7. परमेश्वर के कार्य के तीन चरण किस तरह क्रमशः गहनतर होते जाते हैं ताकि लोगों को बचाया जा सके और उन्हें परिपूर्ण किया जा सके?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन तीन चरणों में विभाजित है और प्रत्येक चरण में मनुष्य से यथोचित अपेक्षाएँ की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, जैसे-जैसे युग बीतते और आगे बढ़ते जाते हैं, समस्त मानवजाति से परमेश्वर की अपेक्षाएँ और अधिक ऊँची होती जाती हैं। इस प्रकार, कदम-दर-कदम परमेश्वर का प्रबंधन का यह कार्य अपने चरम पर पहुँचता जाता है, जब तक कि मनुष्य “वचन का देह में प्रकट होना” नहीं देख लेता, और इस तरह मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ अधिक ऊँची हो जाती हैं, साथ ही वह गवाही भी ऊँची हो जाती है जिसे देने की अपेक्षा मनुष्य से की जाती है। मनुष्य परमेश्वर के साथ वास्तव में सहयोग करने में जितना अधिक सक्षम होता है, उतना ही अधिक परमेश्वर महिमा प्राप्त करता है। मनुष्य का सहयोग वह गवाही है, जिसे देने की उससे अपेक्षा की जाती है, और जो गवाही वह देता है, वह मनुष्य का अभ्यास है। इसलिए, परमेश्वर के कार्य का उचित प्रभाव हो सकता है या नहीं, और सच्ची गवाही हो सकती है या नहीं, ये अटूट रूप से मनुष्य के सहयोग और गवाही से जुड़े हुए हैं। जब कार्य समाप्त हो जाएगा, अर्थात् जब परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन अपनी समाप्ति पर पहुँच जाएगा, तो मनुष्य से अधिक ऊँची गवाही देने की अपेक्षा की जाएगी, और जब परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुँच जाएगा, तब मनुष्य का अभ्यास और प्रवेश अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाएँगे। अतीत में मनुष्य से व्यवस्था और आज्ञाओं का पालन करना अपेक्षित था, और उससे धैर्यवान और विनम्र बनने की अपेक्षा की जाती थी। आज मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह परमेश्वर के समस्त प्रबंधन के प्रति समर्पण करे और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखे, और अंततः उससे अपेक्षा की जाती है कि वह क्लेश के बीच भी परमेश्वर से प्रेम करे। ये तीन चरण वे अपेक्षाएँ हैं, जो परमेश्वर अपने संपूर्ण प्रबंधन के दौरान कदम-दर-कदम मनुष्य से करता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण की तुलना में अधिक गहरे जाता है, और प्रत्येक चरण में मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाएँ पिछले चरण की तुलना में और अधिक ऊँची होती हैं, और इस तरह परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन धीरे-धीरे आकार लेता है। इसका कारण ठीक यह है कि मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ हमेशा इतनी ऊँची होती है कि मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के निरंतर अधिक नजदीक आ जाता है, और केवल तभी संपूर्ण मानवजाति धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव से अलग होना शुरू करती है; जब तक परमेश्वर का कार्य पूर्ण समाप्ति पर आएगा, संपूर्ण मानवजाति शैतान के प्रभाव से बचा ली गई होगी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास
परमेश्वर का प्रबंधन-कार्य संसार की उत्पत्ति से प्रारंभ हुआ, और मनुष्य इस कार्य के केंद्र में है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि मनुष्य के लिए ही है। चूँकि उसके प्रबंधन का कार्य हज़ारों सालों में फैला हुआ है, और वह केवल एक ही मिनट या सेकंड के अंतराल में या पलक झपकते या एक या दो सालों में पूरा नहीं होता, इसलिए उसे मनुष्य के अस्तित्व के लिए आवश्यक और अधिक चीज़ों का सृजन करना पड़ा, जैसे कि सूर्य, चंद्रमा, सभी प्रकार के जीव, भोजन और एक अनुकूल पर्यावरण। यह परमेश्वर के प्रबंधन का प्रारंभ था।
इसके बाद परमेश्वर ने मनुष्य को शैतान के हाथों में सौंप दिया, और मनुष्य शैतान की सत्ता के अधीन रहने लगा, जिसने धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रथम युग के कार्य की शुरुआत की : व्यवस्था के युग की कहानी...। व्यवस्था के युग के दौरान कई हज़ार सालों में, मानवजाति व्यवस्था के युग के मार्गदर्शन की आदी हो गई और उसे हलके में लेने लगी। धीरे-धीरे मनुष्य ने परमेश्वर की देखभाल छोड़ दी। और इसलिए, व्यवस्था का अनुसरण करते हुए लोग मूर्तिपूजा और बुरे कर्म भी करने लगे। वे यहोवा की सुरक्षा से वंचित थे और केवल मंदिर की वेदी के सामने अपना जीवनयापन कर रहे थे। वास्तव में, परमेश्वर का कार्य उन्हें बहुत पहले छोड़ चुका था, और हालाँकि इस्राएली अभी भी व्यवस्था से चिपके हुए थे और यहोवा का नाम लेते थे, यहाँ तक कि गर्व से विश्वास करते थे कि केवल वे ही यहोवा के लोग हैं और वे यहोवा के चुने हुए हैं, किंतु परमेश्वर की महिमा ने उन्हें चुपके से त्याग दिया था ...
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जैसा कि हमेशा से होता आया है, व्यवस्था के युग में यहोवा के कार्य के बाद परमेश्वर ने दूसरे चरण का अपना कार्य प्रारंभ किया : देह धारण कर—दस, बीस साल के लिए मनुष्य के समान देह में आकर—विश्वासियों के बीच बोलते और अपना कार्य करते हुए उसने ऐसा किया। फिर भी बिना किसी अपवाद के, कोई भी यह बात नहीं जान पाया और प्रभु यीशु को सलीब पर लटकाए जाने और उसके पुनर्जीवित होने के बाद बहुत थोड़े-से लोगों ने ही माना कि वह देहधारी परमेश्वर था। ... जैसे ही परमेश्वर के कार्य का दूसरा चरण पूरा हुआ—सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद—मनुष्य को पाप से बचाने (अर्थात मनुष्य को शैतान के हाथों से छुड़ाने) का परमेश्वर का कार्य संपन्न हो गया। और इसलिए, उस क्षण के बाद से, मानवजाति को केवल प्रभु यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना था, और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते। मोटे तौर पर, मनुष्य के पाप अब उसके द्वारा उद्धार प्राप्त करने और परमेश्वर के सामने आने में बाधक नहीं रहे थे और न ही शैतान द्वारा मनुष्य को दोषी ठहराने का कारण रह गए थे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर स्वयं ने व्यावहारिक कार्य किया था, उसने पापमय देह के समान बनकर उसका अनुभव किया था, और परमेश्वर स्वयं ही पापबलि था। इस प्रकार, मनुष्य सलीब से उतर गया, परमेश्वर के देह—इस पापमय देह की समानता के जरिये छुड़ा और बचा लिया गया। और इसलिए, शैतान द्वारा बंदी बना लिए जाने के बाद, मनुष्य परमेश्वर के सामने उसका उद्धार स्वीकार करने के एक कदम और पास आ गया। बेशक, कार्य का यह चरण व्यवस्था के युग में परमेश्वर के प्रबंधन से अधिक गहन और अधिक विकसित था।
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और फिर राज्य का युग आया, जो कार्य का अधिक व्यावहारिक चरण है, और फिर भी जिसे स्वीकार करना मनुष्य के लिए सबसे कठिन भी है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जितना अधिक मनुष्य परमेश्वर के नज़दीक आता है, परमेश्वर की छड़ी उसके उतने ही करीब पहुँचती है और परमेश्वर का चेहरा उतनी ही अधिक स्पष्टता से मनुष्य के सामने प्रकट हो जाता है। मानवजाति के छुटकारे के बाद मनुष्य औपचारिक रूप से परमेश्वर के परिवार में लौट आता है। मनुष्य ने सोचा कि अब आनंद का समय आया है, किंतु परमेश्वर द्वारा उसे ऐसे पुरज़ोर आक्रमण का भागी बनाया जाता है, जैसा कभी किसी ने अनुमान नहीं लगाया होगा : होता यह है कि, यह एक बपतिस्मा है, जिसका परमेश्वर के लोगों को “आनंद” लेना है। इस प्रकार के व्यवहार के अंतर्गत, लोगों के पास ठहरकर स्वयं के बारे में यह सोचने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता, “मैं, कई सालों तक खोया हुआ वह मेमना हूँ, जिसे वापस पाने के लिए परमेश्वर ने कितना कुछ खर्च किया है, फिर परमेश्वर मुझसे ऐसा व्यवहार क्यों करता है? क्या यह परमेश्वर का मुझपर हँसने और मुझे उजागर करने का तरीका है? ...” वर्षों के अनुभवों के बाद, शोधन और ताड़ना के कष्टों से गुजरते हुए मनुष्य तपकर मजबूत हो गया है। वैसे तो मनुष्य बीते समय की “महिमा” और “रोमांस” खो चुका है, लेकिन अनजाने में ही वह मानवीय आचरण के सिद्धांतों और इतने वर्षों से मानवजाति को बचाने में परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को समझ गया है। धीरे-धीरे, मनुष्य अपनी बर्बरता से, इस बात से कि उसे काबू में करना कितना मुश्किल है, परमेश्वर के बारे में अपनी सभी गलतफहमियों से और परमेश्वर से उसने जो अत्यधिक माँगें की हैं उनसे नफरत करने लगता है। गुजरा समय वापस नहीं लाया जा सकता। बीती हुई घटनाएँ ऐसी यादें बन जाती हैं जिनके लिए मनुष्य पश्चात्ताप करता है और परमेश्वर के वचन और कोमल प्रेम मनुष्य के नए जीवन में प्रेरक शक्ति बन जाते हैं। मनुष्य के घाव दिन-ब-दिन भरते जाते हैं, उसका शरीर मजबूत होता जाता है और वह उठ खड़ा होता है और उसे सर्वशक्तिमान का चेहरा दिखाई देता है...। यह पता चलता है कि वह हमेशा मेरे पास में रहा है, मेरी देखभाल करता रहा है। उसकी मुस्कान और उसका सुंदर चेहरा अब भी कितना भाव जगाने वाला है, अब भी उसके दिल में अपने सृजित मानवजाति के लिए अब भी बहुत चिंता समाई हुई है और उसके हाथ अब भी उतने ही गर्म और शक्तिशाली हैं जितने वे शुरुआत में थे। यह ऐसा है मानो मनुष्य अदन के बगीचे के समय में लौट आया हो, लेकिन अब मनुष्य साँप के प्रलोभनों को नहीं सुनता है और यहोवा के चेहरे से नहीं छिपता है। मनुष्य परमेश्वर के सामने आराधना में घुटने टेक देता है, परमेश्वर के मुस्कुराते चेहरे की तरफ देखता है और उसे अपना सबसे कीमती बलिदान अर्पण कर देता है—ओह! मेरे प्रभु, मेरे परमेश्वर!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है
यीशु द्वारा किया गया कार्य पुराने विधान से महज एक चरण ऊँचा था; उसे एक युग शुरू करने के लिए और उस युग की अगुआई करने के लिए इस्तेमाल किया गया था। उसने क्यों कहा था, “मैं व्यवस्था नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था पूरी करने आया हूँ”? फिर भी उसके काम में बहुत-कुछ ऐसा था, जो पुराने विधान के इस्राएलियों द्वारा पालन की जाने वाली व्यवस्थाओं और आज्ञाओं से अलग था, क्योंकि वह व्यवस्था का पालन करने नहीं आया था, बल्कि उसे पूरा करने के लिए आया था। उसे पूरा करने की प्रक्रिया में कई व्यावहारिक चीजें शामिल थीं : उसका कार्य अधिक व्यावहारिक और यथार्थपरक था, और इसके अलावा, वह अधिक जीवंत था, और नियमों का अंधा पालन नहीं था। क्या इस्राएली सब्त का पालन नहीं करते थे? जब यीशु आया, तो उसने सब्त का पालन नहीं किया, क्योंकि उसने कहा कि मनुष्य का पुत्र सब्त का प्रभु है, और जब सब्त का प्रभु आएगा, तो वह जैसा चाहेगा वैसा करेगा। वह पुराने विधान की व्यवस्थाएँ पूरी करने और उन्हें बदलने के लिए आया था। आज जो कुछ किया जाता है, वह वर्तमान पर आधारित है, फिर भी वह अब भी व्यवस्था के युग में किए गए यहोवा के कार्य की नींव पर टिका है, और वह इस दायरे का उल्लंघन नहीं करता। उदाहरण के लिए, अपनी जबान सँभालना, व्यभिचार न करना—क्या ये पुराने विधान की व्यवस्थाएँ नहीं हैं? आज, तुम लोगों से जो अपेक्षित है, वह केवल दस आज्ञाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसमें ऐसी आज्ञाएँ और व्यवस्थाएँ शामिल हैं, जो पहले आई आज्ञाओं और व्यवस्थाओं के मुकाबले अधिक उच्च कोटि की हैं। किंतु इसका यह मतलब नहीं है कि जो कुछ पहले आया, उसे खत्म कर दिया गया है, क्योंकि परमेश्वर के काम का प्रत्येक चरण पिछले चरण की नींव पर पूरा किया जाता है। जहाँ तक यहोवा द्वारा उस समय इस्राएल में किए गए कार्य की बात है, जैसे कि लोगों से अपेक्षा करना कि वे बलिदान दें, माँ-बाप का आदर करें, मूर्तियों की पूजा न करें, दूसरों पर वार न करें या उन्हें अपशब्द न कहें, व्यभिचार न करें, धूम्रपान या मदिरापान न करें, और मरी हुई चीजें न खाएँ या रक्तपान न करें—क्या यह आज भी तुम लोगों के अभ्यास की नींव नहीं है? अतीत की नींव पर ही आज तक काम किया गया है। हालाँकि, अतीत की व्यवस्थाओं का अब और उल्लेख नहीं किया जाता और तुमसे नई अपेक्षाएँ की गई हैं, फिर भी, इन व्यवस्थाओं को समाप्त किए जाने के बजाय और ऊँचा उठा दिया गया है। उन्हें समाप्त कर दिया गया कहने का मतलब है कि पिछला युग पुराना पड़ गया है, जबकि कुछ आज्ञाएँ ऐसी हैं, जिनका तुम्हें