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सूचीपत्र

पाखंड क्या है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

"फरीसी" शब्द की परिभाषा क्या है? यह कोई ऐसा व्यक्ति है जो पाखंडी है, जो नक़ली है और अपने हर कार्य में नाटक करता है, अच्छा, दयालु और सकारात्मक होने का ढोंग करता है। क्या वे वास्तव में इस तरह के हैं? वे पाखंडी हैं, और इसलिए उनमें जो कुछ भी व्यक्त और प्रकट होता है वह झूठ है, वह सब ढोंग है—यह उनका असली चेहरा नहीं है। उनका असली चेहरा उनके हृदयों के भीतर छिपा है; यह दिखायी नहीं देता है। यदि लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं, यदि वे सत्य को नहीं समझते हैं, तो उनके धार्मिक ज्ञान और उनके द्वारा प्राप्त सिद्धांत क्या बन जाते हैं? क्या वे सिद्धांत के वचन बन जाते हैं जो लोग अक्सर बोलते हैं? लोग ढोंग करने और अपने को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करने के लिए इन तथा-कथित सही सिद्धांतों का उपयोग करते हैं। वे जहाँ कहीं भी जाते हैं, जिन चीज़ों के बारे में बात करते हैं, वे जो कहते हैं, और उनका बाहरी व्यवहार दूसरों को सही और अच्छा लगता है। वे सभी व्यक्ति की अवधारणाओं और रुचि के अनुरूप हैं। दूसरों की नज़रों में, वे धर्मनिष्ठ और विनम्र होते हैं। वे सहिष्णु, सहनशील और दूसरों के प्रति प्रेम रखने वाले होते हैं। वास्तव में, यह सब नक़ली है—यह सब ढोंग है। बाहर से, वे परमेश्वर के प्रति वफादार हैं, लेकिन पर्दे के पीछे, वे जो कुछ भी करते हैं, वह लापरवाही से किया गया होता है। सतही तौर पर, उन्होंने अपने परिवार और अपनी आजीविका को छोड़ दिया है, वे कड़ी मेहनत करते हैं और खुद को व्यय करते हैं—लेकिन वास्तव में वे कलीसिया से गुप्त रूप से मुनाफा कमा रहे हैं और चढ़ावों को चुरा रहे हैं! जो कुछ भी वे बाहर प्रकट करते हैं, उनका सारा व्यवहार, नक़ली है! एक पाखंडी फरीसी होने का यही अर्थ है। "फरीसी"—ये लोग कहाँ से आते हैं? क्या वे अविश्वासियों के बीच दिखाई देते हैं? ये सभी विश्वासियों के बीच दिखाई देते हैं। ये विश्वासी उसमें क्यों बदल जाते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि परमेश्वर के वचनों ने उन्हें इस तरह का बनाया है? उनका इस तरह का बनने का कारण मुख्य रूप से यह है कि उन्होंने ग़लत रास्ता अपनाया है। वे परमेश्वर के वचनों को एक उपकरण के रूप में मान लेते हैं जिससे वे स्वयं को शस्त्र-सज्जित करते हैं; वे खुद को इन वचनों के साथ शस्त्र-सज्जित करते हैं और उन्हें जीवित रहने के लिए, बिना कुछ दिए कुछ पाने के लिए, पूँजी के रूप में मानते हैं। वे धार्मिक सिद्धांतों का प्रचार करने के अलावा कुछ नहीं करते हैं, और उन्होंने कभी परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं किया है। उनका कथित अच्छा व्यवहार और अच्छा आचरण, वह थोड़ा सा जो उन्होंने त्यागा और व्यय किया है वह पूरी तरह से मज़बूरी में किया गया है, यह सब उनके द्वारा किया गया नाटक है। वे पूरी तरह से नक़ली हैं; यह सब ढोंग है। इन लोगों के हृदयों में परमेश्वर के प्रति जरा सी भी श्रद्धा नहीं है, और वे परमेश्वर में कोई सच्ची आस्था भी नहीं रखते हैं। इससे भी अधिक, वे अविश्वासियों में से हैं। यदि लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं, तो वे इस तरह के रास्ते पर चलेंगे, और वे फरीसी बन जाएँगे। क्या यह डरावना नहीं है?

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "जीवन में प्रगति के छह संकेतक" से उद्धृत

सतही अच्छे व्यवहार की खोज, फिर आध्यात्मिकता के आभास का उपयोग करके अपने लिए एक ढोंग बनाने की पूरी कोशिश करना; एक आध्यात्मिक व्यक्ति का रूप अपनाना; तू जो कहता है, करता है और प्रकट करता है उसमें आध्यात्मिकता का आभास देना; कुछ चीज़ें करना जो लोगों की अवधारणाओं और कल्पनाओं में प्रशंसनीय हैं—यह सब झूठी आध्यात्मिकता की खोज है, और यह पाखंड है। तू उच्च बातें करने वाले वचनों और सिद्धांत पर खड़ा है, लोगों को अच्छे कर्मों को करने, अच्छे लोग बनने, और सत्य की खोज करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहता है, लेकिन तेरे अपने व्यवहार और अपने कर्तव्य के प्रदर्शन में, तूने कभी भी सत्य की तलाश नहीं की, तूने कभी भी सत्य के सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं किया, तू कभी भी यह नहीं समझ पाया है कि सत्य में किस बारे में बोला गया है, परमेश्वर की इच्छा क्या है, मनुष्य से उसे किन मानकों की अपेक्षा है—तूने इनमें से किसी को भी कभी भी गंभीरता से नहीं लिया है। जब तू कुछ समस्याओं का सामना करता है, तो तू पूरी तरह से अपनी मर्जी के अनुसार कार्य करता है और परमेश्वर को एक तरफ़ रख देता है। क्या ये बाहरी क्रियाएँ और आंतरिक स्थितियाँ, परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना हैं? यदि लोगों की आस्था और उनके सत्य के अनुसरण के बीच कोई संबंध नहीं है, तो फिर चाहे वे कितने भी वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास क्यों न करें, वे वास्तव में परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में असमर्थ होंगे। और इसलिए उस प्रकार के लोग किस प्रकार के मार्ग पर चल सकते हैं? वे अपने आप को किस चीज़ से सज्जित करने में अपने दिनों को बिताते हैं? क्या ये चीज़ें वचन और सिद्धांत नहीं हैं? क्या वे अपने आप को फरीसियों की तरह और अधिक बनाने, ऐसे लोगों की तरह अधिक बनाने के लिए जो कथित रूप से परमेश्वर की सेवा करते हैं, अपने आप को वचनों और सिद्धांतों से सज्जित, सुशोभित करते हुए, अपने दिनों को नही बिताते हैं? ये सभी क्रियाएँ क्या हैं? वे बस बँधे-बँधाये ढर्रे पर चल रहे हैं; वे विश्वास के ध्वज को लहरा रहे हैं और धार्मिक संस्कारों को निभा रहे हैं, आशीष पाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं। वे परमेश्वर की आराधना बिल्कुल नहीं करते हैं।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "यदि तू हर समय परमेश्वर के सामने रह सकता है केवल तभी तू उद्धार के पथ पर चल सकता है" से उद्धृत

कुछ लोगों में अपनी ओर ध्यान खींचने की विशेष प्रवृत्ति होती है। अपने भाई-बहनों की उपस्थिति में, वे कहते हैं कि वह परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ है, परंतु उनकी पीठ पीछे, वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और पूरी तरह से कुछ और ही करते हैं। क्या वे धार्मिक फरीसियों जैसे नहीं हैं? एक ऐसा व्यक्ति जो सच में परमेश्वर से प्यार करता है और जिसमें सत्य है वह परमेश्वर के प्रति निष्ठावान है, परंतु वह बाहर से ऐसा प्रकट नहीं करता है। परिस्थिति उत्पन्न होने पर वह सत्य का अभ्यास करने को तैयार रहता है और अपने विवेक के विरुद्ध जाकर नहीं बोलता है या कार्य नहीं करता है। चाहे परिस्थिति कुछ भी हो, जब मामले उठते हैं तो वह बुद्धि का प्रदर्शन करता है और अपने कर्मों में उच्च सिद्धांत वाला होता है। इस तरह का व्यक्ति ही वह व्यक्ति है जो सच में सेवा करता है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता के लिए दिखावटी प्रेम करते हैं। वे कई दिनों तक चिंता में अपनी भौंहें चढ़ा कर अपने दिन बिताते हैं, एक बनावटी अच्छा व्यक्ति होने का नाटक करते हैं, और एक दयनीय मुखाकृति का दिखावा करते हैं। कितना तिरस्करणीय है! यदि तुम उनसे पूछते कि "तुम परमेश्वर के प्रति किस प्रकार से आभारी हो? कृपया मुझे बताओ!" तो वे निरुत्तर हो जाते। यदि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो, तो इस बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा मत करो, बल्कि परमेश्वर के प्रति अपना प्रेम दर्शाने के लिए अपने वास्तविक अभ्यास का उपयोग करो, और एक सच्चे हृदय से उससे प्रार्थना करो। जो परमेश्वर के साथ व्यवहार करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करते हैं वे सभी पाखंडी हैं। कुछ लोग प्रत्येक प्रार्थना के साथ परमेश्वर के प्रति आभार के बारे में बोलते हैं, और जब कभी भी वे प्रार्थना करते हैं, तो पवित्र आत्मा के द्रवित हुए बिना ही रोना आरंभ कर देते हैं। इस तरह के मनुष्य धार्मिक रिवाजों और अवधारणाओं से सम्पन्न होते हैं; वे सदैव यह विश्वास करते हुए ऐसे रीति-रिवाजों और अवधारणाओं के साथ जीते हैं कि ऐसी क्रियाएँ परमेश्वर को प्रसन्न करती हैं, और यह कि सतही धार्मिकता या दुःखभरे आँसुओं का परमेश्वर समर्थन करता है। ऐसे बेतुके लोगों से कौन सी भलाई आ सकती है? अपनी विनम्रता का प्रदर्शन करने के लिए, कुछ लोग दूसरों की उपस्थिति में अनुग्रह का दिखावा करते हैं। कुछ लोग दूसरों के सामने जानबूझकर किसी नितान्त शक्तिहीन मेमने की तरह चापलूस होते हैं। क्या यह राज्य के लोगों का चाल-चलन है? राज्य के व्यक्ति को जीवंत और स्वतंत्र, भोला-भाला और स्पष्ट, ईमानदार और प्यारा होना चाहिए; एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो स्वतंत्रता की स्थिति में हो। उसमें चरित्र और प्रतिष्ठा हो, और जहाँ कहीं जाए वह गवाही दे सकता हो; वह परमेश्वर और मनुष्य दोनों का प्यारा हो। वे जो विश्वास में नौसिखिये होते हैं उनके पास बहुत से बाहरी अभ्यास होते हैं; उन्हें सबसे पहले निपटान और काट-छांट की एक अवधि से अवश्य गुज़रना चाहिए। जिनके हृदय में परमेश्वर का विश्वास है वे बाहरी रूप से दूसरों को अलग नहीं दिखते हैं, किन्तु उनकी क्रियाएँ और कर्म दूसरों के लिए प्रशंसनीय हैं। केवल ऐसे ही व्यक्ति परमेश्वर के वचनों पर जीवन बिताने वाले समझे जा सकते हैं। यदि तुम इस व्यक्ति को प्रतिदिन सुसमाचार का उपदेश देते हो, और उसे उद्धार में ला रहे हो, तब भी अंत में, तुम नियमों और सिद्धांतों में जी रहे हो, तब तुम परमेश्वर के लिए महिमा नहीं ला सकते हो। इस प्रकार के चाल-चलन के लोग धार्मिक लोग हैं, और पाखंडी भी हैं।

जब कभी भी ऐसे धार्मिक लोग जमा होते हैं, वे पूछते हैं, "बहन, इन दिनों तुम कैसी रही हो?" वह उत्तर देती है, "मैं परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ महसूस करती हूँ और कि मैं उसके हृदय की इच्छा को पूरा करने में असमर्थ हूँ।" दूसरी कहती है, "मैं भी परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हूँ और उसे संतुष्ट करने में असमर्थ हूँ।" ये कुछ वाक्य और वचन अकेले ही उनके हृदयों की गहराई की अधम चीजों को व्यक्त करते हैं। ऐसे वचन अत्यधिक घृणित और अत्यंत अरुचिकर हैं। ऐसे मनुष्यों की प्रकृति परमेश्वर का विरोध करती है। जो लोग वास्तविकता पर ध्यान केन्द्रित करते हैं वे वही संचारित करते हैं जो उनके हृदयों में होता है और संवाद में अपने हृदय को खोल देते हैं। उनमें एक भी झूठा श्रम, कोई शिष्टताएँ या खोखली मधुर बातें नहीं होती है। वे हमेशा स्पष्ट होते हैं और किसी पार्थिव नियम का पालन नहीं करते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिनमें, बिना किसी समझ के, बाह्य प्रदर्शन की प्रवृत्ति होती है। जब कोई दूसरा गाता है, तो वह नाचने लगता है, यहाँ तक कि यह समझे बिना कि उसके बरतन का चावल पहले से ही जला हुआ है। लोगों के इस प्रकार के चाल-चलन धार्मिक या सम्माननीय नहीं हैं, और बहुत ही तुच्छ हैं। ये सब वास्तविकता के अभाव की अभिव्यक्तियाँ है! जब कुछ लोग आत्मा में जीवन के मामलों के बारे में संगति करने के लिए इकट्ठा होते हैं, यद्यपि वे परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ होने की बात नहीं करते हैं, फिर भी वे अपने हृदयों में उसके प्रति एक सच्चे प्यार को कायम रखते हैं। परमेश्वर के प्रति तुम्हारी कृतज्ञता का दूसरों से कोई लेना देना नहीं है; तुम परमेश्वर के प्रति कृतज्ञ हो, न कि किसी मनुष्य के प्रति। इसलिए इस बारे में लगातार दूसरों से कहना तुम्हारे किस उपयोग का है? तुम्हें अवश्य सत्य में प्रवेश करने को महत्व देना चाहिए, न कि बाहरी उत्साह या प्रदर्शन को।

मनुष्य के सतही अच्छे कर्म किस चीज का प्रतिनिधित्व करते हैं? वे देह की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, और यहाँ तक कि बाहरी सर्वोत्तम अभ्यास भी जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करते है, केवल तुम्हारी अपनी व्यक्तिगत मनोदशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। मनुष्य के बाहरी अभ्यास परमेश्वर की इच्छा को पूरा नहीं कर सकते हैं। तुम निरतंर परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता की बातें करते रहते हो, तब भी तुम दूसरे को जीवन की आपूर्ति नहीं कर सकते हो या परमेश्वर से प्रेम करने के लिए दूसरों को उत्तेजित नहीं कर सकते हो। क्या तुम विश्वास करते हो कि ऐसे कार्य परमेश्वर को प्रसन्न करेंगे? तुम विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर के हृदय की इच्छा है, यह आत्मा की इच्छा है, किन्तु सच में यह बेतुका है! तुम विश्वास करते हो कि जो तुम्हें अच्छा लगता है और जो तुम चाहते हो, उसी में परमेश्वर आनंदित होता है। क्या जो तुम्हें अच्छा लगता है, परमेश्वर को अच्छा लगने का प्रतिनिधित्व कर सकता है? क्या मनुष्य का चरित्र परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है? जो तुम्हें अच्छा लगता है निश्चित रूप से यह वही है जिससे परमेश्वर घृणा करता है, और तुम्हारी आदतें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर घृणा करता है और अस्वीकार करता है। यदि तुम कृतज्ञ महसूस करते हो, तो परमेश्वर के सामने जाओ और प्रार्थना करो। इस बारे में दूसरों से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तुम परमेश्वर के सामने प्रार्थना नहीं करते हो, और इसके बजाय दूसरों की उपस्थिति में निरंतर अपनी ओर ध्यान आकर्षित करवाते हो, तो क्या इससे परमेश्वर के हृदय की इच्छा को पूरा किया जा सकता है? यदि तुम्हारी क्रियाएँ सदैव दिखावे के लिए ही हैं, तो इसका अर्थ है कि तुम मनुष्यों में सबसे व्यर्थ हो। वह किस तरह का व्यक्ति है जिसके केवल सतही अच्छे कर्म हैं, किन्तु सच्चाई से रहित हैं? ऐसे लोग पाखंडी फरीसी और धार्मिक लोग हैं। यदि तुम लोग अपने बाहरी अभ्यासों को नहीं छोड़ते हो और परिवर्तन नहीं कर सकते हो, तो तुम लोगों के पाखंड के तत्व और भी अधिक बढ़ जाएँगे। पाखंड के तत्व जितना अधिक होते हैं, परमेश्वर के प्रति विरोध उतना ही अधिक होता है, और अंत में, इस तरह के मनुष्य निश्चित रूप से त्याग दिए जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर" से उद्धृत

एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन का मतलब है परमेश्वर के समक्ष जीवन जीना। प्रार्थना करते समय एक व्यक्ति परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत कर सकता है, और प्रार्थना के माध्यम से पवित्र आत्मा से ज्ञान पाने की कामना कर सकता है, परमेश्वर के वचनों को जान सकता है, और परमेश्वर की इच्छा को समझ सकता है। परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय कोई व्यक्ति इस बात पर और अधिक साफ़ और स्पष्ट हो सकता है कि; परमेश्वर इस वक़्त क्या करना चाहते हैं, और रूढ़िवादी न होते हुए वह अभ्यास का एक नया रास्ता पा सकता है ताकि उसके अभ्यास का उद्देश्य केवल जीवन में प्रगति प्राप्त करना हो। उदाहरण के तौर पर, किसी की प्रार्थना अच्छे शब्दों का इस्तेमाल करने के उद्देश्य से नहीं होती, या परमेश्वर के सामने अपने कर्तव्य को व्यक्त करने के लिए ऊँचे स्वर में पुकारने के लिए नहीं होती, बल्कि यह किसी व्यक्ति के आत्मा का अभ्यास करने के लिए, परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत करने के लिए, हर चीज में परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन की खोज करने के लिए, अपने दिल को ऐसा दिल बनाने के लिए होती है जो हर दिन नए प्रकाश की ओर खिंचा जाता है, यह निष्क्रिय और आलसी होने के लिए नहीं बल्कि परमेश्वर के शब्दों के अभ्यास के सही मार्ग पर चलने के लिए होती है। वर्तमान में ज्यादातर लोगों का ध्यान तरीकों पर है, और वे जीवन में प्रगति हासिल करने के लिए सच्चाई की खोज करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं; यहीं लोग भटक जाते हैं। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो, नए प्रकाश को प्राप्त करने में सक्षम हैं, फिर भी उनके तरीकों में बदलाव नहीं होता है; वे परमेश्वर का आज का वचन पाने के लिए पुरानी धार्मिक धारणाओं को जोड़ते हैं, और वे जिसका आत्मसात करते हैं वह अब भी वो सिद्धांत है जो अपने साथ धार्मिक विचारों को लिए फिरता है, और वे शुद्ध रूप से आज की रोशनी अपने अंदर नहीं ले रहे। इसलिए, उनकी प्रथाएँ अशुद्ध हैं-वे एक नए नाम के साथ वही काम कर रहे हैं, और चाहे उनका अभ्यास कितना ही अच्छा क्यों न हो, यह अभी भी पाखंड से भरा है। परमेश्वर लोगों का रोज़ाना नई चीज करने के लिए मार्गदर्शन देते हैं, और वे अपेक्षा करते हैं कि लोग हर दिन नई अंतर्दृष्टि और नई समझ प्राप्त करें, और पुराने जमाने के या नीरस ना हों। यदि तुमने परमेश्वर में कई सालों से विश्वास किया है, लेकिन तुम्हारे तरीकों में कोई बदलाव नहीं हुआ है, यदि तुम अब भी बाहर से प्रबल और व्यस्त हो, और परमेश्वर के सामने शांत ह्रदय से उनके वचन का आनंद लेने नहीं आते हो, तो तुम कुछ भी नही पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के सम्बन्ध में" से उद्धृत

तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? अधिकांश लोग इस प्रश्न से हैरान हैं। उनके पास व्यावहारिक परमेश्वर और स्वर्ग के परमेश्वर के बारे में हमेशा से बिलकुल दो भिन्न दृष्टिकोण रहे हैं, जो दिखाता है कि वे आज्ञापालन के लिए नहीं, बल्कि कुछ निश्चित लाभों को प्राप्त करने, या विपत्तियों के कष्ट से बच निकलने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। केवल तभी वे थोड़ा बहुत आज्ञाकारी होते हैं, किन्तु उनकी आज्ञाकारिता सशर्त है, यह उनकी स्वयं की व्यक्तिगत भावी संभावनाओं के वास्ते है, और जो उन पर जबरदस्ती डाली जाती है। इसलिए: तुम परमेश्वर पर विश्वास क्यों करते हो? यदि यह केवल तुम्हारी संभावनाओं, और तुम्हारे भाग्य के लिए है, तो बेहतर है कि तुम विश्वास ही मत करो। इस प्रकार का विश्वास आत्म-वंचना, आत्म-आश्वासन और आत्म-प्रशंसा है। यदि तुम्हारा विश्वास परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की नींव पर नहीं बना है, तो अंततः तुम्हें परमेश्वर का विरोध करने के परिणामस्वरूप दण्डित किया जाएगा। वे सभी जो अपने विश्वास में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की खोज नहीं करते हैं, परमेश्वर का विरोध करते हैं। परमेश्वर कहता है कि लोग सत्य की खोज करें, कि वे परमेश्वर के वचन के लिए प्यासे हों, और परमेश्वर के वचनों को खाएँ एवं पीएँ, और उन्हें अभ्यास में लाएँ, ताकि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता को प्राप्त कर सकें। यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ सचमुच में इस प्रकार की हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें उन्नत करेगा, और वह निश्चित रूप से तुम्हारे प्रति अनुग्रहपूर्ण होगा। कोई भी इस पर सन्देह नहीं कर सकता है, और कोई भी इसे बदल नहीं सकता है। यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता के वास्ते नहीं हैं, और तुम्हारे अन्य लक्ष्य हैं, तो जो कुछ भी तुम कहते और करते हो—परमेश्वर के सामने तुम्हारी प्रार्थनाएँ, और यहाँ तक कि तुम्हारे प्रत्येक कार्यकलाप—परमेश्वर के विरोध में होंगे। तुम मृदुभाषी एवं विनम्र-व्यवहार वाले हो सकते हो, तुम्हारा हर कार्यकलाप और अभिव्यक्ति सही दिखायी दे सकती है, तुम एक ऐसा व्यक्ति दिखाई दे सकते हो जो कि आज्ञाकारी है, किन्तु जब परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रेरणाओं एवं परमेश्वर में विश्वास के बारे में तुम्हारे दृष्टिकोण की बात आती है, तो जो कुछ भी तुम करते हो वह परमेश्वर के विरोध में और बुरा होता है। जो लोग भेड़ों के समान आज्ञाकारी प्रतीत होते हैं, परन्तु जिनके हृदय बुरे इरादों को आश्रय देते हैं, वे भेड़ की खाल में भेड़िए हैं, वे प्रत्यक्षत: परमेश्वर का अपमान करते हैं, और परमेश्वर उन में से एक को भी नहीं छोड़ेगा। पवित्र आत्मा उन में से प्रत्येक को प्रकट करेगा, ताकि सभी यह देख सकें कि उन में से प्रत्येक से, जो पाखण्डी हैं, पवित्र आत्मा के द्वारा निश्चित रूप से घृणा की जाएगी एवं उनका तिरस्कार किया जाएगा। चिंता मत करो: परमेश्वर बारी-बारी से उन में से प्रत्येक के साथ निपटेगा और उनका समाधान करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए" से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

यह पहचानना कि पादरी और एल्डर पाखंडी फरीसी और मसीह-विरोधी हैं या नहीं, केवल यह देख कर नहीं हो सकता कि वे बाहर से लोगों के साथ कैसा बर्ताव करते हैं। अहम बात ये है कि वे प्रभु और सत्य के साथ कैसा बर्ताव करते हैं। बाहर से वे विश्वासियों के प्रति स्नेही हो सकते हैं, लेकिन क्या उनके मन में प्रभु के लिए प्रेम है? अगर वे लोगों के प्रति बहुत प्रेमपूर्ण हैं, लेकिन प्रभु और सत्य के प्रति ऊब और नफ़रत से भरे हुए हैं, और अंत के दिनों के मसीह—सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आलोचना और निंदा करते हैं, तो क्या वे पाखंडी फरीसी नहीं हैं? क्या वे मसीह-विरोधी नहीं हैं? बाहर से देखने पर वे प्रवचन देते हुए और मेहनतकश-से लगते हैं, लेकिन अगर ये ताज सजा कर पुरस्कृत होने की खातिर है, तो क्या इसका ये मतलब हो सकता है कि वे प्रभु की आज्ञा मानते हैं और उनके प्रति वफादार हैं? कोई इंसान पाखंडी है या नहीं, यह पहचानने के लिए, आपको उनके दिल में झांकना होगा और उनके इरादों को समझना होगा। चीज़ों की असलियत जानने के लिए यह सबसे अहम बात है। परमेश्वर लोगों के दिल की गहराईयों का मुआयना करते हैं। इसलिए यह देखने के लिए कि कोई इंसान प्रभु से सच्चा प्रेम करता है या नहीं और उनकी आज्ञा मानता है या नहीं, अहम चीज़ यह देखना है कि क्या वे उनके वचन पर अमल करते हुए उससे जुड़े रहते हैं और उनके आदेशों का मान बनाये रखते हैं, और साथ ही यह देखना भी है कि क्या वे प्रभु यीशु को गौरवान्वित करते हैं और उनकी गवाही देते हैं, और क्या वे परमेश्वर की इच्छा का पालन करते हैं। हम देखते हैं कि फरीसी अक्सर आराधनालयों में लोगों के सामने धर्मग्रंथों की व्याख्या किया करते थे, हर चीज़ के लिए बाइबल के नियमों का पालन करते थे, और लोगों के प्रति भी प्रेमपूर्ण थे। लेकिन असलियत में, उनके किये हर काम में परमेश्वर के वचन का पालन नहीं होता था या परमेश्वर के आदेशों का मान नहीं रखा जाता था, परंतु वह सिर्फ इसलिए किया जाता था कि लोग उसे देखें। बिलकुल जैसे कि प्रभु यीशु ने उनको बेनकाब करते वक्त कहा था: "वे अपने सब काम लोगों को दिखाने के लिये करते हैं: वे अपने ताबीजों को चौड़ा करते और अपने वस्त्रों की कोरें बढ़ाते हैं" (मत्ती 23:5)। वे लंबी प्रार्थनाएँ करने के लिए जानबूझ कर आराधनालयों और सड़क की मोड़ों पर खड़े हो जाते। उपवास के दौरान वे जनबूझ कर अपने चेहरों को उदास बना लेते, ताकि लोग जान सकें कि वे उपवास कर रहे हैं। वे जानबूझ कर सड़कों पर अच्छे काम करते ताकि लोगों की नज़र उन पर पड़े। उन्होंने प्राचीन परंपराओं और धार्मिक रीति-रिवाजों को भी जारी रखा जैसे कि "अच्छी तरह से हाथ धोये बिना खाना न खायें।" ...लोगों को अपना साथ देने और अपनी आराधना करवाने के जाल में फांसने के लिए, फरीसी खुद को छुपाने के लिए राई का पहाड़ बना लेते, और सिर्फ धार्मिक आराधना, गायन और गुणगान या कुछ प्राचीन परंपराओं से चिपके रहने के लिए ही लोगों की अगुवाई करते, लेकिन परमेश्वर के वचन पर चलने, उनके आदेशों का मान बनाये रखने, और सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए लोगों की अगुवाई नहीं करते थे। इतना ही नहीं, उन्होंने सत्य पर चलने और परमेश्वर के आज्ञापालन और उनकी आराधना करने के लिए लोगों की अगुवाई नहीं की। उन लोगों ने विश्वासियों को असमंजस में डालकर धोखा देने के लिए बस कुछ बाहरी कार्यकलापों का इस्तेमाल किया! जब प्रभु यीशु उपदेश देने और कार्य करने आये, धर्मपरायण होने का नाटक कर रहे इन फरीसियों ने अपने ओहदों और रोजी-रोटी को बचाने के लिए वास्तव में "बाइबल की रक्षा करने" के बहाने परमेश्वर के व्यवस्थाओं और आदेशों का खुले आम त्याग कर दिया। उन लोगों ने अफवाहें रचीं, झूठी गवाहियां दीं, और प्रभु यीशु की घोर निंदा कर उनको झूठे मामलों में फंसाया, उन्होंने विश्वासियों को प्रभु यीशु का अनुसरण करने से रोकने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। अंत में, उन लोगों ने प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ाने के लिए सत्ताधारियों के साथ सांठ-गांठ भी कर ली। इस तरह से, फरीसियों का पाखंडी और सत्य से नफ़रत करनेवाला स्वभाव पूरी तरह से बेनकाब हो गया। इस प्रकार उनके मसीह-विरोधी सार का पूरी तरह से खुलासा हो गया। इससे पता चलता है कि फरीसियों का सार पाखंडी, बेईमान, धोखेबाज और दुर्भावनापूर्ण था। वे सभी झूठे अगुआ थे, जिन्होंने परमेश्वर का मार्ग छोड़ दिया, लोगों को धोखा दिया और उन्हें पिंजड़ों में बंद कर दिया! उन्होंने देहधारी मसीह को प्रचंडता से नकारते हुए, उनकी निंदा करते हुए और उनसे नफ़रत करते हुए, धार्मिक दुनिया को परमेश्वर का विरोध करने के लिए अपने काबू में करके, विश्वासियों को धोखा देकर अपने चंगुल में फंसा लिया। ये बात यह साबित करने के लिए काफी है कि वे मसीह-विरोधी थे, जो अपना खुद का राज्य स्थापित करना चाहते थे!

अब हम फरीसियों के पाखंड की तरह-तरह की अभिव्यक्तियों को देख सकते हैं। जब हम उनकी तुलना आजकल के धार्मिक पादरियों और एल्डर्स से करते हैं, तो क्या हमें पता नहीं चलेगा कि वे बिल्कुल फरीसियों जैसे ही हैं, और ये सब वैसे लोग हैं, जो प्रभु के वचन पर नहीं चलते और प्रभु के आदेशों का मान नहीं बनाये रखते, और इतना ही नहीं, वे ऐसे लोग नहीं हैं, जो प्रभु का गौरव बढ़ायें और प्रभु की गवाही दें? वे सिर्फ ऐसे लोग हैं, जो आँख बंद करके बाइबल में विश्वास करते हैं, बाइबल की आराधना करते हैं, और बाइबल को गौरवान्वित करते हैं। वे तरह-तरह के धार्मिक रीति-रिवाजों से चिपके रहते हैं, जैसे कि नियमित सेवाओं में मौजूद रहना, ऊषाकाल की प्रार्थना करना, रोटी साझा करना, पवित्र परमप्रसाद में भाग लेना, वगैरह-वगैरह। वे लोगों से सिर्फ विनम्र होने, सब्र रखने, धर्मपरायण होने, और स्नेही होने के बारे में चर्चा करने पर ही ध्यान देते हैं, लेकिन वे परमेश्वर से दिल से प्रेम नहीं करते, और इतना ही नहीं, वे परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं करते और उनके दिल में परमेश्वर के प्रति निष्ठा है ही नहीं। उनके कार्य और उनके उपदेशों का ज़ोर सिर्फ बाइबल के ज्ञान और धर्माशास्त्रीय सिद्धांत से चिपक कर उसकी व्याख्या करने पर ही होता है। लेकिन जब बात आती है कि, प्रभु के वचन का पालन और अनुभव कैसे करें, प्रभु के आदेशों का पालन कैसे करें और प्रभु के वचन का प्रचार कैसे करें और गवाही कैसे दें, लोग स्वर्गिक पिता की इच्छा का पालन कैसे करें, सही मायनों में, परमेश्वर से प्रेम कैसे करें, उनकी आज्ञा का पालन और उनकी आराधना कैसे करें, और ऐसी सारी बातें जो प्रभु यीशु मानवजाति से चाहते हैं, तो वे उनके बारे में खोज नहीं करते, जांच-पड़ताल नहीं करते, और प्रभु के मकसदों को जानने की कोशिश नहीं करते, और यही नहीं, उनका पालन करने या उन्हें पूरा करने में लोगों की अगुवाई नहीं करते। हर जगह जा-जाकर बाइबल के ज्ञान और धर्मशास्त्रीय सिद्धांत पर उपदेश देने का उनका मकसद शेखी बघारना और स्वयं को बड़ा बनाना होता है, और लोगों के नज़रों में ऊँचा उठना होता है, ताकि वे उनकी आराधना करें। इसलिए, जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंत के दिनों में सत्य व्यक्त करने और अपना न्याय का कार्य करने आये, तो इन पादरियों और एल्डर्स ने, धार्मिक दुनिया में स्थाई सत्ता पाने, और विश्वासियों पर नियंत्रण करने और अपना खुद का राज्य बनाने की महत्वाकांक्षा की खातिर, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बारे में अफवाहें गढ़कर, उन पर हमला करके और उनका तिरस्कार और आलोचना करके, और लोगों के सच्चे मार्ग को खोजने और उसकी जाँच-पड़ताल करने से रोकने के लिए पुरजोर कोशिश करके, प्रभु यीशु के वचन का खुले तौर पर उल्लंघन किया। मिसाल के तौर पर, प्रभु यीशु ने हमें बुद्धिमान कुंवारियां बनना सिखाया: जब हम किसी को चिल्लाता हुआ सुनें "देखो, दूल्हा आ रहा है!" तो हमें बाहर जा कर उनका स्वागत करना चाहिए। लेकिन जब पादरियों और एल्डर्स ने प्रभु यीशु के दोबारा आने की खबर सुनी, तो उन्होंने ऐसा करने के बजाय कलीसिया को नज़रबन्द कर दिया और विश्वासियों को सच्चे मार्ग को खोजने और उसकी जाँच-पड़ताल करने से रोकने की भरसक कोशिश की! प्रभु यीशु ने हमें अपने पड़ोसियों को अपने समान ही प्रेम करना सिखाया था। फिर भी, उन लोगों ने विश्वासियों को उकसाया कि वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की गवाही देनेवाले भाई-बहनों को बदनाम करें और मारे-पीटें। प्रभु यीशु ने मनुष्य से झूठ न बोलने और झूठी गवाही न देने को कहा था, लेकिन पादरियों और एल्डर्स ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को बदनाम करने के लिए हर तरह की झूठी कहानियां गढ़ीं, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य का विरोध करने और उसको बदनाम करने और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को दाग़दार बनाने के लिए राक्षसी सीसीपी के साथ सांठ-गांठ भी की। ...इससे हमें पता चलता है कि धार्मिक पादरियों और एल्डर्स ने जो कहा और किया है, वह प्रभु की शिक्षाओं का पूरी तरह स्व उल्लंघन है। वे बिल्कुल पाखंडी फरीसियों जैसे ही हैं। वे सब ऐसे लोग हैं, जो आँख बंद करके अगुवाई करते हैं, परमेश्वर का विरोध करते हैं, और लोगों को धोखा देते हैं।

— "राज्य के सुसमाचार पर विशिष्ट प्रश्न और उत्तर संकलन" से उद्धृत

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