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क्या तुम ईसाई प्रार्थना के 4 प्रमुख तत्वों को जानते हो?

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यांग यांग, चीन

भाइयों और बहनों, हम सभी जानते हैं कि परमेश्वर से प्रार्थना करना ईसाइयों के लिए परमेश्वर से संवाद करने का सबसे सीधा तरीका है। यही कारण है कि, सुबह और शाम की प्रार्थनाओं के अलावा, हम और भी कई बार प्रार्थना करते हैं जैसे कि जब हम बाइबल पढ़ते हैं, जब हम सभाओं में होते हैं, जब हम विश्रामदिन का पालन करते हैं, या जब हम कठिनाइयों का सामना करते हैं। लेकिन क्या हमारी प्रार्थनाएँ प्रभु की इच्छा के अनुसार होती हैं, और क्या वह हमें सुनेगा? यह कुछ ऐसा है जिसे समझना हर भाई और बहन के लिए महत्वपूर्ण है; अन्यथा, चाहे हम कितनी भी बार प्रार्थना करें या कितने ही समय तक करें, ये प्रार्थनाएँ परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं करेंगी। वास्तव में, प्रभु यीशु ने हमें ये उत्तर बहुत पहले दिए थे, इसलिए, चलो हम देखें, इस संबंध में सच्चाई क्या कहती है!