अनंतकाल तक पालन करना चाहिए। अतीत की आज्ञाएँ पहले ही अभ्यास में लाई जा चुकी हैं, वे पहले ही मनुष्य का अस्तित्व बन चुकी हैं, और “धूम्रपान मत करो”, “मदिरापान मत करो” आदि आज्ञाओं पर विशेष जोर देने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसी नींव पर आज तुम लोगों की जरूरत के अनुसार, तुम लोगों के आध्यात्मिक कद के अनुसार और आज के काम के अनुसार नई आज्ञाएँ निर्धारित की जाती हैं। नए युग के लिए आज्ञाएँ निर्धारित करने का मतलब अतीत की आज्ञाएँ खत्म करना नहीं है, बल्कि उन्हें इसी नींव पर और ऊँचा उठाना है, ताकि मनुष्य के क्रियाकलाप और अधिक पूर्ण और वास्तविकता के और अधिक अनुरूप बनाए जा सकें। यदि आज तुम लोगों को इस्राएलियों की तरह सिर्फ पुराने विधान की आज्ञाओं और व्यवस्थाओं का पालन करना होता, और यदि तुम लोगों को यहोवा द्वारा निर्धारित व्यवस्थाओं को भी याद रखना होता, तो तुम लोगों के बदल सकने की कोई संभावना न होती। यदि तुम लोगों को केवल उन कुछ सीमित आज्ञाओं का पालन करना होता या असंख्य व्यवस्थाओं को याद करना होता, तो तुम्हारा पुराना स्वभाव गहरे गड़ा रहता और उसे उखाड़ना असंभव होता। इस प्रकार तुम लोग और अधिक भ्रष्ट हो जाते, और तुम लोगों में से कोई भी समर्पित न बनता। कहने का अर्थ यह है कि कुछ सरल आज्ञाएँ या अनगिनत व्यवस्थाएँ यहोवा के कर्म जानने में तुम्हारी मदद नहीं कर सकतीं। तुम लोग इस्राएलियों के समान नहीं हो : व्यवस्थाओं का पालन और आज्ञाएँ याद करके वे यहोवा के कर्म देख पाए, और सिर्फ उसकी ही भक्ति कर सके। लेकिन तुम लोग इसे प्राप्त करने में असमर्थ हो, और पुराने विधान के युग की कुछ आज्ञाएँ न केवल तुम्हें अपना हृदय देने के लिए प्रेरित करने या तुम्हारी रक्षा करने में असमर्थ हैं, बल्कि वे तुम लोगों को शिथिल बना देंगी, और तुम्हें रसातल में गिरा देंगी। क्योंकि मेरा काम विजय का काम है, और इसके निशाने पर तुम लोगों का विद्रोहीपन और तुम्हारा पुराना स्वभाव है। यहोवा और यीशु के दयालु वचन आज न्याय के कठोर वचनों से कम पड़ते हैं। ऐसे कठोर वचनों के बिना तुम “विशेषज्ञों” पर विजय प्राप्त करना असंभव होगा, जो हजारों सालों से विद्रोही रहे हैं। पुराने विधान की व्यवस्थाओं ने बहुत पहले तुम लोगों पर अपनी शक्ति खो दी, और आज का न्याय पुरानी व्यवस्थाओं की तुलना में कहीं ज्यादा विकट है। तुम लोगों के लिए जो सबसे उपयुक्त है, वह न्याय है, व्यवस्थाओं के हलके प्रतिबंध नहीं, क्योंकि तुम लोग बिल्कुल प्रारंभ वाली मानव-जाति नहीं हो, बल्कि वह मानव-जाति हो जो हजारों वर्षों से भ्रष्ट है। अब मनुष्य को अपनी आज की वास्तविक दशा के अनुरूप और आज के मनुष्य की काबिलियत और वास्तविक आध्यात्मिक कद के अनुसार हासिल करना चाहिए और इसके लिए जरूरी नहीं कि तुम नियमों का पालन करो। यह इसलिए है, ताकि तुम्हारे पुराने स्वभाव में बदलाव हासिल किया जा सके, और तुम अपनी धारणाएँ त्याग सको।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (1)
यद्यपि आज मनुष्य जिस मार्ग पर चलता है, वह भी सलीब का मार्ग और दुःख का मार्ग है, फिर भी आज का मनुष्य जो अभ्यास करता है, और जो वह खाता, पीता और आनंद लेता है, वह उससे बहुत भिन्न है, जो मनुष्य व्यवस्था के अधीन और अनुग्रह के युग में करता था। आज मनुष्य से जो माँग की जाती है, वह अतीत की माँग से भिन्न है और व्यवस्था के युग में मनुष्य से की गई माँग से तो वह और भी अधिक भिन्न है। व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य से क्या माँग की गई थी, जब परमेश्वर इस्राएल में अपना कार्य कर रहा था? वह इससे बढ़कर कुछ नहीं थी कि मनुष्य को सब्त और यहोवा की व्यवस्थाओं का पालन करना चाहिए। किसी को भी सब्त के दिन काम नहीं करना था या यहोवा की व्यवस्थाओं का उल्लंघन नहीं करना था। परंतु अब ऐसा नहीं है। सब्त के दिन मनुष्य हमेशा की तरह काम करते हैं, इकट्ठे होते हैं और प्रार्थना करते हैं, और उन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाए जाते। अनुग्रह के युग में लोगों को बपतिस्मा लेना पड़ता था, और फिर उन्हें उपवास करने, रोटी तोड़ने, दाखमधु पीने, अपने सिर ढकने और दूसरों के पाँव धोने के लिए कहा जाता था। अब ये नियम समाप्त कर दिए गए हैं, किंतु मनुष्य से और भी बड़ी माँगें की जाती हैं, क्योंकि परमेश्वर का कार्य लगातार अधिक गहरा होता जाता है और मनुष्य का प्रवेश पहले से कहीं अधिक ऊँचा हो गया है। अतीत में यीशु मनुष्य के ऊपर हाथ रखता था और प्रार्थना करता था, परंतु अब जबकि सब कुछ कहा जा चुका है, तो मनुष्य के ऊपर हाथ रखने का क्या उपयोग है? वचन अकेले ही परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। जब अतीत में वह अपना हाथ मनुष्य के ऊपर रखता था, तो यह मनुष्य को आशीष देने और चंगा करने के लिए होता था। उस समय पवित्र आत्मा इसी तरह से कार्य करता था, परंतु अब ऐसा नहीं है। अब पवित्र आत्मा कार्य करने और नतीजे पाने के लिए वचनों का उपयोग करता है। उसके वचन तुम लोगों पर स्पष्ट कर दिए गए हैं, और तुम लोगों को उन्हें ठीक वैसे ही अभ्यास में लाना चाहिए, जैसे तुम्हें बताया गया है। उसके वचन उसके इरादे हैं; वे वह कार्य है, जिसे वह करना चाहता है। उसके वचनों के माध्यम से तुम उसके इरादों को और उस चीज को समझ सकते हो, जिसे प्राप्त करने के लिए वह तुमसे कहता है, और तुम अपने ऊपर हाथ रखे जाने की आवश्यकता के बिना ही सीधे उसके वचनों को अभ्यास में ला सकते हो। कुछ लोग कह सकते हैं, “मुझ पर अपना हाथ रख! मुझ पर अपना हाथ रख, ताकि मैं तेरे आशीष प्राप्त कर सकूँ और तेरा हिस्सा बन सकूँ।” ये सभी पहले के अप्रचलित अभ्यास हैं, जो अब पुराने पड़ गए हैं, क्योंकि युग बदल चुका है। पवित्र आत्मा युग के अनुसार कार्य करता है, न कि इच्छानुसार या तय नियमों के अनुसार। युग बदल चुका है और नया युग अनिवार्य रूप से अपने साथ नया काम लेकर आता है। यह कार्य के प्रत्येक चरण के बारे में सच है, इसलिए उसका कार्य कभी दोहराया नहीं जाता। अनुग्रह के युग में यीशु ने इस तरह का बहुत-सा कार्य किया, जैसे कि बीमारियों को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, मनुष्य के लिए प्रार्थना करने हेतु उस पर हाथ रखना, और उसे आशीष देना। किंतु आज दोबारा ऐसा करना निरर्थक होगा। पवित्र आत्मा ने उस समय उस तरह से कार्य किया, क्योंकि वह अनुग्रह का युग था, और मनुष्य के आनंद लेने के लिए पर्याप्त अनुग्रह था। उससे किसी तरह का कोई भुगतान नहीं माँगा गया, और जब तक उसे विश्वास था, वह अनुग्रह प्राप्त कर सकता था। सबके साथ बहुत दयालुता का व्यवहार किया जाता था। अब युग बदल चुका है और परमेश्वर का कार्य आगे बढ़ चुका है; मनुष्य की विद्रोहशीलता को और उसके भीतर की अशुद्धता को ताड़ना और न्याय के माध्यम से दूर किया जाएगा। चूँकि वह छुटकारे का चरण था, इसलिए मनुष्य के आनंद के लिए उस पर पर्याप्त अनुग्रह प्रदर्शित करते हुए परमेश्वर का उस तरह से कार्य करना उचित था, ताकि मनुष्य को पापों से छुटकारा दिलाया जा सके, और अनुग्रह के माध्यम से उसके पाप क्षमा किए जा सकें। यह वर्तमान चरण ताड़ना, न्याय, वचनों के प्रहार, और साथ ही अनुशासन तथा वचनों के प्रकाशन के माध्यम से मनुष्य के भीतर की अधार्मिकता उजागर करने के लिए है, ताकि बाद में मानवजाति को बचाया जा सके। यह कार्य छुटकारे के कार्य से कहीं अधिक गहरा है। अनुग्रह के युग में मनुष्य के आनंद के लिए अनुग्रह पर्याप्त था; अब चूँकि वह पहले ही इस अनुग्रह का अनुभव कर चुका है, इसलिए उसे अब और उसका आनंद नहीं उठाना है। इस कार्य का समय अब चला गया है और यह अब और नहीं किया जाना है। अब मनुष्य को वचन के न्याय के माध्यम से बचाया जाना है। मनुष्य का न्याय, उसकी ताड़ना और उसका शुद्धिकरण होने के पश्चात् इनके परिणामस्वरूप उसका स्वभाव बदल जाता है। क्या यह सब मेरे द्वारा बोले गए वचनों के कारण नहीं है? कार्य का प्रत्येक चरण समूची मानवजाति की प्रगति और युग के अनुसार किया जाता है। समस्त कार्य महत्वपूर्ण है, और यह सब अंतिम उद्धार के लिए किया जाता है, ताकि मानवजाति को भविष्य में एक अच्छी मंज़िल मिल सके, और अंत में मनुष्यों को प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जा सके।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)
अंत के दिनों के कार्य में वचनों की शक्ति प्रकटीकरण और चमत्कार दिखाने से कहीं अधिक शक्तिमान है, और वचन का अधिकार चिह्नों और चमत्कारों के अधिकार से कहीं बढ़कर है। वचन मनुष्य के हृदय में गहरे दबे सभी भ्रष्ट स्वभावों को उजागर कर देता है। तुम्हारे पास उन्हें अपने आप पहचानने का कोई उपाय नहीं है। जब उन्हें वचन के माध्यम से तुम्हारे सामने प्रकट किया जाता है, तुम स्वाभाविक रूप से उन्हें खोज लोगे; तुम्हें उन्हें अभिस्वीकृति देनी होगी, और तुम पूरी तरह से आश्वस्त हो जाओगे। क्या यह वचन का अधिकार नहीं है? यह आज वचन के कार्य द्वारा प्राप्त किया जाने वाला परिणाम है। इसलिए, बीमारी की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने से मनुष्य को उसके पापों से पूरी तरह से बचाया नहीं जा सकता, न ही चिह्नों और चमत्कारों के प्रदर्शन से उसे पूरी तरह से पूर्ण बनाया जा सकता है। चंगाई करने और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार मनुष्य को केवल अनुग्रह प्रदान करता है, किंतु मनुष्य का देह फिर भी शैतान से संबंधित होता है और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव फिर भी मनुष्य के भीतर बना रहता है। दूसरे शब्दों में, जिसे शुद्ध नहीं किया गया है, वह अभी भी पाप और गंदगी से संबंधित है। केवल वचन के माध्यम से स्वच्छ कर दिए जाने के बाद ही मनुष्य को परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और वह पवित्र बन सकता है। जब मनुष्य के भीतर से दुष्टात्माओं को निकाला गया और उसे छुटकारा दिलाया गया, तो इसका अर्थ केवल इतना था कि उसे शैतान के हाथ से छीनकर परमेश्वर को लौटा दिया गया है। किंतु उसे परमेश्वर द्वारा स्वच्छ या परिवर्तित किए बिना वह भ्रष्ट बना रहता है। मनुष्य के भीतर अब भी गंदगी, विरोध और विद्रोशीलता बनी हुई है; मनुष्य केवल छुटकारे के माध्यम से ही परमेश्वर के पास लौटा है, किंतु उसे परमेश्वर का जरा-सा भी ज्ञान नहीं है और वह अभी भी परमेश्वर का विरोध करने और उसके साथ विश्वासघात करने में सक्षम है। मनुष्य को छुटकारा दिए जाने से पहले शैतान के बहुत-से ज़हर उसमें पहले ही डाल दिए गए थे, और हजारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मनुष्य के भीतर एक ऐसी प्रकृति है, जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। इसलिए, जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया है, तो यह छुटकारे के मामले से बढ़कर कुछ नहीं है। यानी मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर खरीदा गया है, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति हटाई नहीं गई है। मनुष्य को, जो कि इतना गंदा है, परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले एक परिवर्तन से होकर गुजरना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह से जान जाएगा, और वह पूरी तरह से बदलने और शुद्ध होने में समर्थ हो जाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। आज किया जाने वाला समस्त कार्य इसलिए है, ताकि मनुष्य को शुद्ध और परिवर्तित किया जा सके; वचन के द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से, और साथ ही शोधन के माध्यम से भी, मनुष्य अपनी भ्रष्टता छोड़ सकता है और शुद्ध किया जा सकता है। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय के कार्य का चरण भी है और साथ ही उद्धार के कार्य का दूसरा चरण भी है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने की स्थिति में पहुँचता है, और वचनों के माध्यम से शोधन करने, न्याय करने और उजागर करने से ही मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताएँ, धारणाएँ, मंशाएँ और व्यक्तिगत आशाएँ पूरी तरह से प्रकट होती हैं। यूँ तो मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा दिया जा चुका है और क्षमा किया जा चुका है, फिर भी इसे केवल इस रूप में माना जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। किंतु जब मनुष्य को, जो कि देह में रहता है, पाप से मुक्त नहीं किया गया है, तो वह निरंतर अपना भ्रष्ट शैतानी स्वभाव प्रकट करते हुए केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है, जो मनुष्य जीता है—पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर मनुष्य दिन में पाप करते हैं और शाम को स्वीकार करते हैं। इस प्रकार, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी हो, फिर भी वह मनुष्य को पाप से बचाने में सक्षम नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है। उदाहरण के लिए, जब लोगों को पता चला कि वे मोआब के वंशज हैं, तो उन्होंने शिकायत के बोल बोलने शुरू कर दिए, जीवन का अनुसरण करना छोड़ दिया, और पूरी तरह से नकारात्मक हो गए। क्या यह इस बात को नहीं दर्शाता कि मानवजाति अभी भी परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन पूरी तरह से समर्पित होने में असमर्थ है? क्या यह ठीक उनका भ्रष्ट शैतानी स्वभाव नहीं है? जब तुम्हें ताड़ना का भागी नहीं बनाया गया था, तो तुम्हारे हाथ अन्य सबके हाथों से ऊँचे उठे हुए थे, यहाँ तक कि यीशु के हाथों से भी ऊँचे। और तुम ऊँची आवाज़ में पुकार रहे थे : “परमेश्वर के प्रिय पुत्र बनो! परमेश्वर के अंतरंग बनो! हम मर जाएँगे, पर शैतान के आगे नहीं झुकेंगे! शैतान के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़े लाल अजगर के विरुद्ध विद्रोह करो! बड़ा लाल अजगर दीन-हीन होकर सत्ता से गिर जाए! परमेश्वर हमें पूरा करे!” तुम्हारी पुकार अन्य सबसे ऊँची थीं। किंतु फिर ताड़ना का समय आया और एक बार फिर मनुष्यों का भ्रष्ट स्वभाव प्रकट हुआ। फिर उनकी पुकार बंद हो गई और उनका संकल्प टूट गया। यही मनुष्य की भ्रष्टता है; यह पाप से ज्यादा गहरी है, इसे शैतान द्वारा स्थापित किया गया है और यह मनुष्य के भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए है। मनुष्य के लिए अपने पापों से अवगत होना आसान नहीं है; उसके पास अपनी गहरी जमी हुई प्रकृति को पहचानने का कोई उपाय नहीं है, और उसे यह परिणाम प्राप्त करने के लिए वचन के न्याय पर भरोसा करना चाहिए। केवल इसी प्रकार से मनुष्य इस बिंदु से आगे धीरे-धीरे बदल सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)
मनुष्य के उद्धार के कार्य के तीन चरण हैं, जिसका तात्पर्य है कि शैतान को हमेशा के लिए पराजित करने हेतु उसके साथ युद्ध को तीन चरणों में विभाजित किया गया है। किंतु शैतान के साथ युद्ध के समस्त कार्य की भीतरी सच्चाई यह है कि इसके परिणाम कार्य के अनेक चरणों में हासिल किए जाते हैं : मनुष्य को अनुग्रह प्रदान करना, मनुष्य के लिए पापबलि बनना, मनुष्य के पापों को क्षमा करना, मनुष्य पर विजय पाना और मनुष्य को पूर्ण बनाना। वस्तुतः शैतान के साथ युद्ध करना उसके विरुद्ध हथियार उठाना नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को बचाने के द्वारा परमेश्वर की गवाही देना है, मनुष्य के जीवन को गढ़ना है, और मनुष्य के स्वभाव को बदलना है, और इस तरह शैतान को पराजित करना है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के माध्यम से शैतान को पराजित किया जाता है। जब शैतान को पराजित कर दिया जाएगा, अर्थात् जब मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा, तो अपमानित शैतान पूरी तरह से लाचार हो जाएगा, और इस तरह से, मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। इस प्रकार, मनुष्य के उद्धार का सार शैतान के विरुद्ध युद्ध है, और यह युद्ध मुख्य रूप से मनुष्य के उद्धार में प्रतिबिंबित होता है। अंत के दिनों का चरण, जिसमें मनुष्य को जीता जाना है, शैतान के साथ युद्ध का अंतिम चरण है, और यह शैतान की सत्ता से मनुष्य के संपूर्ण उद्धार का कार्य भी है। मनुष्य पर विजय का आंतरिक अर्थ मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप—मनुष्य, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है—का अपने जीते जाने के बाद सृष्टिकर्ता के पास वापस लौटना है, जिसके माध्यम से वह शैतान से विद्रोह कर पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा। इस तरह मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। और इसलिए, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और शैतान की पराजय के वास्ते परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है। इस कार्य के बिना मनुष्य का संपूर्ण उद्धार अंततः असंभव होगा, शैतान की संपूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मानव-जाति कभी भी अपनी अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी। परिणामस्वरूप, शैतान के साथ युद्ध की समाप्ति से पहले मनुष्य के उद्धार का कार्य समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर के प्रबधंन के कार्य का केंद्रीय भाग मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है। आदिम मानव-जाति परमेश्वर के हाथों में थी, किंतु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान द्वारा बाँध लिया गया और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रबधंन-कार्य में शैतान पराजित किए जाने का लक्ष्य बन गया। चूँकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और चूँकि मनुष्य वह पूँजी है जिसे परमेश्वर संपूर्ण प्रबंधन पूरा करने के लिए इस्तेमाल करता है, इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस छीनना होगा, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को शैतान द्वारा बंदी बना लिए जाने के बाद उसे वापस लेना होगा। इस प्रकार, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों और मनुष्य के मूल विवेक को पुनर्स्थापित करने के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए। इस तरह से बंदी बना लिए गए मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस छीना जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिंदा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और चूँकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए एक बार जब यह युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो मनुष्य इस संपूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दंडित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मानव-जाति के उद्धार का संपूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना