1. प्रभु यीशु के आगमन से पहले, फरीसी प्रायः धर्मग्रंथों को सभाओं में उजागर करते थे और लोगों के सामने प्रार्थना किया करते थे। वे बहुत पवित्र दिखाई देते थे, और, लोगों की नज़रों में, ऐसा नहीं लगता था कि वे कुछ भी ऐसा करते थे जिसमें पवित्रशास्त्र का उल्लंघन होता हो। तो फरीसियों को प्रभु यीशु ने श्राप क्यों दिया था? वे किन तरीकों से परमेश्वर की अवहेलना करते थे, उन्होंने परमेश्वर के क्रोध को क्यों उकसाया?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“भी अपनी परम्पराओं के कारण क्यों परमेश्वर की आज्ञा टालते हो? क्योंकि परमेश्वर ने कहा है, ‘अपने पिता और अपनी माता का आदर करना’ और ‘जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, वह मार डाला जाए।’ पर तुम कहते हो कि यदि कोई अपने पिता या माता से कहे, ‘जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुँच सकता था, वह परमेश्वर को भेंट चढ़ाया जा चुका’, तो वह अपने पिता का आदर न करे, इस प्रकार तुम ने अपनी परम्परा के कारण परमेश्वर का वचन टाल दिया। हे कपटियो, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यद्वाणी ठीक ही की है : ‘ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है। और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं’” (मत्ती 15:3-9)

“हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो : इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा।

“हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

“हे अंधे अगुवो, तुम पर हाय! जो कहते हो कि यदि कोई मन्दिर की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु यदि कोई मन्दिर के सोने की सौगन्ध खाए तो उससे बंध जाएगा। हे मूर्खो और अंधो, कौन बड़ा है; सोना या वह मन्दिर जिससे सोना पवित्र होता है? फिर कहते हो कि यदि कोई वेदी की शपथ खाए तो कुछ नहीं, परन्तु जो भेंट उस पर है, यदि कोई उसकी शपथ खाए तो बंध जाएगा। हे अंधो, कौन बड़ा है; भेंट या वेदी जिससे भेंट पवित्र होती है? इसलिये जो वेदी की शपथ खाता है, वह उसकी और जो कुछ उस पर है, उसकी भी शपथ खाता है। जो मन्दिर की शपथ खाता है, वह उसकी और उसमें रहनेवाले की भी शपथ खाता है। जो स्वर्ग की शपथ खाता है, वह परमेश्वर के सिंहासन की और उस पर बैठनेवाले की भी शपथ खाता है।

“हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम पोदीने, और सौंफ, और जीरे का दसवाँ अंश तो देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात् न्याय, और दया, और विश्‍वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। हे अंधे अगुवो, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊँट को निगल जाते हो।

“हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर से तो मांजते हो परन्तु वे भीतर अन्धेर और असंयम से भरे हुए हैं। हे अंधे फरीसी, पहले कटोरे और थाली को भीतर से मांज कि वे बाहर से भी स्वच्छ हों।

“हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं। इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो।

“हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम भविष्यद्वक्‍ताओं की कब्रें सँवारते और धर्मियों की कब्रें बनाते हो, और कहते हो, ‘यदि हम अपने बापदादों के दिनों में होते तो भविष्यद्वक्‍ताओं की हत्या में उनके साझी न होते।’ इससे तो तुम अपने पर आप ही गवाही देते हो कि तुम भविष्यद्वक्‍ताओं के हत्यारों की सन्तान हो। अत : तुम अपने बापदादों के पाप का घड़ा पूरी तरह भर दो। हे साँपो, हे करैतों के बच्‍चो, तुम नरक के दण्ड से कैसे बचोगे? इसलिये देखो, मैं तुम्हारे पास भविष्यद्वक्‍ताओं और बुद्धिमानों और शास्त्रियों को भेजता हूँ; और तुम उनमें से कुछ को मार डालोगे और क्रूस पर चढ़ाओगे, और कुछ को अपने आराधनालयों में कोड़े मारोगे और एक नगर से दूसरे नगर में खदेड़ते फिरोगे। जिससे धर्मी हाबिल से लेकर बिरिक्याह के पुत्र जकरयाह तक, जिसे तुम ने मन्दिर और वेदी के बीच में मार डाला था, जितने धर्मियों का लहू पृथ्वी पर बहाया गया है वह सब तुम्हारे सिर पर पड़ेगा। मैं तुम से सच कहता हूँ, ये सब बातें इस समय के लोगों पर आ पड़ेंगी” (मत्ती 23:13-36)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

क्या तुम लोग इसकी जड़ जानना चाहते हो कि फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया? क्या तुम लोग फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे भी ज़्यादा, उन्होंने केवल इस पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, फिर भी जीवन सत्य का अनुसरण नहीं किया। इसलिए वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि उन्हें जीवन के मार्ग का कोई ज्ञान नहीं है, और वे नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है। तुम्हीं लोग बताओ ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर का आशीष कैसे प्राप्त कर सकते हैं? क्या वे मसीहा को देख सकते हैं? उन्होंने यीशु का विरोध किया क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु द्वारा बताए गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे और इससे भी अधिक इसलिए क्योंकि वे मसीहा को नहीं समझते थे। और चूँकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था और कभी मसीहा के साथ नहीं जुड़े थे, उन्होंने मसीहा के बस नाम के साथ चिपके रहने की ग़लती की, जबकि हर मुमकिन ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का आज्ञापालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत था : इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता, तुम मसीह नहीं हो। क्या यह सोच हास्यास्पद और बेतुकी नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को फिर से बना चुका होगा

मनुष्य जो भ्रष्ट हो चुके हैं, जो शैतान के जाल में जीते हैं, वे सभी देह में जीते हैं, स्वार्थपूर्ण अभिलाषाओं में जीते हैं और उनके मध्य एक भी व्यक्ति नहीं जो मेरे अनुरूप हो। जो कहते हैं कि वे मेरे अनुरूप हैं, वे सब अज्ञात मूर्तियों की आराधना करते हैं। भले ही वे मेरे नाम को पवित्र मानने का दावा करते हैं, पर वे उस रास्ते पर चलते हैं जो मेरे विपरीत जाता है, और उनके शब्द घमंड और आत्मविश्वास से भरे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सब स्वाभाविक रूप से मेरे विरोध में हैं और मेरे अनुरूप नहीं हैं। प्रतिदिन वे बाइबल में मेरे निशान ढूँढ़ते हैं, और यों ही “उपयुक्त” अंश तलाश लेते हैं, जिन्हें वे अंतहीन रूप से पढ़ते रहते हैं और उनका वाचन पवित्रशास्त्र के रूप में करते हैं। वे नहीं जानते कि मेरे अनुरूप कैसे बनें, न ही वे यह जानते हैं कि मेरे विरुद्ध होने का क्या अर्थ है। वे केवल पवित्रशास्त्रों को आँख मूँदकर पढ़ते रहते हैं। वे एक अज्ञात परमेश्वर को जिसे उन्होंने देखा ही नहीं है और आधारभूत रूप से देख भी नहीं सकते, बाइबल की सीमाओं के भीतर परिसीमित करते हैं, वे फुरसत के समय में बाइबल निकालकर पढ़ते हैं। वे मेरा अस्तित्व मात्र बाइबल के दायरे में ही सीमित मानते हैं, और वे मेरी बराबरी बाइबल से करते हैं; बाइबल के बिना मैं नहीं हूँ, और मेरे बिना बाइबल नहीं है। वे मेरे अस्तित्व या क्रियाकलापों पर कोई ध्यान नहीं देते, बल्कि पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर परम और विशेष ध्यान देते हैं। बहुत-से लोग तो यहाँ तक मानते हैं कि अपनी इच्छा से मुझे ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जो पवित्रशास्त्र द्वारा पहले से न कहा गया हो। वे पवित्रशास्त्र को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। कहा जा सकता है कि वे निरे शब्दों को बहुत महत्त्वपूर्ण समझते हैं, इस हद तक कि हर एक वचन जो मैं बोलता हूँ, वे उसे मापने और मेरी निंदा करने के लिए बाइबल के छंदों का उपयोग करते हैं। वे मेरे साथ अनुरूपता का मार्ग या सत्य के साथ अनुरूपता का मार्ग नहीं खोजते, बल्कि बाइबल के शब्दों के अनुरूप होने का मार्ग खोजते हैं और विश्वास करते हैं कि कोई भी चीज जो बाइबल के अनुसार नहीं है, बिना किसी अपवाद के, मेरा कार्य नहीं है। क्या ऐसे लोग फरीसियों के कर्तव्यपरायण वंशज नहीं हैं? यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। वे उस समय के यीशु के अनुरूप होने का प्रयास नहीं करते थे, बल्कि व्यवस्था के प्रत्येक अनुच्छेद के साथ इतनी गंभीरता से पेश आते थे कि—यीशु पर यह दोष लगाने के बाद कि वह पुराने नियम की व्यवस्था का पालन नहीं करता और मसीहा नहीं है—अंततः उन्होंने निर्दोष यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। उनका सार क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के साथ अनुरूपता के मार्ग की खोज नहीं की? वे केवल पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर ध्यान देते थे, जबकि मेरे इरादों और मेरे कार्य के चरणों और विधियों पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं, बल्कि पवित्रशास्त्र के शब्दों से ढिठाई से चिपकने वाले लोग थे; वे परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग नहीं, बल्कि बाइबल में विश्वास करने वाले लोग थे। अगर बात की तह में जाएँ तो वे बाइबल के ठेकेदार बन बैठे थे। बाइबल के हितों की रक्षा करने, बाइबल की गरिमा बनाए रखने और बाइबल की प्रतिष्ठा बचाने के लिए वे यहाँ तक चले गए कि उन्होंने दयालु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ऐसा उन्होंने सिर्फ़ बाइबल का बचाव करने के लिए और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक शब्द का रुतबा बनाए रखने के लिए किया। इसलिए उन्होंने अपना भविष्य त्यागना और पापबलि को प्राप्त न करना पसंद किया ताकि पवित्रशास्त्र के नियमों के अनुरूप न होने के कारण यीशु को मृत्यु-दंड दे सकें। क्या वे लोग पवित्रशास्त्र के एक-एक शब्द के दास नहीं थे?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें मसीह के प्रति अनुरूपता का मार्ग खोजना चाहिए

