2. मैंने कई सालों से प्रभु में विश्वास किया है, और मैंने बाइबल को बहुत पढ़ा है। क्यों मैंने मनुष्य के पुत्र के रूप में परमेश्वर के देह बनने और अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करने के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं पढ़ी है? आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु देह में लौट आया है, कि वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, और यह कि वह अंतिम दिनों का न्याय का कार्य कर रहा है। क्या बाइबल में इसका कोई आधार है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“पिता किसी का न्याय नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है” (यूहन्ना 5:22)।
“वरन् उसे न्याय करने का भी अधिकार दिया है, इसलिये कि वह मनुष्य का पुत्र है” (यूहन्ना 5:27)।
“यदि कोई मनुष्य मेरे वचन सुनता है लेकिन इनका पालन नहीं करता है तो मैं उसका न्याय नहीं करता हूँ : क्योंकि मैं संसार का न्याय करने नहीं, बल्कि संसार को बचाने आया हूँ। वो जो मुझे नकार देता है, और मेरे वचन नहीं स्वीकारता, उसका भी न्याय करने वाला कोई है : मैंने जो मार्ग बताया है वही अंत के दिन उसका न्याय करेगा” (यूहन्ना 12:47-48)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
सभी यहूदी पुराने नियम पढ़ते थे और यशायाह की भविष्यवाणी को जानते थे कि चरणी में एक नर शिशु जन्म लेगा। तो फिर इस भविष्यवाणी को भलीभाँति जानते हुए भी उन्होंने यीशु को क्यों सताया? क्या ऐसा उनकी विद्रोही प्रकृति और पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति अज्ञानता के कारण नहीं हुआ? उस समय, फरीसियों को विश्वास था कि यीशु का कार्य उस भविष्यवाणी से भिन्न था जो वे नर शिशु के बारे में जानते थे; और आज लोग परमेश्वर को इसलिए अस्वीकार करते हैं क्योंकि देहधारी परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं है। क्या परमेश्वर के विरुद्ध उनके विद्रोहीपन का सार समान नहीं है? क्या तुम बिना अपवाद के पवित्र आत्मा के समस्त कार्य को स्वीकार कर सकते हो? यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो यह धारा सही है और तुम्हें बिना किसी आशंका के इसे स्वीकार कर लेना चाहिए; और क्या स्वीकार करना है, इसे लेकर तुम्हें चयन नहीं करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के प्रति अपनी अंतर्दृष्टि का अधिक प्रयोग करने और उसके प्रति ज्यादा सावधानी बरतने का प्रयास करते हो, तो क्या यह अनावश्यक नहीं है? तुम्हें बाइबल से और अधिक प्रमाण नहीं खोजने चाहिए; बल्कि निरपवाद रूप से पवित्र आत्मा का कार्य स्वीकार कर लेना चाहिए, क्योंकि तुम परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम्हें उसकी जाँच-पड़ताल नहीं करनी चाहिए। यह दिखाने के लिए कि मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ, तुम्हें मुझे लेकर और सबूत नहीं खोजने चाहिए, बल्कि तुम्हें यह भेद पहचानने में सक्षम होना चाहिए कि क्या मैं तुम्हारे लिए लाभदायक हूँ, यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। भले ही तुम्हें बाइबल में और अधिक अकाट्य सबूत प्राप्त हो जाएँ, फिर भी ये तुम्हें पूरी तरह से मेरे सामने नहीं ला सकते। तुम केवल बाइबल के दायरे में ही रहते हो, न कि मेरे सामने; बाइबल मुझे जानने में तुम्हारी सहायता नहीं कर सकती है, न ही यह मेरे लिए तुम्हारे प्रेम को गहरा कर सकती है। यद्यपि बाइबल में भविष्यवाणी की गई थी कि एक नर शिशु जन्म लेगा, मगर कोई इसकी थाह नहीं पा सका कि किस पर यह भविष्यवाणी खरी उतरेगी, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर का कार्य नहीं पता था, और यही कारण था कि फरीसियों ने यीशु का प्रतिरोध किया। कुछ लोग जानते हैं कि मेरा कार्य मनुष्य के हित में है, फिर भी वे निरंतर यह विश्वास करते रहते हैं कि यीशु और मैं, दो पूरी तरह से अलग, परस्पर असंगत प्राणी हैं। उस समय, यीशु ने अपने शिष्यों को बस इन विषयों पर अनुग्रह के युग के धर्मोपदेशों की एक श्रृंखला दी कि अनुग्रह के युग में अभ्यास कैसे करें, सभा कैसे करें, प्रार्थना में याचना कैसे करें, और दूसरों से कैसे व्यवहार करें इत्यादि। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और उसने केवल इस बारे में बोला कि शिष्य और उस समय जो लोग उसका अनुसरण करते थे, कैसे अभ्यास करें। उस समय उसने केवल अनुग्रह के युग का ही कार्य किया और अंत के दिनों का कोई कार्य नहीं किया। जब यहोवा ने व्यवस्था के युग में पुराने नियम की व्यवस्थाएँ निर्धारित कीं, तब उसने अनुग्रह के युग का कार्य क्यों नहीं किया? उसने पहले से ही अनुग्रह के युग के कार्य को स्पष्ट क्यों नहीं किया? क्या यह मनुष्यों को इसे स्वीकार करने में मदद नहीं करता? उसने केवल यह भविष्यवाणी की कि एक नर शिशु जन्म लेगा और सामर्थ्य में आएगा, परन्तु उसने पहले से ही अनुग्रह के युग का कार्य नहीं किया। प्रत्येक युग में परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट सीमाएँ हैं; वह केवल वर्तमान युग का कार्य करता है और कभी भी कार्य का आगामी चरण पहले से नहीं करता। केवल इस तरह से उसका प्रत्येक युग का प्रतिनिधि कार्य सामने लाया जा सकता है। यीशु ने केवल अंत के दिनों के चिह्नों के बारे में बात की, उसने सिर्फ यह कहा कि उस समय के लोगों को कैसे धैर्य रखना चाहिए, उन्हें कैसे बचाया जाना चाहिए, उन्हें कैसे पश्चात्ताप करना चाहिए और कैसे अपने पाप स्वीकार करने चाहिए, उन्हें कैसे सलीब धारण करना चाहिए और कैसे कष्ट सहने चाहिए। उसने कभी इस बारे में बात नहीं की कि अंत के दिनों में मनुष्य को किस प्रकार प्रवेश हासिल करना चाहिए, या उसे परमेश्वर के इरादे पूरे करने का किस प्रकार प्रयास करना चाहिए। ऐसे में, क्या अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को बाइबल के अंदर खोजना बेतुका नहीं है? महज़ बाइबल को हाथों में पकड़कर तुम क्या देख सकते हो? चाहे बाइबल का व्याख्याता हो या उपदेशक, आज के कार्य को कौन पहले से स्पष्ट रूप से देख सकता था?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन लोगों ने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, वे किस प्रकार उसके प्रकाशनों को प्राप्त कर सकते हैं?
यीशु के समय में, यीशु ने अपने भीतर पवित्र आत्मा के कार्य के अनुसार यहूदियों की और उन सबकी अगुआई की थी, जिन्होंने उस समय उसका अनुसरण किया था। उसने जो कुछ किया, उसमें उसने बाइबल को आधार नहीं बनाया, बल्कि वह अपने कार्य के अनुसार बोला; उसने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया कि बाइबल क्या कहती है, और न ही उसने अपने अनुयायियों की अगुआई करने के लिए बाइबल में कोई मार्ग ढूँढ़ा। ठीक अपना कार्य आरंभ करने के समय से ही उसने पश्चात्ताप के मार्ग का प्रचार किया—एक ऐसा शब्द, जिसका पुराने विधान की असंख्य भविष्यवाणियों में बिल्कुल भी उल्लेख नहीं किया गया था। उसने न केवल बाइबल के अनुसार कार्य नहीं किया, बल्कि एक अधिक नए मार्ग की अगुआई भी की और अधिक नया कार्य किया। उपदेश देते समय उसने कभी बाइबल का उल्लेख नहीं किया। व्यवस्था के युग के दौरान, बीमारों को चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने के उसके चमत्कार करने में कभी कोई सक्षम नहीं हो पाया था। इसी तरह उसका कार्य, उसकी शिक्षाएँ, उसके भाषण का अधिकार और सामर्थ्य भी व्यवस्था के युग में किसी भी मनुष्य से परे थी। यीशु ने मात्र अपना अधिक नया काम किया, और भले ही बहुत-से लोगों ने बाइबल का उपयोग करते हुए उसकी निंदा की—और यहाँ तक कि उसे सलीब पर चढ़ाने के लिए पुराने विधान का उपयोग किया—फिर भी उसका कार्य पुराने विधान से आगे निकल गया; यदि ऐसा न होता, तो लोग उसे सलीब पर क्यों चढ़ाते? क्या यह इसलिए नहीं था, क्योंकि पुराने विधान में उसकी शिक्षाओं और बीमारों को चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने की उसकी सामर्थ्य के बारे में कुछ नहीं कहा गया था? उसका कार्य एक अधिक नए मार्ग की अगुआई करने के लिए था, वह जानबूझकर बाइबल के विरुद्ध लड़ाई करने या जानबूझकर पुराने विधान को अनावश्यक बना देने के लिए नहीं था। वह केवल अपनी सेवकाई करने और उन लोगों के लिए नया कार्य लाने के लिए आया था, जो उसके लिए लालायित थे और उसे खोजते थे। वह पुराने विधान की व्याख्या करने या उसके कार्य का समर्थन करने के लिए नहीं आया था। उसका कार्य व्यवस्था के युग को लगातार विकसित होने देने के लिए नहीं था। उसने इस बात पर कोई विचार नहीं किया कि बाइबल उसके कार्य का आधार थी या नहीं, बल्कि वह तो केवल वही कार्य करने के लिए आया था, जो उसे करना ही था; इसलिए, उसने पुराने विधान की भविष्यवाणियों की व्याख्या नहीं की, न ही उसने पुराने विधान के व्यवस्था के युग के वचनों के अनुसार कार्य किया। उसने इस बात को नज़रअंदाज़ किया कि पुराने विधान में क्या कहा गया है, उसने इस बात की परवाह नहीं की कि पुराना विधान उसके कार्य से सहमत है या नहीं, और उसने इस बात की परवाह नहीं की कि लोग उसके कार्य के बारे में क्या जानते हैं या कैसे उसकी निंदा करते हैं। वह बस वह कार्य करता रहा जो उसे करना चाहिए था, भले ही बहुत-से लोगों ने उसकी निंदा करने के लिए पुराने विधान के नबियों के पूर्वकथनों का उपयोग किया। लोगों को ऐसा प्रतीत हुआ, मानो उसके कार्य का कोई आधार नहीं था, और उसमें बहुत-कुछ ऐसा था, जो पुराने विधान के अभिलेखों से मेल नहीं खाता था। क्या यह मनुष्य की भ्रामकता नहीं थी? क्या परमेश्वर को अपने कार्य पर विनियम लागू करने की आवश्यकता है? और क्या परमेश्वर के कार्य का नबियों के पूर्वकथनों के अनुसार होना आवश्यक है? आखिरकार कौन बड़ा है : परमेश्वर या बाइबल? परमेश्वर को बाइबल के अनुसार कार्य करना क्यों आवश्यक है? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर को बाइबल से आगे निकलने का कोई अधिकार न हो? क्या परमेश्वर बाइबल से दूर नहीं जा सकता और अन्य काम नहीं कर सकता? यीशु और उसके शिष्यों ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया? यदि उसे सब्त के अनुसार और पुराने विधान की आज्ञाओं के अनुसार अभ्यास करना था, तो आने के बाद यीशु ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया, बल्कि इसके बजाय क्यों उसने पाँव धोए, सिर ढका, रोटी तोड़ी और दाखरस पिया? क्या यह सब पुराने विधान की आज्ञाओं में अनुपस्थित नहीं है? यदि यीशु पुराने विधान का पालन करता था, तो उसने इन विनियमों को क्यों तोड़ा? तुम्हें पता होना चाहिए कि पहले कौन आया, परमेश्वर या बाइबल! सब्त का प्रभु होते हुए, क्या वह बाइबल का भी प्रभु नहीं हो सकता?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (1)
यूँ तो यीशु मनुष्यों के बीच आया और उसने बहुत-सा कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया और मनुष्य की पाप-बलि के रूप में काम किया; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त नहीं किया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह बचाने के लिए केवल यीशु का पाप-बलि बनना और मनुष्य के पापों को वहन करना ही आवश्यक नहीं था, बल्कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए उसके स्वभावों से पूरी तरह छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करना आवश्यक था। और इसलिए मनुष्य के पापों के क्षमा किए जाने के बाद परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए देह में लौट आया और उसने ताड़ना तथा न्याय का कार्य आरंभ किया। यह कार्य मानवजाति को एक उच्चतर क्षेत्र में ले आया है। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में प्रकाश में जिएँगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना
अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों का गहन-विश्लेषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर के प्रति समर्पण किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता जीनी चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभावों पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य परमेश्वर को कैसे अस्वीकार करता है, और भी अधिक इस तथ्य को उजागर करने पर केंद्रित हैं कि मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध एक विरोधी शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर कुछ वचनों में मनुष्य की प्रकृति को पूरी तरह नहीं समझाता है; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर और काट-छाँट करने की इन विभिन्न विधियों को साधारण वचनों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; बल्कि उजागर और काट-छाँट करने के इस कार्य को करने में उस सत्य का उपयोग किया जाता है जो मनुष्य के पास बिल्कुल भी नहीं होता है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य की समझ पैदा करने का काम करता है। न्याय के कार्य ने मनुष्य को परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों के बारे में काफी समझ प्राप्त करने में सक्षम बनाया है जो उसकी समझ से परे होते हैं। इसने मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार और अपनी भ्रष्टता की जड़ को समझने और जानने, साथ ही अपने कुरूप चेहरे का पता लगाने में सक्षम बनाया है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन को उन सभी के लिए उद्घाटित करने का कार्य है जो उसमें आस्था रखते हैं। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है
यदि लोग अनुग्रह के युग में अटके रहेंगे, तो वे कभी भी अपने भ्रष्ट स्वभावों से छुटकारा नहीं पाएँगे, परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव को जानने की बात तो दूर है! यदि लोग सदैव अनुग्रह की प्रचुरता में रहते हैं, परंतु उनके पास जीवन का वह मार्ग नहीं है, जो उन्हें परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने में समर्थ बनाता है, तो वे परमेश्वर पर अपने विश्वास में उसे वास्तव में कभी भी प्राप्त नहीं करेंगे। इस प्रकार का विश्वास वास्तव में दयनीय है। जब तुम इस पुस्तक को पूरा पढ़ लोगे, जब तुम राज्य के युग में देहधारी परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का अनुभव कर लोगे, तब तुम महसूस करोगे कि अनेक वर्षों की तुम्हारी आशाएँ अंततः साकार हो गई हैं। तुम महसूस करोगे कि केवल अब तुमने परमेश्वर को वास्तव में आमने-सामने देखा है; केवल अब तुमने परमेश्वर के चेहरे को निहारा है, उसके व्यक्तिगत कथन सुने हैं, उसके कार्य की बुद्धिमत्ता को समझा है, और वास्तव में महसूस किया है वह कितना व्यावहारिक और सर्वशक्तिमान है। तुम महसूस करोगे कि तुमने ऐसी बहुत-सी चीजें पाई हैं, जिन्हें अतीत में लोगों ने न कभी देखा था, न ही प्राप्त किया था। इस समय, तुम स्पष्ट रूप से जान लोगे कि परमेश्वर पर विश्वास करना क्या होता है और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होना क्या होता है। निस्संदेह, यदि तुम अतीत के विचारों से चिपके रहते हो, और परमेश्वर के दूसरे देहधारण के तथ्य को अस्वीकार कर देते हो और उसे स्वीकार नहीं करते हो, तो तुम खाली हाथ रहोगे और कुछ नहीं पाओगे, और अंततः परमेश्वर का विरोध करने के दोषी ठहराए जाओगे। जो लोग सत्य के प्रति समर्पित होते हैं और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित होते हैं, वे दूसरे देहधारी परमेश्वर—सर्वशक्तिमान—के नाम के अधीन स्वीकार किए जाएँगे। वे परमेश्वर का व्यक्तिगत मार्गदर्शन स्वीकार करने में सक्षम होंगे, वे अधिक और उच्चतर सत्य और वास्तविक मानव जीवन प्राप्त करेंगे। वे उस दर्शन को निहारेंगे, जिसे अतीत के लोगों द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया था : “तब मैं ने उसे, जो मुझ से बोल रहा था, देखने के लिए अपना मुँह फेरा; और पीछे घूमकर मैं ने सोने की सात दीवटें देखीं, और उन दीवटों के बीच में मनुष्य के पुत्र सदृश एक पुरुष को देखा, जो पाँवों तक का वस्त्र पहिने, और छाती पर सोने का पटुका बाँधे हुए था। उसके सिर और बाल श्वेत ऊन वरन् पाले के समान उज्ज्वल थे, और उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं। उसके पाँव उत्तम पीतल के समान थे जो मानो भट्ठी में तपाया गया हो, और उसका शब्द बहुत जल के शब्द के समान था। वह अपने दाहिने हाथ में सात तारे लिए हुए था, और उसके मुख से तेज दोधारी तलवार निकलती थी। उसका मुँह ऐसा प्रज्वलित था, जैसा सूर्य कड़ी धूप के समय चमकता है” (प्रकाशितवाक्य 1:12-16)। यह दर्शन परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है, और उसके संपूर्ण स्वभाव की यह अभिव्यक्ति वर्तमान देहधारण में परमेश्वर के कार्य की अभिव्यक्ति भी है। ताड़ना और न्याय की निरंतर धारा में मनुष्य का पुत्र अपने कथनों के माध्यम से अपने अंतर्निहित स्वभाव को व्यक्त करता है और उन सभी को, जो उसकी ताड़ना और न्याय स्वीकार करते हैं, मनुष्य के पुत्र का वास्तविक चेहरा देखने देता है। यह वही चेहरा है जो यूहन्ना द्वारा देखे गए मनुष्य के पुत्र के चेहरे का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करता है। (निस्संदेह, यह सब उनके लिए अदृश्य होगा, जो राज्य के युग में परमेश्वर के कार्यों को स्वीकार नहीं करते।) परमेश्वर का वास्तविक चेहरा मनुष्य की भाषा द्वारा पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता; इसलिए परमेश्वर अपने अंतर्निहित स्वभाव को अभिव्यक्त करके मनुष्य को अपना वास्तविक चेहरा दिखाता है। अर्थात्, जिन सभी लोगों ने मनुष्य के पुत्र के अंतर्निहित स्वभाव को भली-भाँति समझा है, उन्होंने मनुष्य के पुत्र का वास्तविक चेहरा देखा है; क्योंकि परमेश्वर इतना महान है कि उसे मनुष्य की भाषा द्वारा पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। एक बार जब मनुष्य राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का अनुभव कर लेगा, तब वह यूहन्ना के वचनों का वास्तविक अर्थ जान लेगा, जो उसने दीवटों के बीच मनुष्य के पुत्र के बारे में कहे थे : “उसके सिर और बाल श्वेत ऊन वरन् पाले के समान उज्ज्वल थे, और उसकी आँखें आग की ज्वाला के समान थीं। उसके पाँव उत्तम पीतल के समान थे जो मानो भट्ठी में तपाया गया हो, और उसका शब्द बहुत जल के शब्द के समान था। वह अपने दाहिने हाथ में सात तारे लिए हुए था, और उसके मुख से तेज दोधारी तलवार निकलती थी। उसका मुँह ऐसा प्रज्वलित था, जैसा सूर्य कड़ी धूप के समय चमकता है।” उस समय तुम निस्संदेह जान जाओगे कि इतना कुछ कहने वाला यह साधारण देह निर्विवाद रूप से दूसरा देहधारी परमेश्वर है। इतना ही नहीं, तुम्हें वास्तव में अनुभव होगा कि तुम कितने धन्य हो, और तुम स्वयं को सबसे अधिक भाग्यशाली महसूस करोगे। क्या तुम इस आशीष को प्राप्त करने के इच्छुक नहीं हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना