5. बचाए जाने एवं सिद्ध बनाए जाने के लिए तुम्हें परमेश्वर पर किस प्रकार विश्वास करना चाहिए?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
सटीक रूप से, अपने विश्वास में पतरस के मार्ग को अपनाने का अर्थ है, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, जो वास्तव में स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कैसे पतरस के मार्ग पर चलना है साथ ही कैसे इसे अभ्यास में लाना है। पहले तो, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित प्रयासों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीजों को एक ओर रखना होगा। एक व्यक्ति को पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों में सत्य और उसकी आकांक्षाओं की खोज पर अवश्य ध्यान केंद्रित करना चाहिए, और हर चीज में परमेश्वर के इरादों को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और प्राणाधार पद्धति है। यह वही था जो पतरस ने यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर के वचन के प्रति हार्दिक समर्पण में मुख्यतः परमेश्वर के वचनों में सत्य और उसके आकांक्षाओं की खोज करना, परमेश्वर के इरादों को समझने पर ध्यान केंद्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना व और अधिक प्राप्त करना शामिल है। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धर्म-विद्या का ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था। इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर के इरादों पर पकड़ बनाने पर, साथ ही परमेश्वर के स्वभाव और मनोहरता का ज्ञान प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट दशाओं, मनुष्य के प्रकृति सार और मनुष्य की वास्तविक कमियों को जानने का भी प्रयास किया। केवल इसी तरीके से वह परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उसकी अपेक्षाओं को आसानी से पूरा कर सकता था। जब परमेश्वर के वचनों की बात आती थी तो पतरस के पास बहुत-से सटीक अभ्यास थे। यह परमेश्वर के इरादों के सर्वाधिक अनुरूप था, और यह वो सर्वोत्तम तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता था। परमेश्वर के भेजे हुए सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय पतरस मनुष्य का न्याय और उसे उजागर करने वाले परमेश्वर के हर वचन और मनुष्य से उसकी माँगों के हर वचन से सख्ती से अपना मिलान करता था, स्वयं को जाँचता था और परमेश्वर के वचनों का अर्थ ठीक-ठीक समझने का प्रयास करता था। यीशु उससे जो कुछ कहता था, उस पर वह गंभीरता से मनन करता था, हर वचन को मन में दृढ़ता से धारण करता था—और इस तरीके से बहुत अच्छे परिणाम मिलते थे। इस तरीके से अभ्यास कर उसने परमेश्वर के वचनों के जरिए स्वयं को जान लिया और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट दशाओं और कमियों को जान गया, बल्कि वह मनुष्य के सार और प्रकृति को भी जान गया। खुद को वास्तव में जानना यही होता है। परमेश्वर के वचनों से पतरस ने एक ओर अपने बारे में सच्चा ज्ञान हासिल किया और दूसरी ओर उसने देखा परमेश्वर द्वारा व्यक्त धार्मिक स्वभाव, जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, परमेश्वर के अपने कार्य के लिए इरादे और मानवजाति से परमेश्वर की माँगें। इन वचनों से उसने परमेश्वर को सच में जाना, उसका स्वभाव और उसका सार उसे पता चला; जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, वे बातें उसने जानीं और समझीं, साथ ही परमेश्वर की मनोहरता और मनुष्य से परमेश्वर की माँगें भी जानीं। भले ही परमेश्वर ने उस समय उतना नहीं बोला, जितना आज वह बोलता है, किन्तु पतरस में इन पहलुओं में परिणाम उत्पन्न हुआ था। यह एक दुर्लभ और बहुमूल्य चीज थी। पतरस सैकड़ों परीक्षणों से गुजरा; उसका कष्ट सहना व्यर्थ नहीं गया। न केवल उसने परमेश्वर के वचनों और कार्यों से स्वयं को जाना बल्कि उसने परमेश्वर को भी जान लिया। इसके साथ ही, परमेश्वर के वचनों में पतरस ने विशेष रूप से मनुष्य से परमेश्वर की माँगों पर और उन पहलुओं पर ध्यान दिया जिनमें मनुष्य को परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए ताकि वह परमेश्वर के इरादे के अनुसार हो सके, और वह इन बातों में अत्यधिक प्रयास लगाने में समर्थ रहा और उनमें उसे पूरी स्पष्टता प्राप्त हुई। उसके जीवन प्रवेश के लिए यह अत्यंत लाभकारी था। परमेश्वर के वचनों का चाहे कोई भी पहलू हो, अगर वे वचन जीवन के रूप में कार्य करने योग्य थे और सत्य थे, तो पतरस उन्हें अपने हृदय में उकेर लेता था, जहाँ वह अक्सर उन पर विचार करता और उन्हें समझता था। यीशु के वचनों को सुनकर, वह उन्हें अपने हृदय में उतार सका, जिससे पता चलता है कि उसका ध्यान विशेष रूप से परमेश्वर के वचनों पर ही था, और अंत में उसने वास्तव में परिणाम प्राप्त कर लिए। अर्थात्, वह परमेश्वर के वचनों को कुशलतापूर्वक अभ्यास में ला सका, वह सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य सटीक ढंग से कर सका, वह पूरी तरह परमेश्वर की इच्छाओं के अनुसार कार्य कर सका और अपने निजी मतों और कल्पनाओं का त्याग कर सका। इस तरीके से पतरस ने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश किया। पतरस की सेवा परमेश्वर के इरादों के अनुसार मुख्यतः इसीलिए थी क्योंकि उसने ऐसा किया था।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें
परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की कोशिश करने के लिए, व्यक्ति को पहले यह समझना होगा कि परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अर्थ क्या होता है, साथ ही, परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए किन शर्तों को पूरा करना होता है। एक बार जब इंसान ऐसे मामलों को समझ लेता है, तब उसे अभ्यास का मार्ग खोजना ही चाहिए। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए व्यक्ति में एक विशिष्ट स्तर की काबिलियत होनी चाहिए। बहुत-से लोग स्वाभाविक रूप से उच्च काबिलियत वाले नहीं होते, ऐसी स्थिति में तुम्हें कीमत चुकानी चाहिए और स्वयं कड़ी मेहनत करनी चाहिए। तुम्हारी काबिलियत जितनी कम होगी, तुम्हें स्वयं उतना ही अधिक प्रयास करना पड़ेगा। परमेश्वर के वचनों की तुम्हारी समझ जितनी अधिक होगी और जितना अधिक तुम उन्हें अभ्यास में लाओगे, उतनी ही जल्दी तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के पथ पर कदम रख सकते हो। प्रार्थना करने से, तुम प्रार्थना के दौरान पूर्ण बनाए जा सकते हो; परमेश्वर के वचनों को खाने एवं पीने से, उनके सार को समझने और उनकी वास्तविकता को जीने से भी तुम्हें पूर्ण बनाया जा सकता है। दैनिक आधार पर परमेश्वर के वचनों का अनुभव करके, तुम्हें यह जान लेना चाहिए कि तुममें किस बात की कमी है, इससे भी बढ़कर, तुम्हें अपने घातक दोष एवं कमजोरियों को पहचान लेना चाहिए और परमेश्वर से प्रार्थना और विनती करनी चाहिए। ऐसा करके, तुम्हें धीरे-धीरे पूर्ण बनाया जाएगा। पूर्ण बनाए जाने का रास्ता है : प्रार्थना करना, परमेश्वर के वचनों को खाना एवं पीना, परमेश्वर के वचनों के सार को समझना; परमेश्वर के वचनों के अनुभव में प्रवेश करना; तुममें जिस बात की कमी है उसे जानना; परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित होना; परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील होना और अपने परमेश्वर-प्रेमी हृदय द्वारा देह के खिलाफ विद्रोह करना; और अपने भाई-बहनों के साथ निरंतर संगति में शामिल होना, जो तुम्हारे अनुभवों को समृद्ध करता है। चाहे तुम्हारा सामुदायिक जीवन हो या व्यक्तिगत जीवन, और चाहे बड़ी सभाएँ हों या छोटी हों, वे सभी तुम्हें अनुभव प्राप्त करने, प्रशिक्षण प्राप्त करने दे सकते हैं और तुम्हारे दिल को परमेश्वर के सामने शांत रहने और उसकी ओर मुड़ने में सक्षम बना सकते हैं। यह सब कुछ पूर्ण बनाए जाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का अर्थ, जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, वास्तव में व्यक्तिगत रूप से उनका अनुभव करने में सक्षम होना और स्वयं को उन्हें जीने देना है—ताकि तुम परमेश्वर के लिए अधिक आस्था और प्रेम प्राप्त कर सको—और ऐसा करके धीरे-धीरे अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को उतार फेंक सको, अपने अनुचित इरादों को त्याग सको और एक सामान्य व्यक्ति के समान जीवन जी सको। तुम्हारे भीतर परमेश्वर के लिए अधिकाधिक प्रेम होगा—कहने का तात्पर्य यह है कि तुम्हारे ऐसे हिस्से अधिकाधिक होंगे जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है और फिर तुम्हारे वे हिस्से जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं, कम से कम होते जाएँगे। अपने व्यावहारिक अनुभवों के जरिए, तुम धीरे-धीरे पूर्ण बनाए जाने के पथ पर कदम रखोगे। इसलिए, यदि तुम पूर्ण बनाए जाना चाहते हो, तो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना और उसके वचनों का अनुभव करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहो
यदि तुम परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास करते हो, तो तुम्हें यह मानना होगा कि जो चीजें हर दिन घटित होती हैं, चाहे वे अच्छी हों या बुरी, वे यूँ ही नहीं होती हैं। ऐसा नहीं है कि कोई जानबूझकर तुम पर सख्त हो रहा है या तुम पर निशाना साध रहा है; यह सब परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित और आयोजित है। परमेश्वर इन चीजों की योजना क्यों बनाता है? तुम कौन हो यह उजागर करने या तुम्हें प्रकट करके हटा देने के लिए नहीं है; तुम्हें प्रकट करना अंतिम लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य तुम्हें पूर्ण बनाना और बचाना है। परमेश्वर तुम्हें पूर्ण कैसे बनाता है? और वह तुम्हें कैसे बचाता है? वह तुम्हें तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों से अवगत कराने और तुम्हें तुम्हारा प्रकृति सार, तुम्हारी कमियाँ और तुम्हारा अभाव ज्ञात कराने से शुरुआत करता है। उन्हें समझकर और जानकर ही तुम सत्य का अनुसरण कर सकते हो और धीरे-धीरे अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ सकते हो। यह परमेश्वर का तुम्हें एक अवसर प्रदान करना है। यह परमेश्वर की दया है। तुम्हें इस अवसर का लाभ उठाना आना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के प्रति प्रतिरोधी नहीं होना चाहिए, उसके प्रति अवज्ञाकारी नहीं होना चाहिए या उसे गलत नहीं समझना चाहिए। विशेष रूप से उन लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करते समय, जिनकी परमेश्वर तुम्हारे आसपास व्यवस्था करता है, लगातार यह महसूस मत करो कि वे वैसी नहीं हैं जैसी तुम चाहते हो, हमेशा उनसे बच निकलने की मत सोचो या परमेश्वर के बारे में शिकायत मत करो या उसे गलत मत समझो। अगर तुम लगातार ऐसा कर रहे हो तो तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर रहे हो और इससे तुम्हारे लिए सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। चाहे तुम्हारा ऐसी किसी भी चीज से सामना हो जिसे तुम पूरी तरह समझ न पाओ या जो तुम्हें कठिन लगे, तुम्हें समर्पण करना सीखना चाहिए। तुम्हें पहले परमेश्वर के सामने आकर और अधिक प्रार्थना करनी चाहिए। इस तरह, इससे पहले कि तुम जान पाओ, तुम्हारी आंतरिक अवस्था में एक बदलाव आएगा और तुम समस्या हल करने के लिए सत्य की तलाश कर पाओगे। इस तरह तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर पाओगे। जब ऐसा होगा तो तुम्हारे भीतर सत्य वास्तविकता गढ़ी जाएगी, और इस तरह से तुम प्रगति करोगे और तुम्हारे जीवन की अवस्था का रूपांतरण होगा। एक बार जब तुम इस बदलाव से गुजर चुको और तुममें यह सत्य वास्तविकता आ जाए, तब तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा, और जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा, तब जीवन होगा। यदि कोई हमेशा शैतानी भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर जीता है, तो फिर चाहे उसमें कितना भी उत्साह या प्रबल प्रेरणा हो, यह नहीं माना जा सकता कि उसके पास आध्यात्मिक कद या जीवन है। जब परमेश्वर हर व्यक्ति में कार्य करता है, भले ही उसकी विधि कुछ भी हो, सेवा करने के लिए वो किस प्रकार के लोगों, घटनाओं या चीज़ों का प्रयोग करता है, या उसकी बातों का लहजा कैसा है, परमेश्वर का केवल एक ही अंतिम लक्ष्य होता है : तुम्हें बचाना। और वह तुम्हें कैसे बचाता है? तुम्हें बदलकर। तो तुम थोड़ी-बहुत पीड़ा कैसे नहीं सह सकते? तुम्हें थोड़ी-बहुत पीड़ा तो सहनी ही होगी। इस पीड़ा में कई चीजें शामिल हो सकती हैं। पहले, जब लोग परमेश्वर के वचनों का न्याय और ताड़ना स्वीकारते हैं, तो उन्हें कष्ट होता है। जब परमेश्वर के वचन बहुत कठोर और स्पष्ट होते हैं तब लोग परमेश्वर को गलत समझ लेते हैं, यहाँ तक कि वे धारणाएँ भी विकसित कर लेते हैं और उन्हें थोड़ा-बहुत कष्ट भी होता है। कभी-कभी परमेश्वर लोगों की भ्रष्टता प्रकट करने के लिए और उनसे आत्मचिंतन और आत्मज्ञान करवाने के लिए उनके आसपास एक परिवेश बना देता है और तब उन्हें थोड़ा कष्ट भी होता है। कई बार जब लोगों की सीधे काट-छाँट कर उन्हें उजागर किया जाता है, तब वे कष्ट सहते हैं। भ्रष्ट स्वभाव हल करना सर्जरी कराने जैसा ही है—बिना कष्ट सहे तुम कोई परिणाम नहीं पा सकते। यदि हर बार जब तुम्हारी काट-छाँट की जाती है और हर बार जब तुम किसी परिवेश द्वारा प्रकट किए जाते हो, यह तुम्हारे हृदय को झकझोरता है और तुम्हें बढ़ावा देता है, तुम्हें सत्य खोजने और आत्मचिंतन करने, अपनी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता जानने और परमेश्वर के सामने सच में पश्चात्ताप करने के लिए प्रेरित करता है—यदि तुम इस तरह से चीजों को अनुभव करते हो तो तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश करोगे और तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य प्राप्त करने के लिए अपने आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों से सबक सीखना चाहिए
परमेश्वर में अपने विश्वास में, पतरस ने प्रत्येक चीज में परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास किया और उस सबके प्रति समर्पण करने का प्रयास किया जो परमेश्वर से आया था। वह ताड़ना और न्याय के साथ ही शोधन, क्लेश और अपने जीवन में भौतिक वस्तुओं का अभाव स्वीकार कर पाया और उसने एक भी शिकायत नहीं की। इसमें से कुछ भी उसके परमेश्वर-प्रेमी हृदय को नहीं बदल सका। क्या यह परमेश्वर के प्रति परम प्रेम नहीं था? क्या यह सृजित प्राणी के कर्तव्य का अच्छे से निर्वहन नहीं था? चाहे यह ताड़ना में हो, न्याय में हो, या क्लेश में हो, तुम मृत्युपर्यंत समर्पण प्राप्त करने में सक्षम हो, और यह वह है जो सृजित प्राणी को प्राप्त करना चाहिए, यह परमेश्वर के प्रति प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इस हद तक प्राप्त कर सकता है, तो वह मानक स्तर का सृजित प्राणी है, और सृष्टिकर्ता के इरादों को पूरा करने के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है
यदि लोग जीवित प्राणी बनना, परमेश्वर की गवाही देना और परमेश्वर द्वारा योग्य समझा जाना चाहते हैं तो उन्हें परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करना चाहिए; उन्हें सहर्ष उसके न्याय व ताड़ना के प्रति समर्पण करना चाहिए और परमेश्वर द्वारा काट-छाँट को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। तभी वे परमेश्वर द्वारा अपेक्षित तमाम सत्यों को अभ्यास में ला सकेंगे, तभी वे परमेश्वर का उद्धारकारी अनुग्रह प्राप्त करेंगे और सचमुच जीवित प्राणी बनेंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?
वे लोग जिनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी समर्पण नहीं है, जो केवल उसका नाम स्वीकारते हैं, जिन्हें परमेश्वर की सुलभता और मनोहरता का कुछ-कुछ आभास है, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कदमों के साथ तालमेल बनाकर नहीं चलते और पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य एवं वचनों के प्रति समर्पण नहीं करते—ऐसे लोग परमेश्वर के अनुग्रह में रहते हैं और उसके द्वारा प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं या पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं। परमेश्वर लोगों को उनके समर्पण, परमेश्वर के वचनों को उनके खाने-पीने, उनका आनन्द उठाने और उनके जीवन में कष्ट एवं शोधन के माध्यम से पूर्ण बनाता है। ऐसे विश्वास से ही लोगों का स्वभाव परिवर्तित हो सकता है और तभी उन्हें परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हो सकता है। परमेश्वर के अनुग्रह के बीच रहकर सन्तुष्ट न हो जाना, सत्य के लिए सक्रियता से लालायित होना और इसे खोजना और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने का अनुसरण करना—यही सचेत होकर परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का अर्थ है और ठीक इसी प्रकार की आस्था वह चाहता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर में अपनी आस्था में तुम्हें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए