1. हम जिस कैथलिक धर्म को मानते हैं, वह प्रेरितों से नीचे पारित हुआ है, और यह सभी धर्मों में सबसे रूढ़िवादी है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया ईसाई धर्म से संबंधित है, और ईसाई धर्म कैथलिक धर्म की एक शाखा है। यदि हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो क्या ईसाई धर्म में हमारा धर्म-परिवर्तन नहीं हो जाएगा? और ऐसा करने में, क्या हम परमेश्वर को अपनी पीठ न दिखा देंगे?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“मेरी और भी भेड़ें हैं, जो इस भेड़शाला की नहीं। मुझे उनका भी लाना अवश्य है। वे मेरा शब्द सुनेंगी, तब एक ही झुण्ड और एक ही चरवाहा होगा” (यूहन्ना 10:16)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
संसार में कई प्रमुख धर्म हैं, प्रत्येक का अपना प्रमुख या अगुआ है और उनके अनुयायी संसार भर के विभिन्न देशों और क्षेत्रों में सभी ओर फैले हुए हैं; लगभग प्रत्येक देश में, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, भिन्न-भिन्न धर्म हैं। फिर भी संसार भर में चाहे कितने ही धर्म क्यों न हों, ब्रह्मांड के सभी लोग अंततः एक ही परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन अस्तित्व में हैं, धर्म के प्रमुखों या अगुआओं के मार्गदर्शन के अधीन नहीं हैं। कहने का अर्थ है कि मानवजाति किसी विशेष धर्म-प्रमुख या अगुवा द्वारा मार्गदर्शित नहीं है; बल्कि संपूर्ण मानवजाति को एक ही सृष्टिकर्ता के द्वारा मार्गदर्शित किया जाता है, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी का और सभी चीजों का और मानवजाति का भी सृजन किया है—यह एक तथ्य है। यद्यपि संसार में कई प्रमुख धर्म हैं, किंतु वे कितने ही बड़े क्यों न हों, वे सभी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन अस्तित्व में हैं और उनमें से कोई भी इस प्रभुत्व के दायरे से बाहर नहीं जा सकता है। मानवजाति का विकास, समाज का परिवर्तन, प्राकृतिक विज्ञानों का उन्नत होना—प्रत्येक सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं से अविभाज्य है और यह कार्य ऐसा नहीं है जो किसी धर्म-प्रमुख द्वारा किया जा सके। धर्म-प्रमुख मात्र किसी धर्म विशेष के अगुआ हैं, और वे परमेश्वर का, या उसका जिसने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों को रचा है, प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। धर्म-प्रमुख पूरे धर्म के भीतर सभी का नेतृत्व कर सकते हैं, परंतु वे स्वर्ग के नीचे के सभी सृजित प्राणियों को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं—यह सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत तथ्य है। एक धर्म-प्रमुख मात्र अगुआ है, और वह परमेश्वर (सृष्टिकर्ता) के समकक्ष खड़ा नहीं हो सकता। सभी चीजें सृष्टिकर्ता के हाथों में हैं और अंत में वे सभी सृष्टिकर्ता के हाथों में लौट जाएँगी। मानवजाति परमेश्वर द्वारा बनाई गई थी और प्रत्येक धर्म परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन आ जाएगा—यह अपरिहार्य है। केवल परमेश्वर ही सभी चीज़ों में सर्वोच्च है, और सभी सृजित प्राणियों में उच्चतम शासक को भी उसके प्रभुत्व के अधीन आना होगा। किसी इंसान का रुतबा चाहे कितना भी ऊँचा क्यों न हो, वह मानवजाति को किसी उपयुक्त गंतव्य तक नहीं ले जा सकता और कोई भी सभी चीजों को उनकी किस्म के आधार पर छाँटने में सक्षम नहीं है। स्वयं यहोवा ने मानवजाति की रचना की और प्रत्येक को उसकी किस्म के आधार पर छाँटा और जब अंत का समय आएगा तो वह तब भी सभी चीजों को उनकी किस्म के आधार पर छाँटते हुए अपना कार्य स्वयं ही करेगा—इस कार्य में कोई भी इंसान परमेश्वर की जगह नहीं ले सकता। आरंभ से लेकर आज तक किए गए कार्य के सभी तीन चरण स्वयं परमेश्वर के द्वारा किए गए हैं और एक ही परमेश्वर के द्वारा किए गए हैं। कार्य के तीन चरणों का तथ्य परमेश्वर की समस्त मानवजाति की अगुआई का तथ्य है, एक ऐसा तथ्य जिसे कोई नकार