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जब तुम देते हो अपना हृदय परमेश्वर को

I

ईश्वर से प्यार और उसमें आस्था के लिए,

मानव को छूना चाहिए उसके आत्मा को दिल से,

ताकि उन्हें मिले ईश्वर की संतुष्टि।

मानव को लगाना चाहिए परमेश्वर के वचन को दिल से,

ताकि वो प्रेरित हो जाएँ, परमेश्वर के आत्मा द्वारा।

यदि लोग परमेश्वर को अपने विश्वास में

नहीं देते उसे अपना दिल, अपना दिल

गर उसके बोझ को वे गले नहीं लगाते,

धोखा देते हैं ईश्वर को, अभ्यास करते हैं

धर्म का जो भी वो करते है उसमें।

ये नहीं पा सकता प्रशंसा परमेश्वर की।

जब तुम देते हो अपना दिल परमेश्वर को,

तुम पा सकते हो गहरा प्रवेश,

रहो ऊँची अन्तर्दृष्टि की सतहों पर,

और तुम पाओगे ज़्यादा समझ

अपनी कमज़ोरियों की और ग़लतियों की,

पूर्ण करने को अधीर ईश्वर की इच्छा,

सक्रिय, नहीं निष्क्रिय, प्रवेश में।

ये दिखाता है कि तुम सही व्यक्ति हो।

II

यदि तुम्हारा दिल ईश्वर में बहाया जाये,

और खामोश रह सके सामने उसके, सामने उसके।

पवित्रात्मा तुम्हें उपयोग में लाएगा,

रोशनी प्राप्त करोगे तुम।

पवित्र आत्मा तुम्हारी कमियों को पूर्ण करेगा।

जब तुम दिल ईश्वर को देते हो,

तुम समझोगे हर एक सूक्ष्म हलचल अपनी आत्मा में,

और हर प्रबुद्धता ईश्वर से।

इसे पकड़ कर रखो, तुम प्रवेश करोगे

परमेश्वर द्वारा सम्पूर्ण किए जाने के सही पथ में।

III

जब वे नहीं देते हैं अपना दिल ईश्वर को,

मानव की आत्मा बन जाती है मंद और सुन्न।

ऐसे लोगों के पास हक़ नहीं होगा

ईश्वर के वचन समझने का,

या ईश्वर से एक उचित संबंध का,

और उनका स्वभाव नहीं बदलेगा।

अपना स्वभाव बदलने का मतलब है देना

अपना दिल ईश्वर को पूरी तरह,

और प्रबुद्धता को प्राप्त करना

सभी वचनों से जो ईश्वर ने हैं कहे।

जब तुम देते हो अपना दिल परमेश्वर को

तुम पा सकते हो गहरा प्रवेश,

रहो ऊँची अन्तर्दृष्टि की सतहों पर,

और तुम पाओगे ज़्यादा समझ

अपनी कमज़ोरियों की और ग़लतियों की,

पूर्ण करने को अधीर ईश्वर की इच्छा,

सक्रिय, नहीं निष्क्रिय, प्रवेश में।

ये दिखाता है कि तुम सही व्यक्ति हो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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