9. इस्राएलियों ने पीढ़ी दर पीढ़ी यहोवा पर विश्‍वास किया है, और प्रभु यीशु पर विश्‍वास करने वाले लोग पूरी दुनिया में पाए जा सकते हैं। चूँकि यहोवा, प्रभु यीशु, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक ही परमेश्वर हैं, आप यह क्यों कहते हैं कि चाहे लोग यहोवा या यीशु पर विश्वास करें, यदि वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंतिम दिनों के न्याय के कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, तो उन्हें हटा दिया जाएगा?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

चूँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए उसे परमेश्वर के हर पदचिह्न का निकटता से अनुसरण करना चाहिए; और उसे “जहाँ कहीं मेमना जाता है उसका अनुसरण करना” चाहिए। जो लोग ऐसा करते हैं, केवल वे ही सचमुच सच्चे मार्ग की खोज करते हैं, वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को जानते हैं। जो लोग हठपूर्वक शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से चिपके रहते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा हटा दिया गया है। प्रत्येक समयावधि में परमेश्वर नया कार्य आरंभ करेगा और प्रत्येक अवधि में मनुष्य के बीच एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल इन सत्यों का ही पालन करता है कि “यहोवा परमेश्वर है” और “यीशु मसीह है,” जो ऐसे सत्य हैं जिनमें से हर एक केवल एक युग पर ही लागू होता है, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा और वह हमेशा के लिए पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा। परमेश्वर चाहे कैसे भी कार्य करता हो, यदि मनुष्य बिना किसी संदेह के अनुसरण करता है और वह निकटता से अनुसरण करता है, तो फिर पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य को कैसे निकाला जा सकता है? परमेश्वर चाहे जो भी करे, जब तक मनुष्य निश्चित है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य के साथ सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दंड दिया जा सकता है? परमेश्वर का कार्य कभी नहीं रुका है, उसके कदम कभी नहीं थमे हैं, और अपने प्रबंधन-कार्य की पूर्णता से पहले वह सदैव व्यस्त रहा है और कभी नहीं रुकता। किंतु मनुष्य अलग है : पवित्र आत्मा के कार्य का थोड़ा-सा अंश प्राप्त करने के बाद वह उसके साथ इस तरह व्यवहार करता है मानो वह कभी नहीं बदलेगा; जरा-सा ज्ञान प्राप्त करने के बाद वह परमेश्वर के नए कार्य के पदचिह्नों का अनुसरण करने के लिए आगे नहीं बढ़ता; परमेश्वर के कार्य का थोड़ा-सा ही अंश देखने के बाद वह तुरंत ही परमेश्वर को लकड़ी की एक विशिष्ट आकृति के होने में सीमित कर देता है और यह मानता है कि परमेश्वर सदैव इसी छवि में बना रहेगा जिसे वह देखता है, कि यह अतीत में भी ऐसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही रहेगा; सिर्फ थोड़ा-सा सतही स्तर का ज्ञान प्राप्त करने के बाद मनुष्य इतना घमंडी हो जाता है कि स्वयं को भूल जाता है और परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व के बारे में बेहूदा ढंग से घोषणा करने लगता है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं होता; और पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण के बारे में निश्चित हो जाने के बाद परमेश्वर के नए कार्य की घोषणा करने वाला व्यक्ति चाहे किसी भी प्रकार का क्यों न हो, मनुष्य उस नए कार्य को स्वीकार नहीं करता। इस तरह के लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं कर सकते; वे बहुत रूढ़िवादी हैं और नई चीजों को स्वीकार करने में अक्षम हैं। ये वे लोग हैं, जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं, किंतु परमेश्वर को अस्वीकार भी करते हैं। मनुष्य का मानना है कि इस्राएलियों का “केवल यहोवा में विश्वास करना और यीशु में विश्वास न करना” ग़लत था, किंतु अधिकतर लोग ऐसी ही भूमिका निभाते हैं, जिसमें वे “केवल यहोवा में विश्वास करते हैं और यीशु को अस्वीकार करते हैं” और “मसीहा के लौटने की लालसा करते हैं, किंतु उस मसीहा का विरोध करते हैं जिसे यीशु कहते हैं।” तो कोई आश्चर्य नहीं कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण को स्वीकार करने के पश्चात् अभी भी शैतान की सत्ता के अधीन जीते हैं, और अभी भी परमेश्वर के आशीष प्राप्त नहीं करते। क्या यह मनुष्य की विद्रोहशीलता का परिणाम नहीं है? दुनिया भर में ईसाई धर्म के सभी लोग, जिन्होंने आज के नए कार्य के साथ कदम नहीं मिलाया है, यह मानते हुए कि परमेश्वर उनकी संबंधित इच्छाएँ पूरी करेगा, इस उम्मीद से चिपके रहते हैं कि वे भाग्यशाली होंगे। फिर भी वे पूरी निश्चितता से यह नहीं कह सकते कि क्यों परमेश्वर उन्हें तीसरे स्वर्ग तक ले जाएगा या कैसे यीशु उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए सफेद बादल पर सवार होकर आएगा, वे तो पूर्ण निश्चितता के साथ यह भी नहीं कह सकते कि यीशु वास्तव में उस दिन सफेद बादल पर सवार होकर आएगा या नहीं, जिस दिन की वे कल्पना करते हैं। वे सभी चितित और हैरान हैं; वे स्वयं भी नहीं जानते कि परमेश्वर उनमें से प्रत्येक को ऊपर ले जाएगा या नहीं, जो विभिन्न समूहों के थोड़े-से मुट्ठी भर लोग हैं, जो हर पंथ से आते हैं। परमेश्वर द्वारा अभी किया जाने वाला कार्य, वर्तमान युग, परमेश्वर के इरादे—इनमें से किसी भी चीज की उन्हें कोई समझ नहीं है और वे अपनी उँगलियों पर दिन गिनने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते। जो लोग बिल्कुल अंत तक मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं, केवल वे ही अंतिम आशीष प्राप्त कर सकते हैं, जबकि वे “चतुर लोग,” जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ हैं, किंतु विश्वास करते हैं कि उन्होंने सब कुछ प्राप्त कर लिया है, वे परमेश्वर के प्रकटन को देखने में असमर्थ हैं। वे सभी विश्वास करते हैं कि वे पृथ्वी पर सबसे चतुर व्यक्ति हैं, और वे बिना किसी कारण परमेश्वर के कार्य के निरंतर विकास को बीच में ही रोक देते हैं, तथा पूर्ण निश्चय के साथ विश्वास करते प्रतीत होते हैं कि परमेश्वर उन्हें स्वर्ग तक ले जाएगा—वे, जिनकी “परमेश्वर के प्रति अटूट निष्ठा है, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं।” भले ही उनमें परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों के प्रति “अटूट निष्ठा” हो, फिर भी उनकी कथनी और करनी अत्यंत घिनौनी है, क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं और कपट और बुराई करते हैं। जो लोग बिल्कुल अंत तक अनुसरण नहीं कर सकते और पवित्र आत्मा के कार्य के साथ तालमेल नहीं बिठा सकते और केवल पुराने कार्य से चिपके रहते हैं, वे न केवल परमेश्वर के प्रति वफादारी हासिल करने में असफल हुए हैं, बल्कि इसके विपरीत वे ऐसे लोग बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, जो नए युग द्वारा ठुकरा दिए जाते हैं और जो दंडित किए जाएँगे। क्या उनसे भी अधिक दयनीय कोई है? अनेक तो यहाँ तक विश्वास करते हैं कि जो लोग प्राचीन व्यवस्था को ठुकराते हैं और नए कार्य को स्वीकार करते हैं वे सभी अंतरात्मा विहीन हैं। ये लोग, जो केवल “अंतरात्मा” पर ध्यान केंद्रित करते हैं, फिर भी पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते, अंततः अपनी ही अंतरात्मा द्वारा अपने भविष्य की संभावनाओं को बीच में नहीं रोकेंगे। यहाँ तक कि परमेश्वर भी अपने कार्य में विनियमों का पालन नहीं करता, और भले ही वह उसका अपना कार्य हो, फिर भी परमेश्वर उससे चिपका नहीं रहता। जिसे नकारा जाना चाहिए उसे नकारा जाता है, जिसे निकाल दिया जाना चाहिए उसे निकाल दिया जाता है। फिर भी मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के एक छोटे-से भाग को ही पकड़े रहकर खुद को उसके विरोध में खड़ा कर लेता है। क्या यह मनुष्य की बेहूदगी नहीं है? क्या यह मनुष्य की अज्ञानता नहीं है? आशीष प्राप्त न करने के डर से लोग जितना अधिक कायर और अति-सतर्क होते हैं, उतना ही अधिक वे और अधिक आशीष प्राप्त करने और अंतिम आशीष पाने में असमर्थ होते हैं। जो लोग हठपूर्वक