1. आप गवाही देते हैं कि प्रभु देह बन गया है, गुप्त रूप से पृथ्वी पर उतरा है, और परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को कर रहा है। यह कैसे हो सकता है? बाइबल स्पष्ट रूप से भविष्यवाणी करती है, “तब मनुष्य के पुत्र का चिह्न आकाश में दिखाई देगा, और तब पृथ्वी के सब कुलों के लोग छाती पीटेंगे; और मनुष्य के पुत्र को बड़ी सामर्थ्य और ऐश्‍वर्य के साथ आकाश के बादलों पर आते देखेंगे(मत्ती 24:30)। “देखो, वह बादलों के साथ आनेवाला है, और हर एक आँख उसे देखेगी, वरन् जिन्होंने उसे बेधा था वे भी उसे देखेंगे, और पृथ्वी के सारे कुल उसके कारण छाती पीटेंगे(प्रकाशितवाक्य 1:7)। हमारा मानना है कि जब परमेश्वर लौटता है, तो उसे बादलों के साथ लौटना चाहिए और सभी लोगों के सामने खुलकर प्रकट होना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु पहले से ही देह बन चुका है और गुप्त रूप से पृथ्वी पर उतरा है, जो हमारी समझ से पूरी तरह से भिन्न है। यहाँ क्या चल रहा है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“हमारे पास जो भविष्यद्वक्‍ताओं का वचन है, वह इस घटना से दृढ़ ठहरा। तुम यह अच्छा करते हो जो यह समझकर उस पर ध्यान करते हो कि वह एक दीया है, जो अन्धियारे स्थान में उस समय तक प्रकाश देता रहता है जब तक कि पौ न फटे और भोर का तारा तुम्हारे हृदयों में न चमक उठे। पर पहले यह जान लो कि पवित्रशास्त्र की कोई भी भविष्यद्वाणी किसी के अपने ही विचारधारा के आधार पर पूर्ण नहीं होती, क्योंकि कोई भी भविष्यद्वाणी मनुष्य की इच्छा से कभी नहीं हुई, पर भक्‍त जन पवित्र आत्मा के द्वारा उभारे जाकर परमेश्‍वर की ओर से बोलते थे” (2 पतरस 1:19-21)

“देख, मैं चोर के समान आता हूँ; धन्य वह है जो जागता रहता है, और अपने वस्त्र की चौकसी करता है कि नंगा न फिरे, और लोग उसका नंगापन न देखें” (प्रकाशितवाक्य 16:15)

“यदि तू जागृत न रहेगा तो मैं चोर के समान आ जाऊँगा, और तू कदापि न जान सकेगा कि मैं किस घड़ी तुझ पर आ पड़ूँगा” (प्रकाशितवाक्य 3:3)

“तुम भी तैयार रहो; क्योंकि जिस घड़ी तुम सोचते भी नहीं, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा” (लूका 12:40)

“क्योंकि जैसे बिजली आकाश के एक छोर से कौंध कर आकाश के दूसरे छोर तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य का पुत्र भी अपने दिन में प्रगट होगा। परन्तु पहले अवश्य है कि वह बहुत दुःख उठाए, और इस युग के लोग उसे तुच्छ ठहराएँ” (लूका 17:24-25)

“आधी रात को धूम मची : ‘देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो’” (मत्ती 25:6)

“देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ” (प्रकाशितवाक्य 3:20)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

कई सहस्राब्दियों से मनुष्य ने उद्धारकर्ता के आगमन को देखने की लालसा की है। मनुष्य उद्धारकर्ता यीशु को एक सफेद बादल पर सवार होकर व्यक्तिगत रूप से उन लोगों के बीच उतरते देखने के लिए तरसा है, जो हज़ारों सालों से उसके लिए लालायित रहे हैं और उसकी आशा की है। मनुष्य ने यह भी लालसा की है कि उद्धारकर्ता वापस लौटे और उसके साथ फिर से जुड़े; अर्थात् लोगों से हज़ारों सालों से अलग हुए उद्धारकर्ता यीशु के वापस आने और एक बार फिर से छुटकारे के उस कार्य को करने की, जो उसने यहूदियों के बीच किया था, मनुष्य के प्रति दयालु और प्रेममय होने की, मनुष्य के पाप क्षमा करने और उन्हें अपने ऊपर लेने की, यहाँ तक कि मनुष्य के सभी अपराध ग्रहण करने और उसे पाप से बचाने की लालसा की है। मनुष्य उद्धारकर्ता यीशु के पहले के समान होने की लालसा करता है—ऐसा उद्धारकर्ता जो प्यारा, दयालु और आदरणीय है, जो मनुष्य से कभी गुस्सा नहीं होता, और जो कभी मनुष्य को धिक्कारता नहीं, बल्कि जो मनुष्य के सारे पाप क्षमा करता है और उन्हें अपने ऊपर ले लेता है, यहाँ तक कि जो एक बार फिर से मनुष्य के लिए सलीब पर अपनी जान दे देगा। जब से यीशु गया है, वे चेले जो उसका अनुसरण करते थे, और वे सभी संत जिन्हें उसके नाम पर बचाया गया था, वे बेतहाशा उसे याद कर रहे और उसके आने की अपेक्षा कर रहे हैं। वे सभी, जो अनुग्रह के युग के दौरान यीशु मसीह के अनुग्रह द्वारा बचाए गए थे, अंत के दिनों के दौरान उस उल्लास भरे दिन की लालसा कर रहे हैं, जब उद्धारकर्ता यीशु सफेद बादल पर सवार होकर असंख्य लोगों के बीच प्रकट होगा। निस्संदेह, यह उन सभी लोगों की सामूहिक इच्छा भी है, जो आज उद्धारकर्ता यीशु के नाम को स्वीकार करते हैं। विश्व भर में वे सभी, जो उद्धारकर्ता यीशु के उद्धार को जानते हैं, वे अत्यधिक लालायित हैं कि यीशु मसीह अचानक आकर, पृथ्वी पर कहे अपने ये वचन पूरे करे : “मैं जैसे गया था वैसे ही मैं वापस आऊँगा।” मनुष्य मानता है कि सलीब पर चढ़ने और पुनरुत्थान के बाद यीशु सर्वोच्च परमेश्वर की दाईं ओर अपना स्थान ग्रहण करने के लिए सफेद बादल पर सवार होकर स्वर्ग वापस चला गया था। इसी प्रकार यीशु फिर से सफेद बादल पर सवार होकर (यह बादल उस बादल को संदर्भित करता है, जिस पर यीशु तब सवार हुआ था, जब वह स्वर्ग वापस गया था), उन लोगों के बीच वापस आएगा, जिन्होंने हज़ारों सालों से उसके लिए बेतहाशा लालसा की है, और वह यहूदियों का स्वरूप और उनके कपड़े धारण करेगा। उनके सामने प्रकट होने के बाद वह उन्हें भोजन प्रदान करेगा, उनके लिए जीवंत जल को उड़ेलेगा और मनुष्यों के बीच में रहेगा, अनुग्रह और प्रेमपूर्ण अनुकंपा से भरा हुआ, जीवंत और वास्तविक। ये सभी वे धारणाएँ हैं, जिन्हें लोग मानते हैं। किंतु उद्धारकर्ता यीशु ने ऐसा नहीं किया; उसने जो किया वह मनुष्य की धारणाओं के बिल्कुल विपरीत था। वह उन लोगों के बीच में नहीं आया, जिन्होंने बेसब्री से उसकी वापसी की लालसा की थी, और वह सफेद बादल पर सवार होकर असंख्य मनुष्यों के सामने प्रकट नहीं हुआ। वह पहले ही आ चुका है, किंतु मनुष्य उसे नहीं जानता, वह इससे अनभिज्ञ बना हुआ है। मनुष्य केवल निरुद्देश्य होकर उसका इंतज़ार कर रहा है—उसे थोड़ा भी अंदाजा नहीं है कि वह तो पहले ही “सफेद बादल” पर सवार होकर नीचे आ चुका है (वह सफेद बादल, जो उसका आत्मा, उसके वचन, उसका संपूर्ण स्वभाव और उसका स्वरूप है), और वह अब उन विजेताओं के समूह के बीच है, जिसे वह अंत के दिनों के दौरान बनाएगा। मनुष्य इसे कैसे जान सकता था कि भले ही पवित्र उद्धारकर्ता यीशु मनुष्य के प्रति प्रेमपूर्ण अनुकंपा और प्रेम से भरा हुआ है, पर उसका उन “मंदिरों” में कार्य करना संभव नहीं है जो गंदगी से भरे हैं और जहाँ अशुद्ध आत्माएँ रहती हैं? यद्यपि मनुष्य उसके आगमन का इंतज़ार करता रहा है, फिर भी वह उनके सामने कैसे प्रकट हो सकता है जो अधार्मिक का मांस खाते हैं, अधार्मिक का रक्त पीते हैं और अधार्मिकों के वस्त्र पहनते हैं, जो उस पर विश्वास तो करते हैं फिर भी उसे जानते नहीं, और लगातार उससे जबरदस्ती माँगते रहते हैं? मनुष्य केवल यही जानता है कि उद्धारकर्ता यीशु प्रेमपूर्ण अनुकंपा और दयालुता से परिपूर्ण है, और वह एक पाप-बलि है जो छुटकारे से भरपूर है। परंतु मनुष्य को नहीं पता कि वह स्वयं परमेश्वर है, जो धार्मिकता, प्रताप, कोप और न्याय से लबालब भरा है, और अधिकार और गौरव से संपन्न है। इसलिए, भले ही मनुष्य छुटकारा दिलाने वाले की वापसी के लिए उत्सुकता से लालायित रहता है और उसके लिए तरसता है, यहाँ तक कि उसकी प्रार्थनाएँ “स्वर्ग” को भी द्रवित कर देती हैं, किंतु उद्धारकर्ता यीशु उन लोगों के सामने प्रकट नहीं होता, जो उस पर विश्वास तो करते हैं किंतु उसे जानते नहीं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, उद्धारकर्ता पहले ही एक “सफेद बादल” पर सवार होकर वापस आ चुका है

यदि, जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है, यीशु पुनः आएगा और अंत के दिनों में तब भी यीशु कहलाएगा, और तब भी एक सफेद बादल पर यीशु की छवि में मनुष्य के बीच अवरोहण करेगा : तो क्या यह उसके कार्य की पुनरावृत्ति नहीं होगी? क्या पवित्र आत्मा पुराने से चिपके रह सकता है? मनुष्य जो कुछ भी मानता है, वे धारणाएँ हैं, और जो कुछ भी मनुष्य समझता है, वह शाब्दिक अर्थ के अनुसार है, और साथ ही उसकी कल्पनाओं के अनुसार है; वे पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों के प्रतिकूल हैं, और परमेश्वर के विचारों से मेल नहीं खाते हैं। परमेश्वर उस तरह से कार्य नहीं करेगा; परमेश्वर इतना अज्ञानी और नासमझ नहीं है, और उसका कार्य इतना सरल नहीं है जितना कि तुम कल्पना करते हो। लोगों की कल्पनाओं के अनुसार, यीशु एक बादल पर सवार होकर आएगा और तुम लोगों के बीच उतरेगा। तुम लोग उसे देखोगे, जो एक बादल पर सवारी करते हुए तुम लोगों को बताएगा कि वह यीशु है। तुम लोग उसके हाथों में कीलों के निशान भी देखोगे, और उसे यीशु के रूप में जानोगे। और वह तुम लोगों को फिर से बचाएगा, और तुम लोगों का शक्तिशाली परमेश्वर होगा। वह तुम लोगों को बचाएगा, तुम लोगों को एक नया नाम प्रदान करेगा, और तुम लोगों में से प्रत्येक को एक सफ़ेद पत्थर देगा, जिसके बाद तुम लोगों को स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने दिया जाएगा और स्वर्ग में तुम्हारा स्वागत किया जाएगा। क्या इस तरह के विश्वास मनुष्य की धारणाएँ नहीं हैं? क्या परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं के अनुसार कार्य करता है, या क्या वह मनुष्य की धारणाओं के विपरीत कार्य करता है? क्या मनुष्य की सभी धारणाएँ शैतान से नहीं आतीं? क्या सब मनुष्य शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं किए गए हैं? यदि परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं के अनुसार अपना कार्य करता, तो क्या वह शैतान नहीं बन गया होता? क्या वह उसी प्रकार का नहीं होता, जैसे सृजित प्राणी हैं? चूँकि सृजित प्राणी अब शैतान द्वारा इतने भ्रष्ट हो गए हैं और मनुष्य शैतान का मूर्त रूप बन गया है, इसलिए यदि परमेश्वर शैतान की चीज़ों के अनुसार कार्य करता, तो क्या वह शैतान के साथ मिला हुआ नहीं होता? मनुष्य परमेश्वर के कार्य की थाह कैसे पा सकता है? इसलिए, परमेश्वर कभी मनुष्य की धारणाओं के अनुसार कार्य नहीं करेगा, और कभी उस तरह से कार्य नहीं करेगा, जैसी तुम कल्पना करते हो। तुम कह सकते हो कि स्वयं परमेश्वर ने कहा था कि वह एक बादल पर आएगा। यह सच है कि परमेश्वर ने स्वयं ऐसा कहा था, पर क्या तुम नहीं जानते कि कोई मनुष्य परमेश्वर के रहस्यों की थाह नहीं पा सकता? क्या तुम नहीं जानते कि कोई मनुष्य परमेश्वर के वचनों की व्याख्या नहीं कर सकता? क्या तुम, बिना लेशमात्र संदेह के, निश्चित हो कि तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और रोशन कर दिया गया था? निश्चित रूप से ऐसा नहीं था कि पवित्र आत्मा ने तुम्हें इतने प्रत्यक्ष तरीके से निर्देश दिया था? क्या वह पवित्र आत्मा था, जिसने तुम्हें निर्देश दिए थे, या तुम्हारी स्वयं की धारणाओं ने तुम्हें ऐसा सोचने के लिए प्रेरित किया? तुम कह सकते हो, “यह स्वयं परमेश्वर द्वारा कहा गया था।” किंतु हम परमेश्वर के वचनों को मापने के लिए अपनी धारणाओं और मन का उपयोग नहीं कर सकते। जहाँ तक यशायाह के वचनों की बात है, क्या तुम पूरी निश्चितता के साथ उसके वचनों की व्याख्या कर सकते हो? क्या तुम उसके वचनों की व्याख्या करने का साहस करते हो? चूँकि तुम यशायाह के वचनों की व्याख्या करने का साहस नहीं करते, तो तुम यीशु के वचनों की व्याख्या करने का साहस क्यों करते हो? कौन अधिक बड़ा है, यीशु अथवा यशायाह? चूँकि उत्तर यीशु है, तो तुम यीशु द्वारा बोले गए वचनों की व्याख्या क्यों करते हो? क्या परमेश्वर अपने कार्य के बारे में तुम्हें अग्रिम रूप से बताएगा? कोई एक सृजित प्राणी भी नहीं जान सकता, यहाँ तक कि स्वर्ग के दूत भी नहीं, और न ही मनुष्य का पुत्र जान सकता है, तो तुम कैसे जान सकते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

परमेश्वर के प्रकटन का अर्थ है कि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आता है। वह अपनी स्वयं की पहचान, अपने स्वभाव और अपने अंतर्निहित तरीके से, एक नए युग का आरंभ करने और पुराने युग का अंत करने का कार्य करने के लिए मनुष्यजाति के बीच उतरता है। इस तरह का प्रकटन किसी अनुष्ठान का रूप नहीं है। यह कोई संकेत, कोई तसवीर, कोई चमत्कार या एक प्रकार का भव्य दर्शन नहीं है, और किसी प्रकार की धार्मिक प्रक्रिया तो दूर की बात है। बल्कि यह एक असली और वास्तविक तथ्य है, जिसे किसी के भी द्वारा छुआ और देखा जा सकता है। इस तरह का प्रकटन केवल औपचारिकता निभाने के लिए या एक प्रकार के अल्पकालिक कार्य की खातिर नहीं है। इसके बजाय यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना में कार्य के एक चरण के वास्ते है। परमेश्वर का प्रकटन हमेशा अर्थपूर्ण होता है और हमेशा उसकी प्रबंधन योजना से इसका कुछ संबंध होता है। यहाँ जिसे “प्रकटन” कहा गया है, वह उस प्रकार के “प्रकटन” से बिल्कुल ही भिन्न है, जिसमें परमेश्वर मनुष्य का मार्गदर्शन, अगुआई और प्रबोधन करता है। हर बार जब परमेश्वर प्रकट होता है, वह अपने महान कार्य के एक चरण को कार्यान्वित करता है। यह कार्य किसी भी अन्य युग के कार्य से भिन्न होता है। यह मनुष्य के लिए अकल्पनीय है, और इसका मनुष्य द्वारा पहले कभी भी अनुभव नहीं किया गया है। यह वह कार्य है, जो एक नए युग का आरंभ करता है और पुराने युग का समापन करता है, और यह मनुष्यजाति के उद्धार के कार्य का एक अधिक नया और उच्चतर चरण है; और भी अधिक, यह वह कार्य है जो मनुष्यजाति को नए युग में ले जाता है। यह परमेश्वर के प्रकटन का महत्त्व है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 1 : परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है

अब परमेश्वर का नया काम आरंभ हो गया है यानी एक नए युग का आरंभ हो गया है। परमेश्वर छुटकारा पाए हुए लोगों को अपने घर में लाता है और उद्धार का अपना नया कार्य आरंभ करता है। इस समय उद्धार का कार्य पिछले समय की तुलना में अधिक गहन है। यह पवित्र आत्मा नहीं है जो मनुष्य में इसलिए कार्य कर रही है कि वह अपने आप बदल जाए, न ही यह यीशु का शरीर है जो इस कार्य को करने के लिए मनुष्य के बीच प्रकट हो रहा है और यह कार्य किसी और तरीके से तो बिल्कुल नहीं किया जा रहा है। बल्कि यह कार्य देहधारी परमेश्वर स्वयं संपन्न और निर्देशित कर रहा है। वह इसे इस तरह मनुष्य को नए कार्य में ले जाने के लिए कर रहा है। क्या यह महान काम नहीं है? परमेश्वर यह काम मानवता के एक भाग द्वारा या भविष्यवाणियों के माध्यम से नहीं करता; बल्कि परमेश्वर इसे स्वयं करता है। कुछ लोग कह सकते हैं कि यह कोई महान काम नहीं है और यह मनुष्य के लिए परमानंद नहीं ला सकता। लेकिन मैं तुमसे कहूँगा कि परमेश्वर का काम केवल यही नहीं है, बल्कि इससे कहीं बड़ा और अधिक है।

इस बार परमेश्वर कार्य करने के लिए आध्यात्मिक देह में नहीं, बल्कि बहुत ही साधारण शरीर में आया है। इसके अलावा, यह परमेश्वर के दूसरे देहधारण का शरीर है और यह वह शरीर भी है, जिसके द्वारा वह देह में लौटकर आया है। यह एक बहुत साधारण देह है। उस पर नजर डालकर तुम ऐसा कुछ भी नहीं देख सकते हो जो उसे दूसरों से भिन्न दिखाता हो, लेकिन तुम उससे अब तक अनसुने सत्य प्राप्त कर सकते हो। महज यह तुच्छ देह परमेश्वर के सत्य के समस्त वचनों का मूर्त रूप है, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की वाहक है और मनुष्य के समझने के लिए परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है। क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? क्या तुम मानवजाति का गंतव्य देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? वह तुम्हें ये सभी रहस्य बताएगा—वे रहस्य जो कोई मनुष्य तुम्हें कभी नहीं बता पाया है—और वह तुम्हें वे सत्य भी बताएगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह राज्य में जाने का तुम्हारा द्वार है, और नए युग में जाने के लिए तुम्हारा मार्गदर्शक है। यह साधारण देह कई रहस्यों को समेटे हुए है जिनकी थाह मनुष्य नहीं ले सकता है। उसके कर्म तुम्हारे लिए गूढ़ हैं, लेकिन उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य का संपूर्ण लक्ष्य तुम्हें यह सब देखने की क्षमता देने के लिए पर्याप्त है कि वह कोई साधारण देह नहीं है, जैसा कि लोग मानते हैं, क्योंकि वह अंत के दिनों के परमेश्वर के इरादों और अंत के दिनों में मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि तुम उसके द्वारा बोले गए उन वचनों को नहीं सुन सकते जो आकाश और पृथ्वी को कँपाते-से लगते हैं, यद्यपि तुम उसकी आँखें आग की लपटों जैसी नहीं देख सकते, और यद्यपि तुम उसके लौह-दंड का अनुशासन नहीं पा सकते, फिर भी तुम उसके वचनों से यह सुन सकते हो कि परमेश्वर क्रोधित हो रहा है और यह जान सकते हो कि परमेश्वर मानवजाति पर दया दिखा रहा है, और तुम परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव और उसकी बुद्धि देख सकते हो, और उससे भी अधिक, समस्त मानवजाति के लिए परमेश्वर की परवाह को समझ सकते हो। अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य मनुष्य को स्वर्ग के परमेश्वर का पृथ्वी पर मनुष्य के बीच रहना दिखाना है और परमेश्वर को जानने, उसके प्रति समर्पण करने, उसका भय मानने और उससे प्रेम करने में सक्षम बनाना है। यही कारण है कि वह दूसरी बार देह में लौटा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम जानते थे? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक महान काम किया है

ऐसी चीज की जाँच करना कठिन नहीं है, परंतु इसके लिए जरूरी है कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति पहले इस सत्य को जान ले : जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर का सार है और जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति है। चूँकि परमेश्वर देहधारी बना है, इसलिए वह उस कार्य को अपने साथ लाता है जो वह करना चाहता है और चूँकि वह देहधारी परमेश्वर है, इसलिए वह परमेश्वर का स्वरूप व्यक्त करता है और वह मनुष्य के लिए सत्य ला सकता है, उसे जीवन प्रदान कर सकता है और उसे मार्ग दिखा सकता है। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इसमें कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह जाँच करना चाहता है कि क्या यह परमेश्वर की देहधारी देह है, तो उसे इसका निर्धारण उसके द्वारा व्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करना चाहिए। अर्थात्, यह निर्धारित करने के लिए कि वह परमेश्वर का देहधारी स्वरूप है या नहीं और वह सच्चा मार्ग है या नहीं, व्यक्ति को उसके सार के आधार पर उसकी परख करनी चाहिए। अतः यह देहधारी परमेश्वर की देह है कि नहीं, यह निर्धारित करने की कुंजी उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (यानी उसके कार्य, उसके वचनों, उसके स्वभाव और बहुत-से अन्य पहलुओं) में निहित होती है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके मूर्ख और अज्ञानी होने का पता चलता है। बाहरी स्वरूप सार का निर्धारण नहीं कर सकता; इतना ही नहीं, परमेश्वर का कार्य कभी भी मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हो सकता। क्या यीशु का बाहरी स्वरूप मनुष्य की धारणाओं के विपरीत नहीं था? क्या उसका चेहरा और पहनावा उसकी असली पहचान को दर्शाने में असमर्थ नहीं थे? क्या उस समय के फरीसियों ने यीशु का ठीक इसीलिए विरोध नहीं किया था क्योंकि उन्होंने केवल उसके बाहरी स्वरूप को देखा और उसके मुख से निकले वचनों को गंभीरता से स्वीकार नहीं किया? मुझे उम्मीद है कि प्रत्येक भाई-बहन जो परमेश्वर के प्रकटन की खोज में है, वह इतिहास की त्रासदी को नहीं दोहराएगा, आधुनिक काल का फरीसी नहीं बनेगा और परमेश्वर को फिर से सलीब पर नहीं चढ़ाएगा। तुम्हें सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए कि परमेश्वर की वापसी का स्वागत कैसे किया जाए और तुम्हारे मस्तिष्क में यह स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसा व्यक्ति कैसे बना जाए, जो सत्य के प्रति समर्पण करता है। यह हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है, जो यीशु के बादल पर सवार होकर लौटने का इंतजार कर रहा है। हमें अपनी आध्यात्मिक आँखों को साफ करना चाहिए और कल्पना के शब्दों के दलदल में नहीं फँसना चाहिए। हमें परमेश्वर के वास्तविक कार्य के बारे में सोचना चाहिए और परमेश्वर के व्यावहारिक पक्ष पर दृष्टि डालनी चाहिए। खुद को दिवास्वप्नों में बहने या खोने मत दो और हमेशा यह आशा मत करते रहो कि प्रभु यीशु अचानक बादल पर सवार होकर तुम्हारे बीच उतर आएँगे और तुम्हें—जिन्होंने उन्हें कभी जाना या देखा नहीं है और जो उनकी इच्छा के अनुसार चलना नहीं जानते—अपने साथ ले जाएँगे। इससे अधिक यथार्थवादी मामलों के बारे में सोचना बेहतर है!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

तुम लोग नहीं जानते कि परमेश्वर क्या है, तुम लोग नहीं जानते कि मसीह क्या है, तुम लोग नहीं जानते कि यहोवा का भय कैसे मानें, तुम लोग नहीं जानते कि कैसे पवित्र आत्मा के कार्य में प्रवेश करें और तुम लोग नहीं जानते कि परमेश्वर स्वयं के कार्य और मनुष्य द्वारा गुमराह किए जाने के बीच कैसे भेद करें। तुम परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य के किसी भी ऐसे वचन की केवल निंदा करना ही जानते हो, जो तुम्हारे विचारों के अनुरूप नहीं होता। तुम्हारी विनम्रता कहाँ है? तुम्हारा समर्पण कहाँ है? तुम्हारी निष्ठा कहाँ है? सत्य खोजने का तुम्हारा रवैया कहाँ है? परमेश्वर का भय मानने वाला तुम्हारा हृदय कहाँ है? मैं तुम लोगों को बता दूँ कि जो परमेश्वर में संकेतों की वजह से विश्वास करते हैं, वे निश्चित रूप से वह श्रेणी होगी, जो नष्ट की जाएगी। जो देह में लौटे यीशु के वचनों को स्वीकारने में अक्षम हैं, वे निश्चित ही नरक के वंशज, महा देवदूत के वंशज हैं, उस श्रेणी में हैं जो हमेशा के लिए नष्ट कर दी जाएगी। बहुत-से लोगों को शायद इसकी परवाह न हो कि मैं क्या कहता हूँ, किंतु फिर भी मैं यीशु का अनुसरण करने वाले हर तथाकथित संत को बताना चाहता हूँ कि जब तुम लोग यीशु को एक श्वेत बादल पर स्वर्ग से उतरते अपनी आँखों से देखोगे तो यह धार्मिकता के सूर्य के सार्वजनिक प्रकटन का समय होगा। शायद वह तुम्हारे लिए एक बड़ी उत्तेजना का समय होगा। हालाँकि तुम्हें पता होना चाहिए कि जिस समय तुम यीशु को स्वर्ग से उतरते देखोगे तो यह वह समय भी होगा जब तुम दंडित किए जाने के लिए नीचे नरक में जाओगे, वह समय होगा जब परमेश्वर की प्रबंधन योजना की समाप्ति की घोषणा की जा चुकी होगी और जब परमेश्वर अच्छे लोगों को पुरस्कार और बुरे लोगों को दंड देगा। क्योंकि परमेश्वर का न्याय उस समय से पहले ही समाप्त हो चुका होगा जब मनुष्य चिह्न देखता है, जब सिर्फ सत्य की अभिव्यक्ति होती है। वे जो सत्य को स्वीकार करते हैं और चिह्न नहीं खोजते हैं और इस प्रकार शुद्ध कर दिए गए हैं, वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने लाए जा चुके होंगे और सृष्टिकर्ता के आलिंगन में प्रवेश कर चुके होंगे। सिर्फ वे जो इस विश्वास में बने रहते हैं कि “ऐसा यीशु जो श्वेत बादल पर सवारी नहीं करता, एक झूठा मसीह है” अनंत दंड के अधीन कर दिए जाएँगे, क्योंकि वे सिर्फ उस यीशु में विश्वास करते हैं जो चिह्न प्रदर्शित करता है, पर उस यीशु को स्वीकार नहीं करते जो कड़ा न्याय अभिव्यक्त करता है और जीवन और सच्चा मार्ग प्रदान करता है। इसलिए केवल यही हो सकता है कि जब यीशु खुलेआम श्वेत बादल पर वापस लौटे तो वह उनसे निपटे। वे बहुत हठधर्मी, अपने आप में बहुत आश्वस्त, बहुत अहंकारी हैं। ऐसे नीच लोग यीशु द्वारा कैसे पुरस्कृत किए जा सकते हैं? यीशु की वापसी उन लोगों के लिए एक महान उद्धार है, जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, पर जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं उनके लिए यह दोषी ठहराए जाने का संकेत है। तुम लोगों को अपना स्वयं का रास्ता चुनना चाहिए, और पवित्र आत्मा के खिलाफ ईशनिंदा नहीं करनी चाहिए और सत्य को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। तुम लोगों को अज्ञानी और अभिमानी व्यक्ति नहीं बनना चाहिए, बल्कि ऐसा बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करता हो और सत्य के लिए प्यासा होकर इसकी खोज करता हो; सिर्फ इसी तरीके से तुम लोग लाभान्वित होगे। मैं तुम लोगों को परमेश्वर में विश्वास के रास्ते पर सावधानी से चलने की सलाह देता हूँ। स्वेच्छाचारी रूप से निष्कर्ष पर मत पहुँचो; और परमेश्वर में अपने विश्वास में लापरवाह और ढीले-ढाले तो और भी मत रहो। तुम लोगों को जानना चाहिए कि कम से कम, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं उनके पास विनम्र और परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होना चाहिए। जिन्होंने सत्य सुन लिया है और फिर भी इस पर अपनी नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, वे मूर्ख और अज्ञानी हैं। जो सत्य को सुन चुके हैं और फिर भी लापरवाही से निष्कर्षों तक पहुँचते हैं या इसे दोषी ठहराते हैं वे अहंकारी लोग हैं। जो भी यीशु पर विश्वास करता है वह दूसरों को शाप देने या निंदा करने के योग्य नहीं है। तुम सब लोगों को ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसके पास विवेक है और जो सत्य स्वीकार करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को फिर से बना चुका होगा

पिछला: परिचय

अगला: 2. प्रभु की वापसी के बारे में, बाइबल स्पष्ट रूप से कहती है, “उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत और न पुत्र, परन्तु केवल पिता(मत्ती 24:36)। कोई नहीं जानता कि प्रभु कब आएगा, फिर भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया इस बात की गवाही दे रही है कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है। आप यह कैसे जानते हैं?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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