36. अंधा होकर मैंने क्या पाया
2010 में मेरी पत्नी ने मुझे परमेश्वर का राज्य का सुसमाचार सुनाया। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैं जान गया कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटा हुआ प्रभु यीशु है और वह मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए सत्य व्यक्त कर रहा है। मैं बहुत खुश हुआ और मन ही मन सोचने लगा, “अब से, मुझे ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करना और उसका अनुसरण करना चाहिए। अगर मैं आने वाले दिनों में परमेश्वर के आशीष और उद्धार पा सका तो मैं कितना धन्य होऊँगा!” कुछ समय बाद मैं कलीसिया में नए लोगों का सिंचन करने लगा और बाद में कलीसिया का एक अगुआ बन गया। मैं हर दिन कलीसिया के विभिन्न कार्यों को सँभालने में व्यस्त रहता था और मैं बहुत खुश महसूस करता था, यह सोचता था कि अगर मैं इस तरह से अपना कर्तव्य निभाता रहूँगा तो मैं निश्चित रूप से उद्धार प्राप्त कर लूँगा। अपने कर्तव्य के प्रति खुद को पूर्णकालिक रूप से समर्पित करने के लिए मैंने अपना मुनाफेदार लकड़ी का कारोबार एक रिश्तेदार को सौंप दिया।
जनवरी 2017 में रेटिना अलग होने के कारण मेरी बाईं आँख की सर्जरी हुई, लेकिन सर्जरी ठीक नहीं हुई, इसलिए मेरी नज़र केवल 0.1 रह गई। मैं शब्दों को भी साफ-साफ नहीं देख पाता था और मैं देखने के लिए केवल अपनी दाईं आँख का उपयोग कर सकता था। मैंने मूल रूप से कुछ समय बाद एक और सर्जरी कराने की योजना बनाई थी, लेकिन जून में एक यहूदा के विश्वासघात के कारण सीसीपी पुलिस हमें हर जगह गिरफ्तार करने की कोशिश करने लगी, इसलिए मैं और मेरी पत्नी दूसरे इलाके में भाग गए और मैंने इलाज के लिए अस्पताल जाने की हिम्मत नहीं की। उस समय मैं बस यह कर सकता था कि घर पर रहूँ और पाठ-आधारित कर्तव्य निभाऊँ, लेकिन जब मैं लंबे समय तक कंप्यूटर देखता तो मेरी नज़र धुँधली हो जाती थी और मुझे अपना कर्तव्य करना बहुत मुश्किल लगता था। यह देखकर कि मेरे आस-पास के भाई-बहनों की नज़र काफी अच्छी है, मैंने मन ही मन सोचा, “इन पिछले कुछ सालों में मैंने अपना कारोबार त्याग दिया और मैं कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाता आ रहा हूँ, तो फिर मुझे ही आँखों की यह बीमारी क्यों हुई? मेरी दाईं आँख की भी पहले सर्जरी हो चुकी थी, इसलिए अगर उसमें भी कुछ गड़बड़ हो गई तो मैं कौन-सा कर्तव्य निभा पाऊँगा? अगर मैं अपना कर्तव्य नहीं निभाता हूँ तो मैं कैसे बचाया जा सकता हूँ?” मैं इलाज के लिए अस्पताल जाने का जोखिम उठाना चाहता था, लेकिन मुझे सीसीपी द्वारा गिरफ्तार किए जाने का डर था, इसलिए मैंने जाने की हिम्मत नहीं की। मैंने सोचा कि कैसे कुछ भाई-बहन बीमार पड़ने के बाद भी अपने कर्तव्य में लगे रहे और बाद में पूरी तरह से ठीक हो गए। अगर मैं अपने कर्तव्य में लगा रहा तो क्या परमेश्वर मुझ पर दया नहीं करेगा और मुझे भी ठीक नहीं करेगा? शायद मेरी आँख ठीक हो जाए? इसलिए मैं इसी तरह अपना कर्तव्य करता रहा।
1 मई 2024 को मेरी दाईं आँख में अचानक बहुत सूजन और दर्द हो गया और मुझे चक्कर और मतली महसूस होने लगी। पल भर में, मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दिया। थोड़ी देर बाद मैं अपने सामने आकृतियों को धुँधले ढंग से हिलते हुए देख पा रहा था, लेकिन मैं साफ-साफ यह नहीं देख पा रहा था कि मैं कहाँ चल रहा हूँ। मैं अचानक स्तब्ध हो गया और सोचने लगा, “यह क्या हो रहा है? बीस साल से भी पहले मैंने अपनी दाईं आँख की रेटिना अलग होने के कारण सर्जरी कराई थी। क्या यह उसी पुरानी बीमारी का फिर से उभरना है? यह तो बहुत बुरा हुआ। मेरी बाईं आँख अभी तक ठीक नहीं हुई है और अब मैं अपनी दाईं आँख से भी नहीं देख पा रहा हूँ। अगर मैं दोनों आँखों से अंधा हो गया तो मैं कोई कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगा। परमेश्वर का कार्य समाप्त होने वाला है और इस महत्वपूर्ण समय में अगर मैं देख नहीं सका तो क्या मैं बेकार नहीं हो जाऊँगा? क्या मुझे निकाल दिया जाएगा?” मैं बहुत चिंतित था और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। फिर, मेरी दाईं आँख तेज दर्द की लहरों से जल उठी, मेरे सिर में बहुत दर्द हो रहा था और मुझे उल्टी होने जैसा महसूस होता रहा। कोई और चारा न होने पर मैंने अस्पताल जाकर जाँच कराने का जोखिम उठाया। डॉक्टर ने कहा कि मुझे एक्यूट एंगल-क्लोजर ग्लूकोमा है, इसलिए मेरी आँख का दबाव ज़्यादा था, मेरी पुतलियाँ फैली हुई थीं और मेरी आँख में गंभीर हाइपरेमिया था। उसने कहा कि बहुत संभावना है कि मेरी धुँधली नजर का कारण विट्रियस ओपेसिटी या लेंस डिस्प्लेसमेंट है। उसने कहा कि तुरंत अस्पताल में भर्ती होना ज़रूरी है, नहीं तो मैं अपनी दाईं आँख से अंधा हो सकता हूँ। यह सुनकर मुझे लगा, “मेरा तो काम तमाम हो गया। मेरी बाईं आँख की नजर कमजोर है और अगर मैं अपनी दाईं आँख से भी नहीं देख पाया तो क्या मैं सचमुच अंधा नहीं हो जाऊँगा? कर्तव्य निभाना तो दूर की बात है—दैनिक जीवन सँभालना तक समस्या बन जाएगा। तब मैं क्या करूँगा? मैं पिछले कुछ सालों से कलीसिया में पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ, तो फिर मुझे ऐसी बीमारी कैसे हो सकती है? अगर सिर्फ पीठ का दर्द या पैर का दर्द होता तो भी ठीक था; कम से-कम उससे मेरे कर्तव्य में देरी तो नहीं होती। लेकिन अगर मेरी आँखें देख नहीं सकतीं और मैं कोई कर्तव्य नहीं कर सकता तो क्या मैं बेकार नहीं हो जाऊँगा? मैं इस तरह अभी भी कैसे बचाया जा सकता हूँ?” मैंने इस बारे में जितना अधिक सोचा, मैं उतना ही अधिक नकारात्मक होता गया। मैं तीन दिन तक अस्पताल में भर्ती रहा और डॉक्टर ने कई तरह के इलाज आज़माए, लेकिन