व्यवस्था का पालन करते हैं वे सभी व्यवस्था के प्रति अटूट निष्ठा प्रदर्शित करते हैं और जितनी अधिक वे व्यवस्था के प्रति ऐसी वफादारी दिखाते हैं, उतना ही अधिक वे ऐसे विद्रोही होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। चूँकि अब व्यवस्था का युग नहीं, राज्य का युग है, इसलिए आज के कार्य और अतीत के कार्य का उल्लेख एक-साथ नहीं किया जा सकता, न ही अतीत के कार्य की तुलना आज के कार्य से की जा सकती है। परमेश्वर का कार्य बदल चुका है और मनुष्य का अभ्यास भी बदल चुका है; वह व्यवस्था को थामे रहना या सलीब उठाना नहीं है। इसलिए, व्यवस्था और सलीब के प्रति लोगों की वफादारी को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

यहोवा के कार्य के बाद यीशु मनुष्यों के बीच अपना कार्य करने के लिए देहधारी हो गया। उसका कार्य अलग से किया गया कार्य नहीं था, बल्कि यहोवा के कार्य के आधार पर किया गया था। यह कार्य एक नए युग के लिए था, जिसे परमेश्वर ने व्यवस्था का युग समाप्त करने के बाद किया था। इसी प्रकार, यीशु का कार्य समाप्त हो जाने के बाद परमेश्वर ने अगले युग के लिए अपना कार्य जारी रखा, क्योंकि परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन सदैव आगे बढ़ रहा है। जब पुराना युग बीत जाता है, तो उसके स्थान पर नया युग आ जाता है, और एक बार जब पुराना कार्य पूरा हो जाता है, तो परमेश्वर के प्रबंधन को जारी रखने के लिए नया कार्य शुरू हो जाता है। यह देहधारण परमेश्वर का दूसरा देहधारण है, जो यीशु का कार्य पूरा होने के बाद हुआ है। निस्संदेह, यह देहधारण स्वतंत्र रूप से घटित नहीं होता; व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के बाद यह कार्य का तीसरा चरण है। हर बार जब परमेश्वर कार्य का नया चरण आरंभ करता है, तो हमेशा एक नई शुरुआत होती है और वह हमेशा एक नया युग लाता है। इसलिए परमेश्वर के स्वभाव, उसके कार्य करने के तरीके, उसके कार्य के स्थल, और उसके नाम में भी परिवर्तन होते हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि मनुष्य के लिए नए युग में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करना कठिन होता है। परंतु मनुष्य उसका कितना भी विरोध करे, परमेश्वर सदैव अपना कार्य करता रहता है और सदैव समस्त मानवजाति को आगे ले जाता रहता है। जब यीशु मनुष्य के संसार में आया तो उसने अनुग्रह का युग शुरू किया और व्यवस्था का युग समाप्त किया। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर एक बार फिर देहधारी हुआ और इस देहधारण के साथ उसने अनुग्रह का युग समाप्त किया और राज्य का युग शुरू किया। वे सब जो परमेश्वर के दूसरे देहधारण को स्वीकार करने में सक्षम हैं, राज्य के युग में ले जाए जाएँगे और इसके अलावा वे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर का मार्गदर्शन स्वीकार करने में सक्षम होंगे। यूँ तो यीशु मनुष्यों के बीच आया और उसने बहुत-सा कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया और मनुष्य की पाप-बलि के रूप में काम किया; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त नहीं किया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह बचाने के लिए केवल यीशु का पाप-बलि बनना और मनुष्य के पापों को वहन करना ही आवश्यक नहीं था, बल्कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए उसके स्वभावों से पूरी तरह छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करना आवश्यक था। और इसलिए मनुष्य के पापों के क्षमा किए जाने के बाद परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए देह में लौट आया और उसने ताड़ना तथा न्याय का कार्य आरंभ किया। यह कार्य मानवजाति को एक उच्चतर क्षेत्र में ले आया है। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में प्रकाश में जिएँगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे।

यदि लोग अनुग्रह के युग में अटके रहेंगे, तो वे कभी भी अपने भ्रष्ट स्वभावों से छुटकारा नहीं पाएँगे, परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव को जानने की बात तो दूर है! यदि लोग सदैव अनुग्रह की प्रचुरता में रहते हैं, परंतु उनके पास जीवन का वह मार्ग नहीं है, जो उन्हें परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने में समर्थ बनाता है, तो वे परमेश्वर पर अपने विश्वास में उसे वास्तव में कभी भी प्राप्त नहीं करेंगे। इस प्रकार का विश्वास वास्तव में दयनीय है। जब तुम इस पुस्तक को पूरा पढ़ लोगे, जब तुम राज्य के युग में देहधारी परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का अनुभव कर लोगे, तब तुम महसूस करोगे कि अनेक वर्षों की तुम्हारी आशाएँ अंततः साकार हो गई हैं। तुम महसूस करोगे कि केवल अब तुमने परमेश्वर को वास्तव में आमने-सामने देखा है; केवल अब तुमने परमेश्वर के चेहरे को निहारा है, उसके व्यक्तिगत कथन सुने हैं, उसके कार्य की बुद्धिमत्ता को समझा है, और वास्तव में महसूस किया है वह कितना व्यावहारिक और सर्वशक्तिमान है। तुम महसूस करोगे कि तुमने ऐसी बहुत-सी चीजें पाई हैं, जिन्हें अतीत में लोगों ने न कभी देखा था, न ही प्राप्त किया था। इस समय, तुम स्पष्ट रूप से जान लोगे कि परमेश्वर पर विश्वास करना क्या होता है और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होना क्या होता है। निस्संदेह, यदि तुम अतीत के विचारों से चिपके रहते हो, और परमेश्वर के दूसरे देहधारण के तथ्य को अस्वीकार कर देते हो और उसे स्वीकार नहीं करते हो, तो तुम खाली हाथ रहोगे और कुछ नहीं पाओगे, और अंततः परमेश्वर का विरोध करने के दोषी ठहराए जाओगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

परमेश्वर के संपूर्ण कार्य के दौरान यदि मनुष्य सदैव यहोवा की व्यवस्था का पालन करता रहता, तो परमेश्वर का कार्य प्रगति नहीं कर सकता था, और संपूर्ण युग का अंत करना तो बिल्कुल भी संभव न होता। यदि मनुष्य हमेशा सलीब को पकड़े रहता और धैर्य और विनम्रता का अभ्यास करता रहता, तो परमेश्वर के कार्य का प्रगति करते रहना असंभव होता। छह हजार वर्षों का प्रबंधन ऐसे ही उन लोगों के बीच समाप्त नहीं किया जा सकता, जो केवल व्यवस्था का पालन करते हैं, या सिर्फ सलीब थामे रहते हैं और धैर्य और विनम्रता का अभ्यास करते हैं। इसके बजाय, परमेश्वर के प्रबंधन का संपूर्ण कार्य अंत के दिनों के उन लोगों के बीच संपन्न किया जाएगा, जो परमेश्वर को जानते हैं, जिन्हें शैतान के चंगुल से छुड़ाया गया है, और जिन्होंने अपने आप को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से मुक्त कर लिया है। यह परमेश्वर के कार्य की अनिवार्य दिशा है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि धार्मिक कलीसियाओं के लोगों का अभ्यास पुराना पड़ गया है? वह इसलिए, क्योंकि जिसका वे अभ्यास करते हैं, वह आज के कार्य से असंबद्ध है। अनुग्रह के युग में जिसका वे अभ्यास करते थे वह सही था, किंतु चूँकि युग गुज़र चुका है और परमेश्वर का कार्य बदल चुका है, इसलिए उनका अभ्यास धीरे-धीरे प्रचलन से बाहर हो गया है। उसे नए कार्य और नए प्रकाश ने पीछे छोड़ दिया है। अपनी मूल बुनियाद के आधार पर पवित्र आत्मा का कार्य कई कदम गहरी प्रगति कर चुका है। किंतु वे लोग अभी भी परमेश्वर के कार्य के मूल चरण पर अटके हुए हैं और अभी भी पुराने अभ्यासों और पुराने प्रकाश से चिपके हुए हैं। तीन या पाँच वर्षों में ही परमेश्वर का कार्य बहुत बदल सकता है, तो क्या 2,000 वर्षों के दौरान और भी अधिक बड़े रूपांतरण नहीं हुए होंगे? यदि मनुष्य के पास कोई नया प्रकाश या अभ्यास नहीं है, तो इसका अर्थ है कि वह पवित्र आत्मा के कार्य के साथ बना नहीं रहा है और यह मनुष्य की असफलता है। परमेश्वर के नए कार्य के अस्तित्व को इसलिए नहीं नकारा जा सकता कि जिन लोगों के पास पहले पवित्र आत्मा का कार्य था, वे आज भी प्रचलन से बाहर हो चुके अभ्यासों का पालन करते हैं। पवित्र आत्मा का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है, और जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में हैं, उन्हें भी अधिक गहरे जाना और कदम-दर-कदम बदलना चाहिए। उन्हें एक ही चरण पर रुक नहीं जाना चाहिए। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते, केवल वे ही परमेश्वर के मूल कार्य पर रुक जाएँगे और पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे। जो लोग विद्रोही हैं, केवल वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने में अक्षम होंगे। यदि मनुष्य का अभ्यास पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ गति बनाए नहीं रखता, तो मनुष्य का अभ्यास निश्चित रूप से वर्तमान कार्य से कटा हुआ है और वह निश्चित रूप से वर्तमान कार्य के विपरीत है। ऐसे पुराने पड़ चुके लोग परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में एकदम अक्षम होते हैं, वे ऐसे लोग तो बिल्कुल भी नहीं बन सकते जो अंततः परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहेंगे। इतना ही नहीं, संपूर्ण प्रबंधन कार्य ऐसे लोगों के समूह के बीच संपन्न नहीं किया जा सकता। जो लोग कभी यहोवा की व्यवस्था का पालन करते थे और जिन्होंने कभी सलीब के लिए दुःख सहा था, यदि वे अंत के दिनों के कार्य के इस चरण को स्वीकार नहीं कर सकते, तो उन्होंने जो कुछ भी किया है वह सब व्यर्थ और निष्फल हो जाएगा। पवित्र आत्मा के कार्य की स्पष्टतम अभिव्यक्ति अभी वर्तमान को गले लगाने में है, अतीत से चिपके रहने में नहीं। जो लोग आज के कार्य के साथ बने नहीं रहे हैं, और जो आज के अभ्यास से अलग हो गए हैं, वे वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं और उसे स्वीकार नहीं करते। ऐसे लोग परमेश्वर के वर्तमान कार्य का विरोध करते हैं। यद्यपि वे अतीत के प्रकाश को पकड़े रहते हैं, किंतु इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते। मनुष्य के अभ्यास में परिवर्तनों के बारे में, अतीत और वर्तमान के बीच के अभ्यास की भिन्नताओं के बारे में, पूर्ववर्ती युग के दौरान किस प्रकार अभ्यास किया जाता था और आज किस प्रकार किया जाता है इस बारे में, यह सब बातचीत क्यों की गई है? मनुष्य के अभ्यास में ऐसे विभाजनों के बारे में हमेशा बात की जाती है, क्योंकि पवित्र आत्मा का कार्य लगातार आगे बढ़ रहा है, इसलिए मनुष्य के अभ्यास का निरंतर बदलना आवश्यक है। यदि मनुष्य एक ही चरण में अटका रहता है, तो यह प्रमाणित करता है कि वह परमेश्वर के नए कार्य और नए प्रकाश के साथ बने रहने में असमर्थ है; इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि परमेश्वर की प्रबंधन-योजना नहीं बदली है। जो पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं, वे सदैव सोचते हैं कि वे सही हैं, किंतु वास्तव में उन पर परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही रुक गया है और वे पूरी तरह से पवित्र आत्मा के कार्य से रहित हैं। परमेश्वर का कार्य बहुत पहले ही लोगों के एक अन्य समूह को हस्तांतरित हो गया था और वह अपने नए कार्य को इन लोगों पर पूरा करने का इरादा रखता है। चूँकि धर्म में मौजूद लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने में अक्षम हैं और केवल अतीत के पुराने कार्य को ही पकड़े रहते हैं, इसलिए परमेश्वर ने इन लोगों को छोड़ दिया है, और वह अपना कार्य उन लोगों पर करता है जो इस नए कार्य को स्वीकार करते हैं। ये वे लोग हैं जो उसके नए कार्य के साथ सहयोग करते हैं, और केवल इसी तरह से उसका प्रबंधन पूरा हो सकता है। परमेश्वर का प्रबंधन सदैव आगे बढ़ रहा है, और मनुष्य का अभ्यास हमेशा ऊँचा हो रहा है। परमेश्वर सदैव कार्य कर रहा है और मनुष्य को सदैव आवश्यकता रहती है; इस प्रकार दोनों अपने चरम बिंदु तक पहुँचते हैं और परमेश्वर तथा मनुष्य पूर्ण एकता प्राप्त करते हैं। यह परमेश्वर के महान कार्य की पूर्णता की अभिव्यक्ति है और यह परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन का अंतिम परिणाम है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

