आलस्य से खुद को बरबाद मत करो
शिनचे, चीनजुलाई 2024 में मैं कलीसिया में पाठ आधारित कार्य की पर्यवेक्षक थी। चूँकि एक अगुआ को गिरफ्तार किया जा चुका था तो मुझे और मेरी...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
कलीसिया में मेरा कर्तव्य सुसमाचार कार्यकर्ताओं को गवाही देने के लिए विकसित करना था। शुरू-शुरू में, जब भी मेरे सामने कोई मुश्किल आती, मैं अक्सर प्रार्थना करती थी और अनुभवी भाई-बहनों के साथ खोज करती थी। मैं व्यावहारिक रूप से खुद को सत्य से लैस भी करती थी और सुसमाचार की फिल्में और वीडियो देखती थी। कुछ समय बाद, मैंने सुसमाचार प्रचार के कुछ सिद्धांत समझ लिए थे और मेरे कर्तव्य से कुछ नतीजे भी मिलने लगे थे। मैंने मन ही मन सोचा, “भले ही मैं टीम में सबसे अच्छी नहीं हूँ, लेकिन ज्यादातर लोगों से तो बेहतर ही हूँ। अगर मैं ऐसे ही काम करती रही, तो इतना काफी रहेगा।” मैं आत्म-संतुष्टि और परितोष की अवस्था में जी रही थी। पर्यवेक्षक हमें बार-बार याद दिलाती थी कि हम खुद को सत्य से और ज्यादा लैस करें। उसका कहना था कि धार्मिक लोगों की धारणाओं को सुलझाने का बस यही एक तरीका है और अगर हम इसी स्थिति से संतुष्ट रहे, तो हम अपने कर्तव्य में अच्छे नतीजे हासिल नहीं कर पाएँगे। ऊपर से तो मैं सहमति जताती, लेकिन दिल में मैंने सोचा, “अपने कर्तव्य में अच्छे नतीजे पाने के लिए, मुझे न सिर्फ खुद को और ज्यादा सत्य से लैस करना पड़ेगा, बल्कि उससे जुड़ी सामग्री भी ढूँढ़नी पड़ेगी। धार्मिक लोगों की जो धारणाएँ मैं नहीं सुलझा सकती, उनके बारे में मुझे दूसरों से भी पूछना पड़ेगा। इसके लिए मुझे बड़ी कीमत चुकानी होगी और बहुत ज्यादा दिमाग खपाना पड़ेगा! मैंने सुसमाचार प्रचार के कुछ सिद्धांत तो पहले ही सीख लिए हैं और अपने कर्तव्य में कुछ नतीजे भी हासिल कर लिए हैं। बस इतना ही बनाए रखना ठीक रहेगा। रोज-रोज खुद पर इतना बोझ डालना बहुत थका देने वाला है! वैसे भी, महामारी के दौरान बीमार पड़ने के बाद से मेरी सेहत पहले जैसी नहीं रही। अगर मैं काम की थकान से चूर हो गई तो?” यह सोचकर, खुद को सत्य से लैस करने में दिमाग खपाने से मैं और भी कतराने लगी। एक बार, मैं सुसमाचार कार्यकर्ताओं के काम की जानकारी ले रही थी, तब मैंने पाया कि उन्होंने एक संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ता की धारणाओं को सुलझाने के लिए संगति नहीं की थी। नतीजतन, उस संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ता ने सभाओं में आना बंद कर दिया। बाद में मुझे पता चला कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कार्यकर्ताओं को उस संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ता की धारणाओं को सुलझाना नहीं आता था। मुझे एहसास हुआ कि उनके सुसमाचार प्रचार करने के तरीके में अभी भी कई कमियाँ हैं और उन्हें और ज्यादा सभाओं और संगति की ज़रूरत है। लेकिन फिर मुझे खयाल आया कि इस मामले में तो मुझमें भी कमियाँ हैं। उनके साथ संगति करने के लिए, मुझे अनुभवी भाई-बहनों से पूछना पड़ेगा, सामग्री ढूँढ़नी पड़ेगी और उससे जुड़े फिल्म के अंश देखने पड़ेंगे। इसमें बहुत सारा समय और ऊर्जा लगेगी। यह कितना थका देने वाला होगा! इसलिए, मैंने बस उससे जुड़ा एक फिल्म का अंश खोजा, उसे सुसमाचार कार्यकर्ताओं को भेज दिया और उनसे इसे खुद ही सुलझाने के लिए कह दिया। मुझे पता था कि इससे सीमित नतीजे ही मिलेंगे, लेकिन फिर भी मैंने समस्या को सुलझाने में टालमटोल की। बाद में कई अन्य संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ताओं ने भी इसी तरह की धारणा के कारण कलीसिया में शामिल होने से इनकार कर दिया। एक कार्य सारांश बैठक के दौरान, यंत्रवत ढंग से अपना कर्तव्य निभाने के लिए पर्यवेक्षक ने मेरी काट-छाँट की। उसने कहा कि मैं सिर्फ खुद को व्यस्त रखकर ही संतुष्ट हूँ और नतीजे हासिल करने का प्रयास नहीं कर रही हूँ। सीधे शब्दों में कहा जाए तो मैं अनमने ढंग से काम कर रही थी और इसमें अपना दिल नहीं लगा रही थी। उसकी ये बातें मेरे दिल में चुभ गईं। शर्म से मेरा चेहरा तुरंत लाल हो गया और मैं चाहने लगी कि काश धरती फट जाए और मैं उसमें समा जाऊं। लेकिन मैं जानती थी कि यह सच है कि हाल ही में मैं अपने कर्तव्य में अपना पूरा मन नहीं लगा रही थी और नतीजे वाकई गिर गए थे। मुझे इसे स्वीकार करना था, आत्म-चिंतन करना था और खुद को जानना था। मुझे परमेश्वर के वचनों का एक भजन याद आया जो मैंने कुछ दिन पहले सुना था : “भले ही तुम्हें कोई चीज पसंद न हो या अगर तुम उसके कारण कष्ट उठाते हो या अगर वह तुम्हारी गरिमा और आत्मसम्मान को चुनौती देती या दबाती हो तो भी अगर वह ऐसी चीज है जिसे तुम्हें अनुभव करना चाहिए, जिसकी परमेश्वर ने तुम्हारे लिए योजना बनाई और व्यवस्था की है तो तुम्हें उसके प्रति समर्पण करना चाहिए और तुम अपनी कोई पसंद नहीं रख सकते हो” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। हर दिन मेरे सामने आने वाले लोगों, घटनाओं और चीज़ों को परमेश्वर की अनुमति होती है। मुझे उन्हें परमेश्वर से स्वीकार लेना चाहिए और सबक सीखना चाहिए। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि यह काट-छाँट मुझ पर इत्तेफाक से नहीं आई है, लेकिन मैं नहीं जानती कि तुम्हारा इरादा क्या है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं अपना सबक सीख सकूँ।”
एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और अपनी समस्या को समझ गई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “नकली अगुआ असली काम नहीं करते, लेकिन वे जानते हैं कि एक अधिकारी की तरह कैसे कार्य करना है। अगुआ बनकर वे सबसे पहला काम क्या करते हैं? यह लोगों का अनुग्रह खरीदने के लिए है। वे ‘नए अधिकारी दूसरों को प्रभावित करने के लिए तत्पर रहते हैं’ का दृष्टिकोण अपनाते हैं : पहले वे लोगों को खुश करने के लिए कुछ चीजें करते हैं और कुछ चीजें सँभालते हैं जो हर किसी के रोजमर्रा के कल्याण में सुधार करती हैं। पहले वे लोगों में एक अच्छी छवि बनाने, सबको यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि वे जनता के साथ जुड़े हैं, ताकि हर कोई उनकी प्रशंसा करे और कहे, ‘यह अगुआ हमारे साथ माता-पिता जैसा व्यवहार करता है!’ फिर वे आधिकारिक तौर पर पदभार सँभाल लेते हैं। उन्हें लगता है कि उनके पास जनता का समर्थन है और कि उनकी स्थिति सुरक्षित हो गई है; फिर वे रुतबे के फायदों का आनंद लेना शुरू कर देते हैं, मानो उन पर उनका उचित अधिकार हो। उनका आदर्श वाक्य होता है, ‘जीवन सिर्फ अच्छा खाने और सुंदर कपड़े पहनने के बारे में है,’ ‘चार दिन की जिंदगी है, मौज कर लो,’ और ‘आज मौज करो, कल की फिक्र कल करना।’ वे आने वाले हर दिन का आनंद लेते हैं, जब तक हो सके मौजमस्ती करते हैं और भविष्य के बारे में कोई विचार नहीं करते, वे इस बात पर तो बिल्कुल विचार नहीं करते कि एक अगुआ को कौन-सी जिम्मेदारियाँ निभानी चाहिए और कौन-से कर्तव्य करने चाहिए। वे सामान्य प्रक्रिया के तौर पर कुछ शब्दों और सिद्धांतों का प्रचार करते हैं और दिखावे के लिए कुछ तुच्छ कार्य करते हैं—वे कोई वास्तविक कार्य नहीं करते हैं। वे कलीसिया में वास्तविक समस्याओं का पता नहीं लगा रहे हैं और उन्हें पूरी तरह से हल नहीं कर रहे हैं, तो फिर उनके द्वारा ऐसे सतही कार्य करने का क्या अर्थ है? क्या यह भ्रामक नहीं है? क्या इस किस्म के नकली अगुआ को महत्वपूर्ण कार्य सौंपे जा सकते हैं? क्या वे अगुआओं और कर्मियों के चयन के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांतों और शर्तों के अनुरूप हैं? (नहीं।) ऐसे लोगों में न तो अंतरात्मा होती है और न ही विवेक, उनमें जिम्मेदारी की कोई भावना नहीं होती, और फिर भी वे कलीसिया में कोई आधिकारिक पद सँभालना, अगुआ बनना चाहते हैं—वे इतने बेशर्म क्यों हैं? कुछ लोग, जिनमें जिम्मेदारी की भावना होती है, अगर खराब काबिलियत के हों, तो वे अगुआ नहीं हो सकते—और उन बेकार लोगों की तो बात ही छोड़ दो जिनमें जिम्मेदारी की कोई भावना नहीं होती है; वे अगुआ बनने के लिए और भी कम योग्य हैं। ऐसे लालची और निकम्मे नकली अगुआ आखिर कितने आलसी होते हैं? जब उन्हें किसी समस्या का पता लगता है और वे जानते हैं कि यह एक मुद्दा है, तो भी वे इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं और इस पर कोई ध्यान नहीं देते हैं। वे कितने गैर-जिम्मेदार होते हैं! वैसे तो वे बातचीत करने में अच्छे होते हैं और उनमें थोड़ी काबिलियत भी प्रतीत होती है, लेकिन वे कलीसिया के काम में आने वाली विभिन्न समस्याएँ हल नहीं कर सकते, जिससे कार्य ठप्प हो जाता है; समस्याएँ बढ़ती चली जाती हैं, लेकिन ये अगुआ उन पर ध्यान नहीं देते हैं, और सामान्य प्रक्रिया के तौर पर कुछ सतही कार्य पूरे करने पर अड़े रहते हैं। और इसका क्या नतीजा होता है? क्या वे कलीसिया के कार्य में गड़बड़ नहीं कर देते, क्या वे उसे पूरी तरह चौपट नहीं कर देते? क्या उनके कारण कलीसिया में अराजकता नहीं फैलती है और एकता में कमी नहीं होती है? यह अपरिहार्य परिणाम है” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। परमेश्वर उजागर करता है कि जब झूठे अगुआ पहली बार चुने जाते हैं, तो वे लोगों की प्रशंसा और उनका समर्थन पाने के लिए दिखावे के तौर पर कुछ काम करते हैं। अपना लक्ष्य हासिल कर लेने के बाद वे शारीरिक सुख में लिप्त होने लगते हैं, अनमने हो जाते हैं और बस किसी तरह अपना कर्तव्य निभाते हैं। यहाँ तक कि जब वे सभाओं में जाते हैं तो वे किसी भी वास्तविक समस्या को सुलझाए बिना केवल कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत ही बोलते हैं। इससे कलीसिया का काम अस्त-व्यस्त हो जाता है और काम के किसी भी हिस्से से नतीजे नहीं मिलते। परमेश्वर विशेष रूप से झूठे अगुआओं से घृणा करता है। मैंने सोचा कि जब मैंने पहली बार यह कर्तव्य करना शुरू किया था तो मैं हर किसी की प्रशंसा पाने के लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने को तैयार थी। लेकिन कुछ समय बाद जब काम में कुछ सुधार हुआ तो भाई-बहनों को सुसमाचार प्रचार में आने वाली मुश्किलों और समस्याओं को सुलझाने के लिए मैं खुद को सत्य से लैस करने में ज्यादा दिमाग खपाना या ज्यादा थकान सहना नहीं चाहती थी। इसके बजाय मैंने वह सब किया जिससे मुझे परेशानी न हो। कभी-कभी, मैं सुसमाचार कार्यकर्ताओं को बस उससे जुड़ी किसी फिल्म का अंश भेज देती थी और उनसे संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ताओं की धारणाओं को खुद ही सुलझाने के लिए कह देती थी। मैं ठीक वैसी ही झूठी अगुआ थी जिसके बारे में परमेश्वर बात करता है, जो केवल दिखावे के लिए काम करती है। मैं ऐसे शैतानी ज़हरों के सहारे जी रही थी जैसे, “ज़िंदगी बस अच्छा खाने और अच्छा पहनने का नाम है,” “आज की फिक्र आज करो, कल की कल देखेंगे,” और “खुद की अच्छी खातिरदारी करो।” मेरा मानना था कि ज़िंदगी में लोगों को मजे करना आना चाहिए, आज के लिए जीना चाहिए और हर पल खुश रहना चाहिए। मुझे लगता था कि रोज़-रोज़ कष्ट सहना तो खुद के साथ नाइंसाफी होगी, कि इस तरह जीना बेकार है। इन विचारों और सोच के वश में होकर, मैं पतनशील और अधम हो गई, मेरे आत्म-संतुष्टि और परितोष का शिकार होने की बहुत संभावना थी। मैं अपनी पिछली उपलब्धियों के सहारे ही काम चलाना चाहती थी, चाहे वे कितनी भी छोटी क्यों न हों और अपनी देह को ज़रा भी कष्ट नहीं देना चाहती थी। मुझे अपने स्कूल के दिन याद आए। शुरू-शुरू में, एक अच्छी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने के लिए मैं थोड़ी कीमत चुकाने को तैयार थी। लेकिन जैसे ही मेरे ग्रेड्स में थोड़ा सुधार हुआ, मैं संतुष्ट हो गई। मैं अब पढ़ाई में और मेहनत नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैं देर तक सोती रहती और अपना होमवर्क गंभीरता से नहीं करती थी। आखिरकार, मुझे एक साधारण सी यूनिवर्सिटी में भी दाखिला नहीं मिल पाया। परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद भी, मैं वैसी ही थी। जैसे ही मेरे कर्तव्य में कुछ नतीजे दिखते, मैं प्रगति करने का प्रयास करना बंद कर देती थी। मुझे लगता था कि मैं जितने सत्य सिद्धांत समझती हूँ वे काफी हैं, जब मेरे पास खाली समय होता था तो मैं और ज्यादा अध्ययन नहीं करना चाहती थी। जब सुसमाचार कार्यकर्ताओं के सामने मुश्किलें और समस्याएँ आतीं जिन्हें सुलझाने की ज़रूरत होती तो मैं बस उन्हें किसी तरह निपटाने की कोशिश करती और जब भी मौका मिलता मैं अनमने ढंग से काम करती थी। मैं इतनी आलसी और चालाक थी, बिना किसी सत्यनिष्ठा या गरिमा के जी रही थी। मैं धरती पर बोझ थी! अब, मेरे कर्तव्य के नतीजे गिर रहे थे; यह परमेश्वर का मुझसे अपना मुँह छिपाना था। अगर मैंने चीजों में बदलाव नहीं किया तो आखिरकार मुझे प्रकट कर निकाल दिया जाएगा। परमेश्वर ने मुझे यह कर्तव्य करने देकर मेरा उत्कर्ष किया था। उसका इरादा था कि मैं खुद को और ज्यादा सत्य से लैस करूँ और ज्यादा लोगों को उसके सामने लाऊँ। यह मेरे लिए अपने कर्तव्य में अच्छे कर्म तैयार करने का मौका था। लेकिन मैं नहीं जानती थी कि मेरे लिए क्या अच्छा है और मैंने सिर्फ अपनी देह के बारे में सोचा। मैंने अपनी सबसे बुनियादी ज़िम्मेदारियाँ भी पूरी नहीं कीं। मैं कितने अधम ढंग से जी रही थी! मैं बस खुद को थप्पड़ मारना चाहती थी। तब मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मुझे शैतान ने बहुत गहराई तक भ्रष्ट कर दिया है। अब मैं शैतानी विचारों के सहारे नहीं जीना चाहती। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं अपनी देह से विद्रोह कर सकूँ।”
उसके बाद मैंने ज़रूरी सामग्री खोजी और सुसमाचार कार्यकर्ताओं के साथ चर्चा की कि संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ताओं के सवालों को सुलझाने के लिए कदम-दर-कदम संगति कैसे की जाए। आखिरकार, उनकी धारणाएँ सुलझ गईं और उन्होंने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया। इस तरह सहयोग करके मैंने अपने दिल में सुकून और शांति महसूस की। लगा जैसे मैंने वाकई अपना कर्तव्य निभाया हो। न केवल मेरे कर्तव्य के नतीजे बेहतर हुए, बल्कि इससे भी अहम बात यह है कि, इन मसलों को सुलझाने के लिए असल में सत्य की खोज करने से, मैंने परमेश्वर के मार्गदर्शन को महसूस किया। मैं यह समझने लगी कि जिन धारणाओं को मैं पहले सुलझाना नहीं जानती थी, उनके बारे में संगति कैसे की जाए।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा और मुझे अपने कर्तव्य में प्रगति करने का प्रयास न करने के नतीजों की ज्यादा स्पष्ट समझ मिल गई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर ने तुम्हें पर्याप्त काबिलियत और श्रेष्ठतर स्थितियाँ दी हैं जो तुम्हें कुछ चीजें स्पष्टता से देखने देती हैं और इस कार्य के लिए योग्य बनने देती हैं। लेकिन तुम अपने कर्तव्य के प्रति सही रवैया नहीं रखते, तुममें कोई ईमानदारी नहीं है, लगन की तो बात ही दूर है और तुम इसे अच्छी तरह से करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास नहीं करना चाहते हो। यह परमेश्वर को बहुत ही निराश करता है। तो, यदि तुम आलसी हो और हमेशा यह महसूस करते हो कि तुम्हें सौंपा गया कार्य परेशानी भरा है और तुम उसे करना नहीं चाहते हो और मन ही मन बड़बड़ाते हो, ‘मुझसे यह करने के लिए क्यों कहा जा रहा है, किसी और से क्यों नहीं?’ तो यह एक मूर्खतापूर्ण विचार है। जब कोई कर्तव्य तुम्हारे हिस्से में आता है, तो यह कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है, यह एक सम्मान है और यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उत्कर्ष है। तुम्हें इसे खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए और वह कर्तव्य करना चाहिए जो तुम्हें करने की जरूरत है; यह तुम्हें नहीं थकाएगा। बल्कि, अगर तुम अपना कर्तव्य अच्छे से निभाते हो, सत्य को समझते हो और समस्याओं का समाधान करते हो, तो तुम अपने मन में शांति और सुकून महसूस करोगे और तुमने परमेश्वर को निराश नहीं किया होगा। परमेश्वर के सामने, तुममें आस्था होगी और तुम सिर उठाकर आचरण कर सकोगे। अगर तुमने अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं निभाया है और हमेशा अनमने रहते हो, तो यह एक अपराध है और भले ही तुम्हारे कारण कोई नुकसान न हुआ हो, इस अपराध के कारण तुम्हारे दिल में जीवन भर का पछतावा