“माता-पिता हमेशा सही होते हैं,” क्या यह नज़रिया सही है?

31 जुलाई, 2026

आन्शिन, चीन

मेरी माँ ने मुझे और मेरे छोटे भाई को पालने में बहुत दुख उठाए थे। वह अक्सर कहती थी कि जब तक मैं और मेरा भाई अच्छा जीवन जीते हैं, उनका हर दुख उठाना सार्थक है। मुझे यकीन था कि दुनिया में मेरी माँ मुझे सबसे ज्यादा प्यार करती है और वह जो कुछ भी करती है, मेरी भलाई के लिए ही करती है। जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई, मेरी शादी मेरे माता-पिता की सबसे बड़ी चिंता बन गई। जब मैं तेईस साल की थी, मेरी माँ अक्सर मेरे पीछे पड़ी रहती थी और कहती, “अब तुम बड़ी हो गई हो। एक सही जीवनसाथी ढूँढ़ने का समय आ गया है। अगर और इंतज़ार करोगी तो सारे अच्छे लड़के हाथ से निकल जाएँगे।” मुझे लगता था कि शादी जीवन भर की प्रतिबद्धता है, इससे सावधानी से पेश आना चाहिए; मैं यूँ ही जल्दबाज़ी में शादी नहीं करना चाहती थी। वैसे भी उस समय मेरी उम्र इतनी ज़्यादा नहीं थी, इसलिए मैं यह कहकर बात टाल देती, “कोई जल्दी नहीं है। जब सही लड़का मिलेगा, तब मैं मिलना-जुलना शुरू करूँगी।” उसी साल मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार किया था। परमेश्वर के वचन पढ़कर, मुझे पता चला कि यह मानवता को बचाने के लिए परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का यह बेहद दुर्लभ अवसर है। मुझे तत्काल अपना कर्तव्य निभाना था और सच्चाई से सत्य का अनुसरण करना था। ऐसे समय में शादी करने से मेरे उद्धार पाने का मौका आसानी से बर्बाद हो सकता था। इसलिए, मैं शादी को लेकर और ज़्यादा सावधान हो गई और लड़का ढूँढ़ने की बात टालती रही। मेरी माँ बहुत चिंतित थी। जब भी कोई किसी लड़के का रिश्ता लाता, वह मुझसे उससे मिलने के लिए ज़ोर देती। मुझे इससे बहुत चिढ़ होती थी। मुझे लगता था जैसे वह मुझे किसी सामान की तरह बेचने की कोशिश कर रही हो। साथ ही, मैं काफी शर्मीले स्वभाव की हूँ और मुझे इस तरह मिलना-जुलना बिल्कुल पसंद नहीं था, इसलिए मैं वास्तव में उन तय मुलाकातों के लिए नहीं जाना चाहती थी। लेकिन जब मेरी माँ शादी के लिए दबाव डालती तो मैं बेबस महसूस करती थी। मुझे और मेरे भाई को पालने में उसने बहुत दुख उठाए थे और वह अक्सर हमें बताती थी कि यह कितना मुश्किल था। “माता-पिता का प्यार महान है” और “माता-पिता हमेशा सही होते हैं,” इन कहावतों की वजह से, मुझे बस यही लगता था कि वह जो भी करती है मेरी भलाई के लिए ही करती है। उसे दुख न पहुँचाने के लिए, मैं उसकी बात मान लेती और न चाहते हुए भी उसके तय किए गए लड़कों से मिलने जाती। लेकिन मैं जानती थी कि यह परमेश्वर के कार्य का महत्वपूर्ण समय है और मिलने-जुलने या शादी करने से परमेश्वर में मेरे विश्वास में बाधा आएगी। इसलिए ज़्यादातर समय, मैं इन मुलाकातों पर जाती और बाद में कोई बहाना बनाकर कह देती कि हम एक-दूसरे के लिए सही नहीं हैं। इसी तरह से मैं बात को टाल देती थी। फिर 2013 में, जब मैं पच्चीस साल की थी, मेरी एक लड़के से मुलाकात हुई जो बिल्कुल मेरी पसंद का था। वह सुलझा हुआ था और अपने माता-पिता का आदर करता था और मेरी माँ को वह बहुत पसंद आया। मैंने मन ही मन सोचा, “मैं उससे मिलकर देख सकती हूँ। मैं उसे सुसमाचार का प्रचार करूँगी और फिर हम एक साथ परमेश्वर में विश्वास कर सकेंगे।” मैंने उससे तीन बार परमेश्वर में विश्वास करने के बारे में बात की, लेकिन उसने आधे-अधूरे मन से सुना और मुस्कुराते हुए कहा, “परमेश्वर पर विश्वास करना अच्छी बात है। मैं तुम्हें ऐसा करने से नहीं रोकूँगा।” मैं बहुत निराश हुई और मुझे चिंता होने लगी कि अगर हम सच में एक साथ हो गए तो कहीं वह भी उसी तरह मेरा विरोध और उत्पीड़न न करे जैसे अन्य बहनों को अपने पतियों से सहना पड़ता है। हम चार महीने से ज़्यादा समय तक मिलते रहे और जितना ज़्यादा समय हमने साथ बिताया, वह मुझे उतना ही ज़्यादा पसंद आने लगा। मैंने सोचा, “हमें साथ हुए अभी कुछ ही महीने हुए हैं, लेकिन मेरा मन पहले ही इन चीज़ों से भर चुका है। मैं अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं निभा पा रही हूँ, मैं सभाओं में बस औपचारिकता निभा रही हूँ और परमेश्वर के वचन पढ़ने में मन नहीं लगा रही हूँ। अगर हमारी सच में शादी हो जाती है तो क्या मैं हर दिन परिवार के इन्हीं छोटे-मोटे मामलों में नहीं उलझी रहूँगी और अपने कर्तव्य पर पूरी तरह ध्यान नहीं दे पाऊँगी? मैं आँखें बंद करके जल्दबाज़ी में शादी नहीं कर सकती।” लेकिन मेरे माता-पिता चाहते थे कि हम सिर्फ चार महीने बाद ही शादी कर लें। मुझे डर था कि शादी करने से परमेश्वर पर विश्वास करके उद्धार पाने का मेरा मौका सच में बर्बाद हो जाएगा। लेकिन मेरा मन उससे रिश्ता तोड़ने को नहीं मान रहा था। बड़ी मुश्किल से मुझे अपनी पसंद का कोई मिला था और मैं उसे छोड़ना नहीं चाहती थी। इसके अलावा, मेरे माता-पिता और मेरी दादी सभी उसे पसंद करते थे। अगर मैं उससे शादी नहीं करती तो मेरे माता-पिता बहुत निराश होते और मेरी शादी को लेकर हमेशा चिंता में डूबे रहते। मेरे दिल में लगातार एक जंग छिड़ी हुई थी और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। अपनी इस पीड़ा में, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, कि वह सही चुनाव करने में मेरा मार्गदर्शन करे। बाद में, मैंने प्रभु यीशु के ये वचन पढ़े : “जो गर्भवती और दूध पिलाती होंगी, उन के लिये हाय, हाय(मत्ती 24:19)। मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के ये वचन भी पढ़े : “कुछ लोगों का परिवार उन्हें परमेश्वर में आस्था रखने से रोकता है जिससे कि वे जब तक शादी न करें, परमेश्वर में आस्था न रख पाएँ। इस तरह, विवाह वास्तव में उनके लिए मददगार है। दूसरों के लिए, विवाह फायदेमंद नहीं है, बल्कि उसके कारण उन्हें वह भी गँवाना पड़ता है जो पहले उनके पास था। तुम्हारा अपना मामला तुम्हारी वास्तविक परिस्थितियों और तुम्हारे अपने संकल्प से तय होना चाहिए। मैं यहाँ तुम्हारे लिए नए नियम और कायदे बनाने के लिए नहीं हूँ जिनके अनुसार मैं तुम लोगों से अपेक्षाएँ करूँ(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (7))। परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ आया कि सत्य की खातिर शादी छोड़ देना एक बहुत ही मूल्यवान बात है। ऐसा करके, मुझे अपना कर्तव्य निभाने और सत्य का अनुसरण करने के लिए ज़्यादा समय और ऊर्जा मिलेगी। अगर शादी के कारण मैंने अपना कर्तव्य निभाने का मौका खो दिया और आखिर में सत्य या उद्धार नहीं पा सकी तो मैं जितना पाऊँगी उससे कहीं ज़्यादा खो दूँगी। महा विनाश पहले ही शुरू हो चुका है और अब ज़्यादा समय नहीं बचा है। मुझे इस समय का फायदा उठाकर खुद को सत्य से लैस करना होगा। अभी मेरी शादी नहीं हुई है और मुझ पर परिवार का कोई बंधन नहीं है, इसलिए मैं पूरे समय अपना कर्तव्य निभा सकती हूँ। अगर मेरी शादी हो गई तो मैं पक्का दिन-भर घर में फंसी रहूँगी। मैं बहुत भावुक इंसान हूँ, इसलिए अगर आगे चलकर मेरा परिवार हो गया तो पक्का मैं अपनी भावनाओं के कारण अपने कर्तव्य की उपेक्षा करूँगी और इससे मेरे उद्धार पाने का मौका बर्बाद हो जाएगा। बहुत सोच-विचार करने के बाद, मैंने आखिरकार उससे रिश्ता तोड़ने का फैसला कर लिया। जब मेरी माँ को यह बात पता चली तो वह बहुत परेशान हुई और उसे गुस्सा भी आया। उसने मुझे समझाते हुए कहा, “मैं और तुम्हारे पिता अब बूढ़े हो रहे हैं और मेरी तबीयत भी ठीक नहीं रहती। हम ज़िंदगी-भर तुम्हारी देखभाल नहीं कर सकते! हम इस परिवार को अच्छी तरह जानते हैं। अगर तुम जल्दी से शादी कर लो तो मेरे और तुम्हारे पिता के सिर से यह भावनात्मक बोझ उतर जाएगा।” माँ की ये बातें सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ। मेरे माता-पिता मेरी शादी को लेकर हर दिन इतना परेशान रहते थे कि यह उनके लिए एक भावनात्मक बोझ बन गया था। मुझे पालते हुए उन्हें पहले ही काफी चिंताओं का सामना करना पड़ चुका था। उनका बोझ बाँटने और उनकी परेशानी कम करने के बजाय, मैं उनके लिए सबसे बड़ा बोझ बन रही थी। मैं खुद को धिक्कार रही थी, मुझे लग रहा था कि मैं संतानोचित नहीं हूँ। भले ही वह लड़का मेरी पसंद का था, पर परमेश्वर पर विश्वास करने में उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी। हमारी सोच अलग थी और हमारे रास्ते अलग थे। हम एक साथ खुश नहीं रह पाते। जिन कुछ महीनों में हम मिले-जुले, मुझे इस रिश्ते की कोई खुशी नहीं मिली, बल्कि मुझे लगातार आध्यात्मिक पीड़ा ही सहनी पड़ी। मुझे हमेशा यही डर लगा रहता था कि शादी के बाद, मेरा परिवार एक ऐसी उलझन और रुकावट बन जाएगा जो मुझे सत्य के अनुसरण से रोकेगा और इससे मेरे उद्धार पाने का मौका बर्बाद हो जाएगा। यह सब सोचकर, मेरा इरादा पक्का हो गया और मैंने उससे रिश्ता तोड़ने का फैसला कर लिया। इसके बाद, मेरे प्रति मेरी माँ का रवैया बदल गया। कभी-कभी वह अपना आपा खो देती और मुझ पर बुरी तरह चिल्लाती, “परमेश्वर पर इतनी गंभीरता से कौन विश्वास करता है? एक लड़की का काम एक अच्छे घर में शादी करना और घर के छोटे-बड़ों की देखभाल करना है!” कभी-कभी वह मुझे भड़काने के लिए बहुत कड़वी बातें भी कहती थी। मुझे बहुत दुख होता था, लेकिन मैं उसे दोष नहीं देती थी। जैसा कि लोग कहते हैं, “माता-पिता हमेशा सही होते हैं।” मुझे लगता था कि वह जो कुछ भी करती है, मेरी भलाई के लिए ही करती है। आखिरकार, “प्यार जितना गहरा होता है, डाँट भी उतनी ही सख़्त होती है।” वह मेरी शादी को लेकर परेशान थी और इसी चिंता की वजह से मुझ पर चिल्लाती थी। इसलिए मैं बस चुपचाप सब सहती रही।

चीनी नव वर्ष और अन्य त्योहारों पर, मेरे माता-पिता दूसरी बेटियों को उनके पति और बच्चों के साथ खुशी-खुशी घर आते देखते थे, जबकि मैं हमेशा अकेले ही आती थी। वे बहुत परेशान दिखते और लगातार आहें भरते रहते थे। हर बार, मेरी माँ मुझे समझाते हुए कहती, “फलां को देखो। उसकी शादी हो चुकी है और उसके ससुराल वाले उसे कितने अच्छे से रखते हैं। कितना अच्छा होगा अगर तुम्हारी भी किसी अच्छे परिवार में शादी हो जाए, फिर तुम्हारी देखभाल करने वाले और भी लोग होंगे। फिर मैं और तुम्हारे पिता भी चैन की साँस ले सकेंगे। अगर तुमने जल्दी नहीं की और इस बात को गंभीरता से नहीं लिया, फिर बाद में तुम्हें कोई अच्छा लड़का नहीं मिला तो क्या करोगी? मैं तुम्हारी माँ हूँ। क्या मैं कभी तुम्हारा बुरा करूँगी? मैं यह सब तुम्हारी भलाई के लिए ही तो कर रही हूँ।” अपने माता-पिता को मेरी शादी को लेकर दिन-भर इतना परेशान, चिंतित और आहें भरते देखकर, मुझे बहुत बुरा लगता था और मैं अपराध-बोध से भरी हुई थी। मैं इतनी बड़ी हो चुकी थी, फिर भी उन्हें इतनी परेशानियाँ दे रही थी। मैं बिल्कुल संतानोचित नहीं थी! बाद में एक घटना से मुझे एहसास हुआ कि मेरे माता-पिता की मेरे प्रति यह तथाकथित “भलाई,” वास्तव में मेरे लिए बिल्कुल भी भलाई नहीं थी।

2017 में एक दिन मेरे पिता सीढ़ी से गिर गए और उनकी पीठ में चोट आ गई। जब मैं उस शाम घर पहुँची तो मेरी माँ ने गुस्से में मुझसे कहा, “क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे पिता क्यों गिरे? क्योंकि उन्हें तुम्हारी इतनी चिंता है! वह इतने चिंतित हैं कि न ठीक से सोते हैं, न खाते हैं और चिंता के मारे उनके बाल सफेद हो रहे हैं। तुम्हारी शादी को लेकर यह पूरा परिवार बहुत ज़्यादा परेशान हो गया है। तुम इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती हो? तुम सिर्फ अपने बारे में सोचती हो और तुम्हें नहीं पता कि माता-पिता होना क्या होता है!” उसकी यह बात सुनकर मुझे बहुत अपराध-बोध हुआ। मेरी माँ ने मुझे सिर झुकाए चुपचाप खड़ी देखा और आगे बोली, “क्या तुम्हें नहीं पता? तुम्हारी शादी नहीं हुई है, इसलिए मैं और तुम्हारे पिता दूसरों के सामने सिर उठाकर नहीं चल सकते। पड़ोसी बातें बनाते हैं कि तुम तीस साल की हो गई हो और अभी तक तुम्हारी शादी नहीं हुई है। तुमने मेरे और अपने पिता के सम्मान को मिट्टी में मिला दिया है!” मेरी माँ की ये बातें सुनकर मैं सच में हैरान रह गई और मुझे बहुत दुख हुआ। मुझे समझ नहीं आ रहा था। मैंने बस शादी ही तो नहीं की थी; मैंने कोई शर्मनाक काम थोड़े ही किया था। इसमें ऐसा क्या था जिसकी वजह से वे सिर उठाकर नहीं चल सकते थे? इसलिए मैंने उससे पूछा, “मेरे शादी न करने से तुम्हारा सम्मान कैसे कम होता है? मैंने कुछ गलत नहीं किया है। क्या बिना शादी के रहना उन लोगों से बेहतर नहीं है जो किसी के भी साथ चक्कर चलाते हैं? शादी जीवन भर के लिए होती है। सिर्फ इसलिए कि तुम्हारा सम्मान कम न हो, मैं किसी से भी शादी नहीं कर सकती! इसके अलावा, अगर मैंने शादी कर ली और वह शादी नहीं चली और मेरा तलाक हो गया तो क्या तुम्हें और शर्मिंदगी नहीं उठानी पड़ेगी?” मेरी माँ ने ताना मारते हुए और नीचा दिखाने वाले लहज़े में कहा, “तो क्या हुआ अगर तुम्हारा तलाक हो गया? किसी और को ढूँढ़ लेना! आजकल हर कोई ऐसा ही करता है। एक आदमी ढूँढ़ पाना ही असली कौशल है! अपनी चचेरी बहन को ही देखो। छह महीने पहले ही उसका तलाक हुआ था और उसने एक नया आदमी ढूँढ़ लिया। इसे ही मैं काबिलियत मानती हूँ! और तुम्हारे पास क्या है? तुम्हारे लिए तो एक लँगड़ा भी काफी होगा।” मेरी माँ की बातों ने मेरे दिल को बहुत गहरी ठेस पहुँचाई। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मेरी अपनी माँ ऐसी बातें कह सकती है। अचानक, वह मुझे पूरी तरह से एक अजनबी लगने लगी। मैं अपने कमरे में वापस गई और बहुत फूट-फूटकर रोई। मैंने कभी नहीं सोचा था कि जो माँ मुझे हमेशा इतना प्यार करती थी, वह कुछ इतना कठोर कह सकती है। क्या वह सच में यह मेरी भलाई के लिए कर रही थी? क्या यही सच्चा प्यार था? अपनी पीड़ा में, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि ये चुभने वाली बातें न होतीं तो मेरे दिल को कभी सच में ठेस नहीं लगती। लेकिन मुझे अभी भी लगता है कि मेरी माँ ही मेरे साथ सबसे अच्छा व्यवहार करती है। परमेश्वर, मुझे नहीं पता कि इस परिस्थिति का अनुभव कैसे करूँ। कृपया मुझे प्रबुद्ध कर मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं तुम्हारे इरादे समझ सकूँ।”

बाद में मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “बच्चे क्यों अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित आज्ञाकारिता दिखाते हैं? माता-पिता क्यों अपने बच्चों पर प्यार न्योछावर करते हैं? वह कौन-सी मंशा है जो सारे लोग पालते हैं? क्या यह अपनी योजनाओं और स्वार्थी इच्छाओं को पूरा करने की नहीं होती है? क्या यह वास्तव में परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए कार्य करने की है? क्या यह वास्तव में परमेश्वर के कार्य के लिए कार्य करने की है? क्या यह सृजित प्राणी के कर्तव्यों को अच्छे से निभाने की है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। “किसी व्यक्ति के जीवन के लिए सबसे बड़ा बोझ कौन वहन करता है? (परमेश्वर।) मात्र परमेश्वर ही लोगों से सबसे अधिक प्रेम करता है। क्या लोगों के माता-पिता और रिश्तेदार वास्तव में उनसे प्रेम करते हैं? वे जो प्यार देते हैं क्या वह सच्चा प्रेम होता है? क्या वह लोगों को शैतान के प्रभाव से बचा सकता है? नहीं बचा सकता। लोग सुन्न और मंदबुद्धि होते हैं, वे इन चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते और हमेशा कहते हैं, ‘मैं तो यह महसूस ही नहीं कर सकता कि परमेश्वर मुझसे कैसे प्रेम करता है। वैसे भी, मेरे माता-पिता मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। वे मेरी पढ़ाई-लिखाई का खर्च उठाते हैं, मुझे तकनीकी कौशल सिखवाते हैं ताकि मैं बड़ा होकर कुछ बन सकूँ, दूसरों से ऊपर उठ सकूँ और एक प्रसिद्ध व्यक्ति, एक हस्ती बन सकूँ। मेरे माता-पिता मुझे विकसित करने पर इतना पैसा खर्च करते हैं और मेरी शिक्षा में मेरा सहयोग करते हैं, खान-पान में कंजूसी और बचत करते हैं। वह कैसा महान प्रेम है! मैं उनका ऋण कभी नहीं चुका सकता!’ तुम्हें लगता है कि यह प्यार है? जब तुम्हारे माता-पिता तुम्हें दूसरों से ऊपर उठने, दुनिया में एक हस्ती बनने, एक अच्छी नौकरी पाने, और दुनियादारी के लायक बनने पर जोर देते हैं तो उसके क्या परिणाम होते हैं? वे लगातार तुमसे प्रयास करवाते हैं कि तुम दूसरों से ऊपर उठो, अपने परिवार को सम्मान दिलाओ और दुनिया की बुरी प्रवृत्तियों में एकीकृत हो जाओ। नतीजतन, तुम पाप के गड्ढे में जा गिरते हो, तबाही झेलते हो, नष्ट हो जाते हो और शैतान द्वारा निगल लिए जाते हो। क्या यह प्रेम है? वे तुमसे प्यार नहीं कर रहे, तुम्हारा नुकसान कर रहे हैं, तुम्हें बर्बाद कर रहे हैं। अगर किसी दिन तुम इतना नीचे डूब जाते हो कि तुम उस हद के पार निकल जाते हो जहाँ से वापस नहीं आ सकते, इतना नीचे कि तुम खुद को बाहर नहीं निकाल पाते और नरक में उतर जाते हो, तभी तुम्हें एहसास होता है, ‘ओह, माता-पिता का प्यार दैहिक प्यार है, और यह परमेश्वर में विश्वास रखने या सत्य प्राप्त करने के लिए फायदेमंद नहीं है—यह सच्चा प्यार नहीं है!’ तुम लोगों को अभी तक इसका एहसास नहीं हुआ होगा। कुछ लोग कहते हैं, ‘मैं महसूस नहीं कर सकता कि परमेश्वर मुझसे कैसे प्रेम करता है। मुझे अब भी लगता है कि मेरी माँ मुझसे सबसे ज्यादा प्यार करती है। वह मेरे लिए दुनिया की सबसे करीबी इंसान है। एक गाना है “माँ दुनिया में सबसे अच्छी होती है।” यह वास्तविकता को प्रतिबिंबित करता है; यह वक्तव्य बिल्कुल सच है!’ किसी दिन, जब तुम्हारे पास वास्तव में जीवन प्रवेश होगा और जब तुमने सत्य पा लिया होगा, तो तुम कहोगे, ‘मुझसे सबसे ज्यादा प्यार करने वाली मेरी माँ नहीं है, न ही वे मेरे पिता हैं। परमेश्वर मुझसे सबसे ज्यादा प्यार करता है और वह मेरा सबसे प्यारा परमप्रिय है, क्योंकि उसने मुझे जीवन दिया, और वह हमेशा मेरी अगुआई कर रहा है, मेरा भरण-पोषण कर रहा है और मुझे शैतान के प्रभाव से बचा लिया है। एकमात्र परमेश्वर ही है, जो लोगों को जीवन प्रदान करता है, जो लोगों की अगुवाई करता है और जिसकी सभी चीजों पर संप्रभुता है।’ जब तुम सत्य को समझ लोगे और सत्य को पूरी तरह से पा लोगे, तभी तुम इन वचनों को गहराई से सराह पाओगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य प्राप्त करने के लिए अपने आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों से सबक सीखना चाहिए)। पहले, मैं परमेश्वर के वचनों के इन दो अंशों को असल में स्वीकार नहीं कर पाती थी। मुझे लगता था कि दुनिया में मेरे माता-पिता ही मुझे सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं, खासकर मेरी माँ, जिसने मुझे और मेरे भाई को पालने में इतना दुख उठाया था। जब वह शादी न करने पर मुझे डाँटती थी तो क्या इसका मतलब वही नहीं था जो कहावत में कहा गया है, “प्यार जितना गहरा होता है, डाँट भी उतनी ही सख़्त होती है”? मुझे लगा कि मेरी माँ बस यह चाहती है कि मुझे एक अच्छा परिवार मिल जाए और मैं खुश रहूँ और दुनिया में बस वही लोग हैं जो मुझे कभी धोखा नहीं देंगे या मेरा नुकसान नहीं करेंगे। लेकिन इस घटना के बाद जब मैंने परमेश्वर के इन वचनों को फिर से पढ़ा तो मैं आखिरकार उन्हें स्वीकार कर पाई। मेरी माँ का दावा था कि यह मेरी अपनी भलाई के लिए था कि मेरी एक अच्छे परिवार में शादी हो जाए और मैं खुश रहूँ। लेकिन असल में वह सिर्फ अपने सम्मान के बारे में सोच रही थी, ताकि लोग उसकी पीठ पीछे बातें न बनाएँ और वह दूसरों के सामने सिर उठाकर चल सके। इसलिए वह चाहती थी कि मैं किसी से भी जल्दी शादी कर लूँ जो मुझे अपनाने के लिए तैयार हो—यहाँ तक कि उसने यह भी कहा कि एक लँगड़ा भी चल जाएगा। वह मेरी खुशी के बारे में बिल्कुल नहीं सोच रही थी! मेरी माँ के प्यार में मिलावट थी। वह सिर्फ अपने बारे में सोच रही थी और वह मुझसे सच्चा प्यार नहीं करती थी। इतना ही नहीं, वह किसी भी तरह मेरी शादी कराना चाहती थी ताकि वह शादी को एक जाल की तरह इस्तेमाल कर सके, जिससे मैं घर पर अपने पति की सेवा करने और बच्चों को पालने में ही लगी रहूँ और वह मुझे परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने से रोक सके। आखिरकार मुझे समझ आ गया कि मेरी माँ सच में मेरे भले के बारे में नहीं सोच रही थी; वह मुझे परमेश्वर से दूर ले जाने की कोशिश कर रही थी और मुझे शैतान की मांद में खींच रही थी! अगर मैंने सच में उसकी बात मान ली होती तो मेरी देह तो संतुष्ट हो जाती, लेकिन मेरे पास अपना कर्तव्य निभाने और सत्य का अनुसरण करने के लिए कम समय और ऊर्जा होती। आखिर में मेरे उद्धार पाने का मौका बर्बाद हो जाता। मेरी माँ ने मुझे शादी को लेकर जो नज़रिया सिखाया था वह गलत था। इससे मैं शादी का अनादर करने लगती और शादी और तलाक को एक खेल की तरह समझती। वह मुझे जीवन में सही रास्ता नहीं दिखा सकती थी। यह परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य ही था जिसने मुझे जीवन में अनुसरण के लिए सही लक्ष्य दिए। उदाहरण के लिए, परमेश्वर हमें शादी का सम्मान करने और व्यभिचार न करने के लिए कहता है; यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति है। साथ ही, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना सबसे सार्थक जीवन है और केवल सत्य का अनुसरण करने और स्वभाव में बदलाव के ज़रिए ही हम उद्धार पा सकते हैं और जीवित रह सकते हैं। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, मैंने स्पष्ट रूप से देखा कि मेरे प्रति मेरी माँ का प्यार सच्चा प्यार नहीं था। परमेश्वर ही है जो मुझे सबसे ज़्यादा प्यार करता है।

मैंने हमेशा अपने माता-पिता को अपने सबसे करीब माना था। मैंने कभी यह भेद नहीं पहचाना कि उनके कौन-से काम सही हैं और कौन-से गलत और मुझे यह भी नहीं पता था कि उनके साथ सही तरीके से कैसे व्यवहार करना है। जब मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े तब जाकर मैं उनका थोड़ा भेद पहचान पाई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “एक दिन, जब तुम थोड़ा-बहुत सत्य समझ लोगे, तो तुम यह नहीं सोचोगे कि तुम्हारी माँ सबसे अच्छी इंसान है, या तुम्हारे माता-पिता सबसे अच्छे लोग हैं। तुम महसूस करोगे कि वे भी भ्रष्ट मानवजाति के सदस्य हैं, उनके भ्रष्ट स्वभाव बिल्कुल एक-जैसे हैं, उन्हें सिर्फ तुम्हारे साथ उनका रक्त-संबंध अलग करता है और अगर वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, तो वे भी गैर-विश्वासियों के ही समान हैं। तब तुम उन्हें परिवार के किसी सदस्य के नजरिए से नहीं, या अपने देह के संबंध के नजरिए से नहीं, बल्कि सत्य के दृष्टिकोण से देखोगे। तुम्हें किन मुख्य पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर में विश्वास के बारे में उनके दृष्टिकोण, दुनिया को लेकर उनके दृष्टिकोण, मामले सँभालने समय उनके दृष्टिकोण, और सबसे महत्वपूर्ण बात, परमेश्वर के प्रति उनके रवैये देखने चाहिए। अगर तुम इन पहलुओं को सटीक ढंग से देख लेते हो तो तुम स्पष्ट रूप से देख पाओगे कि वे अच्छे लोग हैं या बुरे लोग। किसी दिन तुम स्पष्ट रूप से देख सकते हो कि वे बिल्कुल तुम्हारे जैसे भ्रष्ट स्वभाव वाले लोग हैं और वे ऐसे दयालु लोग नहीं हैं जो तुमसे वास्तविक प्रेम करते हैं, जैसा कि तुम उन्हें समझते हो, और न वे तुम्हें सत्य की ओर या जीवन में सही रास्ते पर ले जाने में बिल्कुल भी समर्थ हैं। तुम स्पष्ट रूप से देख सकते हो कि उन्होंने तुम्हारे लिए जो कुछ किया है, वह कोई बहुत लाभदायक नहीं है और यह जीवन में सही मार्ग पर चलने में तुम्हारे लिए किसी काम का नहीं है। तुम यह भी देख सकते हो कि उनके बहुत-से क्रियाकलाप और मत सत्य के विपरीत और देह के होते हैं, और तुम्हें तिरस्कार, विकर्षण और घृणा महसूस कराते हैं। अगर तुम इन चीजों को भाँप सको तो फिर तुम अपने माता-पिता के साथ अपने दिल में सही ढंग से पेश आ सकोगे, तुम उनकी कमी महसूस नहीं करोगे, उनके बारे में चिंतित नहीं रहोगे और उनसे अलग रहने में असमर्थ नहीं रहोगे; उन्होंने माता-पिता के रूप में अपना मिशन पूरा कर लिया है। अब तुम उन्हें अपने सबसे करीबी लोग नहीं मानोगे और न ही उन्हें अपना आराध्य मानोगे। बल्कि, तुम उन्हें साधारण इंसान मानोगे और तब तुम स्नेह के बंधन से पूरी तरह से मुक्त हो जाओगे और स्नेह और पारिवारिक प्रेम से उबर जाओगे। एक बार तुम स्नेह और पारिवारिक प्रेम से मुक्त हो जाओगे तो तुम्हें एहसास हो जाएगा कि ये चीजें सँजोने लायक नहीं हैं। उस समय तुम देखोगे कि रिश्तेदार, परिवार और देह के संबंध सत्य को समझने और स्नेह से मुक्त करने की राह की बाधाएँ हैं। तुम देखोगे कि तुम्हारा अपने माता-पिता के साथ वैसा पारिवारिक संबंध, वैसा दैहिक संबंध है जो तुम्हें पंगु बना देता है, तुम्हें पथभ्रष्ट करता है, इसलिए तुम यह विश्वास करते हो कि वे तुम्हारे सबसे निकट हैं, तुम्हारे लिए किसी से भी अधिक चिंता करते हैं, तुमसे सर्वाधिक प्रेम करते हैं, और तुम स्पष्ट रूप से यह भेद पहचानने के लायक नहीं रहते हो कि वे अच्छे लोग हैं या बुरे। एक बार जब तुम स्नेह से सचमुच किनारा कर लोगे तो क्या तुम तब भी उसी तरह तहेदिल से उनकी कमी महसूस करोगे, उनके बारे में ही सोचते रहोगे और उनके बारे में सरोकार महसूस करोगे जैसा अभी समय-समय पर उनके बारे में सोचते हुए महसूस करते हो? तुम ऐसा नहीं करोगे। तुम ऐसा नहीं कहोगे : ‘जिस व्यक्ति के बिना मैं वाकई रह नहीं सकता वह मेरी माँ है; वही मुझसे प्यार करती है, मेरी देखभाल करती है और मेरी सबसे ज्यादा फिक्र करती है।’ जब तुम इतना समझने लगोगे तो क्या तुम्हें अब भी उनकी इतनी अधिक याद सताएगी कि तुम रो पड़ते हो? नहीं। यह समस्या हल हो जाएगी(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्‍ट स्‍वभावों का समाधान करने से ही सच्चा परिवर्तन आ सकता है)। अतीत में, मैं अपनी माँ को अपने सबसे करीब मानती थी। मुझे लगता था कि चूँकि वह मेरी माँ है, वह जो कुछ भी करती है मेरी भलाई के लिए ही करती है। वह हमेशा मुझ पर तय किए गए लड़कों से मिलने और शादी करने के लिए दबाव डालती रहती थी। भले ही मुझे इससे नफरत थी और मुझे यह सब बिल्कुल भी नहीं सुहाता था, फिर भी मैं उसकी इच्छा के अनुसार उन लड़कों से मिलने जाती थी। अपने माता-पिता को मेरी शादी को लेकर लगातार परेशान और व्याकुल देखकर मुझे अपराध-बोध होता था और मैं खुद को एक संतानोचित और आज्ञाकारी बेटी न होने के लिए दोष देती थी। सच तो यह है कि मेरी माँ ने मेरे मन में शादी को लेकर एक गलत नज़रिया बिठा दिया था, लेकिन हमारे खून के रिश्ते के कारण, मैं उसका भेद बिल्कुल नहीं पहचान पाई। परमेश्वर हमें शादी का सम्मान करने और व्यभिचार न करने के लिए कहता है, लेकिन मेरी माँ ने शादी को एक खेल समझती थी। उसकी नज़र में ज़्यादा साथी ढूँढ पाना काबिलियत की निशानी थी। उदाहरण के लिए, मेरी चचेरी बहनें शादी का सम्मान नहीं करतीं और इसे एक खेल की तरह समझती हैं और बिना सोचे-समझे शादी करती और तलाक देती रहती हैं। मेरी बड़ी चचेरी बहन शादीशुदा थी, लेकिन एक शादीशुदा आदमी की रखैल थी और व्यभिचार कर रही थी। मेरी माँ को यह शर्मिंदगी या बेइज़्ज़ती की बात नहीं लगती थी; उसे तो लगा कि यह काबिल होना है। मैं शादी को लेकर सतर्क थी। मैं दूसरों की तरह जल्दबाज़ी में शादी या तलाक नहीं चाहती थी और न ही बिना सोचे-समझे किसी के साथ मिलना-जुलना चाहती थी। इस बात के लिए, मेरी माँ ने मुझे नाकाबिल कहकर डाँटा और कहा कि शादी न करके, मैं उनका सम्मान कम कर रही हूँ और उन्हें सिर उठाकर चलने नहीं दे रही हूँ। मेरी माँ ने बुरी प्रवृत्तियों के विचारों को स्वीकार कर लिया था और अब वह सही और गलत के बीच फर्क नहीं कर पाती थी; उसने सही और गलत को पूरी तरह से उल्टा कर दिया था। चीज़ों को देखने का उसका नज़रिया पूरी तरह से विकृत था। शुरू से ही, मैं अपने पारिवारिक बंधन के चलते अंधी हो चुकी थी, हमेशा यही सोचती थी कि मेरी माँ जो भी करती है मेरी भलाई के लिए ही करती है। लेकिन वास्तव में, वह शैतान के जीवित रहने के नियमों के अनुसार जी रही थी और वह शैतान द्वारा मूर्ख बनाए जाने और नुकसान पहुँचाए जाने से बच नहीं सकी। वह मुझे जीवन के सही रास्ते पर कैसे ले जा सकती थी? तब जाकर मैं अपनी माँ का भेद पहचान पाई और मैंने उनकी माँगें पूरी न कर पाने के लिए खुद को दोष देना बंद कर दिया।

2018 में, परमेश्वर में मेरे विश्वास के कारण एक यहूदा ने मेरे साथ गद्दारी की। राष्ट्रीय सुरक्षा ब्रिगेड के लोग मुझे गिरफ्तार करने मेरे घर आए, लेकिन चूँकि मैं कहीं और अपना कर्तव्य निभा रही थी, इसलिए मैं इस विपत्ति से बच गई। तब से मैंने घर जाने की हिम्मत नहीं की है। शादी करने के लिए माता-पिता के दबाव से मुक्त होकर, मैं अपना दिल अपने कर्तव्य में ज़्यादा लगा पाई और पहले से ज़्यादा सत्य समझ पाई।

2024 में, “माता-पिता हमेशा सही होते हैं,” इस भ्रामक नज़रिये के बारे में परमेश्वर ने संगति की और इसका गहन-विश्लेषण किया। जब मैंने इसे पढ़ा तो मैं बहुत भावुक हो गई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “‘माता-पिता हमेशा सही होते हैं।’ तो इस कहावत का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि चाहे तुम्हारे माता-पिता सही हों या गलत, मूल रूप से चूँकि उन्होंने तुम्हें जन्म दिया है, पाल-पोस कर बड़ा किया है, इसलिए जहाँ तक तुम्हारा सवाल है, तुम्हारे माता-पिता द्वारा किया सब कुछ सही है। तुम फैसला नहीं कर सकते कि वे सही हैं या गलत, न ही तुम उन्हें ठुकरा सकते हो, उनका प्रतिरोध करना तो दूर की बात है। इसे संतानोचित धर्मपरायणता कहते हैं। भले ही तुम्हारे माता-पिता ने गलत किया हो, और भले ही उनके कुछ विचार और सोच पुराने या गलत हों, या जिस तरह से या जिन विचारों और सोच से वे तुम्हें शिक्षित करें, वे सही और सकारात्मक न हों, तो भी तुम्हें उन पर शक नहीं करना चाहिए या उन्हें ठुकराना नहीं चाहिए, क्योंकि उस बारे में एक कहावत है—‘माता-पिता हमेशा सही होते हैं।’ माता-पिता के मामले में, तुम्हें कभी यह भेद नहीं पहचानना चाहिए कि वे सही हैं या गलत, क्योंकि जहाँ तक बच्चों का सवाल है, उनका जीवन और उन्हें प्राप्त हर चीज उनके माता-पिता से आई है। तुम्हारे माता-पिता से ऊपर कोई नहीं, तो अगर तुममें जमीर है, तो तुम्हें उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए। तुम्हारे माता-पिता चाहे जितने भी गलत या अपूर्ण क्यों न हों, फिर भी वे तुम्हारे माता-पिता हैं। वही लोग तुम्हारे सबसे करीब हैं, जिन्होंने तुम्हें पाल-पोस कर बड़ा किया, जो तुमसे सबसे अच्छे ढंग से पेश आते हैं, और जिन्होंने तुम्हें जीवन दिया है। क्या सभी लोग इस कहावत को नहीं स्वीकारते? और चूँकि यह मानसिकता मौजूद है, ठीक इसीलिए तुम्हारे माता-पिता को लगता है कि वे तुमसे अनैतिक ढंग से पेश आ सकते हैं, तुम्हें तमाम चीजें करने की ओर मोड़ने के लिए विविध तरीके इस्तेमाल कर सकते हैं, और तुम्हारे मन में विविध विचार भर सकते हैं। अपने नजरिये से उन्हें लगता है, ‘मेरी मंशाएँ सही हैं, यह तुम्हारी भलाई के लिए है। तुम्हारे पास जो भी है वह मेरा दिया हुआ है। तुम्हें मैंने ही जन्म देकर, पाल-पोस कर बड़ा किया है, इसलिए तुमसे चाहे जैसे पेश आऊँ, मैं गलत नहीं हो सकता, क्योंकि मैं सब-कुछ तुम्हारी भलाई के लिए करता हूँ, और मैं तुम्हें आहत नहीं करूँगा, नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।’ बच्चों के परिप्रेक्ष्य से, क्या अपने माता-पिता के प्रति उनका रवैया इस कहावत पर आधारित होना चाहिए, ‘माता-पिता हमेशा सही होते हैं’? (नहीं, यह गलत है।) यकीनन यह गलत है। ... हमें सत्य के अनुसार इस मामले को कैसे देखना चाहिए? इसे पेश करने का सही तरीका क्या है? क्या बच्चों का जीवन और उनके शरीर उन्हें माता-पिता द्वारा दिए गए हैं? (नहीं।) किसी व्यक्ति का दैहिक शरीर उसके माता-पिता से पैदा होता है, लेकिन माता-पिता को बच्चे जनने की क्षमता कहाँ से मिलती है? (यह परमेश्वर द्वारा दी जाती है, परमेश्वर से आती है।) व्यक्ति की आत्मा का क्या? यह कहाँ से आती है? यह भी परमेश्वर से आती है। तो मूल में, लोगों को परमेश्वर ने रचा है, और ये सब उसके द्वारा पूर्व-निर्धारित किए गए हैं। परमेश्वर ने ही तुम्हारा इस परिवार में जन्म लेना पूर्वनियत किया। परमेश्वर ने इस परिवार में एक आत्मा भेजी, फिर तुम इस परिवार में जन्मे, तुम्हारे माता-पिता के साथ तुम्हारा रिश्ता पूर्व-निर्धारित है—यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत था। परमेश्वर की संप्रभुता और पूर्वनियति के कारण ही तुम्हारे माता-पिता को तुम मिले और तुमने इस परिवार में जन्म लिया। यह मामले की तह तक जाना है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (13))। “चूँकि हर कोई इस बुरी मानवजाति के बीच रहता है, इसलिए वे सभी एक ऐसे परिवेश में बड़े होते हैं जिसमें वे अपने परिवारों के पारंपरिक तौर-तरीकों, राज्य की शिक्षा और सामाजिक अनुकूलन को स्वीकार करते हैं। लोग जो कुछ भी ग्रहण करते हैं, वे बुरी दुनिया से आने वाले विभिन्न विचार और दृष्टिकोण हैं, जो अंततः शैतान के सभी प्रकार के विधर्म और भ्रांतियाँ हैं, जो सत्य के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं हैं और उनमें कोई सत्य नहीं है; इससे भी बढ़कर, लोग यह नहीं समझते कि सत्य क्या है। इस दृष्टिकोण से, माता-पिता और उनके बच्चे एक समान होते हैं और उनके विचार और दृष्टिकोण एक समान होते हैं। बात बस इतनी है कि माता-पिता ने इन विचारों और दृष्टिकोणों को 20 या 30 साल पहले स्वीकार कर लिया था, जबकि बच्चों ने उन्हें थोड़ा बाद में स्वीकार किया। कहने का मतलब है कि एक समान सामाजिक पृष्ठभूमि को देखते हुए, जब तक तुम एक सामान्य व्यक्ति हो, तुमने और तुम्हारे माता-पिता दोनों ने शैतान से एक समान भ्रष्टता, सामाजिक परिवेश से मिली शिक्षा और समाज की विभिन्न बुरी प्रवृत्तियों से उत्पन्न होने वाले समान विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार किया है। इस दृष्टिकोण से, बच्चे भी अपने माता-पिता की ही श्रेणी में आते हैं। ... और चूँकि माता-पिता अपने बच्चों को जन्म देते हैं, उनका पालन-पोषण करते हैं और उनका यह विशेष दर्जा होता है, इसलिए बच्चों को अपने माता-पिता के प्रति समर्पित होना चाहिए और उनके प्रति अपने दायित्वों को पूरा करना चाहिए। लोगों की अपने माता-पिता के प्रति केवल यही जिम्मेदारी है। लेकिन चूँकि माता-पिता और बच्चे समान रूप से भ्रष्ट मनुष्य हैं, इसलिए माता-पिता अपने बच्चों के लिए नैतिक प्रतिमान नहीं हैं, न ही वे सत्य का अनुसरण करने में अपने बच्चों के लिए मिसाल या आदर्श हैं, परमेश्वर की आराधना करने और उसके प्रति समर्पण करने के मामले में अपने बच्चों के लिए आदर्श होने की तो बात ही दूर है। बेशक, माता-पिता सत्य का मूर्त रूप भी नहीं हैं। बच्चों को अपने माता-पिता को नैतिक प्रतिमान नहीं मानना चाहिए, बिना शर्त उनकी आज्ञा मानने का उनका कोई दायित्व या जिम्मेदारी होने की तो बात ही दूर है। बच्चों को अपने माता-पिता के क्रियाकलापों, व्यवहार और स्वभाव सार का भेद पहचानने का प्रयास करने से भी नहीं डरना चाहिए। यानी, जब अपने माता-पिता के साथ पेश आने की बात आती है, तो बच्चों को इस विचार से नहीं चिपके रहना चाहिए कि ‘माता-पिता हमेशा सही होते हैं’। यह दृष्टिकोण माता-पिता के विशेष दर्जे पर आधारित है, जो यह है कि उन्होंने परमेश्वर की पूर्वनियति के तहत अपने बच्चों को जन्म दिया और इसलिए, देह के लिहाज से, उनका दर्जा और परिवार में उनकी पीढ़ी उनके बच्चों के दर्जे और पीढ़ी से अलग है। इस अंतर के कारण, लोग अपने माता-पिता को ऐसे लोगों का वर्ग मानते हैं जो कभी गलत नहीं होते। क्या यह सही है? (नहीं।) यह तर्कहीन है और सत्य के अनुरूप नहीं है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (13))

परमेश्वर के वचनों से, मुझे समझ आया कि “माता-पिता हमेशा सही होते हैं” एक गलत विचार है जो शैतान परिवार की शिक्षा और सामाजिक अनुकूलन के माध्यम से हमारे अंदर डालता है। इससे हमें लगता है कि हमारे माता-पिता हमारे सबसे करीब हैं और वही हैं जो हमसे सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं, इसलिए हमें उनकी सिखाई हर बात बिना किसी शर्त के मान लेनी चाहिए। हम कभी नहीं सोचते कि उनकी बातें सही हैं या नहीं, बस यही मानते हैं कि माता-पिता जो भी करते हैं हमारी भलाई के लिए करते हैं। हमें लगता है कि बच्चों को यह तय नहीं करना चाहिए कि उनके माता-पिता सही हैं या गलत, बल्कि बिना किसी शर्त के उनकी आज्ञा माननी चाहिए। ये विचार और ख्याल हमें बिना किसी सिद्धांत के अपने माता-पिता की बात सुनने और उनकी आज्ञा मानने की ओर ले जाते हैं। यह अंधी संतानोचित धर्मनिष्ठा है और यह हमें गलत रास्ते पर ले जाती है। मैं इसी नज़रिए के साथ जी रही थी कि “माता-पिता हमेशा सही होते हैं।” मेरा मानना था कि मेरे माता-पिता ने जो कुछ भी किया, वह मेरी भलाई के लिए ही था—कि वे दुनिया में किसी से भी ज़्यादा मुझसे प्यार करते थे और मुझे कभी नुकसान नहीं पहुँचाएंगे। मैंने बिना किसी शर्त और सिद्धांत के उनकी हर बात मान ली थी। मैंने कभी यह भेद पहचानने की कोशिश नहीं की कि आचरण करने और काम करने के उनके मानक सही थे या गलत; मैंने बस आँख बंद करके उन पर भरोसा किया और उनकी आज्ञा मानी। परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ आया कि मेरे माता-पिता भी मेरी तरह शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए इंसान हैं। उनके विचार और नज़रिए भी शैतान से आते हैं। वे जो कहते हैं वह सत्य नहीं है और हमेशा सही नहीं होता। मुझे अपने माता-पिता की हर बात आँख बंद करके नहीं माननी चाहिए या उनकी बातों को सत्य समझकर उनका पालन नहीं करना चाहिए। मैंने सोचा कि कैसे मेरी माँ प्रभु यीशु पर विश्वास करती थी, लेकिन वह सिर्फ नाम की विश्वासी थी। उसकी सोच यह थी कि “लड़के के बड़े होने पर उसकी शादी कर देनी चाहिए और लड़की के बड़े होने पर उसे ब्याह देना चाहिए।” उसका मानना था कि एक वयस्क महिला को शादी करके अपना परिवार बसाना चाहिए और उसकी ज़िंदगी अपने परिवार, पति और बच्चों के इर्द-गिर्द ही घूमनी चाहिए—और यही सामान्य जीवन जीने का एकमात्र तरीका है। वह परमेश्वर में आस्था को सिर्फ एक मान्यता मानती थी जिसे दैनिक जीवन में बाधा नहीं बनना चाहिए। इसीलिए वह मुझ पर जल्दी शादी करने का दबाव डालती रहती थी और नहीं चाहती थी कि मैं परमेश्वर में विश्वास करूँ और अपना कर्तव्य निभाऊँ। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि मैं जिस आदमी से शादी करूँगी, उसका चरित्र या मानवता कैसी है। मेरी शादी को लेकर उसका रवैया बहुत गैर-ज़िम्मेदाराना था। वह इस बात के लिए भी तैयार थी कि मैं किसी अपाहिज से शादी कर लूँ, या बार-बार मेरी शादी और तलाक हो, बस उसका सम्मान बचा रहे और लोग यह न कहें कि उसकी एक बड़ी उम्र की कुँवारी बेटी है। मेरी माँ शादी का इस्तेमाल परमेश्वर में मेरे आस्था में बाधा डालने के लिए भी करना चाहती थी। अगर मैंने उसकी बात मानी होती तो मैं परमेश्वर से और दूर होती चली जाती और आखिर में अपना जीवन बर्बाद कर लेती। लोगों को बचाने के लिए अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य एक बेहद दुर्लभ अवसर है। यह अच्छी बात है कि मेरी शादी नहीं हुई है और परिवार का कोई बंधन नहीं है जिससे मैं आस्था के मार्ग पर आसानी से चल सकती हूँ। परमेश्वर का अनुसरण कर पाना और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना सबसे मूल्यवान और सार्थक बात है। मेरे लिए यही सबसे सही चुनाव था।

बाद में मैंने परमेश्वर के और भी वचन पढ़े और सीखा कि मुझे अपने माता-पिता के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। परमेश्वर कहता है : “अपने माता-पिता से पेश आने में पहले तुम्हें तर्कसंगत रूप से इस रक्त संबंध से बाहर निकलना चाहिए और तुम जो सत्य पहले ही स्वीकार और समझ चुके हो उसका प्रयोग कर अपने माता-पिता का भेद पहचानना चाहिए। अपने माता-पिता का भेद इस आधार पर पहचानो कि कार्य और आचरण करने के बारे में उनके विचार, दृष्टिकोण और प्रयोजन क्या हैं और कार्य और आचरण करने के बारे में उनके सिद्धांत और तौर-तरीके क्या हैं, जिससे यह पुष्टि हो जाएगी कि वे भी शैतान द्वारा भ्रष्ट किए हुए लोग हैं। सत्य के परिप्रेक्ष्य से अपने माता-पिता को देखो और उनका भेद पहचानो, न कि उन्हें हमेशा ऊँचा, निस्वार्थ और तुम्हारे प्रति दयालु समझो; अगर तुम उन्हें इस तरह देखोगे, तो कभी पता नहीं लगा पाओगे कि उनकी समस्याएँ क्या हैं। अपने माता-पिता को अपने पारिवारिक रिश्तों या पुत्र-पुत्री की भूमिका के परिप्रेक्ष्य से मत देखो। इस घेरे से बाहर कदम रखो और देखो कि वे दुनिया, सत्य, लोगों, घटनाओं और चीजों से कैसे निपटते हैं। साथ ही, और ज्यादा विशिष्ट रूप से, लोगों और चीजों को देखने, और अपना आचरण और कार्य करने के बारे में उन विचारों और सोच पर गौर करो जिनका प्रभाव तुम्हारे माता-पिता ने तुम पर डाला है—तुम्हें इसी तरीके से उन्हें पहचानना और उनका भेद पहचानना चाहिए। इस प्रकार, उनके मानवीय गुण और शैतान द्वारा उनके भ्रष्ट होने की सच्चाई थोड़ा-थोड़ा कर स्पष्ट हो जाएगी। वे किस प्रकार के लोग हैं? अगर वे विश्वासी नहीं हैं, तो परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों के प्रति उनका रवैया क्या है? अगर वे विश्वासी हैं तो सत्य के प्रति उनका रवैया क्या है? क्या वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं? क्या वे सत्य से प्रेम करते हैं? क्या उन्हें सकारात्मक चीजें पसंद हैं? जीवन और दुनिया के बारे में उनका नजरिया क्या है? वगैरह-वगैरह। अगर इन चीजों के आधार पर तुम अपने माता-पिता का भेद पहचान सको, तो तुम्हारे मन में स्पष्टता होगी। एक बार ये विषय स्पष्ट हो जाएँ, तो तुम्हारे मन में बसा अपने माता-पिता का ऊँचा, गरिमामयी और अडिग रुतबा बदल जाएगा। इसके बदलने पर तुम्हारे माता-पिता द्वारा दिखाया गया मातृ और पितृ प्रेम—साथ ही उनकी विशेष बातें और कार्य तथा उनके बारे में तुम्हारे मन में बसी वे ऊँची छवियाँ—उनकी छाप अब तुम्हारे मन में उतनी गहरी नहीं होगी(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (13))। परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ आया कि अपने माता-पिता के साथ व्यवहार करते समय मेरे कुछ सिद्धांत होने चाहिए और मुझे उनकी बातों का भेद पहचानना चाहिए। वे भी भ्रष्ट किए गए इंसान हैं और उनकी सोच और नज़रिए शैतान के तरह-तरह के ज़हर से भरे हैं। अगर मेरे माता-पिता की बातें सत्य के अनुरूप हैं तो मैं उनकी बात मान सकती हूँ। अगर ऐसा नहीं है तो मैं उनकी आज्ञा नहीं मान सकती। सबसे सटीक तरीका है परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों और चीज़ों को देखना, आचरण और काम करना। मेरी माँ का नज़रिया यह था कि अगर शादी में बात बने तो साथ रहो और न बने तो तलाक ले लो। उसकी नज़र में ज़्यादा साथी ढूँढ पाना काबिलियत की निशानी थी। शादी को लेकर उसका नज़रिया विकृत था और परमेश्वर की अपेक्षाओं के खिलाफ था। मुझे आँख बंद करके उसकी बात नहीं माननी चाहिए। साथ ही, मुझे यह भी समझ आया कि शादी परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों पर निर्भर करती है; यह उसके द्वारा पूर्वनियत है। इसका व्यक्तिगत पसंद या माता-पिता की उम्मीदों से कोई लेना-देना नहीं है। मुझे अपने माता-पिता की उम्मीदें पूरी करने के लिए नहीं जीना चाहिए या उनकी उम्मीदों को अपनी ज़िम्मेदारी नहीं मानना चाहिए। अपनी शादी को लेकर सही रवैया परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के प्रति समर्पण करना है।

पीछे मुड़कर देखूँ तो, इन सालों में मैं इस विचार से प्रभावित थी कि “माता-पिता हमेशा सही होते हैं।” मैं हमेशा यही सोचती थी कि मेरे माता-पिता जो भी करते हैं वह सही है और मेरी भलाई के लिए है और मैं आँख बंद करके उनकी आज्ञा मानती थी। भले ही उनके काम करने के तरीके मेरी इच्छा के खिलाफ होते, फिर भी मैं अपनी इच्छा मारकर उनकी माँगों के अनुसार काम करती थी और जब मैं उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाती थी तो मैं खुद को उनका कर्ज़दार महसूस करती थी। परमेश्वर के वचनों के माध्यम से ही मैंने धीरे-धीरे “माता-पिता हमेशा सही होते हैं,” इस भ्रामक विचार का भेद पहचाना, अपने माता-पिता के साथ व्यवहार करने का सही तरीका ढूँढ़ा और अपनी आत्मा में आज़ादी महसूस की। अब मैं अपना ज़्यादा समय और ऊर्जा अपने कर्तव्य में लगा सकती हूँ और अपने जीवन के सबसे अच्छे साल सत्य का अनुसरण करने में बिता सकती हूँ। यह सब परमेश्वर के मार्गदर्शन के कारण ही है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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