अंत के दिनों का मसीह जीवन लाता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लाता है। यह सत्य वह मार्ग है, जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यही एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह द्वारा प्रदान किया गया जीवन का मार्ग नहीं खोजते, तो तुम यीशु की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं करोगे, और स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश करने के योग्य कभी नहीं हो पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास की कठपुतली और कैदी दोनों ही हो। जो लोग विनियमों से, शब्दों से और इतिहास की बेड़ियों से नियंत्रित होते हैं, वे न तो कभी जीवन प्राप्त कर पाएँगे और न ही जीवन का अनंत मार्ग प्राप्त कर पाएँगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे जो प्राप्त करते हैं वह सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के जल के बजाय बस मैला पानी ही है, जिससे वे हजारों सालों से चिपके हुए हैं। जिन्हें जीवन के जल की आपूर्ति नहीं की जाती, वे हमेशा मुर्दे, शैतान के खिलौने और नरक की संतानें बने रहेंगे। फिर वे कैसे परमेश्वर के दर्शन कर सकते हैं? तुम केवल अतीत को पकड़े रखने की खोज में रहते हो, स्थिर खड़े रहने और चीजों को वैसे ही रखने की कोशिश करते हो और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को छोड़ने की खोज में नहीं रहते, इसलिए क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोधी नहीं होगे? परमेश्वर के कार्य के कदम उमड़ती लहरों और घुमड़ते गर्जनों की तरह जबरदस्त और शक्तिशाली हैं—फिर भी तुम निष्क्रियता से बैठकर तबाही का इंतजार करते हो, उससे चिपके रहते हो जो पुराना है और चीजों के अपनी गोद में आ गिरने की प्रतीक्षा करते हो। इस तरह, तुम्हें मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कैसे माना जा सकता है? यह कैसे दिखा सकता है कि तुम जिस परमेश्वर को थामे हो, वह वही परमेश्वर है जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताबों के शब्द तुम्हें पार कराकर नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे परमेश्वर के कार्य के चरणों को खोजने में तुम्हारी अगुआई कैसे कर सकते हैं? और वे तुम्हें ऊपर स्वर्ग में कैसे ले जा सकते हैं? जिन्हें तुम अपने हाथों में थामे हो, वे केवल शब्द हैं, जो तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना दे सकते हैं, वे तुम्हें जीवन देने में सक्षम सत्य नहीं हैं। धर्मशास्त्र के शब्द जिन्हें तुम पढ़ते हो, वे केवल तुम्हारी जिह्वा को समृद्ध कर सकते हैं; वे बुद्धिमानी के शब्द नहीं हैं जो मानव जीवन को जानने में तुम्हारी मदद कर सकते हों, उनके तुम्हें पूर्णता की ओर ले जाने वाला मार्ग होने की बात तो दूर रही। क्या यह विसंगति तुम्हारे लिए चिंतन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें इसके भीतर समाहित रहस्यों के बारे में अंतर्दृष्टि नहीं देती है? क्या तुम अपने बल पर परमेश्वर से मिलने के लिए अपने आप को स्वर्ग भिजवाने में समर्थ हो? परमेश्वर के आए बिना, क्या तुम परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनंद मनाने के लिए अपने आप को स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? तो मेरा उपदेश यह है कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है—देखो कि अब अंत के दिनों में मनुष्य को बचाने का कार्य कौन कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी जीवन प्राप्त करोगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है

जो लोग मसीह द्वारा बोले गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करना चाहते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे बेतुके लोग हैं, और जो मसीह द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे कोरी कल्पना में खोए हैं। और इसलिए मैं कहता हूँ कि जो लोग अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते, उनसे परमेश्वर हमेशा घृणा करेगा। अंत के दिनों में मसीह राज्य के लिए मनुष्य का प्रवेशद्वार है और ऐसा कोई नहीं है जो उसे लाँघकर निकल सके। मसीह के माध्यम के अलावा किसी भी दूसरे तरीके से किसी को भी परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें उसके वचन स्वीकारने चाहिए और उसके वचन के प्रति समर्पण करना चाहिए। सत्य और जीवन के प्रावधान को स्वीकारने में असमर्थ रहते हुए केवल आशीष प्राप्त करने की मत सोचो। मसीह अंत के दिनों में इसलिए आया है ताकि वह उन सबको जीवन प्रदान कर सके जो उसमें ईमानदारी से विश्वास रखते हैं। यह कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है, और यह कार्य वह मार्ग है जिसे नए युग में प्रवेश करने वाले सभी लोगों को अपनाना ही चाहिए। यदि तुम मसीह को नहीं स्वीकारते और यही नहीं, उसकी भर्त्सना, ईशनिंदा या उसका उत्पीड़न करते हो, तो तुम्हें अनंतकाल तक जलाया जाना तय है और तुम परमेश्वर के राज्य में कभी प्रवेश नहीं करोगे। ऐसा इसलिए क्योंकि यह मसीह स्वयं पवित्र आत्मा की अभिव्यक्ति है, परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वह है जिसे परमेश्वर ने अपना कार्य पृथ्वी पर करने के लिए सौंपा है, और इसलिए मैं कहता हूँ कि यदि तुम वह सब स्वीकार नहीं करते जो अंत के दिनों के मसीह द्वारा किया जाता है, तो तुम पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करते हो। पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करने वाले जिस प्रतिफल के पात्र हैं, वह सभी को स्वतः स्पष्ट है। मैं तुम्हें यह भी बताता हूँ : अगर तुम अंत के दिनों के मसीह का प्रतिरोध करते हो, अगर तुम अंत के दिनों के मसीह को नकारते हो तो कोई भी अन्य तुम्हारे बदले में इसका अंजाम नहीं भुगत सकता है। इतना ही नहीं, उस बिंदु के बाद तुम्हें परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने का अवसर कभी नहीं मिलेगा; यदि तुम अपने तौर-तरीके सुधारना भी चाहो, तब भी तुम दोबारा कभी परमेश्वर का चेहरा नहीं देख पाओगे। ऐसा इसलिए क्योंकि तुम जिसका प्रतिरोध कर रहे हो वह मानव नहीं है, तुम जिसे अस्वीकार कर रहे हो वह कोई तुच्छ व्यक्ति नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम जानते हो कि इसके क्या दुष्परिणाम हैं? तुम कोई छोटी-मोटी गलती नहीं कर रहे हो, बल्कि एक जघन्य पाप कर रहे हो। और इसलिए मैं हर व्यक्ति को सलाह देता हूँ कि सत्य के सामने अपने नुकीले दाँत और पंजे मत दिखाओ या मनमानी टिप्पणियाँ मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुम्हें जीवन दिला सकता है, और सत्य के अलावा कुछ भी तुम्हें पुनः जन्म लेने या दोबारा परमेश्वर का चेहरा देखने में सक्षम नहीं बना सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है

क्या अब तुम समझ गए हो कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? अगर तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने के लिए आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने की सलाह देता हूँ, वरना तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किए जाने या उसके द्वारा अपने राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं लेकिन कभी शुद्ध नहीं किए जा सकते, अर्थात् जो न्याय के कार्य के बीच से ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप अधिक गंभीर हैं और अधिक संख्या में हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। जो लोग मजदूरी के भी योग्य नहीं हैं, वे और कठोर दंड प्राप्त करेंगे, ऐसा दंड जो चिरस्थायी भी होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा, जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखाई, मगर फिर परमेश्वर को धोखा दे दिया। ऐसे लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दंड के माध्यम से प्रतिदंड भुगतेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकटन नहीं है? क्या मनुष्य का न्याय करने और उसे उजागर करने में परमेश्वर का बिल्कुल यही उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन लोगों को, जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के कुकर्म करते हैं, दुष्टात्माओं से आक्रांत स्थान पर भेजता है, और उन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीर नष्ट करने देता है, और उन लोगों के शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है। यही उनका उचित प्रतिदंड है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों और झूठे कार्यकर्ताओं का हर पाप उनकी रिकॉर्ड पुस्तिकाओं में लिखता है; और जब सही समय आता है, वह उन्हें अशुद्ध आत्माओं के बीच में फेंक देता है, उन अशुद्ध आत्माओं को अपनी इच्छानुसार उनके पूरे शरीर को अपवित्र करने देता है, और ऐसी व्यवस्था करता है कि वे कभी पुनर्जन्म नहीं ले पाते हैं और फिर कभी प्रकाश नहीं देख पाते हैं। परमेश्वर बुरे लोगों की सूची में उन पाखंडियों को जोड़ता है जो कुछ समय के लिए तो सेवा करते हैं, लेकिन अंत तक वफ़ादार नहीं रहते हैं और वह उन्हें बुरे लोगों के साथ कीचड़ में लोटने और उनके साथ मिलकर विविध प्रकार के बदमाशों का गिरोह बनाने देता है और अंत में, परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता, जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे या जिन्होंने अपनी ताकत का बिल्कुल भी योगदान नहीं किया, और युग बदलने पर वह उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे अब और पृथ्वी पर मौजूद नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य का मार्ग तो बिल्कुल भी प्राप्त नहीं करेंगे। परमेश्वर अपने लोगों की सेवा करने वालों की सूची में ऐसे हर व्यक्ति को जोड़ता है, जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहा है, बल्कि उसके पास परमेश्वर के साथ अनमने ढंग से व्यवहार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ऐसे गिने-चुने लोग ही जीवित बचेंगे, जबकि बहुसंख्यक लोग उन लोगों के साथ नष्ट कर दिए जाएँगे जिनका श्रम मानक-स्तर का भी नहीं है। अंत में, परमेश्वर उन सभी को, जो परमेश्वर के साथ एकदिल और एकमन हैं, अपने लोगों और पुत्रों को, और परमेश्वर द्वारा याजक बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को अपने राज्य में ले आएगा। ये परमेश्वर के कार्य का सार हैं। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जिन्हें परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है, उन्हें अविश्वासियों की श्रेणियों में सूचीबद्ध किया जाएगा और तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका क्या परिणाम होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ, जो मुझे कहना चाहिए; तुम लोग जो मार्ग चुनते हो, वह केवल तुम्हारी पसंद है। तुम लोगों को जो समझना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी व्यक्ति की प्रतीक्षा कभी नहीं करता जो उसके साथ कदमताल नहीं कर सकता और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है

पिछला: 8. हम मानते हैं कि प्रभु यीशु उद्धारकर्ता है क्योंकि उसने हमारे पापों को क्षमा किया और हमें हमारे पापों से छुटकारा दिलाया। अब आप गवाही देते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंतिम दिनों का मसीह है, उद्धारकर्ता का प्रकटन है, वह सत्य को व्यक्त कर रहा है, और इंसान को पूरी तरह से शुद्ध करने और उसे बचाने के लिए, इंसान को शैतान के बुरे प्रभाव से मुक्त करने के लिए, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कैसे मनुष्य को पूरी तरह से शुद्ध करता और बचाता है?

अगला: 1. आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु अंतिम दिनों में लौट आया है और उसका एक नया नाम है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर। यह कैसे हो सकता है? बाइबल स्पष्ट रूप से कहती है, “किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें” (प्रेरितों 4:12)। “यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक-सा है” (इब्रानियों 13:8)। हम मानते हैं कि प्रभु यीशु का नाम कभी नहीं बदल सकता है, और यह कि उनकी वापसी पर उन्हें किसी अन्य नाम से नहीं पुकारा जा सकता है।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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