3. कुछ दर्जन वर्षों में लोगों का जीवन एक कौंध में खत्म हो जाता है। पीछे मुड़कर देखते हुए, वे अपने जीवन को याद करते हैं: स्कूल जाना, काम करना, शादी करना, बच्चे पैदा करना, मृत्यु की प्रतीक्षा करना, उनका पूरा जीवन परिवार, धन, स्थिति, भाग्य और प्रतिष्ठा की खातिर भाग-दौड़ करने में बीत जाता है, सही दिशा और मानवीय अस्तित्व के उद्देश्यों से पूरी तरह से रहित, और जीवित रहने में किसी भी मूल्य या अर्थ को खोजने में असमर्थ रहकर। इस तरह लोग पीढ़ी-दर-पीढी इस दर्दीले और खाली तरीके से जीते हैं। लोगों का जीवन इतना दर्दीला और खाली क्यों होता है? और मानव अस्तित्व के दर्द और शून्यता को कैसे हल किया जा सकता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

लोगों को यह समझना चाहिए कि वे जीवन भर जन्म, बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु के जिन कष्टों को सहते हैं, वे कहाँ से आए हैं और मनुष्य इन कष्टों को क्यों सहता है। जब परमेश्वर ने आरंभ में मनुष्य को बनाया था, तो क्या मनुष्य इन कष्टों से मुक्त नहीं था? तो फिर बाद में मनुष्य को होने वाले ये कष्ट कहाँ से आए? ये शैतान से आए। शैतान द्वारा मनुष्य को लुभाए और भ्रष्ट किए जाने के बाद, जब उसका पतन हुआ, तब ये कष्ट उत्पन्न हुए। मनुष्य के शारीरिक कष्ट, चिंताएँ और खालीपन और मानव-संसार की सभी दयनीय चीजें—ये सभी शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट किए जाने के बाद ही अस्तित्व में आईं। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, मनुष्य में शैतानी स्वभाव आ गए हैं और इसलिए वह अधिकाधिक पतित होता जाता है; उसकी बीमारी और अधिक गहरी होती जाती है, उसकी पीड़ा और अधिक बढ़ जाती है, उसमें यह भावना बढ़ने लगती है कि यह संसार खाली और दयनीय है, इस संसार में जीवित रहना असंभव है और इस संसार में जीना अधिक से अधिक आशाहीन होता जा रहा है। इसलिए, ये सभी कष्ट शैतान द्वारा ही मनुष्य पर लाए गए हैं, ये शैतान द्वारा मनुष्य को भ्रष्ट किए जाने और उसके पतन के बाद ही आए हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर द्वारा जगत की पीड़ा का अनुभव करने का अर्थ

सामाजिक विज्ञानों के आगमन के बाद से ही मनुष्य का दिल विज्ञान और ज्ञान से भर गया है। विज्ञान और ज्ञान तब से मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए हैं, जिससे मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश और परमेश्वर की आराधना करने के लिए उतनी अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं बची हैं। मनुष्य के हृदय में परमेश्वर की स्थिति लगातार गिरती जा रही है। अपने हृदय में परमेश्वर के लिए स्थान न होने पर मनुष्य का आंतरिक संसार अंधकारमय, निराशाजनक और खाली होता है। बाद में मनुष्य के हृदय और मन में भरने के लिए कई समाज-वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों ने सामने आकर सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव-विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांत व्यक्त किए, जो इस सत्य का खंडन करते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की है, और इस तरह, यह विश्वास करने वाले बहुत कम होते गए हैं कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है और विकास के सिद्धांत पर विश्वास करने वालों की संख्या और अधिक बढ़ती गई है। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथक और किंवदंतियाँ समझते हैं। अपने हृदयों में लोग परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति उदासीन हो जाते हैं और वे परमेश्वर के अस्तित्व के प्रति उदासीन हो जाते हैं और इस सिद्धांत के प्रति भी कि परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब महत्वपूर्ण नहीं रहे, और मनुष्य केवल खाने-पीने और भोग-विलास के अनुसरण पर ध्यान लगाए एक खोखले संसार में रहता है। ... बहुत थोड़े लोग स्वयं इस बात की खोज करने की पहल करते हैं कि आज परमेश्वर अपना कार्य कहाँ करता है, या यह तलाशने की पहल कि वह किस प्रकार मनुष्य के गंतव्य पर संप्रभु है और उसकी व्यवस्था करता है। और इस तरह, मनुष्य के बिना जाने ही मानव-सभ्यता मनुष्य की इच्छाओं के अनुसार चलने में अधिक से अधिक अक्षम होती चली जाती है; कई ऐसे लोग भी हैं जो यह महसूस करते हैं कि ऐसे संसार में रहकर वे उन लोगों की तुलना में कम खुश हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है। यहाँ तक कि उन देशों के लोग भी, जो अत्यधिक सभ्य हुआ करते थे, इस तरह की शिकायतें व्यक्त करते हैं। क्योंकि परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना अगर शासक और समाजशास्त्री मानव सभ्यता को संरक्षित रखने के लिए अपना दिमाग खपा भी लें, तो भी कोई फायदा नहीं होगा। मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई व्यक्ति नहीं भर सकता, क्योंकि कोई भी व्यक्ति मनुष्य का जीवन नहीं हो सकता और कोई भी सामाजिक सिद्धांत मनुष्य को खालीपन की परेशानियों से मुक्ति नहीं दिला सकता। विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, सुख और आराम मनुष्य को केवल अस्थायी सांत्वना देते हैं। ये चीजें होने के बावजूद मनुष्य अभी भी अपरिहार्य रूप से पाप करता है और समाज में अन्याय की शिकायत करता है। इन चीजों का होना मनुष्य की अन्वेषण की अभिलाषा और इच्छा को बाधित नहीं कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा बनाया गया था और मनुष्य के निरर्थक त्याग और अन्वेषण उसके लिए अधिकाधिक कष्ट ही लाएंगे, और मनुष्य को निरंतर व्याकुलता की स्थिति में रखेंगे, वह यह नहीं जानता कि मानवजाति के भविष्य का सामना कैसे करे या आगामी मार्ग का सामना कैसे करे, इस हद तक कि मनुष्य ज्ञान-विज्ञान से भी डरने लगता है और खालीपन के एहसास से तो और भी घबराने लगता है। इस संसार में, चाहे तुम किसी स्वतंत्र देश में रहते हो या बिना मानवाधिकारों वाले देश में, तुम मानवजाति के भाग्य से बचने में सर्वथा अक्षम हो। तुम चाहे शासक हो या शासित, तुम मानवजाति के भाग्य, रहस्यों और गंतव्य का पता लगाने की इच्छा से बचने में सर्वथा अक्षम हो, खालीपन की अव्याख्येय भावना से बचने में तो तुम और भी अधिक अक्षम हो। इस प्रकार की घटनाएँ, जो समस्त मानवजाति के लिए आम हैं, समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक घटनाएँ कही जाती हैं, लेकिन कोई भी महान व्यक्ति ऐसी समस्याओं का समाधान करने के लिए सामने नहीं आ सकता है। मनुष्य आखिर मनुष्य है; परमेश्वर के दर्जे और जीवन की जगह कोई मनुष्य नहीं ले सकता। मानवजाति को केवल एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज की ही आवश्यकता नहीं है जिसमें हर व्यक्ति को भरपेट भोजन मिले, सभी समान और स्वतंत्र हों; मानवजाति को जिस चीज की जरूरत है वह है परमेश्वर का उद्धार और मनुष्य के लिए उसके जीवन की आपूर्ति। जब मनुष्य परमेश्वर के जीवन की आपूर्ति और उसका उद्धार प्राप्त करता है, केवल तभी उसकी आवश्यकताओं, अन्वेषण की इच्छा और दिल के खालीपन का समाधान हो सकता है। यदि किसी देश या राष्ट्र के लोग परमेश्वर का उद्धार और उसकी छत्रछाया प्राप्त करने में असमर्थ हैं तो ऐसा देश या राष्ट्र पतन की ओर, अंधकार की ओर बढ़ेगा और नतीजे में परमेश्वर द्वारा जड़ से मिटा दिया जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है

लोग इस जीवन को गरीबी और अमीरी में बिताते हैं और लंबा और छोटा जीवन जीते हैं। कुछ आम लोग हैं, जबकि अन्य उच्च पद पर आसीन अधिकारी और संभ्रांत व्यक्ति हैं। समाज में हर तरह के लोग हैं, लेकिन वे सभी लगभग एक जैसे ही रहते हैं : वे अपनी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और शैतानी स्वभावों के अनुसार शोहरत और लाभ के लिए होड़ करते हैं, और तब तक शांति से नहीं बैठते, जब तक इन लक्ष्यों को हासिल ना कर लें। इन परिस्थितियों को देखकर, लोग सोच सकते हैं, “लोग इस तरह क्यों जीते हैं? क्या आगे बढ़ने के लिए कोई और रास्ता नहीं है? क्या लोग वास्तव में मरने तक केवल अच्छा खाने और पीने के लिए ही जीवित रहते हैं? इसके बाद वे कहाँ जाते हैं? लोगों की इतनी सारी पीढ़ियाँ इसी तरह क्यों जीती रही हैं? इन सबकी जड़ क्या है?” मनुष्य नहीं जानते कि वे कहाँ से आए हैं, जीवन में उनका मिशन क्या है या प्रभारी कौन है और इन सब चीजों पर किसकी संप्रभुता है। पीढ़ियाँ एक के बाद एक आती हैं और चली जाती हैं, और हर पीढ़ी दूसरी पीढ़ी की तरह ही जीती है और फिर मर जाती है। वे सब एक जैसे ही आते और चले जाते हैं, और किसी को भी जीने की सच्ची राह या साधन नहीं मिल पाता है। कोई भी इसमें सत्य की तलाश नहीं करता। प्राचीन काल से लेकर अब तक सारे लोग एक ही जैसे रहते आए हैं। वे सभी तलाश और प्रतीक्षा कर रहे हैं, यह देखने की इच्छा में कि बिना किसी के जाने या देखे मानवता कैसी होगी। जब सब कुछ कहा और किया जाता है, तो लोग आम तौर पर यह नहीं जानते कि वह कौन है जो इन सब चीजों पर शासन करता है और संप्रभुता रखता है या उसका अस्तित्व है भी या नहीं। वे इसका जवाब नहीं जानते हैं, और केवल यही कर सकते हैं कि असहाय होकर जीते रहें, साल-दर-साल तरसते रहें, और अब तक दिन-ब-दिन सहते रहें। अगर लोगों को पता होता कि यह सब क्यों होता है, तो क्या इससे उन्हें यह राह मिल जाएगी कि उन्हें कैसे जीना चाहिए? क्या तब वे इस कष्ट से बच सकेंगे और उन्हें मानवीय इच्छाओं और उम्मीदों के अनुसार नहीं जीना पड़ेगा? जब लोग यह समझ जाते हैं कि वे क्यों जीते हैं, क्यों मरते हैं और इस दुनिया का प्रभारी कौन है; जब उन्हें यह उत्तर समझ में आ जाएगा कि जो हर चीज पर संप्रभुता रखता है वही सृष्टिकर्ता है, तो उनके पास अनुसरण के लिए एक मार्ग होगा। उन्हें पता चल जाएगा कि आगे बढ़ने का रास्ता खोजने के लिए उन्हें परमेश्वर के वचनों में सत्य की तलाश करनी चाहिए और उन्हें इच्छाओं और उम्मीदों पर निर्भर होकर ऐसे दुख में जीने की जरूरत नहीं है। यदि लोग इसका जवाब तलाश लें कि वे क्यों जीते हैं और मरते हैं, तो क्या सभी मानवीय दुखों और कठिनाइयों का समाधान नहीं हो जाएगा? क्या इससे लोगों को मुक्ति नहीं मिल जाएगी? लोगों को वास्तव में मुक्ति मिल जाएगी, और वे पूरी तरह से स्वतंत्र हो जाएँगे।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

“वह जो हर चीज पर संप्रभु है” गीत सुनने के बाद तुम लोगों को अपने हृदय में क्या विचार करना चाहिए? यदि मानवजाति को यह पता हो कि लोग क्यों जीते हैं और क्यों मरते हैं और वास्तव में, इस दुनिया और सभी चीजों पर संप्रभु कौन है, कौन हर चीज पर शासन करता है और वह वास्तव में कहाँ है और वह मनुष्य से क्या चाहता है—यदि मानवजाति इन बातों को समझ पाए, तो उसे पता होगा कि सृष्टिकर्ता के साथ कैसा व्यवहार करना है, उसकी आराधना कैसे करनी है और कैसे उसके प्रति समर्पण करना है, इससे लोगों के हृदय को आध्यात्मिक शक्ति, शांति और खुशी मिलेगी और वे ऐसी यातना और पीड़ा में नहीं रहेंगे। अंत में, लोगों को सत्य समझना चाहिए। वे अपने जीवन के लिए जो भी राह चुनते हैं वह अहम होती है, और वे कैसे जीते हैं यह भी महत्वपूर्ण है। कोई कैसे जीता है और वह किस राह पर चलता है इससे तय होता है कि उसका जीवन आनंदमय है या दुखमय। यह बात लोगों को समझनी चाहिए। जब लोग इस भजन को सुनते हैं, तो उनके दिलों में ऐसी गहरी अनुभूति हो सकती है : “पूरी मानवजाति का जीवन इसी पद्धति पर चलता है; प्राचीन लोग कोई अपवाद नहीं थे, और आधुनिक लोग भी वैसे ही हैं जैसे पुराने लोग थे। आधुनिक लोगों ने इन तरीकों को नहीं बदला है। तो क्या मानवजाति के बीच कोई संप्रभु, कोई पौराणिक परमेश्वर है जो हर चीज का प्रभारी है? यदि मानवजाति परमेश्वर को पा ले, जो हर चीज का प्रभारी है, तो क्या मानवजाति खुशी का एहसास करने में सक्षम नहीं हो जाएगी? सबसे बड़ी बात मानवजाति के मूल की तलाश करना है। यह मूल कहाँ है? इस मूल के मिलने पर मानवजाति एक अन्य प्रकार के क्षेत्र में आ सकती है। यदि मानवजाति इसे पाने में असमर्थ रहती है और हमेशा की तरह उसी प्रकार का जीवन जीती रहती है, तो क्या लोग खुशी हासिल कर सकेंगे?” यदि लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, भले ही वे जानते हों कि मानवजाति अत्यधिक भ्रष्ट है, तो वे और क्या ही कर सकते हैं? क्या वे भ्रष्टता की असली समस्या का समाधान कर सकते हैं? क्या उनके पास उद्धार का कोई रास्ता है? भले ही तुम बेहतरी के लिए बदलाव करना चाहो और एक मानव के समान जीवन जीना चाहो, पर क्या तुम ऐसा कर सकते हो? तुम्हारे पास ऐसा करने के लिए कोई राह ही नहीं है! उदाहरण के लिए, तुम कुछ लोगों को अपने बच्चों के लिए जीते हुए देखते हो—तुम जानते हो कि जीने का यह तरीका सही नहीं है, लेकिन क्या तुम अपने बच्चों के लिए जीने से बच सकते हो? या तुम कुछ लोगों को पैसे, प्रसिद्धि और लाभ के पीछे भाग-दौड़ करते और व्यस्त देखते हो—तुम अपने दिल में जानते हो कि यह रास्ता गलत है, लेकिन क्या तुम उन्हीं चीजों का अनुसरण करने और व्यस्त होने से बच सकते हो? यदि तुम जिस रास्ते पर चल रहे हो वह ठीक प्रसिद्धि और लाभ के अनुसरण का है और तुम जानते हो कि यह गलत रास्ता है, फिर भी भले ही तुम चाहते हो, तुम सत्य के अनुसरण के मार्ग पर नहीं चल सकते, इसका मतलब है कि तुम इस दुनिया में कैसे जीते हो, इस पर तुम्हारा नियंत्रण नहीं है! इसका मूल क्या है? यह है कि लोगों ने परमेश्वर के कार्य को स्वीकार नहीं किया है या सत्य प्राप्त नहीं किया है। लोगों का आध्यात्मिक सहारा क्या है? वे आध्यात्मिक सहारे के लिए कहाँ देखते हैं? आध्यात्मिक सहारे के लिए लोग परिवार की एकजुटता की ओर; विवाह के आनंद की ओर; भौतिक चीजों के आनंद की ओर; धन, प्रसिद्धि, लाभ, रुतबे, रिश्तों और करियर की ओर; और अगली पीढ़ी की खुशी की ओर देखते हैं। क्या कोई ऐसा है जो आध्यात्मिक सहारे के लिए इन चीजों की ओर नहीं देखता है? जिनकी संतानें हैं वे इसे अपनी संतानों में देखते हैं; जिनकी संतानें नहीं हैं वे इसे अपने करियर में, विवाह संबंध में, अपने सामाजिक रुतबे में और प्रसिद्धि और लाभ में देखते हैं। इसलिए, इस प्रकार उत्पन्न हुई जीवन जीने की सभी रीतियाँ एक समान ही हैं; और सब लोग, जो शैतान के नियंत्रण और उसके अधिकार-क्षेत्र के अधीन हैं, अनचाहे ही रुतबे, प्रसिद्धि, लाभ, अपने करियर और संभावनाओं, अपने विवाह संबंधों, अपने परिवारों, अपने बच्चों की संभावनाओं और दैहिक सुखों की खातिर भागदौड़ करते हैं और स्वयं को व्यस्त रखते हैं। क्या यही सच्चा मार्ग है? इस संसार में लोग चाहे कितनी भी व्यस्तता से भाग-दौड़ करें, वे चाहे अपने करियर में कितने भी कामयाब हो जाएँ, चाहे उनके परिवार कितने भी खुशहाल रहें, चाहे उनका परिवार कितना भी बड़ा हो, चाहे उनका रुतबा कितना भी प्रतिष्ठित हो—क्या वे जीवन में सच्चे मार्ग पर चलने में समर्थ हैं? प्रसिद्धि और लाभ, संसार या अपने करियर के पीछे भागते हुए क्या वे इस सत्य को देख पाने में समर्थ हैं कि परमेश्वर ने ही समस्त चीजों की रचना की है और वही मानवजाति के भाग्य पर संप्रभुता रखता है? यह संभव नहीं है। चाहे लोग किसी भी चीज का अनुसरण करें या किसी भी तरह के मार्ग पर चलें, यदि लोग इस सत्य को स्वीकार नहीं करते कि परमेश्वर ही मानवजाति के भाग्य पर संप्रभुता रखता है, तो उनका चुना गया मार्ग गलत है। यह उचित मार्ग नहीं है, बल्कि विकृत मार्ग है, यह बुराई का मार्ग है। तुम्हारे आध्यात्मिक सहारे का स्रोत संतुष्ट किया गया है या नहीं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, न ही इससे कि तुम इसे कहाँ खोजते हो, यह सच्ची आस्था नहीं है और यह जीवन में उचित मार्ग नहीं है। सच्ची आस्था क्या होती है? यह परमेश्वर के प्रकटन और कार्य को स्वीकारना और परमेश्वर द्वारा व्यक्त समस्त सत्य को स्वीकारना है। यह सत्य जीवन में सही राह है और वही सत्य और जीवन है जिसका लोगों को अनुसरण करना चाहिए। जीवन में सही राह पर चलने का मतलब है परमेश्वर का अनुसरण करना और उसके वचनों की अगुआई में सत्य को समझने, अच्छाई-बुराई में भेद करने, यह जानने में सक्षम होना कि क्या सकारात्मक चीजें हैं और क्या नकारात्मक चीजें हैं और उसकी संप्रभुता और सर्वशक्तिमत्ता को समझ पाना। जब लोग सच में अपने दिलों में यह समझते हैं कि परमेश्वर ने न केवल स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों को बनाया है, बल्कि वह ब्रह्मांड और सभी चीजों पर संप्रभुता भी रखता है, तो वे उसके सभी आयोजनों और व्यवस्थाओं के आगे समर्पण करने, उसके वचनों के अनुसार जीने और परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहने में सक्षम होंगे। इसका अर्थ होगा कि लोग जीवन में सही राह पर चल पड़े हैं। जब लोग जीवन में सही राह अपनाते हैं, तो वे समझ सकते हैं कि लोग आखिर क्यों जीते हैं और प्रकाश में रहने और परमेश्वर की आशीष और स्वीकृति पाने के लिए उन्हें किस तरह जीना चाहिए।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

“यह भाग्य है,” इस वाक्यांश के बारे में कुछ लोगों को एक गहन, गहराई से महसूस की गई समझ होती है, फिर भी वे परमेश्वर की संप्रभुता पर जरा-सा भी विश्वास नहीं करते हैं; वे यह नहीं मानते हैं कि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित और आयोजित किया जाता है और वे परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण करने के अनिच्छुक होते हैं। इस प्रकार के लोग मानो महासागर में इधर-उधर भटकते रहते हैं, लहरों के द्वारा उछाले जाते हैं, जलधारा के साथ-साथ बहते रहते हैं। उनके पास निष्क्रियता से इंतजार करने और अपने आप को भाग्य पर छोड़ देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता है। फिर भी वे नहीं पहचानते हैं कि मनुष्य का भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है; वे स्वयं की पहल से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जान सकते हैं और इसके फलस्वरूप परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण नहीं कर सकते हैं, भाग्य का प्रतिरोध करना बन्द नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर की देखभाल, सुरक्षा और मार्गदर्शन के अधीन जी नहीं सकते हैं। दूसरे शब्दों में, भाग्य को स्वीकार करना और सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन होना एक ही बात नहीं है; भाग्य में विश्वास करने का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करता है, पहचानता और जानता है; भाग्य में विश्वास करना मात्र उसकी सच्चाई और उसकी सतही प्रकटीकरण की पहचान है। यह इस बात को जानने से भिन्न है कि किस प्रकार सृष्टिकर्ता मनुष्य के भाग्य पर शासन करता है, और सभी चीज़ों के भाग्य पर प्रभुत्व का स्रोत सृष्टिकर्ता ही है, और निश्चित रूप से मानवजाति के भाग्य के लिए सृष्टिकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण से एकदम अलग है। मान लो कि कोई व्यक्ति केवल भाग्य में विश्वास करता है, और यहाँ तक कि उसे इसकी गहरी समझ भी है, लेकिन इससे वह मानवजाति के भाग्य पर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने, मानने, उसके प्रति समर्पण करने या उसे स्वीकार करने में सक्षम नहीं है। ऐसे में, उसका जीवन एक त्रासदी होगा; वह फिर भी यह जीवन व्यर्थ ही जिएगा—यह सब निरर्थक हो जाएगा। वह अभी भी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के आगे आत्मसमर्पण नहीं कर पाएगा, सच्चे अर्थ में एक सृजित मनुष्य नहीं बन पाएगा और सृष्टिकर्ता की स्वीकृति पाने में असमर्थ होगा। जो व्यक्ति वास्तव में सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानता और अनुभव करता है उसे एक सकारात्मक दशा में होना चाहिए, न कि ऐसी दशा में जो नकारात्मक या असहाय हो। इसके बजाय, चूँकि वह स्वीकार करता है कि सभी चीजें भाग्य से निर्धारित होती हैं, उसके दिल में भी जीवन और भाग्य की एक सटीक परिभाषा होती है : मनुष्य का संपूर्ण जीवन सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन है। जब वह पीछे मुड़कर उस मार्ग को देखता है जिस पर वह चला है, जब वह अपने जीवन के हर चरण को याद करता है, तो वह देखता है—चाहे उसकी यात्रा कठिन रही हो या सुगम—हर कदम पर परमेश्वर उसे मार्ग दिखा रहा था और उसके लिए व्यवस्थाएँ कर रहा था। वह समझता है कि परमेश्वर की कुशल योजना के साथ ही उसकी सावधानीपूर्ण व्यवस्थाओं ने ही आज तक अनजाने में उसकी अगुआई की है, जहाँ वह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और उसके उद्धार को स्वीकार करने में समर्थ है। यह किसी व्यक्ति के जीवन में सबसे बड़ा आशीष है! यदि भाग्य के प्रति किसी व्यक्ति में नकारात्मक रवैया है तो इससे साबित होता है कि वह हर उस चीज का विरोध कर रहा है जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने उसके लिए की है और उसमें समर्पणशील रवैया नहीं है। यदि मनुष्य के भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति किसी व्यक्ति का सकारात्मक रवैया है, तो जब वह पीछे मुड़कर उस मार्ग को देखता है जिस पर वह चला था, जब वह सही मायनों में परमेश्वर की संप्रभुता का अनुभव करता है तो वह और भी अधिक सच्चे मन से हर उस चीज के प्रति समर्पण करना चाहेगा जिसकी परमेश्वर ने व्यवस्था की है, और उसके पास परमेश्वर को उसके भाग्य की योजना बनाने देने और आगे से परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह न करने के लिए और अधिक दृढ़ संकल्प और आस्था होगी। यह इसलिए क्योंकि वह देखता है कि जब लोग नहीं जानते कि भाग्य क्या है या परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझते हैं तो वे बस मनमर्जी से धुँध में हाथ-पैर मारते हुए और लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ते हैं और यह यात्रा बहुत ही कठिन होती है और दिल में बहुत अधिक दर्द उत्पन्न करती है। इसलिए जब लोगों को यह एहसास होता है कि परमेश्वर मानव भाग्य पर संप्रभु है तो चतुर लोग परमेश्वर की संप्रभुता को जानना और स्वीकार करना चुनते हैं और भाग्य के खिलाफ संघर्ष जारी रखने और अपने तरीके से अपने तथाकथित जीवन लक्ष्यों का पीछा करने के बजाय “अपने स्वयं के हाथों से एक अच्छा जीवन बनाने की कोशिश करने” के दर्दनाक दिनों को अलविदा कहते हैं। जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के बिना होता है, जब वह उसे नहीं देख सकता है, जब वह वास्तव में और स्पष्टता से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जान पाता है तो उसका हर दिन निरर्थक, बेकार और अवर्णनीय रूप से पीड़ादायक होता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई व्यक्ति कहाँ है और उसका क्या काम है, उसके जीने के साधन और जिन लक्ष्यों का वह अनुसरण करता है वे उसे केवल अंतहीन दिल का दर्द और ऐसी पीड़ा देते हैं जिससे उबरना कठिन होता है, जो ऐसे अनुभव हैं जिन्हें वह पीछे मुड़कर देखना भी बर्दाश्त नहीं कर पाता है। सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करके, उसके आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करके और एक सच्चा मानव जीवन हासिल करने का अनुसरण करके ही कोई व्यक्ति धीरे-धीरे समस्त दिल के दर्द और पीड़ा से मुक्त हो सकता है और धीरे-धीरे मानव जीवन के सारे खालीपन से खुद को छुटकारा दिला सकता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III

चूँकि मनुष्य परमेश्वर के आयोजनों और परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जानता है, इसलिए वह नियति का सामना हमेशा प्रतिरोधी मनोदशा और विद्रोही रवैये के साथ करता है, और वह हमेशा परमेश्वर के अधिकार और संप्रभुता और नियति की व्यवस्थाओं से मुक्त होना चाहता है, व्यर्थ ही यह आशा रखता है कि वह अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदल देगा और अपनी नियति को पलट देगा। परंतु वह कभी भी सफल नहीं हो सकता और वह हर मोड़ पर नाकामियों का सामना करता है। उसकी आत्मा की गहराइयों में चलने वाला यह संघर्ष उसे पीड़ा देता है और यह पीड़ा उसकी हड्डियों तक उतर जाती है, साथ ही यह उससे उसका जीवन व्यर्थ करवा देती है। इस पीड़ा का कारण क्या है? क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण है या बुरी नियति के कारण? स्पष्ट है कि दोनों में कोई भी बात सही नहीं है। अंतिम विश्लेषण में, मनुष्य जिस मार्ग पर चलता है और अपना जीवन जीने का जो तरीका वह चुनता है, उसी के कारण ऐसा होता है। हो सकता है कि कुछ लोगों ने इन चीजों को अनुभव ही न किया हो। किन्तु जब तुम सही मायनों में जान जाते हो और यह स्वीकार कर लेते हो कि मनुष्य की नियति पर परमेश्वर की संप्रभुता है, जब तुम सही मायनों में समझ जाते हो कि हर वह चीज जिस पर परमेश्वर की संप्रभुता है और जिसकी वह व्यवस्था करता है, वह तुम्हारे लिए जबरदस्त लाभ और सुरक्षा है, तब तुम्हें अपनी पीड़ा धीरे-धीरे कम होती महसूस होगी और तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व धीरे-धीरे सुकून भरा, स्वतंत्र और मुक्त हो जाएगा। अधिकांश लोगों की स्थितियों का आकलन करने से पता चलता है कि वे तटस्थ भाव से मनुष्य के भाग्य पर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के व्यावहारिक मूल्य एवं अर्थ को स्वीकार नहीं पाते हैं, यद्यपि व्यक्तिपरक स्तर पर वे उसी तरह से जीवन जीते रहना नहीं चाहते हैं, जैसा वे पहले जीते थे, और अपनी पीड़ा से राहत चाहते हैं; फिर भी तटस्थ भाव से वे सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को सही मायनों में समझ नहीं पाते और उसके अधीन नहीं हो सकते हैं, और वे यह तो बिल्कुल भी नहीं जानते हैं कि सृष्टिकर्ता के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं को किस प्रकार खोजें एवं स्वीकार करें। इसलिए, यदि मनुष्य वास्तव में इस तथ्य को नहीं जान पाता है कि सृष्टिकर्ता की उसके भाग्य और उसकी हर चीज पर संप्रभुता है, और वह वास्तव में सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन समर्पण नहीं कर सकता है, तो उसके लिए इस विचार से संचालित होने और बेड़ियों में जकड़े रहने से बचना बहुत कठिन होगा कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथों में है, और उसके लिए भाग्य और सृष्टिकर्ता के अधिकार के खिलाफ अपने तीव्र संघर्ष से उत्पन्न होने वाली पीड़ा से मुक्त होना बहुत कठिन होगा—बेशक, उसके लिए वास्तव में स्वतंत्र और मुक्त होना, परमेश्वर की आराधना करने वाला व्यक्ति बनना भी बहुत कठिन होगा। इस दशा से खुद को मुक्त करने का सबसे सरल तरीका है जीने के अपने पुराने तरीके को अलविदा कहना; जीवन में अपने पुराने लक्ष्यों को अलविदा कहना; अपने पुराने जीने के तरीके, जीवन के दृष्टिकोण, अनुसरणों, इच्छाओं एवं आकांक्षाओं को सारांशित करना और उनका गहन-विश्लेषण करना; और उसके बाद मनुष्य के लिए परमेश्वर के इरादों और अपेक्षाओं के साथ उनकी तुलना करना और यह देखना कि क्या उनमें से कोई परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है, क्या उनमें से कोई परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप है, क्या उनमें से कोई जीवन के सही मूल्य प्रदान करता है, व्यक्ति को अधिकाधिक सत्य को समझने की दिशा में ले जाता है और व्यक्ति को मानवता के साथ और मनुष्य के समान जीने में समर्थ बनाता है। जब तुम लोगों द्वारा जीवन में अनुसरण किए जा रहे अपने विभिन्न लक्ष्यों और उनके जीने के विभिन्न तरीकों की बार-बार जाँच करोगे और इनका सावधानीपूर्वक गहन-विश्लेषण करोगे तो तुम यह पाओगे कि उनमें से एक भी सृष्टिकर्ता के उस मूल इरादे के अनुरूप नहीं है जिसके साथ उसने मानवजाति का सृजन किया था। ये सारी चीजें लोगों को सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और उसकी देखभाल से दूर करती हैं; ये सभी ऐसे जाल हैं जो लोगों को भ्रष्ट बनने का कारण बनते हैं और उन्हें नरक में ले जाते हैं। इस बात का एहसास होने के बाद तुम्हें जीवन के अपने पुराने दृष्टिकोण को त्याग देना चाहिए, विभिन्न जालों से दूर रहना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर को तुम्हारे जीवन का नियंत्रण करने देना चाहिए और इसके लिए व्यवस्थाएँ करने देना चाहिए, केवल परमेश्वर के आयोजनों और मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करने का दृढ़ संकल्प करना चाहिए, खुद से कोई चुनाव नहीं करने चाहिए और एक ऐसा इंसान बनना चाहिए जो परमेश्वर की आराधना करता हो। यह सुनने में आसान लगता है, परन्तु इसे करना बहुत कठिन है। कुछ लोग इसकी तकलीफ सहन कर सकते हैं, कुछ नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग पालन करने के इच्छुक होते हैं, कुछ लोग अनिच्छुक होते हैं। जो लोग अनिच्छुक होते हैं उनमें ऐसा करने की इच्छा और दृढ़ संकल्प की कमी होती है; वे एकदम स्पष्ट रूप से परमेश्वर की संप्रभुता के बारे में अवगत हैं, बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि यह परमेश्वर ही है जो मनुष्य के भाग्य की योजना बनाता है और उसकी व्यवस्था करता है, और फिर भी वे हाथ-पैर मारते और संघर्ष करते हैं, और अपने भाग्य को परमेश्वर के हाथों में सौंपने और परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पित होने के लिए सहमत नहीं होते हैं; यही नहीं, वे परमेश्वर के आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं से नाराज़ रहते हैं। अतः हमेशा कुछ ऐसे लोग होंगे जो स्वयं देखना चाहते हैं कि वे क्या करने में सक्षम हैं; वे अपने दोनों हाथों से अपने भाग्य को बदलना चाहते हैं, या अपनी ताकत से खुशियाँ प्राप्त करना चाहते हैं, यह देखना चाहते हैं कि वे परमेश्वर के अधिकार की सीमाओं का अतिक्रमण कर सकते हैं या नहीं और परमेश्वर की संप्रभुता से ऊपर उठ सकते हैं या नहीं। मनुष्य की त्रासदी यह नहीं है कि वह सुखी जीवन के पीछे भागता है और न ही यह है कि वह प्रसिद्धि और लाभ का पीछा करता है या वह धुंध में अपनी नियति के खिलाफ संघर्ष करता है, बल्कि यह है कि सृष्टिकर्ता का अस्तित्व देख लेने के बाद भी, यह सच्चाई जान लेने के बाद भी कि सृष्टिकर्ता मानव की नियति पर संप्रभु है, वह गलत मार्ग से लौट नहीं पाता है, वह कीचड़ से अपने पैर बाहर नहीं निकाल पाता है, बल्कि अपना दिल कठोर बना लेता है और अपनी गलतियों पर अड़ा रहता है। लेशमात्र भी पछतावे के बिना, वह कीचड़ में लगातार हाथ पैर मारना, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के विरोध में अवज्ञतापूर्ण ढंग से स्पर्धा करना अधिक पसंद करता है, और दुखद अंत तक प्रतिरोध करता रहता है। जब वह टूटकर बिखर जाता है और उसका रक्त बह रहा होता है तब जाकर वह अंततः हार मान लेने और वापस मुड़ने का निर्णय लेता है। यही मनुष्य की असली त्रासदी है। इसलिए मैं कहता हूँ, जो लोग समर्पण करना चुनते हैं वे बुद्धिमान हैं, जबकि जो संघर्ष करने और बचकर भागने का चुनाव करते हैं, वे वस्तुतः मूर्ख और जिद्दी होते हैं।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III

पिछला: 2. कुछ लोग, चूँकि उन्होंने परमेश्वर को देखा नहीं है, कहते हैं कि दुनिया में कोई परमेश्वर नहीं है, जबकि अन्य लोग परमेश्वर के अस्तित्व की गवाही देने के लिए अपने व्यक्तिगत अनुभवों का उपयोग करते हैं। हम नहीं जानते कि क्या वास्तव में कोई परमेश्वर है, इसलिए हम यह कैसे निर्धारित कर सकते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है या नहीं?

अगला: 4. यदि हम परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, और केवल भले हैं, अच्छे कर्म कर रहे हैं और कोई बुराई नहीं कर रहे, तो क्या हम परमेश्वर द्वारा बचाए जाएँगे?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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