98. मैंने रुतबे की चाहत छोड़ दी है

ली निंग, चीन

दिसंबर 2023 में मुझे उपदेशक चुना गया। जब मैंने यह खबर सुनी तो मैं थोड़ा चिंतित हुआ, “एक उपदेशक होने के नाते मुझे कई कलीसियाओं की जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी। मुझे कलीसिया के अगुआओं और उपयाजकों के साथ अक्सर सभा करने और कार्य का मार्गदर्शन करने के लिए उनके साथ संगति करने की जरूरत होगी। इसके लिए सत्य की समझ और समस्याओं के समाधान की खातिर सत्य पर संगति करने की क्षमता की जरूरत होती है। मुझे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए बहुत कम समय हुआ है और सत्य के बारे में मेरी समझ उथली है। मैंने अभी-अभी उपदेशक के तौर पर प्रशिक्षण लेना शुरू किया है और मुझमें कई तरह की कमियाँ हैं। अगर मैं सभाओं के दौरान भाई-बहनों की समस्याएँ हल नहीं कर पाया, तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वे सोचेंगे कि मैं इस कर्तव्य के लिए सक्षम नहीं हूँ और मुझे नीची नजरों से देखेंगे?” लेकिन फिर मैंने सोचा, “कर्तव्य मुझे परमेश्वर की अनुमति से मिला है और उससे भी बढ़कर यह परमेश्वर का अनुग्रह है। मैं परमेश्वर को निराश नहीं कर सकता और कार्य करने में मुझे परमेश्वर पर निर्भर रहना होगा।” इसलिए मैंने यह कर्तव्य स्वीकार कर लिया।

शुरुआत में मैं कलीसिया के अगुआओं और उपयाजकों से सिर्फ पत्रों के जरिए ही कार्य के बारे में बात करता था, लेकिन यह ज्यादा कारगर नहीं रहा। कुछ कार्यों के लिए सभाओं की जरूरत होती थी ताकि हालात को व्यक्तिगत रूप से समझा जा सके और व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया जा सके। मैंने सोचा कि ज्यादातर कलीसिया अगुआ मुझसे ज्यादा समय से परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और निश्चित रूप से मुझसे ज्यादा सत्य समझते हैं। अगर मैं अच्छी तरह से संगति नहीं कर पाया, उनकी समस्याओं और मुश्किलों का समाधान नहीं कर पाया तो क्या यह बेहद शर्मनाक नहीं होगा? अगर हम पत्रों के जरिए बात करते, तो मैं उनकी समस्याओं पर विचार करने के लिए समय निकाल पाता और जो भी बात मुझे समझ नहीं आती, उसके बारे में अपने वरिष्ठों से पूछ लेता। कम से कम मुझे सबके सामने शर्मिंदा तो नहीं होना पड़ता। लेकिन सभाओं के बिना उनकी समस्याओं और मुश्किलों को विस्तार से समझने का कोई तरीका नहीं था, इसलिए मेरे पास उन्हें सभा में आमंत्रित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। मैं सभा के दौरान बहुत घबराया हुआ था। एक बहन ने कहा कि स्वच्छता का कार्य करते समय उसे कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था और वह नहीं जानती थी कि उनका समाधान कैसे किया जाए और उसकी अवस्था भी खराब थी। मेरा दिमाग सुन्न हो गया और मैं तुरंत यह नहीं समझ पाया कि इन समस्याओं को कैसे हल किया जाए और इसलिए मैं और भी घबरा गया। मैंने मन ही मन सोचा, “बहन अभी इंतजार कर रही है कि मैं उसके साथ संगति करूँ। यह मेरी पहली सभा है। अगर मैं समस्याएँ हल नहीं कर पाया, तो भाई-बहन मेरे बारे में क्या सोचेंगे? कहीं वे यह तो नहीं सोचेंगे कि मेरे जैसे स्तर का उपदेशक होकर भी मैं इन समस्याओं को हल नहीं कर पाता?” भाई-बहनों को अपनी असलियत जानने से रोकने के लिए मेरे पास मजबूरन परमेश्वर के वचन खोजने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। काफी देर तक ढूँढ़ने के बाद भी मुझे बहन की अवस्था पर लागू होने वाले कोई वचन नहीं मिले। आखिरकार बड़ी मुश्किल से मुझे एक अंश मिला, लेकिन उसे पढ़ने के बाद किसी ने भी उस पर संगति नहीं की। कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया और मैं शर्म से गड़ा जा रहा था। “यह बहुत शर्मनाक है। निश्चित रूप से जो अंश मुझे मिला है वह उपयुक्त नहीं है और इन समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। भाई-बहनों को अब मेरा असली स्तर पता चल गया होगा। भविष्य में मैं उनका सामना कैसे कर पाऊँगा?” जितना मैंने इसके बारे में सोचा, उतना ही मुझे लगा कि मैं यह कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगा। अंत में मैंने बस बेमन से दो-चार बातें संगति में कहीं और कार्य के बारे में पूछना शुरू करके विषय बदल दिया। लेकिन क्योंकि मैं घबराया हुआ था, इस बात को लेकर चिंतित था कि यदि मैं समस्याएँ हल नहीं कर सका तो मेरे भाई-बहन मुझे किस नजर से देखेंगे, मुझे उनके कार्य के बारे में बस एक बहुत ही मोटा-मोटा अंदाजा प्राप्त हुआ और मैं किसी तरह सभा समाप्त होने तक टिके रहने में सफल रहा। घर पहुँचने पर मैं बहुत नकारात्मक था और मैंने मन ही मन सोचा, “आज की सभा पूरी तरह से नाकाम रही। न केवल मैं भाई-बहनों की समस्याओं का समाधान करने में नाकाम रहा, बल्कि मैंने अपने असली स्तर को भी पूरी तरह से उजागर कर दिया। भविष्य में मैं भाई-बहनों का सामना कैसे कर पाऊँगा?” उस दौरान मैं नकारात्मक अवस्था में जी रहा था और मुझमें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने की कोई ऊर्जा नहीं थी। मैं कार्य का जायजा लेने में उतना तत्पर नहीं था और जानबूझकर सभाओं से बचता रहा। मैंने लगभग एक महीने तक अगुआओं और उपयाजकों के साथ सभा करने की हिम्मत भी नहीं की। कुछ कलीसिया अगुआ लोगों का भेद पहचानने के सिद्धांतों को नहीं समझते थे और लोगों को बाहर निकाल देने की सामग्री को व्यवस्थित करने की प्रगति अत्यंत ही धीमी थी। पत्रों के जरिए कई बार संवाद करने के बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ, इसलिए हमें व्यावहारिक मार्गदर्शन के लिए व्यक्तिगत रूप से मिलना था। हालाँकि, अपनी इज्जत बचाने के लिए मैंने उनसे मिलने और संगति करने की हिम्मत नहीं की। इससे कलीसिया के स्वच्छता कार्य में देरी हुई।

बाद में जब मैंने अपने सहकर्मियों के साथ सभा की तो मैंने उन्हें अपनी अवस्था के बारे में बताया। मेरी सहयोगी बहन ने मुझे परमेश्वर के वचनों के पाठ का एक वीडियो दिखाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब कोई व्यक्ति भाई-बहनों द्वारा अगुआ चुना जाता है या परमेश्वर के घर द्वारा कोई निश्चित कार्य करने या कोई निश्चित कर्तव्य निभाने के लिए पदोन्नत किया जाता है तो इसका यह मतलब नहीं होता कि उसका कोई विशेष रुतबा या पद है या वह जिन सत्यों को समझता है वे उन सत्यों की तुलना में अधिक गहरे और संख्या में अधिक हैं जिन्हें दूसरे लोग समझते हैं—यह व्यक्ति परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम है और उसके साथ विश्वासघात नहीं करेगा, यह कहना तो और भी दूर की बात है। निश्चय ही, इसका यह मतलब भी नहीं है कि वह परमेश्वर को जानता है और परमेश्वर का भय मानने वाला व्यक्ति है। वास्तव में उसने इनमें से कुछ भी हासिल नहीं किया है। पदोन्नति और विकास सीधे मायने में केवल पदोन्नति और विकास ही है और यह उनके पूर्वनियत किए जाने या परमेश्वर द्वारा योग्य पाए जाने के समतुल्य नहीं है। उनकी पदोन्नति और विकास का सीधा-सा अर्थ है कि उन्हें उन्नत किया गया है और वे विकसित किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। और इस विकसित किए जाने का अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि क्या यह व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है और क्या वह सत्य के अनुसरण का रास्ता चुनने में सक्षम है। इस प्रकार जब कलीसिया में किसी को अगुआ बनने के लिए पदोन्नत और विकसित किया जाता है तो उसे सीधे अर्थ में पदोन्नत और विकसित किया जाता है; इसका यह मतलब नहीं कि वह पहले से ही अगुआ के रूप में मानक स्तर पर है और एक सक्षम अगुआ है, कि वह पहले से ही अगुआई का काम करने में सक्षम है और वास्तविक कार्य कर सकता है—ऐसा नहीं है। ज्यादातर लोग इन चीजों की असलियत नहीं देख सकते और अपनी कल्पनाओं के आधार पर वे इन पदोन्नत लोगों को ऊँचा मानने लगते हैं। यह एक भूल है। जिन्हें पदोन्नत किया जाता है, उन्होंने चाहे कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा हो, क्या उनके पास वास्तव में सत्य वास्तविकता होती है? ऐसा जरूरी नहीं है। क्या वे परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाएँ लागू करने में सक्षम हैं? अनिवार्य रूप से नहीं। क्या उनमें जिम्मेदारी की भावना है? क्या वे निष्ठावान हैं? क्या वे समर्पण करने में सक्षम हैं? जब उनके सामने कोई समस्या आती है तो क्या वे सत्य खोज पाते हैं? यह सब अज्ञात है। क्या इन लोगों के अंदर परमेश्वर का भय मानने वाले हृदय हैं? और उनके परमेश्वर का भय मानने वाले हृदय कितने गहरे हैं? क्या काम करते समय वे अपनी इच्छा का पालन करना टाल पाते हैं? क्या वे परमेश्वर की खोज करने में समर्थ हैं? अगुआई का कार्य करने के दौरान क्या वे अक्सर परमेश्वर के इरादों की तलाश में परमेश्वर के सामने आने में सक्षम हैं? क्या वे लोगों के सत्य वास्तविकता में प्रवेश की अगुआई करने में सक्षम हैं? निश्चित रूप से वे ऐसी चीजें कर पाने में अक्षम होते हैं। उन्हें प्रशिक्षण नहीं मिला है और उन्होंने पर्याप्त अनुभव भी हासिल नहीं किया है, इसलिए वे इन चीजों को करने में सक्षम नहीं हैं। इसीलिए, किसी को पदोन्नत और विकसित करने का यह मतलब नहीं कि वह पहले से ही सत्य को समझता है और न ही इसका अर्थ यह है कि वह पहले से ही अपना कर्तव्य ऐसे तरीके से निभाने में सक्षम है जो एक मानक स्तर का है। तो किसी को पदोन्नत और विकसित करने का क्या उद्देश्य और मायने हैं? वह यह है कि इस व्यक्ति को एक व्यक्ति के रूप में पदोन्नत किया गया है, ताकि वह अभ्यास कर सके और वह विशेष रूप से सिंचित और प्रशिक्षित हो सके; इस प्रकार वह इस योग्य हो जाए कि सत्य सिद्धांतों को समझ जाए और विभिन्न चीजों को करने और विभिन्न समस्याओं को हल करने के सिद्धांतों, साधनों और तरीकों को समझ जाए; साथ ही, यह भी समझ जाए कि जब वह विभिन्न प्रकार के परिवेशों और लोगों का सामना करे, तो परमेश्वर के इरादों के अनुसार और उस तरह से चीजों को कैसे सँभाले और उनसे कैसे निपटे जिससे कि परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा हो सके। इन बिंदुओं के आधार पर परखें तो क्या परमेश्वर के घर द्वारा पदोन्नत और विकसित किए गए प्रतिभाशाली लोग, पदोन्नत और विकसित किए जाने की अवधि के दौरान या पदोन्नत और विकसित किए जाने से पहले अपना कार्य और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करने में पर्याप्त सक्षम हैं? बेशक नहीं। इस प्रकार, यह अपरिहार्य है कि विकसित किए जाने की अवधि के दौरान ये लोग काट-छाँट और न्याय किए जाने और ताड़ना दिए जाने, उजागर किए जाने, यहाँ तक कि बर्खास्तगी का भी अनुभव करेंगे; यह सामान्य बात है, यही है प्रशिक्षण और विकसित किया जाना(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (5))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे समझ आया कि सिर्फ किसी व्यक्ति को पदोन्नत और विकसित करने भर का मतलब यह नहीं होता कि वह किसी और से बेहतर है या वह सत्य वास्तविकता रखता है या किसी भी समस्या को स्पष्ट रूप से देख और हल कर सकता है। जब कलीसिया किसी को पदोन्नत और विकसित करती है तो वह उसे जिम्मेदारी और दायित्व सौंपती है, उसे अभ्यास करने के ज्यादा अवसर देती है, समस्याएँ ढूँढ़ना और उनका समाधान करने के लिए सत्य की खोज करना सिखाती है। यह बिल्कुल सामान्य है कि कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें वह समझ नहीं पाता या नहीं कर पाता। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसे तब होता था जब मैं भाई-बहनों के साथ सभा करता था। क्योंकि मुझे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए थोड़ा ही समय हुआ था और मैंने अभी-अभी यह कर्तव्य निभाना शुरू किया था, इसलिए यह बिल्कुल स्वाभाविक था कि मुझे कुछ समस्याओं का समाधान करना नहीं आता था। लेकिन मेरा हमेशा से मानना था कि एक उपदेशक के रूप में मुझे सभी समस्याओं का समाधान करना आना चाहिए और मैं यह नहीं कह सकता था कि मुझे नहीं पता कि उनका समाधान कैसे करना है। जब मैं समस्याएँ हल नहीं कर पा रहा था तो अपनी कमियों को छिपा रहा था। मैं नकारात्मक भी हो गया था और अपने बारे में यह फैसला दे दिया था कि मैं एक उपदेशक के कर्तव्य के योग्य नहीं हूँ, लगभग एक महीने तक अगुआओं और उपयाजकों के साथ सभा करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाया, जिससे कलीसिया के कार्य में देरी हो गई। असल में भले ही मैं उपदेशक था, मेरा आध्यात्मिक कद अब भी वैसा ही था। मुझमें अभी भी कई कमियाँ थीं, सत्य की एक उथली समझ थी और मुझे उन चीजों के बारे में और अधिक खोज करने और पूछने की जरूरत थी जो मुझे समझ में नहीं आती थीं या जो मैं नहीं कर सकता था, भाई-बहनों के साथ खुलकर संगति करनी थी, उनकी खूबियों का लाभ उठाकर अपनी कमजोरियों को दूर करना था, ताकि अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा सकूँ। यह समझने के बाद, मैं कलीसिया के अगुआओं और उपयाजकों के साथ एक सभा के लिए मिलने को तैयार था।

लेकिन जब मैंने उन्हें सभा के बारे में सूचित करने के लिए लिखा तो मेरी पिछली चिंताएँ अवचेतन रूप से फिर से उभर आईं। बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जो ठीक मेरी दशा से निपटता था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सभी भ्रष्ट इंसानों में एक सामान्य खामी होती है : जब उनके पास रुतबा नहीं होता, तो वे दूसरों से बातचीत करते या बोलते समय कोई अकड़ नहीं दिखाते या कोई खास तरीका नहीं अपनाते। उनकी बोली में कोई बनावटी लहजा नहीं होता और वह साधारण और सामान्य होती है। वे दिखावा नहीं करते या इस बात की चिंता नहीं करते कि दूसरे उनके बारे में क्या सोचते हैं। वे कोई मनोवैज्ञानिक दबाव महसूस नहीं करते और वे खुलकर दूसरों के साथ संगति और दिल से दिल की बातें करने में सक्षम होते हैं। दूसरों को लगता है कि वे मिलनसार और सहज हैं और सोचते हैं कि वे काफी अच्छे हैं। जैसे ही उन्हें कोई रुतबा प्राप्त होता है, वे घमंडी बन जाते हैं, साधारण लोगों की अनदेखी करते हैं, कोई उन तक नहीं पहुँच सकता; उन्हें लगता है कि वे श्रेष्ठ हैं और आम लोगों से भिन्न हैं। वे आम इंसान को हेय समझते हैं, बोलते समय श्रेष्ठता का भाव दिखाते हैं और दूसरों के साथ खुलकर संगति करना बंद कर देते हैं। वे अब खुले तौर पर संगति क्यों नहीं करते हैं? उन्हें लगता है कि अब उनके पास रुतबा है और वे अगुआ हैं। उन्हें लगता है कि अगुआओं की एक निश्चित छवि होनी चाहिए, उन्हें साधारण लोगों की तुलना में अधिक ऊँचा होना चाहिए, उनके पास अधिक बड़ा आध्यात्मिक कद और सहनशीलता होनी चाहिए; वे मानते हैं कि आम लोगों की तुलना में, अगुआओं में अधिक धैर्य होना चाहिए, उन्हें अधिक कष्ट उठाने और खपने में समर्थ होना चाहिए और शैतान के किसी भी प्रलोभन का प्रतिरोध करने में सक्षम होना चाहिए। भले ही उनके माता-पिता या परिवार के दूसरे सदस्य मर जाएँ, उन्हें लगता है कि उनमें रोने से बचने का आत्म-नियंत्रण होना चाहिए या उन्हें दूसरों के सामने रोने के बजाय, छिपकर, किसी की नजरों से दूर रोना चाहिए। वे सोचते हैं कि वे किसी को भी अपनी कमियों या खामियों या अपनी किसी भी कमजोरी को देखने नहीं दे सकते और वे किसी को यह भी पता नहीं चलने दे सकते कि वे नकारात्मक हो गए हैं; इसके बजाय, उन्हें ऐसी सभी चीजों को छिपाना ही चाहिए। वे मानते हैं कि रुतबे वाले व्यक्ति को ऐसा ही करना चाहिए। जब वे इस हद तक अपना दमन करते हैं, तो क्या रुतबा उनका परमेश्वर, उनका प्रभु नहीं बन गया है? और ऐसा होने पर, क्या उनमें अभी भी सामान्य मानवता है? जब उनमें ये विचार होते हैं, वे खुद को इस दायरे में रखते हैं और इस तरह का छद्मवेश धारण करते हैं, तो क्या वे रुतबे के प्रति आसक्त नहीं हो गए हैं?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, रुतबे के प्रलोभनों और बंधनों का समाधान कैसे करें)। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन के माध्यम से मैं समझ गया कि उपदेशक बनने के बाद से मैं अपनी कमियों और खामियों का सही ढंग से सामना इसलिए नहीं कर पाया था क्योंकि मैंने खुद को उपदेशक के रूप में एक ऊँचे स्थान पर रख दिया था। सभा से पहले जैसे ही मैंने सोचा कि जिन अगुआओं और उपयाजकों का मैं सामना करूँगा, वे कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते रहे हैं तो मैं घबरा गया, डर गया कि मैं समस्याएँ हल नहीं कर पाऊँगा, वे मुझे अक्षम उपदेशक मान लेंगे, जिससे मैं शर्मिंदा और असहज हो जाता। सभा के दौरान भले ही मैं स्पष्ट रूप से बहन की समस्याओं को देख नहीं पाया था या उनका समाधान नहीं कर पाया था, फिर भी मेरा मानना था कि उपदेशक होने के नाते मैं वास्तव में यह नहीं कह सकता कि मैं उनकी असलियत नहीं देख पा रहा था। इसलिए, मैंने यूँ ही परमेश्वर के वचनों का एक अंश ढूँढ़ लिया था और अनमने ढंग से संगति कर ली थी, इस पर ध्यान दिए बिना कि बहन की समस्याएँ हल हुई हैं या नहीं, मैंने बातचीत को दूसरे काम के बारे में जानने की ओर मोड़ दिया था। फिर भी, क्योंकि मुझे चिंता थी कि मैं अपनी खोजी हुई समस्याओं का समाधान नहीं कर पाया था, मैंने कार्य के बारे में बहुत संक्षेप में ही पूछा था। नतीजतन, सभा में कोई समस्या हल नहीं हुई। अगर मैं उस समय खुलकर और ईमानदारी से अपनी बात कह पाता और फिर सबके साथ मिलकर संगति और खोज करता, तो बहन की समस्याएँ कुछ हद तक हल हो सकती थीं। और अगर वे सचमुच हल नहीं हो पातीं, तो मैं बाद में दूसरों से खोज सकता था। लेकिन मैंने हर मोड़ पर एक उपदेशक के रूप में अपने रुतबे और छवि की रक्षा की, लगातार दिखावा करता रहा और अपनी वास्तविकता को छिपाने के लिए बनावटी रूप ओढ़े रहा। मैंने सोचा कि जब ऊपरी अगुआ मेरे साथ सभा कर रहे थे, मैंने जितना समझा, उतनी संगति की और जो कुछ भी मुझे समझ नहीं आया, उसके बारे में अपना दिल खोलकर पूछताछ की। उन सभाओं के दौरान मुझे सुकून और मुक्ति का एहसास हुआ। लेकिन जब भी मैं भाई-बहनों के साथ सभा करता था तो सुकून और मुक्ति का यह एहसास पूरी तरह से गायब हो जाता था। मेरा मानना था कि उपदेशक के तौर पर मैं उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए वहाँ था और इसलिए मैंने अवचेतन रूप में खुद को उपदेशक के तौर पर एक ऊँचे स्थान पर बैठा लिया था। मैंने लगातार अपनी कमियाँ छिपाने की कोशिश की थी और नतीजतन, मैं परमेश्वर की अगुआई प्राप्त नहीं कर पाया था। इससे सभाओं में मेरी संगति नीरस और बेजान हो गई और इसने मुझे बहुत थका हुआ महसूस कराया।

मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा और अपनी समस्या के बारे में थोड़ी और समझ प्राप्त की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के प्रति मसीह-विरोधियों का अनुराग साधारण लोगों से कहीं ज्यादा होता है और यह एक ऐसी चीज है जो उनके स्वभाव सार के भीतर होती है; यह कोई अस्थायी रुचि या उनके परिवेश का क्षणिक प्रभाव नहीं होता—यह उनके जीवन, उनकी हड्डियों में समायी हुई चीज है और इसलिए यह उनका सार है। कहने का तात्पर्य यह है कि मसीह-विरोधी जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका पहला विचार उनकी अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे का होता है और कुछ नहीं। मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा उनका जीवन हैं और वही वे लक्ष्य होते हैं जिसका वे जीवन भर अनुसरण करते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका पहला विचार यही होता है : ‘मेरे रुतबे का क्या होगा? और मेरी प्रतिष्ठा का क्या होगा? क्या ऐसा करने से मुझे अच्छी प्रतिष्ठा मिलेगी? क्या इससे लोगों के मन में मेरा रुतबा बढ़ेगा?’ यही वह पहली चीज है जिसके बारे में वे सोचते हैं जो इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उनमें मसीह-विरोधियों का स्वभाव और सार होता है—और इसी कारण से वे चीजों को इस तरह से देखते हैं। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा कोई अतिरिक्त आवश्यकता नहीं है, यह बात तो रहने ही दो कि ये उनके लिए ऐसी बाहरी चीजें हैं जिनके बिना उनका काम चल सकता है। ये मसीह-विरोधियों की प्रकृति का हिस्सा हैं, ये उनकी हड्डियों में हैं, उनके खून में हैं, ये उनमें जन्मजात हैं। मसीह-विरोधी इस बात के प्रति उदासीन नहीं होते कि उनके पास प्रतिष्ठा और रुतबा है या नहीं; यह उनका रवैया नहीं होता। फिर उनका रवैया क्या होता है? प्रतिष्ठा और रुतबा उनके दैनिक जीवन से, उनकी दैनिक स्थिति से, जिस चीज का वे रोजाना अनुसरण करते हैं उससे, घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं। मसीह-विरोधियों के लिए रुतबा और प्रतिष्ठा उनका जीवन हैं। चाहे वे कैसे भी जीते हों, चाहे वे किसी भी परिवेश में रहते हों, चाहे वे कोई भी काम करते हों, चाहे वे किसी भी चीज का अनुसरण करते हों, उनके कोई भी लक्ष्य हों, उनके जीवन की कोई भी दिशा हो, यह सब अच्छी प्रतिष्ठा और ऊँचा रुतबा पाने के इर्द-गिर्द घूमता है। और यह लक्ष्य बदलता नहीं है; वे कभी ऐसी चीजों को दरकिनार नहीं कर सकते हैं। यह मसीह-विरोधियों का असली चेहरा और सार है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। परमेश्वर उजागर करता है कि एक मसीह-विरोधी प्रतिष्ठा और रुतबे को ही अपना जीवन मानता है। वह चाहे कुछ भी करे, हमेशा अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को सबसे पहले महत्व देता है, प्रतिष्ठा और रुतबे के बिना उसके पास कुछ भी करने की कोई प्रेरणा नहीं होती। यह उसके प्रकृति सार से निर्धारित होता है। मैंने भी हर मोड़ पर अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा की। उपदेशक चुने जाने के बाद मैं किसी भी सभा में जाने से पहले ही समस्याएँ हल न कर पाने की चिंता करने लगा था। मैं सभाओं में नहीं जाना चाहता था क्योंकि मुझे डर था कि भाई-बहन मेरा असली स्तर देख लेंगे। यूँ तो मुझे अच्छी तरह पता था कि भाई-बहन लोगों को बाहर निकाल देने की सामग्री को व्यवस्थित करने के सिद्धांतों को नहीं समझते हैं और उन्हें आमने-सामने के मार्गदर्शन की जरूरत है, फिर भी मैं उनके सामने मूर्ख बनने और अपनी इज्जत खोने से डरता था, इसलिए मैं सभा में नहीं जाता था। इसका मतलब था कि स्वच्छता कार्य संबंधी समस्याओं के समाधान में बहुत देरी हो गई थी, जिससे काम में देरी हुई थी। मैंने प्रतिष्ठा और रुतबे की बहुत ज्यादा परवाह की थी! अतीत में जब मैं संसार में रहता था, तो मुझमें प्रतिष्ठा और रुतबे की खास तौर पर तीव्र इच्छा थी। जब मैं कार्य करता था तो अक्सर बैठकों में शिफ्ट का अगुआ मेरी तारीफ करता था क्योंकि मुझमें जबर्दस्त कार्य नैतिकता थी और कुछ कौशल भी थे। मालिक भी मुझे बहुत मानता था और उसने मुझे कुछ कार्यों की जिम्मेदारी लेने को कहा था। इससे मुझे बहुत खुशी हुई थी। लेकिन जब मेरे कार्य को दोबारा करने की जरूरत पड़ी और शिफ्ट के अगुआ ने मेरी आलोचना की, क्योंकि मुझे लगा कि इतने सारे लोगों के सामने मेरी इज्जत चली गई है तो मैं बस इस्तीफा देना चाहता था। परमेश्वर के घर अपना कर्तव्य करने आने के बाद भी मैं अपने अभिमान और रुतबे को सबसे पहले रखता था और यह स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करता था कि कुछ कार्य ऐसे हैं जिन्हें मैं सँभाल नहीं पाता। मैंने ज्यादा समय तक परमेश्वर में विश्वास नहीं किया था, लेकिन मुझ पर परमेश्वर का अनुग्रह था कि मैं एक उपदेशक के रूप में अपना कर्तव्य निभा सका। परमेश्वर का इरादा था कि मैं अपने कर्तव्य में समस्याओं को हल करने के लिए सत्य खोजने का प्रशिक्षण लूँ। यह सत्य प्राप्त करने का एक अच्छा अवसर था। लेकिन मैंने यह नहीं सोचा कि मैं अपना कर्तव्य कैसे अच्छी तरह निभाऊँ और परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करूँ, बल्कि मैंने अपने अभिमान और रुतबे की रक्षा करने की पूरी कोशिश की। जब मैंने कलीसिया के काम में ऐसी समस्याएँ देखीं जिनका समाधान जरूरी था, तो मैं अपनी इज्जत और रुतबा बचाने के लिए पीछे हट गया और उन्हें हल करने से कतराने लगा। मैंने कलीसिया के काम पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। मैं खास तौर पर स्वार्थी और घिनौना था। मैं जिस मार्ग पर चल रहा था, वह परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला, मसीह-विरोधियों का मार्ग था! जब मुझे यह बात समझ में आई तो मुझे लगा कि मेरी अवस्था बहुत खतरनाक है, मैं जल्दी से पश्चात्ताप करके चीजों को बदलने के लिए तैयार था।

बाद में जब उच्च अगुआओं को मेरी अवस्था के बारे में पता चला तो उन्होंने मेरे साथ परमेश्वर के वचनों के दो अंश साझा किए, जिनसे मुझे रुतबे को त्यागने का अभ्यास करने का मार्ग मिला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम साधारण और सामान्य व्यक्ति कैसे बन सकते हो? ... सबसे पहले, खुद को कोई उपाधि मत दो और फिर खुद को सीमित मत होने दो, यह कहते हुए, ‘मैं अगुआ हूँ, मैं टीम का प्रभारी हूँ, मैं पर्यवेक्षक हूँ या मैं इस क्षेत्र में सबसे अधिक जानकार और तकनीकी रूप से कुशल व्यक्ति हूँ।’ अपनी खुद की दी हुई उपाधि से बाधित मत हो। जैसे ही ऐसा होता है, यह तुम्हें कसकर बाँध देगा; तुम्हारी कथनी-करनी इससे प्रभावित होगी, साथ ही तुम्हारी सामान्य सोच और निर्णय भी। तुम्हें इस रुतबे की बाधाओं से खुद को मुक्त करना चाहिए। सबसे पहले, इस आधिकारिक उपाधि के स्थान से नीचे उतरो और एक साधारण व्यक्ति का स्थान ग्रहण करो। तब तुम्हारी मानसिकता कुछ हद तक सामान्य हो जाएगी। तुम्हें यह भी स्वीकार करना है : ‘मैं नहीं जानता कि इसे कैसे करना है और मैं उस चीज को नहीं समझता हूँ—मुझे कुछ शोध और अध्ययन करना है’ या ‘मैंने इसका कभी अनुभव नहीं किया है, इसलिए मुझे नहीं पता कि क्या करना है।’ जब तुम वह कह सकते हो जो तुम वास्तव में सोच रहे हो और इस तरह ईमानदारी से बोल सकते हो, तो तुम सामान्य विवेक से युक्त होगे। यदि तुम दूसरों को अपनी असलियत जानने देते हो, तो वे तुम्हारे बारे में एक सामान्य दृष्टिकोण रखेंगे और तुम्हें कोई मुखौटा नहीं लगाना पड़ेगा। तुम अब भारी दबाव महसूस नहीं करोगे और तुम दूसरों के साथ सामान्य रूप से संवाद कर पाओगे। इस तरह जीना मुक्त और सहज है। जिस किसी को भी जीवन बहुत ही थकाऊ लगता है, इसके लिए वह खुद ही दोषी है। कुछ भी दिखावा मत करो या छिपाओ मत। सबसे पहले, अपने दिल में जो सोच रहे हो और अपने सच्चे विचारों के बारे में खुलकर बताओ, ताकि हर कोई उन्हें जाने और समझे। इस तरह, तुम्हारी चिंताएँ, साथ ही तुम्हारे और दूसरों के बीच की बाधाएँ और संदेह, सब समाप्त हो जाएँगे। इसके अलावा, एक और चीज भी है जो तुम्हें बाँध रही है, वह यह है कि तुम हमेशा खुद को टीम का मुखिया, एक अगुआ या कार्यकर्ता, पदवी, रुतबे और हैसियत वाला कोई व्यक्ति मानते हो—अगर तुम फिर कहते हो कि तुम यह नहीं समझते और वह करने में असमर्थ हो, तो क्या यह खुद को नीचा दिखाना नहीं है? जब तुम अपने दिल की इन बेड़ियों को तोड़ देते हो, जब तुम खुद को अगुआ या कार्यकर्ता समझना बंद कर देते हो और जब तुम यह सोचना बंद कर देते हो कि तुम दूसरे लोगों से बेहतर हो और इसके बजाय महसूस करते हो कि तुम एक साधारण व्यक्ति हो, जो बाकी सब जैसा ही है और यह कि कुछ क्षेत्रों में तुम दूसरों से कमतर हो, फिर जब तुम इस मानसिकता के साथ सत्य और काम से संबंधित मामलों पर संगति करते हो, तो नतीजे और माहौल दोनों अलग होंगे। यदि तुम्हारे दिल में हमेशा शंकाएँ रहती हैं, यदि तुम हमेशा तनावग्रस्त और बाधित महसूस करते हो और तुम इन चीजों को छोड़ना चाहते हो पर छोड़ नहीं पाते, तो तुम्हें ईमानदारी से परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, आत्म-चिंतन करना चाहिए, अपनी कमियों को पहचानना चाहिए और सत्य की ओर प्रयास करना चाहिए। यदि तुम सत्य को अभ्यास में लाने लगोगे, तो तुम्हें नतीजे मिलेंगे। तुम जो कुछ भी करो, रुतबे की जगह से या अपनी पदवी को ध्यान में रखकर मत बोलो और इस तरह काम मत करो। सबसे पहले, इन सब को एक तरफ रख दो और एक साधारण व्यक्ति का स्थान ग्रहण करो(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के वचनों को सँजोना परमेश्वर में विश्वास की नींव है)। “तुम्हारे लिए रुतबे का अर्थ क्या है? दरअसल, रुतबा बस एक फालतू, अतिरिक्त चीज है, एक वस्त्र या एक टोपी की तरह। यह बस एक आभूषण है। इसका कोई वास्तविक उपयोग नहीं है, और इसकी मौजूदगी किसी भी चीज को प्रभावित नहीं करती। तुम्हारा कोई रुतबा हो या न हो, तुम अभी भी वही व्यक्ति हो। तुम्हें सत्य वास्तविकता सिर्फ इसलिए हासिल नहीं होगी क्योंकि तुमने रुतबा पा लिया है। लोग सत्य को समझ सकते हैं या नहीं, वे सत्य और जीवन प्राप्त कर सकते हैं या नहीं, इसका रुतबे से कोई लेना-देना नहीं है। जब तक तुम रुतबे को कोई बड़ी बात नहीं समझते, तब तक वह तुम्हें बाधित नहीं कर सकता। हालाँकि, यदि तुम रुतबे से प्रेम करते हो और उस पर विशेष ध्यान देते हो, उसे हमेशा एक महत्वपूर्ण मामला मानते हो, तो वह तुम्हें अपने नियंत्रण में कर लेगा और तुम हमेशा अपने रुतबे और लोगों के मन में अपनी छवि की रक्षा करना चाहोगे। तुम खुलकर अपनी असलियत सामने रखने या आत्म-ज्ञान प्राप्त करने को तैयार नहीं होगे, तुम अपने क्रियाकलापों, अपनी बोली, दूसरों के साथ मिलने-जुलने और अपने कर्तव्य निर्वहन में एक अगुआ के रूप में अपनी पहचान और रुतबे को दरकिनार करने को राजी नहीं होगे। यह कैसी समस्या है? क्या यह रुतबे से बाधित होने का मामला नहीं है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि तुम रुतबे वाले स्थान से बोलते और कार्य करते हो और अपने ऊँचे पद से उतर नहीं सकते हो। ऐसा करके क्या तुम खुद को ही नहीं सता रहे हो? अगर तुम सचमुच सत्य समझते हो और रुतबा रखते हो पर उसे खुद पर हावी नहीं होने देते हो, बल्कि वे सभी कर्तव्य और जिम्मेदारियाँ पूरी करने में ध्यान लगा सकते हो, जो तुम्हें पूरी करनी चाहिए और अगर तुम खुद को एक साधारण भाई-बहन की तरह देखते हो, तो तुम रुतबे से बाधित नहीं होगे, है ना?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, रुतबे के प्रलोभनों और बंधनों का समाधान कैसे करें)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे समझ आया कि “उपदेशक” शब्द सिर्फ एक ओहदा है और यह किसी चीज का प्रतिनिधित्व नहीं करता। ऐसा नहीं था कि मैं सिर्फ उपदेशक होने के कारण तुरंत सत्य समझ सकता था और समस्याएँ हल कर सकता था; मेरा आध्यात्मिक कद अब भी पहले जैसा ही था और मैं उन चीजों को अब भी नहीं कर पाता जो मैं नहीं कर सकता था। परमेश्वर आशा करता है कि मैं एक व्यावहारिक, साधारण व्यक्ति बन सकूँ; ओहदों से बंधा या बेबस न रहूँ; सभाओं के दौरान अपनी भ्रष्टता और कमियों के बारे में खुलकर बता सकूँ, जितना मैं समझता हूँ, उतनी ही संगति कर सकूँ; एक ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास कर सकूँ और जब ऐसी समस्याओं या मुश्किलों का सामना करूँ जिनका मैं समाधान नहीं कर सकता तो “मुझे नहीं पता” कह सकूँ; भाई-बहनों के साथ खोज और संगति कर सकूँ और अपना कर्तव्य अच्छे से निभा सकूँ। परमेश्वर का इरादा समझने के बाद मैं इस संबंध में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करने को तैयार था। बाद में सभाओं के दौरान मैं खुद को उपदेशक के ऊँचे स्थान पर नहीं रखता था, जब मेरे सामने समस्याएँ आतीं जो मुझे समझ में न आतीं तो मैं सबके साथ मिलकर उन पर चर्चा करता और उनका समाधान करता था।

एक बार, मैं एक कलीसिया में उसके काम के बारे में जानने गया और एक भाई को देखा जिससे मैं पहले भी संपर्क में था। उसका जीवन प्रवेश काफी अच्छा था और वह समस्याओं को हल करने के लिए सत्य पर संगति कर सकता था। मैं सोचने लगा, “अगर मैं समस्याओं को सुलझाने में उतना अच्छा नहीं रहा जितना वह है तो भाई-बहन मेरे बारे में क्या सोचेंगे? कहीं वे यह तो नहीं सोचेंगे कि मैं, एक उपदेशक, सत्य का उपयोग करके समस्याओं का समाधान भी नहीं कर सकता? यह बहुत अजीब महसूस होगा!” मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से अपने रुतबे और ओहदे से बेबस हो रहा हूँ और अतीत की सभाओं के बारे में सोचा, जब मैंने हमेशा प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए चीजें छिपाई थीं और खुद को छिपाया था, उन बातों को खुलकर कहने और उजागर करने की हिम्मत नहीं की थी जो मुझे समझ नहीं आती थीं या जो मैं नहीं कर सकता था। सभाओं में दिखावा करना वाकई बहुत दुखद और पीड़ादायक था! मैं अब ऐसा नहीं करना चाहता था। मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आए : “यदि तुम रुतबे के बंधन और बाधाओं से पीड़ित नहीं होना चाहते, तो तुम्हें इन सभी पदवियों और प्रभामंडलों को छोड़ देना चाहिए और अपने भाई-बहनों को अपनी सच्ची दशा और अपने दिल के विचार बताने चाहिए। उन्हें अपनी कमियाँ और खामियाँ देखने दो; इस तरह, वे तुम्हारे साथ सही ढंग से व्यवहार कर पाएँगे, तुम्हें बहुत अधिक सम्मान नहीं देंगे या तुम्हें आदर की दृष्टि से नहीं देखेंगे और मुखौटा लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। फिर, जब तुम खुलकर अपनी असली दशा के बारे में सब कुछ बता दोगे, तो क्या तुम्हारा दिल अधिक स्थिर, अधिक शांत महसूस नहीं करेगा? अपनी पीठ पर इतना भारी बोझ लेकर क्यों चलना? यदि तुम अपनी सच्ची स्थिति दिखाओगे, तो क्या भाई-बहन सच में तुम्हें नीची नजर से देखेंगे? क्या वे सच में तुम्हें त्याग देंगे? बिल्कुल नहीं। इसके विपरीत, भाई-बहन तुम्हारा अनुमोदन करेंगे और तुम्हारे दिल से बोलने के साहस के लिए तुम्हारी प्रशंसा करेंगे। वे कहेंगे कि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो। यह तुम्हें कलीसिया का काम करने में बिल्कुल भी बाधा नहीं डालेगा, न ही इस पर जरा भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यदि भाई-बहन सच में देखते हैं कि तुम्हें कठिनाइयाँ हैं, तो वे तुम्हारी मदद करने और तुम्हारे साथ सहयोग करने के लिए पहल करेंगे। क्या ऐसा नहीं होगा?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के वचनों को सँजोना परमेश्वर में विश्वास की नींव है)। परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ आया कि अगर मैं रुतबे और ओहदे को छोड़ना चाहता हूँ तो मुझे ईमानदार इंसान बनना होगा, बिना किसी बात को छिपाए या बिना भेष बदले, भाई-बहनों के साथ अपने सच्चे विचारों के बारे में खुलकर संगति करनी होगी, भाई-बहनों से पूछूँ और उन बातों के बारे में सबके साथ संगति करूँ जो मुझे समझ नहीं आतीं, अपनी कमजोरियों की भरपाई के लिए एक-दूसरे की खूबियों से सीखूँ। यह मेरे और कलीसिया के कार्य, दोनों के लिए फायदेमंद है। इसलिए, मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह मुझे राह दिखाए ताकि मैं अपना घमंड और रुतबा त्याग सकूँ, ओहदे के बंधनों को उतार फेंकूँ, एक ईमानदार व्यक्ति बनूँ और संगति में खुलकर अपनी बात रखूँ। सभा के दौरान मैंने खुलकर कहा कि मुझमें कई कमियाँ हैं और अगर किसी को कोई समस्या है, तो हम एक साथ संगति कर सकते हैं और एक-दूसरे की खूबियों से सीख सकते हैं। जब मैंने खुद को उपदेशक के ऊँचे स्थान पर रखना बंद कर दिया, तो मैं सभा में अब उतना तनावग्रस्त या बेबस नहीं होता था। इसके बजाय उस पूरी सभा में मैं सचमुच मुक्त और आजाद महसूस कर रहा था। मुझे भाई-बहनों की संगति से भी कुछ रोशनी मिली, मैंने समस्याओं को और स्पष्ट रूप से देखा। मुझे अपने दिल की गहराइयों से लगा कि सभा के दौरान रुतबे और ओहदे को छोड़ देना कितना सुकून देने वाला है।

इस दौरान अपने अनुभव से, मैंने समझा कि अपने कर्तव्य करते हुए प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करने से मुझे केवल पीड़ा और कष्ट ही मिले, मैं जिस मार्ग पर चल रहा था, वह मसीह-विरोधियों का और परमेश्वर का प्रतिरोध करने का मार्ग था। आखिरकार परमेश्वर द्वारा मुझे हटा दिया जाता। केवल एक सृजित प्राणी की उचित स्थिति में खड़े होकर, व्यावहारिक बनकर और सीधे-सीधे खुलकर और एक ईमानदार व्यक्ति बनकर ही मैं अपना कर्तव्य अच्छे से निभा सकता हूँ।

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