2. कुछ लोग, चूँकि उन्होंने परमेश्वर को देखा नहीं है, कहते हैं कि दुनिया में कोई परमेश्वर नहीं है, जबकि अन्य लोग परमेश्वर के अस्तित्व की गवाही देने के लिए अपने व्यक्तिगत अनुभवों का उपयोग करते हैं। हम नहीं जानते कि क्या वास्तव में कोई परमेश्वर है, इसलिए हम यह कैसे निर्धारित कर सकते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है या नहीं?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
परमेश्वर के अधिकार, परमेश्वर के सामर्थ्य, परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार का ज्ञान अपनी कल्पना पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता। चूँकि परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए तुम कल्पना पर भरोसा नहीं कर सकते, तो फिर तुम परमेश्वर के अधिकार का सच्चा ज्ञान किस तरह प्राप्त कर सकते हो? इसका तरीका है परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, संगति करना और परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना। इस तरह तुम्हें परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और सत्यापन होगा और तुम उसकी एक क्रमिक समझ और वर्धमान ज्ञान प्राप्त करोगे। परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान प्राप्त करने का यही एकमात्र तरीका है; इसका कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोगों से कल्पना न करने के लिए कहना तुम लोगों को विनाश की प्रतीक्षा करते हुए निष्क्रिय बैठने के लिए प्रेरित करने या तुम लोगों को कुछ भी करने से रोकने के समान नहीं है। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का उपयोग न करने का अर्थ है अनुमान लगाने के लिए तर्क का उपयोग न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का उपयोग न करना, आधार के रूप में विज्ञान का उपयोग न करना, बल्कि इस बात को समझना, सत्यापित करना और पुष्टि करना कि जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो, उसके पास अधिकार है, इस बात की पुष्टि करना कि वह तुम्हारे भाग्य पर संप्रभुता रखता है, और यह कि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, सत्य के माध्यम से, हर उस चीज के माध्यम से जिसका तुम जीवन में सामना करते हो, उसका सामर्थ्य हर समय उसे स्वयं सच्चा परमेश्वर साबित करता है। यही एकमात्र तरीका है, जिससे परमेश्वर की समझ प्राप्त की जा सकती है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस लक्ष्य को प्राप्त करने का कोई आसान तरीका खोजना चाहते हैं, लेकिन क्या तुम लोग ऐसा कोई तरीका सोच सकते हो? मैं तुमसे कहता हूँ, सोचने की कोई जरूरत नहीं : कोई दूसरा तरीका नहीं है! उसके द्वारा व्यक्त प्रत्येक वचन और वह जो भी करता है, बस उसी के माध्यम से परमेश्वर के पास जो कुछ है और जो वह है, उसे कर्तव्यनिष्ठा और दृढ़ता से जाना और सत्यापित किया जा सकता है। परमेश्वर को जानने का यही एकमात्र तरीका है। क्योंकि जो कुछ परमेश्वर के पास है और जो वह है, और परमेश्वर की हर चीज, खोखली और खाली नहीं, बल्कि व्यावहारिक है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
ब्रह्मांड और आकाश की विशालता में अनगिनत जीव रहते और प्रजनन करते हैं, एक अंतहीन चक्र में जीवन के नियम का पालन करते हैं, और एक अटल नियम का अनुसरण करते हैं। जो मर जाते हैं वे अपने साथ जीवित लोगों की कहानियाँ लेकर चले जाते हैं, और जो लोग जी रहे हैं वे खत्म हो चुके लोगों के उसी त्रासद इतिहास को दोहराते हैं। और इसलिए, मानवजाति यह पूछे बिना नहीं रह पाती : हम क्यों जीते हैं? और हमें मरना क्यों पड़ता है? इस संसार पर कौन शासन करता है? और इस मानवजाति को किसने बनाया? क्या मानवजाति को वास्तव में प्रकृति ने बनाया? क्या मानवजाति वास्तव में अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकती है? ... ये वे सवाल हैं, जो मानवजाति ने हजारों वर्षों से अनवरत पूछे हैं। दुर्भाग्य से, जितना अधिक मनुष्य इन सवालों से ग्रस्त हुआ है, उसमें उतनी ही अधिक प्यास विज्ञान के लिए विकसित हुई है। विज्ञान देह की संक्षिप्त तृप्ति और अस्थायी आनंद प्रदान करता है, लेकिन वह मनुष्य को उसकी आत्मा के भीतर की तन्हाई, अकेलेपन, बमुश्किल छिपाए जा सकने वाले आतंक और लाचारी से मुक्त नहीं कर सकता है। मानवजाति केवल उसी वैज्ञानिक ज्ञान का उपयोग करती है, जिसे वह अपनी खुली आँखों से देख सकती है और अपने मस्तिष्क से समझ सकती है, जिससे अपने हृदय को चेतनाशून्य कर सके। फिर भी यह वैज्ञानिक ज्ञान मानवजाति को रहस्यों की खोज करने से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। मानवजाति यह नहीं जानती कि ब्रह्मांड और सभी चीजों का संप्रभु कौन है, और मानवजाति के प्रारंभ और भविष्य के बारे में तो वह बिल्कुल भी नहीं जानती। मानवजाति केवल इस व्यवस्था के बीच विवशतापूर्वक जीती है। इससे कोई बच नहीं सकता और इसे कोई बदल नहीं सकता, क्योंकि सभी चीजों के बीच और ब्रह्मांड के ऊपर अनंतकाल से लेकर अनंतकाल तक वह एक ही है, जो सभी चीजों पर अपनी संप्रभुता रखता है। वह एक ही है, जिसे मनुष्य द्वारा कभी देखा नहीं गया है, वह जिसे मनुष्य ने कभी नहीं जाना है, जिसके अस्तित्व पर मनुष्य ने कभी विश्वास नहीं किया है—फिर भी वह एक ही है, जिसने मनुष्य के पूर्वजों में साँस फूँकी और मानवजाति को जीवन प्रदान किया। वह एक ही है, जो मानवजाति के लिए आपूर्ति और इसका भरण-पोषण करता है और उसका अस्तित्व बनाए रखता है; और वह एक ही है, जिसने आज तक मानवजाति का मार्गदर्शन किया है। इससे भी अधिक, वह और केवल वह एक ही है, जिस पर मानवजाति अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करती है। वह सभी चीजों पर और ब्रह्मांड के सभी जीवित प्राणियों पर संप्रभुता रखता है। वह चारों मौसमों को शासित करता है और वही है जो हवा, पाले, हिमपात और बारिश के बदलावों को नियंत्रित करता है। वह मानवजाति के लिए सूर्य का प्रकाश लाता है और रात्रि का सूत्रपात करता है। यह वही था, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी की व्यवस्था की, और मनुष्य को पहाड़, झीलें और नदियाँ और उनके भीतर के सभी जीव प्रदान किए। उसके कर्म सर्वव्यापी हैं, उसकी सामर्थ्य सर्वव्यापी है, उसकी बुद्धि सर्वव्यापी है, और उसका अधिकार सर्वव्यापी है। इन व्यवस्थाओं और नियमों में से प्रत्येक उसके कर्मों का मूर्त रूप है, प्रत्येक उसकी बुद्धिमत्ता और अधिकार का प्रकाशन है। कौन खुद को उसके प्रभुत्व से मुक्त कर सकता है? और कौन उसकी अभिकल्पनाओं से खुद को छुड़ा सकता है? सभी चीजें उसकी निगाह के नीचे मौजूद हैं, और इतना ही नहीं, सभी चीजें उसकी संप्रभुता के अधीन रहती हैं। उसके कर्म और सामर्थ्य मानवजाति के लिए इसे स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं छोड़ते कि वह वास्तव में मौजूद है, साथ ही इस तथ्य को भी कि वह सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है। उसके अतिरिक्त कुछ भी ब्रह्मांड पर शासन नहीं कर सकता और मानवजाति का निरंतर भरण-पोषण तो बिल्कुल नहीं कर सकता। चाहे तुम परमेश्वर के कर्मों को पहचानने में सक्षम हो या न हो, और चाहे तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो या न करते हो, इसमें कोई शक नहीं कि तुम्हारा भाग्य परमेश्वर द्वारा नियत किया जाता है, और इसमें भी कोई शक नहीं कि परमेश्वर ही हमेशा वह एक रहेगा जो सभी चीजों पर अपनी संप्रभुता रखेगा। उसका अस्तित्व और अधिकार इस बात से निर्धारित नहीं होता कि वे मनुष्य द्वारा पहचाने और समझे जाते हैं या नहीं। केवल वही मनुष्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य को जानता है, और केवल वही मानवजाति के भाग्य का निर्धारण कर सकता है। चाहे तुम इस तथ्य को स्वीकार करने में सक्षम हो या न हो, इसमें ज्यादा समय नहीं लगेगा, जब मानवजाति अपनी आँखों से यह सब देखेगी, और परमेश्वर जल्दी ही इस तथ्य को साकार करेगा। मनुष्य परमेश्वर की आँखों के सामने जीता है और मर जाता है। मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के लिए जीता है, और अपनी आँखें आखिरी बार इसी प्रबंधन के लिए बंद करता है। मनुष्य बार-बार आता और जाता रहता है, चक्र चलता रहता है। बिना किसी अपवाद के, यह सब परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी अभिकल्पना का हिस्सा है। परमेश्वर का प्रबंधन निरंतर अग्रसर है; यह कभी रुका नहीं है। वह मानवजाति को अपने अस्तित्व से अवगत कराएगा, अपनी संप्रभुता में विश्वास करवाएगा, अपने कर्मों का दर्शन करवाएगा, और अपने राज्य में वापस लौटा ले जाएगा। यही उसकी योजना है और वह कार्य है जिसका वह हजारों वर्षों से प्रबंधन कर रहा है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है
जिस क्षण तुम रोते हुए इस दुनिया में आते हो उसी पल से तुम अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना शुरू कर देते हो। परमेश्वर की योजना और उसके विधान की खातिर तुम अपनी भूमिका निभाते हो और अपनी जीवन यात्रा शुरू करते हो। तुम्हारी पृष्ठभूमि जो भी हो और तुम्हारी आगे की यात्रा जैसी भी हो, किसी भी स्थिति में कोई भी स्वर्ग के आयोजनों और व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता और कोई भी अपनी नियति को नियंत्रित नहीं कर सकता, क्योंकि जो सभी चीजों का संप्रभु है सिर्फ वही ऐसा करने में सक्षम है। मनुष्य के अस्तित्व में आने की शुरुआत से ही परमेश्वर अपने कार्य को हमेशा से इसी ढंग से करता आ रहा है, ब्रह्मांड को सँभाल रहा है और सभी चीजों के लिए परिवर्तन के नियमों और उनकी गतिविधियों के पथ को संचालित कर रहा है। सभी चीजों की तरह मनुष्य भी चुपचाप और अनजाने में परमेश्वर से मिठास, बारिश और ओस से पोषित हो रहा है; सभी चीजों की तरह मनुष्य भी अनजाने में परमेश्वर के हाथ के आयोजन के अधीन रहता है। मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर की मुट्ठी में होते हैं और उसके जीवन की हर चीज परमेश्वर की दृष्टि में रहती है। चाहे तुम यह सब मानो या न मानो, एक-एक चीज, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव, परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही हरकत करेगी, बदलेगी, नई बनेगी और लुप्त हो जाएगी। परमेश्वर इसी तरह सभी चीजों पर संप्रभु है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है
जब से परमेश्वर ने सभी चीजों का सृजन शुरू किया, तब से उसका सामर्थ्य व्यक्त और प्रकट होना शुरू हो गया, क्योंकि परमेश्वर ने सभी चीजें सृजित करने के लिए वचनों का इस्तेमाल किया। उसने उन्हें जिस भी तरीके से बनाया हो, उसने उन्हें जिस भी वजह से बनाया हो, परमेश्वर के वचनों के कारण सभी चीजें अस्तित्व में आ गईं, डटी और मौजूद रहीं; यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है। मानव-जाति के दुनिया में प्रकट होने से पहले के समय में सृष्टिकर्ता ने मानव-जाति के लिए सभी चीजें बनाने के लिए अपने सामर्थ्य और अधिकार का उपयोग किया, और मानव-जाति के रहने के लिए एक उपयुक्त परिवेश तैयार करने के लिए अपनी अनूठी विधियाँ नियोजित कीं। उसने जो कुछ किया, वह मानव-जाति की तैयारी में था, जो शीघ्र ही परमेश्वर की श्वास पाने वाली थी। अर्थात् मानव-जाति के सृजन से पहले के समय में परमेश्वर का अधिकार मानव-जाति से भिन्न सभी सृजन में, आकाश, ज्योतियों, समुद्र और भूमि जैसी बड़ी चीजों में, और जानवरों और पक्षियों के साथ-साथ सभी प्रकार के कीड़ों और सूक्ष्मजीवियों में, जिनमें आँखों के लिए अदृश्य विभिन्न बैक्टीरिया शामिल हैं, दिखाया गया था। उनमें से प्रत्येक को सृष्टिकर्ता के वचनों द्वारा जीवन दिया गया, प्रत्येक ने सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण वंश-वृद्धि की, और प्रत्येक सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण उसकी संप्रभुता के तहत रहा। हालाँकि उन्हें सृष्टिकर्ता की साँस नहीं मिली, फिर भी उन्होंने सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदान की गई जीवन-शक्ति को अपने विभिन्न रूपों और संरचनाओं के माध्यम से प्रदर्शित किया; हालाँकि उन्हें सृष्टिकर्ता द्वारा मानव-जाति को दी गई बोलने की क्षमता प्राप्त नहीं हुई, फिर भी उनमें से प्रत्येक ने अपने जीवन को व्यक्त करने का एक तरीका प्राप्त किया, जो उन्हें सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदान किया गया था और जो मनुष्य की भाषा से भिन्न था। सृष्टिकर्ता का अधिकार न केवल गतिहीन प्रतीत होने वाली भौतिक चीजों को जीवन-शक्ति देता है, ताकि वे कभी गायब न हों, बल्कि वह प्रत्येक जीवित प्राणी को प्रजनन द्वारा वंश-वृद्धि करने की प्रवृत्ति भी देता है, ताकि वे कभी नष्ट न हों, जिससे कि वे सृष्टिकर्ता द्वारा उन्हें दी गई अस्तित्व में रहने की व्यवस्थाएँ और सिद्धांत पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करें। जिस तरह से सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का प्रयोग करता है, वह किसी स्थूल या सूक्ष्म दृष्टिकोण का कठोरता से पालन नहीं करता और किसी भी रूप तक सीमित नहीं रहता; वह ब्रह्मांड के कार्यों को नियंत्रित करने और सभी चीजों के जीवन और मृत्यु पर संप्रभुता रखने में सक्षम है, और इसके अलावा, वह सभी चीजें इस तरह संचालित करने में सक्षम है कि वे उसकी सेवा करें; वह पहाड़ों, नदियों और झीलों के सभी कार्यों का प्रबंधन कर सकता है, और उनके भीतर की सभी चीजों पर शासन कर सकता है, और इससे भी बढ़कर, वह वो चीज प्रदान करने में सक्षम है जो सभी चीजों के लिए आवश्यक है। यह मानव-जाति के अलावा सभी चीजों के बीच सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की अभिव्यक्ति है। ऐसी अभिव्यक्ति केवल जीवन भर के लिए नहीं है; यह कभी खत्म नहीं होगी, न ही रुकेगी, और इसे किसी व्यक्ति या वस्तु द्वारा बदला या क्षतिग्रस्त नहीं किया जा सकता, न ही इसे किसी व्यक्ति या वस्तु द्वारा बढ़ाया-घटाया जा सकता है—क्योंकि कोई भी सृष्टिकर्ता की पहचान को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता, और इसलिए, सृष्टिकर्ता के अधिकार को किसी भी सृजित प्राणी द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता; यह किसी भी गैर-सृजित प्राणी द्वारा अप्राप्य है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
मानवजाति के अस्तित्व में आने से पहले, ब्रह्माण्ड—आकाश के समस्त ग्रह, सभी सितारे—पहले से ही अस्तित्व में थे। बृहद स्तर पर, ये खगोलीय पिंड, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के लिए, परमेश्वर के नियन्त्रण में नियमित रूप से अपने कक्ष में परिक्रमा करते रहे हैं, चाहे ऐसा करने में कितने ही वर्ष लगते हों। कौन-सा ग्रह किस समय में कहाँ जाता है; कौन-सा ग्रह कौन-सा कार्य करता है, और कब करता है; कौन-सा ग्रह किस कक्ष में चक्कर लगाता है, और वह कब अदृश्य हो जाता है या बदल दिया जाता है—ये सभी चीज़ें बिना कोई त्रुटि के होती रहती हैं। ग्रहों की स्थितियाँ और उनके बीच की दूरियाँ सभी कठोर प्रतिमानों का पालन करती हैं, उन सभी को सटीक आँकड़ों द्वारा वर्णित किया जा सकता है; वे जिस ग्रहपथ पर घूमते हैं, उनके कक्षों की गति और स्वरूप, वह समय जब वे विभिन्न स्थितियों में होते हैं, इन सभी को सटीक ढंग से निर्धारित व विशेष नियमों द्वारा परिमाणित किया जा सकता है। बिना चूके युगों से ग्रह इन नियमों का पालन कर रहे हैं। कोई भी शक्ति उनके कक्षों या तरीकों को, जिनका वे पालन करते हैं, नहीं बदल सकती, न ही कोई रुकावट पैदा कर सकती है। क्योंकि वे विशेष नियम जो उनकी गति को संचालित करते हैं और वे सटीक आँकड़े जो उनका वर्णन करते हैं, सृजनकर्त्ता के अधिकार द्वारा पूर्वनियत हैं, वे सृजनकर्त्ता की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन इन नियमों का पालन अपनी इच्छा से करते हैं। बृहत स्तर पर, कुछ प्रतिमानों, कुछ आँकड़ों, और कुछ अजीब और समझाए न जा सकने वाले नियमों या घटनाओं के बारे में जानना मनुष्य के लिए कठिन नहीं है। यद्यपि मानवजाति यह नहीं स्वीकारती कि परमेश्वर है, न ही इस तथ्य को स्वीकार करती है कि सृजनकर्त्ता ने ही हर चीज़ को बनाया है और हर चीज़ पर संप्रभु है, और यही नहीं सृजनकर्त्ता के अधिकार के अस्तित्व को भी नहीं स्वीकारती, फिर भी मानव-विज्ञानियों, खगोलशास्त्रियों और भौतिक-विज्ञानियों को लगातार पता चल रहा है कि सभी चीजों के अस्तित्व और गतियों को निर्देशित करने वाले सिद्धांत और आवर्ती कार्यप्रणालियां (पैटर्न) एक विशाल और गुप्त श्याम ऊर्जा द्वारा शासित और नियन्त्रित होती हैं। यह तथ्य मनुष्य को बाध्य करता है कि वह इस बात का सामना करे और स्वीकार करे कि इन गतियों के स्वरूपों के बीच एक शक्तिशाली जन है, जो हर एक चीज़ का आयोजन करता है। उसका सामर्थ्य असाधारण है, और यद्यपि कोई भी उसके असली स्वरूप को नहीं देख पाता, फिर भी वह हर क्षण हर एक चीज पर संप्रभुता रखता हैऔर नियन्त्रित करता है। कोई भी व्यक्ति या ताकत उसकी संप्रभुता से परे नहीं जा सकती। इस सत्य का सामना करते हुए, मनुष्य को यह अवश्य पहचानना चाहिए कि वे नियम जो सभी चीज़ों के अस्तित्व को संचालित करते हैं उन्हें मनुष्यों द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता, किसी के भी द्वारा बदला नहीं जा सकता; साथ ही उसे यह भी स्वीकार करना चाहिए कि मानवजाति इन नियमों को पूरी तरह से नहीं समझ सकती, और वे प्राकृतिक रूप से घटित नहीं हो रही हैं, बल्कि एक परम सत्ता उनका निर्धारण कर रही है। ये सब परमेश्वर के अधिकार की अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें मनुष्य जाति बृहत स्तर पर समझ व महसूस कर सकती है।
सूक्ष्म स्तर पर, सभी पहाड़, नदियाँ, झीलें, समुद्र और भू-भाग जिन्हें मनुष्य पृथ्वी पर देखता है, सारे मौसम जिनका वह अनुभव करता है, पेड़-पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव और मनुष्य सहित, सारी चीज़ें जो पृथ्वी पर निवास करती हैं, सभी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं, और परमेश्वर द्वारा नियन्त्रित की जाती हैं। परमेश्वर की संप्रभुता और नियन्त्रण के अंतर्गत, सभी चीज़ें उसके विचारों के अनुरूप अस्तित्व में आती हैं या अदृश्य हो जाती हैं; नियम बनते हैं जो उनके जीवन को संचालित करते हैं, और वे उनके अनुसार चलते हुए विकास करते हैं और निरंतर अपनी संख्या बढ़ाते हैं। कोई भी मनुष्य या चीज इन नियमों के ऊपर नहीं है। ऐसा क्यों है? इसका एकमात्र उत्तर है : ऐसा परमेश्वर के अधिकार की वजह से है। दूसरे शब्दों में कहें तो, परमेश्वर के विचारों और परमेश्वर के वचनों के कारण है; स्वयं परमेश्वर के कार्यों की वजह से है। अर्थात्, यह परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर की इच्छा है जो इन नियमों को बनाती है; जो उसके विचार के अनुसार परिवर्तित होंगे एवं बदलेंगे, ये सभी परिवर्तन और बदलाव उसकी योजना की खातिर घटित होंगे या मिट जाएँगे। उदाहरण के लिए, महामारियों को ही लें। वे बिना चेतावनी दिए ही अचानक फैल जाती हैं। वे कैसे फैलीं या क्यों हुईं, इसके सही कारणों के बारे में किसी को नहीं पता, और जब कभी भी कोई महामारी किसी स्थान पर फैलती है, तो अभिशप्त लोग ऐसी विपत्ति से बच नहीं पाते हैं। मानव-विज्ञान का मानना है कि महामारियाँ ख़तरनाक या हानिकारक सूक्ष्म रोगाणुओं के फैलने से उत्पन्न होती हैं, और उनकी रफ्तार, पहुँच और एक से दूसरे तक संचारण के तरीके का पूर्वानुमान या नियन्त्रण मानव-विज्ञान द्वारा करना संभव नहीं है। हालाँकि, मनुष्य हर सम्भव तरीके से महामारी को रोकने का प्रयत्न करता है, लेकिन जब महामारियां फैलती हैं तो कौन-सा व्यक्ति या पशु अपरिहार्य रूप से इसकी चपेट में आ जाएगा, इसे वह नियंत्रित नहीं कर पाता। मनुष्य केवल उनको रोकने का और उनसे बचाव करने का और उन पर शोध करने का प्रयास कर सकता है। परन्तु कोई भी उस मूल वजह को नहीं जानता जो यह बता सके कि किसी महामारी की शुरुआत और अंत कैसे होता है, और न ही कोई उन्हें नियन्त्रित कर सकता है। किसी महामारी के शुरू होने और फैलने पर, सबसे पहले मनुष्य जो कदम उठाता है वह होता है उसका टीका विकसित करना, परन्तु अक्सर टीका तैयार होने से पहले ही वह महामारी अपने आप ही ख़त्म हो जाती है। आखिर क्यों महामारियाँ खत्म हो जाती हैं? कुछ लोग कहते हैं कि रोगाणुओं को नियन्त्रित कर लिया जाता है, कुछ का कहना है कि मौसम के बदलने से वे खत्म हो जाती हैं। ये अनुमान तर्कसंगत हैं या नहीं, विज्ञान इसके बारे में न तो कोई स्पष्टीकरण दे सकता है, न ही कोई सटीक उत्तर। मानवजाति को न केवल इन अटकलबाज़ियों का सामना करना है, वरन महामारियों के बारे में अपनी समझ की कमी और भय से भी निपटना है। अंततः कोई नहीं जानता कि महामारियाँ क्यों शुरू होती हैं या वे क्यों खत्म हो जाती हैं। क्योंकि मानवजाति का विश्वास केवल विज्ञान में है, वह पूरी तरह से उसी पर आश्रित है, वह सृजनकर्ता के अधिकार को नहीं पहचानती या उसकी संप्रभुता को स्वीकार नहीं करती, इसलिए उसे कभी भी इसका कोई उत्तर नहीं मिल पाएगा।
परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन, उसके अधिकार के कारण और उसके प्रबंधन की खातिर सभी चीजें जन्म लेती हैं, जीवित रहती हैं और नष्ट हो जाती हैं। कुछ चीजें चुपचाप आती और चली जाती हैं और मनुष्य नहीं देख सकता कि वे कहाँ से आई हैं, न ही उन नियमों को समझ सकता है जिनका वे अनुसरण करती हैं और वह उन कारणों को तो बिल्कुल नहीं समझ पाता कि वे क्यों आती हैं और क्यों चली जाती हैं। यद्यपि सभी वस्तुओं के बीच जो कुछ भी घटित होता है, वह सब मनुष्य द्वारा अपनी ही आँखों से देखा जा सकता है, अपने ही कानों से सुना जा सकता है या स्वयं अनुभव किया जा सकता है; यूँ तो यह मनुष्य से संबंधित है और यूँ तो मनुष्य अवचेतन रूप से विभिन्न घटनाओं की असामान्यता, नियमितता या यहाँ तक कि विचित्रता को भी अनुभव कर सकता है, फिर भी वह सभी चीजों के बीच जो भी घटित होता है उसके पीछे निहित सृष्टिकर्ता के इरादों और विचारों के बारे में कुछ भी नहीं जानता। वहाँ अनेक कहानियाँ और अनेक गुप्त सत्य छिपे हुए होते हैं। चूँकि मनुष्य भटक कर सृष्टिकर्ता से बहुत दूर चला गया है और चूँकि वह इस तथ्य को स्वीकार नहीं करता कि सृष्टिकर्ता का अधिकार सभी चीजों पर संप्रभु है, इसलिए वह कभी भी वह सब कुछ नहीं जान और समझ सकेगा जो सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता के अंतर्गत घटित होता है। संक्षेप में, परमेश्वर का नियंत्रण और संप्रभुता मानव की कल्पना, मानव के ज्ञान, मानव की समझ और वह सब कुछ जिसकी प्राप्ति मानवीय विज्ञान कर सकता है, इन सबकी सीमाओं से परे है; ये सृजित मानवजाति की क्षमताओं से परे हैं। कुछ लोग कहते हैं, “तुमने परमेश्वर की संप्रभुता नहीं देखी है—तुम कैसे विश्वास कर सकते हो कि यह सब कुछ उसके अधिकार का नतीजा है?” देखने का मतलब जरूरी नहीं कि विश्वास करना या स्वीकार करना और समझना हो। तो विश्वास करना कहाँ से आता है? मैं निश्चय के साथ कह सकता हूँ कि विश्वास लोगों द्वारा चीजों के मूल कारणों और वास्तविकता की समझ और अनुभव के स्तर और गहराई से उत्पन्न होता है। यदि तुम विश्वास करते हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है, किंतु तुम सभी चीजों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता और परमेश्वर के नियंत्रण के तथ्य को स्वीकार नहीं करते हो, इसे देखने की बात तो दूर है, तो तुम अपने हृदय में यह कभी स्वीकार नहीं करोगे कि परमेश्वर के पास इस प्रकार का अधिकार है और परमेश्वर का अधिकार अद्वितीय है और तुम सृष्टिकर्ता को कभी भी अपने प्रभु और अपने परमेश्वर के रूप में सचमुच स्वीकार नहीं करोगे।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
लोग अक्सर कहते हैं कि परमेश्वर को जानना आसान बात नहीं है। किंतु मैं कहता हूँ कि परमेश्वर को जानना बिल्कुल भी कठिन बात नहीं है, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य को बार-बार अपने कर्म दिखाता है। परमेश्वर ने कभी भी मनुष्य के साथ संवाद करना बंद नहीं किया है, और न ही उसने कभी अपने आपको मनुष्य से गुप्त रखा है, न उसने स्वयं को छिपाया है। उसके विचार, उसकी युक्तियाँ, उसके वचन और उसके कर्म सब मानवजाति के सामने हैं। इसलिए, यदि मनुष्य परमेश्वर को जानना चाहता है, तो वह सभी प्रकार के साधनों और पद्धतियों के जरिये उसे समझ और जान सकता है। मनुष्य के आँख मूँदकर यह सोचने की वजह कि परमेश्वर ने जानबूझकर खुद को मनुष्य से छिपाया है, कि उसका कोई इरादा नहीं है कि मनुष्य परमेश्वर को समझे या जाने, यह है कि मनुष्य नहीं जानता कि परमेश्वर कौन है, और न ही वह परमेश्वर को समझना चाहता है। इससे भी बढ़कर, मनुष्य सृष्टिकर्ता के विचारों, वचनों या कर्मों की परवाह नहीं करता...। सच कहूँ तो यदि कोई व्यक्ति सृष्टिकर्ता के वचनों या कर्मों पर ध्यान केंद्रित करने और उन्हें समझने के लिए सिर्फ अपने खाली समय का उपयोग करे और यदि वह सृष्टिकर्ता के विचारों और उसके हृदय की वाणी पर थोड़ा-सा ध्यान दे, तो उसे यह एहसास करने में कठिनाई नहीं होगी कि सृष्टिकर्ता के विचार, वचन और कर्म खुले हुए और पारदर्शी हैं। इसी प्रकार, यह एहसास करने में बस थोड़ा-सा प्रयास लगेगा कि सृष्टिकर्ता हर समय मनुष्य के मध्य है, वह हमेशा मनुष्य और सभी चीजों के साथ बातचीत करता रहता है और वह प्रतिदिन नए कर्म कर रहा है। उसका सार और स्वभाव मनुष्य के साथ उसके संवाद में अभिव्यक्त होते हैं; उसके विचार और सोच पूरी तरह से उसके कर्मों में प्रकट होते हैं; वह हर समय मनुष्य के साथ रहता है और उसका अवलोकन करता है। वह अपने मौन वचनों का इस्तेमाल करके समस्त चीजों और मानवजाति को चुपचाप यह बताता है : “मैं स्वर्ग में हूँ और मैं सभी चीजों के मध्य हूँ। मैं रखवाली कर रहा हूँ, मैं इंतजार कर रहा हूँ; मैं तुम्हारे साथ हूँ...।” उसके हाथ गर्माहट से भरे और मजबूत हैं, उसके कदम हल्के हैं, उसकी वाणी कोमल और सुखद है; समूची मानवजाति को आलिंगन में लिए हुए उसका स्वरूप गुजरता और घूमता है; उसका मुखमंडल सुंदर और सौम्य है। वह कभी छोड़कर नहीं गया, कभी विलुप्त नहीं हुआ। दिन-रात, वह मानवजाति का निरंतर साथी है, वह उसका साथ कभी नहीं छोड़ता।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
परमेश्वर के अधिकार के अधीन, प्रत्येक व्यक्ति सक्रिय या निष्क्रिय रूप से उसकी संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करता है, और चाहे कोई व्यक्ति अपने जीवन के दौरान कैसे भी संघर्ष क्यों न करता हो, भले ही वह कितने ही टेढ़े-मेढ़े पथों पर क्यों न चलता हो, अंत में वह सृजनकर्ता के द्वारा उसके लिए निर्धारित भाग्य के परिक्रमा-पथ पर वापस लौट आएगा। यह सृजनकर्ता के अधिकार की अजेयता है, और इसी तरह उसका अधिकार ब्रह्मांड पर नियंत्रण करता और उसे संचालित करता है। यही अजेयता, इस तरह का नियंत्रण और संचालन उन नियमों के लिए उत्तरदायी है जो सभी चीजों के जीवन का निर्धारण करते हैं, जो मनुष्यों को बिना किसी हस्तक्षेप के बार-बार पुनर्जन्म लेने देते हैं, जो इस संसार को नियमित रूप से चलाते और दिन प्रतिदिन, साल दर साल, आगे बढ़ाते रहते हैं। तुम लोगों ने इन सभी तथ्यों को देखा है और, चाहे सतही तौर पर समझो या गहराई से, तुम लोग उन्हें समझते हो; तुम लोगों की समझ की गहराई सत्य के बारे में तुम लोगों के अनुभव और ज्ञान पर, और परमेश्वर के बारे में तुम लोगों के ज्ञान पर निर्भर करती है। तुम सत्य वास्तविकता को कितनी अच्छी तरह से जानते हो, तुम्हारे पास परमेश्वर के वचनों का कितना अनुभव है, तुम परमेश्वर के सार और उसके स्वभाव को कितनी अच्छी तरह से जानते हो—ये सब चीजें परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के बारे में तुम्हारी समझ की गहराई को प्रदर्शित करती हैं। क्या परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाएँ इस बात पर निर्भर करती हैं कि मनुष्य उसके प्रति समर्पण करता है या नहीं? क्या यह तथ्य कि परमेश्वर इस अधिकार को धारण करता है, इस बात के द्वारा निर्धारित होता है कि मानवजाति उसके प्रति समर्पण करती है या नहीं? परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों परमेश्वर का अधिकार अस्तित्व में रहता है। समस्त परिस्थितियों में परमेश्वर अपने विचारों, और अपनी इच्छाओं के अनुरूप प्रत्येक मनुष्य के भाग्य और सभी चीजों पर नियंत्रण और उनकी व्यवस्था करता है। यह मनुष्यों के बदलने की वजह से नहीं बदलेगा; और यह मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र है, और समय, स्थान, और भूगोल में होने वाले किन्ही भी परिवर्तनों द्वारा इसे नहीं बदला जा सकता है, क्योंकि परमेश्वर का अधिकार उसका सार ही है। चाहे मनुष्य परमेश्वर की संप्रभुता को जानने और स्वीकार करने में समर्थ हो या न हो, और चाहे मनुष्य इसके प्रति समर्पण करने में समर्थ हो या न हो, यह मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता के सच को जरा-सा भी नहीं बदलता है। अर्थात्, परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति मनुष्य भले ही कोई भी दृष्टिकोण क्यों न रखे, यह इस सच को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के भाग्य और सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है। चाहे तुम परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण न भी करो, तब भी वह तुम्हारे भाग्य को नियंत्रित करता है; चाहे तुम उसकी संप्रभुता को न भी जान सको, फिर भी उसका अधिकार अस्तित्व में रहता है। परमेश्वर का अधिकार और मनुष्य के भाग्य पर उसकी संप्रभुता मनुष्य की इच्छा से स्वतंत्र हैं, और मनुष्य की प्राथमिकताओं और पसंद के अनुसार बदलते नहीं हैं। परमेश्वर का अधिकार हर समय और हर एक क्षण हर जगह मौजूद है। स्वर्ग और पृथ्वी समाप्त हो जाएँगे, पर उसका अधिकार कभी समाप्त नहीं होगा, क्योंकि वह स्वयं परमेश्वर है, उसके पास अद्वितीय अधिकार है, और उसका अधिकार लोगों, घटनाओं या चीजों के द्वारा, स्थान या भूगोल के द्वारा प्रतिबंधित या सीमित नहीं होता है। परमेश्वर हमेशा अपने अधिकार को काम में लाता है, अपनी ताक़त दिखाता है, हमेशा की तरह अपने प्रबंधन-कार्य को करता रहता है; वह हमेशा सभी चीजों पर शासन करता है, सभी चीजों का भरण-पोषण करता है, और सभी चीजों का आयोजन करता है—ठीक वैसे ही जैसे उसने हमेशा से किया है। इसे कोई नहीं बदल सकता है। यह एक सच्चाई है; यह चिरकाल से अपरिवर्तनीय सत्य है!
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III