7. तुम गवाही देते हो कि परमेश्वर मनुष्य को पूरी तरह शुद्ध करने और उसे बचाने के लिए अंत के दिनों के दौरान न्याय का कार्य करता है, लेकिन मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचन पढ़े हैं और उनमें से कुछ काफी कठोर हैं—वे मनुष्य की निंदा करते हैं और उसे शाप देते हैं। क्या यह मनुष्य को दंड नहीं है? इसे मनुष्य का शुद्धिकरण और उद्धार कैसे कहा जा सकता है?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें वह वो सब प्रकट करता है जो अधार्मिक है, वह अनगिनत लोगों का सरेआम न्याय करता है और उन लोगों को पूर्ण बनाता है जो सच्चे दिल से उससे प्रेम करते हैं। केवल इस तरह का स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सभी चीजें अपनी किस्म के अनुसार छाँटी जाती हैं और अपनी विभिन्न खूबियों के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित की जाती हैं। ठीक यही वह समय है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और गंतव्य प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय का अनुभव न करें तो उनके विद्रोहीपन और अधार्मिकता को उजागर नहीं किया जा सकता है। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी चीजों का परिणाम प्रकट किया जा सकता है। लोग जो सच में हैं वह केवल तब दिखाते हैं जब उन्हें ताड़ना दी जाती है और उनका न्याय किया जाता है। बुरे को बुरे के साथ रखा जाएगा, भले को भले के साथ, और सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से सभी चीजों के परिणाम प्रकट किए जाएँगे ताकि बुरे को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और अनगिनत लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के सामने आत्मसमर्पण कर लें। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से पूरा करना होगा। चूँकि लोगों की भ्रष्टता अपने शिखर पर पहुँच गई है और उनका विद्रोहीपन अत्यंत गंभीर है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यतः ताड़ना और न्याय से युक्त है और अंत के दिनों में प्रकट होता है, लोगों को पूरी तरह से परिवर्तित कर सकता है और उन्हें पूर्ण कर सकता है, बुराई को उजागर कर सकता है, और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दंडित किया जाएगा। इसलिए इस तरह के स्वभाव में युग का महत्व निहित है। प्रत्येक नए युग के कार्य की खातिर परमेश्वर के स्वभाव का प्रकटन और खुलासा होता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर अपने स्वभाव को मनमाने और निरर्थक ढंग से प्रकट करता है। मान लो कि लोगों के परिणामों के प्रकट होने के अंत के दिनों में अगर परमेश्वर अभी भी लोगों पर असीम दया और करुणा बरसाता रहता और उनसे प्रेम करता रहता, उन्हें धार्मिक न्याय के अधीन करने के बजाय उनके प्रति नरमी, धैर्य और क्षमा दर्शाता रहता और उन्हें माफ करता रहता, चाहे उनके पाप कितने भी गंभीर क्यों न हों, उन्हें रत्ती भर भी धार्मिक न्याय के अधीन न करता, तो फिर परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का समापन कब होता? कब इस तरह का कोई स्वभाव सही मंजिल की ओर मानवजाति की अगुआई करने में सक्षम होगा? यह किसी ऐसे न्यायाधीश के समान है जो लोगों के प्रति हमेशा प्रेममय होता है, एक दयालु चेहरे और सौम्य हृदय वाला प्रेममय न्यायाधीश जो लोगों से प्यार करता है चाहे उन्होंने जो भी अपराध किए हों, और उन्हें प्रेम और सहनशीलता दिखाता है चाहे वे जो भी हों—ऐसा न्यायाधीश कब न्यायोचित निर्णय पर पहुँचेगा? अंत के दिनों के दौरान केवल धार्मिक न्याय ही लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँट सकता है और उन्हें एक नए क्षेत्र में ला सकता है। इस तरह से परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)
यद्यपि मेरे वचन कठोर हैं, किंतु वे सब मनुष्य के लिए उद्धार हैं, क्योंकि मैं केवल वचन बोल रहा हूँ, मनुष्य की देह को दंडित नहीं कर रहा हूँ। इन वचनों के कारण मनुष्य प्रकाश में रह पाता है, यह जान पाता है कि प्रकाश मौजूद है, यह जान पाता है कि प्रकाश अनमोल है, और, इससे भी बढ़कर, यह जान पाता है कि ये वचन उसके लिए कितने फायदेमंद हैं, साथ ही यह भी जान पाता है कि परमेश्वर उद्धार है। यद्यपि मैंने ताड़ना और न्याय के बहुत-से वचन कहे हैं, लेकिन कुछ भी वास्तव में तुम लोगों पर नहीं आया है। मैं विशेष रूप से अपना काम करने और अपने वचन बोलने के लिए आया हूँ, और भले ही मेरे वचन कड़े हैं, लेकिन वे तुम लोगों की भ्रष्टता और विद्रोहशीलता का न्याय करने के लिए बोले जाते हैं। मेरे ऐसा करने का उद्देश्य मनुष्य को शैतान की सत्ता से बचाना है। मेरा उद्देश्य अपने वचनों का उपयोग कर मनुष्य को बचाना है; यह अपने वचनों से मनुष्य को नुकसान पहुँचाना नहीं है। मेरे वचन कठोर इसलिए हैं, ताकि मेरे कार्य में परिणाम प्राप्त हो सकें। केवल ऐसे कार्य से ही मनुष्य खुद को जान सकता है और अपने विद्रोही स्वभाव से दूर हो सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें रुतबे के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए
परमेश्वर द्वारा मनुष्य की पूर्णता किन साधनों से संपन्न होती है? वह परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से संपन्न होती है। परमेश्वर के स्वभाव में मुख्यतः धार्मिकता, कोप, प्रताप, न्याय और शाप शामिल हैं और वह मनुष्य को मुख्य रूप से अपने न्याय के माध्यम से पूर्ण बनाता है। कुछ लोग समझते नहीं हैं और पूछते हैं, ऐसा क्यों है कि परमेश्वर केवल न्याय और शाप के जरिए ही मनुष्य को पूर्ण बना सकता है। वे कहते हैं, “यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर को मनुष्य का न्याय करना पड़े तो क्या मनुष्य को दोषी नहीं ठहराया जाएगा? तो फिर भी वह पूर्ण कैसे बनाया जा सकता है?” ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर जिस चीज को शाप देता है वह है मनुष्य की विद्रोहशीलता और वह जिस चीज का न्याय करता है वे हैं मनुष्य के पाप। यूँ तो वह कठोरतापूर्वक बोलता है और मनुष्य की भावनाओं का बिल्कुल भी लिहाज नहीं करता है और वह सब उजागर करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, कुछ कठोर वचनों के जरिए वह सब उजागर करता है जो मनुष्य के भीतर सारभूत है, ऐसे न्याय के जरिए वह मनुष्य को देह के सार का गहन ज्ञान प्रदान करता है और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष समर्पण कर देता है। मनुष्य की देह पाप की है और शैतान की है, यह विद्रोही है और यह परमेश्वर की ताड़ना का पात्र है। इसलिए मनुष्य को खुद को जानने देने के लिए उस पर परमेश्वर के न्याय के वचन आने ही चाहिए और सभी प्रकार के शोधन का प्रयोग किया जाना चाहिए; तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावी हो सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो
परमेश्वर अपने न्याय का उपयोग मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है, उसने मनुष्य से प्रेम किया है और उसे बचाया है—परंतु उसके प्रेम में क्या निहित है? उसमें न्याय, प्रताप, क्रोध और शाप निहित है। यद्यपि अतीत में परमेश्वर ने मनुष्य को शाप दिया था, परंतु उसने मनुष्य को पूरी तरह से अथाह कुंड में नहीं फेंका, बल्कि उसने यह उपाय मनुष्य के विश्वास के शोधन के लिए किया था; उसने मनुष्य को घातक स्थिति में नहीं डाला था, बल्कि उसने मनुष्य को पूर्ण बनाने का कार्य किया था। देह का सार वही है जो शैतान का है—परमेश्वर ने यह बिल्कुल सही कहा है—परंतु परमेश्वर द्वारा कार्यान्वित तथ्य उसके वचनों के अनुसार साकार नहीं होते। वह तुम्हें शाप देता है ताकि तुम उससे प्रेम कर सको, ताकि तुम देह के सार को जान सको; वह तुम्हें ताड़ना देता है ताकि तुम्हें जगाया जा सके, तुम अपने भीतर की कमियाँ और मनुष्य की दयनीयता और उसकी अयोग्यता जान सको। इस प्रकार, परमेश्वर के शाप, उसका न्याय, और उसका प्रताप और क्रोध—ये सब मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए हैं। परमेश्वर आज जो कुछ भी करता है और तुम लोगों पर अपने कार्य के माध्यम से वह जो धार्मिक स्वभाव प्रकट करता है—यह सब मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए है। ऐसा है परमेश्वर का प्रेम।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो
यद्यपि मनुष्य के लिए परमेश्वर की ताड़ना और न्याय शोधन हैं, निर्दयतापूर्ण प्रकाशन हैं और उसके पापों के लिए उसे सज़ा देने और उसके देह को सज़ा देने के उद्देश्य से की गई चीजें हैं, फिर भी इस कार्य का कुछ भी उनके देह की निंदा करने और उसे नष्ट करने के इरादे से नहीं है। वचन का कठोर प्रकाशन तुम्हें सही मार्ग पर ले जाने के उद्देश्य से है। तुम लोगों ने इस कार्य का बहुत-कुछ व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है, और स्पष्टतः, यह तुम्हें बुरे मार्ग पर नहीं ले गया है! यह सब तुम्हें सामान्य मानवता को जीने योग्य बनाने के लिए है; और यह सब तुम्हारी सामान्य मानवता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक कदम तुम्हारी आवश्यकताओं पर आधारित है, तुम्हारी दुर्बलताओं के अनुसार है, और तुम्हारे वास्तविक आध्यात्मिक कद के अनुसार है, और तुम लोगों पर कोई असहनीय बोझ नहीं लादा गया है। यह आज तुम्हें स्पष्ट नहीं है, और तुम्हें लगता है कि मैं तुम पर कठोर हो रहा हूँ, और तुम सदैव यह विश्वास करते हो कि मैं तुम्हें प्रतिदिन इसलिए ताड़ना देता हूँ, इसलिए तुम्हारा न्याय करता हूँ और इसलिए तुम्हारी भर्त्सना करता हूँ, क्योंकि मैं तुमसे घृणा करता हूँ। किंतु यद्यपि जो तुम प्राप्त करते हो, वह ताड़ना और न्याय है, किंतु वास्तव में यह तुम्हारे लिए प्रेम है, और यह सबसे बड़ी सुरक्षा है। यदि तुम इस कार्य के गहन अर्थ को नहीं समझ सकते, तो तुम्हारे लिए अनुभव जारी रखना असंभव होगा। तुम्हें इस उद्धार से आश्वासन प्राप्त करना चाहिए। होश में आने से इनकार मत करो। इतनी दूर आकर तुम्हें विजय के कार्य का अर्थ स्पष्ट दिखाई देना चाहिए, और तुम्हें अब और इसके बारे में ऐसी-वैसी राय नहीं रखनी चाहिए!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (4)
आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, तुम लोगों को ताड़ना देता है और तुम्हें दोषी ठहराता है, लेकिन तुम्हें यह जानना चाहिए कि तुम्हें दोषी इसलिए ठहराया जाता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको। वह दोषी ठहराता है, शाप देता है, न्याय करता और ताड़ना देता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो सके और उससे भी बढ़कर तुम अपनी कीमत जान सको और यह देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धार्मिक हैं, वे उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं, वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है और यह कि वह धार्मिक परमेश्वर है, जो मनुष्य से प्रेम करता है, उसे बचाता है, उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना भी देता है। यदि तुम केवल यह जानते हो कि तुम निम्न स्तर के हो, कि तुम भ्रष्ट और विद्रोही हो, परंतु यह नहीं जानते कि परमेश्वर आज तुम पर जो न्याय और ताड़ना का कार्य कर रहा है उसके माध्यम से वह अपने उद्धार को प्रकट करने का इरादा रखता है, तो तुम्हारे पास चीजों को अनुभव करने का कोई तरीका नहीं है, तुम आगे बढ़ने में तो बिल्कुल भी सक्षम नहीं हो। परमेश्वर लोगों को मार गिराने या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि उनका न्याय करने, उन्हें शाप देने, ताड़ना देने और बचाने के लिए आया है। जब तक उसकी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना का समापन नहीं हो जाता—पहले वह मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी के परिणाम का खुलासा करेगा—पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से उद्धार की खातिर है; इसका विशुद्ध प्रयोजन उससे प्रेम करने वाले लोगों को पूरी तरह पूर्ण करना और उन्हें अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पण कराना है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर लोगों को कैसे बचाता है, यह सब उन्हें उनकी पुरानी शैतानी प्रकृति से अलग करके किया जाता है; अर्थात्, वह उन्हें जीवन का अनुसरण करवाकर बचाता है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उनके पास परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कोई रास्ता नहीं होगा। उद्धार स्वयं परमेश्वर का कार्य है और जीवन का अनुसरण ऐसी चीज है, जो उद्धार स्वीकार करने के लिए मनुष्य के पास होनी ही चाहिए। मनुष्य की निगाह में, उद्धार परमेश्वर का प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम ताड़ना, न्याय और शाप नहीं हो सकता; उद्धार में दया, प्रेमपूर्ण दयालुता और, इनके अलावा, सांत्वना के वचनों के साथ-साथ परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए असीम आशीष समाविष्ट होने चाहिए। लोगों का मानना है कि जब परमेश्वर मनुष्य को बचाता है, तो ऐसा वह उसे अपने आशीषों और अनुग्रह से प्रेरित करके करता है, ताकि वह अपना हृदय परमेश्वर को दे सके। दूसरे शब्दों में, उसका मनुष्य को स्पर्श करना उसे बचाना है। इस तरह का उद्धार लेनदेन पर आधारित है। केवल जब परमेश्वर मनुष्य को सौ गुना प्रदान करता है, तभी मनुष्य परमेश्वर के नाम के प्रति समर्पण करेगा और ऐसा करके वह परमेश्वर को गौरवान्वित करेगा और उसका मान बढ़ाएगा। मानवजाति के लिए परमेश्वर का यह इरादा नहीं है। परमेश्वर पृथ्वी पर भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है। यदि ऐसा न होता, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित ही नहीं आता। अतीत में, उद्धार के उसके साधन में परम दया और प्रेमपूर्ण दयालुता दिखाना शामिल था, यहाँ तक कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। वर्तमान अतीत जैसा नहीं है : आज तुम लोगों का उद्धार अंत के दिनों के समय घटित होता है, जब प्रत्येक व्यक्ति उसके प्रकार के अनुसार छाँटा जाता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन दया या प्रेमपूर्ण दयालुता नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है, ताकि मनुष्य को अधिक पूरी तरह से बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है, वह ताड़ना, न्याय और निर्मम प्रहार है, लेकिन यह जान लो : इस निर्मम प्रहार में थोड़ा-सा भी दंड नहीं है। मेरे वचन कितने भी कठोर हों, तुम लोगों को जो मिलता है, वे कुछ वचन ही होते हैं, जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत हो सकते हैं, और मैं कितना भी क्रोधित क्यों न हूँ, तुम लोगों को जो मिलता है, वे फिर भी फटकार के वचन ही होते हैं, और मेरा आशय तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना या तुम लोगों को मार डालना नहीं है। क्या यह सब तथ्य नहीं है? जान लो कि आजकल हर चीज उद्धार के लिए है, चाहे वह धार्मिक न्याय हो या निर्मम शोधन और ताड़ना। भले ही आज प्रत्येक व्यक्ति उसके प्रकार के अनुसार छाँटा जाए या सभी प्रकार के लोगों को बेनकाब किया जाए, परमेश्वर के समस्त वचनों और कार्य का प्रयोजन उन लोगों को बचाना है जो परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हैं। धार्मिक न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से लाया जाता है और निर्मम शोधन उसे शुद्ध करने के लिए किया जाता है; कठोर वचन बोलना या ताड़ना देना, दोनों शुद्ध करने के लिए हैं और वे उद्धार के लिए हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें रुतबे के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए