1. प्रभु ने हमसे यह कहते हुए, एक वादा किया, “मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो” (यूहन्ना 14:2-3)। प्रभु यीशु पुनर्जीवित हुआ और हमारे लिए एक जगह तैयार करने के लिए स्वर्ग में चढ़ा, और इसलिए यह स्थान स्वर्ग में होना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आया है और पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य स्थापित कर चुका है। मुझे समझ में नहीं आता : स्वर्ग का राज्य स्वर्ग में है या पृथ्वी पर?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो” (मत्ती 6:9-10)।
“जब सातवें दूत ने तुरही फूँकी, तो स्वर्ग में इस विषय के बड़े बड़े शब्द होने लगे : ‘जगत का राज्य हमारे प्रभु का और उसके मसीह का हो गया, और वह युगानुयुग राज्य करेगा’” (प्रकाशितवाक्य 11:15)।
“फिर मैं ने पवित्र नगर नये यरूशलेम को स्वर्ग से परमेश्वर के पास से उतरते देखा। वह उस दुल्हिन के समान थी जो अपने पति के लिये सिंगार किए हो। फिर मैं ने सिंहासन में से किसी को ऊँचे शब्द से यह कहते हुए सुना, ‘देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है। वह उनके साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्वर होगा। वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं’” (प्रकाशितवाक्य 21:2-4)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
परमेश्वर ने मनुष्यों का सृजन किया और उसने उन्हें पृथ्वी पर रखा और तब से उनकी अगुआई की है और बाद में उसने उन्हें बचाया और मानवता के लिए पाप-बलि बना और अंत में, उसे अभी भी मानवता को जीतना होगा, मनुष्यों को पूरी तरह से बचाना होगा और उन्हें उनकी मूल समानता में वापस लौटाना होगा। यही वह कार्य है जिसमें वह आरंभ से अंत तक संलग्न रहा है—मनुष्य को उसकी मूल छवि और उसकी मूल समानता में वापस लौटाना। परमेश्वर अपना राज्य स्थापित करेगा और मनुष्य की मूल समानता बहाल करेगा, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर पृथ्वी पर और समस्त सृजित प्राणियों के बीच अपने अधिकार को बहाल करेगा। मनुष्यों ने शैतान से भ्रष्ट होने के बाद सृजित प्राणियों की जो भूमिका होनी चाहिए थी उसे खोने के साथ-साथ परमेश्वर का भय मानने वाला अपना हृदय भी गँवा दिया। वे सब परमेश्वर के प्रति विद्रोही शत्रु बन गए, शैतान की सत्ता के अधीन जीते थे और शैतान की चालाकी के वश में थे; इस प्रकार, अपने सृजित प्राणियों के बीच कार्य करने का परमेश्वर के पास कोई तरीका नहीं था और वह उनका भय प्राप्त कर पाने में और भी असमर्थ हो गया। मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया था और उन्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, पर उन्होंने वास्तव में परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया और इसके बजाय शैतान की आराधना करने लगे। शैतान उनके दिलों में आदर्श बन गया। इस प्रकार परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसके द्वारा मानवजाति के सृजन के पीछे का अर्थ खो गया। इसलिए मानवजाति के सृजन के अपने अर्थ को बहाल करने के लिए उसे उनकी मूल समानता को बहाल करना होगा और मानवजाति को उसके भ्रष्ट स्वभाव से मुक्ति दिलानी होगी। शैतान से मनुष्यों को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे उन्हें पाप से बचाना होगा। केवल इसी तरह परमेश्वर धीरे-धीरे उनकी मूल समानता और भूमिका को बहाल कर सकता है और अंततः अपने राज्य को बहाल कर सकता है। विद्रोह करने वाले उन पुत्रों का अंत में पूर्णतया विनाश भी इसलिए होगा कि मनुष्य बेहतर ढंग से परमेश्वर की आराधना कर सकें और पृथ्वी पर बेहतर ढंग से रह सकें। चूँकि परमेश्वर ने मानवों का सृजन किया, इसलिए वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाएगा; क्योंकि वह मानवता के मूल कार्य को बहाल करना चाहता है, वह उसे पूर्ण रूप से और बिना किसी मिलावट के बहाल करेगा। अपना अधिकार बहाल करने का अर्थ है, मनुष्यों से अपनी आराधना कराना और समर्पण कराना; इसका अर्थ है कि वह अपनी वजह से मनुष्यों को जीवित रखेगा और अपने अधिकार की वजह से अपने शत्रुओं का विनाश करेगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर किसी प्रतिरोध के बिना, मनुष्यों के बीच उस सब को बनाए रखेगा जो उसके बारे में है। जो राज्य परमेश्वर स्थापित करना चाहता है, वह उसका स्वयं का राज्य है। वह जिस मानवता की आकांक्षा रखता है वह ऐसी हो जो उसकी आराधना करे, जो उसके प्रति पूरी तरह समर्पण करे और जो उसकी महिमा से युक्त हो। यदि परमेश्वर ने भ्रष्ट मानवता को न बचाया तो उसके द्वारा मानवता के सृजन का अर्थ खत्म हो जाएगा; उसका मनुष्यों के बीच अब और अधिकार नहीं रहेगा और पृथ्वी पर उसके राज्य का अस्तित्व अब और नहीं रह पाएगा। यदि परमेश्वर ने उन शत्रुओं का नाश नहीं किया जो उसके प्रति विद्रोही हैं, तो वह अपनी संपूर्ण महिमा प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा, न ही वह पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना कर पाएगा। मानवता में से उन सबको पूरी तरह नष्ट करना, जो उसके प्रति विद्रोही हैं और जो पूर्ण किए जा चुके हैं, उन्हें विश्राम में लाना—ये उसका कार्य पूरा होने और उसकी महान उपलब्धि के चिह्न होंगे। जब मनुष्यों को उनकी मूल समानता में बहाल कर लिया जाएगा और जब वे अपने-अपने कर्तव्य अच्छे से निभा सकेंगे, अपने उचित स्थानों पर बने रह सकेंगे और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकेंगे, तब परमेश्वर ने पृथ्वी पर उन लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया होगा जो उसकी आराधना करते हैं और उसने पृथ्वी पर एक राज्य भी स्थापित कर लिया होगा जो उसकी आराधना करता है। पृथ्वी पर उसकी अनंत विजय होगी और वे सभी जो उसके विरोध में हैं, अनंतकाल के लिए नष्ट हो जाएँगे। इससे मनुष्य का सृजन करने की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी; इससे सब चीजों के सृजन की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी और इससे पृथ्वी पर, सभी चीजों के बीच, और शत्रुओं के बीच उसका अधिकार भी बहाल हो जाएगा। ये उसकी संपूर्ण विजय के चिह्न होंगे। इसके बाद से मानवता विश्राम में प्रवेश करेगी और ऐसे जीवन में प्रवेश करेगी, जो सही मार्ग पर है। मानवता के साथ परमेश्वर भी अनंत विश्राम में प्रवेश करेगा और एक ऐसा अनंत जीवन आरंभ करेगा जिसे स्वयं वह और मनुष्य दोनों ही साझा करते हों। पृथ्वी से गंदगी और विद्रोहीपन मिट जाएगा, पृथ्वी पर से सारा विलाप भी समाप्त हो जाएगा और परमेश्वर का विरोध करने वाली प्रत्येक चीज का अस्तित्व नहीं रहेगा। केवल परमेश्वर और वही लोग बचेंगे, जिनका उसने उद्धार किया है; केवल उसकी सृष्टि ही बचेगी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
जब परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक साथ विश्राम में प्रवेश करते हैं तो इसका अर्थ है कि मानवजाति को बचा लिया गया है, शैतान को नष्ट किया जा चुका है और मनुष्यों पर परमेश्वर का कार्य पूरी तरह पूरा हो गया है। परमेश्वर अब मनुष्यों पर कार्य करना जारी नहीं रखेगा और वे अब शैतान की सत्ता के अधीन नहीं रहेंगे। इस तरह, परमेश्वर अब और व्यस्त नहीं रहेगा और मनुष्य अब लगातार भागदौड़ में नहीं रहेंगे; परमेश्वर और मानवजाति एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर अपने मूल स्थान पर लौट जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने संबंधित स्थान पर लौट जाएगा। ये परमेश्वर का समस्त प्रबंधन पूरा होने पर परमेश्वर और मनुष्य की संबंधित मंजिलें होंगी। परमेश्वर के पास परमेश्वर की मंजिल है और मनुष्यों के पास वह जगह है जहाँ वे जाएँगे। विश्राम करते समय, परमेश्वर पृथ्वी पर जीने के लिए सभी मनुष्यों की अगुआई करता रहेगा, जबकि उसके प्रकाश में, वे स्वर्ग के एकमात्र सच्चे परमेश्वर की आराधना करेंगे। परमेश्वर अब मानवता के बीच नहीं रहेगा, न ही मनुष्य परमेश्वर के साथ उसकी मंजिल में रहने में समर्थ होंगे। परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक ही क्षेत्र के भीतर नहीं रह सकते; बल्कि दोनों के जीने के अपने-अपने संबंधित तरीके हैं। परमेश्वर वह है जो समस्त मानवता की अगुआई करता है और समस्त मानवता परमेश्वर के प्रबंधन कार्य का मूर्त परिणाम है। मनुष्य वे हैं जिनकी अगुआई की जाती है और उनका सार परमेश्वर के सार के समान नहीं है। “विश्राम” का अर्थ है अपने मूल स्थान में लौटना। इसलिए, जब परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करता है, तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर अपने मूल स्थान में लौट जाता है। वह पृथ्वी पर अब और नहीं रहेगा या मानवता के बीच उसकी खुशी या पीड़ा साझा करने के लिए नहीं रहेगा। जब मनुष्य विश्राम में प्रवेश करते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे सच्चे सृजित प्राणी बन गए हैं; वे पृथ्वी से परमेश्वर की आराधना करेंगे और सामान्य मानवीय जीवन जिएंगे। लोग अब और परमेश्वर से विद्रोह या उसका प्रतिरोध नहीं करेंगे और वे आदम और हव्वा के मूल जीवन की ओर लौट जाएँगे। विश्राम में प्रवेश करने के बाद ये परमेश्वर और मनुष्य के अपने-अपने जीवन और गंतव्य होंगे। परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध में शैतान की पराजय अपरिहार्य प्रवृत्ति है। इसी तरह, अपना प्रबंधन-कार्य पूरा करने के बाद परमेश्वर का विश्राम में प्रवेश करना और मनुष्य का पूर्ण उद्धार और विश्राम में प्रवेश अपरिहार्य प्रवृत्ति बन गए हैं। मनुष्य के विश्राम का स्थान पृथ्वी पर है और परमेश्वर के विश्राम का स्थान स्वर्ग में है। मनुष्य विश्राम करते समय, पृथ्वी पर रहकर परमेश्वर की आराधना करेंगे। परमेश्वर स्वयं विश्राम करते हुए शेष मानवता की अगुआई करेगा; वह स्वर्ग से उनकी अगुआई करेगा, न कि पृथ्वी से।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
विजय का कार्य पूरा कर लिए जाने के बाद मनुष्य को एक सुंदर संसार में लाया जाएगा। यह जीवन बेशक अभी भी पृथ्वी पर होगा, किंतु यह मनुष्य के आज के जीवन से बिल्कुल भिन्न होगा। यह वह जीवन है जो मानवजाति के पास तब होगा जब संपूर्ण मानवजाति पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी, यह पृथ्वी पर मनुष्य के लिए एक नई शुरुआत होगी। मानवजाति के पास इस प्रकार का जीवन होना इस बात का सबूत होगा कि मानवजाति ने एक नए और सुंदर क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है; यह पृथ्वी पर परमेश्वर और मनुष्य के जीवन की शुरुआत होगी। ऐसे सुंदर जीवन के लिए यह पूर्वापेक्षा जरूर होनी चाहिए कि मनुष्य को शुद्ध कर दिए जाने और उस पर विजय पा लिए जाने के बाद वह सृष्टिकर्ता के सम्मुख समर्पण कर दे। और इसलिए, मानवजाति के अद्भुत मंजिल में प्रवेश करने से पहले विजय का कार्य परमेश्वर के कार्य का अंतिम चरण है। ऐसा जीवन पृथ्वी पर मनुष्य का भविष्य का जीवन है, पृथ्वी पर सबसे अधिक सुंदर जीवन है, उस प्रकार का जीवन है जिसके लिए मनुष्य लालायित रहता है और उस प्रकार का जीवन है जिसे मनुष्य ने संसार के इतिहास में पहले कभी प्राप्त नहीं किया है। यह 6,000 वर्षों के प्रबंधन के कार्य का अंतिम परिणाम है; यही वह चीज है जिसके लिए मानवजाति सर्वाधिक लालायित रहती है और यह मनुष्य से परमेश्वर का वादा भी है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना
मेरे वचन ज्यों-ज्यों पूर्ण होते हैं, पृथ्वी पर धीरे-धीरे राज्य बनता जाता है और मनुष्य धीरे-धीरे सामान्यता की ओर लौटता है, और इस प्रकार पृथ्वी पर वह राज्य स्थापित हो जाता है जो मेरे हृदय में है। राज्य में, परमेश्वर के सभी लोग सामान्य मनुष्य का जीवन पुनः प्राप्त कर लेते हैं। पाले वाली शीत ऋतु विदा हो रही है, उसका स्थान वासंती नगरों का संसार ले रहा है, जहाँ पूरे साल बहार रहती है। लोग अब कभी मनुष्य के संसार की वीरानी का अनुभव नहीं करते हैं और न ही वे मनुष्य के संसार की ठंडी सिहरन सहते हैं। लोग एक दूसरे से लड़ते नहीं हैं, देश एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध में नहीं उतरते हैं, नरसंहार अब और नहीं हैं और न वह लहू जो नरसंहार से बहता है; सारे भूभाग आनंद से भरे हैं, और हर जगह लोगों की आपसी गर्माहट से भरी है। मैं पूरे संसार में चलता हूँ, मैं ऊपर अपने सिंहासन से आनंदित होता हूँ, और मैं तारों के बीच रहता हूँ। स्वर्गदूत मेरे लिए नए-नए गीत और नए-नए नृत्य प्रस्तुत करते हैं। उनकी अपनी भंगुरता अब कभी उनकी आँखों से आँसू बहने का कारण नहीं बनती है। अब मुझे अपने सामने स्वर्गदूतों के रोने की आवाज़ नहीं सुनाई देती, और अब कोई भी मुझे अपने दुख नहीं बताता है। आज, तुम सब लोग मेरे सामने रहते हो; कल तुम सब लोग मेरे राज्य में रहोगे। क्या यह सबसे बड़ा आशीष नहीं है जो मैं मनुष्य को देता हूँ?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 20