3. मैंने कई वर्षों से प्रभु यीशु पर विश्वास किया है, और हालाँकि मुझे पता है कि प्रभु यीशु देह बना परमेश्वर है, मैं देहधारण के सत्य को पूरी तरह से नहीं समझता हूँ। जब प्रभु लौटता है, तब यदि वह वास्तव में प्रभु यीशु के रूप में प्रकट होता है, मनुष्य के पुत्र के रूप में कार्य करते हुए, तो हमारे लिए उसे पहचानना या उसके आने का स्वागत कर पाना असंभव होगा। मुझे लगता है कि देहधारण एक रहस्य है, और केवल कुछ ही लोग देहधारण की सच्चाई को समझते हैं। कृपया मेरे साथ सहभागिता करें कि वस्तुतः देहधारण क्या है।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“आदि में मार्ग था, और मार्ग परमेश्वर के साथ था, और मार्ग परमेश्वर था” (यूहन्ना 1:1)

“और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्‍चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा” (यूहन्ना 1:14)

“इसमें सन्देह नहीं कि भक्‍ति का भेद गम्भीर है, अर्थात्, वह जो शरीर में प्रगट हुआ, आत्मा में धर्मी ठहरा, स्वर्गदूतों को दिखाई दिया, अन्यजातियों में उसका प्रचार हुआ, जगत में उस पर विश्‍वास किया गया, और महिमा में ऊपर उठाया गया” (1 तीमुथियुस 3:16)

“यीशु ने उससे कहा, ‘मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता। यदि तुम ने मुझे जाना होता, तो मेरे पिता को भी जानते; और अब उसे जानते हो, और उसे देखा भी है’” (यूहन्ना 14:6-7)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

“देहधारण” परमेश्वर का देह में प्रकट होना है; परमेश्वर सृजित मनुष्यों के मध्य देह की छवि में कार्य करता है। इसलिए, चूँकि वह देहधारी परमेश्वर है, तो उसे सबसे पहले देह होना होगा, सामान्य मानवता वाली देह होना होगा; यह सबसे मौलिक पूर्वापेक्षा है। वास्तव में, परमेश्वर के देहधारण का निहितार्थ यह है कि परमेश्वर देह में रहता और कार्य करता है, परमेश्वर अपने सार में देह बन जाता है, वह एक व्यक्ति बन जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार

देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है और मसीह परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण की गई देह है। यह देह किसी ऐसे मनुष्य से भिन्न है जो देह का है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह दैहिक होने के बजाय आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता भी है और पूर्ण दिव्यता भी है। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य के पास नहीं है। उसकी सामान्य मानवता का उद्देश्य देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियों को बनाए रखना है, जबकि उसकी दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य को कार्यान्वित करती है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है

जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर का सार है और जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति है। चूँकि परमेश्वर देहधारी बना है, इसलिए वह उस कार्य को अपने साथ लाता है जो वह करना चाहता है और चूँकि वह देहधारी परमेश्वर है, इसलिए वह परमेश्वर का स्वरूप व्यक्त करता है और वह मनुष्य के लिए सत्य ला सकता है, उसे जीवन प्रदान कर सकता है और उसे मार्ग दिखा सकता है। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इसमें कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह जाँच करना चाहता है कि क्या यह परमेश्वर की देहधारी देह है, तो उसे इसका निर्धारण उसके द्वारा व्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करना चाहिए। अर्थात्, यह निर्धारित करने के लिए कि वह परमेश्वर का देहधारी स्वरूप है या नहीं और वह सच्चा मार्ग है या नहीं, व्यक्ति को उसके सार के आधार पर उसकी परख करनी चाहिए। अतः यह देहधारी परमेश्वर की देह है कि नहीं, यह निर्धारित करने की कुंजी उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (यानी उसके कार्य, उसके वचनों, उसके स्वभाव और बहुत-से अन्य पहलुओं) में निहित होती है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके मूर्ख और अज्ञानी होने का पता चलता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

देहधारी परमेश्वर की मानवता उसके दैहिक सार के लिए अस्तित्व में रहती है; मानवता के बिना कोई देह नहीं हो सकती है और एक मानवता रहित व्यक्ति मनुष्य नहीं होता है। इस तरह, परमेश्वर की देह की मानवता, परमेश्वर के देहधारण का अंतर्भूत गुण है। यह कहना कि "जब परमेश्वर देहधारी होता है तो उसके पास केवल दिव्यता होती है, कोई मानवता नहीं," ईशनिंदा है, क्योंकि यह वक्तव्य टिक ही नहीं सकता है, और यह देहधारण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। अपनी सेवकाई आरंभ करने के बाद भी, अपना कार्य करते हुए वह बाह्य मानवीय आवरण के साथ ही अपनी दिव्यता में रहता है; बात सिर्फ़ इतनी ही है कि उस समय, उसकी मानवता उसकी दिव्यता को सामान्य देह में कार्य करने देने के एकमात्र प्रयोजन को पूरा करती है। इसलिए कार्य की अभिकर्ता उसकी मानवता में रहने वाली दिव्यता है। कार्य उसकी दिव्यता करती है, न कि उसकी मानवता, मगर यह दिव्यता उसकी मानवता में छिपी रहती है; सार रूप में, उसका कार्य अब भी उसकी संपूर्ण दिव्यता द्वारा ही किया जाता है, न कि उसकी मानवता द्वारा। परन्तु कार्य को करने वाली उसकी देह है। कह सकते हैं कि वह मनुष्य भी है और परमेश्वर भी, क्योंकि परमेश्वर देह में रहने वाला परमेश्वर बन जाता है; उसके पास मानवीय आवरण और मानवीय सार होता है, और उससे भी अधिक उसमें परमेश्वर का सार होता है। चूँकि वह परमेश्वर के सार वाला मनुष्य है, इसलिए वह सभी सृजित मानवों से ऊपर है, ऐसे किसी भी व्यक्ति से ऊपर है जो परमेश्वर का कार्य कर सकता है। तो, उसके समान मानवीय आवरण वाले सभी लोगों में, जिन लोगों में मानवता है, उनमें, एकमात्र वही स्वयं देहधारी परमेश्वर है—अन्य सभी सृजित मानव हैं। यद्यपि उन सभी में मानवता है, किन्तु सृजित मानव में केवल मानवता ही है, जबकि देहधारी परमेश्वर भिन्न है : उसकी देह में न केवल मानवता है, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उसमें दिव्यता भी है। उसकी मानवता उसके देह के बाहरी रूप-रंग में और उसके दिन-प्रतिदिन के जीवन में देखी जा सकती है, किन्तु उसकी दिव्यता को देख पाना मुश्किल है। क्योंकि उसकी दिव्यता केवल तभी व्यक्त होती है जब उसमें मानवता होती है, और यह वैसी अलौकिक नहीं होती जैसी लोग कल्पना करते हैं, इसलिए लोगों के लिए इसे देख पाना बहुत कठिन होता है। आज भी, लोगों के लिए इसकी थाह पाना बहुत कठिन है कि देहधारी परमेश्वर का सार आखिर क्या है। मेरे इतने सारे वचन बोलने के बाद भी, मुझे लगता है कि तुम लोगों में से अधिकांश के लिए यह एक रहस्य ही है। वास्तव में, यह मामला बहुत सरल है : चूँकि परमेश्वर देहधारी बन जाता है, उसका सार मानवता और दिव्यता का संयोजन है। यह संयोजन स्वयं परमेश्वर, पृथ्वी पर स्वयं परमेश्वर कहलाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार

देहधारण की महत्ता यह है कि एक साधारण, सामान्य व्यक्ति स्वयं परमेश्वर का कार्य करता है; अर्थात्, परमेश्वर मानवता में अपना दिव्य कार्य करके शैतान को हरा देता है। देहधारण का अर्थ है कि परमेश्वर का आत्मा देह बन जाता है, अर्थात्, परमेश्वर देह बन जाता है; देह के द्वारा किया जाने वाला कार्य आत्मा का कार्य है, जो देह में साकार होता है, देह द्वारा अभिव्यक्त होता है। परमेश्वर के देह को छोड़कर अन्य कोई भी देहधारी परमेश्वर की सेवकाई को पूरा नहीं कर सकता; अर्थात्, केवल परमेश्वर का देहधारी देह, यह सामान्य मानव दिव्य कार्य को व्यक्त कर सकता है। इसमें कोई मनुष्य उसकी जगह नहीं ले सकता। यदि, परमेश्वर के पहले आगमन के दौरान, उनतीस वर्ष की उम्र से पहले उसमें सामान्य मानवता नहीं होती—यदि जन्म लेते ही वह चिह्न दिखा और चमत्कार कर सकता, बोलना आरंभ करते ही वह स्वर्ग की भाषा बोलने लगता, यदि जन्म से वह सभी सांसारिक मामलों को समझने लगता, हर व्यक्ति के विचारों और जो उसके हृदय में है, उसे देखने लगता—तो ऐसे इंसान को सामान्य मनुष्य नहीं कहा जा सकता था, और ऐसी देह को मानवीय देह नहीं कहा जा सकता था। यदि मसीह के साथ ऐसा ही होता, तो परमेश्वर के देहधारण का कोई अर्थ और सार ही नहीं रह जाता। उसका सामान्य मानवता से युक्त होना इस बात को सिद्ध करता है कि वह शरीर में देहधारी हुआ परमेश्वर है; उसका सामान्य मानव विकास प्रक्रिया से गुज़रना और भी दिखाता है कि वह एक सामान्य देह है; इसमें उसके कार्य को भी जोड़ दें तो यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वह परमेश्वर का वचन है, परमेश्वर का आत्मा है जिसने देहधारण किया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार

देहधारी परमेश्वर की मानवता देह में सामान्य दिव्य कार्य को बनाए रखने के लिए मौजूद रहती है; उसकी सामान्य मानवीय सोच उसकी सामान्य मानवता को बनाए रखती और उसकी समस्त सामान्य दैहिक गतिविधियों को सहारा देती है। ऐसा कहा जा सकता है कि उसकी सामान्य मानवीय सोच देह में परमेश्वर के समस्त कार्य को बनाए रखने के उद्देश्य से विद्यमान रहती है। यदि इस देह में सामान्य मानवीय मन न होता, तो परमेश्वर देह में कार्य न कर पाता और जो उसे देह में करना था, वह कभी नहीं किया जा सकता था। यद्यपि देहधारी परमेश्वर में एक सामान्य मानवीय मन होता है, किन्तु उसके कार्य में मानवीय विचारों की मिलावट नहीं होती; वह सामान्य मन के साथ मानवता में कार्य करता है, मन-युक्त मानवता के होने की पूर्वशर्त के तहत, न कि सामान्य मानवीय विचारों को प्रयोग में लाकर। उसकी देह के विचार कितने भी उत्कृष्ट क्यों न हों, लेकिन उसके कार्य में तर्क या सोच की मिलावट नहीं होती। दूसरे शब्दों में, उसके कार्य की कल्पना उसकी देह के मन के द्वारा नहीं की जाती, बल्कि वह उसकी मानवता में दिव्य कार्य की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। उसका समस्त कार्य उसकी वह सेवकाई है जिसे उसे पूरा करना है, उसमें से कुछ भी उसके मस्तिष्क की कल्पना नहीं होता। उदाहरण के लिए, बीमार को चंगा करना, राक्षसों को निकालना, और क्रूसीकरण उसके मानवीय मन की उपज नहीं थे, उन्हें किसी भी मानवीय मन वाले मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता था। उसी तरह, आज का विजय-कार्य ऐसी सेवकाई है जिसे देहधारी परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, किन्तु यह व्यक्ति की इच्छा नहीं है, यह ऐसा कार्य है जो उसकी दिव्यता को करना चाहिए, ऐसा कार्य जिसे करने में कोई भी रक्त-मांस का मानव सक्षम नहीं है। इसलिए देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानव मन होना चाहिए, सामान्य मानवता से संपन्न होना चाहिए, क्योंकि उसे अवश्य एक सामान्य मन के साथ मानवता में कार्य करना चाहिए। यही देहधारी परमेश्वर के कार्य का सार है, देहधारी परमेश्वर का वास्तविक सार है।

कार्य आरंभ करने से पहले, यीशु मात्र सामान्य मानवता में रहता था। कोई नहीं कह सकता था कि वह परमेश्वर है, किसी को भी पता नहीं चला कि वह देहधारी परमेश्वर है; लोग उसे बस एक सर्वाधिक साधारण व्यक्ति के रूप में जानते थे। उसकी सामान्य मानवता—जो उतनी साधारण थी जितना कि संभव है—इस बात का प्रमाण थी कि परमेश्वर ने शरीर में देहधारण किया है, और अनुग्रह का युग देहधारी परमेश्वर के कार्य का युग है, न कि आत्मा के कार्य का युग। यह इस बात का प्रमाण था कि परमेश्वर का आत्मा पूरी तरह से देह में साकार हुआ है और परमेश्वर के देहधारण के युग में उसकी देह आत्मा का समस्त कार्य करेगी। सामान्य मानवता वाला मसीह ऐसी देह है जिसमें आत्मा साकार हुआ है, जिसमें सामान्य मानवता है, सामान्य समझ है और मानवीय विचार हैं। “साकार होने” का अर्थ है परमेश्वर का मानव बनना, आत्मा का देह बनना; इसे और स्पष्ट रूप से कहें, तो यह तब होता है जब स्वयं परमेश्वर सामान्य मानवता वाली देह में वास करके उसके माध्यम से अपने दिव्य कार्य को व्यक्त करता है—यही साकार होने या देहधारी होने का अर्थ है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार

पिछला: 2. मैंने कई सालों से प्रभु में विश्वास किया है, और मैंने बाइबल को बहुत पढ़ा है। क्यों मैंने मनुष्य के पुत्र के रूप में परमेश्वर के देह बनने और अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करने के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं पढ़ी है? आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु देह में लौट आया है, कि वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, और यह कि वह अंतिम दिनों का न्याय का कार्य कर रहा है। क्या बाइबल में इसका कोई आधार है?

अगला: 4. बाइबल में जो लिखित है उसके अनुसार, प्रभु यीशु देह बना हुआ मसीह है, वह परमेश्वर का पुत्र है। फिर भी आप गवाही देते हैं कि देहधारी मसीह परमेश्वर का प्रकटन है, वह स्वयं परमेश्वर ही है। यदि प्रभु यीशु स्वयं परमेश्वर है, तो प्रार्थना करते समय प्रभु यीशु अपने पिता से प्रार्थना कैसे कर सकता है? देहधारी मसीह परमेश्वर का पुत्र है या स्वयं परमेश्वर ही है?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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