4. आप कहते हैं कि यदि हम अंतिम दिनों के परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, तो हमें शुद्ध नहीं किया जाएगा, और इस प्रकार हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के योग्य नहीं होंगे। हम इस पर विश्वास नहीं करते हैं। हालाँकि हम अभी भी पाप करने में सक्षम हैं और देह से जकड़े हुए हैं, बाइबल में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है, “और यह क्षण भर में, पलक मारते ही अन्तिम तुरही फूँकते ही होगा। क्योंकि तुरही फूँकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी दशा में उठाए जाएँगे, और हम बदल जाएँगे” (1 कुरिन्थियों 15:52)। हम मानते हैं कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है : परमेश्वर के एक ही कथन ने आकाश और पृथ्वी और सभी चीजों का निर्माण कर दिया था, और परमेश्वर का एक मात्र कथन मृत लोगों को उठा सकता है। जब परमेश्वर आएगा, तो वह एक क्षण में ही हमारे रूप को परिवर्तित करने में सक्षम होगा और हमें स्वर्ग के राज्य में उठा लेगा। इस तरह, हमारे लिए अंतिम दिनों में परमेश्वर देह बने, सत्य को व्यक्त करे और न्याय तथा शुद्धि का काम करे, इसकी आवश्यकता नहीं है।
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“क्योंकि वह समय आ चुका है कि परमेश्वर के घर से न्याय शुरू किया जाए” (1 पतरस 4:17)।
“यदि कोई मनुष्य मेरे वचन सुनता है लेकिन इनका पालन नहीं करता है तो मैं उसका न्याय नहीं करता हूँ : क्योंकि मैं संसार का न्याय करने नहीं, बल्कि संसार को बचाने आया हूँ। वो जो मुझे नकार देता है, और मेरे वचन नहीं स्वीकारता, उसका भी न्याय करने वाला कोई है : मैंने जो मार्ग बताया है वही अंत के दिन उसका न्याय करेगा” (यूहन्ना 12:47-48)।
“मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)।
“मैं यह विनती नहीं करता कि तू उन्हें जगत से उठा ले; परन्तु यह कि तू उन्हें उस दुष्ट से बचाए रख। ... अपने सत्य के माध्यम से उन्हें पावनीकृत करो : तुम्हारा मार्ग सत्य है। ... और उनके लिये मैं अपने आप को पवित्र करता हूँ, ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किये जाएँ” (यूहन्ना 17:15, 17, 19)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
तुम लोगों को परमेश्वर का इरादा देखने में सक्षम होना चाहिए और तुम्हें देखना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों के सृजन जितना सरल नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आज का कार्य उन लोगों का रूपांतरण करना है जो भ्रष्ट किए जा चुके हैं, जो बेहद सुन्न हैं, यह उन्हें शुद्ध करने के लिए है जो सृजित किए गए थे किंतु शैतान द्वारा संसाधित किए गए थे। यह आदम और हव्वा का सृजन नहीं है, यह प्रकाश का सृजन, या प्रत्येक पौधे और पशु का सृजन तो और भी नहीं है। परमेश्वर शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दी गई चीजों को शुद्ध करता है और फिर उन्हें नए सिरे से प्राप्त करता है, उन्हें ऐसी चीजें बनाता है, जो उसकी होती हैं और उन्हें अपनी महिमा बनाता है। यह स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों के सृजन जितना आसान नहीं है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है, न ही यह शैतान को अथाह कुंड में जाने का शाप देने के कार्य जैसा है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है। बल्कि, यह मनुष्य का कायापलट करने का कार्य है, उन चीजों को जो नकारात्मक हैं, और उसकी नहीं हैं, ऐसी चीजों में बदलने का कार्य है जो सकारात्मक हैं और उसकी हैं। परमेश्वर के कार्य के इस चरण के पीछे की यही वास्तविक कहानी है। तुम लोगों को यह समझना ही चाहिए, और विषयों को अत्यधिक सरलीकृत करने से बचना चाहिए। परमेश्वर का कार्य किसी भी साधारण कार्य के समान नहीं है। इसकी अद्भुतता और बुद्धि मनुष्य की सोच से परे हैं। परमेश्वर कार्य के इस चरण के दौरान सभी चीजों का सृजन नहीं करता है, किंतु वह उन्हें नष्ट भी नहीं करता है। इसके बजाय, वह अपनी सृजित की गई सभी चीजों का कायापलट करता है, और शैतान द्वारा दूषित कर दी गई सभी चीजों को शुद्ध करता है। और इस प्रकार, परमेश्वर एक महान उद्यम आरंभ करता है। यही परमेश्वर के कार्य का संपूर्ण महत्व है। क्या इन वचनों में तुम यह देखते हो कि परमेश्वर का कार्य सचमुच इतना सीधा-सरल है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?
सबसे आरंभ में मानव-जाति परमेश्वर के हाथों में थी, किंतु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान द्वारा बाँध लिया गया और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रबंधन कार्य में शैतान पराजित किए जाने का लक्ष्य बन गया। चूँकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और चूँकि मनुष्य परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन की पूँजी है, इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस लेना होगा, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को, जिसे शैतान द्वारा बंदी बना लिया गया है, वापस लेना होगा। इस प्रकार, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों और मनुष्य के मूल विवेक को पुनर्स्थापित करने के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए। इस तरह से बंदी बना लिए गए मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस लिया जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिंदा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और चूँकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए एक बार जब यह युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो मनुष्य इस संपूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दंडित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मानव-जाति के उद्धार का संपूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना
परमेश्वर पूरे ब्रह्मांड में अपना कार्य करता है। जो उस पर विश्वास करते हैं, उन सबको अवश्य ही उसके वचन स्वीकार करने चाहिए और उसके वचन खाने और पीने चाहिए; परमेश्वर द्वारा दिखाए गए संकेतों और चमत्कारों को देखकर कोई भी व्यक्ति परमेश्वर द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। युगों-युगों और पीढ़ियों से परमेश्वर ने मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए सदैव वचन का उपयोग किया है। इसलिए तुम लोगों को अपना समस्त ध्यान संकेतों और चमत्कारों पर नहीं लगाना चाहिए, बल्कि परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करने पर लगाना चाहिए। पुराने विधान के व्यवस्था के युग में परमेश्वर ने कुछ वचन कहे, और अनुग्रह के युग में यीशु ने भी बहुत-से वचन कहे। यीशु द्वारा बहुत-से वचन कहे जाने के बाद, बाद के प्रेरितों और शिष्यों ने लोगों को यीशु द्वारा जारी की गई आज्ञाओं के अनुसार अभ्यास करने में अगुआई की, और यीशु द्वारा कहे गए वचनों और उसके द्वारा बताए गए सिद्धांतों के अनुसार चीजों का अनुभव किया। अंत के दिनों में परमेश्वर वचन का उपयोग मुख्यतः मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है। वह मनुष्य को जबरन आश्वस्त करने के लिए चिह्नों और चमत्कारों का उपयोग नहीं करता; यह परमेश्वर के महान सामर्थ्य को प्रकट नहीं कर सकता। यदि परमेश्वर केवल चिह्न और चमत्कार दिखाता तो इससे परमेश्वर की व्यावहारिकता प्रकट न होती और इससे मनुष्य पूर्ण न बनाया जा सकता। परमेश्वर संकेतों और चमत्कारों से मनुष्य को पूर्ण नहीं बनाता, अपितु उसे सींचने और उसकी चरवाही करने के लिए वचन का उपयोग करता है, जिसके बाद मनुष्य परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण कर सकता है और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यही उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य और बोले जाने वाले वचनों का उद्देश्य है। परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए संकेत एवं चमत्कार दिखाने की विधि का उपयोग नहीं करता—वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों और कार्य की कई विधियों का उपयोग करता है। चाहे वह शोधन, काट-छाँट या वचनों का पोषण हो, मनुष्य को पूर्ण बनाने और उसे परमेश्वर के कार्य, उसकी बुद्धि और चमत्कारिकता का अधिक ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम बनाने के लिए परमेश्वर कई भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलता है। अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा युग का समापन करने के समय जब मनुष्य को पूर्ण किया जाएगा, तब वह संकेत और चमत्कार देखने योग्य हो जाएगा। जब तुम परमेश्वर को जान लेते हो और इस बात की परवाह किए बिना कि वह क्या करता है, उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम हो जाते हो, तब संकेत और चमत्कार देखकर तुम परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं बनाते। इस समय तुम भ्रष्ट हो और परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण करने में अक्षम हो—तुम क्या अपने को चिह्न और चमत्कार देखने योग्य समझते हो? जब परमेश्वर संकेत और चमत्कार दिखाता है, तो यह तब होता है, जब वह मनुष्य को दंड देता है, और तब भी, जब युग बदलता है, और इतना ही नहीं, जब युग का समापन होता है। जब परमेश्वर का कार्य सामान्य रूप से किया जा रहा हो, तो वह संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता। संकेत और चमत्कार दिखाना उसके लिए बहुत ही आसान है, किंतु वह परमेश्वर के कार्य का सिद्धांत नहीं है, न ही वह परमेश्वर के मनुष्य के प्रबंधन का लक्ष्य है। यदि मनुष्य संकेत और चमत्कार देखते और उन्हें परमेश्वर की आध्यात्मिक देह भी प्रकट होती तो क्या सभी लोग परमेश्वर “में विश्वास” न करते? मैंने पहले कहा था कि पूर्व से विजेताओं का एक समूह प्राप्त किया जाएगा, ऐसे विजेताओं का जो महाक्लेश से निकलेंगे। इन वचनों का क्या अर्थ है? उनका अर्थ है कि ये जो लोग प्राप्त किए गए हैं, वे केवल न्याय, ताड़ना, काट-छाँट और सभी प्रकार के शोधन से गुजरने के बाद सचमुच ही समर्पणशील होते हैं। इन लोगों का विश्वास कल्पित नहीं, बल्कि व्यावहारिक है। उन्होंने कोई संकेत और चमत्कार या कोई अचंभा नहीं देखा है; वे ऊँचे शब्द और धर्म-सिद्धांत कहने या गहन अंतर्दृष्टियों को व्यक्त करने में सक्षम नहीं हैं; इसके बजाय, उनके पास वास्तविकता है और परमेश्वर के वचन हैं और परमेश्वर का व्यावहारिक और सच्चा ज्ञान है। क्या ऐसा समूह परमेश्वर के महान सामर्थ्य को प्रकट करने में अधिक सक्षम नहीं है? अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का कार्य व्यावहारिक कार्य है। यीशु के युग के दौरान, वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए नहीं, बल्कि छुटकारा दिलाने के लिए आया, और इसलिए उसने लोगों से अपना अनुसरण करवाने के लिए कुछ चमत्कार प्रदर्शित किए। क्योंकि वह मुख्य रूप से सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा करने आया था, और संकेत दिखाना उसकी सेवकाई का हिस्सा नहीं था। इस प्रकार के संकेत और चमत्कार ऐसे कार्य थे, जो उसके कार्य को कारगर बनाने के लिए किए गए थे; वे अतिरिक्त कार्य थे, और संपूर्ण युग के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। पुराने विधान के व्यवस्था के युग के दौरान भी परमेश्वर ने कुछ संकेत और चमत्कार दिखाए—किंतु आज परमेश्वर जो कार्य करता है, वह व्यावहारिक कार्य है, और वह अब निश्चित रूप से संकेत और चमत्कार नहीं दिखाएगा। यदि उसने संकेत और चमत्कार दिखाए, तो उसका व्यावहारिक कार्य अस्तव्यस्त हो जाएगा, और वह कोई और कार्य करने में असमर्थ होगा। यदि परमेश्वर कहता कि वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचन का उपयोग करेगा, लेकिन साथ ही संकेत और चमत्कार भी दिखाता, तो क्या इससे यह प्रकट हो पाता कि मनुष्य वास्तव में उस पर विश्वास करता है या नहीं? इसलिए परमेश्वर इस तरह की चीजें नहीं करता। मनुष्य के भीतर धर्म की अतिशय बातें हैं; अंत के दिनों में परमेश्वर मनुष्य के भीतर से सभी धार्मिक धारणाओं और अलौकिक बातों को बाहर निकालने, मनुष्य को परमेश्वर की व्यावहारिकता का ज्ञान कराने और परमेश्वर की वह छवि हटाने के लिए आया है, जो अज्ञात और काल्पनिक है और कहा जा सकता है कि उसका अस्तित्व ही नहीं है। और इसलिए, अब तुम्हारे लिए जो एकमात्र बहुमूल्य चीज है, वह है व्यावहारिकता का ज्ञान होना! सत्य सभी चीजों पर प्रबल है। आज तुम्हारे पास कितना सत्य है? क्या वे सब, जो संकेत और चमत्कार दिखाते हैं, परमेश्वर हैं? दुष्टात्माएँ भी संकेत और चमत्कार दिखा सकती हैं; तो क्या वे सब परमेश्वर हैं? परमेश्वर पर अपने विश्वास में मनुष्य जिसे खोजता है वह सत्य है, और वह जिसका अनुसरण करता है वह संकेतों और चमत्कारों के बजाय, जीवन है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन सबका यही लक्ष्य होना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब कुछ पूरा हो जाता है
अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों का गहन-विश्लेषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर के प्रति समर्पण किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता जीनी चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभावों पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य परमेश्वर को कैसे अस्वीकार करता है, और भी अधिक इस तथ्य को उजागर करने पर केंद्रित हैं कि मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध एक विरोधी शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर कुछ वचनों में मनुष्य की प्रकृति को पूरी तरह नहीं समझाता है; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर और काट-छाँट करने की इन विभिन्न विधियों को साधारण वचनों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; बल्कि उजागर और काट-छाँट करने के इस कार्य को करने में उस सत्य का उपयोग किया जाता है जो मनुष्य के पास बिल्कुल भी नहीं होता है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य की समझ पैदा करने का काम करता है। न्याय के कार्य ने मनुष्य को परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों के बारे में काफी समझ प्राप्त करने में सक्षम बनाया है जो उसकी समझ से परे होते हैं। इसने मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार और अपनी भ्रष्टता की जड़ को समझने और जानने, साथ ही अपने कुरूप चेहरे का पता लगाने में सक्षम बनाया है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन को उन सभी के लिए उद्घाटित करने का कार्य है जो उसमें आस्था रखते हैं। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है
इस युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किया जाने वाला कार्य मुख्य रूप से मनुष्य के लिए जीवन के वचनों का पोषण देना; मनुष्य के प्रकृति सार और भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करना; और उसकी धर्म संबंधी धारणाओं, सामंती सोच, पुरानी पड़ चुकी सोच और ज्ञान और संस्कृति को मिटाना है। ये सभी चीजें परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किए जाने के माध्यम से शुद्ध की जानी चाहिए। अंत के दिनों में, मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर चिह्नों और चमत्कारों का नहीं, वचनों का उपयोग करता है। वह मनुष्य को प्रकट करने, उसका न्याय करने, उसे ताड़ना देने और उसे पूर्ण बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है, ताकि परमेश्वर के वचनों में मनुष्य परमेश्वर की बुद्धि और मनोहरता देखने लगे, और परमेश्वर के स्वभाव को समझने लगे, और ताकि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के कर्मों को निहारे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान
अंत के दिनों के कार्य में वचनों की शक्ति चिह्नों और चमत्कारों के प्रदर्शन की शक्ति से कहीं अधिक है और वचन का अधिकार चिह्नों और चमत्कारों के अधिकार से कहीं बढ़कर है। वचन मनुष्य के हृदय में गहरे दबे सभी भ्रष्ट स्वभावों को उजागर कर देता है। तुम्हारे पास उनका खुद एहसास करने का कोई उपाय नहीं है। जब उन्हें वचन के माध्यम से उजागर किया जाता है, तो तुम स्वाभाविक रूप से उनका एहसास कर लोगे; तुम्हें उन्हें स्वीकारना होगा और तुम पूरी तरह से आश्वस्त हो जाओगे। क्या यह वचन का अधिकार नहीं है? यह आज वचन के कार्य द्वारा प्राप्त किया जाने वाला परिणाम है। इसलिए, बीमारी की चंगाई और दुष्टात्माओं को निकालने से मनुष्य को उसके पापों से पूरी तरह से नहीं बचाया जा सकता, न ही चिह्नों और चमत्कारों के प्रदर्शन से उसे पूरी तरह से पूर्ण किया जा सकता है। चंगाई करने और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार मनुष्य को केवल अनुग्रह प्रदान करता है, किंतु मनुष्य की देह अभी भी शैतान की है और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव अभी भी मनुष्य के भीतर बने हुए हैं। दूसरे शब्दों में, जिस मनुष्य को शुद्ध नहीं किया गया है, वह अभी भी पाप और गंदगी का है। केवल वचन के माध्यम से शुद्ध किए जाने के बाद ही मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया और पावनीकृत किया जा सकता है। जब मनुष्य के भीतर से दुष्टात्माओं को निकाला गया और उसे छुटकारा दिलाया गया, तो इसका अर्थ केवल इतना था कि उसे शैतान के हाथ से छीनकर परमेश्वर को लौटा दिया गया है। किंतु मनुष्य अभी तक परमेश्वर द्वारा शुद्ध नहीं किया गया या बदला नहीं गया है और वह भ्रष्ट बना हुआ है। मनुष्य के भीतर अब भी गंदगी, प्रतिरोध और विद्रोहशीलता मौजूद है; मनुष्य केवल परमेश्वर के छुटकारे के माध्यम से ही उसके पास लौटा है, किंतु उसे परमेश्वर का जरा-सा भी ज्ञान नहीं है और वह अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने और उसके साथ विश्वासघात करने में सक्षम है। मनुष्य को छुटकारा दिलाए जाने से पहले उसके अंदर शैतान के बहुत-से जहर पहले ही डाल दिए गए थे और हजारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद उसके भीतर एक ऐसी प्रकृति है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। इसलिए जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया तो यह छुटकारे के मामले से बढ़कर कुछ नहीं था। यानी मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर वापस खरीदा गया, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति नहीं हटाई गई। मनुष्य, जो इतना गंदा है, को परमेश्वर की सेवा करने योग्य होने से पहले परिवर्तन से होकर गुजरना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह जान जाएगा और वह पूरी तरह बदल पाएगा और शुद्ध हो पाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने योग्य हो सकता है। सारा वर्तमान कार्य इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य को शुद्ध किया और बदला जा सके; ऐसा इसलिए है ताकि वचन के न्याय और ताड़ना के माध्यम से और शोधन के जरिये मनुष्य अपनी भ्रष्टता छोड़ सके और शुद्ध किया जा सके। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय के कार्य का चरण भी है और साथ ही उद्धार-कार्य का दूसरा चरण भी है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाता है, और वचन द्वारा शोधन, न्याय और उजागर किए जाने से ही मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताएँ, धारणाएँ, मंशाएँ और व्यक्तिगत आशाएँ पूरी तरह से प्रकट होती हैं। हालाँकि मनुष्य को छुटकारा दिलाया जा चुका है और उसके पाप क्षमा किए जा चुके हैं, फिर भी इसे केवल इस तरह समझा जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता और उसके साथ उसके अपराधों के अनुसार व्यवहार नहीं करता। लेकिन मनुष्य पाप से मुक्त हुए बिना देह में रहता है और केवल पाप करता रह सकता है और निरंतर अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप करने और क्षमा किए जाने का एक अंतहीन चक्र। अधिकतर लोग दिन में पाप करते हैं और शाम को उन्हें स्वीकार करते हैं। और इसलिए, हालाँकि पाप-बलि मनुष्य के लिए हमेशा के लिए प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से नहीं बचा सकती। उद्धार का केवल आधा कार्य पूरा हुआ है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव हैं। ... मनुष्य के लिए अपने पापों से अवगत होना आसान नहीं है और उसके पास अपनी गहरी जमी हुई प्रकृति को पहचानने का कोई उपाय नहीं है। यह परिणाम केवल वचनों के न्याय के जरिये प्राप्त किया जा सकता है। केवल इसी प्रकार मनुष्य इस बिंदु से आगे धीरे-धीरे बदल सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)
अंत के दिनों का कार्य वचन बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने से इन लोगों में अब जो परिवर्तन हुए हैं, वे उन परिवर्तनों से बहुत अधिक बड़े हैं, जो संकेत और चमत्कार स्वीकार करने से अनुग्रह के युग में लोगों में हुए थे। क्योंकि अनुग्रह के युग में हाथ रखकर और प्रार्थना करके दुष्टात्माओं को मनुष्य से निकाला जाता था, परंतु मनुष्य के भीतर भ्रष्ट स्वभाव तब भी बने रहते थे। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा कर दिया जाता था और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते थे, किंतु जहाँ तक यह प्रश्न है कि मनुष्य अपने भीतर के शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को कैसे छोड़ सकता है, तो उस पर अभी यह कार्य किया जाना बाकी था। मनुष्य को सिर्फ उसकी आस्था के कारण छुटकारा दिया गया था और उसके पाप क्षमा किए गए थे, किंतु मनुष्य की पापी प्रकृति नहीं मिटाई गई थी और वह अब भी उसके भीतर बनी हुई थी। मनुष्य के पाप परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से क्षमा कर दिए गए थे, परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य के भीतर अब पाप नहीं रहा था। मनुष्य के पाप पाप-बलि के माध्यम से क्षमा किए जा सकते थे, लेकिन जहाँ तक यह बात है कि मनुष्य को अब पाप न करने वाला कैसे बनाया जा सकता है, उसके भ्रष्ट स्वभावों और पापी प्रकृति को पूरी तरह से कैसे त्यागा जा सकता है और उसके जीवन स्वभाव को कुछ हद तक कैसे बदला जा सकता है, उसके पास इस समस्या को हल करने का कोई तरीका नहीं है। मनुष्य के पाप क्षमा कर दिए गए हैं और यह परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य के कारण है, लेकिन मनुष्य अभी भी अपने पुराने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों में ही जी रहा है। ऐसे में मनुष्य को उसके शैतानी भ्रष्ट स्वभावों से पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए, उसकी पापी प्रकृति पूरी तरह से त्याग दी जानी चाहिए, ताकि वह फिर कभी विकसित न हो, और उसके स्वभाव में रूपांतरण होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य जीवन में संवृद्धि के मार्ग को समझे, जीवन का मार्ग समझे और अपने स्वभाव को बदलने का तरीका समझे। साथ ही, इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है, ताकि धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदल सके और वह रोशनी की चमक में जी सके, ताकि वह जो कुछ भी करे वह परमेश्वर के इरादों के अनुसार हो, ताकि वह अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ सके और शैतान के अंधकार के प्रभाव से आजाद हो सके और परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह उबर सके। केवल तभी मनुष्य ने पूर्ण उद्धारकारी अनुग्रह प्राप्त किया होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)
परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य इसलिए करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर के बारे में ज्ञान प्राप्त कर सके; साथ ही, वह अपनी गवाही की खातिर ऐसा करता है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रति परमेश्वर के न्याय के बिना मनुष्य उसके धार्मिक स्वभाव को बिल्कुल नहीं जान सकता था, जो किसी अपमान को सहन नहीं करता, न ही मनुष्य परमेश्वर के बारे में अपने पुराने ज्ञान को एक नए ज्ञान में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है; इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के जरिए, वह मनुष्य को परमेश्वर से जुड़े ज्ञान तक पहुँचने, अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने और परमेश्वर के लिए जबरदस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का परिवर्तन परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके इरादों के अनुरूप बनने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन दर्शाता है कि मनुष्य को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त करा दिया गया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हैं