1. परमेश्वर मानवजाति को बचाने का कार्य क्यों करता है?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
आरंभ में परमेश्वर विश्राम में था। उस समय पृथ्वी पर कोई मनुष्य या अन्य कुछ भी नहीं था और परमेश्वर ने तब तक किसी भी तरह का कोई कार्य नहीं किया था। उसने अपने प्रबंधन का कार्य केवल तब आरंभ किया, जब मानवता अस्तित्व में आ गई और जब मानवता भ्रष्ट कर दी गई; उस पल से, उसने विश्राम नहीं किया बल्कि उसने स्वयं को मानवता के बीच व्यस्त रखना आरंभ कर दिया। मानवता के भ्रष्ट होने के कारण परमेश्वर विश्राम खो बैठा और प्रधान स्वर्गदूत के विश्वासघात के कारण भी। यदि परमेश्वर शैतान को परास्त नहीं करता है और भ्रष्ट हो चुकी मानवता को नहीं बचाता है, तो वह पुनः कभी भी विश्राम में प्रवेश नहीं कर पाएगा। जैसे मनुष्य को विश्राम नहीं है, वैसे ही परमेश्वर को भी नहीं है और जब वह एक बार फिर विश्राम करेगा, तो मनुष्य भी विश्राम करेंगे। विश्रामरत जीवन का अर्थ है युद्ध के बिना, गंदगी के बिना और किसी अधार्मिकता के बिना जीवन। कहने का अर्थ है कि यह जीवन शैतान के विघ्नों (यहाँ “शैतान” का अर्थ शत्रुतापूर्ण शक्तियों से है) और शैतान की भ्रष्टता से मुक्त है और यह परमेश्वर विरोधी किसी भी शक्ति के अतिक्रमण से मुक्त है; यह ऐसा जीवन है जिसमें हर चीज अपनी किस्म के अनुसार छाँट दी जाती है और सृष्टिकर्ता की आराधना कर सकती है और जिसमें स्वर्ग और पृथ्वी पूरी तरह शांत होते हैं। यही मनुष्यों के लिए विश्राम का जीवन है। जब परमेश्वर विश्राम करेगा तो पृथ्वी पर अधार्मिकता नहीं रहेगी, न ही शत्रुतापूर्ण शक्तियों का फिर कोई अतिक्रमण होगा और मानवजाति एक नए क्षेत्र में प्रवेश करेगी—यह अब ऐसी मानवजाति नहीं होगी जो शैतान द्वारा भ्रष्ट बना दी गई है, बल्कि एक ऐसी मानवजाति होगी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट बना दिए जाने के बाद बचाया गया है। मानवजाति का विश्राम का दिन परमेश्वर का विश्राम का दिन भी होगा। मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थता के कारण परमेश्वर ने अपना विश्राम खोया था; ऐसा नहीं है कि उसे शुरुआत से कोई विश्राम नहीं था।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
तथ्य ये हैं : पृथ्वी के अस्तित्व से पहले, प्रधान स्वर्गदूत स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सबसे महान था। स्वर्ग के सभी स्वर्गदूतों पर उसका अधिकार था; और यह अधिकार उसे परमेश्वर ने दिया था। परमेश्वर के अपवाद के साथ, वह स्वर्ग के स्वर्गदूतों में सर्वोच्च था। बाद में जब परमेश्वर ने मानवजाति का सृजन किया, तब प्रधान स्वर्गदूत ने पृथ्वी पर परमेश्वर से और भी बड़ा विश्वासघात किया। मैं कहता हूँ कि उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात इसलिए किया क्योंकि वह मानवजाति का प्रबंधन करना चाहता था और परमेश्वर के अधिकार को मात देना चाहता था। यह प्रधान स्वर्गदूत ही था जिसने हव्वा को पाप करने के लिए ललचाया; उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करना और मानवजाति से परमेश्वर को धोखा दिलाकर अपना आज्ञापालन करवाना चाहता था। उसने देखा कि बहुत-सी चीजें हैं जो उसका आज्ञापालन कर सकती थीं—स्वर्गदूत उसकी आज्ञा मान सकते थे, ऐसे ही पृथ्वी पर लोग भी उसकी आज्ञा मान सकते थे। पृथ्वी पर पक्षी और पशु, वृक्ष और जंगल, पर्वत और नदियाँ और सभी वस्तुएँ मनुष्य—अर्थात, आदम और हव्वा—की देखभाल के अधीन थीं, जबकि आदम और हव्वा प्रधान स्वर्गदूत का आज्ञापालन करते थे। इसलिए प्रधान स्वर्गदूत परमेश्वर के अधिकार से आगे बढ़ना और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना चाहता था। इसके बाद उसने परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के लिए बहुत से स्वर्गदूतों की अगुआई की, जो बाद में विभिन्न अशुद्ध आत्माएँ बन गए। क्या आज के दिन तक मानवजाति का विकास प्रधान स्वर्गदूत की भ्रष्टता के कारण नहीं है? मानवजाति जैसी आज है, केवल इसलिए है क्योंकि प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया और मानवजाति को भ्रष्ट कर दिया। ... मानवजाति और पृथ्वी पर सभी वस्तुएँ अब शैतान की सत्ता के अधीन हैं और दुष्टों की सत्ता के अधीन हैं। परमेश्वर अपने कर्मों को सभी चीजों पर प्रकट करना चाहता है ताकि लोग उसे जान सकें, और परिणामस्वरूप शैतान को हरा सके और अपने शत्रुओं को पूरी तरह पस्त कर सके। इस कार्य की समग्रता परमेश्वर के कर्मों के प्रकट होने के माध्यम से संपन्न होती है। उसकी सभी रचनाएँ शैतान की सत्ता के अधीन हैं, इसलिए वह उनके सामने अपनी सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करना चाहता है, और परिणामस्वरूप शैतान को पराजित करना चाहता है। यदि शैतान नहीं होता, तो परमेश्वर को अपने कर्म प्रकट करने की जरूरत न पड़ती। यदि शैतान ने विघ्न न डाला होता तो मानवजाति को सृजित करने के बाद परमेश्वर मनुष्यों को अदन की वाटिका में रहने ले जाता। शैतान के विश्वासघात से पहले परमेश्वर ने अपने सारे कर्म स्वर्गदूतों या प्रधान स्वर्गदूत को कभी प्रकट क्यों नहीं किए? यदि आरंभ में स्वर्गदूतों और प्रधान स्वर्गदूत ने परमेश्वर को जान लिया होता और उसके प्रति समर्पण कर लिया होता तो वह ये निरर्थक कार्यकलाप न करता। क्योंकि शैतान और दानव मौजूद हैं और क्योंकि मनुष्य परमेश्वर का प्रतिरोध करता है और वह विद्रोही स्वभावों से लबालब भरा हुआ है, इसलिए परमेश्वर अपने कर्मों को प्रकट करेगा। क्योंकि वह शैतान से युद्ध करेगा, इसलिए शैतान को पराजित करने के लिए वह अवश्य अपने अधिकार का उपयोग करेगा और अपने सभी कर्मों का उपयोग करेगा; इस तरह, परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के बीच किया गया उद्धार का कार्य उन्हें उसकी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को देखने देगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई
चूँकि सारी मानवजाति के ऊपर का आसमान, स्पष्टता की जरा-सी झलक के बिना, मलिन और अंधकारमय है, और मानव-संसार स्याह अँधेरे में इस तरह डूबा हुआ है कि उसमें रहने वाला व्यक्ति अपने चेहरे के सामने लाकर अपने हाथ को या अपना सिर उठाकर सूरज को भी नहीं देख सकता। उसके पैरों के नीचे की कीचड़दार और गड्ढों से भरी सड़क घुमावदार और टेढ़ी-मेढ़ी है; पूरी जमीन पर लाशें बिखरी हुई हैं। अँधेरे कोने मृतकों के अवशेषों से भरे पड़े हैं, जबकि ठंडे और छायादार कोनों में दानवों की भीड़ ने अपना निवास बना लिया है। हर कदम पर, दानव लोगों के बीच झुंडों में आते-जाते रहते हैं। सभी तरह के जंगली जानवरों की गंदगी से ढकी हुई संतानें घमासान युद्ध में उलझी हुई हैं, जिनकी आवाज दिल में दहशत पैदा करती है। ऐसे समय में, इस तरह के संसार में, ऐसे “सांसारिक स्वर्गलोक” में व्यक्ति जीवन के आनंद की खोज करने कहाँ जा सकता है? अपने जीवन की मंजिल खोजने के लिए कोई कहाँ जा सकता है? लंबे समय से शैतान के पैरों के नीचे रौंदी हुई मानवजाति शैतान की छवि लिए एक प्रस्तोता रही है—इससे भी अधिक, मानवजाति शैतान का मूर्त रूप है और वह शैतान की ओर से “जबरदस्त गवाही” देने वाले प्रमाण के रूप में काम करती है। ऐसी मानवजाति, ऐसे अधम लोगों का झुंड, भ्रष्ट मानव-परिवार की ऐसी संतान परमेश्वर की गवाही कैसे दे सकती है? मेरी महिमा कहाँ से आती है? क्या मेरी ऐसी कोई गवाही है जिसके बारे में बात की जा सके? क्योंकि उस शत्रु ने, जो मेरे खिलाफ खड़ा है और जिसने मानवजाति को भ्रष्ट किया है, पहले ही उस मानवजाति को—जिसे मैंने बहुत पहले बनाया था और जो मेरी महिमा और मेरे जीवन यापन से भरी थी—दूषित कर दिया है। उसने मेरी महिमा छीन ली है और मनुष्य में जो चीज भर दी है, वह शैतान की कुरूपता की भारी मिलावट वाला जहर और अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष के फल का रस है। आरंभ में मैंने मानवजाति का सृजन किया; अर्थात् मैंने मानवजाति के पूर्वज, आदम का सृजन किया। वह रूप और छवि से संपन्न, जीवन शक्ति से भरपूर, जोश से भरपूर था और इससे भी बढ़कर, वह मेरी महिमा के साहचर्य में था। वह महिमामय दिन था, जब मैंने मनुष्य का सृजन किया। इसके बाद आदम के शरीर से हव्वा उत्पन्न हुई, वह भी मनुष्य की पूर्वज थी। इस प्रकार जिन लोगों का मैंने सृजन किया था, वे मेरे श्वास से भरे थे और मेरी महिमा से भरपूर थे। आदम मूल रूप से मेरे हाथ से “पैदा हुआ” और वह मेरी छवि का प्रतिनिधित्व था। इसलिए “आदम” का मूल अर्थ था मेरे द्वारा सृजित किया गया प्राणी, जो मेरी जीवन-ऊर्जा से भरा हुआ, मेरी महिमा से भरा हुआ, रूप और छवि से युक्त, आत्मा और श्वास से युक्त था। आत्मा से संपन्न वह एकमात्र सृजित प्राणी था, जो मेरा प्रतिनिधित्व करने और मेरी छवि धारण करने में सक्षम था, जिसने मेरा श्वास प्राप्त किया। आरंभ में, हव्वा दूसरी ऐसी इंसान थी जो श्वास से संपन्न थी, जिसका सृजन मैंने नियत किया था, इसलिए “हव्वा” का मूल अर्थ था, ऐसा सृजित प्राणी जो मेरी महिमा जारी रखेगा, जो मेरी जीवन शक्ति से भरा हुआ है और इससे भी बढ़कर, मेरी महिमा से संपन्न है। हव्वा आदम से आई, इसलिए उसने भी मेरी छवि धारण की, क्योंकि वह मेरी छवि में सृजित की जाने वाली दूसरी इंसान थी। “हव्वा” का मूल अर्थ था आत्मा, देह और हड्डियों से युक्त एक जीवित मनुष्य। वह मेरी दूसरी गवाही और साथ ही मानवजाति के बीच मेरी दूसरी छवि थी। वे मानवजाति के पूर्वज थे, मानवजाति में बहुमूल्य और शुद्ध मनुष्य थे और मूल रूप से आत्माओं से संपन्न जीवित प्राणी थे। किंतु उस दुष्ट ने मानवजाति के पूर्वजों की संतान को कुचल दिया और उन्हें बंदी बना लिया, उसने मानव-संसार को पूर्णतः अंधकार में डुबो दिया, और हालात ऐसे बना दिए कि उनकी संतान मेरे अस्तित्व में विश्वास नहीं करती। इससे भी अधिक घिनौनी बात यह है कि जहाँ दुष्ट ने लोगों को भ्रष्ट किया और उन सभी को कुचल दिया, वहीं उसने मेरी महिमा, मेरी गवाही, वह प्राणशक्ति जो मैंने उन्हें प्रदान की थी, वह श्वास और जीवन जो मैंने उनमें फूँका था, मानव-संसार में मेरी समस्त महिमा, और हृदय का समस्त रक्त जो मैंने मानवजाति पर खर्च किया था, वह सब भी क्रूरतापूर्वक छीन लिया। मानवजाति अब प्रकाश में नहीं है, लोगों ने वह सब खो दिया है जो मैंने उन्हें प्रदान किया था, और उन्होंने उस महिमा को भी छोड़ दिया है जो मैंने उन्हें प्रदान की थी। वे कैसे स्वीकार कर सकते हैं कि मैं समस्त सृष्टि का प्रभु हूँ? वे स्वर्ग में मेरे अस्तित्व में कैसे विश्वास कर सकते हैं? कैसे वे पृथ्वी पर मेरी महिमा की अभिव्यक्तियों को देख सकते हैं? ये पोते-पोतियाँ परमेश्वर को वह परमेश्वर कैसे मान सकते हैं जिसका भय उनके पूर्वज ऐसे प्रभु के रूप में मानते थे जिसने उनका सृजन किया था? इन बेचारे पोते-पोतियों ने वास्तव में वह महिमा, छवि, और वह गवाही जो मैंने आदम और हव्वा को प्रदान की थी, और वह जीवन जो मैंने मानवजाति को प्रदान किया था और जिस पर वे अपने अस्तित्व के लिए निर्भर हैं, काफी उदारता के साथ उस दुष्ट को “भेंट कर दिया”; और वे उस दुष्ट की उपस्थिति की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते और मेरी सारी महिमा उसे दे देते हैं। क्या यह “अधम लोगों का झुंड” शब्द का स्रोत नहीं है? ऐसी मानवजाति, ऐसे दुष्ट राक्षस, ऐसी चलती-फिरती लाशें, ऐसे शैतान, मेरे ऐसे शत्रु मेरी महिमा से कैसे संपन्न हो सकते हैं? मैं अपनी महिमा वापस पा लूँगा, मनुष्यों के बीच अपनी गवाही और वह सब वापस पा लूँगा, जो मूल रूप से मेरा था और जिसे मैंने बहुत पहले मानवजाति को दे दिया था—मैं मानवजाति को पूरी तरह से जीत लूँगा। किंतु तुम्हें पता होना चाहिए कि जिन मनुष्यों का मैंने सृजन किया था, वे शुद्ध मनुष्य थे जो मेरी छवि और मेरी महिमा धारण करते थे। वे शैतान के नहीं थे, न ही वे उससे कुचले जाने के भागी थे, बल्कि शैतान के लेशमात्र जहर से भी मुक्त, शुद्ध रूप से मेरी ही अभिव्यक्ति थे। और इसलिए, मैं मानवता को यह बताता हूँ : मैं केवल उन शुद्ध लोगों को चाहता हूँ जिन्हें मेरे हाथ से रचा गया था और जिनसे मैं प्रेम करता हूँ और जो किसी अन्य इकाई के नहीं हैं और मैं उनसे आनंद प्राप्त करूँगा और उन्हें अपनी महिमा मानूँगा; हालाँकि, मैं उस मानवजाति को नहीं चाहता जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, जो आज शैतान की है और जो अब मेरी मूल सृष्टि नहीं है। चूँकि मैं मानव-संसार में अपनी महिमा वापस पाना चाहता हूँ, इसलिए मैं शैतान को पराजित करने में अपनी महिमा के प्रमाण के रूप में, मानवजाति के शेष उत्तरजीवियों को पूर्ण रूप से जीत लूँगा। मैं सिर्फ अपनी गवाही को अपनी कड़ी मेहनत का नतीजा, अपनी आनंद की वस्तु मानता हूँ। यही मेरा इरादा है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक वास्तविक व्यक्ति होने का क्या अर्थ है