2. हम मानते हैं कि मृत्यु के बाद पाप-मोचन स्थल में मनुष्य के पाप शुद्ध किए जाते हैं जिसके बाद लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। फिर भी तुम गवाही देते हो कि जो लोग अंत के दिनों का परमेश्वर का न्याय का कार्य स्वीकार नहीं करते हैं उन्हें शुद्ध नहीं किया जाएगा और इसलिए वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं होंगे। इससे तुम्हारा क्या तात्पर्य है? लोग स्वर्ग के राज्य में ठीक कैसे प्रवेश कर सकते हैं?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“अपने सत्य के माध्यम से उन्हें पावनीकृत करो : तुम्हारा मार्ग सत्य है। जैसे तू ने मुझे जगत में भेजा, वैसे ही मैं ने भी उन्हें जगत में भेजा; और उनके लिये मैं अपने आप को पवित्र करता हूँ, ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किये जाएँ” (यूहन्ना 17:17-19)।
“मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)।
“यदि कोई मनुष्य मेरे वचन सुनता है लेकिन इनका पालन नहीं करता है तो मैं उसका न्याय नहीं करता हूँ : क्योंकि मैं संसार का न्याय करने नहीं, बल्कि संसार को बचाने आया हूँ। वो जो मुझे नकार देता है, और मेरे वचन नहीं स्वीकारता, उसका भी न्याय करने वाला कोई है : मैंने जो मार्ग बताया है वही अंत के दिन उसका न्याय करेगा” (यूहन्ना 12:47-48)।
“क्योंकि वह समय आ चुका है कि परमेश्वर के घर से न्याय शुरू किया जाए” (1 पतरस 4:17)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
तुम लोगों को परमेश्वर का इरादा देखने में सक्षम होना चाहिए और तुम्हें देखना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों के सृजन जितना सरल नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आज का कार्य उन लोगों का रूपांतरण करना है जो भ्रष्ट किए जा चुके हैं, जो बेहद सुन्न हैं, यह उन्हें शुद्ध करने के लिए है जो सृजित किए गए थे किंतु शैतान द्वारा संसाधित किए गए थे। यह आदम और हव्वा का सृजन नहीं है, यह प्रकाश का सृजन, या प्रत्येक पौधे और पशु का सृजन तो और भी नहीं है। परमेश्वर शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दी गई चीजों को शुद्ध करता है और फिर उन्हें नए सिरे से प्राप्त करता है, उन्हें ऐसी चीजें बनाता है, जो उसकी होती हैं और उन्हें अपनी महिमा बनाता है। यह स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों के सृजन जितना आसान नहीं है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है, न ही यह शैतान को अथाह कुंड में जाने का शाप देने के कार्य जैसा है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है। बल्कि, यह मनुष्य का कायापलट करने का कार्य है, उन चीजों को जो नकारात्मक हैं, और उसकी नहीं हैं, ऐसी चीजों में बदलने का कार्य है जो सकारात्मक हैं और उसकी हैं। परमेश्वर के कार्य के इस चरण के पीछे की यही वास्तविक कहानी है। तुम लोगों को यह समझना ही चाहिए, और विषयों को अत्यधिक सरलीकृत करने से बचना चाहिए। परमेश्वर का कार्य किसी भी साधारण कार्य के समान नहीं है। इसकी अद्भुतता और बुद्धि मनुष्य की सोच से परे हैं। परमेश्वर कार्य के इस चरण के दौरान सभी चीजों का सृजन नहीं करता है, किंतु वह उन्हें नष्ट भी नहीं करता है। इसके बजाय, वह अपनी सृजित की गई सभी चीजों का कायापलट करता है, और शैतान द्वारा दूषित कर दी गई सभी चीजों को शुद्ध करता है। और इस प्रकार, परमेश्वर एक महान उद्यम आरंभ करता है। यही परमेश्वर के कार्य का संपूर्ण महत्व है। क्या इन वचनों में तुम यह देखते हो कि परमेश्वर का कार्य सचमुच इतना सीधा-सरल है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?
अंत के दिनों के कार्य में वचनों की शक्ति चिह्नों और चमत्कारों के प्रदर्शन की शक्ति से कहीं अधिक है और वचन का अधिकार चिह्नों और चमत्कारों के अधिकार से कहीं बढ़कर है। वचन मनुष्य के हृदय में गहरे दबे सभी भ्रष्ट स्वभावों को उजागर कर देता है। तुम्हारे पास उनका खुद एहसास करने का कोई उपाय नहीं है। जब उन्हें वचन के माध्यम से उजागर किया जाता है, तो तुम स्वाभाविक रूप से उनका एहसास कर लोगे; तुम्हें उन्हें स्वीकारना होगा और तुम पूरी तरह से आश्वस्त हो जाओगे। क्या यह वचन का अधिकार नहीं है? यह आज वचन के कार्य द्वारा प्राप्त किया जाने वाला परिणाम है। इसलिए, बीमारी की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने से मनुष्य को उसके पापों से पूरी तरह से नहीं बचाया जा सकता, न ही चिह्नों और चमत्कारों के प्रदर्शन से उसे पूरी तरह से पूर्ण किया जा सकता है। चंगाई करने और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार मनुष्य को केवल अनुग्रह प्रदान करता है, किंतु मनुष्य की देह अभी भी शैतान की है और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव अभी भी मनुष्य के भीतर बने हुए हैं। दूसरे शब्दों में, जिस मनुष्य को शुद्ध नहीं किया गया है, वह अभी भी पाप और गंदगी का है। केवल वचन के माध्यम से शुद्ध किए जाने के बाद ही मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया और पावनीकृत किया जा सकता है। जब मनुष्य के भीतर से दुष्टात्माओं को निकाला गया और उसे छुटकारा दिलाया गया, तो इसका अर्थ केवल इतना था कि उसे शैतान के हाथ से छीनकर परमेश्वर को लौटा दिया गया है। किंतु मनुष्य अभी तक परमेश्वर द्वारा शुद्ध नहीं किया गया या बदला नहीं गया है और वह भ्रष्ट बना हुआ है। मनुष्य के भीतर अब भी गंदगी, प्रतिरोध और विद्रोहशीलता मौजूद है; मनुष्य केवल परमेश्वर के छुटकारे के माध्यम से ही उसके पास लौटा है, किंतु उसे परमेश्वर का जरा-सा भी ज्ञान नहीं है और वह अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने और उसके साथ विश्वासघात करने में सक्षम है। मनुष्य को छुटकारा दिलाए जाने से पहले उसके अंदर शैतान के बहुत-से जहर पहले ही डाल दिए गए थे और हजारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद उसके भीतर एक ऐसी प्रकृति है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। इसलिए जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया तो यह छुटकारे के मामले से बढ़कर कुछ नहीं था। यानी मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर वापस खरीदा गया, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति नहीं हटाई गई। मनुष्य, जो इतना गंदा है, को परमेश्वर की सेवा करने योग्य होने से पहले परिवर्तन से होकर गुजरना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह जान जाएगा और वह पूरी तरह बदल पाएगा और शुद्ध हो पाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने योग्य हो सकता है। सारा वर्तमान कार्य इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य को शुद्ध किया और बदला जा सके; ऐसा इसलिए है ताकि वचन के न्याय और ताड़ना के माध्यम से और शोधन के जरिये मनुष्य अपनी भ्रष्टता छोड़ सके और शुद्ध किया जा सके। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय के कार्य का चरण भी है और साथ ही उद्धार-कार्य का दूसरा चरण भी है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाता है, और वचन द्वारा शोधन, न्याय और उजागर किए जाने से ही मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताएँ, धारणाएँ, मंशाएँ और व्यक्तिगत आशाएँ पूरी तरह से प्रकट होती हैं। हालाँकि मनुष्य को छुटकारा दिलाया जा चुका है और उसके पाप क्षमा किए जा चुके हैं, फिर भी इसे केवल इस तरह समझा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ उसके अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। लेकिन मनुष्य पाप से मुक्त हुए बिना देह में रहता है और केवल पाप करता रह सकता है और निरंतर अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर लोग दिन में पाप करते हैं और शाम को उन्हें स्वीकार करते हैं। और इसलिए, हालाँकि पाप-बलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से नहीं बचा सकती। उद्धार का केवल आधा कार्य पूरा हुआ है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव हैं। ... मनुष्य के लिए अपने पापों से अवगत होना आसान नहीं है और उसके पास अपनी गहरी जमी हुई प्रकृति को पहचानने का कोई उपाय नहीं है। यह परिणाम केवल वचनों के न्याय के जरिये प्राप्त किया जा सकता है। केवल इसी प्रकार मनुष्य इस बिंदु से आगे धीरे-धीरे बदल सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)
अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों का गहन-विश्लेषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर के प्रति समर्पण किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता जीनी चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभावों पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य परमेश्वर को कैसे अस्वीकार करता है, और भी अधिक इस तथ्य को उजागर करने पर केंद्रित हैं कि मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध एक विरोधी शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर कुछ वचनों में मनुष्य की प्रकृति को पूरी तरह नहीं समझाता है; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर और काट-छाँट करने की इन विभिन्न विधियों को साधारण वचनों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; बल्कि उजागर और काट-छाँट करने के इस कार्य को करने में उस सत्य का उपयोग किया जाता है जो मनुष्य के पास बिल्कुल भी नहीं होता है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य की समझ पैदा करने का काम करता है। न्याय के कार्य ने मनुष्य को परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों के बारे में काफी समझ प्राप्त करने में सक्षम बनाया है जो उसकी समझ से परे होते हैं। इसने मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार और अपनी भ्रष्टता की जड़ को समझने और जानने, साथ ही अपने कुरूप चेहरे का पता लगाने में सक्षम बनाया है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन को उन सभी के लिए उद्घाटित करने का कार्य है जो उसमें आस्था रखते हैं। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है
तुझे यह जानना चाहिए कि परमेश्वर का मनुष्य को पूर्ण बनाना, उसे पूर्ण करना और उसे प्राप्त करना, उसकी देह पर तलवारों और प्रहारों के साथ-साथ अंतहीन पीड़ा और आग से जलन, निष्ठुर न्याय, ताड़ना, शाप और असीम परीक्षणों के सिवाय कुछ नहीं लाता है। मानव का प्रबंधन करने के कार्य की वास्तविक कहानी और सच्चाई ऐसी है। किंतु इन सारी चीजों का निशाना मनुष्य की देह पर लगा हुआ है और शत्रुता के सारे तीरों का लक्ष्य निर्दयतापूर्वक मनुष्य की देह है (क्योंकि मनुष्य निर्दोष है)। यह सब परमेश्वर की महिमा और गवाही के लिए और उसके प्रबंधन के लिए है। इसका कारण यह है कि उसका कार्य केवल मानव-जाति के लिए नहीं है, बल्कि पूरी योजना के लिए भी है और साथ ही मानव-जाति के सृजन के समय का उसका मूल इरादा पूरा करने के लिए भी है। इसलिए, मनुष्य जो अनुभव करता है, उसका शायद नब्बे प्रतिशत पीड़ा और अग्नि-परीक्षण ही है और वे मीठे और सुखद दिन बहुत कम हैं या बिल्कुल नहीं हैं, जिनके लिए मनुष्य की देह लालायित रही है। परमेश्वर के साथ खूबसूरत समय बिताकर देह में सुखद पलों का आनंद लेना तो मनुष्य के लिए और भी असंभव है। देह मलिन है, इसलिए मनुष्य की देह जिस चीज को देखती या उसका आनंद लेती है, वह परमेश्वर की ताड़ना के अलावा और कुछ नहीं है, जिसे मनुष्य अपनी भावनाओं का लिहाज न रखने वाली समझता है, मानो उसमें सामान्य समझ की कमी हो। इसका कारण यह है कि परमेश्वर अपने धार्मिक स्वभाव को प्रकट करेगा, जो “मनुष्य की भावनाओं का लिहाज न रखने वाला” है, जो मनुष्य के अपमानों को बरदाश्त नहीं करता और दुश्मनों से घृणा करता है। परमेश्वर किसी भी आवश्यक तरीके से खुले तौर पर अपना संपूर्ण स्वभाव प्रकट करता है और इस तरह शैतान के साथ अपने छह-हजार-वर्षीय युद्ध का कार्य पूरा करता है—जो संपूर्ण मानव-जाति के उद्धार और पुराने शैतान के विनाश का कार्य है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मानव-जाति के प्रबंधन का उद्देश्य
परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य इसलिए करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर के बारे में ज्ञान प्राप्त कर सके; साथ ही, वह अपनी गवाही की खातिर ऐसा करता है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रति परमेश्वर के न्याय के बिना मनुष्य उसके धार्मिक स्वभाव को बिल्कुल नहीं जान सकता था, जो किसी अपमान को सहन नहीं करता, न ही मनुष्य परमेश्वर के बारे में अपने पुराने ज्ञान को एक नए ज्ञान में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है; इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के जरिए, वह मनुष्य को परमेश्वर से जुड़े ज्ञान तक पहुँचने, अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने और परमेश्वर के लिए जबरदस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का परिवर्तन परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके इरादों के अनुरूप बनने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन दर्शाता है कि मनुष्य को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त करा दिया गया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हैं
जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान अडिग रहने में समर्थ हैं—यानी, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—वे लोग होंगे, जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; तो वे सभी जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुजरने के बाद ही उसके द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग, जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे, अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर ताड़ना और न्याय का कार्य मूलतः मानवता को शुद्ध करने और विश्राम के अंतिम दिन की खातिर करता है; अन्यथा मानवता का कोई भी सदस्य अपनी किस्म के अनुसार छांटा नहीं जा सकेगा या विश्राम में प्रवेश नहीं कर सकेगा। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। परमेश्वर का शुद्धिकरण का कार्य ही मनुष्यों को उनकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा और उसका ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानवता के उन विद्रोही तत्वों को उजागर करेगा, और इस तरह बचाए जा सकने वालों को बचाए न जा सकने वालों से अलग करेगा और जो बचे रह सकते हैं उनसे उन्हें अलग करेगा जो बचे नहीं रह सकते हैं। इस कार्य के समाप्त होने पर जो लोग बचे रह सकते हैं वे सब शुद्ध किए जाएँगे और मानवता के उच्चतर क्षेत्र में प्रवेश करेंगे जहाँ वे पृथ्वी पर और अधिक अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का आनंद उठाएंगे; दूसरे शब्दों में, वे मानवता के विश्राम के दिन में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ जिएंगे। जो बचे नहीं रह सकते हैं उनकी ताड़ना और उनका न्याय किए जाने के बाद उनके असली रूप पूरी तरह उजागर हो जाएँगे; उसके बाद वे सब के सब नष्ट कर दिए जाएँगे और शैतान के समान उन्हें पृथ्वी पर जीवित रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवता में इस किस्म के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ऐसे लोग अंतिम विश्राम की धरती पर प्रवेश करने के योग्य नहीं हैं, न ही वे उस विश्राम के दिन में प्रवेश के योग्य हैं जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे, क्योंकि वे दंड के लक्ष्य हैं और वे धार्मिक लोग नहीं, बल्कि बुरे लोग हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर के लिए मजदूरी भी की थी। लेकिन जब अंतिम दिन आएगा तो उन्हें अब भी अपनी बुराई के कारण और अपनी विद्रोहशीलता और असाध्यता के परिणामस्वरूप निकाल दिया और नष्ट कर दिया जाएगा; वे भविष्य के संसार में अब कभी नहीं जिएंगे और कभी भविष्य की मानवजाति के बीच नहीं रहेंगे। जैसे ही मानवता के पावनीकृत जन विश्राम में प्रवेश करेंगे, चाहे वे मृत लोगों की आत्मा हों या अभी भी देह में रह रहे लोग, सभी बुराई करने वाले और वे सभी जिन्हें बचाया नहीं गया है, नष्ट कर दिए जाएँगे। जहाँ तक इन बुरा करने वाली आत्माओं और मनुष्यों, या धार्मिक लोगों की आत्माओं और धार्मिकता करने वालों की बात है, चाहे वे जिस युग में हों, जो भी बुरे हैं वे सभी नष्ट हो जाएँगे और जो लोग धार्मिक हैं, वे बच जाएँगे। किसी व्यक्ति या आत्मा को उद्धार प्राप्त होगा या नहीं, यह पूर्णतः अंत के युग के कार्य के आधार पर तय नहीं होता है; बल्कि यह इससे निर्धारित होता है कि क्या वह परमेश्वर का प्रतिरोध या उससे विद्रोह कर चुका है कि नहीं। पिछले युग में जिन लोगों ने बुरा किया और जो बचाए नहीं जा सके वे निःसंदेह दंड के भागी बनेंगे और वे जो इस युग में बुरा करते हैं और उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, तो वे भी निश्चित रूप से दंड के भागी बनेंगे। मनुष्य अच्छे और बुरे के आधार पर श्रेणीबद्ध किए जाते हैं, न कि उस युग के आधार पर जिसमें वे जीते हैं। एक बार इस प्रकार वर्गीकृत किए जाने पर, उन्हें तुरंत दंड या पुरस्कार नहीं दिया जाएगा; बल्कि, परमेश्वर अंत के दिनों में अपने विजय के कार्य को समाप्त करने के बाद ही बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने का अपना कार्य करेगा। वास्तव में, वह मनुष्यों को तब से अच्छे और बुरे में पृथक कर रहा है, जबसे उसने मानवजाति के उद्धार का अपना कार्य आरंभ किया था। बात बस इतनी है कि वह धार्मिकों को पुरस्कृत और दुष्टों को दंड देने का कार्य केवल तब करेगा, जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा; ऐसा नहीं है कि वह अपने कार्य के पूरा होने पर उन्हें श्रेणियों में पृथक करेगा और फिर तुरंत दुष्टों को दंडित करना और धार्मिकों को पुरस्कृत करना शुरू करेगा। बल्कि, यह कार्य तभी किया जाएगा, जब उसका कार्य पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा। बुराई को दंडित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने के परमेश्वर के अंतिम कार्य के पीछे का एकमात्र उद्देश्य, सभी मनुष्यों को पूरी तरह शुद्ध करना है, ताकि वह पूरी तरह पावनीकृत मानवता को शाश्वत विश्राम में ला सके। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है; यह उसके समस्त प्रबंधन-कार्य का अंतिम चरण है। यदि परमेश्वर ने कुकर्मियों का नाश न किया, बल्कि उन्हें बचे रहने दिया तो सारी की सारी मानवजाति अभी भी विश्राम में प्रवेश करने में असमर्थ होगी और परमेश्वर उसे एक अधिक अद्भुत क्षेत्र में नहीं ला पाएगा। ऐसा कार्य पूरी तरह समाप्त नहीं होगा। जब उसका कार्य समाप्त होगा तो संपूर्ण मानवजाति पूर्णतः पावनीकृत हो जाएगी; केवल इसी तरीके से परमेश्वर शांतिपूर्वक विश्राम में रह सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे