3. परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य का महत्व

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

अंत के दिनों का कार्य सभी को अपनी किस्म के अनुसार छाँटना और परमेश्वर की प्रबंधन योजना का समापन करना है, क्योंकि समय निकट है और परमेश्वर का दिन आ गया है। परमेश्वर उन सभी को, जो उसके राज्य में प्रवेश करते हैं—उन सभी को जो अंत तक उसके वफादार रहे हैं—स्वयं परमेश्वर के युग में ले जाता है। फिर भी, स्वयं परमेश्वर के युग के आगमन से पूर्व, परमेश्वर का कार्य मनुष्य के कर्मों की जाँच करना या मनुष्य के जीवन की जाँच-पड़ताल करना नहीं, बल्कि मनुष्य की विद्रोहशीलता का न्याय करना है, क्योंकि परमेश्वर उन सभी को शुद्ध करेगा जो उसके सिंहासन के सामने आते हैं। वे सभी, जिन्होंने आज तक परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण किया है, वे लोग हैं जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने आते हैं और ऐसा होने से हर वह व्यक्ति जो परमेश्वर के कार्य को उसके अंतिम चरण में स्वीकार करता है, परमेश्वर द्वारा शुद्ध किए जाने का पात्र होता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के कार्य को उसके अंतिम चरण में स्वीकार करने वाला हर व्यक्ति परमेश्वर के न्याय का पात्र होता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है

अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों का गहन-विश्लेषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर के प्रति समर्पण किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता जीनी चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभावों पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य परमेश्वर को कैसे अस्वीकार करता है, और भी अधिक इस तथ्य को उजागर करने पर केंद्रित हैं कि मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध एक विरोधी शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर कुछ वचनों में मनुष्य की प्रकृति को पूरी तरह नहीं समझाता है; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर और काट-छाँट करने की इन विभिन्न विधियों को साधारण वचनों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; बल्कि उजागर और काट-छाँट करने के इस कार्य को करने में उस सत्य का उपयोग किया जाता है जो मनुष्य के पास बिल्कुल भी नहीं होता है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य की समझ पैदा करने का काम करता है। न्याय के कार्य ने मनुष्य को परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों के बारे में काफी समझ प्राप्त करने में सक्षम बनाया है जो उसकी समझ से परे होते हैं। इसने मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार और अपनी भ्रष्टता की जड़ को समझने और जानने, साथ ही अपने कुरूप चेहरे का पता लगाने में सक्षम बनाया है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन को उन सभी के लिए उद्घाटित करने का कार्य है जो उसमें आस्था रखते हैं। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है

परमेश्वर ताड़ना और न्याय का कार्य मूलतः मानवता को शुद्ध करने और विश्राम के अंतिम दिन की खातिर करता है; अन्यथा मानवता का कोई भी सदस्य अपनी किस्म के अनुसार छांटा नहीं जा सकेगा या विश्राम में प्रवेश नहीं कर सकेगा। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। परमेश्वर का शुद्धिकरण का कार्य ही मनुष्यों को उनकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा और उसका ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानवता के उन विद्रोही तत्वों को उजागर करेगा, और इस तरह बचाए जा सकने वालों को बचाए न जा सकने वालों से अलग करेगा और जो बचे रह सकते हैं उनसे उन्हें अलग करेगा जो बचे नहीं रह सकते हैं। इस कार्य के समाप्त होने पर जो लोग बचे रह सकते हैं वे सब शुद्ध किए जाएँगे और मानवता के उच्चतर क्षेत्र में प्रवेश करेंगे जहाँ वे पृथ्वी पर और अधिक अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का आनंद उठाएंगे; दूसरे शब्दों में, वे मानवता के विश्राम के दिन में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ जिएंगे। जो बचे नहीं रह सकते हैं उनकी ताड़ना और उनका न्याय किए जाने के बाद उनके असली रूप पूरी तरह उजागर हो जाएँगे; उसके बाद वे सब के सब नष्ट कर दिए जाएँगे और शैतान के समान उन्हें पृथ्वी पर जीवित रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवता में इस किस्म के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ऐसे लोग अंतिम विश्राम की धरती पर प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं, न ही वे उस विश्राम के दिन में प्रवेश के योग्य हैं जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे, क्योंकि वे दंड के लक्ष्य हैं और वे धार्मिक लोग नहीं, बल्कि बुरे लोग हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे

युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें वह वो सब प्रकट करता है जो अधार्मिक है, वह अनगिनत लोगों का सरेआम न्याय करता है और उन लोगों को पूर्ण बनाता है जो सच्चे दिल से उससे प्रेम करते हैं। केवल इस तरह का स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सभी चीजें अपनी किस्म के अनुसार छाँटी जाती हैं और अपनी विभिन्न खूबियों के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित की जाती हैं। ठीक यही वह समय है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और गंतव्य प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय का अनुभव न करें तो उनके विद्रोहीपन और अधार्मिकता को उजागर नहीं किया जा सकता है। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी चीजों का परिणाम प्रकट किया जा सकता है। लोग जो सच में हैं वह केवल तब दिखाते हैं जब उन्हें ताड़ना दी जाती है और उनका न्याय किया जाता है। बुरे को बुरे के साथ रखा जाएगा, भले को भले के साथ, और सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से सभी चीजों के परिणाम प्रकट किए जाएँगे ताकि बुरे को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और अनगिनत लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के सामने आत्मसमर्पण कर लें। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से पूरा करना होगा। चूँकि लोगों की भ्रष्टता अपने शिखर पर पहुँच गई है और उनका विद्रोहीपन अत्यंत गंभीर है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यतः ताड़ना और न्याय से युक्त है और अंत के दिनों में प्रकट होता है, लोगों को पूरी तरह से परिवर्तित कर सकता है और उन्हें पूर्ण कर सकता है, बुराई को उजागर कर सकता है, और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दंडित किया जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, तुम लोगों को ताड़ना देता है और तुम्हें दोषी ठहराता है, लेकिन तुम्हें यह जानना चाहिए कि तुम्हें दोषी इसलिए ठहराया जाता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको। वह दोषी ठहराता है, शाप देता है, न्याय करता और ताड़ना देता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो सके और उससे भी बढ़कर तुम अपनी कीमत जान सको और यह देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धार्मिक हैं, वे उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं, वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है और यह कि वह धार्मिक परमेश्वर है, जो मनुष्य से प्रेम करता है, उसे बचाता है, उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना भी देता है। यदि तुम केवल यह जानते हो कि तुम निम्न स्तर के हो, कि तुम भ्रष्ट और विद्रोही हो, परंतु यह नहीं जानते कि परमेश्वर आज तुम पर जो न्याय और ताड़ना का कार्य कर रहा है उसके माध्यम से वह अपने उद्धार को प्रकट करने का इरादा रखता है, तो तुम्हारे पास चीजों को अनुभव करने का कोई तरीका नहीं है, तुम आगे बढ़ने में तो बिल्कुल भी सक्षम नहीं हो। परमेश्वर लोगों को मार गिराने या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि उनका न्याय करने, उन्हें शाप देने, ताड़ना देने और बचाने के लिए आया है। जब तक उसकी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना का समापन नहीं हो जाता—पहले वह मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी के परिणाम का खुलासा करेगा—पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से उद्धार की खातिर है; इसका विशुद्ध प्रयोजन उससे प्रेम करने वाले लोगों को पूरी तरह पूर्ण करना और उन्हें अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पण कराना है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर लोगों को कैसे बचाता है, यह सब उन्हें उनकी पुरानी शैतानी प्रकृति से अलग करके किया जाता है; अर्थात्, वह उन्हें जीवन का अनुसरण करवाकर बचाता है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उनके पास परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कोई रास्ता नहीं होगा। उद्धार स्वयं परमेश्वर का कार्य है और जीवन का अनुसरण ऐसी चीज है, जो उद्धार स्वीकार करने के लिए मनुष्य के पास होनी ही चाहिए। मनुष्य की निगाह में, उद्धार परमेश्वर का प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम ताड़ना, न्याय और शाप नहीं हो सकता; उद्धार में दया, प्रेमपूर्ण दयालुता और, इनके अलावा, सांत्वना के वचनों के साथ-साथ परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए असीम आशीष समाविष्ट होने चाहिए। लोगों का मानना है कि जब परमेश्वर मनुष्य को बचाता है, तो ऐसा वह उसे अपने आशीषों और अनुग्रह से प्रेरित करके करता है, ताकि वह अपना हृदय परमेश्वर को दे सके। दूसरे शब्दों में, उसका मनुष्य को स्पर्श करना उसे बचाना है। इस तरह का उद्धार लेनदेन पर आधारित है। केवल जब परमेश्वर मनुष्य को सौ गुना प्रदान करता है, तभी मनुष्य परमेश्वर के नाम के प्रति समर्पण करेगा और ऐसा करके वह परमेश्वर को गौरवान्वित करेगा और उसका मान बढ़ाएगा। मानवजाति के लिए परमेश्वर का यह इरादा नहीं है। परमेश्वर पृथ्वी पर भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है। यदि ऐसा न होता, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित ही नहीं आता। अतीत में, उद्धार के उसके साधन में परम दया और प्रेमपूर्ण दयालुता दिखाना शामिल था, यहाँ तक कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। वर्तमान अतीत जैसा नहीं है : आज तुम लोगों का उद्धार अंत के दिनों के समय घटित होता है, जब प्रत्येक व्यक्ति उसके प्रकार के अनुसार छाँटा जाता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन दया या प्रेमपूर्ण दयालुता नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है, ताकि मनुष्य को अधिक पूरी तरह से बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है, वह ताड़ना, न्याय और निर्मम प्रहार है, लेकिन यह जान लो : इस निर्मम प्रहार में थोड़ा-सा भी दंड नहीं है। मेरे वचन कितने भी कठोर हों, तुम लोगों को जो मिलता है, वे कुछ वचन ही होते हैं, जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत हो सकते हैं, और मैं कितना भी क्रोधित क्यों न हूँ, तुम लोगों को जो मिलता है, वे फिर भी फटकार के वचन ही होते हैं, और मेरा आशय तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना या तुम लोगों को मार डालना नहीं है। क्या यह सब तथ्य नहीं है? जान लो कि आजकल हर चीज उद्धार के लिए है, चाहे वह धार्मिक न्याय हो या निर्मम शोधन और ताड़ना। भले ही आज प्रत्येक व्यक्ति उसके प्रकार के अनुसार छाँटा जाए या सभी प्रकार के लोगों को बेनकाब किया जाए, परमेश्वर के समस्त वचनों और कार्य का प्रयोजन उन लोगों को बचाना है जो परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हैं। धार्मिक न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से लाया जाता है और निर्मम शोधन उसे शुद्ध करने के लिए किया जाता है; कठोर वचन बोलना या ताड़ना देना, दोनों शुद्ध करने के लिए हैं और वे उद्धार के लिए हैं। इस प्रकार, उद्धार का आज का तरीका अतीत के तरीके जैसा नहीं है। आज धार्मिक न्याय तुम्हारे उद्धार का काम करता है और वह तुम लोगों में से प्रत्येक को तुम्हारे प्रकार के अनुसार छाँटने का एक अच्छा उपकरण है और निर्मम ताड़ना तुम लोगों के सर्वोच्च उद्धार का काम करती है। ऐसी ताड़ना और न्याय का सामना होने पर तुम लोगों को क्या कहना है? क्या तुम लोगों ने शुरू से अंत तक हमेशा उद्धार का आनंद नहीं लिया है? तुम लोगों ने देहधारी परमेश्वर को देखा है और उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि का एहसास किया है; इसके अलावा, तुम लोगों ने बार-बार प्रहार और अनुशासन का अनुभव किया है। लेकिन क्या तुम लोगों को सर्वोच्च अनुग्रह भी प्राप्त नहीं हुआ है? क्या तुम लोगों को प्राप्त हुए आशीष किसी भी अन्य की तुलना में अधिक नहीं हैं? तुम लोगों को प्राप्त हुए अनुग्रह सुलेमान को प्राप्त महिमा और संपत्ति से भी अधिक विपुल हैं! इसके बारे में सोचो : यदि आगमन के पीछे मेरा इरादा तुम लोगों को बचाने के बजाय तुम्हारी निंदा करना और सज़ा देना होता, तो क्या तुम लोगों का जीवन इतने लंबे समय तक चल सकता था? क्या तुम लोग जो मांस और रक्त के पापी प्राणी हो, आज तक जीवित रहते? यदि मेरा उद्देश्य केवल तुम लोगों को दंड देना होता, तो मैं देह धारण क्यों करता और इतने महान उद्यम की शुरुआत क्यों करता? क्या तुम जैसे तुच्छ लोगों को दंडित करने का काम महज एक वचन बोलने से ही नहीं किया जा सकता? क्या तुम लोगों की जानबूझकर निंदा करने के बाद अभी भी मुझे तुम लोगों को नष्ट करने की आवश्यकता होगी? क्या तुम लोगों को अभी भी मेरे इन वचनों पर विश्वास नहीं है? क्या मैं केवल दया और प्रेमपूर्ण दयालुता के माध्यम से मनुष्य को बचा सकता हूँ? या क्या मैं मनुष्यों को बचाने के लिए केवल सूली पर चढ़ने के तरीके का ही उपयोग कर सकता हूँ? क्या मेरा धार्मिक स्वभाव मनुष्य को पूरी तरह से समर्पित बनाने में अधिक सहायक नहीं है? क्या यह मनुष्य को पूरी तरह से बचाने में अधिक सक्षम नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें रुतबे के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए

सच में, जो कार्य अब किया जा रहा है, वह लोगों से शैतान और अपने पूर्वज के खिलाफ विद्रोह करने के लिए किया जा रहा है। वचन के द्वारा सभी न्यायों का उद्देश्य लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करना और उन्हें जीवन का सार समझने में सक्षम बनाना है। ये बार-बार के न्याय लोगों के हृदयों को बेध देते हैं। प्रत्येक न्याय सीधे उनके भाग्यों से संबंधित होता है और उनके हृदयों को घायल करने के लिए होता है, ताकि वे उन सभी बातों को जाने दें और फलस्वरूप जीवन के बारे में जान जाएँ, इस गंदी दुनिया को जान जाएँ, परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को जान जाएँ, और मानवजाति को भी जान जाएँ, जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है। जितना अधिक इस प्रकार की ताड़ना और न्याय होता है, उतना ही अधिक मनुष्य का हृदय घायल किया जा सकता है और उतना ही अधिक उसकी आत्मा को जगाया जा सकता है। इस प्रकार के न्याय का लक्ष्य इन अत्यधिक भ्रष्ट और सबसे अधिक गहराई से भ्रमित लोगों की आत्माओं को जगाना है। मनुष्य के पास कोई आत्मा नहीं है, अर्थात् उसकी आत्मा बहुत पहले ही मर गई और वह नहीं जानता है कि स्वर्ग है, नहीं जानता कि परमेश्वर है, और निश्चित रूप से नहीं जानता कि वह मौत की अतल खाई में संघर्ष कर रहा है; वह संभवतः कैसे जान सकता है कि वह इस बुरे मानवीय नरक में जी रहा है? वह संभवतः कैसे जान सकता है कि उसका यह सड़ा हुआ शव शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मृत्यु के रसातल में गिर गया है? वह संभवतः कैसे जान सकता है कि पृथ्वी पर सभी चीजें मानवजाति द्वारा बहुत पहले ही इतनी बरबाद कर दी गई हैं कि अब सुधारी नहीं जा सकतीं? और वह संभवतः कैसे जान सकता है कि आज सृष्टिकर्ता पृथ्वी पर आया है और भ्रष्ट किए गए लोगों के एक समूह की तलाश कर रहा है, जिसे वह बचा सके? भले ही मनुष्य ने हर संभव शोधन और न्याय का अनुभव किया है, उसकी संवेदनहीन चेतना पूरी तरह से अचल रही है और लगभग प्रतिक्रियाहीन है। मनुष्य कितना पतित है! और यद्यपि इस प्रकार का न्याय आसमान से गिरने वाले क्रूर ओलों के समान है, फिर भी वह मनुष्य के लिए सर्वाधिक लाभप्रद है। इस तरह से लोगों का न्याय किए बिना नतीजा हासिल नहीं किया जा सकता और लोगों को दुःख की अतल खाई से बचाना नितांत असंभव होगा। इस तरह कार्य किए बिना तो लोगों का रसातल से बाहर निकलना बहुत कठिन होगा, क्योंकि उनके हृदय बहुत पहले ही मर चुके हैं और उनकी आत्माओं को शैतान द्वारा बहुत पहले ही कुचल दिया गया है। पतन की गहराइयों में डूब चुके तुम लोगों को बचाने के लिए तुम्हें हर प्रयास कर पुकारने और तुम्हारा न्याय करने की आवश्यकता है; केवल तभी तुम लोगों के जमे हुए हृदयों को जगाया जा सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है

तुम सब पाप और व्यभिचार की धरती पर रहते हो; और तुम सब व्यभिचारी और पापी हो। आज तुम लोग न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण रूप से, तुम लोगों ने ताड़ना और न्याय प्राप्त किया है, तुमने यह गहनतम उद्धार प्राप्त किया है, दूसरे शब्दों में, तुमने परमेश्वर का महानतम प्रेम प्राप्त किया है। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह तुम लोगों के लिए सच्चा प्रेम है। वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता। यह तुम लोगों के पापों के कारण है कि वह तुम लोगों का न्याय करता है, ताकि तुम लोग आत्म-चिंतन करो और यह जबरदस्त उद्धार प्राप्त करो। यह सारा कार्य मनुष्य को पूर्ण करने के प्रयोजन से किया जाता है। प्रारंभ से लेकर अंत तक, परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए भरसक कोशिश कर रहा है, और अपने ही हाथों से बनाए हुए लोगों को पूर्णतया नष्ट करने की उसकी बिल्कुल इच्छा नहीं है। आज वह कार्य करने के लिए तुम लोगों के बीच आया है; क्या यह और भी बड़ा उद्धार नहीं है? अगर वह तुम लोगों से नफरत करता, तो क्या फिर भी वह व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? वह इस प्रकार कष्ट क्यों उठाए? परमेश्वर तुम लोगों से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम सर्वाधिक वास्तविक है। केवल लोगों के विद्रोही होने के कारण ही उसे न्याय के माध्यम से उन्हें बचाना पड़ता है; वरना उन्हें बचाना तब भी असंभव होता। क्योंकि तुम लोग नहीं जानते कि अपने जीवन कैसे जिएँ, और नहीं जानते कि कैसे जीना चाहिए, और चूँकि तुम लोग इस व्यभिचारी और पापमय भूमि पर जीते हो और स्वयं व्यभिचारी और गंदे दानव हो, इसलिए वह सह नहीं सकता कि तुम और अधिक पतित बनते जाओ, वह तुम लोगों को इस मलिन भूमि पर उस तरह से रहते हुए देख नहीं सकता जैसे तुम अभी जी रहे हो, शैतान द्वारा उसकी इच्छानुसार कुचले जाते हुए, और वह नहीं सह सकता कि तुम्हें रसातल में गिरने दे। वह केवल लोगों के इस समूह को प्राप्त करना और तुम लोगों को पूर्णतः बचाना चाहता है। तुम लोगों पर विजय का कार्य करने का यह मुख्य उद्देश्य है—यह उद्धार के लिए है। यदि तुम नहीं देख सकते कि जो कुछ तुम पर किया जा रहा है, वह प्रेम और उद्धार है, यदि तुम सोचते हो कि यह मनुष्य को यातना देने की एक पद्धति, एक तरीका भर है और विश्वास के लायक नहीं है, तो तुम पीड़ा और कठिनाई सहने के लिए वापस अपने संसार में ही लौट जाओ! यदि तुम इस धारा में इस न्याय और अमित उद्धार, और इन सब आशीषों का जो मनुष्य के संसार में कहीं न पाए जा सकते और इस प्रेम का आनंद उठाने के इच्छुक हो, तो अच्छा है : विजय के कार्य को स्वीकार करने के लिए इस धारा में बने रहो, ताकि तुम्हें पूर्ण बनाया जा सके। परमेश्वर के न्याय के कारण आज तुम कुछ कष्ट और शोधन सहते हो, लेकिन यह कष्ट मूल्यवान और अर्थपूर्ण है। यद्यपि मनुष्य के लिए परमेश्वर की ताड़ना और न्याय शोधन हैं, निर्दयतापूर्ण प्रकाशन हैं और उसके पापों के लिए उसे सज़ा देने और उसके देह को सज़ा देने के उद्देश्य से की गई चीजें हैं, फिर भी इस कार्य का कुछ भी उनके देह की निंदा करने और उसे नष्ट करने के इरादे से नहीं है। वचन का कठोर प्रकाशन तुम्हें सही मार्ग पर ले जाने के उद्देश्य से है। तुम लोगों ने इस कार्य का बहुत-कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है, और स्पष्टतः, यह तुम्हें बुरे मार्ग पर नहीं ले गया है! यह सब तुम्हें सामान्य मानवता को जीने योग्य बनाने के लिए है; और यह सब तुम्हारी सामान्य मानवता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारे वास्तविक आध्यात्मिक कद के अनुसार है, और तुम लोगों पर कोई असहनीय बोझ नहीं लादा गया है। यह आज तुम्हें स्पष्ट नहीं है, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हो रहा हूँ, और तुम सदैव यह विश्वास करते हो कि मैं तुम्हें प्रतिदिन इसलिए ताड़ना देता हूँ, इसलिए तुम्हारा न्याय करता हूँ और इसलिए तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे घृणा करता हूँ। किंतु यद्यपि जो तुम प्राप्त करते हो, वह ताड़ना और न्याय है, किंतु वास्तव में यह तुम्हारे लिए प्रेम है, और यह सबसे बड़ी सुरक्षा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (4)

सबसे पिछड़े और मलिन स्थान पर देहधारी होकर ही परमेश्वर अपने पवित्र और धार्मिक स्वभाव की समग्रता को प्रकट कर सकता है। और उसका धार्मिक स्वभाव किस चीज के जरिए प्रकट होता है? वह उसके द्वारा मनुष्य के पापों का न्याय करने, शैतान का न्याय करने, पाप से घृणा करने और उन शत्रुओं से उसकी घृणा के जरिए प्रकट होता है जो उसका प्रतिरोध और उसके खिलाफ विद्रोह करते हैं। मैं आज जो वचन बोलता हूँ, वे मनुष्य के पापों का न्याय करने के लिए, मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय करने के लिए और मनुष्य के विद्रोहीपन को और मनुष्य की कुटिलता और धोखेबाजी को शाप देने के लिए हैं। मनुष्य के शब्दों और कर्मों में जो कुछ भी परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं है उस सबका न्याय होना चाहिए और मनुष्य का समस्त विद्रोहीपन पाप के रूप में ठहराया जाता है। उसके वचन न्याय के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमते हैं; वह अपने धार्मिक स्वभाव को प्रकट करने के लिए मनुष्य की अधार्मिकता के न्याय, मनुष्य की विद्रोहशीलता के शाप और मनुष्य के सभी कुरूप चेहरों को उजागर करने का उपयोग करता है। पवित्रता उसके धार्मिक स्वभाव का निरूपण है और दरअसल उसकी पवित्रता उसका धार्मिक स्वभाव है। तुम लोगों के भ्रष्ट स्वभाव आज के वचनों के प्रसंग हैं—मैं उनके अनुसार बोलता हूँ, न्याय करता हूँ और विजय के कार्य को कार्यान्वित करता हूँ। मात्र यही व्यावहारिक कार्य है और केवल इसी तरह से परमेश्वर की पवित्रता पूरी तरह से प्रमुखता पा सकती है। अगर तुममें भ्रष्ट स्वभाव का कोई निशान नहीं है तो परमेश्वर तुम्हारा न्याय नहीं करेगा, न ही वह तुम्हें अपना धार्मिक स्वभाव दिखाएगा। चूँकि तुममें भ्रष्ट स्वभाव हैं, इसलिए परमेश्वर तुम्हें छोड़ेगा नहीं और इसी के जरिए उसकी पवित्रता दिखती है। अगर परमेश्वर देखता कि मनुष्य की मलिनता और विद्रोहशीलता बहुत भयंकर हैं, लेकिन वह न तो बोलता, न तुम्हारा न्याय करता, न तुम्हारी अधार्मिकता के लिए तुम्हें ताड़ना देता, तो इससे यह साबित हो जाता कि वह परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उसे पाप से कोई घृणा न होती; वह मनुष्य जितना ही मलिन होता। आज मैं तुम्हारी मलिनता के कारण ही तुम्हारा न्याय कर रहा हूँ, और तुम्हारी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता के कारण ही तुम्हें ताड़ना दे रहा हूँ। मैं तुम लोगों के सामने अपने सामर्थ्य की अकड़ नहीं दिखा रहा या जानबूझकर तुम लोगों का दमन नहीं कर रहा; मैं ऐसा इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि इस मलिन धरती पर पैदा हुए तुम लोग मलिनता से बुरी तरह दूषित हो गए हो। तुम लोगों ने गंदी जगहों पर रहने वाले सूअर की तरह अपनी सत्यनिष्ठा और मानवीयता खो दी है। तुम्हारी मलिनता और भ्रष्टता की वजह से ही तुम्हारा न्याय किया जाता है और मैं तुम पर अपना क्रोध बरसाता हूँ। ठीक इन वचनों के न्याय की वजह से ही तुम यह देख पाए हो कि परमेश्वर धार्मिक परमेश्वर है और परमेश्वर पवित्र परमेश्वर है; ठीक अपनी पवित्रता और धार्मिकता की वजह से ही वह तुम लोगों का न्याय करता है और तुम लोगों पर अपना क्रोध बरसाता है; ठीक मानवजाति की विद्रोहशीलता को देखने की वजह से ही वह अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करता है। मानवजाति की मलिनता और भ्रष्टता उसकी पवित्रता को प्रकट करती है। यह दिखाने के लिए यह पर्याप्त है कि वह स्वयं परमेश्वर है, जो पवित्र और निष्कलंक है और फिर भी मलिनता की धरती पर रहता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय-कार्य के दूसरे चरण के प्रभावों को कैसे प्राप्त किया जाता है

परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य इसलिए करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर के बारे में ज्ञान प्राप्त कर सके; साथ ही, वह अपनी गवाही की खातिर ऐसा करता है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रति परमेश्वर के न्याय के बिना मनुष्य उसके धार्मिक स्वभाव को बिल्कुल नहीं जान सकता था, जो किसी अपमान को सहन नहीं करता, न ही मनुष्य परमेश्वर के बारे में अपने पुराने ज्ञान को एक नए ज्ञान में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है; इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के जरिए, वह मनुष्य को परमेश्वर से जुड़े ज्ञान तक पहुँचने, अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने और परमेश्वर के लिए जबरदस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का परिवर्तन परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके इरादों के अनुरूप बनने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन दर्शाता है कि मनुष्य को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त करा दिया गया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। आज देहधारी परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति समर्पित हो, और उसकी गवाही दे—मनुष्य को परमेश्वर के व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जानना है, उसे उसके उन सभी वचनों और कार्य के प्रति समर्पण करना है, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उसे उस समस्त कार्य की गवाही देनी है, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और मनुष्य को जीतने के उसके सभी कर्मों की भी गवाही देनी है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही सटीक और व्यावहारिक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय, उसकी ताड़ना, और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। वह अपनी गवाही देने के लिए उनका उपयोग करता है जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य के मुँह से की जाने वाली स्तुति की आवश्यकता नहीं है, न ही उसे शैतान की किस्म के उन लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हैं

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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