मेरे कर्तव्य ने मेरा स्वार्थ प्रकट कर दिया
रोक्साना, ताइवानमैं दो वर्षों से अधिक समय से वीडियो कार्य की पर्यवेक्षक हूँ। कुछ समय पहले काम की जरूरतों के चलते हमारे समूह को दो छोटे...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
मार्च 2019 में मैं कलीसिया के पाठ आधारित कार्य की पर्यवेक्षक के रूप में अपना कर्तव्य निभा रही थी, जिसमें लेखों की छँटाई भी शामिल थी। उस समय कुछ कर्मियों के फेरबदल के कारण टीम में केवल चांग ली और ली लिन ही अधिक अनुभवी सदस्य बची थीं। मैं चांग ली के साथ एक समूह में थी, जबकि ली लिन टीम के दो नए सदस्यों के साथ दूसरे समूह में थी। जून में अगुआओं ने हमें पत्र लिखा कि वे परमेश्वर के घर की प्रूफरीडिंग टीम में कर्तव्य निभाने के लिए चांग ली को पदोन्नति देना चाहते हैं और पूछा कि क्या वह इच्छुक है। पत्र पढ़कर मैं असहज महसूस किए बिना न रह पाई, “टीम में पहले से ही कर्मचारियों की कमी है, तो वे अभी चांग ली का तबादला क्यों कर रहे हैं? वह हमारी टीम की रीढ़ है। उसमें अच्छी काबिलियत है और उसकी सिद्धांतों पर अच्छी पकड़ है। अगर वह चली गई, तो मुझे अकेले ही सारा काम का बोझ सँभालना पड़ेगा। यह न केवल बहुत कठिन और थकाऊ होगा, बल्कि अगर मैं कोई अच्छा लेख नहीं चुन पाई, तो क्या अगुआ यह नहीं कहेंगे कि मेरी कार्यक्षमता बहुत खराब है और मैं पर्यवेक्षक का कर्तव्य निभाने के लायक नहीं हूँ? क्या मेरी पूरी इज्जत नहीं चली जाएगी?” यूँ तो मैं जानती थी कि चांग ली को पदोन्नति देने से कलीसिया के कार्य को फायदा होगा और मुझे सिर्फ अपने हितों के बारे में नहीं सोचना चाहिए, फिर भी उसके जाने के खयाल से मैं परेशान थी, इसलिए मैं उसका मन टटोलकर देखना चाहती थी कि वह क्या सोचती है। चांग ली ने कहा, “मुझमें बहुत-सी कमियाँ हैं और मुझे डर है कि अगर मैं वहाँ गई तो काम नहीं सँभाल पाऊँगी। अगर मैं अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं कर पाई तो यह बहुत शर्मिंदगी की बात होगी। मैं यहाँ का काम सँभाल सकती हूँ, इसलिए मैं नहीं जाना चाहती।” उसकी यह बात सुनकर मैं मन ही मन खुश हुई, और ऐसा लगा जैसे मेरे कंधों से कोई बोझ उतर गया हो। हालाँकि मैंने उसके साथ संगति करने के लिए परमेश्वर के कुछ वचन भी खोजे, लेकिन दिल से मैं पूरी उम्मीद कर रही थी कि वह न जाए, क्योंकि इससे मेरा काम आसान हो जाता। तीन दिन बीत गए और चांग ली ने अगुआओं को अब तक कोई जवाब नहीं दिया था। मैं बेचैन हो रही थी, इसलिए मैंने फिर से उससे पूछा, “मैंने देखा है कि तुमने अभी तक अगुआओं को जवाब नहीं दिया है। तुम क्या करने की सोच रही हो?” उसने कहा कि उसने अभी तक फैसला नहीं किया है। फिर मैंने बनावटीपन से कहा, “परमेश्वर के घर की प्रूफरीडिंग टीम में कर्तव्य निभाने के लिए, तुम्हारे पास कुछ सिद्धांतों की समझ और कुछ खास पेशेवर कौशल और कार्य-क्षमता होनी चाहिए। वरना, तुम सच में इसे अच्छी तरह से नहीं कर पाओगी। लेकिन तुम्हें वहाँ और प्रशिक्षण मिलेगा और तुम्हारे पेशेवर कौशल में जल्दी सुधार होगा।” चांग ली ने कहा कि वह इस बारे में और खोज करेगी। यह देखकर कि चांग ली ने अभी भी कोई साफ रवैया व्यक्त नहीं किया है, मैं लगातार असहज थी और सोचने लगी, “क्या मुझे उसके साथ फिर से संगति करनी चाहिए, और उसे परमेश्वर के इरादों की परवाह करने और कलीसिया की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए?” लेकिन फिर मेरे मन में एक और खयाल आया : “अगर मेरी संगति के बाद वह सच में चली गई, तो मुझे यह सारा काम सँभालना पड़ेगा। मेरी दक्षता निश्चित रूप से धीमी हो जाएगी और अगर नतीजे खराब हो गए, तो अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेंगे?” बार-बार सोचने के बाद, आखिरकार मैंने उसके साथ संगति नहीं की। हालाँकि मुझे थोड़ी आत्म-ग्लानि महसूस हुई, लेकिन यहाँ जमा हुए सारे काम के बारे में सोचकर मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा। मैं बहुत डर गई थी कि कहीं वह दूसरी जगह कर्तव्य करने के लिए तैयार न हो जाए। “नहीं,” मैंने सोचा, “मुझे अगुआओं को पत्र लिखकर हमारी असली स्थिति समझानी होगी ताकि वे चांग ली को यहीं रखें।” लेकिन फिर मैंने दोबारा सोचा, “अगर मैंने ऐसा किया, तो क्या अगुआ यह नहीं कहेंगे कि मैं बहुत स्वार्थी हूँ, कि मैं परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील नहीं रहती, और मैं लोगों को पदोन्नति देने और विकसित करने में परमेश्वर के घर को बाधित कर रही हूँ?” बार-बार सोचने के बाद मैंने वह पत्र मिटा दिया जिसे लिखना मैंने शुरू किया था। कई दिनों तक यह बात मेरे मन पर बोझ बनी रही। दो और दिन बीत गए और मैंने देखा कि चांग ली के हाव-भाव आम दिनों से कुछ अलग थे। उसके माथे पर शिकन नहीं थी और ऐसा लग रहा था कि उसने अपना जवाब लिखना शुरू कर दिया है। जैसे ही चांग ली ने अपना जवाब पूरा किया, मैंने उत्सुकता से उससे पूछा कि उसने क्या फैसला किया है। जब मैंने सुना कि वह जाने के लिए तैयार हो गई है, तो मुझे थोड़ी निराशा हुई। उसके जाने से मैं एक काबिल सहायक खो देती, इसलिए मैं उसे जाने देने के लिए सच में अनिच्छुक थी। लेकिन जब फैसला हो ही गया था, तो मैं केवल समर्पण कर सकती थी। मैं केवल खुद को दिलासा दे सकती थी, “मुझे कलीसिया से कोई दूसरा उपयुक्त व्यक्ति ढूँढ़ना होगा। कम से कम ली लिन अभी भी दूसरे समूह का काम सँभाल रही है। मुझे बस अपनी तरफ से थोड़ा और काम करना होगा। शायद इससे काम की प्रगति में बहुत ज्यादा देरी नहीं होगी।”
बाद में हमारे समूह में तीन नए सदस्य तबादला होकर आ गए। एक महीने बाद तीनों नए सदस्यों ने कुछ सिद्धांत समझ चुके थे। ठीक उसी समय, मुझे अगुआओं का एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि वे समूह की अगुआ, ली लिन का तबादला गीत लेखन टीम में पर्यवेक्षक के रूप में कर रहे हैं। यह सुनते ही मेरा मन नहीं माना। मैंने सोचा, “टीम में पहले से ही लोगों की कमी है, और ली लिन की काबिलियत अच्छी है और वह मेरे काम का बहुत-सा बोझ हल्का करती है। अगर उसका तबादला हो गया, तो मेरे पास अकेले दो समूहों के काम की निगरानी करने का समय ही नहीं बचेगा! अगर मैं कोई भी मानक-स्तरीय लेख नहीं चुन पाई, तो अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वे यह नहीं कहेंगे कि मुझमें कोई कार्यक्षमता नहीं है? अगर कार्य का कोई नतीजा नहीं निकला और मुझे बर्खास्त कर दिया गया, तो क्या मेरी नाक नहीं कट जाएगी? नहीं, इस बार मुझे अगुआओं को पत्र लिखना ही होगा। मुझे चाहे कुछ भी हो जाए, ली लिन को यहीं रखना है। मैं उसे जाने नहीं दे सकती।” इसलिए मैंने अगुआओं को लिखा, “नए सदस्यों को अभी भी विकसित करने की जरूरत है। क्या हम ली लिन का तबादला करने से पहले उनके पूरी तरह से काम सीखने तक इंतजार कर सकते हैं?” असल में, ली लिन के समूह में दो लोगों को तीन-चार महीने तक विकसित किया जा चुका था और वे कुछ काम सँभाल सकते थे। लेकिन स्थिर नतीजे कायम रखने के लिए मैं अब भी ली लिन को अपने साथ रखना चाहती थी। इस तरह मैं बहुत-सी परेशानियों से बच सकती थी, और अगर काम के नतीजे सुधर जाते, तो मैं अगुआओं की प्रशंसा भी पा सकती थी। लेकिन अगुआओं ने कहा कि गीत लेखन टीम का काम पहले से ही प्रभावित हो रहा है क्योंकि उसके पास कोई पर्यवेक्षक नहीं है और उन्होंने मुझसे परमेश्वर पर अधिक निर्भर रहने और यह कर्तव्य सँभालने को कहा। पत्र पढ़ने के बाद, मेरा मन बिल्कुल भी शांत नहीं हो पा रहा था। मैंने मन ही मन सोचा, “ये अगुआ भी न! वे हमारी टीम की असली स्थिति के बारे में सब जानते हैं, फिर भी वे एक के बाद एक लोगों का तबादला कर रहे हैं। क्या हमारी टीम बिखर नहीं जाएगी? मैं दो समूहों के काम की प्रभारी होऊँगी। न केवल काम का बोझ बढ़ेगा, बल्कि नतीजे भी निश्चित रूप से गिरेंगे।” उन दिनों मैंने अपने कर्तव्य में प्रेरणा खो दी और किसी भी चीज में मुझे पता ही नहीं होता था कि मैं क्या कर रही हूँ। मुझे यह भी नहीं पता था कि अपनी प्रार्थनाओं में परमेश्वर से क्या कहूँ और जब मैं परमेश्वर के वचन पढ़ती तो उन्हें समझ नहीं पाती थी। रात में, मैं करवटें बदलती रहती, सो नहीं पाती थी, मेरा दिमाग इसी सोच में डूबा रहता, “मैं आखिरकार अकेले दो समूहों के नए सदस्यों को कैसे विकसित कर पाऊँगी? यह कर्तव्य बहुत कठिन है!” अपनी पीड़ा में, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, जब से चांग ली और फिर ली लिन का तबादला हुआ है, मुझे चिंता है कि नए सदस्य सिद्धांत नहीं समझते हैं और मानक-स्तरीय लेख नहीं चुन पाएँगे, और अगर कार्य के नतीजे नहीं निकले तो अगुआ मुझे नीची नजर से देखेंगे। मैं जानती हूँ कि अगुआ काम की जरूरतों के आधार पर कर्मियों का फेरबदल करते हैं, लेकिन मैं दिल से समर्पण नहीं कर पा रही हूँ। मेरा मार्गदर्शन करो कि मैं खुद को जानूँ और तुम्हारे इरादों को समझूँ।”
मैंने भक्ति के दौरान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मुझे गहरी आत्म-ग्लानि हुई। परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर के घर में, सत्य का अनुसरण करने वाले सभी लोग परमेश्वर के सामने एकजुट रहते हैं, न कि विभाजित। वे सभी एक ही साझा लक्ष्य के लिए कार्य करते हैं : अपने कर्तव्य को पूरा करना, खुद को मिला हुआ कार्य अच्छे से करना, सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना, परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार कार्य करना और उसके इरादों को पूरा करना। यदि तुम्हारा लक्ष्य इसके लिए नहीं है बल्कि तुम्हारे अपने लिए है, अपनी स्वार्थी इच्छाओं को पूरा करने के लिए है, तो यह एक शैतानी भ्रष्ट स्वभाव का खुलासा है। परमेश्वर के घर में लोग सत्य सिद्धांतों के अनुसार अपने कर्तव्य निभाते हैं, जबकि अविश्वासियों के कार्य उनके शैतानी स्वभावों द्वारा नियंत्रित होते हैं। ये दो बहुत अलग रास्ते हैं। अविश्वासी अपनी छिपी हुई मंशाएँ मन में पाले रहते हैं, उनमें से हर एक के अपने लक्ष्य और योजनाएँ होती हैं और हर कोई अपने हितों के लिए जीता है। यही कारण है कि वे सभी लाभ के हर अंश के लिए लड़ते हैं और एक इंच भी झुकने से इनकार करते हैं। वे विभाजित हैं, एकजुट नहीं, क्योंकि वे एक सामान्य लक्ष्य के लिए काम नहीं करते हैं। वे जो करते हैं उसके पीछे का इरादा और प्रकृति एक समान है। वे सभी अपने लिए हैं। इसमें सत्य का शासन नहीं है; इन सब में जो शासन करता है और इनका प्रभारी है, वे उनके शैतानी भ्रष्ट स्वभाव हैं। वे अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों द्वारा नियंत्रित होते हैं और उनमें आत्म-नियंत्रण नहीं होता, इसलिए वे पाप में और गहरे डूबते जाते हैं। परमेश्वर के घर में, यदि तुम लोगों के क्रियाकलापों की प्रेरक शक्ति, प्रेरणा, सिद्धांत और तरीके अविश्वासियों के तरीकों से अलग नहीं हैं, यदि तुम भी अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों द्वारा बहकाए जाते हो, उनके द्वारा नियंत्रित और संचालित होते हो, यदि तुम्हारे क्रियाकलापों की प्रेरक शक्ति तुम्हारे अपने हित, प्रतिष्ठा, अहंकार और रुतबा है, तो जिस तरह से तुम लोग अपना कर्तव्य निभाते हो, वह अविश्वासियों के चीजें करने के तरीके से अलग नहीं होगा” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैंने आत्म-चिंतन किया। जब अगुआओं ने लिखा कि वे चांग ली का तबादला करना चाहते हैं, तो मुझे चिंता हुई कि अगर वह चली गई, तो हमारे काम के नतीजों में गिरावट से अगुआओं की नजर में मेरी छवि पर असर पड़ेगा, इसलिए मैं उसे जाने नहीं देना चाहती थी। जब मैंने चांग ली को यह कहते सुना कि वह परमेश्वर के घर की प्रूफरीडिंग टीम में प्रशिक्षित होने नहीं जाना चाहती है, तो मैं मन ही मन खुश हुई। ऊपरी तौर पर मैंने उसके साथ परमेश्वर के इरादों के बारे में संगति की, लेकिन असल में मैं उसके विचारों को टटोलने की कोशिश कर रही थी, मैं उम्मीद कर रही थी कि वह मेरे पास रुक जाएगी और नए समूह के सदस्यों को विकसित करेगी और कार्य आगे बढ़ाएगी, ताकि रुतबे और प्रतिष्ठा की मेरी इच्छा पूरी हो सके। जब मैंने देखा कि उसने अभी भी अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है, तो मैंने न केवल परमेश्वर के इरादों के बारे में संगति नहीं की, बल्कि असल में व्यग्रतापूर्वक उम्मीद की कि वह न जाए। उसे अपने पास रोकने के उद्देश्य से मैंने यहाँ तक सोचा कि टीम की कठिनाइयों को रेखांकित करने के लिए अगुआओं को पत्र लिखूँ। चांग ली का तबादला होने के बाद मुझे लगा कि ली लिन नए समूह के सदस्यों को विकसित कर सकती है और कार्य बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं होगा। लेकिन अप्रत्याशित रूप से, अगुआओं ने ली लिन का भी तबादला करना चाहा। मेरा दिल अचानक शिकायतों और प्रतिरोध से भर गया और मैं समर्पण कर ही नहीं सकी। मुझे लगा कि अगुआ हमारी असली कठिनाइयों पर विचार नहीं कर रहे हैं, और मैंने अगुआओं को ली लिन का तबादला न करने के लिए एक पत्र भी लिखा, मुझे चिंता थी कि कार्य के नतीजों में गिरावट से मैं अगुआओं की नजर में अपनी अच्छी छवि को गँवा बैठूँगी। मैं लगातार अपने हितों पर विचार कर रही थी, न कि कलीसिया के कार्य पर। मैं इतनी स्वार्थी और नीच थी! अगुआ पहले ही यह स्पष्ट कर चुके थे कि गीत लेखन टीम के काम में इसलिए देरी हो रही थी क्योंकि उनके पास कोई पर्यवेक्षक नहीं था, और यह कि वे कलीसिया के कार्य की खातिर ली लिन का तबादला कर रहे थे। लेकिन अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा के लिए, मैं कलीसिया के कार्य को नुकसान पहुँचते देखते हुए भी ली लिन को जाने नहीं देना चाहती थी। मुझमें बिल्कुल भी सामान्य मानवता नहीं थी! अविश्वासी व्यक्तिगत हित के लिए हर छोटी-छोटी बात पर लड़ते और झगड़ते हैं; ताकि मेरी निगरानी वाला लेखन कार्य प्रभावी रहे, इसके लिए मैंने दूसरी टीम के कार्य की अवहेलना की और अपनी इज्जत और रुतबे को बचाने के लिए ली लिन को अपने पास रोकने की कोशिश की। मेरे क्रियाकलाप अविश्वासियों के क्रियाकलापों से कतई अलग नहीं थे। मैं सचमुच बहुत ही स्वार्थी और नीच थी! यह सोचकर मुझे गहरा पछतावा हुआ और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, मैं पश्चात्ताप करने की इच्छुक थी।
सितंबर 2021 में, कलीसिया में कार्य की जरूरतों के कारण एक नई धर्मोपदेश टीम बनाई गई। मैं जीवन के अनुभवजन्य गवाही लेखों के लिए जिम्मेदार थी, जबकि मेरे साथ सहयोग करनेवाले भाई धर्मोपदेश के काम के लिए जिम्मेदार थे। अगुआओं ने हमें पत्र लिखा, जिसमें कहा गया था कि हम धर्मोपदेश लिख सकने वाले लोगों को छाँटने के लिए अपना दायरा बढ़ाएँ और साथ ही प्रूफरीडिंग टीम में सबकी खूबियों और नतीजों के आधार पर कर्तव्य सौंपने में उचित फेरबदल करें। कर्मियों के फेरबदल के बाद धर्मोपदेश लिखने वाले लोग और कम हो गए, जिससे कार्य की प्रगति में देरी हुई। फिर मेरे साथ सहयोग करनेवाले भाई ने मेरे कार्यक्षेत्र से बहन झोउ ली को धर्मोपदेश टीम में स्थानांतरित करने के बारे में मुझसे चर्चा की। यह सुनते ही मैं हिचकिचाई। मैंने सोचा, “झोउ ली में अच्छी काबिलियत है, उसने कुछ सिद्धांत समझ लिए हैं और उसे लेखों के चयन में अच्छे नतीजे मिलते हैं। अगर उसका तबादला हो गया, तो क्या काम के नतीजे नहीं गिर जाएँगे?” यह सोचते हुए, मैंने मना कर दिया। भाई ने चाहे कुछ भी कहा, मैं झोउ ली के तबादले के लिए तैयार नहीं हुई। असल में, मैं अपने दिल में साफ तौर पर जानती थी कि झोउ ली ने न केवल लेखों के चयन के सिद्धांत समझ लिए थे, बल्कि उसके पास अंतर्दृष्टि भी थी और वह धर्मोपदेश लिखने के लिए उपयुक्त थी। अब, सुसमाचार का प्रचार करने और परमेश्वर की गवाही देने के लिए धर्मोपदेश लिखने को और लोगों की जरूरत थी, इसलिए उसका तबादला करना कार्य के लिए लाभदायक रहता। क्या मैं उसे रोककर बहुत स्वार्थी नहीं हो रही थी? यह सोचकर मुझे थोड़ी आत्म-ग्लानि हुई। लेकिन फिर मैंने सोचा कि अगर उसका तबादला हो गया तो लेखों का काम प्रभावित होगा, और अगर कार्य के नतीजे गिर गए, तो अगुआ निश्चित रूप से कहेंगे कि पिछले नतीजे टीम में उस भाई के सहयोग से हासिल हुए थे। क्या इससे यह नहीं लगेगा कि मैं कुछ भी नहीं थी? मैं दुविधा में थी और समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूँ, और मैं अपने कर्तव्य में प्रेरणा खो बैठी। मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा गलत है, इसलिए मैंने प्रार्थना की और खोजा : “ऐसा क्यों है कि जब भी अच्छी काबिलियत वाले किसी व्यक्ति का तबादला होता है, तो मैं प्रतिरोध महसूस करती हूँ, समर्पण नहीं कर पाती, और यहाँ तक कि अपने कर्तव्य में प्रेरणा भी खो देती हूँ?” बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “अगर किसी मसीह-विरोधी के अधीनस्थ किसी अच्छी काबिलियत वाले व्यक्ति को दूसरा कर्तव्य करने के लिए स्थानांतरित किया जाता है तो मसीह-विरोधी अपने दिल में इसका हठपूर्वक विरोध करता और इसे नकार देता है, वह काम छोड़ देना चाहता है और अब उसमें अगुआ या टीम प्रमुख होने का कोई उत्साह नहीं रह जाता। यह क्या समस्या है? उनमें कलीसिया की व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता क्यों नहीं होती? उन्हें लगता है कि उनके ‘दाएँ-हाथ जैसे व्यक्ति’ का तबादला उनके काम के परिणामों और प्रगति को प्रभावित करेगा, परिणामस्वरूप उनके रुतबे और प्रतिष्ठा पर असर पड़ेगा, जिससे उन्हें परिणामों की गारंटी देने के लिए कड़ी मेहनत करने और ज्यादा कष्ट उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा—जो आखिरी चीज है, जिसे वे करना चाहते हैं। वे सुविधाभोगी हो गए हैं और थोड़ा और काम करना या थोड़ा और कष्ट उठाना नहीं चाहते, इसलिए वे उस व्यक्ति को जाने नहीं देना चाहते। अगर परमेश्वर का घर फिर भी तबादला कर देता है तो वे बहुत शिकायत करते हैं, यहाँ तक कि अपना काम भी छोड़ देना चाहते हैं। क्या यह स्वार्थी और नीच होना नहीं है? परमेश्वर के घर द्वारा परमेश्वर के चुने हुए लोगों को केंद्रीय रूप से आवंटित किया जाना चाहिए। इसका किसी अगुआ, टीम प्रमुख या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। सभी को सिद्धांत के अनुसार कार्य करना चाहिए; यह परमेश्वर के घर का नियम है। मसीह-विरोधी परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं करते; वे लगातार अपने रुतबे और हितों के लिए साजिशें रचते हैं और अपनी शक्ति और रुतबे को मजबूत करने के लिए अच्छी काबिलियत वाले भाई-बहनों से अपनी सेवा करवाने के लिए उनका इस्तेमाल करने की आशा करते हैं। क्या यह स्वार्थी और नीच होना नहीं है? बाहरी तौर पर, अच्छी काबिलियत वाले लोगों को अपने पास रखना और परमेश्वर के घर द्वारा उनका तबादला न होने देना ऐसा प्रतीत होता है, मानो वे कलीसिया के काम के बारे में सोच रहे हों, लेकिन वास्तव में वे सिर्फ अपनी शक्ति और रुतबे के बारे में सोच रहे होते हैं, कलीसिया के काम के बारे में बिल्कुल नहीं सोचते। वे डरते हैं कि वे कलीसिया का काम खराब तरह से करेंगे और फलस्वरूप बर्खास्त कर दिए जाएँगे जिससे उनका रुतबा खो जाएगा। मसीह-विरोधी परमेश्वर के घर के व्यापक कार्य के बारे में कोई विचार नहीं करते, सिर्फ अपने रुतबे के बारे में सोचते हैं, परमेश्वर के घर के हितों को होने वाले नुकसान के लिए जरा भी खेद न करके अपने रुतबे की रक्षा करते हैं और कलीसिया के कार्य को हानि पहुँचाकर अपने रुतबे और हितों की रक्षा करते हैं। यह स्वार्थी और नीच होना है। ... मसीह-विरोधी इसी प्रकार के लोग हुआ करते हैं। वे हमेशा कलीसिया के काम को, भाइयों और बहनों को, यहाँ तक कि परमेश्वर के घर की सारी संपत्ति को जो उनकी जिम्मेदारी के दायरे में आती है, निजी संपत्ति के रूप में ही देखते हैं। मानते हैं कि यह उन पर है कि इन चीजों को कैसे वितरित करें, स्थानांतरित करें और उपयोग में लें और कि परमेश्वर के घर को दखल देने की अनुमति नहीं होती। जब वे चीजें उनके हाथों में आ जाती हैं तो ऐसा लगता है कि वे शैतान के कब्जे में हैं, किसी को भी उन्हें छूने की अनुमति नहीं होती। वे बड़ी तोप चीज होते हैं, वे ही सबसे बड़े होते हैं और जो कोई भी उनके क्षेत्र में जाता है उसे उनके आदेशों और व्यवस्थाओं का पालन शिष्ट और आज्ञाकारी तरीके से करना होता है और उनकी अभिव्यक्तियों से इशारा लेना होता है। यह मसीह-विरोधियों के चरित्र के स्वार्थ और नीचता की अभिव्यक्ति होती है। वे परमेश्वर के घर के कार्य पर कोई ध्यान नहीं देते, वे सिद्धांतों का जरा भी पालन नहीं करते और केवल निजी हितों और अपने ही रुतबे के बारे में सोचते हैं—जो मसीह-विरोधियों के स्वार्थ और नीचता की प्रमुख विशेषता है” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, अनुपूरक चार : मसीह-विरोधियों के चरित्र और उनके स्वभाव सार का सारांश (भाग एक))। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि मसीह-विरोधियों की प्रकृति विशेष रूप से स्वार्थी और नीच होती है। अपने कर्तव्य निभाते समय वे परमेश्वर के इरादों के प्रति बिल्कुल भी विचारशील नहीं होते। वे चाहे कुछ भी करें, वे केवल अपने हितों पर विचार करते हैं। अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा के लिए, वे अच्छी काबिलियत वाले लोगों को कसकर पकड़े रहते हैं, उन्हें परमेश्वर के घर द्वारा कहीं और नहीं भेजे जाने देते हैं। क्या मेरी अभिव्यक्तियाँ बिल्कुल वही नहीं थीं जो किसी मसीह-विरोधी की होती हैं? जब चांग ली का तबादला हो रहा था, तो मैं बहुत अनिच्छुक थी क्योंकि मुझे डर था कि काम के नतीजों में गिरावट से मेरी प्रतिष्ठा और रुतबे पर असर पड़ेगा। जब मैंने सुना कि अगुआ मेरी काबिल सहायक ली लिन का तबादला करना चाहते हैं, तो मेरा दिल और भी ज्यादा प्रतिरोध से भर गया। मैंने अपने भ्रष्ट स्वभाव के कारण अगुआओं को एक पत्र भी लिखा, उन्हें ली लिन का तबादला करने से रोकने की कोशिश की। अपनी मनमानी न चलते देख मैं अपने कर्तव्य में नकारात्मक और सुस्त हो गई। धर्मोपदेश टीम की स्थापना के बाद, मेरे साथ सहयोग करनेवाले भाई ने मुझे बताया कि झोउ ली के पास अंतर्दृष्टि है और वह धर्मोपदेश लिखने के लिए उपयुक्त है। मैं भी जानती थी कि झोउ ली का तबादला धर्मोपदेश कार्य के लिए लाभकारी रहेगा, लेकिन अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा करने के लिए मैंने उसे जाने देने से मना कर दिया, बावजूद इसके कि मेरे सहयोगी ने बहुत बार मेरे साथ इस पर चर्चा की, जिससे धर्मोपदेश कार्य की प्रगति में देरी हुई। मैं हमेशा यह चाहती थी कि अच्छी काबिलियत वाले टीम सदस्यों को अपने इस्तेमाल के लिए अपने पास रखूँ। क्या मैं अपने भाई-बहनों को अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के अनुसरण में औजार की तरह इस्तेमाल नहीं कर रही थी? मैं साफ तौर पर जानती थी कि दूसरी टीम का कार्य पहले ही प्रभावित हो रहा था और उसे हमारी टीम से ज्यादा लोगों की जरूरत थी, फिर भी मैंने उसे जाने देने से मना कर दिया। मैं अपने हितों की रक्षा करना छोड़ने के बजाय कलीसिया के कार्य को नुकसान पहुँचते देखना पसंद कर रही थी। मैं सचमुच बहुत स्वार्थी और नीच थी! क्या मेरे क्रियाकलापों की प्रकृति उन बड़े लोगों और सर्वेसर्वाओं के समान नहीं थी जिन्हें परमेश्वर उजागर करता है? मैंने किसी को भी उन लोगों का तबादला नहीं करने दिया जो मेरी प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए फायदेमंद थे और मैं हमेशा लोगों पर अपनी कड़ी पकड़ बनाए रखना चाहती थी। मैं एक मसीह-विरोधी के रास्ते पर चल रही थी। अगर मैं इसी तरह चलती रही, तो मैं निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा ठुकरा और हटा दी जाऊँगी।
बाद में मैंने परमेश्वर के और अधिक वचन पढ़े और अपने क्रियाकलापों की गंभीर प्रकृति को और भी अधिक समझा। परमेश्वर कहता है : “वह मानक क्या है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति के कर्मों को अच्छे या बुरे के रूप में आँका जाता है? वह यह है कि वह अपने विचारों, खुलासों और क्रियाकलापों में सत्य को अभ्यास में लाने और सत्य वास्तविकता को जीने की गवाही रखता है या नहीं। यदि तुम्हारे पास यह वास्तविकता नहीं है या तुम इसे नहीं जीते, तो बेशक, तुम एक कुकर्मी हो। परमेश्वर कुकर्मियों को कैसे देखता है? परमेश्वर की नजर में, तुम्हारे विचार और बाहरी क्रियाकलाप परमेश्वर की गवाही नहीं देते हैं, न ही वे शैतान को शर्मिंदा करते या हराते हैं; बल्कि वे परमेश्वर को शर्मिंदा करते हैं और उसका अनादर करने के निशानों से भरे हुए हैं। तुम परमेश्वर की गवाही नहीं दे रहे हो, न ही तुम खुद को परमेश्वर के लिए खपा रहे हो, तुम परमेश्वर की खातिर अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को भी पूरा नहीं कर रहे हो; बल्कि केवल अपनी खातिर कार्य कर रहे हो। ‘केवल अपनी खातिर’ का क्या मतलब है? इसका सही-सही मतलब है, शैतान की खातिर। इसलिए अंत में परमेश्वर यही कहेगा, ‘हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।’ परमेश्वर की नजर में तुम्हारे कार्यों को अच्छे कर्मों के रूप में नहीं देखा जाएगा, बल्कि उन्हें बुरे कर्म माना जाएगा। उन्हें न केवल परमेश्वर की स्वीकृति हासिल नहीं होगी—बल्कि उनकी निंदा भी की जाएगी। परमेश्वर में ऐसे विश्वास से कोई क्या हासिल करने की आशा कर सकता है? क्या इस तरह का विश्वास अंततः व्यर्थ नहीं हो जाएगा?” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि परमेश्वर किसी व्यक्ति के क्रियाकलापों को अच्छा या बुरा उसके इरादों और शुरुआती बिंदु के आधार पर मापता है—इस आधार पर मापता है कि वे परमेश्वर के घर के हितों को कायम रख रहे हैं या अपने व्यक्तिगत हितों को। परमेश्वर के वचनों से खुद की तुलना करते हुए, मैंने आत्म-चिंतन किया कि इन कर्मियों के फेरबदल में मैं यह नहीं सोच रही थी कि परमेश्वर को कैसे संतुष्ट किया जाए, बल्कि हर मोड़ पर अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे पर विचार कर रही थी। अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा के लिए, मैंने अगुआओं को अपनी बहनों का तबादला करने से रोकने की कोशिश की। आत्म-ग्लानि महसूस होने पर भी मैंने हठपूर्वक उन्हें अपने पास रखने की कोशिश की। जब मेरी मनमानी नहीं चली, तो मैं नकारात्मक हो गई और अपने कर्तव्य में प्रेरणा खो बैठी। मैं अपने विचारों और अभिव्यक्तियों में परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सत्य का अभ्यास नहीं कर रही थी; यह परमेश्वर की नजर में बुराई थी और उसकी घृणा और नफरत को न्योता देती थी। मैंने उस समय के बारे में सोचा जब प्रभु यीशु कार्य कर रहे थे। यहूदी धर्म के महायाजकों और फरीसियों ने प्रभु यीशु के कार्य को स्वीकार नहीं किया और यहाँ तक कि प्रभु यीशु का प्रतिरोध किया और उसे दोषी ठहराया। अपने रुतबे और आजीविका की रक्षा करने के लिए उन्होंने विश्वासियों पर शिकंजा कसे रखा और यहाँ तक कि बेशर्मी से कहा कि विश्वासी उनके हैं। आज धार्मिक दुनिया में पादरी और एल्डर भी ऐसे ही हैं। वे अपने रुतबे की रक्षा करने के लिए विश्वासियों को सच्चे मार्ग की जाँच करने से रोकते हैं, परमेश्वर की भेड़ों को अपना बताते हैं, परमेश्वर का विरोध करते हैं और लोगों के लिए उससे प्रतिस्पर्धा करते हैं। वे परमेश्वर द्वारा उजागर किए गए दुष्ट सेवक और मसीह-विरोधी बन गए हैं। क्या मेरे और फरीसियों या धार्मिक दुनिया के पादरियों और एल्डरों के क्रियाकलापों की प्रकृति में कोई अंतर था? अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा के लिए, मैंने एक प्रतिभाशाली व्यक्ति के तबादले में बाधा डाली, धर्मोपदेश के कार्य की प्रगति में देरी कर दी। यह परमेश्वर के स्वभाव का अपमान था! यह एहसास होने पर मैं भयाक्रांत हो गई। अगर मैंने पश्चात्ताप न किया तो मेरा परिणाम भी फरीसियों और धार्मिक दुनिया के पादरियों और एल्डरों जैसा ही होगा—मैं निश्चित रूप से परमेश्वर से शाप और दंड प्राप्त करती। समस्या की गंभीरता को पहचानकर, मैं अपने मसले हल करना चाहती थी।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े और अभ्यास का मार्ग पाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यदि तुम हमेशा दूसरों को दिखाने के लिए ही चीजें करते हो और हमेशा दूसरों की प्रशंसा और सराहना प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते हो तो क्या तब भी परमेश्वर तुम्हारे हृदय में है? ऐसे लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं होता। हमेशा अपने लिए कार्य मत करो, हमेशा अपने हितों की मत सोचो, अपने गौरव, प्रतिष्ठा और रुतबे पर विचार मत करो और अपने निजी हितों पर विचार मत करो। तुम्हें सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उन्हें अपनी प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना चाहिए और सबसे पहले यह चिंतन करना चाहिए कि तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन में अशुद्धियाँ रही हैं या नहीं, तुम समर्पित रहे हो या नहीं, तुमने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं या नहीं, और अपना सर्वस्व दिया है या नहीं, साथ ही तुम अपने कर्तव्य, और कलीसिया के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार करते रहे हो या नहीं। तुम्हें इन चीजों के बारे में अवश्य विचार करना चाहिए। अगर तुम इन पर बार-बार विचार करते हो और इन्हें समझ लेते हो, तो तुम्हारे लिए अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना आसान हो जाएगा। अकेला अपवाद यह है कि अगर तुम्हारी काबिलियत खराब है या तुम्हारा अनुभव उथला है या तुम अपने पेशेवर कार्य में पर्याप्त रूप से दक्ष नहीं हो और यह तुम्हारे कार्य में पैदा हो रही कुछ गलतियों या कमियों की ओर ले जा सकता है, और यह अच्छे परिणाम मिलने से रोकता है, पर तुम पहले ही अपना सर्वश्रेष्ठ कर रहे हो। तुम अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ या प्राथमिकताएँ पूरी करने के लिए कार्य नहीं कर रहे। इसके बजाय, तुम हर मामले में कलीसिया के कार्य और परमेश्वर के घर के हितों पर विचार कर रहे हो। यूँ तो हो सकता है कि तुम अपने कर्तव्य में अच्छे नतीजे प्राप्त न कर रहे हो, तुम्हारा हृदय सही दिशा में सोच रहा है; इसके अलावा अगर तुम अपने कर्तव्य में समस्याओं का समाधान करने के लिए सत्य खोजने में समर्थ हो तो तुम अपने कर्तव्य निर्वहन में मानक स्तर के होओगे और साथ ही तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश करोगे। तब तुम्हारे पास गवाही होगी” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। “अपने कर्तव्य को निभाने वाले सभी लोगों के लिए, चाहे सत्य को लेकर उनकी समझ कितनी भी उथली या गहरी क्यों न हो, सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने का सबसे सरल अभ्यास यह है कि हर मोड़ पर परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोचा जाए, अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं, व्यक्तिगत मंशाओं, उद्देश्यों, इज्जत और रुतबे का त्याग किया जाए और परमेश्वर के घर के हितों को सबसे आगे रखा जाए—कम से कम इतना तो उन्हें करना ही चाहिए। अपना कर्तव्य निभाने वाला कोई व्यक्ति अगर इतना भी नहीं कर सकता, तो उस व्यक्ति को कर्तव्य निभाने वाला कैसे कहा जा सकता है? यह अपना कर्तव्य निभाना नहीं है। तुम्हें पहले परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोचना चाहिए, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना चाहिए और कलीसिया के कार्य का ध्यान रखना चाहिए। इन चीजों को पहले स्थान पर रखना चाहिए; उसके बाद ही तुम अपने रुतबे की स्थिरता या दूसरे लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं, इसकी चिंता कर सकते हो। इसे दो चरणों में बाँटो, थोड़ा-सा समझौता कर लो—क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि इससे चीजें थोड़ी आसान हो जाती हैं? यदि तुम कुछ समय तक इस तरह अभ्यास करते हो, तो तुम्हें महसूस होने लगेगा कि परमेश्वर को संतुष्ट करना कोई मुश्किल काम नहीं है। इसके अलावा, यदि तुम अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर सकते हो; अपने दायित्वों और कर्तव्य को पूरा कर सकते हो; अपनी स्वार्थी इच्छाओं, मंशाओं और उद्देश्यों को एक तरफ रख सकते हो; परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हो सकते हो; और परमेश्वर के घर के हितों, कलीसिया के कार्य और उस कर्तव्य को जिसे तुम्हें निभाना चाहिए, सबसे पहले रख सकते हो, तो कुछ समय तक इस तरह अनुभव करने के बाद, तुम्हें महसूस होगा कि इस तरह से आचरण करना अच्छा है, लोगों को ईमानदारी और स्पष्टवादिता से जीना चाहिए और उन्हें नैतिक साहस से विहीन, घिनौना, नीच अस्तित्व नहीं जीना चाहिए, बल्कि उन्हें ईमानदार और न्यायसंगत होना चाहिए। तुम्हें महसूस होगा कि यही वह छवि है जिसे व्यक्ति को जीना चाहिए। धीरे-धीरे, अपने हितों को तुष्ट करने की तुम्हारी इच्छा घटती चली जाएगी” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। परमेश्वर के वचनों से, मैं परमेश्वर के इरादों और अपेक्षाओं को समझ गई। मैं चाहे कुछ भी करूँ, मुझे अपने इरादे सही रखने चाहिए और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना चाहिए, अपनी इज्जत या रुतबे पर विचार नहीं करना चाहिए, परमेश्वर के घर के हितों को पहले रखना चाहिए, और अपना कर्तव्य और जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। खासकर चूँकि मैं एक पर्यवेक्षक थी, इसलिए मुझे प्रतिभाशाली लोगों को आगे बढ़कर विकसित करना चाहिए था और अपनी जिम्मेदारी के दायरे में उन सारे भाई-बहनों को पदोन्नत और विकसित करना चाहिए था जिनमें खूबियाँ हैं, ताकि वे उपयुक्त कर्तव्यों में अपनी भूमिका निभा सकें। परमेश्वर के इरादों को समझने के बाद, मैं अपने हितों को छोड़ने और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करने को तैयार थी। मुझे कलीसिया के कार्य को पहले रखना था और इतना स्वार्थी होना बंद करना था। मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब कुछ समय के प्रशिक्षण के बाद समूह के तीन नए सदस्यों ने लेखों के चयन में तेजी से प्रगति की और वे जल्द ही समूह का कार्य सँभालने में सक्षम हो गए।
2023 में, मैं एक कलीसिया अगुआ के रूप में अपना कर्तव्य कर रही थी, और बहन यीशुन सुसमाचार कार्य के लिए जिम्मेदार थी। वह सुसमाचार का प्रचार करने में कुशल थी, उसकी काबिलियत और कार्य-क्षमता अच्छी थी और वह स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम थी। मई में एक दिन, ऊपरी-स्तर के अगुआओं ने हमसे यीशुन का मूल्यांकन लिखने को कहा, क्योंकि वे उसे एक अधिक व्यापक जिम्मेदारी के दायरे में सुसमाचार कार्य की निगरानी के लिए स्थानांतरित करने की तैयारी कर रहे थे। यह खबर सुनकर मैं चौंक गई और सोचने लगी, “जिस सुसमाचार कार्य की यीशुन हाल ही में निगरानी कर रही है, उसमें अभी-अभी सुधार दिखना शुरू हुआ है। अगर उसका तबादला हो गया, तो मुझे कोई नया व्यक्ति ढूँढ़ना पड़ेगा। अगर मुझे कोई उपयुक्त सुसमाचार कार्यकर्ता नहीं मिला और सुसमाचार कार्य के नतीजों में गिरावट आ गई तो दूसरे मेरे बारे में क्या सोचेंगे?” मैंने थोड़ा-सा प्रतिरोध महसूस किया। जैसे ही मैं अपनी सहयोगी बहन से शिकायत करने वाली थी, मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा गलत है। मैं फिर से अपने हितों के बारे में क्यों सोचने लगी? मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “जब परमेश्वर के घर के कार्य को आवश्यकता हो तो चाहे वे कोई भी हों, सभी को परमेश्वर के घर के समन्वय और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना चाहिए और किसी एक अगुआ या कार्यकर्ता द्वारा नियंत्रित नहीं होना चाहिए, मानो वे उसके हों या उसके निर्णयों के अधीन हों। परमेश्वर के चुने हुए लोगों की परमेश्वर के घर की केंद्रीकृत व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है और इन व्यवस्थाओं की किसी के द्वारा अवहेलना नहीं की जा सकती, जब तक कि कोई अगुआ या कार्यकर्ता कोई मनमाना तबादला नहीं करता जो सिद्धांत के अनुसार न हो—उस मामले में इस व्यवस्था की अवज्ञा की जा सकती है। अगर सिद्धांतों के अनुसार सामान्य स्थानांतरण किया जाता है तो परमेश्वर के सभी चुने हुए लोगों को आज्ञापालन करना चाहिए और किसी अगुआ या कार्यकर्ता को किसी को नियंत्रित करने का प्रयास करने का अधिकार या कोई कारण नहीं है। क्या तुम लोग कहोगे कि ऐसा भी कोई कार्य होता है जो परमेश्वर के घर का कार्य नहीं होता? क्या कोई ऐसा कार्य होता है जिसमें परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार फैलाना शामिल नहीं होता? यह सब परमेश्वर के घर का ही कार्य होता है, हर कार्य समान होता है और उसमें कोई ‘तेरा’ और ‘मेरा’ नहीं होता। अगर तबादला सिद्धांत के अनुरूप और कलीसिया के कार्य की आवश्यकताओं पर आधारित है तो इन लोगों को वहाँ जाना चाहिए जहाँ इनकी सबसे ज्यादा जरूरत है” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, अनुपूरक चार : मसीह-विरोधियों के चरित्र और उनके स्वभाव सार का सारांश (भाग एक))। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि कर्मियों की व्यवस्था परमेश्वर के घर के कार्य की जरूरतों के अनुसार की जानी चाहिए और मुझे सभी कार्मिक तबादलों को स्वीकार करना चाहिए और इनके प्रति समर्पण करना चाहिए, बशर्ते ये उचित हों। मुझे लोगों को पकड़े रहने और उन्हें जाने न देने का कोई अधिकार नहीं है। मैं हमेशा अपने हितों पर विचार नहीं कर सकती। मेरे भाई-बहन चाहे कहीं भी अपने कर्तव्य करने के लिए भेजे जाएँ, यह सब परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार का प्रसार करने की खातिर है। अपनी बहन को एक उपयुक्त जगह पर अपना कर्तव्य करने देने से वह अपनी भूमिका बेहतर ढंग से निभा सकेगी और इससे कलीसिया के कार्य को लाभ होगा। परमेश्वर के इरादों को समझने के बाद, मैंने अपने भाई-बहनों से यीशुन के लिए एक मूल्यांकन लिखने की व्यवस्था की, और जल्द ही उसका तबादला हो गया। बाद में, हमने नए सुसमाचार कार्यकर्ता चुने, और कुछ समय के प्रशिक्षण के बाद, उन्होंने भी काम सँभाल लिया। सुसमाचार कार्य प्रभावित नहीं हुआ।
अतीत में, मैं हमेशा मानती थी कि अगर प्रतिभाशाली लोगों का तबादला हो गया तो काम के नतीजे निश्चित रूप से गिरेंगे, लेकिन अब मैंने देखा कि यह विचार भ्रामक था। अपना कर्तव्य निभाने में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या किसी का दिल सही है। अगर तुम परमेश्वर के इरादों का ध्यान रख सकते हो, अपने व्यक्तिगत हितों को छोड़ सकते हो, परमेश्वर के घर के हितों को पहले रख सकते हो और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर की अगुआई और आशीषों को देखोगे, और तुम अपना कर्तव्य बेहतर से बेहतर ढंग से करोगे। जैसा कि परमेश्वर कहता है : “जो चीजें सत्य सिद्धांतों के अनुसार होती हैं, उनके उत्तरोत्तर अच्छे नतीजे निकलते जाते हैं, जबकि जो चीजें सत्य सिद्धांतों के अनुसार नहीं होती हैं उनके उत्तरोत्तर खराब नतीजे निकलते हैं, भले ही वे उस समय लोगों की धारणाओं के अनुरूप हों। तमाम लोगों को इसकी पुष्टि हो जाएगी” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने का मार्ग)।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
रोक्साना, ताइवानमैं दो वर्षों से अधिक समय से वीडियो कार्य की पर्यवेक्षक हूँ। कुछ समय पहले काम की जरूरतों के चलते हमारे समूह को दो छोटे...
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