नहीं सकता। कार्य के तीन चरणों के अंत में सभी चीजों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा और वे परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन लौट जाएँगी, क्योंकि ब्रह्मांड के ऊपर और संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल इसी एक परमेश्वर का अस्तित्व है, और कोई दूसरे धर्म नहीं हैं। जो संसार का निर्माण करने में अक्षम है वह उसका अंत करने में भी अक्षम होगा, जबकि जिसने संसार की रचना की है वह उसका अंत करने में भी निश्चित रूप से समर्थ होगा। इसलिए, यदि कोई युग का अंत करने में असमर्थ है और बस मानव की स्वयं को विकसित करने और अपने चरित्र का शोधन करने में सहायता करने में सक्षम है, तो वह निश्चित रूप से परमेश्वर नहीं होगा, वह निश्चित रूप से मानवजाति का प्रभु नहीं होगा और वह इस तरह के महान कार्य को करने में असमर्थ होगा। केवल एक ही है जो इस प्रकार का कार्य कर सकता है और वे सभी जो यह कार्य करने में असमर्थ हैं, निश्चित रूप से विभिन्न बुरी आत्माएँ हैं, न कि परमेश्वर और सभी बुरी आत्माएँ परमेश्वर की दुश्मन हैं। जब तक कुछ बुरी आत्माओं द्वारा लोगों को गुमराह करने का कार्य है, वह एक बुरा धर्म है और बुरे धर्म परमेश्वर के साथ असंगत हैं और जो परमेश्वर के साथ असंगत है, वह परमेश्वर का शत्रु है। समस्त कार्य केवल इसी एक सच्चे परमेश्वर द्वारा किया जाता है और संपूर्ण ब्रह्मांड पर केवल इसी एक परमेश्वर का शासन है। चाहे उसका इस्राएल का काम हो या चीन का, चाहे यह कार्य आत्मा द्वारा किया जाए या देह के द्वारा, किया सब कुछ परमेश्वर के द्वारा ही जाता है, किसी अन्य के द्वारा नहीं। बिल्कुल इसी कारण कि वह समस्त मानवजाति का परमेश्वर है, वह किसी भी परिस्थिति से बाधित हुए बिना स्वतंत्र रूप से कार्य करता है। यह सभी दर्शनों में सबसे महान है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है
यहोवा के कार्य से लेकर यीशु के कार्य तक और यीशु के कार्य से लेकर इस वर्तमान चरण तक, ये तीन चरण परमेश्वर के प्रबंधन के पूर्ण विस्तार को एक सतत सूत्र में पिरोते हैं और ये सब एक ही आत्मा का कार्य हैं। दुनिया के सृजन से परमेश्वर हमेशा मानवजाति का प्रबंधन करता आ रहा है। वही आरंभ और अंत है, वही प्रथम और अंतिम है, और वही एक है जो युग का आरंभ करता है और वही एक है जो युग का अंत करता है। विभिन्न युगों और विभिन्न स्थानों में कार्य के तीन चरण अचूक रूप में एक ही आत्मा का कार्य हैं। इन तीन चरणों को पृथक करने वाले सभी लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। अब तुम्हारे लिए यह समझना एकदम आवश्यक है कि प्रथम चरण से लेकर आज तक का समस्त कार्य एक ही परमेश्वर का कार्य है, एक ही आत्मा का कार्य है। इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)
यहोवा के कार्य के बाद यीशु मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए देहधारी हो गया। उसका कार्य अलग से किया गया कार्य नहीं था, बल्कि यहोवा के कार्य के आधार पर किया गया था। यह कार्य एक नए युग के लिए था, जिसे परमेश्वर ने व्यवस्था का युग समाप्त करने के बाद किया था। इसी प्रकार, यीशु का कार्य समाप्त हो जाने के बाद परमेश्वर ने अगले युग के लिए अपना कार्य जारी रखा, क्योंकि परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन सदैव आगे बढ़ रहा है। जब पुराना युग बीत जाता है, तो उसके स्थान पर नया युग आ जाता है, और एक बार जब पुराना कार्य पूरा हो जाता है, तो परमेश्वर के प्रबंधन को जारी रखने के लिए नया कार्य शुरू हो जाता है। यह देहधारण परमेश्वर का दूसरा देहधारण है, जो यीशु का कार्य पूरा होने के बाद हुआ है। निस्संदेह, यह देहधारण स्वतंत्र रूप से घटित नहीं होता; व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के बाद यह कार्य का तीसरा चरण है। हर बार जब परमेश्वर कार्य का नया चरण आरंभ करता है, तो हमेशा एक नई शुरुआत होती है और वह हमेशा एक नया युग लाता है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव, उसके कार्य करने के तरीके, उसके कार्य के स्थल, और उसके नाम में भी परिवर्तन होते हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि मनुष्य के लिए नए युग में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करना कठिन होता है। परंतु मनुष्य उसका कितना भी विरोध करे, परमेश्वर सदैव अपना कार्य करता रहता है और सदैव समस्त मानवजाति को आगे ले जाता रहता है। जब यीशु मनुष्य के संसार में आया तो उसने अनुग्रह का युग शुरू किया और व्यवस्था का युग समाप्त किया। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर एक बार फिर देहधारी हुआ और इस देहधारण के साथ उसने अनुग्रह का युग समाप्त किया और राज्य का युग शुरू किया। वे सब जो परमेश्वर के दूसरे देहधारण को स्वीकार करने में सक्षम हैं, राज्य के युग में ले जाए जाएँगे और इसके अलावा वे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर का मार्गदर्शन स्वीकार करने में सक्षम होंगे। यूँ तो यीशु मनुष्यों के बीच आया और उसने बहुत-सा कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया और मनुष्य की पाप-बलि के रूप में काम किया; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त नहीं किया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह बचाने के लिए केवल यीशु का पाप-बलि बनना और मनुष्य के पापों को वहन करना ही आवश्यक नहीं था, बल्कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए उसके स्वभावों से पूरी तरह छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करना आवश्यक था। और इसलिए मनुष्य के पापों के क्षमा किए जाने के बाद परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए देह में लौट आया और उसने ताड़ना तथा न्याय का कार्य आरंभ किया। यह कार्य मानवजाति को एक उच्चतर क्षेत्र में ले आया है। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में प्रकाश में जिएँगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना
आज के कार्य ने अनुग्रह के युग के कार्य को आगे बढ़ाया है; अर्थात्, समस्त छह हजार सालों की प्रबंधन योजना का कार्य आगे बढ़ा है। यद्यपि अनुग्रह का युग समाप्त हो गया है, किन्तु परमेश्वर के कार्य ने अधिक और गहरी प्रगति की है। मैं क्यों बार-बार कहता हूँ कि कार्य का यह चरण अनुग्रह के युग और व्यवस्था के युग पर आधारित है? दूसरी तरह से कहा जाए तो आज का कार्य अनुग्रह के युग में किए गए कार्य की निरंतरता और व्यवस्था के युग में किए गए कार्य की प्रगति है। तीनों चरण आपस में घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं और श्रृंखला की हर कड़ी निकटता से अगली कड़ी से जुड़ी है। मैं यह भी क्यों कहता हूँ कि कार्य का यह चरण यीशु द्वारा किए गए कार्य पर आधारित है? मान लो, यह चरण यीशु द्वारा किए गए कार्य पर आधारित न होता, तो फिर इस चरण में क्रूस पर चढ़ाए जाने का कार्य फिर से करना होता, और पहले किए गए छुटकारे के कार्य को फिर से करना पड़ता। यह अर्थहीन होता। इसलिए, ऐसा नहीं है कि कार्य पूरी तरह समाप्त हो चुका है, बल्कि युग आगे बढ़ गया है और कार्य को पहले से अधिक ऊँचा कर दिया गया है। यह कहा जा सकता है कि कार्य का यह चरण व्यवस्था के युग की नींव और यीशु के कार्य की चट्टान पर निर्मित है। परमेश्वर का कार्य चरण-दर-चरण निर्मित किया जाता है, और यह चरण कोई नई शुरुआत नहीं है। सिर्फ तीनों चरणों के कार्य के संयोजन को ही छह हजार सालों की प्रबंधन योजना माना जा सकता है। इस चरण का कार्य अनुग्रह के युग के कार्य की नींव पर किया जाता है। यदि कार्य के ये दो चरण जुड़े न होते, तो इस चरण में क्रूस पर चढ़ाए जाने का कार्य क्यों नहीं दोहराया गया? मैं मनुष्य के पापों को अपने ऊपर क्यों नहीं लेता हूँ, इसके बजाय सीधे उनका न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने क्यों आता हूँ? अगर मनुष्य का न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने का मेरा कार्य क्रूसीकरण के बाद नहीं होता—इस तथ्य के साथ कि अब मेरा आगमन पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आए बिना हुआ है—तो मैं मनुष्य का न्याय करने और उन्हें ताड़ना देने के योग्य नहीं होता। मैं यीशु से एकाकार हूँ, बस इसी कारण मैं प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य को ताड़ना देने और उसका न्याय करने के लिए आता हूँ। कार्य का यह चरण पूरी तरह से पिछले चरण पर ही निर्मित है। यही कारण है कि सिर्फ ऐसा कार्य ही चरण-दर-चरण मनुष्य का उद्धार कर सकता है। यीशु और मैं एक ही पवित्रात्मा से आते हैं। यद्यपि हमारी देह एक-दूसरे से जुड़ी नहीं है, किन्तु हमारा आत्मा एक ही है; यद्यपि हमारे कार्य की विषयवस्तु और हम जो कार्य करते हैं, वे एक नहीं हैं, तब भी हमारा सार एक समान है; हमारी देह भिन्न रूप धारण करती हैं, लेकिन यह युग में परिवर्तन और हमारे कार्य की भिन्न आवश्यकताओं के कारण है; हमारी सेवकाई एक जैसी नहीं है, इसलिए जो कार्य हम आगे लाते हैं और जिस स्वभाव को हम मनुष्य पर प्रकट करते हैं, वे भी भिन्न हैं। यही कारण है कि आज मनुष्य जो देखता और समझता है वह अतीत के समान नहीं है; ऐसा युग में बदलाव के कारण है। यद्यपि उनके देह के लिंग और रूप भिन्न-भिन्न हैं, और वे दोनों एक ही परिवार में नहीं जन्मे हैं, उसी समयावधि में तो बिल्कुल नहीं, किन्तु फिर भी उनके आत्मा एक ही हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने
चूँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए उसे परमेश्वर के हर पदचिह्न का निकटता से अनुसरण करना चाहिए; और उसे “जहाँ कहीं मेमना जाता है उसका अनुसरण करना” चाहिए। जो लोग ऐसा करते हैं, केवल वे ही सचमुच सच्चे मार्ग की खोज करते हैं, वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को जानते हैं। जो लोग हठपूर्वक शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से चिपके रहते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा हटा दिया गया है। प्रत्येक समयावधि में परमेश्वर नया कार्य आरंभ करेगा और प्रत्येक अवधि में मनुष्य के बीच एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल इन सत्यों का ही पालन करता है कि “यहोवा परमेश्वर है” और “यीशु मसीह है,” जो ऐसे सत्य हैं जिनमें से हर एक केवल एक युग पर ही लागू होता है, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा और वह हमेशा के लिए पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा। परमेश्वर चाहे कैसे भी कार्य करता हो, यदि मनुष्य बिना किसी संदेह के अनुसरण करता है और वह निकटता से अनुसरण करता है, तो फिर पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य को कैसे निकाला जा सकता है? परमेश्वर चाहे जो भी करे, जब तक मनुष्य निश्चित है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य के साथ सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दंड दिया जा सकता है? परमेश्वर का कार्य कभी नहीं रुका है, उसके कदम कभी नहीं थमे हैं, और अपने प्रबंधन-कार्य की पूर्णता से पहले वह सदैव व्यस्त रहा है और कभी नहीं रुकता। किंतु मनुष्य अलग है : पवित्र आत्मा के कार्य का थोड़ा-सा अंश प्राप्त करने के बाद वह उसके साथ इस तरह व्यवहार करता है मानो वह कभी नहीं बदलेगा; जरा-सा ज्ञान प्राप्त करने के बाद वह परमेश्वर के नए कार्य के पदचिह्नों का अनुसरण करने के लिए आगे नहीं बढ़ता; परमेश्वर के कार्य का थोड़ा-सा ही अंश देखने के बाद वह तुरंत ही परमेश्वर को लकड़ी की एक विशिष्ट आकृति के होने में सीमित कर देता है और यह मानता है कि परमेश्वर सदैव इसी छवि में बना रहेगा जिसे वह देखता है, कि यह अतीत में भी ऐसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही रहेगा; सिर्फ थोड़ा-सा सतही स्तर का ज्ञान प्राप्त करने के बाद मनुष्य इतना घमंडी हो जाता है कि स्वयं को भूल जाता है और परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व के बारे में बेहूदा ढंग से घोषणा करने लगता है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं होता; और पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण के बारे में निश्चित हो जाने के बाद परमेश्वर के नए कार्य की घोषणा करने वाला व्यक्ति चाहे किसी भी प्रकार का क्यों न हो, मनुष्य उस नए कार्य को स्वीकार नहीं करता। इस तरह के लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं कर सकते; वे बहुत रूढ़िवादी हैं और नई चीजों को स्वीकार करने में अक्षम हैं। ये वे लोग हैं, जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं, किंतु परमेश्वर को अस्वीकार भी करते हैं। मनुष्य का मानना है कि इस्राएलियों का “केवल यहोवा में विश्वास करना और यीशु में विश्वास न करना” ग़लत था, किंतु अधिकतर लोग ऐसी ही भूमिका निभाते हैं, जिसमें वे “केवल यहोवा में विश्वास करते हैं और यीशु को अस्वीकार करते हैं” और “मसीहा के लौटने की लालसा करते हैं, किंतु उस मसीहा का विरोध करते हैं जिसे यीशु कहते हैं।” तो कोई आश्चर्य नहीं कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण को स्वीकार करने के पश्चात् अभी भी शैतान की सत्ता के अधीन जीते हैं, और अभी भी परमेश्वर के आशीष प्राप्त नहीं करते। क्या यह मनुष्य की विद्रोहशीलता का परिणाम नहीं है? दुनिया भर में ईसाई धर्म के सभी लोग, जिन्होंने आज के नए कार्य के साथ कदम नहीं मिलाया है, यह मानते हुए कि परमेश्वर उनकी संबंधित इच्छाएँ पूरी करेगा, इस उम्मीद से चिपके रहते हैं कि वे भाग्यशाली होंगे। फिर भी वे पूरी निश्चितता से यह नहीं कह सकते कि क्यों परमेश्वर उन्हें तीसरे स्वर्ग तक ले जाएगा या कैसे यीशु उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए सफेद बादल पर सवार होकर आएगा, वे तो पूर्ण निश्चितता के साथ यह भी नहीं कह सकते कि यीशु वास्तव में उस दिन सफेद बादल पर सवार होकर आएगा या नहीं, जिस दिन की वे कल्पना करते हैं। वे सभी चितित और हैरान हैं; वे स्वयं भी नहीं जानते कि परमेश्वर उनमें से प्रत्येक को ऊपर ले जाएगा या नहीं, जो विभिन्न समूहों के थोड़े-से मुट्ठी भर लोग हैं, जो हर पंथ से आते हैं। परमेश्वर द्वारा अभी किया जाने वाला कार्य, वर्तमान युग, परमेश्वर के इरादे—इनमें से किसी भी चीज की उन्हें कोई समझ नहीं है और वे अपनी उँगलियों पर दिन गिनने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते। जो लोग बिल्कुल अंत तक मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं, केवल वे ही अंतिम आशीष प्राप्त कर सकते हैं, जबकि वे “चतुर लोग,” जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ हैं, किंतु विश्वास करते हैं कि उन्होंने सब कुछ प्राप्त कर लिया है, वे परमेश्वर के प्रकटन को देखने में असमर्थ हैं। वे सभी विश्वास करते हैं कि वे पृथ्वी पर सबसे चतुर व्यक्ति हैं, और वे बिना किसी कारण परमेश्वर के कार्य के निरंतर विकास को बीच में ही रोक देते हैं, तथा पूर्ण निश्चय के साथ विश्वास करते प्रतीत होते हैं कि परमेश्वर उन्हें स्वर्ग तक ले जाएगा—वे, जिनकी “परमेश्वर के प्रति अटूट निष्ठा है, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं।” भले ही उनमें परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों के प्रति “अटूट निष्ठा” हो, फिर भी उनकी कथनी और करनी अत्यंत घिनौनी है, क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं और कपट और बुराई करते हैं। जो लोग बिल्कुल अंत तक अनुसरण नहीं कर सकते और पवित्र आत्मा के कार्य के साथ तालमेल नहीं बिठा सकते और केवल पुराने कार्य से चिपके रहते हैं, वे न केवल परमेश्वर के प्रति वफादारी हासिल करने में असफल हुए हैं, बल्कि इसके विपरीत वे ऐसे लोग बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, जो नए युग द्वारा ठुकरा दिए जाते हैं और जो दंडित किए जाएँगे। क्या उनसे भी अधिक दयनीय कोई है? अनेक तो यहाँ तक विश्वास करते हैं कि जो लोग प्राचीन व्यवस्था को ठुकराते हैं और नए कार्य को स्वीकार करते हैं वे सभी अंतरात्मा विहीन हैं। ये लोग, जो केवल “अंतरात्मा” पर ध्यान केंद्रित करते हैं, फिर भी पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते, अंततः अपनी ही अंतरात्मा द्वारा अपने भविष्य की संभावनाओं को बीच में नहीं रोकेंगे। यहाँ तक कि परमेश्वर भी अपने कार्य में विनियमों का पालन नहीं करता, और भले ही वह उसका अपना कार्य हो, फिर भी परमेश्वर उससे चिपका नहीं रहता। जिसे नकारा जाना चाहिए उसे नकारा जाता है, जिसे निकाल दिया जाना चाहिए उसे निकाल दिया जाता है। फिर भी मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के एक छोटे-से भाग को ही पकड़े रहकर खुद को उसके विरोध में खड़ा कर लेता है। क्या यह मनुष्य की बेहूदगी नहीं है? क्या यह मनुष्य की अज्ञानता नहीं है? आशीष प्राप्त न करने के डर से लोग जितना अधिक कायर और अति-सतर्क होते हैं, उतना ही अधिक वे और अधिक आशीष प्राप्त करने और अंतिम आशीष पाने में असमर्थ होते हैं। जो लोग हठपूर्वक व्यवस्था का पालन करते हैं वे सभी व्यवस्था के प्रति अटूट निष्ठा प्रदर्शित करते हैं और जितनी अधिक वे व्यवस्था के प्रति ऐसी वफादारी दिखाते हैं, उतना ही अधिक वे ऐसे विद्रोही होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। चूँकि अब व्यवस्था का युग नहीं, राज्य का युग है, इसलिए आज के कार्य और अतीत के कार्य का उल्लेख एक-साथ नहीं किया जा सकता, न ही अतीत के कार्य की तुलना आज के कार्य से की जा सकती है। परमेश्वर का कार्य बदल चुका है और मनुष्य का अभ्यास भी बदल चुका है; वह व्यवस्था को थामे रहना या सलीब उठाना नहीं है। इसलिए, व्यवस्था और सलीब के प्रति लोगों की वफादारी को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास
जब परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन समाप्ति के निकट होगा, तो परमेश्वर सभी चीजों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटेगा। मनुष्य सृष्टिकर्ता के हाथों से रचा गया था और अंत में वह मनुष्य को पूरी तरह से अपने प्रभुत्व में वापस ले लेगा; कार्य के तीन चरणों की यही परिणति है। अंत के दिनों में कार्य का चरण और इस्राएल एवं यहूदा में पिछले दो चरण, संपूर्ण ब्रह्मांड में परमेश्वर के प्रबंधन की योजना हैं। इसे कोई नकार नहीं सकता है, और यह परमेश्वर के कार्य का तथ्य है। यद्यपि लोगों ने इस कार्य के बहुत-से हिस्से का अनुभव नहीं किया है या इसके साक्षी नहीं हैं, परंतु तथ्य तब भी तथ्य ही हैं और इसे किसी भी मनुष्य के द्वारा नकारा नहीं जा सकता है। ब्रह्मांड में हर जगह जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे सभी कार्य के इन तीनों चरणों को स्वीकार करेंगे। यदि तुम कार्य के किसी एक विशेष चरण को ही जानते हो, और कार्य के अन्य दो चरणों को नहीं समझते हो, अतीत में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों को नहीं समझते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रबंधन की समस्त योजना के संपूर्ण सत्य के बारे में बात करने में असमर्थ हो, और परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान एक-पक्षीय है, क्योंकि तुम परमेश्वर को जानते या समझते नहीं हो, और इसलिए तुम परमेश्वर के गवाह बनने के लिए योग्य नहीं हो। इन चीज़ों के बारे में तुम्हारा वर्तमान ज्ञान चाहे गहरा हो या सतही, अंत में तुम सभी लोगों के पास ज्ञान होना ही चाहिए और तुम्हें पूरी तरह से आश्वस्त होना चाहिए और सभी लोग परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता को देखेंगे और उसके प्रभुत्व के अधीन समर्पित होंगे। इस कार्य के अंत में सभी धर्म एक हो जाएँगे, सभी सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन लौट जाएँगे, सभी सृजित प्राणी एक सच्चे परमेश्वर की आराधना करेंगे और सभी दुष्ट धर्म नष्ट हो जाएँगे और फिर कभी भी प्रकट नहीं होंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है