6. आप गवाही देते हैं कि अंतिम दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, प्रभु यीशु की वापसी है, और वह मानव जाति के न्याय, शुद्धिकरण और उद्धार के लिए सभी सत्य को व्यक्त कर रहा है। फिर भी सीसीपी का दावा है कि जिस “सर्वशक्तिमान परमेश्वर” में आप विश्वास करते हैं वह केवल एक सामान्य व्यक्ति है। CCP इस व्यक्ति की पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में सब कुछ जानता है, और उसने इस व्यक्ति की तस्वीर, नाम और परिवार का पता भी ऑनलाइन पोस्ट किया है। मैं इसे ठीक से समझ नहीं सकता—क्या CCP का कहना सही है या गलत है?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
“देहधारण” परमेश्वर का देह में प्रकट होना है; परमेश्वर सृजित मनुष्यों के मध्य देह की छवि में कार्य करता है। इसलिए, चूँकि वह देहधारी परमेश्वर है, तो उसे सबसे पहले देह होना होगा, सामान्य मानवता वाली देह होना होगा; यह सबसे मौलिक पूर्वापेक्षा है। वास्तव में, परमेश्वर के देहधारण का निहितार्थ यह है कि परमेश्वर देह में रहता और कार्य करता है, परमेश्वर अपने सार में देह बन जाता है, वह एक व्यक्ति बन जाता है। उसके देहधारी जीवन और कार्य को दो चरणों में विभाजित किया जा सकता है। पहला वह जीवन है जो वह सेवकाई प्रारम्भ करने से पहले जीता है। वह साधारण मानवीय परिवार में, एकदम सामान्य मानवता में रहता है, मानवीय जीवन की सामान्य नैतिकताओं का पालन और मानवीय जीवन की सामान्य व्यवस्थाओं का पालन करता है, उसकी सामान्य मानवीय आवश्यकताएँ होती हैं (भोजन, कपड़ा, आवास, निद्रा), उसमें सामान्य मानवीय कमजोरियाँ और सामान्य मानवीय भावनाएँ होती हैं। दूसरे शब्दों में, इस पहले चरण में वह सभी सामान्य मानवीय क्रियाकलापों में शामिल होते हुए, बिना दिव्यता के, पूरी तरह से सामान्य मानवता में रहता है। दूसरा चरण वह जीवन है जो वह अपनी सेवकाई को आरंभ करने के बाद जीता है। वह अब भी सामान्य मानव-आवरण के साथ, साधारण मानवता में रहता है, और किसी तरह की अलौकिकता का कोई बाहरी चिह्न नहीं देता। फिर भी वह पूरी तरह से अपनी सेवकाई के लिए ही जीता है, और इस दौरान उसकी सामान्य मानवता पूरी तरह से उसकी दिव्यता के सामान्य कार्य को बनाए रखने के लिए अस्तित्व में रहती है, क्योंकि तब तक उसकी सामान्य मानवता उसकी सेवकाई के कार्य को करने में सक्षम होने की स्थिति तक परिपक्व हो चुकी होती है। तो उसके जीवन का दूसरा चरण सामान्य मानवता में अपनी सेवकाई को करना है, जब यह सामान्य मानवता और पूर्ण दिव्यता दोनों का जीवन होता है। अपने जीवन के प्रथम चरण में वह पूरी तरह से साधारण मानवता का जीवन क्यों जीता है, उसका कारण यह है कि उसकी मानवता अभी तक दिव्य कार्य की समग्रता को सँभालने लायक नहीं हो पायी है, अभी तक वह परिपक्व नहीं हुई है; जब उसकी मानवता परिपक्व हो जाती है—यानी, जब वह उसकी सेवकाई का बीड़ा उठा सकती है—तब ही वह जो सेवकाई उसे करनी चाहिए, उसे करने की शुरुआत कर सकता है। चूँकि वह देह है, उसे विकसित होकर परिपक्व होने की आवश्यकता होती है। इसलिए, उसके जीवन का पहला चरण सामान्य मानवता का जीवन होता है, जबकि दूसरे चरण में, उसकी मानवता उसके कार्य का बीड़ा उठाने और उसकी सेवकाई को करने में सक्षम होती है, और इसलिए अपनी सेवकाई के दौरान देहधारी परमेश्वर जिस जीवन को जीता है वह मानवता और पूर्ण दिव्यता दोनों का जीवन होता है। यदि अपने जन्म के समय से ही परमेश्वर का देहधारी शरीर, औपचारिक रूप से अपनी सेवकाई आरंभ कर देता, और वह जो करता उस सबमें अलौकिक चिह्न और चमत्कार शामिल होते, तो उसमें कोई भी दैहिक सार नहीं होता। इसलिए, उसकी मानवता उसके दैहिक सार के लिए अस्तित्व में रहती है; मानवता के बिना कोई देह नहीं हो सकती है और एक मानवता रहित व्यक्ति मनुष्य नहीं होता है। इस तरह, परमेश्वर की देह की मानवता, परमेश्वर के देहधारण का अंतर्भूत गुण है। यह कहना कि "जब परमेश्वर देहधारी होता है तो उसके पास केवल दिव्यता होती है, कोई मानवता नहीं," ईशनिंदा है, क्योंकि यह वक्तव्य टिक ही नहीं सकता है, और यह देहधारण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। अपनी सेवकाई आरंभ करने के बाद भी, अपना कार्य करते हुए वह बाह्य मानवीय आवरण के साथ ही अपनी दिव्यता में रहता है; बात सिर्फ़ इतनी ही है कि उस समय, उसकी मानवता उसकी दिव्यता को सामान्य देह में कार्य करने देने के एकमात्र प्रयोजन को पूरा करती है। इसलिए कार्य की अभिकर्ता उसकी मानवता में रहने वाली दिव्यता है। कार्य उसकी दिव्यता करती है, न कि उसकी मानवता, मगर यह दिव्यता उसकी मानवता में छिपी रहती है; सार रूप में, उसका कार्य अब भी उसकी संपूर्ण दिव्यता द्वारा ही किया जाता है, न कि उसकी मानवता द्वारा। परन्तु कार्य को करने वाली उसकी देह है। कह सकते हैं कि वह मनुष्य भी है और परमेश्वर भी, क्योंकि परमेश्वर देह में रहने वाला परमेश्वर बन जाता है; उसके पास मानवीय आवरण और मानवीय सार होता है, और उससे भी अधिक उसमें परमेश्वर का सार होता है। चूँकि वह परमेश्वर के सार वाला मनुष्य है, इसलिए वह सभी सृजित मानवों से ऊपर है, ऐसे किसी भी व्यक्ति से ऊपर है जो परमेश्वर का कार्य कर सकता है। तो, उसके समान मानवीय आवरण वाले सभी लोगों में, जिन लोगों में मानवता है, उनमें, एकमात्र वही स्वयं देहधारी परमेश्वर है—अन्य सभी सृजित मानव हैं। यद्यपि उन सभी में मानवता है, किन्तु सृजित मानव में केवल मानवता ही है, जबकि देहधारी परमेश्वर भिन्न है : उसकी देह में न केवल मानवता है, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उसमें दिव्यता भी है। उसकी मानवता उसके देह के बाहरी रूप-रंग में और उसके दिन-प्रतिदिन के जीवन में देखी जा सकती है, किन्तु उसकी दिव्यता को देख पाना मुश्किल है। क्योंकि उसकी दिव्यता केवल तभी व्यक्त होती है जब उसमें मानवता होती है, और यह वैसी अलौकिक नहीं होती जैसी लोग कल्पना करते हैं, इसलिए लोगों के लिए इसे देख पाना बहुत कठिन होता है। आज भी, लोगों के लिए इसकी थाह पाना बहुत कठिन है कि देहधारी परमेश्वर का सार आखिर क्या है। मेरे इतने सारे वचन बोलने के बाद भी, मुझे लगता है कि तुम लोगों में से अधिकांश के लिए यह एक रहस्य ही है। वास्तव में, यह मामला बहुत सरल है : चूँकि परमेश्वर देहधारी बन जाता है, उसका सार मानवता और दिव्यता का संयोजन है। यह संयोजन स्वयं परमेश्वर, पृथ्वी पर स्वयं परमेश्वर कहलाता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार
देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है और मसीह परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण की गई देह है। यह देह किसी ऐसे मनुष्य से भिन्न है जो देह का है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह दैहिक होने के बजाय आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता भी है और पूर्ण दिव्यता भी है। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य के पास नहीं है। उसकी सामान्य मानवता का उद्देश्य देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियों को बनाए रखना है, जबकि उसकी दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य को कार्यान्वित करती है। चाहे यह उसकी मानवता हो या दिव्यता, दोनों स्वर्गिक परमपिता की इच्छा को समर्पित हैं। मसीह का सार आत्मा, यानी दिव्यता है। इसलिए, उसका सार स्वयं परमेश्वर का है; यह सार उसके स्वयं के कार्य में गड़बड़ी नहीं करेगा और वह कुछ भी ऐसा कतई नहीं कर सकता है, जो उसके अपने ही कार्य को नष्ट करता हो, न ही वह कभी ऐसे वचन कहेगा जो उसकी अपनी इच्छा के विरुद्ध जाते हों। इस प्रकार, देहधारी परमेश्वर कभी भी कोई ऐसा कार्य बिल्कुल नहीं करेगा, जो उसके अपने प्रबंधन में गड़बड़ी करता हो। यह वह बात है, जिसे सभी मनुष्यों को समझना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है
जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर का सार है और जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति है। चूँकि परमेश्वर देहधारी बना है, इसलिए वह उस कार्य को अपने साथ लाता है जो वह करना चाहता है और चूँकि वह देहधारी परमेश्वर है, इसलिए वह परमेश्वर का स्वरूप व्यक्त करता है और वह मनुष्य के लिए सत्य ला सकता है, उसे जीवन प्रदान कर सकता है और उसे मार्ग दिखा सकता है। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इसमें कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह जाँच करना चाहता है कि क्या यह परमेश्वर की देहधारी देह है, तो उसे इसका निर्धारण उसके द्वारा व्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करना चाहिए। अर्थात्, यह निर्धारित करने के लिए कि वह परमेश्वर का देहधारी स्वरूप है या नहीं और वह सच्चा मार्ग है या नहीं, व्यक्ति को उसके सार के आधार पर उसकी परख करनी चाहिए। अतः यह देहधारी परमेश्वर की देह है कि नहीं, यह निर्धारित करने की कुंजी उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (यानी उसके कार्य, उसके वचनों, उसके स्वभाव और बहुत-से अन्य पहलुओं) में निहित होती है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके मूर्ख और अज्ञानी होने का पता चलता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना
देहधारण की महत्ता यह है कि एक साधारण, सामान्य व्यक्ति स्वयं परमेश्वर का कार्य करता है; अर्थात्, परमेश्वर मानवता में अपना दिव्य कार्य करके शैतान को हरा देता है। देहधारण का अर्थ है कि परमेश्वर का आत्मा देह बन जाता है, अर्थात्, परमेश्वर देह बन जाता है; देह के द्वारा किया जाने वाला कार्य आत्मा का कार्य है, जो देह में साकार होता है, देह द्वारा अभिव्यक्त होता है। परमेश्वर के देह को छोड़कर अन्य कोई भी देहधारी परमेश्वर की सेवकाई को पूरा नहीं कर सकता; अर्थात्, केवल परमेश्वर का देहधारी देह, यह सामान्य मानव दिव्य कार्य को व्यक्त कर सकता है। इसमें कोई मनुष्य उसकी जगह नहीं ले सकता। यदि, परमेश्वर के पहले आगमन के दौरान, उनतीस वर्ष की उम्र से पहले उसमें सामान्य मानवता नहीं होती—यदि जन्म लेते ही वह चिह्न दिखा और चमत्कार कर सकता, बोलना आरंभ करते ही वह स्वर्ग की भाषा बोलने लगता, यदि जन्म से वह सभी सांसारिक मामलों को समझने लगता, हर व्यक्ति के विचारों और जो उसके हृदय में है, उसे देखने लगता—तो ऐसे इंसान को सामान्य मनुष्य नहीं कहा जा सकता था, और ऐसी देह को मानवीय देह नहीं कहा जा सकता था। यदि मसीह के साथ ऐसा ही होता, तो परमेश्वर के देहधारण का कोई अर्थ और सार ही नहीं रह जाता। उसका सामान्य मानवता से युक्त होना इस बात को सिद्ध करता है कि वह शरीर में देहधारी हुआ परमेश्वर है; उसका सामान्य मानव विकास प्रक्रिया से गुज़रना और भी दिखाता है कि वह एक सामान्य देह है; इसमें उसके कार्य को भी जोड़ दें तो यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वह परमेश्वर का वचन है, परमेश्वर का आत्मा है जिसने देहधारण किया है। अपने कार्य की आवश्यकताओं की वजह से परमेश्वर देहधारी बनता है; दूसरे शब्दों में, कार्य का यह चरण देह में पूरा किया जाना चाहिए, अर्थात सामान्य मानवता में पूरा किया जाना चाहिए। यही “वचन के देह बनने” के लिए, “वचन के देह में प्रकट होने” के लिए पूर्वशर्त है, और यही परमेश्वर के दो देहधारणों की असली कहानी है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार
मसीह का कार्य तथा अभिव्यक्ति उसके सार को निर्धारित करते हैं। वह अपने सच्चे हृदय से उसे पूर्ण करने में सक्षम है, जो उसे सौंपा गया है। वह सच्चे हृदय से स्वर्ग में परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम है और सच्चे हृदय से परमपिता परमेश्वर की इच्छा खोजने में सक्षम है। यह सब उसके सार द्वारा निर्धारित होता है। और इसी प्रकार उसका प्राकृतिक प्रकाशन भी उसके सार द्वारा निर्धारित किया जाता है; इसे मैं उसका “प्राकृतिक प्रकाशन” कहता हूँ क्योंकि उसकी अभिव्यक्ति कोई नकल नहीं है, या मनुष्य द्वारा शिक्षा का परिणाम, या मनुष्य द्वारा कई वर्षों के संवर्धन का परिणाम नहीं है। उसने इसे सीखा या इससे स्वयं को सँवारा नहीं; बल्कि, यह उसमें अंतर्निहित है। मनुष्य उसके कार्य, उसकी अभिव्यक्ति, उसकी मानवता, और सामान्य मानवता के उसके संपूर्ण जीवन से इनकार कर सकता है, किंतु कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता कि वह सच्चे हृदय से स्वर्ग के परमेश्वर की आराधना करता है; कोई इनकार नहीं कर सकता है कि वह स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करने के लिए आया है, और कोई उस गंभीर इच्छा से इनकार नहीं कर सकता, जिससे वह परमपिता परमेश्वर की खोज करता है। यद्यपि उसकी छवि इंद्रियों के लिए सुखद नहीं, उसके प्रवचन असाधारण प्रभामंडल से संपन्न नहीं हैं और उसका कार्य धरती या आकाश को थर्रा देने वाला नहीं है जैसा मनुष्य कल्पना करता है, वास्तव में वह मसीह है, जो सच्चे हृदय से स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करता है, पूर्णतः स्वर्गिक पिता के प्रति समर्पण करता है और मृत्यु तक समर्पित रहता है। यह इसलिए क्योंकि उसका सार मसीह का सार है। मनुष्य के लिए इस तथ्य पर विश्वास करना कठिन है किंतु यह एक तथ्य है। जब मसीह की सेवकाई पूर्णतः संपन्न हो गई है, तो मनुष्य उसके कार्य से देखने में सक्षम होगा कि उसका स्वभाव और उसका अस्तित्व स्वर्ग के परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है। उस समय, उसके संपूर्ण कार्य को सारांशित कर मनुष्य इसकी पुष्टि कर सकता है कि वह वास्तव में वही देह है जिसे वचन धारण करता है और एक देह और रक्त के मनुष्य के देह के समान नहीं है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है
इस बार परमेश्वर कार्य करने के लिए आध्यात्मिक देह में नहीं, बल्कि बहुत ही साधारण शरीर में आया है। इसके अलावा, यह परमेश्वर के दूसरे देहधारण का शरीर है और यह वह शरीर भी है, जिसके द्वारा वह देह में लौटकर आया है। यह एक बहुत साधारण देह है। उस पर नजर डालकर तुम ऐसा कुछ भी नहीं देख सकते हो जो उसे दूसरों से भिन्न दिखाता हो, लेकिन तुम उससे अब तक अनसुने सत्य प्राप्त कर सकते हो। महज यह तुच्छ देह परमेश्वर के सत्य के समस्त वचनों का मूर्त रूप है, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की वाहक है और मनुष्य के समझने के लिए परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है। क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? क्या तुम मानवजाति का गंतव्य देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? वह तुम्हें ये सभी रहस्य बताएगा—वे रहस्य जो कोई मनुष्य तुम्हें कभी नहीं बता पाया है—और वह तुम्हें वे सत्य भी बताएगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह राज्य में जाने का तुम्हारा द्वार है, और नए युग में जाने के लिए तुम्हारा मार्गदर्शक है। यह साधारण देह कई रहस्यों को समेटे हुए है जिनकी थाह मनुष्य नहीं ले सकता है। उसके कर्म तुम्हारे लिए गूढ़ हैं, लेकिन उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य का संपूर्ण लक्ष्य तुम्हें यह सब देखने की क्षमता देने के लिए पर्याप्त है कि वह कोई साधारण देह नहीं है, जैसा कि लोग मानते हैं, क्योंकि वह अंत के दिनों के परमेश्वर के इरादों और अंत के दिनों में मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि तुम उसके द्वारा बोले गए उन वचनों को नहीं सुन सकते जो आकाश और पृथ्वी को कँपाते-से लगते हैं, यद्यपि तुम उसकी आँखें आग की लपटों जैसी नहीं देख सकते, और यद्यपि तुम उसके लौह-दंड का अनुशासन नहीं पा सकते, फिर भी तुम उसके वचनों से यह सुन सकते हो कि परमेश्वर क्रोधित हो रहा है और यह जान सकते हो कि परमेश्वर मानवजाति पर दया दिखा रहा है, और तुम परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव और उसकी बुद्धि देख सकते हो, और उससे भी अधिक, समस्त मानवजाति के लिए परमेश्वर की परवाह को समझ सकते हो। अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य मनुष्य को स्वर्ग के परमेश्वर का पृथ्वी पर मनुष्य के बीच रहना दिखाना है और परमेश्वर को जानने, उसके प्रति समर्पण करने, उसका भय मानने और उससे प्रेम करने में सक्षम बनाना है। यही कारण है कि वह दूसरी बार देह में लौटा है। यूँ तो आज मनुष्य जो देखता है वह एक ऐसा परमेश्वर है जो बिल्कुल मनुष्य के ही समान है, एक नाक और दो आँखों वाला परमेश्वर और एक बहुत ही साधारण परमेश्वर, लेकिन अंत में परमेश्वर तुम लोगों को दिखाएगा कि अगर यह व्यक्ति न हो, तो आकाश और धरती में जबरदस्त बदलाव आएँगे; अगर यह व्यक्ति न हो तो आकाश धुँधला जाएगा, पृथ्वी पर उथल-पुथल मच जाएगी और समस्त मानवजाति अकाल और महामारियों के बीच जिएगी। वह तुम लोगों को दिखाएगा कि यदि अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर तुम लोगों को बचाने के लिए न आता तो परमेश्वर समस्त मानवजाति को बहुत पहले ही नरक में नष्ट कर चुका होता; यदि यह देह न होती तो तुम लोग सदैव महापापी होते और तुम हमेशा के लिए लाश होते। तुम लोगों को जानना चाहिए कि यदि यह देह न होती तो समस्त मानवजाति के लिए एक महा आपदा से बचना असंभव होता, और उसके लिए अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा मानवजाति को दिए जाने वाले और भी कठोर दंड से बच पाना असंभव होता। यदि इस साधारण देह का जन्म न हुआ होता तो तुम सबकी ऐसी हालत होती कि तुम लोग जीवन की भीख माँगते लेकिन जी न पाते और मरने की भीख माँगते लेकिन मर न पाते; यदि यह देह न होती तो तुम लोग सत्य प्राप्त न कर पाते और आज परमेश्वर के सिंहासन के सामने न आ पाते, बल्कि अपने जघन्य पापों के लिए परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाते। क्या तुम लोग जानते थे कि यदि परमेश्वर देह में लौटा न होता तो किसी के पास भी उद्धार का अवसर न होता; और यदि इस देह का आगमन न होता तो परमेश्वर ने बहुत पहले ही पुराने युग को समाप्त कर दिया होता? ऐसा होने से क्या तुम लोग अभी भी परमेश्वर के दूसरे देहधारण को नकारोगे? चूँकि तुम लोग इस साधारण व्यक्ति से इतने बड़े लाभ प्राप्त कर सकते हो तो तुम उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार क्यों नहीं करोगे?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम जानते थे? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक महान काम किया है
अंत में अनेक राष्ट्र इस साधारण व्यक्ति की उपासना करेंगे और साथ ही इस मामूली व्यक्ति को धन्यवाद देंगे और उसके प्रति समर्पण करेंगे, क्योंकि उसके द्वारा लाए गए सत्य, जीवन और मार्ग ने ही समस्त मानवजाति को बचाया है, मनुष्य और परमेश्वर के बीच के संघर्ष को शांत किया है, उनके बीच की दूरी कम की है, और परमेश्वर के विचारों और मनुष्य के बीच संबंध स्थापित किया है। इसी ने परमेश्वर के लिए और अधिक महिमा हासिल की है। क्या ऐसा साधारण व्यक्ति तुम्हारे विश्वास और श्रद्धा के योग्य नहीं है? क्या यह साधारण देह मसीह कहलाने के योग्य नहीं है? क्या ऐसा साधारण व्यक्ति मनुष्य के बीच परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं बन सकता? क्या ऐसा व्यक्ति, जिसने मानवजाति को आपदा से बचाया है, तुम लोगों के प्रेम और उसे थामे रखने की तुम्हारी इच्छा का अधिकारी नहीं है? यदि तुम लोग उसके मुख से व्यक्त सत्य को नकारते हो, और अपने बीच उसके अस्तित्व से घृणा करते हो, तो अंत में तुम लोगों का क्या होगा?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम जानते थे? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक महान काम किया है