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अपने पुनरूत्थान के बाद अपने चेलों के लिए यीशु के वचन

8

(यूहन्ना 20:26-29) आठ दिन के बाद उसके चेले फिर घर के भीतर थे, और थोमा उनके साथ था; और द्वार बन्द थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़े होकर कहा, "तुम्हें शान्ति मिले।" तब उसने थोमा से कहा, "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्वासी नहीं परन्तु विश्वासी हो।" यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, "हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर! यीशु ने उससे कहा, तू ने मुझे देखा है, क्या इसलिये विश्वास किया है, धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया।"

(यूहन्ना 21:16-17) उसने फिर दूसरी बार उससे कहा, "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" उसने उससे कहा, "हाँ, प्रभु; तू जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।" उसने उससे कहा मेरी भेड़ों की रखवाली कर। उसने तीसरी बार उससे कहा, "हे शमौन यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?" पतरस उदास हुआ कि उसने उससे तीसरी बार ऐसा कहा, "क्या तू मुझ से प्रीति रखता है? और उससे कहा, "हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है; तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ। यीशु ने उस से कहा, "मेरी भेड़ों को चरा।"

ये अंश जिसे फिर से बताते हैं वे कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद किया था और अपने चेलों से कहा था। पहले, आओ हम पुनरूत्थान से पहले के प्रभु यीशु और उसके बाद के प्रभु यीशु के मध्य किसी भी प्रकार केअन्तर पर एक नज़र डालें। क्या वह अभी भी पिछले दिनों के प्रभु यीशु के समान ही था? पवित्र शास्त्र में निम्नलिखित पंक्ति है जो पुनरूत्थान के बाद के प्रभु यीशु की चित्रण करती हैः "और द्वार बन्द थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़े होकर कहा, तुम्हें शांति मिले।" यह बिल्कुल स्पष्ट है कि उस समय प्रभु यीशु देह में नहीं था, परन्तु एक आध्यात्मिक देह था। यह इसलिए था क्योंकि उसने देह की सीमाओं को पार कर दिया था, और जब द्वार बन्द ही थे फिर भी वह लोगों के बीच में भीतर आ गया और उन्हें अपने आप को दिखाया। यह पुनरूत्थान के बाद के प्रभु यीशु और पुनरूत्थान के पहले के प्रभु यीशु जो देह में रह रहा था उन के मध्य सब से बड़ा अन्तर है। यद्यपि उस समय आध्यात्मिक देह के रूप और उस से पहले के प्रभु यीशु के रूप के बीच में कोई अन्तर नहीं था, फिर भी उस पल यीशु एक ऐसा यीशु बन गया था जो लोगों को एक अजनबी के समान लगता था, क्योंकि मुर्दों में से जी उठने के बाद वह एक आध्यात्मिक देह बन गया था, और अपनी पिछली देह की तुलना में, यह आध्यात्मिक देह लोगों के लिए कहीं ज़्यादा व्याकुल करने वाला और भ्रमित करने वाला था। इस ने प्रभु यीशु और लोगों के मध्य दूरियों को और अधिक बढ़ाया, और लोगों ने अपने हृदयों में महसूस किया कि उस समय प्रभु यीशु कहीं ज़्यादा रहस्यमयी बन गया था। लोगों की ऐसी समझ और भावनाओं ने उन्हें अचानक वापस एक ऐसे युग में पहुँचा दिया था जिस में वे एक ऐसे परमेश्वर पर विश्वास करते थे जिसे देखा और छुआ नहीं जा सकता था। इस प्रकार, वह पहली चीज़ जो प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद किया वह यह था कि उसने अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए, और अपने पुनरूत्थान को साबित करने के लिए हर एक को उसे देखने की अनुमति दी। इस के अतिरिक्त, उसने लोगों के साथ अपने रिश्ते को फिर से उस तरह सुधारा जैसा उनके साथ था जब वह देह में कार्य कर रहा था, और वह उनका मसीहा था जिसे वे देख और छू सकते थे। इस रीति से, एक परिणाम यह हुआ कि लोगों में कोई सन्देह नहीं था कि प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से ठोके जाने के बाद उसे मृत्यु से जिलाया गया था, और मानव जाति को छुड़ाने के प्रभु यीशु के कार्य में कोई सन्देह नहीं था। और दूसरा परिणाम वह प्रमाणित तथ्य है कि पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु ने लोगों के सामने अपने आप को प्रकट किया और लोगों को उसे देखने और छूने की अनुमति दी जिस ने अनुग्रह के युग में मानव जाति को दृढ़ता से सुरक्षित किया। इस समय के बाद से, प्रभु यीशु की "अनुपस्थिति" या "छोड़कर चले जाने" के कारण लोग वापस पिछले युग, अर्थात् व्यवस्था के युग में नहीं जा सकते थे, लेकिन वे प्रभु यीशु की शिक्षाओं और उस कार्य का अनुसरण करते हुए जो उसने किया था लगातार आगे बढ़ते जाएँगे। इस प्रकार, अनुग्रह के युग के कार्य में औपचारिक रूप से एक नया दौर खुल चुका था, और वे लोग जो लम्बे समय से व्यवस्था के अधीन थे, उसके बाद औपचारिक रूप से व्यवस्था से बाहर आ गए, औरएक नए युग में, एक नई शुरूआत के साथ प्रवेश किया।पुनरूत्थान के बाद मानव जाति के सामने प्रभु यीशु के दिखाई देने के ये ढेर सारे अर्थ हैं।

जबकि वह एक आध्यात्मिक देह था, तो लोग उसे कैसे छू सकते थे, और उसे कैसे देख सकते थे? यह मानव जाति के लिए प्रभु यीशु के प्रकटीकरण के महत्व से ताल्लुक रखता है। क्या तुम लोगों ने पवित्र शास्त्र के इन अंशों में किसी चीज़ पर ध्यान दिया? सामान्यतः आध्यात्मिक देहों को देखा या छुआ नहीं जा सकता है, और पुनरूत्थान के बाद जो कार्य प्रभु यीशु ने किया था वह पूर्ण हो चुका था। तो सैद्धांतिक रीति से, उसे उनसे मिलने के लिए लोगों के बीच में अपने मूल रूप में वापस आने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं थी, परन्तु जब थोमा जैसे लोगों के सामने प्रभु यीशु की आध्यात्मिक देह प्रकट हुई तो इस ने उस के महत्व को और भी ज़्यादा दृढ़ कर दिया, और इस ने लोगों के हृदयों को और गहराई से आर पार कर दिया था। जब वह थोमा के पास आया, उसने सन्देह करनेवाले थोमा को अपने हाथों को छूने दिया, और उस से कहाः "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्वासी नहीं परन्तु विश्वासी हो।" ये वचन, और ये कार्य वे चीज़ें नहीं थीं जिन्हें प्रभु यीशु केवल अपने पुनरूत्थान के बाद कहना या करना चाहता था, परन्तु ये वे चीज़ें थीं जिन्हें वह क्रूस पर कीलों से ठोके जाने से पहले करना चाहता था। यह प्रकट है कि जब प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से ठोका भी नहीं गया था तब से उसके पास थोमा जैसे लोगों की पहले से ही समझ थी। अतः हम इस से क्या देख सकते हैं? पुनरूत्थान के बाद भी वह वही प्रभु यीशु था। उसका सार नहीं बदला था। थोमा के सन्देह बस अभी शुरू नहीं हुए थे परन्तु जब से वह प्रभु यीशु का अनुसरण कर रहा था तब से हर समय उसके साथ थे, परन्तु प्रभु यीशु जो मुर्दों में से जी उठा था और आध्यात्मिक संसार से अपने मूल रूप के साथ, अपने मूल स्वभाव के साथ, और अपने देह में रहने के अपने समय से मानव जाति की अपनी समझ के साथ वापस आ चुका था, अतः थोमा को उसके पंजर पर हाथ रखने, पुनरूत्थान के बाद उसे अपनी आध्यात्मिक देह दिखाने, अपने आध्यात्मिक देह के अस्तित्व का स्पर्श और एहसास कराने, और पूर्णत: उसके सन्देहों को हटाने के लिए प्रभु यीशु पहले थोमा को ढूँढ़ने गया था। प्रभु यीशु के क्रूस पर ठोके जाने से पहले, थोमा ने हमेशा से सन्देह किया था कि वह मसीहा है कि नहीं, और उस पर विश्वास ना कर सका था। जो कुछ वह अपनी आँखों से देख सकता था, जो कुछ वह अपने हाथों से छू सकता था उसके आधार पर ही परमेश्वर के प्रति उसका विश्वास स्थापित हुआ था। इस प्रकार के व्यक्ति के विश्वास के विषय में प्रभु यीशु के पास एक अच्छी समझ थी। वे मात्र स्वर्गीय परमेश्वर पर विश्वास करते थे, और जिसे परमेश्वर ने भेजा है, या मसीह जो देह में था उस पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करते थे, और उसे स्वीकार करना नहीं चाहते थे। उसे प्रभु यीशु के अस्तित्व कीपहचान कराने और यह विश्वास दिलाने कि वही सचमुच में देहधारी परमेश्वर था, उसने थोमा को अपना हाथ बढ़ा कर अपने पांजर को छूने की अनुमति दी। क्या प्रभु यीशु के पुनरूत्थान के पहले और बाद मेंथोमा के सन्देह में कुछ अन्तर था? वह हमेशा से सन्देह करता था, और उसके सामने प्रभु यीशु के आध्यात्मिक देह के व्यक्तिगत रूप से प्रकट होने, और उसे अपनी देह में कीलों के निशानों को छूने देने के अलावा, कोई उसके सन्देहों का समाधान नहीं कर सकता था, और कोई उन्हें उस से दूर नहीं कर सकता था। अतः उस समय से जब प्रभु यीशु ने उसे अपने पंजर को छूने की अनुमति दी और उसे कीलों के निशानों का एहसास कराया, थोमा के सन्देह गायब हो गए थे, और उसने सचमुच में जाना कि प्रभु यीशु मुर्दों में से जी उठा था और उसने स्वीकार किया और विश्वास किया कि प्रभु यीशु ही सच्चा मसीहा था, और यह कि वह देहधारी परमेश्वर था। यद्यपि इस समय थोमा नेआगे से सन्देह नहीं किया, फिर भी उसने मसीह से मिलने का अवसर हमेशा के लिए खो दिया था। उसके साथ इकट्ठे होने, उसका अनुसरण करने, और उसे जानने का अवसर उसने हमेशा के लिए खो दिया था। प्रभु यीशु के द्वारा उसे सिद्ध बनाए जाने का अवसर उसने खो दिया था। प्रभु यीशु के प्रकटन और उसके वचनों ने उन लोगों के विश्वास पर एक निष्कर्ष, और एक आदेश प्रदान किया जो सन्देशों से भरे हुए थे। उसने सन्देह करनेवालों को बताने के लिए, और उन्हें बताने के लिए जो केवल स्वर्गीय परमेश्वर पर विश्वास करते थे किन्तु मसीह पर विश्वास नहीं करते थे अपने मूल वचनों और कार्यों का उपयोग किया था: परमेश्वर ने उनके विश्वास की भर्त्सना नहीं की, ना ही उसने उसकी तारीफ की जिनका वे अनुसरण करते थे जो सन्देहों से भरा हुआ था। जिस दिन उन्होंने परमेश्वर और मसीह पर पूर्णत: विश्वास किया था यह वह दिन था जब परमेश्वर ने अपने महान कार्य को पूर्ण किया था। निस्संदेह, यह वह दिन भी था जब उनके सन्देहों ने एक आदेश प्राप्त किया था। मसीह के प्रति उनकी प्रवृत्ति ने उनकी नियति का निर्धारण किया था, उनके ढीठ सन्देह का अभिप्राय था कि उनके विश्वास से उन्हें कोई परिणाम प्राप्त नहीं हुआ था, और उनकी कठोरता का अभिप्राय था कि उनकी आशाएँ व्यर्थ थीं। क्योंकि स्वर्गीय परमेश्वर पर उनका विश्वास भ्रान्तियों में पला बढ़ा था, और मसीह के प्रति उनका सन्देह वास्तव में परमेश्वर के प्रति उनकी वास्तविक प्रवृत्ति थी, भले ही उन्होंने प्रभु यीशु के देह के कीलों के निशानों को छुआ था, फिर भी उनका विश्वास बेकार ही था और उनके परिणाम को हवा में मुक्केबाजी करने के रूप में दर्शाया जा सकता था—व्यर्थ में। जो कुछ प्रभु यीशु ने थोमा से कहा वह हर एक व्यक्ति को भी साफ-साफ कह गया थाः पुनरूत्थित प्रभु यीशु ही वह प्रभु यीशु है जिसने प्रारम्भिक रूप से साढ़े तैंतीस साल मानव जाति के मध्य काम करते हुए बिताया था। यद्यपि उसे क्रूस पर कीलों से ठोंक दिया गया था और उसने मृत्यु की तराई का अनुभव किया था, और उसने पुनरूत्थान का अनुभव किया था, फिर भी उसके हर एक पहलू में कोई बदलाव नहीं हुआ था। यद्यपि अब भी उसके शरीर में कीलों के निशान थे, और यद्यपि वह पुनरूत्थित हो चुका था और क़ब्र से बाहर आ गया था, फिर भी उसका स्वभाव, मानव जाति की उसकी समझ, और मानव जाति के प्रति उसकी इच्छा थोड़ी सी भी नहीं बदली थी। साथ ही, वह लोगों से कह रहा था कि वह क्रूस से नीचे आ गया था, उसने पाप पर विजय पाई थी, कठिनाईयों पर विजय पाई थी, और मुत्यु पर जयवंत हुआ था। कीलों के निशान शैतान पर उसके विजय के बस प्रमाण थे, जो पूरे मानव जाति को सफलतापूर्वक छुड़ाने के लिए एक पाप बलि का प्रमाण दे रहे थे। वह लोगों से कह रहा था कि उसने पहले से ही उनके पापों को ले लिया है और उसने छुटकारे का कार्य पूर्ण कर लिया है। जब वह अपने चेलों को देखने वापस आया, उसने अपनी उपस्थिति से उनसे कहाः "मैं अभी जीवित हूँ, मैं अभी भी अस्तित्व में हूँ; आज मैं सचमुच में तुम लोगों के सामने खड़ा हूँ ताकि तुम लोग मुझे देख और छू सकते हो। मैं हमेशा तुम लोगों के साथ रहूँगा।" प्रभु यीशु भविष्य के लोगों को चेतावनी देने के लिए थोमा के उदाहरण का भी उपयोग करना चाहता था: यद्यपि तुम प्रभु यीशु में विश्वास करते हो, फिर भी ना तो तुम उसे देख सकते हो ना ही उसे छू सकते हो, तब भी, तुम अपने सच्चे विश्वास के द्वारा आशीषित हो सकते हो, और तुम अपने सच्चे विश्वास के जरिए प्रभु यीशु को देख सकते हो: इस प्रकार का व्यक्ति धन्य है।

……

वे लोग जो सन्देहों से भरे हुए हैं उनके प्रति यह प्रभु यीशु की प्रवृत्ति है। अतः प्रभु यीशु ने उन्हें क्या कहा, और उनके लिए क्या किया जो ईमानदारी से उस पर विश्वास करते हैं और उसका अनुसरण करने में समर्थ हैं? जो कुछ प्रभु यीशु ने पतरस से कहा उसके सम्बन्ध में हम आगे देखने जा रहे हैं।

इस वार्तालाप में, प्रभु यीशु ने लगातार पतरस से एक बात पूछीः "हे पतरस, क्या तू मुझ से प्रेम करता है?" यह वह ऊँचा स्तर है जिसकी माँग प्रभु यीशु अपने पुनरूत्थान के बाद पतरस के समान ही लोगों से करता है, जो सचमुच में मसीह पर विश्वास करते हैं और प्रभु से प्रेम करने के लिए संघर्ष करते हैं। यह प्रश्न एक प्रकार की खोजबीन थी, एक प्रकार की पूछताछ था, परन्तु इसके अतिरिक्त, यह पतरस के समान लोगों से की गई माँग और अपेक्षा थी। उसने प्रश्न पूछने के इस तरीके का प्रयोग किया ताकि लोग स्वयं पर विचार करें और स्वयं के भीतर झाँकें: लोगों से प्रभु यीशु की अपेक्षाएँ क्या हैं? क्या मैं प्रभु से प्रेम करता हूँ? क्या मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जो प्रभु से प्रेम करता है? मुझे किस प्रकार प्रभु से प्रेम करना चाहिए? भले ही प्रभु यीशु ने यह प्रश्न केवल पतरस से पूछा था, परन्तु सच्चाई यह है कि अपने हृदय में, वह इस अवसर का लाभ उठाना चाहता था ताकि पतरस से कह सके कि वह अधिक से अधिक लोगों से इस प्रकार का प्रश्न पूछे जो परमेश्वर से प्रेम करने की खोज में थे। यह सिर्फ पतरस ही है जो इस प्रकार के व्यक्ति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने, और स्वयं प्रभु यीशु के मुँह से प्रश्न को प्राप्त करने के लिए आशीषित था।

तुलना कीजिए, "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्वासी नहीं परन्तु, विश्वासी हो," जिसे प्रभु यीशु ने अपने पुनरूत्थान के बाद थोमा से कहा था, उसने पतरस से तीन बार प्रश्न पूछा थाः "हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है?" इसने लोगों को अनुमति दी कि वे प्रभु यीशु की प्रवृत्ति की कड़ाई, और उस तीव्र इच्छा का भली भांति एहसास करें जो उसने प्रश्न पूछने के समय महसूस किया था। जहाँ तक सन्देह करनेवाले थोमा और उसके मक्कार और धोखेबाज स्वभाव की बात है, प्रभु यीशु नेउसे अनुमति दी कि वह अपना हाथ बढ़ाए और उसके कीलों के निशान को छूए, जिसने उसे विश्वास दिलाया कि प्रभु यीशु ही पुनरूत्थित मनुष्य का पुत्र है और उसने मसीह के रूप में प्रभु यीशु की पहचान को स्वीकार किया। और यद्यपि प्रभु यीशु ने थोमा को सख्ती से नहीं डाँटा था, ना ही उसने मौखिक रूप से उस पर साफ साफ दण्ड की आज्ञा दी थी, परन्तु जब वह उस प्रकार के व्यक्ति के प्रति अपनी मनोवृत्ति और दृढ़ता को प्रदर्शित कर रहा था, तो उसने जाहिर किया कि वह उसे व्यावहारिक कार्यों के द्वारा समझ चुका था। इस प्रकार के व्यक्ति से प्रभु यीशु की माँगों और अपेक्षाओं को जो कुछ उसने कहा था उसके आधार पर देखा नहीं जा सकता है। क्योंकि थोमा जैसे लोगों के पास सामान्यतः सच्चे विश्वास की डोर नहीं होती है। उनके लिए प्रभु यीशु की माँगें बस यही थीं, लेकिन वह मनोवृत्तियाँजो उसने पतरस जैसे लोगों के लिए प्रकट किया था वह बिल्कुल भिन्न था। उसने यह माँग नहीं की थी कि पतरस अपना हाथ बढ़ाए और उसके कीलों के निशानों को छुए, ना ही उसने पतरस से कहाः "अविश्वासी नहीं परन्तु, विश्वासी हो।" उसके बजाए, उसने लगातार उससे वही प्रश्न पूछा। यह विचारों को उकसानेवाला, एवं अर्थपूर्ण प्रश्न था जो कोई मदद नहीं कर सकता था किन्तु मसीह के प्रत्येक अनुयायी को दुखी, और भयभीत करता है, लेकिन साथ ही प्रभु यीशु की चिन्ता, एवं दुखित स्वभाव का भी एहसास कराता है। और जब वे बड़े दर्द और कष्ट में होते हैं, तब वे प्रभु यीशु की चिन्ता और उसकी देखरेख को और अधिक अच्छे से समझ पाते है; वे शुद्ध, और ईमानदार लोगों के लिए उसकी सच्ची शिक्षाओं और कठिन माँगों को समझते हैं। प्रभु यीशु का प्रश्न लोगों को यह एहसास कराता है कि लोगों से प्रभु की माँगें इन सामान्य वचनों में प्रकट हैं जो मात्र उन में विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए नहीं हैं, लेकिन प्रेम को पाने, अपने प्रभु से प्रेम करने, और अपने परमेश्वर से प्रेम करने के लिए है। इस प्रकार का प्रेम देखरेख करनेवाला और आज्ञाकारी है। यह मनुष्यों के लिए परमेश्वर के लिए जीना, परमेश्वर के लिए मरना, परमेश्वर को सब कुछ समर्पित करना है, और परमेश्वर के लिए सब कुछ को खर्च करना एवं उसके लिए सब कुछ दे देना है। इस प्रकार का प्रेम परमेश्वर को सुख देना, गवाही पर उसे आनन्दित होने देना, और उसे विश्राम से रहने देना भी है। उनका उत्तरदायित्व, आभार और कर्त्तव्य है यह मानव जाति की तरफ से परमेश्वर को किया गया पुनःभुगतान है, और यह एक मार्ग है जिसका अनुसरण मानव जाति को जीवन भर करना चाहिए। ये तीनों प्रश्न एक माँग और प्रोत्साहन थे जिन्हें प्रभु यीशु ने पतरस और उन सभी लोगों से किया था जिन्हें सिद्ध बनाया जाएगा। ये वो तीन प्रश्न थे जिन्होंने पतरस को जीवन में अपने मार्ग को पूर्ण करने के लिए अगुवाई और प्रेरणा दी, और प्रभु यीशु के जाने के बाद भी ये वे प्रश्न थे जिन्होंने सिद्ध बनने की उसकी यात्रा को शुरू करने में पतरस की अगुवाई की, जिन्होंने प्रभु के प्रति उसके प्रेम के कारण उसकी अगुवाई की किवे प्रभु के हृदय का ख़्याल रखें, प्रभु की आज्ञाओं का पालन करें, प्रभु का सुख दें, और इस प्रेम के कारण अपने सम्पूर्ण जीवन और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को भेंट चढ़ा दें।

अनुग्रह के युग के दौरान, परमेश्वर का कार्य प्राथमिक रूप से दो प्रकार के लोगों के लिए था। पहला उस प्रकार के लोगों के लिए था जो उस पर विश्वास करते थे और उसका अनुसरण करते थे, जो उसकी आज्ञाओं को मान सकते थे, जो क्रूस को उठा सकते थे और अनुग्रह के युग के मार्ग को थामे रह सकते थे। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त करेगा और परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाएगा। दूसरे प्रकार का व्यक्ति पतरस के समान है, एक ऐसा व्यक्ति जिसे सिद्ध बनाया जाएगा। अतः पुनरूत्थान के बाद, प्रभु यीशु ने पहले इन दो अर्थपूर्ण चीज़ों को पूरा किया था। एक थोमा के साथ, और दूसरा पतरस के साथ। ये दोनों चीज़ें किसे दर्शाते हैं? क्या ये मानव जाति को बचाने के लिए परमेश्वर के सच्चे इरादों को दर्शाते हैं? क्या ये मानव जाति के प्रति परमेश्वर की निष्कपटता को दर्शाते हैं? वह कार्य जो उसने थोमा के साथ किया था वह लोगों की चेतावनी के लिए था कि वे सन्देह ना करें, बस विश्वास करें। वह कार्य जो उसने पतरस के साथ किया था वह पतरस जैसे लोगों के विश्वास को बलवन्त करने, और इस प्रकार के लोगों से स्पष्ट अपेक्षा करने, और यह दिखाने के लिए था कि उन्हें किन उद्देश्यों का अनुसरण करना चाहिए।

प्रभु यीशु पुनरूत्थित होने के बाद, उन लोगों के सामने प्रकट हुआ जिन्हें वह जरूरी समझता था, और उनसे बातें की, उनसे आकांक्षाएँ कीं, और लोगों के लिए अपनी इच्छाओं, और अपनी अपेक्षाओं को छोड़ कर चला गया। ऐसा कहना होगा, कि देहधारी परमेश्वर के रूप में, इससे फर्क नहीं पड़ता है कि यह उसके देह में रहने के समय के दौरान था, या क्रूस पर ठोके जाने और मुर्दों में से जी उठने के बाद अपनी आध्यात्मिक देह में रहने के समय था—मानव जाति के लिए उसकी चिन्ता और लोगों से उसकी आकांक्षाएँ नहीं बदली थीं। क्रूस के ऊपर चढ़ाए जाने से पहले वह इन चेलों को लेकर चिन्तित था; वह अपने हृदय में प्रत्येक व्यक्ति की अवस्था को लेकर स्पष्ट था, उसने प्रत्येक व्यक्ति की घटी को समझा, और वास्तव में उसकी मृत्यु एवं पुनरूत्थान के बाद भी प्रत्येक मनुष्य के प्रति उसकी समझ वही थी, और जैसा पहले वह शरीर में था उसके समान वह एक आध्यात्मिक देह बन गया। वह जानता था कि लोग मसीह के रूप में उसकी पहचान को लेकर पूर्णत: निश्चित नहीं थे, परन्तु देह में रहने के दौरान उसने लोगों से कठोर अपेक्षाएँ नहीं कीं। परन्तु पुनरूत्थित हो जाने के बाद प्रभु यीशु उनके सामने प्रकट हुआ, और उसने उन्हें पूर्णत: निश्चित कराया कि वह परमेश्वर से आया है, यह कि वह देहधारी परमेश्वर है, और उसने मानवजाति के द्वारा जीवन भर अनुसरण करने हेतु सब से बड़े दर्शन और अभिप्रेरणा के रूप में अपने प्रकटन और अपने पुनरूत्थान के तथ्य का उपयोग किया। मृत्यु से उसके पुनरूत्थान ने ना केवल उन सभों को मज़बूत किया जिन्होंने उसका अनुसरण किया था, बल्कि अनुग्रह के युग के उसके कार्य को पूर्णत: मानव जाति के मध्य प्रभावशील कर दिया था, और इस तरह प्रभु यीशु के उद्धार का सुसाचार अनुग्रह के युग में धीरे धीरे मानवता के हर छोर तक पहुँच गया। क्या तुम कहोगे कि पुनरूत्थान के बाद प्रभु यीशु के प्रकटीकरण का कोई महत्व था? उस समय यदि तुम थोमा या पतरस होते, और तुमने अपने जीवन में इस एक चीज़ का सामना किया होता जो इतना अर्थपूर्ण था, तो इसका तुम्हारे ऊपर किस प्रकार का प्रभाव पड़ता? क्या तुम परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए इसे अपने जीवन के सबसे बेहतरीन और सबसे बड़े दर्शन के रूप में देखोगे? क्या तुम इसे परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए एक प्रेरक शक्ति के रूप में देखोगे, उसे सन्तुष्ट करने के लिए संघर्ष करोगे, और अपने जीवन में उसके प्रेम का अनुसरण करोगे? सभी दर्शनों में से सबसे बड़े दर्शन को फैलाने के लिए क्या तुम जीवन भर का प्रयास करोगे? क्या तुम प्रभु यीशु के उद्धार के सुसमाचार को फैलाने की आज्ञा को परमेश्वर से प्राप्त एक महान आदेश के रूप में लोगे? भले ही तुम लोगों ने इसका अनुभव नहीं किया है, फिर भी आधुनिक लोगों के लिए परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर को स्पष्ट रीति से समझने के लिए थोमा और पतरस के दो मामले काफी हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के देहधारी होने के बाद, उसके द्वारा मानव जाति के मध्य जीवन और एक मानवीय जीवन का व्यक्तिगत रीति से अनुभव करने के बाद, और उसके द्वारा मानव जाति की भ्रष्टता और मानवीय जीवन को देखने के बाद, देहधारी परमेश्वर ने मानव जाति की असहायता, उदासी, और दयनीयता का एहसास किया था। देह में रहते हुए अपनी मानवता के कारण, और देह में अपने अंतःज्ञान की वजह से परमेश्वर मनुष्यों की स्थिति के लिए और अधिक तरस से भर गया। इससे वह अपने अनुयायियों को लेकर और अधिक चिन्तित हो गया। शायद ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें तुम लोग नहीं समझ सकते हो, परन्तु मैं इस वाक्यांश से उसके हर एक अनुयायी के लिए देहधारी परमेश्वर की चिन्ता और देखरेख का चित्रण कर सकता हूँ: गहन चिन्ता। भले ही यह शब्द मानवीय भाषा से आता है, और यद्यपि यह बिल्कुल मानवीय कहावत है, फिर भी यह अपने अनुयायियों के लिए परमेश्वर के एहसासों को सचमुच में प्रकट और चित्रित करता है। जहाँ तक मनुष्यों के लिए परमेश्वर की अत्यधिक चिन्ता की बात है, अपने अनुभवों के क्रम में तुम लोग धीरे-धीरे इसका एहसास करोगे और इसका स्वाद चखोगे। फिर भी, अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुसरण करके परमेश्वर के स्वभाव को धीरे-धीरे समझने के द्वारा इसे प्राप्त किया जा सकता है। प्रभु यीशु की उपस्थिति ने मानवता में अपने अनुयायियों के लिए उसकी अत्यधिक चिन्ता को क्रियान्वित किया और उसे उसके आध्यात्मिक देह को सौंप दिया या तुम लोग यह कह सकते हो कि उसकी दिव्यता को सौंप दिया था। जब वह सामर्थ्यपूर्ण ढंग से यह प्रमाणित कर रहा था कि परमेश्वर ही वह एक है जो एक युग को आरम्भ करता है, उस युग को विकसित करता है, और वह ही एक है जो एक युग को समाप्त करता है तब उसकी उपस्थिति ने लोगों को परमेश्वर की चिन्ता और देखरेख को एक अलग प्रकार से अनुभव और एहसास करने की अनुमति दी। अपने प्रकटीकरण के द्वारा उसने लोगों के विश्वास को मज़बूत किया था, और अपनी उपस्थिति के द्वारा उसने संसार के सामने उस सच को साबित किया कि वह स्वयं परमेश्वर है। उसने अपने अनुयायियों को अनंत दृढ़ता प्रदान की, और साथ ही अपने प्रकटीकरण के जरिए उसने एक नए युग में अपने कार्य के एक दौर की शुरूआत की।

"वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी" से