1. प्रार्थना में एक सर्जित प्राणी के स्थान पर खड़े रहो

लूका 18:9-14 में, यह दर्ज है, "उसने उनसे जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं, और दूसरों को तुच्छ जानते थे, यह दृष्‍टान्त कहा: "दो मनुष्य मन्दिर में प्रार्थना करने के लिये गए; एक फरीसी था और दूसरा चुंगी लेनेवाला। फरीसी खड़ा होकर अपने मन में यों प्रार्थना करने लगा, 'हे परमेश्‍वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि मैं दूसरे मनुष्यों के समान अन्धेर करनेवाला, अन्यायी और व्यभिचारी नहीं, और न इस चुंगी लेनेवाले के समान हूँ। मैं सप्‍ताह में दो बार उपवास रखता हूँ; मैं अपनी सब कमाई का दसवाँ अंश भी देता हूँ।' "परन्तु चुंगी लेनेवाले ने दूर खड़े होकर, स्वर्ग की ओर आँखें उठाना भी न चाहा, वरन् अपनी छाती पीट-पीटकर कहा, 'हे परमेश्‍वर, मुझ पापी पर दया कर!' मैं तुम से कहता हूँ कि वह दूसरा नहीं, परन्तु यही मनुष्य धर्मी ठहराया जाकर अपने घर गया; क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा" प्रभु यीशु के दृष्टांत से यह देखना आसान है कि प्रभु ने चुंगी लेने वाले की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और फरीसी की प्रार्थना का तिरस्कार किया। ऐसा इसलिए है क्योंकि फरीसी ने दिखावा किया था, और खुद को प्रदर्शित कर परमेश्वर को अपने काम गिना रहा था। उसने खुद को एक बहुत ऊँचे, यहाँ तक कि परमेश्वर के बराबर, स्थान पर रखा। उसने परमेश्वर के साथ मोलभाव किया, परमेश्वर के अपने कार्य का श्रेय ले लिया, और परमेश्वर के सामने थोड़ी-सी भी धर्मनिष्ठता का पालन नहीं किया। उसके मन में परमेश्वर के प्रति बिलकुल ही भय नहीं था, और इस बात ने परमेश्वर में तिरस्कार और घृणा को जगाया। लेकिन चुंगी लेने वाला पूरी तरह से अलग था। वह जानता था कि वह एक तुच्छ पापी था, इसलिए अपनी प्रार्थना में उसे परमेश्वर का भय था और उसने खुद को खोल कर रखा, अपने स्वयं की भ्रष्टता को स्वीकार किया और परमेश्वर की क्षमा के लिए ईमानदारी से विनती की, और अंत में, उसने परमेश्वर की दया प्राप्त कर ली। परमेश्वर के प्रति उन दोनों के भिन्न नज़रिए के कारण उनके प्रति परमेश्वर का दृष्टिकोण भी अलग-अलग था। इसकी तुलना हमारी अपनी प्रार्थनाओं से करो। हम अक्सर गलत रुख अपना लेते हैं। उदाहरण के लिए: कभी-कभी जब हम कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो हम जानते हैं कि हम जो भी करते हैं वह प्रभु के वचनों के अनुरूप नहीं होता है, लेकिन हम फिर भी इसे करने की ज़िद करते हैं, और हमारी प्रार्थनाओं में हम यह भी चाहते हैं कि परमेश्वर भी हमारी मर्जी के अनुसार काम करे। या, जब हम अपने कर्तव्यों में कुछ पूरा कर लेते हैं, जैसे कि गिरफ्तार हो जाने पर हम प्रभु के साथ विश्वासघात नहीं करते हैं, तो हमें लगता है कि हम प्रभु के प्रति ऐसे अत्यंत समर्पित व्यक्ति हैं, जो वास्तव में उससे प्यार करते हों, इसलिए जब हम प्रार्थना करते हैं, तो हम आशीषें या मुकुट माँगते हैं, और अगर परमेश्वर हमें आशीर्वाद नहीं देता, तो हम उसके साथ खटपट करते हैं। या, जब हम बीमार पड़ते हैं या घर में कुछ भयानक बात हो जाती है, तो हमारी प्रार्थनाओं में हम परमेश्वर को हमारी रक्षा न करने के लिए दोषी ठहराते हैं, और हम उसके साथ बहस करने और हिसाब निपटाने की कोशिश करते हैं। यह सूची लम्बी होते जाती है। ये सभी प्रार्थनाएँ परमेश्वर से माँगें करती हैं और उससे ज़बरदस्ती करती हैं। यह उसका शोषण करना, उसे दोषी ठहराना और यहाँ तक कि उसके खिलाफ़ खड़ा होना और उसका विरोध करना है। इस प्रकार की प्रार्थनाओं में जमीर और विवेक का पूरी तरह से अभाव होता है, और इस तरह प्रार्थना करना परमेश्वर का विरोध करना है। ईसाई प्रार्थना का उद्देश्य होना चाहिए कि परमेश्वर हमें सुने, और चुंगी लेने वाले की तरह प्रार्थना की जाए। हमें एक सर्जित प्राणी की स्थिति में खड़ा होना चाहिए, उसके समक्ष धर्मनिष्ठता के साथ पेश होना चाहिए, और आज्ञाकारी होने की पूर्व शर्त के साथ परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए। हमें अपनी स्वयं की इच्छाओं को परमेश्वर पर थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिए या यह माँग नहीं करनी चाहिए कि वह सभी चीज़ों को हमारी इच्छा के अनुसार किया करे। हमें केवल यह माँगना चाहिए कि परमेश्वर अपनी इच्छा के अनुसार ही चीज़ों को पूरा करे। यह एकमात्र तरीका है जिससे परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं को सुनेगा, और हमारा प्रबोधन एवं मार्गदर्शन करेगा।

2. परमेश्वर से नेकी और ईमानदारी के साथ प्रार्थना करो

एक बार प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों से कहा: "जब तू प्रार्थना करे, तो कपटियों के समान न हो, क्योंकि लोगों को दिखाने के लिये आराधनालयों में और सड़कों के मोड़ों पर खड़े होकर प्रार्थना करना उनको अच्छा लगता है। मैं तुम से सच कहता हूँ कि वे अपना प्रतिफल पा चुके। परन्तु जब तू प्रार्थना करे, तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द कर के अपने पिता से जो गुप्‍त में है प्रार्थना कर। तब तेरा पिता जो गुप्‍त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा" (मत्ती 6:5-6)। बाइबल में लिखी बातों से हम देख सकते हैं कि जब फरीसी प्रार्थना किया करते थे, तो वे अक्सर लोगों की भीड़ वाली जगह चुनना पसंद करते थे। प्रार्थना करने के लिए उन्हें यहूदियों के मंदिरों में या चौराहों पर खड़े होने में मज़ा आता था, और फिर वे अक्सर पवित्रशास्त्र का पाठ करते और लंबी, खोटी प्रार्थनाएँ किया करते थे। यह सब दूसरों को दिखाने के लिए किया जाता था, ताकि दूसरे उन्हें भक्तिपूर्ण और धर्मनिष्ठ समझें, और इस तरह लोगों की प्रशंसा मिले और लोग उन्हें ऊँची नज़रों से देखें। उस तरह की प्रार्थना खुद को ऊपर उठाने और दिखावा करने के अलावा और कुछ नहीं है; यह परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश करना है। इसीलिए प्रभु यीशु ने कहा था कि फरीसी पाखंडी थे, और उनकी प्रार्थना पाखंडी थी, प्रभु की नज़रों में घृणा के योग्य थी। सोच कर देखो, कई बार जब हम प्रार्थना करते हैं, तो हममें भी गलत उद्देश्य होते हैं। उदाहरण के तौर पर, सभाओं में प्रार्थना करते समय, हम परमेश्वर से अपनी सच्ची कठिनाइयों या भ्रष्टता के बारे में बातें नहीं करते हैं, उससे अपने दिल की बात नहीं कहते हैं, और उससे हमारी अगुआई और मार्गदर्शन करने के लिए नहीं कहते हैं। इसके बजाय, हम अलंकृत शब्द बोलते हैं और खोखली प्रशंसा करते हैं, अन्यथा हम बाइबल के अध्यायों का पाठ करते हैं या पवित्रशास्त्र के बारे में बोलते रहते हैं, क्योंकि हम सोचते हैं कि जो भी शास्त्रों को अधिक याद कर लेता है और अधिक वाक्पटुता से प्रार्थना करता है, वही बेहतर प्रार्थना करता है। हम यह भी सोचते हैं कि जितनी अधिक बार हम रात के अंतिम पहर में और शाम को प्रार्थना करते हैं, जितना अधिक हम भोजन से पहले प्रार्थना करते हैं और खाने के बाद परमेश्वर की कृपा के लिए धन्यवाद करते हैं, और जितना अधिक समय हम इन चीज़ों पर खर्च करते हैं, हम उतने ही अधिक आध्यात्मिक और भक्तिपूर्ण बन जाएँगे। हमें लगता है कि इस तरह से प्रार्थना करना प्रभु की इच्छा के अधिक अनुरूप होता है। वास्तव में, उस तरह से प्रार्थना करना हमारे दिलों को प्रभु के साथ साझा करना नहीं है और यह वास्तव में उसकी उपासना नहीं है। इसके बजाय, यह हमारे अपने उद्देश्यों और लक्ष्यों से चिपके रहना है, और यह दूसरों को बताने के लिए है कि हम कितनी अच्छी तरह खोज करते हैं, जबकि हम इसका इस्तेमाल दिखावा करने के लिए करते हैं। इस तरह की प्रार्थना केवल रटी हुई, सिर्फ ऊपरी होती है, और यह एक धार्मिक रिवाज के रूप में प्रार्थना करना है। यह परमेश्वर के प्रति बेपरवाही और उसे बेवकूफ बनाने की कोशिश है, जिससे उसे घृणा हो जाती है। प्रभु यीशु ने कहा, "परमेश्‍वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसकी आराधना करनेवाले आत्मा और सच्‍चाई से आराधना करें" (यूहन्ना 4:24)। परमेश्वर सृष्टि का प्रभु है, इसलिए जब हम सर्जित प्राणी सृष्टिकर्ता के सामने प्रार्थना करें, तो हमारे पास एक भयपूर्ण ह्रदय होना चाहिए और हमें ईमानदारी से उसकी उपासना करनी चाहिए, उसकी निगरानी को स्वीकार करना चाहिए, और परमेश्वर से खुलकर और ईमानदारी से बात करनी चाहिए। केवल इस तरह की प्रार्थना ही परमेश्वर को प्रसन्न करती है।

3. परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए प्रार्थना करो

मत्ती 6:9-10,13 में प्रभु यीशु ने कहा: "अत: तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो: हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो। ... और हमें परीक्षा में न ला, परन्तु बुराई से बचा।" जबसे शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट किया गया है, परमेश्वर मानवता को बचाने का कार्य कर रहा है, ताकि हम बुराई से रिहाई पा सकें, शैतान के बंधन और नुकसान से बच सकें, और अंततः हम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकें। इसलिए परमेश्वर उम्मीद करता है कि लोग उसके सामने आने में सक्षम हों और उसके उद्धार को स्वीकार करें। वह यह भी उम्मीद करता है कि लोग उसके वचनों के अनुसार जिएँ और सर्वोपरि उसका सम्मान करें। यही कारण है कि हमारी प्रार्थनाओं में, हम केवल अपने लिए आग्रह नहीं कर सकते हैं। हमें परमेश्वर की इच्छा पर भी विचार करना होगा, पृथ्वी पर परमेश्वर की इच्छा पूर्ण हो, पृथ्वी पर मसीह का राज्य आए और परमेश्वर का सुसमाचार दुनिया के हर कोने में फैल जाए इसके लिए प्रार्थना करनी होगी। यह अभ्यास का एक और मार्ग है जिसके द्वारा ईसाई प्रार्थना परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो सकती है। उदाहरण के लिए, जब हम सुसमाचार का प्रसार करते समय विभिन्न कठिनाइयों, उपहास और कष्टों का सामना करते हैं और हम कमज़ोर और नकारात्मक महसूस करते हैं, तो हमें विश्वास और शक्ति के लिए नेकी से परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए ताकि हम देहासक्ति को त्याग सकें, सभी कठिनाइयों को दूर कर सकें, और दुश्मन की ताक़तों के अधीन न हो जाएँ। जब हम काम और प्रचार कर रहे हों, तो हमें एक ज़िम्मेदारी के साथ परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें प्रबुद्ध करे और उसके वचनों को समझने में हमारा मार्गदर्शन करे, ताकि हम सभाओं के दौरान उसकी इच्छा को सहभागिता में साझा कर सकें। तब हम अपने भाइयों और बहनों को परमेश्वर के वचनों के अभ्यास और अनुभव में ले जा सकते हैं और उन्हें परमेश्वर के सामने ला सकते हैं। जब हम कलीसिया में अनैतिक, बुरी चीज़ों को देखते हैं, तो हमें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उससे विश्वास और साहस, साथ ही शैतान की चालों को देख पाने और परमेश्वर के घर के हितों को बनाए रखने की खातिर सच्चाई को समझ सकने की माँग करनी चाहिए, और इसी तरह और भी। अगर हम बार-बार यह प्रार्थना करें कि परमेश्वर का राज्य आए और उसकी इच्छा पूरी हो, और अगर हम यथाशक्ति उसके सुसमाचार के प्रसार में अपना योगदान कर सकते हैं, तो परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं को स्वीकार करेगा और वे उसकी इच्छा के अनुरूप होंगी। वास्तव में, बाइबल में कुछ ऐसी प्रार्थनाएँ हैं जिनको परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त हुई थी, जैसे कि राजा दाऊद का यहोवा के लिए एक मंदिर का निर्माण करना ताकि लोग उसके भीतर परमेश्वर की आराधना कर सकें। उसने अक्सर इसके लिए परमेश्वर से प्रार्थना की थी, और फिर उसने इसे अभ्यास में डाला था। उन निवेदनों ने परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त की, और अंत में दाऊद परमेश्वर की इच्छा के अनुकूल बन गया। सुलैमान के राजा बनने के बाद जब परमेश्वर उसे एक सपने में दिखाई दिया, और उससे यह पूछा कि वह क्या माँगेगा, तो सुलैमान ने धन या लंबा जीवन नहीं माँगा, बल्कि इसके बजाय उसने यह माँगा कि परमेश्वर उसे ज्ञान प्रदान करे ताकि वह परमेश्वर की प्रजा पर बेहतर शासन कर सके, और तब उसके लोग परमेश्वर की उपासना बेहतर कर सकें। परमेश्वर ने उसकी प्रार्थनाओं को मंजूरी दे दी, और न केवल उसे ज्ञान प्रदान किया, बल्कि उसे दौलत और लंबी उम्र भी दी जो उसने माँगी तक नहीं थीं। यह स्पष्ट है कि परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए प्रार्थना करना एक ऐसी प्रार्थना है जो पूरी तरह से उसकी इच्छा के अनुरूप है।