फरीसियों द्वारा यीशु की आलोचना

मरकुस 3:21-22  जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो वे उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उसका चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, “उसमें शैतान है,” और “वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।”

प्रभु यीशु की फरीसियों को डाँट

मत्ती 12:31-32  इसलिए मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निन्दा क्षमा की जाएगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।

............

बाइबल में फरीसियों द्वारा स्वयं यीशु और उसके द्वारा की गई चीज़ों का मूल्यांकन इस प्रकार था : “... वे कहते थे, कि उसका चित्त ठिकाने नहीं है। ... उसमें शैतान है, और वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है” (मरकुस 3:21-22)। शास्त्रियों और फरीसियों द्वारा प्रभु यीशु की आलोचना उनके द्वारा दूसरे लोगों के शब्दों को दोहराना भर नहीं था, न ही वह कोई निराधार अनुमान था—वह तो उनके द्वारा प्रभु यीशु के बारे में उसके कार्यों को देख-सुनकर निकाला गया निष्कर्ष था। यद्यपि उनका निष्कर्ष प्रकट रूप में न्याय कायम रखने के नाम पर निकाला गया था और लोगों को ऐसा दिखता था, मानो वह तथ्यों पर आधारित हो, किंतु जिस घमंड और दबंगई के साथ उन्होंने प्रभु यीशु की आलोचना की थी, उस पर काबू रखना स्वयं उनके लिए भी कठिन था। प्रभु यीशु के प्रति उनकी घृणा की उन्मत्त ऊर्जा ने उनकी महत्वाकांक्षाओं और उनके दुष्ट शैतानी चेहरे, और साथ ही परमेश्वर का विरोध करने वाली उनकी दुर्भावनापूर्ण प्रकृति को भी उजागर कर दिया था। उनके द्वारा प्रभु यीशु की आलोचना करते हुए कही गई ये बातें उनकी महत्वाकांक्षाओं, ईर्ष्या, और परमेश्वर तथा सत्य के प्रति उनकी शत्रुता की कुरूप और दुर्भावनापूर्ण प्रकृति से प्रेरित थीं। उन्होंने प्रभु यीशु के कार्यों के स्रोत की जाँच नहीं की, न ही उन्होंने उसके द्वारा कही या की गई चीज़ों के सार की जाँच की। इसके बजाय उन्होंने आँख मूँदकर, अधीरता से, पागलों की तरह, जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से उस पर हमला किया और उसे बदनाम किया जो उसने किया था। वे उसके आत्मा यानी पवित्र आत्मा, परमेश्वर के आत्मा को लापरवाही से बदनाम करने की हद तक चले गए। “उसका चित्त ठिकाने नहीं है,” “शैतान” और “दुष्टात्माओं का सरदार” कहने से उनका यही आशय था। अर्थात्, उन्होंने कहा कि परमेश्वर का आत्मा शैतान और दुष्टात्माओं का सरदार है। जिस देह को परमेश्वर के आत्मा ने वस्त्र की तरह पहना था, उसके कार्य को उन्होंने पागलपन के रूप में निरूपित किया। उन्होंने न केवल शैतान और दुष्टात्माओं का सरदार कहकर परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की, बल्कि परमेश्वर के कार्य की भी निंदा की और प्रभु यीशु मसीह पर दोष लगाया और उसकी ईशनिंदा की। उनके द्वारा परमेश्वर के प्रतिरोध और ईशनिंदा का सार पूरी तरह से शैतान और दुष्ट राक्षसों द्वारा किए गए परमेश्वर के प्रतिरोध और ईशनिंदा के समान था। वे केवल भ्रष्ट मनुष्यों का प्रतिनिधित्व ही नहीं करते थे, बल्कि इससे भी बढ़कर, वे शैतान के मूर्त रूप थे। वे मानवजाति के बीच शैतान के लिए एक माध्यम थे और वे शैतान के सह-अपराधी और सेवक थे। उनकी ईशनिंदा और उनके द्वारा प्रभु यीशु मसीह की अवमानना का सार हैसियत के लिए परमेश्वर के साथ उनका संघर्ष, परमेश्वर से उनका मुकाबला और उनके द्वारा परमेश्वर की कभी न खत्म होने वाली परीक्षा था। उनके द्वारा परमेश्वर के प्रतिरोध और उसके प्रति उनके शत्रुतापूर्ण रवैये के सार ने, और साथ ही उनके वचनों और उनके विचारों ने सीधे-सीधे परमेश्वर के आत्मा की ईशनिंदा की और उसे क्रोधित किया। इसलिए, जो कुछ उन्होंने कहा और किया था, उसके आधार पर परमेश्वर ने एक उचित न्याय का निर्धारण किया, और परमेश्वर ने उनके कर्मों को पवित्र आत्मा के विरुद्ध ईशनिंदा का पाप ठहराया। यह पाप इस दुनिया और आने वाली दुनिया, दोनों में अक्षम्य है, जैसा कि पवित्रशास्त्र के निम्नलिखित अंश से प्रमाणित होता है : “मनुष्य द्वारा की गई पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी” और “जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।”

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III

पहले जमाने में फरीसी इस्रायल में एक सम्मानित वर्ग होता था, तो यह नाम अब एक बिल्ला क्यों बन गया है? ऐसा इसलिए है क्योंकि फरीसी लोग एक खास किस्म के व्यक्ति के परिचायक बन गये हैं। इस प्रकार के व्यक्ति की क्या विशेषताएँ होती हैं? वे चीजों को झूठे ढंग से पेश करने में, मुखौटा लगाने में और दिखावा करने में कुशल होते हैं; वे विशेष रूप से कुलीन, पवित्र, खरे और खुले व पारदर्शी होने का दिखावा करते हैं और वे जो नारे लगाते हैं वे सुनने में अच्छे लगते हैं लेकिन असल में वे बिल्कुल भी सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं। फरीसियों का क्या अच्छा व्यवहार था? वे धर्मग्रंथ पढ़ते थे और उपदेश देते थे; वे दूसरों को व्यवस्था और विनियमों का पालन करना और परमेश्वर का प्रतिरोध न करना सिखाते थे। ये सब अच्छे व्यवहार थे। वे जो कुछ भी कहते थे वह सुनने में अच्छा लगता था लेकिन वे चुपके से चढ़ावा चुरा लेते थे। प्रभु यीशु ने उनसे कहा, “तुम लोग ... मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊँट को निगल जाते हो” (मत्ती 23:24)। इसका मतलब यह है कि उन्होंने जो कुछ भी किया वे सब बाहरी तौर पर अच्छे व्यवहार थे; वे सुनने में भव्य लगने वाले नारे लगाते थे और शानदार, उत्कृष्ट सिद्धांत व्यक्त करते थे, उनके शब्द विशेष रूप से सुखद लगते थे लेकिन वे सत्य को अभ्यास में लाने में बिल्कुल भी सक्षम नहीं थे। उन्होंने जो कुछ भी कहा और किया उसका सत्य से कोई लेना-देना नहीं था; यह सब सिर्फ पाखंडी व्यवहार थे और लोगों को धोखा देना और गुमराह करना था। उनके हृदय में न तो सत्य के लिए और न ही सकारात्मक चीजों के लिए जरा भी प्रेम था और वे सत्य और सकारात्मक चीजों से विमुख भी थे और जो कुछ भी परमेश्वर से आता है उससे विमुख थे। उन्हें क्या पसंद था? क्या उन्हें धार्मिकता और निष्पक्षता पसंद थी? (नहीं।) तुम कैसे बता सकते हो कि उन्हें ये चीजें पसंद नहीं थीं? (जब प्रभु यीशु ने स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार का प्रचार किया, तो उन्होंने न केवल इसे स्वीकार करने से इनकार किया बल्कि इसके बजाय प्रभु यीशु की निंदा की।) यदि उन्होंने प्रभु यीशु की निंदा और प्रतिरोध न किया होता तो क्या यह बताना संभव होता कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते थे और वे धार्मिकता और निष्पक्षता से प्रेम नहीं करते थे? नहीं। प्रभु यीशु के प्रकटन और कार्य ने फरीसियों को पूरी तरह से प्रकट कर दिया; उनके द्वारा प्रभु यीशु की निंदा और प्रतिरोध किए जाने के कारण ही अन्य लोग उनके पाखंड को देख पाए। यदि प्रभु यीशु का प्रकटन और कार्य न होता तो कोई भी फरीसियों का भेद नहीं पहचान पाता और यदि लोग केवल फरीसियों के बाहरी आचरण को देखते तो वे अंदर ही अंदर उनकी बड़ी प्रशंसा करते और उनका आदर करते। फरीसियों ने लोगों का विश्वास धोखे से प्राप्त करने के लिए इन झूठे अच्छे व्यवहारों का उपयोग किया—क्या यह बेईमानी और धोखेबाजी नहीं थी? क्या ऐसे धोखेबाज लोग सत्य से प्रेम कर सकते थे? वे बिल्कुल नहीं कर सकते थे। उनके इन अच्छे व्यवहारों को दिखाने के पीछे क्या उद्देश्य था? एक लिहाज से यह लोगों को धोखा देना था। दूसरे लिहाज से यह लोगों को गुमराह करना और उनका दिल जीतना था ताकि लोग उनके बारे में अच्छा सोचें और उनकी आराधना करें और अंततः वे पुरस्कृत भी होना चाहते थे। यह कैसा बड़ा घोटाला था! क्या यह एक कुशल चाल नहीं थी? क्या इन लोगों को निष्पक्षता और धार्मिकता पसंद थी? जाहिर तौर पर नहीं। उन्हें सिर्फ पद, प्रसिद्धि और लाभ से प्यार था, और वे सिर्फ पुरस्कार और ताज चाहते थे। उन्होंने कभी भी उन वचनों का अभ्यास नहीं किया जो परमेश्वर ने लोगों को सिखाए थे, और उन्होंने कभी भी सत्य वास्तविकताओं को थोड़ा-सा भी नहीं जिया। उन्होंने जो कुछ भी किया वह अच्छे व्यवहारों का उपयोग करके दिखावा करना था और अपने रुतबे और प्रतिष्ठा को सुरक्षित करने के लिए अपने पाखंडी तरीकों से लोगों को धोखा देना और उनका दिल जीतना था, जिसका उपयोग वे फिर अपने लिए पूँजी प्राप्त करने और आजीविका कमाने के लिए करते थे। क्या यह घिनौना नहीं है? उनके इन सभी व्यवहारों से यह देखा जा सकता है कि अपने सार में वे सत्य से प्रेम नहीं करते थे क्योंकि वे कभी इसका अभ्यास नहीं करते थे। कौन-सी चीज यह दर्शाती है कि वे सत्य का अभ्यास नहीं करते थे? सबसे स्पष्ट बात यह रही : प्रभु यीशु छुटकारे का कार्य करने आया और प्रभु यीशु के सभी वचन सत्य थे और उनमें अधिकार था—फरीसियों ने इसके साथ कैसा व्यवहार किया? यद्यपि उन्होंने स्वीकार किया कि प्रभु यीशु के वचनों में अधिकार और सामर्थ्य था, उन्होंने न केवल उसे स्वीकार नहीं किया बल्कि उन्होंने उसकी निंदा और ईशनिंदा भी की। उन्होंने ऐसा क्यों किया? इसलिए किया क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते थे, यहाँ तक कि अपने हृदयों में वे सत्य से विमुख थे और उससे नफरत करते थे। उन्होंने स्वीकार किया कि प्रभु यीशु ने जो कुछ भी कहा वह सही था, उसमें अधिकार और सामर्थ्य था और वह किसी भी तरह से गलत नहीं था और उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं था जिसका वे उसके विरुद्ध उपयोग कर सकें। लेकिन उन्होंने प्रभु यीशु की निंदा करने पर जोर दिया और यहाँ तक कि उसके खिलाफ यह कहते हुए षड्यंत्र रचा, “उसे क्रूस पर चढ़ा दो। या तो वह रहेगा या हम।” इस तरह फरीसियों के उस समूह ने प्रभु यीशु के दुश्मनों के रूप में काम किया। उस समय कोई भी सत्य नहीं समझता था और कोई भी यह पहचानने में सक्षम नहीं था कि प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था। लेकिन मानवीय दृष्टिकोण से प्रभु यीशु ने कई सत्य व्यक्त किए, उसने लोगों के लिए राक्षसों को भी निकाला और बीमारों को चंगा किया, कई चमत्कार किए और पाँच रोटियों और दो मछलियों से 5,000 लोगों को खिलाया—उसने बहुत-सी अच्छी चीजें कीं और लोगों पर इतना अनुग्रह किया और ऐसे अच्छे और धार्मिक लोग बहुत कम हैं। तो फरीसियों ने फिर भी प्रभु यीशु की निंदा क्यों की? वे उसे क्रूस पर चढ़ाने के लिए इतने आमादा क्यों थे? उन्होंने प्रभु यीशु के बजाय एक अपराधी को रिहा करना पसंद किया—यह दर्शाता है कि धार्मिक दुनिया के फरीसी कितने दुष्ट और दुर्भावनापूर्ण थे। वे बहुत बुरे थे! फरीसियों के जो दुष्ट चेहरे उजागर हुए थे और उनकी दिखावटी बाहरी दयालुता के बीच बहुत बड़ा अंतर था; बहुत-से लोग यह भेद नहीं पहचान सके कि कौन-सा असली था और कौन-सा नकली। प्रभु यीशु के प्रकटन और कार्य ने इन फरीसियों को पूरी तरह से प्रकट कर दिया। वे बखूबी दिखावा करते थे और सामान्य परिस्थितियों में बाहरी तौर पर बहुत ही धर्मनिष्ठ लगते थे, और किसी ने भी कल्पना नहीं की होगी कि वे इतने क्रूर तरीके से प्रभु यीशु का प्रतिरोध और उत्पीड़न कर सकते हैं। यदि फरीसियों को तथ्यों द्वारा प्रकट नहीं किया गया होता, तो कोई भी उनकी असलियत नहीं देख पाता।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

