2. परमेश्वर द्वारा मानवजाति के प्रबंधन वाले कार्य के तीन चरणों के उद्देश्य को जानो
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
मेरी संपूर्ण प्रबंधन योजना, छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना, के तीन चरण या तीन युग हैं : आरंभ में व्यवस्था का युग; अनुग्रह का युग (जो छुटकारे का युग भी है); और अंत के दिनों का राज्य का युग। इन तीनों युगों में मेरे कार्य की विषयवस्तु प्रत्येक युग के अनुसार अलग-अलग है, परंतु प्रत्येक चरण में यह कार्य मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप किया गया है—या, ज्यादा सटीक रूप में, यह शैतान द्वारा उस युद्ध में चली जाने वाली चालों के अनुसार किया जाता है, जो मैं उससे लड़ रहा हूँ। इसका उद्देश्य शैतान को हराना, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करना, शैतान की सभी चालों को उजागर करना और परिणामस्वरूप समस्त मानवजाति को बचाना है, जो शैतान की सत्ता के अधीन रहती है। यह मेरी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करने के लिए और शैतान की असहनीय विकरालता को सामने लाने के लिए है; इससे भी अधिक, यह सृजित प्राणियों को अच्छे और बुरे के बीच अंतर करने देने के लिए है, यह जानने देने के लिए कि मैं सभी चीजों का संप्रभु हूँ, यह स्पष्ट रूप से देखने देने के लिए कि शैतान मानवजाति का शत्रु है, अधम है, दुष्ट है; और उन्हें पूरी स्पष्टता के साथ अच्छे और बुरे, सत्य और भ्रांति, पवित्रता और मलिनता और क्या महान है और क्या हेय, इसके बीच अंतर करने में सक्षम बनाने के लिए है। यह अज्ञानी मानवजाति को मेरे लिए यह गवाही देने में सक्षम बनाने के लिए है कि वह मैं नहीं हूँ जो मानवजाति को भ्रष्ट करता है और यह कि केवल मैं—सृष्टिकर्ता—मानवजाति को बचाता हूँ और लोगों को उनके आनंद की वस्तुएँ प्रदान करता हूँ; यह उन्हें जानने देने के लिए है कि मैं सभी चीजों का संप्रभु हूँ और शैतान मात्र वह प्राणी है जिसका मैंने सृजन किया है और जिसने बाद में मुझसे विश्वासघात किया। मेरी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना तीन चरणों में विभाजित है और मैं इस तरह इसलिए कार्य करता हूँ, ताकि सृजित प्राणियों को मेरे लिए गवाही देने, मेरे इरादे समझ पाने और यह जान पाने के योग्य बनाने का प्रभाव प्राप्त कर सकूँ कि मैं ही सत्य हूँ।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, छुटकारे के युग के कार्य की वास्तविक कहानी
आज हम पहले मानवजाति के सृजन के बाद से परमेश्वर के विचारों, मतों और उसकी प्रत्येक गतिविधि का सारांश प्रस्तुत करेंगे। हम इस पर एक नज़र डालेंगे कि उसने संसार की रचना करने से लेकर अनुग्रह के युग के आधिकारिक आरंभ तक कौन-सा कार्य किया है। तब हम यह पता लगा सकते हैं कि परमेश्वर के कौन-से विचार और मत मनुष्य के लिए अज्ञात हैं, और वहाँ से हम परमेश्वर की प्रबंधन योजना के क्रम को स्पष्ट कर सकते हैं, और उस संदर्भ को अच्छी तरह से समझ सकते हैं, जिसमें परमेश्वर ने अपने प्रबंधन के कार्य, उसके स्रोत और विकास की प्रक्रिया को बनाया था, और यह भी अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि वह अपने प्रबंधन-कार्य से कौन-से परिणाम चाहता है—अर्थात् उसके प्रबंधन-कार्य का मर्म और उद्देश्य। इन चीज़ों को समझने के लिए हमें एक सुदूर, स्थिर और शांत समय में जाने की आवश्यकता है, जब मनुष्य नहीं थे ...
परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से पहले जीवित व्यक्ति की रचना करना
जब परमेश्वर अपनी सेज से उठा, तो पहला विचार जो उसके मन में आया, वह यह था : एक जीवित व्यक्ति—एक वास्तविक, जीवित मनुष्य को बनाना—ऐसा मनुष्य, जो उसके साथ रहे और उसका निरंतर साथी बने; वह व्यक्ति उसे सुन सके, और परमेश्वर उस पर भरोसा कर सके और उसके साथ बात कर सके। तब, पहली बार, परमेश्वर ने मुट्ठी भर धूल उठाई और अपने मन में की गई कल्पना के अनुसार सबसे पहला जीवित व्यक्ति बनाने के लिए उसका उपयोग किया, और फिर उसने उस जीवित प्राणी को एक नाम दिया—आदम। इस जीवित और साँस लेते हुए प्राणी को बना चुकने के बाद परमेश्वर ने कैसा महसूस किया? पहली बार उसने एक प्रियजन, एक साथी होने का आनंद महसूस किया। पहली बार उसने पिता होने के उत्तरदायित्व और उसके साथ आने वाली चिंता को भी महसूस किया। यह जीवित और साँस लेता हुआ प्राणी परमेश्वर के लिए प्रसन्नता और आनंद लेकर आया; उसने पहली बार चैन का अनुभव किया। यह वह पहला कार्य था, जो परमेश्वर ने कभी किया था, जो परमेश्वर के विचारों या वचनों से संपन्न नहीं हुआ था, बल्कि जो उसने अपने हाथों से किया था। जब इस प्रकार का प्राणी—एक जीवित और साँस लेता हुआ व्यक्ति—परमेश्वर के सामने खड़ा हुआ, जो शरीर और आकार के साथ मांस और लहू से बना था, और जो परमेश्वर से बातचीत करने में सक्षम था, तो उसने ऐसा आनंद महसूस किया, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। परमेश्वर ने वास्तव में अपना उत्तरदायित्व महसूस किया और इस जीवित प्राणी ने न केवल उसके हृदय को आकर्षित कर लिया, बल्कि उसकी हर एक छोटी-सी चेष्टा ने भी उसे द्रवित कर दिया और उसके हृदय को उत्साह से भर दिया। जब यह जीवित प्राणी परमेश्वर के सामने खड़ा हुआ, तो पहली बार उसे उस तरह के और लोगों को प्राप्त करने का विचार आया। यही घटनाओं की वह शृंखला थी, जो परमेश्वर को आए इस पहले विचार के साथ आरंभ हुई। परमेश्वर के लिए ये सभी घटनाएँ पहली बार घटित हो रही थीं, किंतु इन पहली घटनाओं में, भले ही उसने उस समय कैसा भी महसूस किया हो—आनंद, उत्तरदायित्व, चिंता—उसे साझा करने के लिए उसके पास कोई नहीं था। उस पल से आरंभ करके, परमेश्वर ने सच में ऐसा एकाकीपन और उदासी महसूस की, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी। उसे लगा कि मनुष्य उसके प्रेम और चिंता को, या मनुष्य के लिए उसके इरादों को स्वीकार नहीं कर सकता या समझ नहीं सकता, इसलिए उसे अभी भी अपने हृदय में दुःख और दर्द महसूस हुआ। यद्यपि उसने ये चीज़ें मनुष्य के लिए की थीं, किंतु मनुष्य इससे अवगत नहीं था और उसने इसे समझा नहीं था। प्रसन्नता के अलावा जो आनंद और संतुष्टि मनुष्य उसके लिए लाया था, वह शीघ्रता से अपने साथ उसके लिए उदासी और एकाकीपन की प्रथम भावना भी साथ लेकर आया। उस समय परमेश्वर के ये ही विचार और भावनाएँ थीं। जब परमेश्वर ये सब चीज़ें कर रहा था, तो अपने हृदय में वह आनंद से दुःख की ओर, और दुःख से पीड़ा की ओर चला गया, और ये सब भावनाएँ चिंता से घुल-मिल गईं। जो कुछ वह करना चाहता था, वह था इस व्यक्ति, इस मनुष्य को यह ज्ञात करवाना कि परमेश्वर के हृदय में क्या है, और शीघ्रता से अपनी इच्छाओं को समझवाना। तब वे लोग उसके अनुयायी बन सकते हैं और उसके विचारों को साझा कर उसके इरादों के अनुरूप हो सकते हैं। वे अब केवल परमेश्वर को बोलते हुए नहीं सुनेंगे और मूक नहीं बने रहेंगे; वे अब इस बात से अनजान नहीं रहेंगे कि परमेश्वर के साथ उसके कार्य में कैसे जुड़ें; इन सबसे ऊपर, वे अब परमेश्वर की अपेक्षाओं से उदासीन लोग नहीं रहेंगे। परमेश्वर द्वारा की गई ये पहली चीज़ें बहुत अर्थपूर्ण हैं और उसकी प्रबंधन-योजना के लिए और आज मनुष्यों के लिए बड़ा मूल्य रखती हैं।
सभी चीज़ों और मनुष्यों का सृजन करने के बाद परमेश्वर ने आराम नहीं किया। वह अपने प्रबंधन को कार्यान्वित करने के लिए और उन लोगों को प्राप्त करने के लिए बेचैन और उत्सुक था, जिन्हें उसने मानवजाति के बीच बहुत प्रेम किया था।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
परमेश्वर अपने मानवजाति के प्रबंधन और उद्धार की इस घटना को किसी भी अन्य चीज से ज़्यादा महत्वपूर्ण समझता है। वह इन चीजों को केवल अपने विचारों से नहीं करता, केवल अपने वचनों से नहीं करता और वह इन्हें हल्के-फुल्के तरीके से तो बिल्कुल नहीं करता—वह इन सभी चीजों को अपने इरादों से करता है और साथ ही उसके पास एक योजना होती है, एक लक्ष्य होता है और मानक होते हैं। यह देखा जा सकता है कि मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के कार्य की यह घटना परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बड़ा महत्व रखती है। कार्य चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, इसकी राह में चाहे कितनी भी बड़ी अड़चनें क्यों न हों, मनुष्य चाहे कितने भी दुर्बल क्यों न हों या मानवजाति की विद्रोहशीलता चाहे कितनी भी गहन क्यों न हो, इनमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए कठिन नहीं हैं। परमेश्वर अपने आप को व्यस्त रखता है, अपने दिल का खून खपा रहा है और वह जिस कार्य को कार्यान्वित करना चाहता है उसका प्रबंधन कर रहा है; वह हर चीज की व्यवस्था भी कर रहा है और जिन लोगों पर वह कार्य करना चाहता है और जो कार्य करना चाहता है, उन सब पर संप्रभु है—यह सब कुछ अभूतपूर्व है। यह पहली बार है जब परमेश्वर ने मानवजाति का प्रबंधन करने और उसे बचाने का इतना बड़ा उपक्रम पूरा करने के लिए इन विधियों का उपयोग किया है और इतनी बड़ी कीमत चुकाई है। यह सारा कार्य करते समय परमेश्वर बिना किसी लाग-लपेट के अपने दिल के खून को, जो उसके पास है और जो वह स्वयं है उसको, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को और अपने स्वभाव के हर पहलू को थोड़ा-थोड़ा करके व्यक्त कर रहा है और मानवजाति के सामने ला रहा है, और उसका इन विधियों से इन चीजों का अभिव्यक्त करना और सामने लाना अभूतपूर्व है। इसलिए पूरे ब्रह्मांड में, उन लोगों को छोड़कर जिन्हें प्रबंधित करना और बचाना परमेश्वर का लक्ष्य है, दूसरा कोई प्राणी परमेश्वर के इतने करीब कभी नहीं रहा है और न ही किसी प्राणी का उसके साथ इतना अंतरंग संबंध रहा है। परमेश्वर के हृदय में वह मानवजाति सबसे महत्वपूर्ण है जिसका वह प्रबंधन करना और बचाना चाहता है, और वह इस मानवजाति को अन्य सभी से अधिक महत्व देता है। भले ही उसने इस मानवजाति के लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है और भले ही यह उसे लगातार ठेस पहुँचाती है और उससे विद्रोह करती है, फिर भी उसे कोई शिकायत या पछतावा नहीं है, वह अभी भी उसे छोड़ता नहीं है और न ही उसका परित्याग करता है और वह बिना रुके अपना कार्य करना जारी रखता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह जानता है कि देर-सबेर लोग उसके वचनों की पुकार से जाग जाएँगे, उसके वचनों से द्रवित हो जाएँगे, पहचान जाएँगे कि वही सृष्टिकर्ता है और फिर उसकी ओर लौट आएँगे ...
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
परमेश्वर चाहे जो करता हो या वह जो करता है उसे चाहे जिन उपायों से करता हो, क़ीमत चाहे जो हो, उसका ध्येय चाहे जो हो, किंतु उसके कार्यकलापों का उद्देश्य नहीं बदलता है। उसका उद्देश्य है मनुष्य में परमेश्वर के वचनों, और साथ ही मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं और उसके प्रति परमेश्वर के इरादों को आकार देना; दूसरे शब्दों में, यह मनुष्य के भीतर उस सबको आकार देना है जिसे परमेश्वर अपने सोपानों के अनुसार सकारात्मक चीजें मानता है, जो मनुष्य को परमेश्वर का हृदय समझने और परमेश्वर के सार को समझने और बूझने में समर्थ बनाता है, और मनुष्य को परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में समर्थ बनाता है, इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना प्राप्त करने देता है—यह सब परमेश्वर जो करता है उसमें निहित उसके उद्देश्य का एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि चूँकि शैतान परमेश्वर के कार्य में विषमता और सेवा करने वाली वस्तु है, इसलिए मनुष्य प्रायः शैतान को दिया जाता है; यह वह साधन है जिसका उपयोग परमेश्वर लोगों को शैतान के प्रलोभनों और हमलों में शैतान की दुष्टता, कुरूपता और घिनौनेपन को देखने देने के लिए करता है, इस प्रकार लोगों में शैतान के प्रति घृणा उपजाता है और उन्हें नकारात्मक चीजों को जानने और उनका भेद पहचानने में समर्थ बनाता है। यह प्रक्रिया उन्हें शैतान के नियंत्रण, आरोपों, विघ्नों और हमलों से धीरे-धीरे स्वयं को स्वतंत्र करने देती है—जब तक कि परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के प्रति अपने ज्ञान और समर्पण, और परमेश्वर के प्रति अपनी आस्था और परमेश्वर का भय मानने की बदौलत वे शैतान के हमलों और आरोपों पर पूरी तरह विजय नहीं पा लेते हैं; केवल तभी वे शैतान की सत्ता से पूर्णतः मुक्त कर दिए गए होंगे। लोगों की मुक्ति का अर्थ है कि शैतान की हार घोषित कर दी गई है, इसका अर्थ है कि वे अब शैतान के मुँह का भोजन नहीं हैं, कि वे अब शैतान द्वारा निगले नहीं जाएँगे, इसके बजाय शैतान ने उन्हें छोड़ दिया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोग खरे हैं, क्योंकि उनमें परमेश्वर के प्रति आस्था, समर्पण और भय है और क्योंकि उन्होंने शैतान के साथ पूरी तरह नाता तोड़ लिया है। वे शैतान को लज्जित करते हैं, वे शैतान को कायर बना देते हैं, और वे शैतान को पूरी तरह हरा देते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में उनकी आस्था, और परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसका भय शैतान को हरा देते हैं, और उन्हें पूरी तरह छोड़ देने के लिए शैतान को विवश कर देते हैं। केवल इस जैसे लोग ही परमेश्वर द्वारा सच में प्राप्त किए गए हैं, और यह मनुष्य को बचाने में परमेश्वर का चरम उद्देश्य है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का प्रबंधन ऐसा है : वह मनुष्य को शैतान के हवाले करता है—वह मनुष्य जो यह जानता ही नहीं कि परमेश्वर क्या है, सृष्टिकर्ता क्या है, परमेश्वर की आराधना कैसे करें या उसे परमेश्वर के प्रति समर्पण क्यों करना चाहिए—और वह शैतान को मनमाने ढंग से उसे भ्रष्ट करने देता है; कदम-दर-कदम, परमेश्वर तब मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस ले लेता है, जब तक कि मनुष्य पूरी तरह से परमेश्वर की आराधना नहीं करने लगता और शैतान को अस्वीकार नहीं कर देता। यही परमेश्वर का प्रबंधन है। यह किसी मिथक-कथा जैसा और समझने में मुश्किल लग सकता है। लोगों को यह किसी मिथक-कथा जैसा इसलिए लगता है, क्योंकि उन्हें इसका भान नहीं है कि पिछले हज़ारों सालों में मनुष्य के साथ कितना कुछ घटित हुआ है, और यह तो वे बिल्कुल भी नहीं जानते कि इस ब्रह्मांड और नभमंडल में कितनी कहानियाँ घट चुकी हैं। और इससे भी बढ़कर, ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपनी नश्वर आँखों से उस अधिक अद्भुत, अधिक भय पैदा करने वाली दुनिया को नहीं देख सकते जो भौतिक दुनिया से परे मौजूद है। यह उन्हें समझ से बाहर लगता है क्योंकि उन्हें परमेश्वर द्वारा मानवजाति के उद्धार के महत्व या उसके प्रबंधन कार्य के महत्व की कोई समझ नहीं है और वे यह नहीं समझते कि परमेश्वर वास्तव में किस प्रकार की मानवजाति चाहता है। क्या वह ऐसी मानवजाति है जो शैतान द्वारा बिल्कुल भी भ्रष्ट न की गई हो, जैसे आदम और हव्वा थे? नहीं! परमेश्वर के प्रबंधन का उद्देश्य लोगों के एक ऐसे समूह को प्राप्त करना है, जो उसकी आराधना करे और उसके प्रति समर्पित हो। हालाँकि ये लोग शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं, परंतु वे अब शैतान को अपने पिता के रूप में नहीं देखते; इसके बजाय, वे शैतान के भयानक चेहरे को पहचानते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं, और वे परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने के लिए उसके सामने आते हैं। वे जान जाते हैं कि कुरूप और पवित्र में क्या अंतर है, वे परमेश्वर की महानता और शैतान की बुराई को भी पहचान जाते हैं। इस प्रकार के मनुष्य अब शैतान की सेवा नहीं करेंगे, या शैतान की आराधना नहीं करेंगे, या शैतान को प्रतिष्ठापित नहीं करेंगे। इसका कारण यह है कि यह एक ऐसे लोगों का समूह है, जो सचमुच परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हैं। यही परमेश्वर द्वारा मानवजाति का प्रबंधन करने के कार्य की महत्ता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है
परमेश्वर ने मनुष्यों का सृजन किया और उसने उन्हें पृथ्वी पर रखा और तब से उनकी अगुआई की है और बाद में उसने उन्हें बचाया और मानवता के लिए पाप-बलि बना और अंत में, उसे अभी भी मानवता को जीतना होगा, मनुष्यों को पूरी तरह से बचाना होगा और उन्हें उनकी मूल समानता में वापस लौटाना होगा। यही वह कार्य है जिसमें वह आरंभ से अंत तक संलग्न रहा है—मनुष्य को उसकी मूल छवि और उसकी मूल समानता में वापस लौटाना। परमेश्वर अपना राज्य स्थापित करेगा और मनुष्य की मूल समानता बहाल करेगा, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर पृथ्वी पर और समस्त सृजित प्राणियों के बीच अपने अधिकार को बहाल करेगा। मनुष्यों ने शैतान से भ्रष्ट होने के बाद सृजित प्राणियों की जो भूमिका होनी चाहिए थी उसे खोने के साथ-साथ परमेश्वर का भय मानने वाला अपना हृदय भी गँवा दिया। वे सब परमेश्वर के प्रति विद्रोही शत्रु बन गए, शैतान की सत्ता के अधीन जीते थे और शैतान की चालाकी के वश में थे; इस प्रकार, अपने सृजित प्राणियों के बीच कार्य करने का परमेश्वर के पास कोई