4. सहनशक्ति और संकल्प के साथ प्रभु से प्रार्थना करो—हिम्मत न हारो

लूका 18:1–8 में कहा गया है, फिर उसने इसके विषय में कि नित्य प्रार्थना करना और हियाव न छोड़ना चाहिए, उनसे यह दृष्‍टान्त कहा: "किसी नगर में एक न्यायी रहता था, जो न परमेश्‍वर से डरता था और न किसी मनुष्य की परवाह करता था। उसी नगर में एक विधवा भी रहती थी, जो उसके पास आ-आकर कहा करती थी, 'मेरा न्याय चुकाकर मुझे मुद्दई से बचा।' कुछ समय तक तो वह न माना परन्तु अन्त में मन में विचारकर कहा, 'यद्यपि मैं न परमेश्‍वर से डरता, और न मनुष्यों की कुछ परवाह करता हूँ; तौभी यह विधवा मुझे सताती रहती है, इसलिये मैं उसका न्याय चुकाऊँगा, कहीं ऐसा न हो कि घड़ी-घड़ी आकर अन्त को मेरी नाक में दम करे'।" प्रभु ने कहा, "सुनो, यह अधर्मी न्यायी क्या कहता है? इसलिये क्या परमेश्‍वर अपने चुने हुओं का न्याय न चुकाएगा, जो रात-दिन उसकी दुहाई देते रहते हैं? क्या वह उनके विषय में देर करेगा? मैं तुम से कहता हूँ, वह तुरन्त उनका न्याय चुकाएगा। तौभी मनुष्य का पुत्र जब आएगा, तो क्या वह पृथ्वी पर विश्‍वास पाएगा?" यह दृष्टांत बताता है कि जब हम प्रभु से परमेश्वर की इच्छा जानने के लिए प्रार्थना करते हैं या कुछ माँगते हैं, तो हम इसके निवारण के लिए जल्दी नहीं मचा सकते। हमें प्रतीक्षा करना, तलाश करना और पालन करना सीखना होगा। परमेश्वर सर्वशक्तिमान होने के साथ-साथ व्यावहारिक भी है। वह अलौकिक चीज़ें नहीं करता लेकिन मानवजाति के लिए मार्गदर्शन और प्रावधान देने का उसका कार्य पूरी तरह से लोगों के वास्तविक क़द पर आधारित होता है, और यह सब वास्तव में लोग क्या हासिल कर सकते हैं, उस पर निर्भर करता है। जब तक हमारे निवेदन उसकी इच्छा के अनुरूप हैं, वह निश्चित रूप से हमारी प्रार्थनाएँ पूरी करेगा, इसलिए हमें परमेश्वर में विश्वास रखना होगा। हम सभी इस प्रकार की चीज़ों से गुज़र चुके हैं: कभी-कभी जब हम किसी कठिनाई का सामना करते हैं, और हम नहीं समझ पाते कि हमें क्या करना चाहिए, तो हम परमेश्वर के पास जाते हैं, और परमेश्वर के वचनों को पढ़ने और भाइयों और बहनों के साथ सहभागिता करने के माध्यम से, परमेश्वर जल्दी से हमें प्रबुद्ध करता और हमारी अगुआई करता है, जिससे हमें अभ्यास करने का एक मार्ग मिलता है। या कभी-कभी हम लंबे समय से किसी चीज़ के लिए प्रार्थना कर रहे होते हैं और हमें परमेश्वर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती है, उस समय हमें अपने दिलों को शांत करने की, और परमेश्वर की इच्छा के प्रकट किए जाने का इंतज़ार करने की, आवश्यकता होती है। अन्य समय में, परमेश्वर हमारे विश्वास को परख रहा होता है कि क्या हम वास्तव में उस पर भरोसा करने में सक्षम हैं। कभी-कभी परमेश्वर का उद्देश्य हमारे भीतर की मिलावट को उजागर करना और हमारी भ्रष्टता को साफ़ करना होता है। कभी-कभी परमेश्वर को हमारी प्रार्थनाओं को पूरा करने के लिए लोगों, चीज़ों या घटनाओं को जुटाने या व्यवस्थित करने की आवश्यकता होती है, और इसके लिए समय और एक निश्चित प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। ऐसे मौके भी होते हैं जब परमेश्वर देखता है कि हमारा वर्तमान क़द छोटा है और हम अपने दम पर कुछ संभाल नहीं सकते, या हासिल नहीं कर सकते हैं, इसलिए वह हमारे क़द के कुछ और बड़े हो जाने का इंतज़ार करता है, और फिर वह हमारे लिए इसे पूरा करता है।... परमेश्वर से की गई हमारी प्रार्थना चाहे पूरी हुई हो या नहीं, हमें परमेश्वर में भरोसा रखना होगा और यह विश्वास करना होगा कि वह हमारे साथ जो कुछ भी करता है वह अच्छा है, कि वह सब कुछ जीवन में हमारी वृद्धि के लिए फायदेमंद है, और यह कि परमेश्वर के अच्छे इरादे सभी चीज़ों में मौजूद हैं। इसलिए, जिन कठिनाइयों का हम सामना करते हैं, वे चाहे हमारे दैनिक जीवन में हों या परमेश्वर की सेवा में, हम हिम्मत नहीं हार सकते या निराश नहीं हो सकते हैं। हमें न्याय चाहने वाली विधवा की तरह बनना होगा, स्थिर रहना होगा, परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखना होगा, प्रार्थना में उसके सामने अक्सर आना होगा, तलाश करनी होगी और हमारे सामने उसकी इच्छा के प्रकट होने का इंतज़ार करना होगा। हमें विश्वास करना होगा कि जब परमेश्वर का समय आएगा, तो हम पवित्र आत्मा के प्रबोधन और प्रकाश को प्राप्त करेंगे, और हम परमेश्वर के पराक्रम, ज्ञान और उसके चमत्कारिक कार्यों को देखेंगे।

प्रार्थना के उपरोक्त चार तत्व ईसाई प्रार्थना के लिए अभ्यास का एक मार्ग हैं, और यदि हम हर दिन इन चीज़ों का अभ्यास कर सकते हैं, तो हम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध स्थापित कर पाएँगे और प्रभु के वचनों के भीतर की सच्चाई को समझ पाएँगे। हमारी आत्माओं के दृष्टिकोण निरंतर सुधरते जाएँगे, और परमेश्वर में भरोसा करने और उसका अनुसरण करने में हमें अधिक आत्म-विश्वास होगा। हमारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर की स्वीकृति भी प्राप्त करेंगी!

संपादक की टिपण्णी: परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए प्रार्थना कैसे करें, यह एक ऐसी सच्चाई है जिसमें हमें तत्काल प्रवेश करना चाहिए। यह निबंध इस बात के लिए मार्ग बताता है कि ईसाई कैसे प्रार्थना कर सकते हैं ताकि प्रभु सुने: परमेश्वर से नेकी के साथ प्रार्थना करो, परमेश्वर से कहो कि हमारे दिल में क्या है, एक सर्जित प्राणी के स्थान पर खड़े रहो, और अक्सर परमेश्वर की इच्छा पूरी हो इसके लिए प्रार्थना अर्पित करो। मेरा मानना है कि अगर हम इन चार सिद्धांतों को व्यवहार में लाते हैं, तो परमेश्वर द्वारा हमारी प्रार्थनाएँ सुनी जाएँगी। इसके अलावा, मैं 'परमेश्वर से प्रार्थना के सिद्धांत' की सिफ़ारिश करना चाहूँगी, और मुझे आशा है कि हम सभी सत्य के इस पहलू में एक साथ मिलकर प्रवेश कर सकते हैं।

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