फरीसियों के पाखंडी होने का कारण, उनके दुष्ट होने का कारण यह है कि वे सत्य से विमुख हैं, लेकिन ज्ञान से प्रेम करते हैं, इसलिए वे केवल धर्मशास्त्रों का अध्ययन करते हैं और धर्मशास्त्रों में वर्णित ज्ञान का अनुसरण करते हैं, लेकिन सत्य या परमेश्वर के वचनों को कभी स्वीकार नहीं करते। वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय उसकी प्रार्थना नहीं करते, न ही वे सत्य की खोज करते हैं या उस पर संगति करते हैं। इसके बजाय, वे परमेश्वर के वचनों का अध्ययन करते हैं, यह अध्ययन करते हैं कि परमेश्वर ने क्या कहा और किया है और ऐसा करके वे परमेश्वर के वचनों को एक सैद्धांतिकी में बदल देते हैं, दूसरों को सिखाने के लिए एक धर्म-सिद्धांत में बदल देते हैं, जिसे विद्वत्तापूर्ण अध्ययन कहा जाता है। वे विद्वत्तापूर्ण अध्ययन में क्यों लगे रहते हैं? वे क्या पढ़ रहे हैं? उनकी नजर में यह परमेश्वर के वचन या परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं है, और सत्य तो बिल्कुल भी नहीं है। बल्कि, यह एक प्रकार की विद्वता है, या यह भी कह सकते हैं कि यह धर्मशास्त्रीय ज्ञान है। उनके विचार में, इस ज्ञान का, इस विद्वता का प्रचार-प्रसार करना, परमेश्वर के मार्ग का प्रसार करना है, सुसमाचार का प्रसार करना है—इसे वे उपदेश देना कहते हैं, लेकिन वे जो उपदेश देते हैं वह धर्मशास्त्रीय ज्ञान भर है।

... फरीसी जिन धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों को समझते थे उन्हें वे ज्ञान और लोगों का आकलन और निंदा करने का औजार मानते थे, यहाँ तक कि इसका प्रयोग प्रभु यीशु पर भी करते थे। इस तरह प्रभु यीशु की निंदा की गई। वे लोग जिस तरह से किसी व्यक्ति का मूल्यांकन या उससे व्यवहार करते थे, वह व्यक्ति के सार पर कभी निर्भर नहीं करता था, न ही इस बात पर निर्भर करता था कि उस व्यक्ति ने जो उपदेश दिया है वह सत्य है या नहीं, और इससे भी कम इस बात पर निर्भर करता था कि उस व्यक्ति द्वारा कहे गए शब्दों का स्रोत क्या है—जिस तरह से फरीसी किसी व्यक्ति का मूल्यांकन या उसकी निंदा करते थे वह केवल बाइबल के पुराने नियम के उन विनियमों, शब्दों और धर्म-सिद्धांतों पर निर्भर करता था जो उन्होंने सीखे थे। यूँ तो फरीसी अपने दिलों में जानते थे कि प्रभु यीशु ने जो कहा और किया वह पाप या किसी कानून का उल्लंघन नहीं था, फिर भी उन्होंने उसे दोषी ठहराया, क्योंकि उसने जो सत्य व्यक्त किए और जो संकेत और चमत्कार दिखाए उनके कारण बहुत-से लोगों ने उसका अनुसरण किया और उसकी स्तुति की। फरीसियों में उसके प्रति अधिकाधिक घृणा बढ़ रही थी और यहाँ तक कि वे उससे छुटकारा पा लेना चाहते थे। उन्होंने यह नहीं माना कि प्रभु यीशु ही वह मसीहा था जो आना था, न ही उन्होंने यह माना कि उसके वचनों में सत्य है और यह तो और भी कम माना कि उसका कार्य सत्य के अनुसार था। उन्होंने प्रभु यीशु की भर्त्सना अभिमानपूर्ण बातें करने वाले और राक्षसों के राजकुमार बालजबूल की मदद से राक्षसों को बाहर निकालने वाले के रूप में की। प्रभु यीशु पर इन पापों को थोपना प्रदर्शित करता है कि फरीसियों के मन में प्रभु के लिए कितनी नफरत थी। इसलिए, उन्होंने इस बात को नकारने के लिए पूरी लगन से काम किया कि प्रभु यीशु को परमेश्वर ने भेजा था, और वह परमेश्वर का पुत्र था, और वह मसीहा था। उनके कहने का मतलब था कि “क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करेगा? यदि परमेश्वर देहधारण करता, तो उसका जन्म किसी बहुत ही संभ्रांत परिवार में होता। और उसे शास्त्रियों तथा फरीसियों से शिक्षा भी स्वीकार करनी होती। ‘देहधारी परमेश्वर’ का नाम ग्रहण कर पाने से पहले उसे धर्मशास्त्रों का व्यवस्थित रूप से अध्ययन करना पड़ता, शास्त्रों के ज्ञान की समझ प्राप्त करनी पड़ती और धर्मशास्त्रों के सम्पूर्ण ज्ञान से लैस होना होता।” लेकिन प्रभु यीशु इस ज्ञान से लैस नहीं था, इसलिए उन्होंने उसकी निंदा करते हुए कहा, “सबसे पहले तो तुम इस प्रकार योग्य नहीं हो, इसलिए तुम परमेश्वर नहीं हो सकते; दूसरे, इस शास्त्रीय ज्ञान के बिना परमेश्वर होना तो दूर, तुम परमेश्वर का कार्य भी नहीं कर सकते; तीसरे, तुम्हें मंदिर के बाहर काम नहीं करना चाहिए—अभी तुम मंदिर में काम नहीं करते, बल्कि हमेशा पापियों के बीच में रहते हो, इसलिए तुम जो काम करते हो वह धर्मशास्त्रों के दायरे से परे है, जिसके कारण तुम्हारा परमेश्वर होना और भी कम संभव है।” उनकी निंदा का आधार कहाँ से आया? धर्मशास्त्रों से, मनुष्य के दिमाग से, और उन्हें प्राप्त धर्मशास्त्रीय शिक्षा से। क्योंकि फरीसी धारणाओं, कल्पनाओं और ज्ञान से भरे हुए थे, और उनका विश्वास था कि वह ज्ञान सही है, सत्य है, वैध आधार है, और परमेश्वर कभी भी इन चीजों का उल्लंघन नहीं कर सकता। क्या उन्होंने सत्य की तलाश की थी? उन्होंने ऐसा नहीं किया था। उन्होंने क्या तलाशा था? एक अलौकिक परमेश्वर जो आध्यात्मिक शरीर के रूप में प्रकट होता था। इसलिए उन्होंने मनुष्य की धारणाओं, कल्पनाओं और ज्ञान के अनुसार परमेश्वर के कार्य के मानदंड निर्धारित किए, उसके कार्य को नकारा और परमेश्वर के सही या गलत होने का आकलन किया। और इसका अंतिम परिणाम क्या हुआ? उन्होंने न केवल परमेश्वर के कार्य की निंदा की, बल्कि उन्होंने देहधारी परमेश्वर को सूली पर चढ़ा दिया।

—वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद सात : वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (भाग तीन)

पिछला: 2. जैसा कि हम इसे समझते हैं, कई प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने माना है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया एक उभरती हुई ईसाई कलीसिया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया और पारंपरिक ईसाइयत के बीच क्या अंतर है?

अगला: 2. धार्मिक दुनिया के सभी पादरी और एल्डर्स बाइबल में पारंगत हैं और अक्सर इसके बारे में दूसरों के सामने व्याख्या करते हैं और कहते हैं कि लोग बाइबल का पालन करें। क्या ऐसा करने में वे प्रभु को ऊँचा नहीं उठाते और उसकी गवाही नहीं देते हैं? तुम कैसे कह सकते हो कि वे लोगों को धोखा दे रहे हैं, कि वे पाखंडी फरीसी हैं?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

संबंधित सामग्री

5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें