सत्य बताने की अनिच्छा के पीछे क्या छिपा है?
यी किउ, चीनसितंबर 2022 की शुरुआत में मैं कलीसिया में सिंचन टीम की अगुआ थी। उस समय दो नवागंतुक बहना किउ जेन और बहन यांग युन को दूसरी कलीसिया...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
सितंबर 2021 में मैंने वेंजुआंग कलीसिया के अगुआओं को खत लिखा था, क्योंकि मैं एक धर्मोपदेश लेख को संशोधित करने के लिए बहन ली जिंग के साथ एक बैठक करना चाहता था। अप्रत्याशित रूप से कुछ दिनों बाद अगुआओं ने जवाब दिया कि ली जिंग की समझ बेतुकी है। उसे बाहर निकालने की तैयारी में कलीसिया उस पर सामग्री जुटा रही थी और उन्होंने मुझे उससे न मिलने के लिए कहा। अगुआओं का जवाब सुनकर मैं हैरान रह गया। मैंने सोचा, “मैं और ली जिंग पहले एक ही कलीसिया में थे। तब मैंने देखा था कि उसे परमेश्वर के वचन पढ़ना पसंद था। वह अपने कर्तव्य में उत्साही थी, कीमत चुकाने को तैयार थी और उसकी मानवता काफी अच्छी थी। वह एक ईमानदार विश्वासी थी। बस उसकी काबिलियत बहुत अच्छी नहीं थी और वह भेद नहीं पहचान पाती थी। क्या अगुआओं से कोई गलती हुई है जो उन्होंने उसका निरूपण चीजों को बेतुके ढंग से समझने वाली के रूप में किया है?” अगुआओं की चिट्ठी में कहा गया था कि ली जिंग काफी घमंडी और आत्मतुष्ट है, वह अपने विचारों पर चलती है, अपनी मनमर्जी करती है और अगुआओं द्वारा व्यवस्थित मामलों में हमेशा सिद्धांतों के अनुसार काम करने में नाकाम रहती है। इसमें कुछ उदाहरण भी दिए गए थे कि कैसे वह रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दूसरों को बाधित करती थी। अगुआओं द्वारा बताई गई इनमें से ज़्यादातर अभिव्यक्तियाँ महज़ भ्रष्टता का खुलासा और उसकी मानवता की कमियाँ ही लग रही थीं। इनसे यह साबित नहीं होता था कि ली जिंग की समझ बेतुकी है। क्या अगुआओं ने उसका निरूपण गलत ढंग से किया था? अगर उन्होंने उसे गलती से बाहर निकाल दिया तो उसकी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी! उस समय मैंने अपना नज़रिया बताने के लिए कलीसिया के अगुआओं को खत लिखने की सोची। लेकिन फिर मुझे खयाल आया कि भले ही मैं ली जिंग को अतीत में जानता था, पर वह कई साल पुरानी बात थी। मुझे हाल के सालों में उसकी स्थिति का पता नहीं था। मुझे चिंता थी कि मेरा नज़रिया एकतरफा न हो, इसलिए मैंने चिट्ठी नहीं लिखी। मेरी सहयोगी, बहन यांग यी, हाल ही में ली जिंग के संपर्क में थी, इसलिए मैंने उसकी राय पूछी। यांग यी ने कहा कि जब उसने सुना कि अगुआ ली जिंग पर “बेतुकी समझ” को लेकर सामग्री जुटा रहे हैं तो वह भी हैरान रह गई थी और उसे नहीं लगता था कि ली जिंग बाहर निकाले जाने की शर्तें पूरी करती है। यह सुनकर कि यांग यी का नज़रिया मेरे जैसा ही है, मुझे लगा बहुत संभव है कि अगुआओं का निरूपण बहुत हद तक गलत है। इसलिए, परमेश्वर के घर से लोगों को बाहर निकालने और निष्कासित करने के सिद्धांतों के आधार पर, मैंने ली जिंग के मामले को सँभालने में अगुआओं के विचलन के बारे में लिखा और अपना नज़रिया बताया। लेकिन जैसे ही मैंने चिट्ठी पूरी की और उसे भेजने वाला था, मैं हिचकिचाया, “मेरा कर्तव्य पाठ आधारित कार्य है। लोगों को बाहर निकालना और निष्कासित करना मेरी ज़िम्मेदारी के दायरे में नहीं है। यह कलीसिया के अगुआओं का काम है। इसके अलावा, मैं उनकी कलीसिया का सदस्य नहीं हूँ। अगर मैं उन्हें इस मसले को बताने के लिए लिखता हूँ तो क्या वे यह सोचेंगे कि मैं अपनी हद पार कर रहा हूँ और दखल दे रहा हूँ? मेरा स्वभाव पहले से ही काफी घमंडी है, जैसा कि सभी भाई-बहन जानते हैं। अगर मैं अगुआओं को अपनी राय दूँगा तो क्या उन्हें और भी यकीन नहीं हो जाएगा कि मैं घमंडी हूँ?” फिर मैंने सोचा, “परमेश्वर का घर अभी कलीसिया की सफाई का काम कर रहा है। अगर मैं अब कहूँ कि ली जिंग बाहर निकाले जाने की शर्तें पूरी नहीं करती है तो क्या वे सोचेंगे कि मैं उसे बचा रहा हूँ और कलीसिया की सफाई के काम में बाधा डाल रहा हूँ? यह तो एक गंभीर आरोप होगा! हो सकता है मुझे ही अलग-थलग करके बाहर निकाल दिया जाए, यह उस लायक नहीं है! बेहतर है मैं इसे भूल जाऊँ। अगर वे गलती करते भी हैं तो यह उनकी ज़िम्मेदारी है, मेरी नहीं। जैसा कि कहावत है, ‘जो पक्षी अपनी गर्दन उठाता है गोली उसे ही लगती है,’ इसलिए बेहतर है कि मैं कोई दखल न दूँ। इसके अलावा, जब कलीसिया लोगों को बाहर निकालती और निष्कासित करती है तो उच्च-स्तरीय अगुआ अंतिम जाँच करते हैं। मुझे इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए।” यह सोचकर मैंने जो लिखा था वो मिटा दिया।
बाद में जब भी मैं इस बारे में सोचता, मुझे आत्म-ग्लानि होती और मैं लगातार बेचैन रहता। मैं साफ देख सकता था कि ली जिंग की अभिव्यक्तियाँ महज़ भ्रष्टता का खुलासा थीं और वह बाहर निकाले जाने की शर्तें पूरी नहीं करती थी, लेकिन मैं अगुआओं को इसकी रिपोर्ट करने की हिम्मत भी नहीं जुटा सका। अगर ली जिंग वाकई बाहर निकाल दी गई तो उसकी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी! क्या आंशिक रूप से मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँगा? लेकिन मुझे डर था कि इस मसले को उठाना मेरे लिए बुरा होगा। मैं असमंजस में फँसा हुआ महसूस कर रहा था, समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे मुझे प्रबुद्ध करने की विनती की ताकि मैं सत्य समझ सकूँ, खुद को जान सकूँ और अपने भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार न जीऊँ। प्रार्थना करने के बाद, मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “अधिकांश लोग सत्य का अनुसरण करने को तैयार हैं और सत्य का अभ्यास करना चाहते हैं, बहुत बार उनमें केवल दृढ़ संकल्प और ऐसा करने की इच्छा होती है; लेकिन भीतर से, सत्य उनका जीवन नहीं बना होता है। इसलिए जब तुम बुरी शक्तियों को कलीसिया के काम में बाधा डालते और तोड़फोड़ करते हुए देखते हो—उदाहरण के लिए, जब तुम नकली अगुआओं को सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए मामलों से निपटते और असली काम नहीं करते हुए देखते हो या बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों को बुराई करते और कलीसिया के काम में बाधा डालते और इस तरह परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाते हुए देखते हो—तो तुममें खड़े होने और बोलने का साहस नहीं होता। तुममें यह साहस क्यों नहीं होता? क्या यह इसलिए है क्योंकि तुम डरपोक हो या स्पष्ट रूप से नहीं बोल पाते हो या क्या तुम इसलिए बोलने की हिम्मत नहीं करते क्योंकि तुम चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते? यह इनमें से किसी भी चीज के कारण नहीं है; यह मुख्य रूप से तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों द्वारा बाधित होने का परिणाम है। तुम्हारे द्वारा प्रकट किए जाने वाले भ्रष्ट स्वभावों में से एक कपटी स्वभाव है : जब कुछ घटित होता है, तो सबसे पहले तुम अपने हितों, अपने कार्यों के परिणामों और क्या वे तुम्हारे लिए फायदेमंद होंगे, इस पर विचार करते हो। यह एक कपटी स्वभाव है, है ना? दूसरा स्वार्थी और नीच स्वभाव है। तुम सोचते हो, ‘उनके द्वारा परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाने से मेरा क्या लेना-देना? मैं अगुआ नहीं हूँ, तो मुझे इसमें क्यों शामिल होना चाहिए? इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है और यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है।’ ऐसे विचार और शब्द कुछ ऐसे नहीं हैं जिन्हें तुम जानबूझकर सोचते हो, बल्कि वे तुम्हारे द्वारा अनजाने में उत्पन्न होते हैं—ये वे भ्रष्ट स्वभाव हैं जिन्हें लोग किसी समस्या का सामना करने पर प्रकट करते हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए, मुझे लगा जैसे वह आमने-सामने मुझे उजागर कर रहा था और मेरा न्याय कर रहा था। मैं अच्छी तरह जानता था कि ली जिंग बाहर निकाले जाने की शर्तें पूरी नहीं करती थी और अगुआओं द्वारा किए गए उसके निरूपण में विचलन थे। मैं किसी को गलती से बाहर निकालने के नतीजे भी जानता था। मैंने जो देखा वह पूरी तरह सही रहा हो या न रहा हो, लेकिन मुझे इस बात को उनके सामने रखना चाहिए था ताकि वे उसे गलती से बाहर न निकालें और उसका उद्धार पाने का मौका खतरे में न पड़ जाए। लेकिन मैंने सिर्फ अपने हितों के बारे में सोचा। मुझे डर था कि अगर मैंने अगुआओं को अपनी राय बताई तो भाई-बहन सोचेंगे कि मैं घमंडी हूँ और अपनी हद पार कर रहा हूँ। मुझे यह भी डर था कि वे सोचेंगे कि मैं ली जिंग को बचा रहा हूँ। अगर मुझे कलीसिया की सफाई के काम में बाधा डालने वाला ठहराया गया तो यह मेरे अपने परिणाम और मंज़िल के लिए विनाशकारी होगा। खुद को बचाने के लिए, मैंने अगुआओं को चिट्ठी ही नहीं लिखी। मैं जीवित रहने के शैतानी नियमों के आधार पर जी रहा था, जैसे “चीजों को वैसे ही चलने दो अगर वे किसी को व्यक्तिगत रूप से प्रभावित न करती हों,” “परेशानी जितनी कम हो उतना अच्छा है” और “समझदार लोग आत्म-रक्षा में अच्छे होते हैं, वे बस गलतियाँ करने से बचते हैं।” मैं जो भी करता था, उसका मुख्य सिद्धांत खुद को बचाना होता था। मैंने हमेशा सिर्फ अपने भविष्य और हितों की परवाह की, कलीसिया के काम या अपने भाई-बहनों के जीवन की मुझे कोई फिक्र नहीं थी। मैं कितना स्वार्थी और नीच था, मुझमें मानवता नाम की कोई चीज़ नहीं थी! इसका एहसास होने पर मेरे दिल में खुद के लिए थोड़ी नफरत जगी और अब मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार नहीं जीना चाहता था।
बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिसने सच में मेरे दिल को छू लिया। परमेश्वर कहता है : “यदि तुम परमेश्वर में अपनी आस्था और अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए सचमुच प्रयास नहीं करते; यदि तुम हमेशा बिना मन लगाए काम करते हो और अपने कामों में लापरवाह रहते हो, उस अविश्वासी की तरह जो अपने मालिक के लिए काम करता है; यदि तुम केवल नाम-मात्र के लिए प्रयास करते हो, अपना दिमाग इस्तेमाल नहीं करते, किसी तरह हर दिन यूँ ही गुजार देते हो, उन समस्याओं को देखकर उनसे आँखें फेरते हो, परेशानी में फँसे लोगों के प्रति उदासीन रहते हो, और विवेक शून्य तरीके से हर उस बात को ख़ारिज करते हो जो तुम्हारे व्यक्तिगत लाभ की नहीं—तो क्या यह समस्या नहीं है? ऐसा कोई व्यक्ति परमेश्वर के घर का सदस्य कैसे हो सकता है? ऐसे लोग अविश्वासी होते हैं; वे परमेश्वर के घर के नहीं हो सकते। परमेश्वर उनमें से किसी को भी स्वीकार नहीं करता। तुम सच्चे हो या नहीं, तुमने प्रयास किया हो या नहीं, परमेश्वर इन बातों का हिसाब रखता है और इस बात को तुम भी अच्छी तरह जानते हो। तो क्या तुमने कभी सचमुच अपना कर्तव्य निभाने का प्रयास किया है? क्या तुमने इसे गंभीरता से लिया है? क्या तुमने इसे अपना दायित्व, अपनी बाध्यता माना है? क्या तुमने इसकी जिम्मेदारी ली है? तुम्हें इन मामलों पर ठीक से विचार कर इन्हें जानना चाहिए, जिससे तुम्हारे कर्तव्य निर्वहन में जो समस्याएँ आ रही हैं, उन्हें दूर करना आसान हो जाएगा, यह तुम्हारे जीवन प्रवेश के लिए फायदेमंद होगा। यदि तुम अपना कर्तव्य निभाते हुए हमेशा गैर-जिम्मेदार बने रहोगे, और समस्याओं के पता लगने पर उनके बारे में अगुआओं और कर्मियों को नहीं बताओगे, न ही उन्हें अपने दम पर हल करने के लिए सत्य खोजोगे और यही सोचते रहोगे कि ‘परेशानी जितनी कम हो उतना अच्छा है,’ हमेशा सांसारिक आचरण के फलसफों के सहारे जिओगे, अपने कर्तव्य को निभाते समय अनमने बने रहोगे, कभी कोई लगन नहीं रखोगे, काट-छाँट के समय बिल्कुल भी सत्य नहीं स्वीकारोगे—यदि तुम इस तरह से अपना कर्तव्य निभाओगे तो तुम खतरे में हो; तुम श्रमिकों में से एक हो। श्रमिक परमेश्वर के घर के सदस्य नहीं होते, बल्कि कर्मचारी, भाड़े के मजदूर होते हैं। काम समाप्त होने पर उन्हें हटा दिया जाएगा और वे स्वाभाविक रूप से महा विनाश में जा गिरेंगे। परमेश्वर के घर के लोग अलग हैं; जब वे अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो यह धन के लिए या प्रयास करने या आशीषों के लिए नहीं होता। वे सोचते हैं, ‘मैं परमेश्वर के घर का सदस्य हूँ। जो मामले परमेश्वर के घर से सरोकार रखते हैं, वे मुझसे सरोकार रखते हैं। परमेश्वर के घर के मामले मेरे मामले हैं। मुझे अपना दिल परमेश्वर के घर में लगाना चाहिए।’ इस वजह से वे हर उस मामले में अपना दिल लगाते हैं, जो परमेश्वर के घर से सरोकार रखता है, और उसकी जिम्मेदारी लेते हैं। वे हर उस चीज की जिम्मेदारी लेते हैं, जिसे वे सोच और देख सकते हैं। वे उन चीजों पर नज़र रखते हैं जिन्हें सँभालने की ज़रूरत होती है, और वे मामले को दिल से लेते हैं। ये परमेश्वर के घर के लोग हैं। क्या तुम लोग भी ऐसे ही हो? (नहीं।) अगर तुम केवल देह के सुखों में लिप्त रहते हो, यह देखकर भी ध्यान नहीं देते कि परमेश्वर के घर में ऐसी चीजें हैं जिन्हें सँभालने की जरूरत है, तेल की बोतल गिरने पर उसे उठाते नहीं, और तुम्हारा दिल जानता है कि समस्या है लेकिन तुम उसे हल नहीं करना चाहते, तो तुम परमेश्वर के घर को अपना नहीं मानते। क्या तुम लोग ऐसे ही हो? अगर ऐसा है, तो तुम लोग इतने नीचे गिर गए हो कि तुममें और अविश्वासियों में कोई भेद नहीं है। अगर तुम पश्चात्ताप नहीं करते, तो तुम लोगों को परमेश्वर के घर के बाहर माना जाना चाहिए; तुम्हें किनारे करके हटा दिया जाना चाहिए” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने के लिए व्यक्ति में कम से कम जमीर और विवेक तो होना ही चाहिए)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गया कि परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने में परमेश्वर के प्रति व्यक्ति का रवैया बहुत मायने रखता है। अगर उसका दिल परमेश्वर के लिए सच्चा है, हर बात में वह परमेश्वर की ओर मुड़ता है और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करता है तभी परमेश्वर उसे अपने घर का हिस्सा मानता है। वरना, परमेश्वर उसे ठुकरा और निकाल देगा। मैंने इस बात पर विचार किया कि ली जिंग को बाहर निकालने के लिए सामग्री जुटाने वाले मामले को मैंने कैसे सँभाला था। इससे पता चला कि मेरा दिल परमेश्वर की ओर बिल्कुल नहीं मुड़ा था। मैं देख पा रहा था कि ली जिंग के बारे में अगुआओं के निरूपण में विचलन था और मैं जानता था कि उसे गलत तरीके से बाहर निकालने से उसका नुकसान होगा और उसकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। फिर भी मैंने न देखने का नाटक किया, यह सब सिर्फ खुद को बचाने के लिए था। अपनी जिम्मेदारी से भागने और सत्य का अभ्यास न करने के लिए, मैंने यह बहाना भी बनाया कि कलीसिया के काम की जाँच करने के लिए हर स्तर पर अगुआ हैं। कलीसिया में जो कुछ हो रहा था, उसे लेकर मेरा रवैया दुनिया में काम करने वाले किसी अविश्वासी से अलग कैसे था? मैंने सिर्फ अपने हितों की रक्षा की और बाकी हर बात को नजरअंदाज कर दिया। मैं परमेश्वर के घर में खुद को बाहरी मान रहा था। परमेश्वर के लिए मेरे पास सच्चा दिल नहीं था और मैंने वाकई उसकी नफरत और घृणा मोल ली थी। मैं परमेश्वर के घर का सदस्य हूँ, लेकिन जब मैंने देखा कि एक बहन को गलत तरीके से बाहर निकाला जाने वाला था तो मैं अगुआओं को इसकी रिपोर्ट तक नहीं कर सका। मुझमें न्याय का कोई भाव ही नहीं था। मैं पूरी तरह से बुजदिल था! अगर परमेश्वर के लिए मेरा दिल वाकई सच्चा होता तो मैंने कलीसिया के काम में अपनी जिम्मेदारी निभाई होती। यह वैसा ही है जैसे बच्चे अपने माता-पिता या परिवार को परेशानी में देखकर। खुद आगे बढ़कर मदद करते हैं, उन्हें किसी के कहने या निगरानी की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे खुद को उस परिवार का हिस्सा मानते हैं और परिवार के हर मामले में मदद करना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। लेकिन परमेश्वर के घर का सदस्य होने के नाते, जब मैंने देखा कि अगुआओं द्वारा मामले को सँभालने में विचलन है तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए था कि मैं उस कलीसिया का हूँ या नहीं या यह मेरे दायरे में आता है या नहीं। जब मैंने यह देख लिया था तो अगुआओं को इसके बारे में बताना मेरी जिम्मेदारी थी। मेरा आकलन सही रहा हो या नहीं, पर मेरे मसला उठाने के बाद अगुआ इसका सत्यापन करते, जाँच-पड़ताल करते और इसकी तह तक जाते। जिससे कलीसिया के काम को ही फायदा होता। इस तरह अभ्यास करना दखल देना या अपनी हद पार करना नहीं है, न ही यह घमंडी स्वभाव का प्रकट होना है। यह अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य निभाना है, कलीसिया और मेरे भाई-बहनों के हितों की रक्षा करना है। इसका एहसास होने पर मेरे दिल को थोड़ा सुकून मिला।
बाद में मैंने सोचा कि अगुआओं को इस मसले की रिपोर्ट करना साफ तौर पर सत्य का अभ्यास करना और कलीसिया के हितों की रक्षा करना था। फिर भी मुझे हमेशा डर था कि इसके लिए मुझे दोषी ठहराकर मेरे साथ निपटा जाएगा। यह परमेश्वर से चौकन्ना रहना था और यह विश्वास न करना था कि परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “परमेश्वर के पास विश्वासयोग्यता का सार है, अतः उसके वचनों पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, उसके क्रियाकलाप दोषरहित और निर्विवाद हैं। यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार होते हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तीन चेतावनियाँ)। “यदि तुम बहुत धोखेबाज हो, तो तुम सभी लोगों और मामलों के प्रति सतर्क और शंकित रहोगे; इस प्रकार मुझमें तुम्हारी आस्था संदेह की नींव पर निर्मित होगी। मैं इस तरह की आस्था को कभी स्वीकार नहीं कर सकता। सच्चे विश्वास के अभाव में तुम सच्चे प्यार से और भी अधिक वंचित हो। और यदि तुम परमेश्वर पर संदेह भी कर सकते हो और उसके बारे में मनमाने ढंग से अनुमान लगा सकते हो, तो तुम यकीनन सभी लोगों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। तुम अनुमान लगाते हो कि क्या परमेश्वर मनुष्य जैसा हो सकता है : अक्षम्य रूप से पापी, क्षुद्र, निष्पक्षता और तर्कसंगतता से विहीन, न्याय की भावना से रहित, कुटिल चालें चलने वाला, कपटी और धूर्त, बुराई और अंधकार में खुश होने वाला, आदि-आदि। क्या लोगों के ऐसे विचारों का कारण यह नहीं है कि उन्हें परमेश्वर का थोड़ा-सा भी ज्ञान नहीं है? ऐसा विश्वास पाप से कम नहीं है! कुछ लोग तो यह तक मानते हैं कि मुझे सिर्फ वही लोग पसंद हैं जो चापलूसी करना और तलवे चाटना जानते हैं और जो लोग ऐसा करना नहीं जानते, वे परमेश्वर के घर में अवांछनीय होंगे और वे वहाँ अपना स्थान खो देंगे। क्या तुम लोगों ने इतने बरसों में बस यही ज्ञान हासिल किया है? क्या तुम लोगों ने यही प्राप्त किया है? और मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान इन गलतफहमियों पर ही नहीं रुकता; परमेश्वर के आत्मा के खिलाफ तुम्हारी निंदा और स्वर्ग की बदनामी इससे भी बुरी बात है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि ऐसी आस्था तुम लोगों को केवल मुझसे दूर भटकाएगी और मेरे प्रति शत्रुता और बढ़ा देगी” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पृथ्वी के परमेश्वर को वास्तव में कैसे जानें)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गया कि परमेश्वर का सार वफादार और पवित्र है। वह सभी के लिए धार्मिक है; वह किसी अच्छे व्यक्ति के साथ गलत नहीं करेगा, न ही वह किसी बुरे इंसान को बख्शेगा। परमेश्वर का घर हर व्यक्ति के साथ सिद्धांतों के अनुसार पेश आता है। कलीसिया की सफाई के काम का मकसद अंदर छिपे सभी मसीह-विरोधियों, बुरे लोगों और छद्म-विश्वासियों को बाहर निकालना है ताकि कलीसिया को शुद्ध किया जा सके। यह पूरी तरह से परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव द्वारा निर्धारित होता है। लेकिन मैं परमेश्वर से चौकन्ना था, मैंने परमेश्वर के घर की सफाई के काम को बड़े लाल अजगर के राजनीतिक अभियानों जैसा समझ लिया था, मुझे लगा जैसे मैं तूफान के बीच फँसा हूँ और मैं कुछ भी ऐसे ही नहीं बोल सकता था—वरना मुझे सताया जाएगा। परमेश्वर के घर में सफाई का काम चल रहा था। मुझे चिंता थी कि अगर मैंने अगुआओं को बताया कि ली जिंग बाहर निकाले जाने की शर्तें पूरी नहीं करती है तो मुझे सफाई के काम में बाधा डालने के लिए शायद दोषी ठहराया जाएगा। मेरा नजरिया कितना बेतुका था। मुझे विश्वास नहीं था कि परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है—यह मुझे एक छद्म-विश्वासी बनाता है! असल में, कलीसिया की सफाई के काम में बाधा डालने का मतलब मसीह-विरोधियों और बुरे लोगों का पक्ष लेना है। जब कलीसिया मसीह-विरोधियों, बुरे लोगों और छद्म-विश्वासियों से निपट रही हो, तब तरह-तरह के बहानों से उनका बचाव करना और उन्हें कलीसिया में बनाए रखने की कोशिश करना बाधा डालना है। यह कलीसिया के काम में विघ्न डालना और बुराई करना है। लेकिन इस मामले में, ली जिंग बाहर निकाले जाने की शर्तें पूरी नहीं करती थी। कलीसिया के अगुआओं को इसकी रिपोर्ट करने का मकसद सिर्फ इतना था कि वे इसे सत्यापित कर सकें और स्थिति साफ हो सके और ली जिंग को गलत तरीके से बाहर निकाले जाने के कारण उसका उद्धार पाने का मौका बर्बाद न हो। इस तरह अभ्यास करना मेरे भाई-बहनों की रक्षा करता है और यह कलीसिया के हितों को बनाए रखने की एक अभिव्यक्ति भी है। यह जानबूझकर सफाई के काम में बाधा डालना नहीं है। इसके अलावा मैं गलत होता भी हूँ तो मेरा मकसद तो कलीसिया के हितों की रक्षा करना था। इसलिए कलीसिया इसके लिए मेरी निंदा नहीं करेगी। कलीसिया सिद्धांतों के अनुसार मामले को निष्पक्ष रूप से सँभालेगी। तो फिर मुझे इतना चिंतित और परेशान होने की क्या जरूरत थी? इसका एहसास होने पर मैंने आजाद महसूस किया और सत्य का अभ्यास करने का संकल्प पाया।
मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का अर्थ है परमेश्वर के किसी भी कार्य पर संदेह न करने या उससे इनकार न करने और उसके कार्य के प्रति समर्पित रहने में सक्षम होना। इसका अर्थ है परमेश्वर की उपस्थिति में सही इरादे रखना और स्वयं के लिए योजनाएँ न बनाना; इसका अर्थ परमेश्वर के घर के हितों को प्राथमिकता देना, परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना भी है, चाहे तुम कुछ भी कर रहे हो। तुम जो कुछ भी करते हो, उसमें तुम्हें परमेश्वर की उपस्थिति में अपने हृदय को शांत करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं भी समझते, तो भी तुम्हें अपनी सर्वोत्तम योग्यता के साथ अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करना चाहिए। एक बार परमेश्वर के इरादे तुम पर प्रकट हो जाते हैं, तो फिर उनके अनुसार अभ्यास करो, यह बहुत विलंब नहीं होगा। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाता है, तब लोगों के साथ भी तुम्हारा संबंध सामान्य होगा। परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध बनाने के लिए, सब कुछ परमेश्वर के वचनों की नींव पर बनाया जाना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य करना चाहिए, तुम्हें अपने विचार सही रखने चाहिए, हर चीज में सत्य खोजना चाहिए और जब तुम सत्य समझ जाओ, तो तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए। चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी घटित हो, तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर की आज्ञा मानने वाले दिल से खोजना चाहिए। इस प्रकार अभ्यास करते हुए, तुम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध बनाए रख पाओगे” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गया कि परमेश्वर में विश्वास करने के लिए, हमें उसके साथ एक सामान्य रिश्ता बनाना होगा और अपना दिल उसे सौंपना होगा। अपनी कथनी-करनी में हमें अपने भाई-बहनों के जीवन प्रवेश और कलीसिया के कार्य का ध्यान रखना चाहिए और हमें हर बात में परमेश्वर की पड़ताल स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। तभी हम सत्य का अभ्यास कर सकते हैं। चूँकि मैंने देख लिया था कि अगुआओं ने ली जिंग के मामले में गलत निरूपण किया है, मुझे अपना नज़रिया साझा करना चाहिए था। भले ही मेरा नज़रिया पूरी तरह सही न हो, इसे उठाने से अगुआ फिर से उसकी स्थिति की जाँच करेंगे और गलत तरीके से बाहर निकालने के कारण उसका उद्धार पाने का मौका बर्बाद नहीं होगा। इस तरह अभ्यास करना मेरे भाई-बहनों के जीवन प्रवेश और कलीसिया के काम दोनों के लिए फायदेमंद होगा। भले ही मैं ली जिंग को जानता था, लेकिन मैं उसे बचाने या खुद का दिखावा करने के लिए इस मसले की रिपोर्ट नहीं कर रहा था। यह उसके बारे में मेरी समझ पर आधारित था और इस तथ्य पर कि अगुआओं द्वारा बताई गई अभिव्यक्तियाँ लोगों को बाहर निकालने के कलीसिया के सिद्धांतों से मेल नहीं खाती थीं। यह उसके साथ निजी रिश्ता बनाए रखने के बारे में नहीं था। हालाँकि सतह पर यह मामला छोटा लग रहा था, लेकिन यह इस बात से जुड़ा था कि क्या मैं सत्य का अभ्यास कर सकता हूँ और कलीसिया के हितों की रक्षा कर सकता हूँ। यह परमेश्वर की ओर से एक परीक्षा भी थी। इसलिए मैं घुटनों के बल बैठा और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उसकी माँगों के अनुसार अभ्यास करने की अपनी इच्छा ज़ाहिर की। प्रार्थना करने के बाद मैंने ली जिंग की अभिव्यक्तियों पर एक बार फिर से विचार किया। फिर, उसके बारे में अगुआओं के निरूपण में जो समस्याएँ थीं, उनके आधार पर मैंने प्रासंगिक सिद्धांतों को जोड़ते हुए अपनी समझ और नज़रिये की संगति की। चिट्ठी लिखने के बाद, मैंने इसे अगुआओं को भेज दिया। इस तरह अभ्यास करने से, मुझे बहुत सुकून और शांति मिली।
बाद में अगुआओं ने वापस लिखा। उन्होंने कहा कि उन्होंने फिर से जाँच की है। ली जिंग की अभिव्यक्तियों को लेकर प्रासंगिक सिद्धांतों को खोजने के बाद, उन्होंने माना कि वह बाहर निकाले जाने की शर्तें पूरी नहीं करती है। उन्होंने माना कि उनके पिछले निरूपण में विचलन थे और ली जिंग अभी भी कलीसिया में अपना कर्तव्य कर रही है। यह नतीजा देखकर मुझे बहुत खुशी हुई। मुझे लगा कि सत्य का अभ्यास करना कितना अद्भुत है! अब से, मुझे इसका और भी ज़्यादा अभ्यास करना चाहिए।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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