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अध्याय 2 परमेश्वर के नामों के सत्य

1. परमेश्वर नामों को क्यों अपनाता है, क्या एक ही नाम परमेश्वर की सम्पूर्णता का प्रतिनिधित्व कर सकता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

क्या यीशु का नाम—"परमेश्वर हमारे साथ"—परमेश्वर के स्वभाव को उसकी समग्रता से व्यक्त कर सकता है? क्या यह पूरी तरह से परमेश्वर को स्पष्ट कर सकता है? यदि मनुष्य कहता है कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है, और उसका कोई अन्य नाम नहीं हो सकता है क्योंकि परमेश्वर अपना स्वभाव नहीं बदल सकता है, तो ऐसे वचन वास्तव में ईशनिन्दा हैं! क्या तुम मानते हो कि हमारे पास यीशु, परमेश्वर नाम, अकेला परमेश्वर का उसकी समग्रता से प्रतिनिधित्व कर सकता है? परमेश्वर को कई नामों से बुलाया जा सकता है, किन्तु इन कई नामों में से, एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर के समस्त को संपुटित कर सकता हो, एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व कर सकता हो। और इसलिए, परमेश्वर के कई नाम हैं, किन्तु ये बहुत से नाम परमेश्वर के स्वभाव को पूरी तरह से स्पष्ट नहीं कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव इतना समृद्ध है, कि यह बस मनुष्य के जानने की सीमा से बढ़ कर है। मनुष्य की भाषा का उपयोग करके, परमेश्वर को पूरी तरह से संपुटित करने का मनुष्य के पास कोई तरीका नहीं है। मनुष्य के पास परमेश्वर के स्वभाव के बारे में जो कुछ वह जानता है उसे संपुटित करने के लिए सीमित शब्दावली है: महान, आदरणीय, चमत्कारिक, अथाह, सर्वोच्च, पवित्र, धार्मिक, बुद्धिमान इत्यादि। बहुत से शब्द! इतनी सीमित शब्दावली उस थोड़े से का वर्णन करने में असमर्थ है जो मनुष्य ने परमेश्वर के स्वभाव के बारे में देखा है। समय के साथ, कई अन्य लोगों ने ऐसे शब्दों को जोड़ा है जो उन्हें लगता था कि उनके हृदय के उत्साह का बेहतर ढंग से वर्णन करने में समर्थ हैं: परमेश्वर अत्यंत महान है! परमेश्वर अत्यंत पवित्र है! परमेश्वर अत्यंत प्यारा है! आज, ऐसी मानव उक्तियाँ अपने चरम पर पहुँच गई हैं, फिर भी मनुष्य अभी भी स्वयं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में असमर्थ है। और इसलिए, मनुष्य के लिए, परमेश्वर के कई नाम हैं, मगर उसका कोई एक नाम नहीं है, और ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर का अस्तित्व अत्यधिक भरपूर है, और मनुष्य की भाषा अत्यधिक दरिद्र है। एक विशेष शब्द या नाम परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है, तो क्या आपको लगता है कि उसके नाम को तय किया जा सकता है? परमेश्वर बहुत महान और बहुत पवित्र है फिर भी तुम उसे प्रत्येक नए युग में अपना नाम बदलने की अनुमति नहीं दोगे? इसलिए, प्रत्येक युग में जिसमें परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना स्वयं का कार्य करता है, वह उस कार्य को संपुटित करने के लिए जिसे करने का वह इरादा रखता है, एक नाम का उपयोग करता है जो युग के अनुकूल होता है। वह इस विशेष नाम, एक ऐसा नाम जिसका अस्थायी महत्व है, का उपयोग उस युग के अपने स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के लिए करता है। यह परमेश्वर है जो अपने स्वयं के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग कर रहा है। फिर भी, बहुत से लोग जिन्हें आध्यात्मिक अनुभव हो चुके हैं और जिन्होंने परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से देखा है, अभी भी महसूस करते हैं कि यह एक विशेष नाम परमेश्वर का उसकी समग्रता से प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है—आह, इसमें कोई सहायता नहीं की जा सकती है—इसलिए मनुष्य परमेश्वर को किसी भी नाम से अब और नहीं बुलाता है, बल्कि उसे केवल "परमेश्वर" कहता है। यह ऐसा है मानो कि मनुष्य का हृदय प्रेम से भरा हुआ है, फिर भी यह विरोधाभासों से घिरा हुआ भी है, क्योंकि मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर की व्याख्या कैसे की जाए। परमेश्वर जो है वह अत्यधिक भरपूर है, इसका वर्णन करने का कोई तरीका ही नहीं है। ऐसा कोई भी अकेला नाम नहीं है जो परमेश्वर के स्वभाव को संक्षेप में प्रस्तुत कर सकता हो, और ऐसा कोई भी अकेला नाम नहीं है जो परमेश्वर के स्वरूप का वर्णन कर सकता हो। यदि कोई मुझसे पूछे, "वास्तव में तुम किस नाम का उपयोग करते हो?" तो मैं उन्हें बताऊँगा, "परमेश्वर तो परमेश्वर है!" क्या यह परमेश्वर के लिए सर्वोत्तम नाम नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव का सर्वोत्तम संपुटन नहीं है? ऐसा होने पर, क्यों तुम लोग परमेश्वर के नाम की तलाश में इतना प्रयास लगाते हो? क्यों तुम लोगों को भूखे-प्यासे रह कर, अपने दिमाग को चलाना चाहिए, सब कुछ एक नाम के वास्ते? वह दिन आ जाएगा जब परमेश्वर को यहोवा, यीशु या मसीहा नहीं कहा जाएगा—वह केवल सृष्टिकर्ता होगा। उस समय, वे सभी नाम जो उसने पृथ्वी पर धारण किए हैं समाप्त हो जाएँगे, क्योंकि पृथ्वी पर उसका कार्य समाप्त हो गया होगा, जिसके बाद उसका कोई नाम नहीं होगा। जब सभी चीजें सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आ जाती हैं, तो उसे अत्यधिक उपयुक्त फिर भी अपूर्ण नाम की क्या आवश्यकता है? क्या तुम अभी भी परमेश्वर के नाम की तलाश कर रहे हो? क्या तुम अभी भी कहने का साहस करते हो कि परमेश्वर को केवल यहोवा ही कहा जाता है? क्या तुम अभी भी कहने का साहस करते हो कि परमेश्वर को केवल यीशु कहा जा सकता है? क्या तुम परमेश्वर के विरुद्ध ईशनिन्दा का पाप सहन करने में समर्थ हो? तुम्हें पता होना चाहिए कि मूल रूप से परमेश्वर का कोई नाम नहीं था। उसने केवल एक, या दो या कई नाम धारण किए क्योंकि उसके पास करने के लिए कार्य था और उसे मनुष्यजाति का प्रबंधन करना था। चाहे उसे किसी भी नाम से बुलाया जाए—क्या उसने स्वयं इसे स्वतंत्र रूप से नहीं चुना है? क्या इसे तय करने के लिए उसे तुम्हारी—एक प्राणी की—आवश्यकता होगी? जिस नाम से परमेश्वर को बुलाया जाता है वह ऐसा नाम है जो उसके अनुसार है जिसे, मनुष्यजाति की भाषा के साथ, मनुष्य समझने में समर्थ है, किन्तु यह नाम कुछ ऐसा नहीं है जिसे मनुष्य सम्मिलित कर सकता है। तुम केवल इतना ही कह सकते हो कि स्वर्ग में एक परमेश्वर है, कि वह परमेश्वर कहलाता है, कि वह महान सामर्थ्य वाला परमेश्वर स्वयं है, जो अत्यधिक बुद्धिमान, अत्यधिक उच्च, अत्यधिक चमत्कारिक, अत्यधिक रहस्यमय, अत्यधिक सर्वशक्तिमान है, और फिर तुम इससे अधिक नहीं कह सकते हो; तुम्हें बस इतना जरा सा ही पता हो सकता है। ऐसा होने पर, क्या यीशु का मात्र नाम ही परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जब अंत के दिन आते हैं, भले ही यह अभी भी परमेश्वर ही है जो अपना कार्य करता है, तब भी उसके नाम को बदलना ही है, क्योंकि यह एक भिन्न युग है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से उद्धृत

प्रत्येक युग में और कार्य के प्रत्येक चरण में, मेरा नाम आधारहीन नहीं है, किन्तु प्रतिनिधिक महत्व रखता हैः प्रत्येक नाम एक युग का प्रतिनिधित्व करता है। "यहोवा" व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और यह उस परमेश्वर के लिए सम्मानसूचक है जिसकी आराधना इस्राएल के लोगों के द्वारा की जाती है। "यीशु" अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और यह उन सबके परमेश्वर का नाम है जिन्हें अनुग्रह के युग के दौरान छुटकारा दिया गया था। यदि मनुष्य अब भी अंत के दिनों के दौरान उद्धारकर्त्ता यीशु के आगमन की अभिलाषा करता है, और अब भी उससे अपेक्षा करता है कि वह उसी प्रतिरूप में आए जो उसने यहूदिया में धारण किया था, तो छः हज़ार सालों की सम्पूर्ण प्रबन्धन योजना छुटकारे के युग में रुक जाएगी, और थोड़ी सी भी प्रगति करने में अक्षम होगी। इसके अतिरिक्त, अंत के दिन का आगमन कभी नहीं होगा, और युग का समापन कभी नहीं होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि उद्धारकर्त्ता यीशु सिर्फ मानवजाति के छुटकारे और उद्धार के लिए है। मैंने अनुग्रह के युग के सभी पापियों के लिए यीशु का नाम अपनाया था, और यह वह नाम नहीं है जिसके द्वारा मैं पूरी मानवजाति को समाप्त करूँगा। यद्यपि यहोवा, यीशु, और मसीहा सभी मेरे पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं, किंतु ये नाम मेरी प्रबन्धन योजना में केवल विभिन्न युगों के द्योतक हैं, और मेरी सम्पूर्णता में मेरा प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। ऐसे नाम जिनके द्वारा पृथ्वी के लोग मुझे पुकारते हैं, मेरे सम्पूर्ण स्वभाव को और वह सब कुछ जो मैं हूँ उसे स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर सकते हैं। वे मात्र अलग-अलग नाम हैं जिनके द्वारा विभिन्न युगों के दौरान मुझे पुकारा जाता है। और इसलिए, जब अंतिम युग—अंत के दिनों के युग—का आगमन होगा, तो मेरा नाम पुनः बदल जाएगा। मुझे यहोवा, या यीशु नहीं कहा जाएगा, मसीहा तो कदापि नहीं, बल्कि मुझे सामर्थ्यवान स्वयं सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा, और इस नाम के तहत ही मैं समस्त युग को समाप्त करूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "उद्धारकर्त्ता पहले ही एक 'सफेद बादल' पर सवार होकर वापस आ चुका है" से उद्धृत

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