4. बाइबल में जो लिखित है उसके अनुसार, प्रभु यीशु देह बना हुआ मसीह है, वह परमेश्वर का पुत्र है। फिर भी आप गवाही देते हैं कि देहधारी मसीह परमेश्वर का प्रकटन है, वह स्वयं परमेश्वर ही है। यदि प्रभु यीशु स्वयं परमेश्वर है, तो प्रार्थना करते समय प्रभु यीशु अपने पिता से प्रार्थना कैसे कर सकता है? देहधारी मसीह परमेश्वर का पुत्र है या स्वयं परमेश्वर ही है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“यीशु ने उससे कहा, ‘मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता। यदि तुम ने मुझे जाना होता, तो मेरे पिता को भी जानते; और अब उसे जानते हो, और उसे देखा भी है।’ फिलिप्पुस ने उससे कहा, ‘हे प्रभु, पिता को हमें दिखा दे, यही हमारे लिये बहुत है।’ यीशु ने उससे कहा, ‘हे फिलिप्पुस, मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूँ, और क्या तू मुझे नहीं जानता? जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है। तू क्यों कहता है कि पिता को हमें दिखा? क्या तू विश्वास नहीं करता कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है? ये बातें जो मैं तुम से कहता हूँ, अपनी ओर से नहीं कहता, परन्तु पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है। मेरा विश्वास करो कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है; नहीं तो कामों ही के कारण मेरा विश्वास करो’” (यूहन्ना 14:6-11)।
“मैं और पिता एक हैं” (यूहन्ना 10:30)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
जब प्रार्थना करते हुए यीशु ने स्वर्ग के परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाया, तो यह केवल एक सृजित मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से किया गया था, केवल इसलिए कि परमेश्वर के आत्मा ने एक सामान्य और साधारण देह का चोला धारण किया था और उसका बाहरी आवरण एक सृजित प्राणी का था। भले ही उसके भीतर परमेश्वर का आत्मा था, उसका बाहरी प्रकटन अभी भी एक सामान्य मनुष्य का था; दूसरे शब्दों में, वह “मनुष्य का पुत्र” बन गया था, जिसके बारे में सभी लोगों ने और साथ ही स्वयं यीशु ने भी बात की थी। यह देखते हुए कि वह मनुष्य का पुत्र कहलाता है, वह एक व्यक्ति है (चाहे पुरुष हो या महिला, हर हाल में एक इंसान के बाहरी आवरण के साथ) जो सामान्य लोगों के साधारण परिवार में पैदा हुआ। इसलिए, यीशु का स्वर्ग के परमेश्वर को पिता बुलाना, वैसा ही था जैसे तुम लोगों ने पहले उसे पिता कहा था; उसने एक सृजित मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से ऐसा किया। क्या तुम लोगों को अभी भी प्रभु की प्रार्थना याद है, जो यीशु ने तुम लोगों को याद करने के लिए सिखाई थी? “स्वर्ग में हमारे पिता...” उसने सभी लोगों से स्वर्ग के परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाने को कहा। और चूँकि वह भी उसे पिता कहता था, उसने ऐसा उस व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से किया, जो तुम सभी के साथ समान स्तर पर खड़ा था। चूँकि तुम लोगों ने स्वर्ग के परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाया था, यीशु ने स्वयं को तुम सबके साथ समान स्तर पर देखा और पृथ्वी पर परमेश्वर द्वारा चुने गए मनुष्य (अर्थात परमेश्वर के पुत्र) के रूप में देखा। यदि तुम लोग परमेश्वर को पिता कहते हो, तो क्या यह इसलिए नहीं है कि तुम लोग सृजित प्राणी हो? पृथ्वी पर यीशु का अधिकार चाहे जितना अधिक हो, क्रूस पर चढ़ने से पहले, वह मात्र मनुष्य का पुत्र था, पवित्र आत्मा (यानी परमेश्वर) द्वारा नियंत्रित था और पृथ्वी के सृजित प्राणियों में से एक था क्योंकि अभी भी उसका अपना कार्य करना बाकी था। इसलिए, स्वर्ग के परमेश्वर को पिता बुलाना पूरी तरह से उसकी विनम्रता और आज्ञाकारिता थी। हालाँकि उसका परमेश्वर (अर्थात स्वर्ग में आत्मा) को इस प्रकार संबोधन करना यह साबित नहीं करता कि वह स्वर्ग में परमेश्वर के आत्मा का पुत्र है। बल्कि, यह केवल यही है कि उसका दृष्टिकोण अलग था, न कि वह एक अलग व्यक्ति था। अलग व्यक्तियों का अस्तित्व एक मिथ्या है! क्रूस पर चढ़ने से पहले, यीशु मनुष्य का पुत्र था, जो देह की सीमाओं से बंधा था और उसमें पूरी तरह आत्मा का अधिकार नहीं था। यही कारण है कि वह केवल एक सृजित प्राणी के परिप्रेक्ष्य से परमपिता परमेश्वर के इरादे खोज सकता था। यह वैसा ही है जैसा गतसमनी में उसने तीन बार प्रार्थना की थी : “जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।” क्रूस पर रखे जाने से पहले, वह बस यहूदियों का राजा था; मनुष्य का पुत्र, मसीह, था और महिमा का शरीर नहीं था। यही कारण है कि एक सृजित प्राणी के दृष्टिकोण से, उसने परमेश्वर को पिता बुलाया। अब तुम यह नहीं कह सकते कि सभी जो परमेश्वर को पिता बुलाते हैं, पुत्र हैं। यदि ऐसा होता, तो क्या यीशु द्वारा प्रभु की प्रार्थना सिखाए जाने के बाद, तुम सभी पुत्र नहीं बन गए होते? यदि तुम लोग अभी भी आश्वस्त नहीं हो तो मुझे बताओ, वह कौन है जिसे तुम सब पिता कहते हो? यदि तुम यीशु की बात कर रहे हो तो तुम सबके लिए यीशु का पिता कौन है? यीशु के चले जाने के बाद पिता और पुत्र का यह विचार नहीं रहा। यह विचार केवल उन वर्षों के लिए उपयुक्त था जब यीशु देह में था; अन्य सभी परिस्थितियों में, जब तुम परमेश्वर को पिता कहते हो, तो यह वह रिश्ता है, जो सृष्टिकर्ता और सृजित प्राणी के बीच होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या त्रित्व का अस्तित्व है?
अन्य लोग हैं, जो कहते हैं, “क्या परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया कि यीशु उसका प्रिय पुत्र है?” यीशु परमेश्वर का प्रिय पुत्र है, जिस पर वह प्रसन्न है—यह निश्चित रूप से परमेश्वर ने स्वयं ही कहा था। यह परमेश्वर द्वारा अपनी गवाही देना था, लेकिन केवल एक अलग परिप्रेक्ष्य से, स्वर्ग में आत्मा द्वारा अपने ही देहधारी देह की गवाही देना था। यीशु उसका देहधारी शरीर है, स्वर्ग में उसका पुत्र नहीं। क्या तुम समझते हो? यीशु के वचन, “मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है,” क्या यह संकेत नहीं देते कि वे एक आत्मा हैं? और क्या यह देहधारण के कारण नहीं है कि वे स्वर्ग और पृथ्वी के बीच अलग हो गए थे? वास्तव में, वे अभी भी एक हैं; चाहे कुछ भी हो, यह केवल परमेश्वर द्वारा अपनी गवाही देना है। युग में परिवर्तन, कार्य की जरूरतों और उसकी प्रबंधन योजना के विभिन्न चरणों के कारण, जिस नाम से मनुष्य उसे बुलाता है, वह भी अलग हो जाता है। जब वह कार्य के पहले चरण को क्रियान्वित करने आया था, तो उसे केवल यहोवा कहा जा सकता था, जो इस्राएलियों का चरवाहा था। दूसरे चरण में, देहधारी परमेश्वर को केवल प्रभु और मसीह कहा जा सकता था। परंतु उस समय, स्वर्ग में आत्मा ने केवल यह बताया था कि वह परमेश्वर का प्यारा पुत्र है और उसके परमेश्वर का एकमात्र पुत्र होने का कोई उल्लेख नहीं किया था। ऐसा हुआ ही नहीं था। परमेश्वर की एकमात्र संतान कैसे हो सकती है? तब क्या परमेश्वर मनुष्य नहीं बन जाता? क्योंकि वह देहधारी देह था, उसे परमेश्वर का प्रिय पुत्र कहा गया और इससे पिता और पुत्र के बीच का संबंध आया। यह बस स्वर्ग और पृथ्वी के बीच जो विभाजन है, उसके कारण हुआ। यीशु ने देह के परिप्रेक्ष्य से प्रार्थना की। चूँकि उसने इस तरह की सामान्य मानवता की देह को धारण किया था, और देह के परिप्रेक्ष्य से कहा, “मेरा बाहरी आवरण एक सृजित प्राणी का है; चूँकि मैंने इस धरती पर आने के लिए देहधारण किया है, इसलिए मैं अब स्वर्ग से बहुत दूर हूँ।” इस कारण से, वह केवल परमपिता परमेश्वर से देह के परिप्रेक्ष्य से ही प्रार्थना कर सकता था। यह उसका कर्तव्य था और यह वह था, जो परमेश्वर के आत्मा के देहधारी देह में होना चाहिए। यह नहीं कहा जा सकता कि वह परमेश्वर नहीं था क्योंकि वह देह के दृष्टिकोण से पिता से प्रार्थना करता था। यद्यपि उसे परमेश्वर का प्रिय पुत्र कहा जाता था, वह अभी भी स्वयं परमेश्वर था क्योंकि वह आत्मा का ही देहधारी देह था और उसका सार अब भी आत्मा का था।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या त्रित्व का अस्तित्व है?
देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है और मसीह परमेश्वर के आत्मा द्वारा धारण की गई देह है। यह देह किसी ऐसे मनुष्य से भिन्न है जो देह का है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह दैहिक होने के बजाय आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता भी है और पूर्ण दिव्यता भी है। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य के पास नहीं है। उसकी सामान्य मानवता का उद्देश्य देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियों को बनाए रखना है, जबकि उसकी दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य को कार्यान्वित करती है। चाहे यह उसकी मानवता हो या दिव्यता, दोनों स्वर्गिक परमपिता की इच्छा को समर्पित हैं। मसीह का सार आत्मा, यानी दिव्यता है। इसलिए, उसका सार स्वयं परमेश्वर का है; यह सार उसके स्वयं के कार्य में गड़बड़ी नहीं करेगा और वह कुछ भी ऐसा कतई नहीं कर सकता है, जो उसके अपने ही कार्य को नष्ट करता हो, न ही वह कभी ऐसे वचन कहेगा जो उसकी अपनी इच्छा के विरुद्ध जाते हों। इस प्रकार, देहधारी परमेश्वर कभी भी कोई ऐसा कार्य बिल्कुल नहीं करेगा, जो उसके अपने प्रबंधन में गड़बड़ी करता हो। यह वह बात है, जिसे सभी मनुष्यों को समझना चाहिए। पवित्र आत्मा के कार्य का सार मनुष्य को बचाना और परमेश्वर के अपने प्रबंधन के वास्ते है। इसी प्रकार, मसीह का कार्य भी मनुष्य को बचाना है तथा परमेश्वर की इच्छा के वास्ते है। यह देखते हुए कि परमेश्वर देह बन जाता है, वह अपनी देह में अपने सार को, इस तरह साकार करता है कि उसकी देह उसके कार्य का बीड़ा उठाने के लिए पर्याप्त है। इसलिए देहधारण के समय परमेश्वर के आत्मा का संपूर्ण कार्य मसीह के कार्य द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है और देहधारण के पूरे समय के दौरान संपूर्ण कार्य के केंद्र में मसीह का कार्य होता है। इसे किसी भी अन्य युग के कार्य के साथ मिश्रित नहीं किया जा सकता। और चूँकि परमेश्वर देहधारी हो जाता है, वह अपनी देह की पहचान में कार्य करता है; चूँकि वह देह में आता है, वह अपनी देह में वह कार्य पूरा करता है, जो उसे करना चाहिए। चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या चाहे वह मसीह हो, दोनों स्वयं परमेश्वर हैं और वह उस कार्य को करता है, जो उसे करना चाहिए और उस सेवकाई को करता है, जो उसे करनी चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पण ही मसीह का सार है
देहधारी मनुष्य के पुत्र ने अपनी मानवता के माध्यम से परमेश्वर की दिव्यता को व्यक्त किया, और मानवजाति तक परमेश्वर के इरादों को पहुँचाया। और परमेश्वर के इरादों और स्वभाव की अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम से, उसने लोगों के सामने आध्यात्मिक क्षेत्र के उस परमेश्वर को भी प्रकट किया जिसे देखा या छुआ नहीं जा सकता। लोगों ने जिसे देखा वह रूप और छवि वाला, और हाड़-माँस से बना स्वयं परमेश्वर था। इसलिए देहधारी मनुष्य के पुत्र ने स्वयं परमेश्वर की पहचान, दर्जे, छवि और स्वभाव के साथ-साथ, जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, जैसी चीजों को मूर्त और मानवीय रूप दिया। भले ही, परमेश्वर की छवि के संदर्भ में, मनुष्य का पुत्र अपने रूप-रंग में कुछ सीमाओं के अधीन था, लेकिन उसका सार और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, वे स्वयं परमेश्वर की पहचान और दर्जे का प्रतिनिधित्व करने में पूरी तरह से सक्षम थे—अभिव्यक्ति के रूप में केवल कुछ भिन्नताएँ थीं। चाहे उसकी मानवता में हो या उसकी दिव्यता में, हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि मनुष्य के पुत्र ने स्वयं परमेश्वर की पहचान और दर्जे का प्रतिनिधित्व किया। बात बस इतनी है कि इस समय के दौरान, परमेश्वर ने देह के माध्यम से कार्य किया, देह के परिप्रेक्ष्य से बात की, और मनुष्य के पुत्र की पहचान और दर्जे के साथ मानवजाति का सामना किया, जिससे लोगों को मानवजाति के बीच परमेश्वर के व्यावहारिक वचनों और कार्य के संपर्क में आने और उनका अनुभव करने का अवसर मिला। इसने लोगों को विनम्रता के बीच उसकी दिव्यता और उसकी महानता की अंतर्दृष्टि भी दी, साथ ही परमेश्वर की वास्तविकता और व्यावहारिकता की प्रारंभिक समझ और परिभाषा प्राप्त करने की भी अनुमति दी। भले ही प्रभु यीशु का कार्य, कार्य करने के तरीके, और जिस परिप्रेक्ष्य से उसने बात की, वे आध्यात्मिक क्षेत्र में परमेश्वर के सच्चे रूप के मामले से भिन्न थे, लेकिन उसके बारे में हर चीज ने पूर्ण सटीकता के साथ स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया, जिसे मानवजाति ने पहले कभी नहीं देखा था—इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता! कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर चाहे जिस भी तरीके से प्रकट हो, वह जिस भी परिप्रेक्ष्य से बात करे या वह जिस भी छवि के साथ मानवजाति का सामना करे, परमेश्वर केवल अपना प्रतिनिधित्व करता है; वह किसी भी व्यक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, और न ही वह किसी भ्रष्ट मनुष्य का प्रतिनिधित्व कर सकता है। परमेश्वर स्वयं परमेश्वर है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
उस समय मनुष्य ने जो देखा, वह यह था कि पवित्र आत्मा यीशु पर एक कबूतर की तरह उतर रहा था; यह यीशु के लिए विशेष आत्मा नहीं था, बल्कि पवित्र आत्मा था। तो क्या यीशु का आत्मा पवित्र आत्मा से अलग हो सकता है? अगर यीशु यीशु है, पुत्र है, और पवित्र आत्मा पवित्र आत्मा है, तो वे एक कैसे हो सकते हैं? यदि ऐसा है तो कार्य क्रियान्वित नहीं किया जा सकता। यीशु के भीतर का आत्मा, स्वर्ग में आत्मा और यहोवा का आत्मा सब एक हैं। इसे पवित्र आत्मा, परमेश्वर का आत्मा, सात गुना सशक्त आत्मा और सर्वसमावेशी आत्मा कहा जाता है। परमेश्वर का आत्मा बहुत से कार्य क्रियान्वित कर सकता है। वह दुनिया को बनाने और पृथ्वी को बाढ़ द्वारा नष्ट करने में सक्षम है; वह सारी मानवजाति को छुटकारा दिला सकता है इससे भी अधिक, वह सारी मानवजाति को जीत और नष्ट कर सकता है। यह सारा कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा क्रियान्वित किया गया है और उसके स्थान पर परमेश्वर के व्यक्तियों में से किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता है। उसके आत्मा को यहोवा और यीशु के नाम से, साथ ही सर्वशक्तिमान के नाम से भी बुलाया जा सकता है। वह प्रभु और मसीह है। वह मनुष्य का पुत्र भी बन सकता है। वह स्वर्ग में भी है और पृथ्वी पर भी है; वह ब्रह्मांडों के ऊपर और अनगिनत लोगों के बीच में है। वह स्वर्ग और पृथ्वी का एकमात्र स्वामी है! सृष्टि के समय से अब तक, यह कार्य स्वयं परमेश्वर के आत्मा द्वारा क्रियान्वित किया गया है। यह कार्य स्वर्ग में हो या देह में, सब कुछ उसके अंतर्निहित आत्मा द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। सभी प्राणी, चाहे स्वर्ग में हों या पृथ्वी पर, उसकी सर्वशक्तिमान हथेली में हैं; यह सब स्वयं परमेश्वर का कार्य है और उसके स्थान पर किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता। स्वर्ग में वह आत्मा है, लेकिन स्वयं परमेश्वर भी है; लोगों के बीच वह देह है, पर स्वयं परमेश्वर बना रहता है। यद्यपि उसे सैकड़ों-हज़ारों नामों से बुलाया जा सकता है, तो भी वह स्वयं है, और उसका समस्त कार्य उसके आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। उसके क्रूसीकरण के माध्यम से सारी मानवजाति का छुटकारा उसके आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य था और अंत के दिनों के दौरान सभी देशों और सभी भूभागों के लिए उसका निर्देश भी आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य है। हर समय परमेश्वर को केवल सर्वशक्तिमान एक सच्चा परमेश्वर ही कहा जा सकता है, वह स्वयं सर्व-समावेशी परमेश्वर है। परमेश्वर में ये व्यक्ति बिल्कुल अस्तित्व में नहीं हैं, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का यह विचार तो बिल्कुल नहीं है! स्वर्ग में और पृथ्वी पर केवल एक ही परमेश्वर है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या त्रित्व का अस्तित्व है?