तरीका नहीं था और वह उनका भय प्राप्त कर पाने में और भी असमर्थ हो गया। मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया था और उन्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, पर उन्होंने वास्तव में परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया और इसके बजाय शैतान की आराधना करने लगे। शैतान उनके दिलों में आदर्श बन गया। इस प्रकार परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसके द्वारा मानवजाति के सृजन के पीछे का अर्थ खो गया। इसलिए मानवजाति के सृजन के अपने अर्थ को बहाल करने के लिए उसे उनकी मूल समानता को बहाल करना होगा और मानवजाति को उसके भ्रष्ट स्वभाव से मुक्ति दिलानी होगी। शैतान से मनुष्यों को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे उन्हें पाप से बचाना होगा। केवल इसी तरह परमेश्वर धीरे-धीरे उनकी मूल समानता और भूमिका को बहाल कर सकता है और अंततः अपने राज्य को बहाल कर सकता है। विद्रोह करने वाले उन पुत्रों का अंत में पूर्णतया विनाश भी इसलिए होगा कि मनुष्य बेहतर ढंग से परमेश्वर की आराधना कर सकें और पृथ्वी पर बेहतर ढंग से रह सकें। चूँकि परमेश्वर ने मानवों का सृजन किया, इसलिए वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाएगा; क्योंकि वह मानवता के मूल कार्य को बहाल करना चाहता है, वह उसे पूर्ण रूप से और बिना किसी मिलावट के बहाल करेगा। अपना अधिकार बहाल करने का अर्थ है, मनुष्यों से अपनी आराधना कराना और समर्पण कराना; इसका अर्थ है कि वह अपनी वजह से मनुष्यों को जीवित रखेगा और अपने अधिकार की वजह से अपने शत्रुओं का विनाश करेगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर किसी प्रतिरोध के बिना, मनुष्यों के बीच उस सब को बनाए रखेगा जो उसके बारे में है। जो राज्य परमेश्वर स्थापित करना चाहता है, वह उसका स्वयं का राज्य है। वह जिस मानवता की आकांक्षा रखता है वह ऐसी हो जो उसकी आराधना करे, जो उसके प्रति पूरी तरह समर्पण करे और जो उसकी महिमा से युक्त हो। यदि परमेश्वर ने भ्रष्ट मानवता को न बचाया तो उसके द्वारा मानवता के सृजन का अर्थ खत्म हो जाएगा; उसका मनुष्यों के बीच अब और अधिकार नहीं रहेगा और पृथ्वी पर उसके राज्य का अस्तित्व अब और नहीं रह पाएगा। यदि परमेश्वर ने उन शत्रुओं का नाश नहीं किया जो उसके प्रति विद्रोही हैं, तो वह अपनी संपूर्ण महिमा प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा, न ही वह पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना कर पाएगा। मानवता में से उन सबको पूरी तरह नष्ट करना, जो उसके प्रति विद्रोही हैं और जो पूर्ण किए जा चुके हैं, उन्हें विश्राम में लाना—ये उसका कार्य पूरा होने और उसकी महान उपलब्धि के चिह्न होंगे। जब मनुष्यों को उनकी मूल समानता में बहाल कर लिया जाएगा और जब वे अपने-अपने कर्तव्य अच्छे से निभा सकेंगे, अपने उचित स्थानों पर बने रह सकेंगे और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकेंगे, तब परमेश्वर ने पृथ्वी पर उन लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया होगा जो उसकी आराधना करते हैं और उसने पृथ्वी पर एक राज्य भी स्थापित कर लिया होगा जो उसकी आराधना करता है। पृथ्वी पर उसकी अनंत विजय होगी और वे सभी जो उसके विरोध में हैं, अनंतकाल के लिए नष्ट हो जाएँगे। इससे मनुष्य का सृजन करने की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी; इससे सब चीजों के सृजन की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी और इससे पृथ्वी पर, सभी चीजों के बीच, और शत्रुओं के बीच उसका अधिकार भी बहाल हो जाएगा। ये उसकी संपूर्ण विजय के चिह्न होंगे। इसके बाद से मानवता विश्राम में प्रवेश करेगी और ऐसे जीवन में प्रवेश करेगी, जो सही मार्ग पर है। मानवता के साथ परमेश्वर भी अनंत विश्राम में प्रवेश करेगा और एक ऐसा अनंत जीवन आरंभ करेगा जिसे स्वयं वह और मनुष्य दोनों ही साझा करते हों। पृथ्वी से गंदगी और विद्रोहीपन मिट जाएगा, पृथ्वी पर से सारा विलाप भी समाप्त हो जाएगा और परमेश्वर का विरोध करने वाली प्रत्येक चीज का अस्तित्व नहीं रहेगा। केवल परमेश्वर और वही लोग बचेंगे, जिनका उसने उद्धार किया है; केवल उसकी सृष्टि ही बचेगी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
परमेश्वर ने आज तक अपना छह हजार वर्षों का कार्य किया है और अपने बहुत-से कर्म प्रकट किए हैं, इसका मुख्य उद्देश्य शैतान को पराजित करना और समस्त मानवजाति को बचाना है। इस अवसर के माध्यम से परमेश्वर स्वर्ग की सारी चीजों, पृथ्वी पर की सारी चीजों और समुद्र के अंदर की सारी चीजों और यहाँ तक कि पृथ्वी के हर अंतिम प्राणी को अपनी सर्वशक्तिमत्ता और अपने सारे कर्म देखने देता है। वह शैतान को पराजित करने के इस अवसर के माध्यम से मानवजाति को अपने सारे कर्म प्रकट करता है ताकि वे उसकी स्तुति करें और शैतान को पराजित करने में उसकी बुद्धि का गुणगान कर सकें। पृथ्वी पर, स्वर्ग में और समुद्र के भीतर की सारी चीजें परमेश्वर को महिमा प्रदान करती हैं, उसकी सर्वशक्तिमत्ता की स्तुति करती हैं, उसके हर एक कर्म की स्तुति करती हैं और उसके पवित्र नाम को ऊँचे स्वर में पुकारती हैं। यह उसके द्वारा शैतान को हराने का प्रमाण है; यह शैतान पर उसकी विजय का प्रमाण है। उससे भी अधिक, यह उसके द्वारा मानवजाति के उद्धार का प्रमाण है। परमेश्वर की समस्त सृष्टि उसे महिमा प्रदान करती है, अपने शत्रु को पराजित करने और विजयी होकर लौटने के लिए उसकी स्तुति करती है और एक महान विजयी राजा के रूप में उसका गुणगान करती है। उसका उद्देश्य केवल शैतान को पराजित करना नहीं है, इसीलिए उसका कार्य छह हजार वर्ष से जारी रहा है। वह मानवजाति को बचाने के लिए शैतान की पराजय का उपयोग करता है; वह अपने सभी कर्मों को प्रकट करने के लिए और अपनी सारी महिमा को प्रकट करने के लिए शैतान की पराजय का उपयोग करता है। वह महिमा प्राप्त करेगा और स्वर्गदूतों की समस्त सभा उसकी सारी महिमा देखेगी। स्वर्ग में दूत, पृथ्वी पर मनुष्य और पृथ्वी पर उसकी समस्त सृष्टि सृष्टिकर्ता की महिमा देखेंगे। यही वह कार्य है जो वह करता है। स्वर्ग में और पृथ्वी पर उसकी सृष्टि, सभी उसकी महिमा को देखेंगे और वह शैतान को सर्वथा पराजित करने के बाद विजयोल्लास के साथ वापस लौटेगा, पूरी मानवजाति उसकी प्रशंसा करेगी—यह वह कार्य है जो एक बार में दो लक्ष्य हासिल करता है। अंत में समस्त मानवजाति उसके द्वारा जीत ली जाएगी, और वह ऐसे हर व्यक्ति को मिटा देगा जो उसका विरोध या विद्रोह करेगा, अर्थात्, वह उन सभी को मिटा देगा जो शैतान के हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई