8. हम मानते हैं कि प्रभु यीशु उद्धारकर्ता है क्योंकि उसने हमारे पापों को क्षमा किया और हमें हमारे पापों से छुटकारा दिलाया। अब आप गवाही देते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंतिम दिनों का मसीह है, उद्धारकर्ता का प्रकटन है, वह सत्य को व्यक्त कर रहा है, और इंसान को पूरी तरह से शुद्ध करने और उसे बचाने के लिए, इंसान को शैतान के बुरे प्रभाव से मुक्त करने के लिए, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कैसे मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध करता और बचाता है?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
वर्तमान देहधारण में परमेश्वर का कार्य मुख्य रूप से ताड़ना और न्याय के द्वारा अपने स्वभाव को व्यक्त करना है, और इसी आधार पर मनुष्य तक अधिक सत्य पहुँचाना और उसे अभ्यास करने के और अधिक तरीके बताना है और ऐसा करके मनुष्य को जीतने और उसे उसके भ्रष्ट स्वभावों से बचाने का अपना उद्देश्य हासिल करना है। यही वह चीज है जो राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के पीछे निहित है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना
अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों का गहन-विश्लेषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर के प्रति समर्पण किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता जीनी चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभावों पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य परमेश्वर को कैसे अस्वीकार करता है, और भी अधिक इस तथ्य को उजागर करने पर केंद्रित हैं कि मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध एक विरोधी शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर कुछ वचनों में मनुष्य की प्रकृति को पूरी तरह नहीं समझाता है; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर और काट-छाँट करने की इन विभिन्न विधियों को साधारण वचनों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; बल्कि उजागर और काट-छाँट करने के इस कार्य को करने में उस सत्य का उपयोग किया जाता है जो मनुष्य के पास बिल्कुल भी नहीं होता है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य की समझ पैदा करने का काम करता है। न्याय के कार्य ने मनुष्य को परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों के बारे में काफी समझ प्राप्त करने में सक्षम बनाया है जो उसकी समझ से परे होते हैं। इसने मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार और अपनी भ्रष्टता की जड़ को समझने और जानने, साथ ही अपने कुरूप चेहरे का पता लगाने में सक्षम बनाया है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन को उन सभी के लिए उद्घाटित करने का कार्य है जो उसमें आस्था रखते हैं। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है
परमेश्वर द्वारा मनुष्य की पूर्णता किन साधनों से संपन्न होती है? वह परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से संपन्न होती है। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, कोप, प्रताप, न्याय और शाप शामिल हैं और वह मनुष्य को मुख्य रूप से अपने न्याय के माध्यम से पूर्ण बनाता है। कुछ लोग समझते नहीं हैं और पूछते हैं, ऐसा क्यों है कि परमेश्वर केवल न्याय और शाप के जरिए ही मनुष्य को पूर्ण बना सकता है। वे कहते हैं, “यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर को मनुष्य का न्याय करना पड़े तो क्या मनुष्य को दोषी नहीं ठहराया जाएगा? तो फिर भी वह पूर्ण कैसे बनाया जा सकता है?” ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर जिस चीज को शाप देता है वह है मनुष्य की विद्रोहशीलता और वह जिस चीज का न्याय करता है वे हैं मनुष्य के पाप। यूँ तो वह कठोरतापूर्वक बोलता है और मनुष्य की भावनाओं का बिल्कुल भी लिहाज नहीं करता है और वह सब उजागर करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, कुछ कठोर वचनों के जरिए वह सब उजागर करता है जो मनुष्य के भीतर सारभूत है, ऐसे न्याय के जरिए वह मनुष्य को देह के सार का गहन ज्ञान प्रदान करता है और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष समर्पण कर देता है। मनुष्य की देह पाप की है और शैतान की है, यह विद्रोही है और यह परमेश्वर की ताड़ना का पात्र है। इसलिए मनुष्य को खुद को जानने देने के लिए उस पर परमेश्वर के न्याय के वचन आने ही चाहिए और सभी प्रकार के शोधन का प्रयोग किया जाना चाहिए; तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावी हो सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो
परमेश्वर चाहे मनुष्य का न्याय करे या उसे शाप दे, ये दोनों ही मनुष्य को पूर्ण बनाते हैं : दोनों का उपयोग मनुष्य के भीतर जो अशुद्ध है, उसे पूर्ण बनाने के लिए किया जाता है। इस उपाय से मनुष्य का शोधन किया जाता है, और मनुष्य के भीतर जो कमी है, उसे परमेश्वर के वचनों और कार्य के द्वारा पूर्ण किया जाता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम—चाहे वे कठोर वचन हों या न्याय या ताड़ना—मनुष्य को पूर्ण बनाता है और बिल्कुल उचित होता है। युगों-युगों और पीढ़ियों से कभी परमेश्वर ने ऐसा कार्य नहीं किया है; आज वह तुम लोगों पर कार्य करता है और ऐसा करता है कि तुम लोग उसकी बुद्धि को पूरी तरह समझने लगो। यद्यपि तुम लोगों ने अंदर से कुछ कष्ट सहा है, फिर भी तुम्हारे हृदय हमेशा सुकून और शांति महसूस करते हैं; यह तथ्य कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के इस चरण का आनंद लेने में सक्षम हो, तुम लोगों का सौभाग्य है। भविष्य में तुम चाहे जो भी प्राप्त करने में सक्षम हो, तुम देखते हो कि आज तुम लोगों पर परमेश्वर का सारा कार्य प्रेम है। यदि मनुष्य परमेश्वर के न्याय और शोधन का अनुभव नहीं करता, केवल बाहरी तौर पर चीजें करता है और बाहरी उत्साह दिखाता है जबकि उसका स्वभाव कभी नहीं बदलता, तो क्या इसे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया गया माना जाता है? आज, यद्यपि मनुष्य के भीतर अभी भी बहुत-कुछ ऐसा है जो घमंडी है, फिर भी मनुष्य का स्वभाव पहले की तुलना में बहुत ज्यादा स्थिर है। तुम्हारे प्रति परमेश्वर की काट-छाँट तुम्हें बचाने के लिए है, और यद्यपि तुम उस समय कुछ पीड़ा महसूस करो, फिर भी जब वह दिन आएगा जब तुम्हारा स्वभाव बदलेगा, तब तुम पीछे मुड़कर देखने पर पाओगे कि परमेश्वर का कार्य कितना बुद्धिमत्तापूर्ण है, और उस समय तुम परमेश्वर का इरादा सही मायने में समझ पाओगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो
यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते हो, तो तुम परीक्षणों के दौरान निश्चित रूप से गिर जाओगे, क्योंकि तुम इस बात से अनजान हो कि परमेश्वर लोगों को पूर्ण कैसे बनाता है, वह किन साधनों से उन्हें पूर्ण बनाता है, और जब परमेश्वर के परीक्षण तुम्हारे ऊपर आएँगे और वे तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाएँगे तो तुम अडिग नहीं रह पाओगे। परमेश्वर का सच्चा प्रेम उसका संपूर्ण स्वभाव है और जब परमेश्वर का संपूर्ण स्वभाव लोगों को प्रकट होता है तो यह उनकी देह पर क्या लाता है? जब परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव लोगों को प्रकट होता है तो उनकी देह अपरिहार्य रूप से अत्यधिक पीड़ा भुगतेगी। यदि तुम इस पीड़ा को नहीं भुगतते हो तो तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, न ही तुम परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम अर्पित कर पाओगे। यदि परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाता है तो उसे तुम्हारे सामने अपना संपूर्ण स्वभाव प्रकट करना होगा। सृष्टि की रचना के समय से आज तक परमेश्वर ने अपना संपूर्ण स्वभाव मनुष्य को कभी प्रकट नहीं किया है—किंतु अंत के दिनों के दौरान वह इसे लोगों के इस समूह के सामने प्रकट करता है जिसे उसने पूर्वनियत किया और चुना है और लोगों को पूर्ण करके वह अपना स्वभाव प्रकट करता है, जिसके माध्यम से वह लोगों के एक समूह को पूर्ण करता है। लोगों के लिए परमेश्वर का सच्चा प्रेम ऐसा है। परमेश्वर के सच्चे प्रेम को अनुभव करना यह माँग करता है कि लोग अत्यंत पीड़ा सहें और एक ऊँची कीमत चुकाएँ। केवल तभी लोग अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं और आखिरकार परमेश्वर को अपना सच्चा प्रेम वापस दे पाएँगे और केवल तभी परमेश्वर का हृदय संतुष्ट होगा। यदि लोग परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और यदि वे उसकी इच्छा के अनुसार चलना चाहते हैं और यदि वे अपना सच्चा प्रेम पूरी तरह परमेश्वर को सौंपना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी परिस्थितियों से बहुत अधिक पीड़ा और बहुत सारी यंत्रणाओं का अनुभव करना होगा, इस प्रकार उन्हें मृत्यु के कगार पर लाए जाने जैसी पीड़ा भोगनी होगी, जिससे अंततः वे अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को लौटाने के लिए बाध्य होंगे। कोई व्यक्ति परमेश्वर से सचमुच प्रेम करता है कि नहीं यह पीड़ा भोगने और शोधन के दौरान प्रकट होता है। लोगों के प्रेम का परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण भी केवल पीड़ा भोगने और शोधन के जरिए संपन्न होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है
परमेश्वर के पास मनुष्य को पूर्ण बनाने के अनेक साधन हैं। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों की काट-छाँट करने के लिए परमेश्वर समस्त प्रकार के परिवेशों का उपयोग करता है और मनुष्य को बेनकाब करने के लिए विभिन्न चीजों का उपयोग करता है; एक ओर वह मनुष्य की काट-छाँट करता है, दूसरी ओर वह मनुष्य को बेनकाब करता है और तीसरी ओर वह मनुष्य को उजागर करता है, उसके हृदय की गहराइयों में स्थित “रहस्यों” को खोदकर निकालता है, उजागर करता है और मनुष्य की अनेक दशाओं को उजागर करके उसकी प्रकृति दिखाता है। परमेश्वर मनुष्य को अनेक विधियों से पूर्ण बनाता है—प्रकाशन द्वारा, मनुष्य की काट-छाँट करके, मनुष्य के शोधन द्वारा और ताड़ना द्वारा—जिससे मनुष्य जान सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं
जो कार्य अब किया जा रहा है, वह लोगों से शैतान और अपने पूर्वज के खिलाफ विद्रोह करने के लिए किया जा रहा है। वचन के द्वारा सभी न्यायों का उद्देश्य लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करना और उन्हें जीवन का सार समझने में सक्षम बनाना है। ये बार-बार के न्याय लोगों के हृदयों को बेध देते हैं। प्रत्येक न्याय सीधे उनके भाग्यों से संबंधित होता है और उनके हृदयों को घायल करने के लिए होता है, ताकि वे उन सभी बातों को जाने दें और फलस्वरूप जीवन के बारे में जान जाएँ, इस गंदी दुनिया को जान जाएँ, परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को जान जाएँ, और मानवजाति को भी जान जाएँ, जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है। जितना अधिक इस प्रकार की ताड़ना और न्याय होता है, उतना ही अधिक मनुष्य का हृदय घायल किया जा सकता है और उतना ही अधिक उसकी आत्मा को जगाया जा सकता है। इस प्रकार के न्याय का लक्ष्य इन अत्यधिक भ्रष्ट और सबसे अधिक गहराई से भ्रमित लोगों की आत्माओं को जगाना है। मनुष्य के पास कोई आत्मा नहीं है, अर्थात् उसकी आत्मा बहुत पहले ही मर गई और वह नहीं जानता है कि स्वर्ग है, नहीं जानता कि परमेश्वर है, और निश्चित रूप से नहीं जानता कि वह मौत की अतल खाई में संघर्ष कर रहा है; वह संभवतः कैसे जान सकता है कि वह इस बुरे मानवीय नरक में जी रहा है? वह संभवतः कैसे जान सकता है कि उसका यह सड़ा हुआ शव शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मृत्यु के रसातल में गिर गया है? वह संभवतः कैसे जान सकता है कि पृथ्वी पर सभी चीजें मानवजाति द्वारा बहुत पहले ही इतनी बरबाद कर दी गई हैं कि अब सुधारी नहीं जा सकतीं? और वह संभवतः कैसे जान सकता है कि आज सृष्टिकर्ता पृथ्वी पर आया है और भ्रष्ट किए गए लोगों के एक समूह की तलाश कर रहा है, जिसे वह बचा सके? भले ही मनुष्य ने हर संभव शोधन और न्याय का अनुभव किया है, उसकी संवेदनहीन चेतना पूरी तरह से अचल रही है और लगभग प्रतिक्रियाहीन है। मनुष्य कितना पतित है! और यद्यपि इस प्रकार का न्याय आसमान से गिरने वाले क्रूर ओलों के समान है, फिर भी वह मनुष्य के लिए सर्वाधिक लाभप्रद है। इस तरह से लोगों का न्याय किए बिना नतीजा हासिल नहीं किया जा सकता और लोगों को दुःख की अतल खाई से बचाना नितांत असंभव होगा। इस तरह कार्य किए बिना तो लोगों का रसातल से बाहर निकलना बहुत कठिन होगा, क्योंकि उनके हृदय बहुत पहले ही मर चुके हैं और उनकी आत्माओं को शैतान द्वारा बहुत पहले ही कुचल दिया गया है। पतन की गहराइयों में डूब चुके तुम लोगों को बचाने के लिए तुम्हें हर प्रयास कर पुकारने और तुम्हारा न्याय करने की आवश्यकता है; केवल तभी तुम लोगों के जमे हुए हृदयों को जगाया जा सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है
तुझे यह जानना चाहिए कि परमेश्वर का मनुष्य को पूर्ण बनाना, उसे पूर्ण करना और उसे प्राप्त करना, उसकी देह पर तलवारों और प्रहारों के साथ-साथ अंतहीन पीड़ा और आग से जलन, निष्ठुर न्याय, ताड़ना, शाप और असीम परीक्षणों के सिवाय कुछ नहीं लाता है। मानव का प्रबंधन करने के कार्य की वास्तविक कहानी और सच्चाई ऐसी है। किंतु इन सारी चीजों का निशाना मनुष्य की देह पर लगा हुआ है और शत्रुता के सारे तीरों का लक्ष्य निर्दयतापूर्वक मनुष्य की देह है (क्योंकि मनुष्य निर्दोष है)। यह सब परमेश्वर की महिमा और गवाही के लिए और उसके प्रबंधन के लिए है। इसका कारण यह है कि उसका कार्य केवल मानव-जाति के लिए नहीं है, बल्कि पूरी योजना के लिए भी है और साथ ही मानव-जाति के सृजन के समय का उसका मूल इरादा पूरा करने के लिए भी है। इसलिए, मनुष्य जो अनुभव करता है, उसका शायद नब्बे प्रतिशत पीड़ा और अग्नि-परीक्षण ही है और वे मीठे और सुखद दिन बहुत कम हैं या बिल्कुल नहीं हैं, जिनके लिए मनुष्य की देह लालायित रही है। परमेश्वर के साथ खूबसूरत समय बिताकर देह में सुखद पलों का आनंद लेना तो मनुष्य के लिए और भी असंभव है। देह मलिन है, इसलिए मनुष्य की देह जिस चीज को देखती या उसका आनंद लेती है, वह परमेश्वर की ताड़ना के अलावा और कुछ नहीं है, जिसे मनुष्य अपनी भावनाओं का लिहाज न रखने वाली समझता है, मानो उसमें सामान्य समझ की कमी हो। इसका कारण यह है कि परमेश्वर अपने धार्मिक स्वभाव को प्रकट करेगा, जो “मनुष्य की भावनाओं का लिहाज न रखने वाला” है, जो मनुष्य के अपमानों को बरदाश्त नहीं करता और दुश्मनों से घृणा करता है। परमेश्वर किसी भी आवश्यक तरीके से खुले तौर पर अपना संपूर्ण स्वभाव प्रकट करता है और इस तरह शैतान के साथ अपने छह-हजार-वर्षीय युद्ध का कार्य पूरा करता है—जो संपूर्ण मानव-जाति के उद्धार और पुराने शैतान के विनाश का कार्य है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मानव-जाति के प्रबंधन का उद्देश्य
परमेश्वर का प्रत्येक वचन हमारे मर्मस्थलों पर चोट करता है; यह हमें आहत करता है और हमारे अंदर गहरा भय पैदा करता है। वह हमारी धारणाओं, कल्पनाओं और हमारे भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करता है। हमारे प्रत्येक शब्द, क्रियाकलाप और हमारी प्रत्येक गतिविधि से लेकर हमारे सभी विचारों और दृष्टिकोणों तक हमारा प्रकृति सार उसके वचनों में प्रकट होता है, जो हमें भय और सिहरन की स्थिति में डाल देता है और हम कहीं मुँह छिपाने लायक नहीं रहते। वह एक-एक करके हमें हमारे समस्त क्रियाकलापों, लक्ष्यों और इरादों, यहाँ तक कि हमारे उन भ्रष्ट स्वभावों के बारे में भी बताता है जिन्हें हम खुद भी कभी नहीं जान पाए थे; वह हमें हमारी संपूर्ण अधम अपूर्णता में उजागर होने, यहाँ तक कि पूर्णतः जीत लिए जाने का एहसास कराता है। वह हमारा न्याय करता है क्योंकि हमने उसका विरोध किया, वह हमें ताड़ना देता है क्योंकि हमने उसकी ईशनिंदा की और उसकी निंदा की, वह हमें यह एहसास कराता है कि उसकी नज़र में हमारे अंदर कोई भी सराहनीय गुण नहीं है और हम जीते-जागते शैतान हैं। हमारी आशाएँ चूर-चूर हो जाती हैं; हम उससे अब कोई अतिवादी माँग करने या कोई आकांक्षा रखने का साहस नहीं करते, यहाँ तक कि हमारे स्वप्न भी रातोंरात नष्ट हो जाते हैं। यह वह तथ्य है जिसकी हममें से कोई कल्पना नहीं कर सकता और जिसे हममें से कोई स्वीकार नहीं कर सकता। पल भर के अंतराल में, हम अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं और समझ नहीं पाते कि आगे के मार्ग पर कैसे बढ़ें या अपने विश्वास को कैसे जारी रखें। ऐसा लगता है कि हमारी आस्था वापस प्रारंभिक बिंदु पर पहुँच गई है और मानो हम कभी प्रभु यीशु से मिले ही नहीं या उसे जानते ही नहीं। हमारी आँखों के सामने हर चीज हमें पेचीदगी से भर देती है और अनिर्णय से डगमगा देती है। हम हताश हो जाते हैं, हम निराश हो जाते हैं और हमारे दिलों की गहराई में अदम्य क्रोध और अपमान भर जाता है। हम अपने मन की भड़ास निकालने का प्रयास करते हैं, कोई रास्ता खोजने की कोशिश करते हैं और इतना ही नहीं, अपने उद्धारकर्ता यीशु की प्रतीक्षा करते रहते हैं, ताकि उसके सामने अपने दिलों को उड़ेल सकें। यद्यपि कई बार हम बाहर से न तो घमंडी, न ही विनम्र दिखाई देते हैं, फिर भी अपने दिलों में हमें खोने का एहसास होता है, जिसका अनुभव हमने पहले कभी नहीं किया। यद्यपि कभी-कभी हम बाहरी तौर पर असामान्य रूप से शांत दिखाई दे सकते हैं, किंतु हमारा मन किसी तूफानी समुद्र की तरह पीड़ा से क्षुब्ध होता है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें हमारी सभी आशाओं और स्वप्नों से वंचित कर दिया है, और हमारी अनावश्यक इच्छाओं का अंत कर दिया है और हम यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि वह हमारा उद्धारकर्ता है और हमें बचाने में सक्षम है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमारे और उसके बीच एक खाई पैदा कर दी है, जो इतनी गहरी है कि कोई भी उसे पार करने को तैयार नहीं है। उसके न्याय और ताड़ना के कारण हमने अपने जीवन में पहली बार इतना बड़ा आघात, इतना बड़ा अपमान झेला है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें परमेश्वर के आदर को और मनुष्य के अपराध के प्रति उसकी असहिष्णुता को वास्तव में महसूस कराया है, जिसकी तुलना में हम अत्यधिक नीच, अत्यधिक गंदे हैं। उसके न्याय और ताड़ना ने पहली बार हमें हमारे अभिमान और दंभ से अवगत कराया है और यह भी कि कैसे मनुष्य कभी परमेश्वर की बराबरी नहीं करेगा या कैसे उसकी तुलना परमेश्वर से नहीं हो सकती। उसके न्याय और ताड़ना ने हमारे भीतर छटपटाहट भरी है कि हम अब और ऐसे भ्रष्ट स्वभावों में न जिएँ, जल्द से जल्द इस प्रकृति सार से पीछा छुड़ाएँ, उसकी बेइंतहा नफरत और घृणा का पात्र बनना बंद करें। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें उसके वचनों के प्रति समर्पण करने और उनका पालन करने, उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के खिलाफ अब और विद्रोह न करने का इच्छुक बनाया है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें एक बार फिर जीवित रहने की इच्छा दी है और उसे अपना उद्धारकर्ता सहर्ष स्वीकार करने की भावना दी है...। हम विजय के कार्य से, नरक से, मृत्यु की छाया की घाटी से बाहर आ गए हैं...। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने हमें, लोगों के इस समूह को प्राप्त कर लिया है! उसने शैतान पर विजय पाई है और अपने असंख्य शत्रुओं को पराजित कर दिया है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 4 : परमेश्वर के प्रकटन को उसके न्याय और ताड़ना में देखना