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शुद्धिकरण की पीड़ा के मध्य ही शुद्ध बनता है इंसान का प्रेम

I

अपनी ज़िंदगी में सहे पतरस ने,

दर्द से भरे सैंकड़ों इम्तहान।

परमेश्वर के लिये उसके सबसे ऊँचे प्रेम की बुनियाद था ऐसा शोधन।

उसके पूरे जीवन का ये सबसे अहम अनुभव था।

परमेश्वर के लिये उसका प्रेम उसके संकल्प के कारण था,

मगर ये ज़्यादा उसके शोधन और कष्टों के कारण था।

परमेश्वर-प्रेम में ऐसा दुख उसका रहनुमा था,

उसकी सबसे यादगार चीज़ था।

परमेश्वर से प्रेम की राह में,

अगर शोधन के दर्द से न गुज़रे इंसान,

तो प्राथमिकताओं से भरा,

अपनी कुदरती राह पर ही चलता है उसका प्यार।

परमेश्वर से प्रेम की राह में,

अगर शोधन के दर्द से न गुज़रे इंसान,

तो शैतान के विचारों से भरा होता है उसका प्यार,

और परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर नहीं सकता उसका प्यार।

II

परमेश्वर को प्रेम करने का संकल्प करना,

नहीं है परमेश्वर को सच्चा प्रेम करने के समान।

हो सकता है इंसान के दिल की सोच,

परमेश्वर को प्रेम करने, उसे संतुष्ट करने की हो,

मानो उसमें इंसानी विचार न हों, मानो वो सब परमेश्वर की ख़ातिर ही हों।

मगर नहीं मिलती परमेश्वर के सामने प्रशंसा या आशीष इन विचारों को।

अगर समझ और जान भी ले इंसान सारे सत्यों को,

तो भी ये निशानी नहीं है, सचमुच प्रेम करने की परमेश्वर को।

हो सकता है बिना शोधन के समझ गया हो इंसान

अनेक सत्यों को,

तो भी अमल में लाने के काबिल नहीं है इंसान इन सत्यों को।

शुद्ध होने के बाद ही समझ सकता है इंसान,

इन सत्यों के असल मायने को

और सराह सकता है इनके गहन अर्थ को।

III

उस समय परमेश्वर की इच्छा के मुताबिक,

ला सकता है इंसान अमल में सत्य को।

तभी छूटेंगे उसके इंसानी ख़्याल,

तभी कम होगी सहजता उसकी।

और तभी कम होंगे सारे इंसानी जज़्बे भी उसके।

तभी जो कुछ करता है इंसान,

उससे ज़ाहिर होगा परमेश्वर के लिये इंसान का प्यार।

वचनों के ज्ञान से, चाहने से या समझ से

हासिल नहीं होती परमेश्वर को प्रेम करने की सच्चाई,

बल्कि चुकानी पड़ती है कीमत उसकी।

ये चाहती है दुख सहे इंसान, शुद्धिकरण में दुख सहे इंसान।

तभी इंसान का प्यार निर्मल होगा

और यकीनन परमेश्वर के दिल को संतुष्ट कर पाएगा,

और यकीनन परमेश्वर के दिल को संतुष्ट कर पाएगा,

और यकीनन परमेश्वर के दिल को संतुष्ट कर पाएगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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