4. परमेश्वर के परीक्षणों और शुद्धिकरण के कार्य का महत्व

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

लोगों की कौन-सी आंतरिक अवस्था परीक्षणों का लक्ष्य है? उनका लक्ष्य लोगों के भीतर के विद्रोही स्वभाव हैं, जो उन्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने से रोकते हैं। लोगों के भीतर बहुत सारी अशुद्धियाँ हैं, और बहुत-कुछ पाखंडपूर्ण है, और इसलिए परमेश्वर लोगों को शुद्ध बनाने के लिए उन्हें परीक्षणों का भागी बनाता है। ...

यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते हो, तो तुम परीक्षणों के दौरान निश्चित रूप से गिर जाओगे, क्योंकि तुम इस बात से अनजान हो कि परमेश्वर लोगों को पूर्ण कैसे बनाता है, वह किन साधनों से उन्हें पूर्ण बनाता है, और जब परमेश्वर के परीक्षण तुम्हारे ऊपर आएँगे और वे तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाएँगे तो तुम अडिग नहीं रह पाओगे। परमेश्वर का सच्चा प्रेम उसका संपूर्ण स्वभाव है और जब परमेश्वर का संपूर्ण स्वभाव लोगों को प्रकट होता है तो यह उनकी देह पर क्या लाता है? जब परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव लोगों को प्रकट होता है तो उनकी देह अपरिहार्य रूप से अत्यधिक पीड़ा भुगतेगी। यदि तुम इस पीड़ा को नहीं भुगतते हो तो तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, न ही तुम परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम अर्पित कर पाओगे। यदि परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाता है तो उसे तुम्हारे सामने अपना संपूर्ण स्वभाव प्रकट करना होगा। सृष्टि की रचना के समय से आज तक परमेश्वर ने अपना संपूर्ण स्वभाव मनुष्य को कभी प्रकट नहीं किया है—किंतु अंत के दिनों के दौरान वह इसे लोगों के इस समूह के सामने प्रकट करता है जिसे उसने पूर्वनियत किया और चुना है और लोगों को पूर्ण करके वह अपना स्वभाव प्रकट करता है, जिसके माध्यम से वह लोगों के एक समूह को पूर्ण करता है। लोगों के लिए परमेश्वर का सच्चा प्रेम ऐसा है। परमेश्वर के सच्चे प्रेम को अनुभव करना यह माँग करता है कि लोग अत्यंत पीड़ा सहें और एक ऊँची कीमत चुकाएँ। केवल तभी लोग अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं और आखिरकार परमेश्वर को अपना सच्चा प्रेम वापस दे पाएँगे और केवल तभी परमेश्वर का हृदय संतुष्ट होगा। यदि लोग परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और यदि वे उसकी इच्छा के अनुसार चलना चाहते हैं और यदि वे अपना सच्चा प्रेम पूरी तरह परमेश्वर को सौंपना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी परिस्थितियों से बहुत अधिक पीड़ा और बहुत सारी यंत्रणाओं का अनुभव करना होगा, इस प्रकार उन्हें मृत्यु के कगार पर लाए जाने जैसी पीड़ा भोगनी होगी, जिससे अंततः वे अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को लौटाने के लिए बाध्य होंगे। कोई व्यक्ति परमेश्वर से सचमुच प्रेम करता है कि नहीं यह पीड़ा भोगने और शोधन के दौरान प्रकट होता है। लोगों के प्रेम का परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण भी केवल पीड़ा भोगने और शोधन के जरिए संपन्न होता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है

मनुष्य की दशा और अपने प्रति मनुष्य का रवैया देखकर परमेश्वर ने नया कार्य किया है, जिससे मनुष्य उसके विषय में ज्ञान और उसके प्रति समर्पण दोनों से युक्त हो सकता है, और प्रेम और गवाही दोनों रख सकता है। इसलिए मनुष्य को परमेश्वर के शोधन, और साथ ही उसके न्याय और काट-छाँट का अनुभव अवश्य करना चाहिए, जिसके बिना मनुष्य कभी परमेश्वर को नहीं जानेगा, और कभी वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का शोधन केवल एकतरफा प्रभाव के लिए नहीं होता, बल्कि बहुआयामी प्रभाव की खातिर होता है। इसलिए परमेश्वर उन लोगों पर शोधन का कार्य करता है, जो सत्य खोजने के लिए तैयार हैं, ताकि उनका संकल्प और प्रेम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाए। जो लोग सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं और जो परमेश्वर की लालसा करते हैं, उनके लिए ऐसे शोधन से अधिक अर्थपूर्ण या अधिक सहायक कुछ नहीं है। परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य द्वारा सरलता से समझा-बूझा नहीं जाता। चूँकि परमेश्वर आखिरकार परमेश्वर है और अंततः परमेश्वर के लिए मनुष्य जैसा स्वभाव रखना असंभव है, इसलिए मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्वभाव को समझना सरल नहीं है। सत्य मनुष्य द्वारा अंतर्निहित रूप में धारण नहीं किया जाता, और वह उनके द्वारा सरलता से नहीं समझा जाता, जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं; मनुष्य सत्य से और सत्य को अभ्यास में लाने के संकल्प से रहित है, और यदि वह पीड़ित नहीं होता और उसका शोधन या न्याय नहीं किया जाता, तो उसका संकल्प कभी सफल नहीं किया जाएगा। सभी लोगों के लिए शोधन बेहद कष्टदायी होता है, और उसे स्वीकार करना बहुत कठिन होता है—परंतु शोधन के दौरान ही परमेश्वर मनुष्य के समक्ष अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करता है, मनुष्य से अपनी अपेक्षाएँ स्पष्ट करता है, अधिक प्रबुद्धता प्रदान करता है और अधिक व्यावहारिक काट-छाँट करता है। तथ्यों और सत्य के बीच की तुलना के माध्यम से मनुष्य अपने और सत्य के बारे में बृहत्तर ज्ञान प्राप्त करता है, और उसे परमेश्वर के इरादों की और अधिक समझ प्राप्त होती है, और इस प्रकार उसे परमेश्वर के लिए अधिक सच्चा और अधिक शुद्ध प्रेम प्राप्त होता है। शोधन का कार्य क्रियान्वित करने में परमेश्वर के लक्ष्य ऐसे होते हैं। परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर किए जाने वाले समस्त कार्य के अपने लक्ष्य और महत्व होते हैं; परमेश्वर निरर्थक कार्य नहीं करता और न ही वह ऐसा कार्य करता है जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शोधन का अर्थ लोगों को परमेश्वर के सामने से हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में नष्ट कर देना होता है। बल्कि इसका अर्थ है शोधन के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना, उसके इरादों को बदलना, उसके पुराने विचारों को बदलना, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना और उसके जीने के संपूर्ण तरीके को बदलना। शोधन मनुष्य की व्यावहारिक परीक्षा और व्यावहारिक प्रशिक्षण का एक रूप है; केवल शोधन के दौरान ही उसका प्रेम अपनी अंतर्निहित भूमिका निभा सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल शोधन का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है

जितना अधिक परमेश्वर लोगों का शोधन करता है, लोगों के हृदय उतने ही अधिक परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके हृदय की पीड़ा उनके जीवन के लिए लाभदायक होती है; यह उन्हें परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में अधिक सक्षम बनाती है, परमेश्वर के साथ उनका अधिक निकटता का संबंध हो जाता है और वे परमेश्वर के अथाह प्रेम और उसके अद्भुत उद्धार को बेहतर तरीके से देख पाते हैं। पतरस ने सैकड़ों बार शोधन का अनुभव किया, और अय्यूब कई परीक्षणों से गुजरा। यदि तुम लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाना चाहते हो, तो तुम लोगों को भी सैकड़ों बार शोधन से होकर गुजरना होगा—तुम लोगों को इस प्रक्रिया से गुजरना होगा और इस चरण पर निर्भर रहना होगा—केवल तभी तुम लोग परमेश्वर के इरादों को पूरा कर पाओगे और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाओगे। शोधन वह सर्वोत्तम साधन है, जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, केवल शोधन और कड़वे परीक्षणों के माध्यम से ही लोगों के हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम विकसित हो सकता है। कष्टों के बिना लोगों में परमेश्वर के लिए कोई सच्चा प्रेम नहीं रहता है; यदि भीतर से उनका परीक्षण नहीं किया जाता, और यदि वे सच्चे शोधन के भागी नहीं बनाए जाते, तो उनके हृदय हमेशा बाहर ही भटकते रहेंगे। एक निश्चित बिंदु तक शोधन किए जाने के बाद तुम अपनी स्वयं की निर्बलताएँ और कठिनाइयाँ देखोगे, तुम देखोगे कि तुममें कितनी कमी है और तुम उन अनेक कठिनाइयों पर काबू पाने में असमर्थ हो जिनका तुम सामना करते हो और तुम देखोगे कि तुमने बहुत अधिक विद्रोह किया है। केवल परीक्षणों के दौरान ही लोग अपनी वास्तविक दशाओं को सचमुच जान पाते हैं; परीक्षण लोगों को पूर्ण बनाने में अधिक सक्षम होते हैं।

अपने जीवनकाल में पतरस ने सैकड़ों बार शोधन का अनुभव किया और वह बहुत-सी कष्टदायक तपन से होकर गुजरा। यह शोधन परमेश्वर के लिए उसके सर्वोच्च प्रेम की नींव बन गया और उसके संपूर्ण जीवन का सबसे अर्थपूर्ण अनुभव हो गया। वह परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखने में समर्थ हो पाया, एक अर्थ में यह परमेश्वर से प्रेम करने के उसके संकल्प के कारण था परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह उस शोधन और पीड़ा के कारण था, जिससे होकर वह गुजरा। यह पीड़ा परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर उसकी मार्गदर्शक बन गई और ऐसी चीज बन गई जो उसके लिए सबसे अधिक यादगार थी। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करते हुए शोधन की पीड़ा से नहीं गुजरते तो उनका प्रेम अशुद्धियों और अपनी स्वयं की पसंद से भरा होता है; ऐसा प्रेम शैतान के विचारों से भरा होता है और मूलतः परमेश्वर के इरादे पूरे करने में असमर्थ होता है। परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प रखना परमेश्वर से सच में प्रेम करने के समान नहीं है। भले ही वे अपने दिलों में जो सोचते हैं, वह सब परमेश्वर से प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने की खातिर ही होता हो—वह किसी मानवीय विचार से रहित प्रतीत होता है, ऐसा प्रतीत होता है कि सब परमेश्वर की खातिर है—फिर भी जब परमेश्वर से प्रेम करने का ऐसा अभ्यास उसके सामने लाया जाता है तो वह उसे स्वीकृति या आशीष नहीं देता। भले ही लोग समस्त सत्यों को पूरी तरह से समझ लें और जान जाएँ तो भी इसे परमेश्वर से प्रेम करने की निशानी नहीं कहा जा सकता, यह नहीं कहा जा सकता कि इन लोगों में परमेश्वर से प्रेम करने की वास्तविकता है। शोधन से गुजरे बिना अनेक सत्यों को समझ लेने के बावजूद लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हैं; केवल शोधन के दौरान ही लोग इन सत्यों का वास्तविक अर्थ समझ सकते हैं, केवल तभी लोग वास्तव में उनके आंतरिक अर्थ का अनुभव कर सकते हैं। उस समय जब वे इन सत्यों का अभ्यास करते हैं, तब वे ऐसा सटीकता से और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप कर पाने में समर्थ होते हैं; उस समय उनके अभ्यास में उनके अपने विचार कम हो जाते हैं, उनकी भ्रष्टता घट जाती है और उनकी मानवीय भावनाएँ कम हो जाती हैं। केवल उसी समय उनका अभ्यास परमेश्वर के प्रति प्रेम की सच्ची अभिव्यक्ति होता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल शोधन का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है

जब परमेश्वर मनुष्य का शोधन करने के लिए काम करता है, तो मनुष्य कष्ट सहता है। किसी व्यक्ति का शोधन जितना अधिक होता है, उसका परमेश्वर-प्रेमी दिल उतना ही बड़ा होगा और उसमें परमेश्वर का महान सामर्थ्य उतना ही अधिक प्रकट होगा। इसके विपरीत, किसी व्यक्ति का शोधन जितना कम होता है, उसका परमेश्वर-प्रेमी दिल उतना ही छोटा होगा और उसमें परमेश्वर का महान सामर्थ्य उतना ही कम प्रकट होगा। किसी व्यक्ति का शोधन और दर्द जितना अधिक होता है और वह जितनी अधिक पीड़ा का अनुभव करता है, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना ही गहरा होता जाएगा, परमेश्वर में उसकी आस्था उतनी ही अधिक सच्ची होती जाएगी और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता जाएगा। अपने अनुभवों में, तुम देखोगे कि जो लोग अत्यंत शोधन और कष्ट से गुजरते हैं, जिनकी बहुत अधिक काट-छाँट की जाती है और जिन्हें बहुत अधिक अनुशासित किया जाता है, उनमें परमेश्वर के लिए एक गहरा प्रेम और परमेश्वर का एक अधिक गहरा और संपूर्ण ज्ञान होता है। जिन लोगों ने काट-छाँट किए जाने का अनुभव नहीं किया है, उनके पास केवल सतही ज्ञान होता है। वे केवल यह कह सकते हैं, “परमेश्वर बहुत अच्छा है, वह लोगों को अनुग्रह देता है ताकि वे उसका आनंद ले सकें।” यदि उन्होंने काट-छाँट किए जाने और अनुशासित किए जाने का अनुभव किया है, तो वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान के बारे में बात करने में सक्षम होते हैं। इसलिए परमेश्वर का कार्य मनुष्य पर जितना अधिक अद्भुत होता है, वह उतना ही अधिक मूल्यवान और महत्वपूर्ण होता है। यह तुम्हारे लिए जितना अधिक अबूझ होता है और तुम्हारी धारणाओं के साथ जितना अधिक असंगत होता है, परमेश्वर का कार्य तुम्हें उतना ही अधिक जीतने, तुम्हें प्राप्त करने और तुम्हें पूर्ण बनाने में सक्षम होता है। परमेश्वर के कार्य का महत्व कितना अधिक है! यदि परमेश्वर मनुष्य का इस तरह शोधन न करे, यदि वह इस पद्धति के अनुसार कार्य न करे, तो उसका कार्य निष्प्रभावी और महत्वहीन होगा। अतीत में जिसका उल्लेख किया गया था, उसका असाधारण महत्व इसी में निहित है—परमेश्वर द्वारा इस समूह को चुनना और प्राप्त करना और अंत के दिनों में उसे पूर्ण करना। वह तुम लोगों पर जितना बड़ा कार्य करता है, परमेश्वर के प्रति तुम लोगों का प्रेम उतना ही ज्यादा गहरा एवं शुद्ध होता है। परमेश्वर का कार्य जितना बड़ा होता है, उतना ही अधिक मनुष्य उसकी बुद्धि के बारे में कुछ समझ पाता है और उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा

परमेश्वर मनुष्य को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं में पूर्ण बना सकता है। यह इस पर निर्भर करता है कि तुम अनुभव करने में सक्षम हो या नहीं, और तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए प्रयास करते हो या नहीं। यदि तुम सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करते हो, तो नकारात्मक पहलू तुम्हारी हानि नहीं कर सकता, बल्कि तुम्हारे लिए अधिक वास्तविक चीजें ला सकता है, तुम्हें यह जानने में और अधिक सक्षम कर सकता है कि तुम्हारे भीतर क्या कमी है, अपनी वास्तविक दशा को समझने में अधिक सक्षम बना सकता है और यह देखने में भी कि मनुष्य के पास कुछ नहीं है और मनुष्य कुछ नहीं है; यदि तुम परीक्षण अनुभव नहीं करते, तो तुम नहीं जानते, और तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि तुम दूसरों से ऊपर हो और प्रत्येक व्यक्ति से बेहतर हो। इस सबके द्वारा तुम देखोगे कि जो कुछ पहले घटित हुआ था, वह सब परमेश्वर द्वारा किया गया था और सुरक्षित रखा गया था। परीक्षणों में प्रवेश तुम्हें प्रेम या आस्था से रहित बना देता है, तुममें प्रार्थना की कमी होती है और तुम भजन गाने में असमर्थ होते हो और इसे जाने बिना ही तुम इसके मध्य स्वयं को जान लेते हो। परमेश्वर के पास मनुष्य को पूर्ण बनाने के अनेक साधन हैं। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों की काट-छाँट करने के लिए परमेश्वर समस्त प्रकार के परिवेशों का उपयोग करता है और मनुष्य को बेनकाब करने के लिए विभिन्न चीजों का उपयोग करता है; एक ओर वह मनुष्य की काट-छाँट करता है, दूसरी ओर वह मनुष्य को बेनकाब करता है और तीसरी ओर वह मनुष्य को उजागर करता है, उसके हृदय की गहराइयों में स्थित “रहस्यों” को खोदकर निकालता है, उजागर करता है और मनुष्य की अनेक दशाओं को उजागर करके उसकी प्रकृति दिखाता है। परमेश्वर मनुष्य को अनेक विधियों से पूर्ण बनाता है—प्रकाशन द्वारा, मनुष्य की काट-छाँट करके, मनुष्य के शोधन द्वारा और ताड़ना द्वारा—जिससे मनुष्य जान सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं

परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग भविष्य के लिए आशीष पाने का अनुसरण करते हैं; यही उनके विश्वास का लक्ष्‍य होता है। सभी लोगों की यही मंशा और आशा होती है, लेकिन उनकी प्रकृति की भ्रष्टता का समाधान परीक्षणों और शोधन के माध्यम से अवश्य किया जाना चाहिए। लोग जिन-जिन पहलुओं में शुद्ध नहीं हैं और अभी भी भ्रष्टता दिखाते हैं उन पहलुओं में उनका शोधन अवश्य किया जाना चाहिए—यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर तुम्हारे लिए परिवेशों का इंतजाम करता है, तुम्हें उनमें शोधन से गुजरने के लिए बाध्य करता है, ताकि तुम अपनी भ्रष्टता को जान जाओ। अंततः तुम उस मुकाम पर पहुँच जाते हो जहाँ तुम अपने मंसूबों और इच्छाओं को छोड़ने और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करने के इच्छुक होते हो, भले ही इसका मतलब मृत्यु हो। इसलिए अगर लोग कई वर्षों के शोधन से न गुजरें, अगर वे एक निश्चित मात्रा में कष्ट नहीं सहते हैं, तो वे अपनी सोच और अपने दिलों में देह की भ्रष्टता के बंधनों से मुक्त नहीं हो पाएंगे। जिन किन्हीं पहलुओं में लोग अभी भी अपनी शैतानी प्रकृति के बंधनों में जकड़े हैं और जिन भी पहलुओं में उनकी अपनी इच्छाएँ और माँगें बची हैं, उन्हीं पहलुओं में उन्हें कष्ट उठाना चाहिए। केवल कष्ट झेलकर ही लोग सबक सीख सकते हैं, जिसका अर्थ है कि वे सत्य प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर के इरादों को समझ सकते हैं। वास्तव में, बहुत-से सत्य कष्ट और परीक्षणों का अनुभव करके समझ में आते हैं। कोई भी व्यक्ति आरामदायक और सहज परिवेश में या अनुकूल परिस्थितियों में परमेश्वर के इरादों को नहीं समझ सकता है, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को नहीं जान सकता है, या परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का एहसास नहीं कर सकता है। यह असंभव होगा!

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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