होगा। यह अपराध एक अथाह काले गड्ढे जैसा होगा; जब भी तुम इसके बारे में सोचोगे, तुम्हें दर्द और बेचैनी महसूस होगी, एक ऐसी वेदना जो दिल में चुभती है। तुम्हें न केवल जरा भी शांति या आनंद नहीं मिलेगा, बल्कि इसके विपरीत, पछतावे और यंत्रणा का यह दर्द तुम्हारे पूरे जीवन भर साथ रहेगा और इसे कभी मिटाया नहीं जा सकेगा। क्या यह अनंत पछतावा नहीं है? तो परमेश्वर की नज़र से क्या? परमेश्वर इस मामले को निरूपित करने के लिए सत्य सिद्धांतों का उपयोग करता है, इसलिए इसकी प्रकृति उससे कहीं ज़्यादा गंभीर है जो तुम महसूस करते हो। ... कुछ लोगों को देखकर लगता है कि अपना कर्तव्य करने में उनमें समर्पण है, ऊपरवाला जो भी व्यवस्था करता है वे उसे करते हुए लगते हैं। लेकिन जब उनसे पूछा जाता है, ‘क्या तुम अपना कर्तव्य लापरवाही से करते हो? क्या तुम इसे सिद्धांतों के अनुसार करते हो?’ तो वे कोई निश्चित उत्तर नहीं दे पाते हैं, बस इतना कहते हैं, ‘मैं वैसा ही करता हूँ जैसा ऊपरवाला निर्देश देता है और बेतहाशा गलत कर्म करने की हिम्मत नहीं करता।’ जब उनसे पूछा जाता है कि क्या उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी की है तो वे कहते हैं, ‘खैर, मैं वही कर रहा हूँ जो मुझे करना चाहिए।’ अपना कर्तव्य निभाने में वह हमेशा इसी तरह का रवैया रखता है, बिना किसी जल्दबाजी के और उदासीन। यद्यपि कोई स्पष्ट समस्या उत्पन्न नहीं हुई है, लेकिन अगर सत्य सिद्धांतों के अनुसार मापा जाए, तो उसका कर्तव्य निर्वहन अकुशल है और यह मानक स्तर का नहीं है। लेकिन उसे कोई परवाह नहीं है। वह अब भी उसी लापरवाही भरे तरीके से काम करता है जैसे उसने अतीत में किया था और जिन चीजों को करने के लिए उसे पहल करनी चाहिए, उनके मामले में वह अब भी उतना ही निष्क्रिय है—वह बिल्कुल नहीं बदला है। क्या वे चिकने घड़े नहीं होते हैं? वे हमेशा यही रवैया बनाए रखते हैं : ‘तुम्हारे पास हजारों शानदार योजनाएँ हो सकती हैं, लेकिन मेरे अपने कुछ नियम हैं। मैं बस ऐसा ही हूँ! देखते हैं तुम मेरे साथ क्या कर सकते हो। मेरा यही रवैया है!’ उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है जो अत्यंत विश्वासघाती या बुरा हो, लेकिन उन्होंने शायद ही कोई अच्छे कर्म किए हैं। तुम क्या कहोगे कि वे किस मार्ग पर चल रहे हैं? क्या परमेश्वर में विश्वास और अपने कर्तव्य के प्रति इस तरह का रवैया अच्छा है? (नहीं।) बाइबल में प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में परमेश्वर यह कहता है : ‘इसलिये कि तू गुनगुना है, और न ठंडा है और न गर्म, मैं तुझे अपने मुँह में से उगलने पर हूँ’ (प्रकाशितवाक्य 3:16)। गुनगुना होना, यानी न ठंडा होना और न ही गर्म—क्या यह रवैया अच्छा है? (नहीं।) इस प्रकार का व्यक्ति अपने मन में अपना खुद का हिसाब-किताब भी रखता है : ‘जब तक मैं अपना कर्तव्य निभाने में कोई बुराई नहीं करता या कलीसिया के काम में गड़बड़ी पैदा नहीं करता, तब तक मुझे दोषी नहीं ठहराया जाएगा। अगर अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना बहुत थका देने वाला है और इसमें बहुत अधिक कष्ट सहने की आवश्यकता है, तो मैं इसे नहीं करूँगा। मैं खुद को नहीं थकाऊँगा, लेकिन मैं कोई बड़ी गलती भी नहीं करूँगा। इस तरह, मुझे बाहर नहीं निकाला जाएगा या हटाया नहीं जाएगा और मैं अब भी उन लोगों से बहुत बेहतर हूँ जो कोई कर्तव्य नहीं करते हैं। इसलिए मैं गुनगुना रहता हूँ, न ठंडा और न ही गर्म। तुम मुझसे जो भी करने को कहोगे, मैं उसे करूँगा। लेकिन अगर तुम मुझे कुछ करने को नहीं कहोगे तो मैं दखल नहीं दूँगा। इस तरह से मुझे थकान नहीं होगी और इसके अलावा, लोग मुझमें कोई गलती नहीं ढूँढ़ पाएँगे। यह तरीका बढ़िया है!’ क्या आचरण करने का यह तरीका अच्छा है? (नहीं।) तुम जानते हो कि यह अच्छा नहीं है, तो तुम्हारे अभ्यास में कैसा बदलाव आना चाहिए? यदि तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलने का प्रयास कभी नहीं करते और फिर भी शैतान के फलसफों के अनुसार जीते रहते हो, तो तुम्हारे उद्धार पाने की कोई आशा न होना तय है” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (11))। परमेश्वर के वचन और खासकर ये वचन पढ़ने के बाद, “इसलिये कि तू गुनगुना है, और न ठंडा है और न गर्म, मैं तुझे अपने मुँह में से उगलने पर हूँ,” और “तो तुम्हारे उद्धार पाने की कोई आशा न होना तय है,” मेरे दिल में सुइयों के चुभने जैसा दर्द हुआ। मुझे लगा कि परमेश्वर का स्वभाव ऐसा है जिसका अपमान न किया जा सके। अगर हम अपने कर्तव्य में सक्रिय होकर अपना सब कुछ नहीं देते और इसके बजाय हमेशा पीछे हटते हैं, कीमत चुकाने के समय कोशिश करने से मना कर देते हैं और हमेशा अपनी देह के बारे में सोचते हैं तो हम ईमानदार नहीं हैं या कोई वास्तविक काम नहीं कर रहे हैं। यह केवल काम को नुकसान पहुँचा सकता है और हम परमेश्वर के सामने अपराध कर सकते हैं। यह बुराई करना है! अगर मैंने पश्चात्ताप नहीं किया तो उद्धार की कोई उम्मीद नहीं है। उस दौरान अपने कर्तव्य के प्रति अपने रवैये के बारे में सोचकर मेरे दिल को बड़ी बेचैनी हुई। मुझे हमेशा कष्ट सहने और थक जाने का डर लगा रहता था, इसलिए मैंने खुद को सत्य सिद्धांतों से लैस करने पर ध्यान नहीं दिया। मैंने बस अपने पिछले काम के सहारे ही काम चलाया और जो भी नतीजे मिले, उनसे संतुष्ट रही। भले ही इससे मेरी देह को आराम मिला, लेकिन मेरे कर्तव्य के नतीजे गिर गए। जिन सुसमाचार कार्यकर्ताओं को मैं विकसित कर रही थी, उन्होंने कोई प्रगति नहीं की और कई संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ता समय पर परमेश्वर के सामने नहीं आ पाए। मैंने काम को जो नुकसान पहुँचाया है, उसकी भरपाई मैं कभी नहीं कर सकती। जब भी मैं इस बारे में सोचती हूँ, मेरा दिल दुखता है। लेकिन यह अपराध पहले ही हो चुका है और इसे वापस नहीं लिया जा सकता। मैं सोचती थी कि जब तक मेरे कर्तव्य से कुछ नतीजे मिल रहे हैं और मैं कोई गड़बड़ी या बाधा पैदा नहीं कर रही हूँ, मैं अपनी देह को थकाए बिना अपना कर्तव्य कर सकती हूँ और अंत में आशीष भी पा सकती हूँ। मैं छोटी-सी कीमत चुकाकर एक बड़ा इनाम पाने की कोशिश कर रही थी और छोटे रास्ते अपना रही थी। मैं इतनी धूर्त और धोखेबाज थी—मैं उन बेशर्म और ज़िद्दी लोगों में से एक थी जिनके बारे में परमेश्वर बात करता है। परमेश्वर इंसान के दिल की गहराइयों की पड़ताल करता है। जब लोग अपना सब कुछ नहीं देते या अपने कर्तव्य में ईमानदार नहीं होते हैं तो वे अच्छे कर्म तैयार नहीं कर रहे होते हैं, बल्कि वे परमेश्वर का कोप इकट्ठा कर रहे होते हैं और बुरे कर्म कर रहे होते हैं। अंत में, परमेश्वर उनसे घृणा करेगा और उन्हें निकाल देगा। यह सोचकर मैं डर गई, इसलिए मैंने जल्दी से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं बहुत धूर्त और धोखेबाज़ रही हूँ और अपने कर्तव्य में बहुत अनमने ढंग से काम करती रही हूँ। मैं इस तरह नहीं जीना चाहती। मैं पश्चात्ताप करने को तैयार हूँ। कृपया अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ने में मेरा मार्गदर्शन करो।”
बाद में अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का एक भजन सुना और मैं मानव जीवन के मूल्य और अर्थ को समझ गई।
केवल अपना कर्तव्य निभाकर ही तुम मानव जीवन का मूल्य जी सकते हो
1 व्यक्ति के जीवन का मूल्य क्या है? एक ओर, यह सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाने के बारे में है। दूसरे संदर्भ में, अपने जीवनकाल के दौरान तुम्हें अपना मिशन पूरा करना चाहिए; यह सबसे महत्वपूर्ण है। हम किसी बड़े मिशन, कर्तव्य या जिम्मेदारी को पूरा करने की बात नहीं करेंगे; लेकिन कम से कम, तुम्हें कुछ तो हासिल करना चाहिए। मनुष्य अपने जीवनकाल में अपना स्थान पाने के बाद, अपनी स्थिति पर अडिग रहता है, अपनी जगह पर टिका रहता है, अपने हृदय का पूरा रक्त और अपनी सारी ऊर्जा खपा देता है, जिस चीज पर काम करना चाहिए और जिसे पूरा करना चाहिए, उसे अच्छी तरह करता है और पूरा करता है। जब वह अंत में हिसाब देने के लिए परमेश्वर के सामने खड़ा होता है, तो वह अपेक्षाकृत संतुष्ट महसूस करता है, उसके दिल में कोई आत्मग्लानि या पछतावा नहीं होता है। उसे सुकून महसूस होता है और उसे लगता है कि उसने कुछ प्राप्त किया है, उसने एक मूल्यवान जीवन जिया है।
2 तो एक मूल्यवान जीवन जीने और अंत में इस प्रकार की फसल प्राप्त करने के लिए क्या किसी व्यक्ति का थोड़ा सा शारीरिक कष्ट सहना और थोड़ी सी कीमत चुकाना सार्थक है, भले ही वह थकावट के कारण बीमार हो जाए या उसे कुछ स्वास्थ्य समस्याएँ हो जाएँ? जब कोई व्यक्ति इस संसार में आता है, तो यह देह के आनंद के लिए नहीं होता, न ही यह खाने, पीने और मौज-मस्ती करने के लिए होता है। व्यक्ति को उन चीजों के लिए नहीं जीना चाहिए; यह मानव जीवन का मूल्य नहीं है, न ही यह उचित मार्ग है। मानव जीवन का मूल्य और अनुसरण का उचित मार्ग कुछ मूल्यवान हासिल करने और कार्य के एक या अनेक मूल्यवान पहलुओं को पूरा करने में निहित हैं। इसे करियर नहीं कहा जा सकता है; इसे उचित मार्ग कहा जाता है और इसे उचित कार्य भी कहा जाता है। किसी व्यक्ति के लिए किसी मूल्यवान कार्य को पूरा करने, सार्थक और मूल्यवान जीवन जीने और सत्य का अनुसरण करके उसे प्राप्त करने के लिए कोई भी कीमत चुकाना सार्थक है।
3 यदि तुम वास्तव में सत्य की समझ का अनुसरण करने, जीवन में उचित मार्ग पर चलने, अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभाने और एक मूल्यवान और सार्थक जीवन जीने की इच्छा रखते हो, तो तुम अपनी सारी ऊर्जा लगाने, सभी कीमतें चुकाने, अपना सारा समय और जीवन के बचे हुए दिन देने में संकोच नहीं करोगे। यदि तुम इस अवधि के दौरान थोड़ी-सी बीमारी का अनुभव करते हो, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, इससे तुम टूट नहीं जाओगे। क्या यह जीवन भर आराम, आजादी और आलस्य के साथ जीने, शरीर को इस हद तक पोषित करने कि वह सुपोषित और स्वस्थ हो और अंत में दीर्घायु होने से ज्यादा बेहतर नहीं है? इन दोनों विकल्पों में से कौन-सा एक मूल्यवान जीवन है? इनमें से कौन-सा विकल्प लोगों को अंत में मृत्यु का सामना करते हुए राहत दे सकता है, जिससे उन्हें कोई पछतावा नहीं होगा? सार्थक जीवन जीने का अर्थ है कि तुम सत्य को प्राप्त कर चुके होगे; अपने दिल में तुम सहज होगे और आनंद प्राप्त करोगे।
—वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (6)
भजन सुनने के बाद, मैं बहुत भावुक हो गई। मुझे समझ आ गया कि एक सृजित प्राणी के रूप में, अपना कर्तव्य निभाकर ही मैं अपनी आत्मा में सच्ची शांति और सुकून पा सकती हूँ। जीने का वही एकमात्र सार्थक और मूल्यवान तरीका है। शारीरिक सुख में लिप्त होना उस वक्त तो अच्छा लगता है, लेकिन बाद में यह बस खोखला लगता है—यह पूरी तरह से अर्थहीन है। मैंने सोचा कि कैसे मैंने अपने कर्तव्य में ज़रा-सा भी दिमाग नहीं लगाया—कैसे मैं कष्ट सहने और थकने से डरती थी और समस्याओं को सुलझाने के लिए कोई प्रयास नहीं करना चाहती थी। बाद में मुझे अक्सर बेचैनी होती थी, मेरा ज़मीर मुझे कोसता था और पवित्र आत्मा ने मुझसे अपना मुँह छिपा लिया था। मुझे परमेश्वर की मौजूदगी महसूस नहीं हो रही थी और मेरी आत्मा अंधकार और पीड़ा में डूबी थी। परमेश्वर ने मुझे यह कर्तव्य देकर मेरा उत्कर्ष किया था। अच्छे नतीजे पाने के लिए मुझे अपनी पूरी क्षमता से काम करना चाहिए। मैंने नूह के जहाज बनाने के बारे में सोचा। उसे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा और उसे अपने परिवार की गलतफहमी और दूसरों के उपहास और निंदा का भी सामना करना पड़ा। भले ही उसका शरीर थक कर चूर हो गया था और वह अपने दिल में कमज़ोरी महसूस कर रहा था, लेकिन जब उसने सोचा कि यह परमेश्वर का आदेश है तो वह जान गया कि चाहे उसे कितना भी कष्ट क्यों न सहना पड़े या यह कितना भी कठिन क्यों न हो, उसे डटे रहना है और इसलिए उसने पूरे दिल और ताकत से इसे किया। अंत में, उसने परमेश्वर के आदेश को पूरा करते हुए जहाज बना दिया। मैं खुद की तुलना नूह से नहीं कर सकती, लेकिन अगर मैं परमेश्वर की भेड़ों को उसके घर वापस लाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा सकूँ ताकि वे उसका उद्धार पा सकें तो यह कितना सार्थक काम होगा!
बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा और अभ्यास का एक मार्ग पा लिया। परमेश्वर कहता है : “यदि तुम वास्तव में एक निश्चित स्तर की काबिलियत रखते हो, तुम अपनी जिम्मेदारी के दायरे में पेशेवर कौशल की समझ रखते हो और अपने पेशे से अनजान नहीं हो, तो तुम्हें बस एक वाक्यांश का पालन करना है, और तुम अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान बन सकोगे। कौन-सा वाक्यांश? ‘पूरे दिल से कार्य करो।’ यदि तुम पूरे दिल से काम करोगे और अपना दिल लोगों में लगाओगे, तो तुम अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान और जिम्मेदार बन पाओगे। लेकिन क्या इस वाक्यांश का अभ्यास करना आसान है? तुम इसे व्यवहार में कैसे लाओगे? इसका मतलब कानों से सुनना या दिमाग से सोचना नहीं है—इसका मतलब है अपने हृदय का इस्तेमाल करना। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में अपने हृदय का उपयोग कर सकता है, तो जब उसकी आँखें देखती हैं कि कोई कुछ कर रहा है, किसी तरह से कार्य कर रहा है या किसी चीज के प्रति उसकी किसी प्रकार की प्रतिक्रिया है या जब उसके कान कुछ लोगों की राय या तर्क सुनते हैं, इन बातों पर विचार और मनन करने के लिए अपने हृदय का उपयोग करके, उसके दिमाग में कुछ ख्याल, विचार और दृष्टिकोण पैदा होता है। ये ख्याल, विचार और दृष्टिकोण उस व्यक्ति या वस्तु की गहरी, विशिष्ट और सही समझ देंगे; साथ ही, उपयुक्त और सही निर्णय और सिद्धांतों को जन्म देंगे। जब किसी व्यक्ति में अपने दिल का इस्तेमाल करने की ऐसी अभिव्यक्तियाँ होती हैं, तभी इसका अर्थ होता है कि वह अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान है” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (7))। दरअसल, परमेश्वर इंसान से बहुत कुछ नहीं माँगता। वह बस हमारा सच्चा दिल चाहता है। जब तक लोग इसमें अपना दिल लगाते हैं, वे अपने कर्तव्य में मौजूद समस्याओं का पता लगा सकते हैं; खोज करने और इन समस्याओं पर विचार करने से, वे उन्हें सुलझाने के तरीके ढूँढ़ सकते हैं और उनके काम के नतीजे स्वाभाविक रूप से बेहतर हो जाएँगे। लेकिन अगर लोग अपना दिल नहीं लगाते तो वे अपनी आँखों के सामने मौजूद समस्याओं पर भी ध्यान नहीं देंगे। आँखें खुली होने पर भी, वे कुछ नहीं देख पाएँगे और उनके कर्तव्य के नतीजे और बदतर होते जाएँगे। अपने कर्तव्य में अपना दिल लगाना बहुत अहम है! मैंने सोचा कि जब मैंने पहली बार यह कर्तव्य शुरू किया था, तब मुझमें कितनी सारी कमियाँ थीं। लेकिन मैं अक्सर प्रार्थना करती थी, अपनी मुश्किलें परमेश्वर को सौंपती थी और उसी पर नज़रें टिकाए रहती थी। परमेश्वर के मार्गदर्शन से, मैंने धीरे-धीरे अपना कर्तव्य निभाने के कुछ सिद्धांत समझ लिए और काम में कुछ नतीजे भी दिखने लगे। लेकिन जब मैं जैसी स्थिति थी उसी से संतुष्ट हो गई और अनमने ढंग से काम करने लगी, मेरे सामने आई समस्याओं को नहीं सुलझाया तो मेरे कर्तव्य के नतीजे गिरते ही चले गए। अंत में, मैं एक के बाद एक संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ता को खोते हुए देखने के अलावा कुछ न कर सकी। मैंने देखा कि अपने कर्तव्य में दिल न लगाना वाकई दूसरों को और खुद को भी नुकसान पहुँचाता है!
तब से, मैंने अपने काम की समस्याओं को एक-एक करके लिखना शुरू कर दिया और पूरे दिल से उन पर विचार करने लगी। अगर मसला किसी सुसमाचार कार्यकर्ता के अपने कर्तव्य के प्रति रवैये का होता तो मैं उनके साथ संगति करने के लिए परमेश्वर के संबंधित वचन ढूँढ़ती। अगर बात किसी संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ता की धारणाओं को सुलझाने की होती, तो मैं संबंधित सामग्री ढूँढ़ती। अगर मुझे कुछ समझ नहीं आता तो मैं अपने भाई-बहनों से पूछती। और फिर धारणाओं को सुलझाने पर चर्चा करने के लिए सुसमाचार कार्यकर्ताओं के साथ संगति करती। इस तरह अभ्यास करने से, मेरे दिल को बहुत सुकून मिला। हालाँकि उस समय इस काट-छाँट का सामना करना शर्मिंदगी भरा था, लेकिन इसने मुझे परमेश्वर के सामने आने और अपने कर्तव्य के प्रति अपने रवैये पर आत्म-चिंतन करने के लिए प्रेरित किया। परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से, मैं देह-सुख में लिप्त होने की अपनी असल वजह को समझ पाई और मैंने सीखा कि केवल अपना कर्तव्य निभाकर ही हम सच्ची शांति और खुशी पा सकते हैं। परमेश्वर का धन्यवाद!
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
शिनचे, चीनजुलाई 2024 में मैं कलीसिया में पाठ आधारित कार्य की पर्यवेक्षक थी। चूँकि एक अगुआ को गिरफ्तार किया जा चुका था तो मुझे और मेरी...
कुछ समय पहले, मेरे बनाये वीडियो की समीक्षा करने वाली बहन ने बताया कि उनकी क्वालिटी अच्छी नहीं थी, उनमें बहुत सी गड़बड़ियाँ थीं। उन्होंने...
ज्यांग लिंग, स्पेन पिछले साल मैंने ग्राफिक डिजाइन का काम लिया, और मुझ पर औरों के काम का दायित्व भी था। शुरू-शुरू में मैं सभी पहलुओं के...
क्षुन कीउ, दक्षिण कोरियासर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मनुष्य द्वारा अपना कर्तव्य निभाना वास्तव में उस सबकी सिद्धि है, जो मनुष्य के भीतर...