मेरी आँख का दबाव घटता-बढ़ता रहा। मेरी पुतलियाँ सामान्य नहीं हो पा रही थीं और मुझे दोहरी छवियाँ दिख रही थीं, मानो मैंने 2,000 डिग्री की पढ़ने वाली ऐनक पहनी हो। मेरी नज़र केवल 0.04 रह गई थी। डॉक्टर ने कहा कि फिलहाल कोई कारगर इलाज नहीं है और एकमात्र विकल्प पहले एक पंक्चर सर्जरी करना है। इस तरह वह देख सकता था कि क्या नेत्र दबाव घटाया जा सकता है, वह नेत्र के लेंस की स्थिति जाँच सकता था और फिर तय कर सकता था कि क्या दूसरी सर्जरी करनी है। यह सुनकर मेरा दिल बैठ गया और बिस्तर पर लेटे-लेटे मेरे मन में तरह-तरह के ख्याल आने लगे : “सीसीपी इतने सालों से मेरा पीछा कर रही है और मैंने अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपना कारोबार छोड़ दिया। भले ही मेरी एक ही आँख ठीक से काम कर रही थी, फिर भी मैं अपना कर्तव्य करता रहा और मेरे कर्तव्य के कुछ नतीजे भी निकले, तो फिर परमेश्वर मेरी रक्षा क्यों नहीं कर रहा है? क्या ऐसा हो सकता है कि मैंने पर्याप्त कीमत नहीं चुकाई या खुद को पर्याप्त नहीं खपाया?” सैद्धांतिक रूप से, मैं जानता था कि मुझे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए, लेकिन मैं अपने दिल में अभी भी यह उम्मीद कर रहा था कि परमेश्वर मेरी आँखें ठीक कर देगा। अगर कोई चमत्कार हो जाए तो कितना अच्छा होगा! बाद में, मैंने बगल वाले बिस्तर पर एक साथी मरीज़ को देखा, जिसकी रेटिना अलग होने की सर्जरी हुई थी, लेकिन उसके बाद भी उसकी आँख का दबाव ज़्यादा बना रहा। उसकी दोनों आँखों की नज़र लगभग जा चुकी थी, उसे धीरे-धीरे चलने के लिए भी अपनी पत्नी का कंधा पकड़ना पड़ता था और उसके ठीक होने की अब कोई उम्मीद नहीं बची थी। यह देखकर मुझे फिर से चिंता होने लगी कि कहीं मेरा भी हाल उसके जैसा न हो जाए। मेरे बच्चे ने मुझे बताया कि इंटरनेट पर लिखा है कि ग्लूकोमा से गई नज़र वापस नहीं आती और इस बीमारी का फिलहाल कोई इलाज नहीं है। यह सुनकर मैं और भी ज़्यादा परेशान और व्यथित हो गया और शिकायत करने लगा, “बीमारी का सामना करने पर इतने सारे भाई-बहन परमेश्वर द्वारा ठीक किए जा चुके हैं तो फिर परमेश्वर मुझ पर अनुग्रह क्यों नहीं कर रहा है?” मैं अपने दिल में समर्पण नहीं कर पा रहा था और मैं अब और प्रार्थना नहीं करना चाहता था। मैं आहें भरकर दिन बिताता था, मेरा खाने का मन नहीं करता था और मैं ठीक से सो भी नहीं पाता था। कुछ ही दिनों में मेरा वज़न कई पाउंड कम हो गया। दूसरी सर्जरी के बाद डॉक्टर ने मेरी आँख में एक कृत्रिम लेंस लगा दिया और जब मैं ऑपरेशन रूम से बाहर आया तो मेरी आँख तीखे दर्द से जल रही थी और मेरे सिर में भी बहुत दर्द हो रहा था। मेरी आँख का दबाव इतना ज़्यादा था कि उसे मापा भी नहीं जा सकता था। डॉक्टर हर आधे घंटे में सर्जिकल चीरे के ज़रिए केवल एक्वियस ह्यूमर निकाल सकता था और आँख का दबाव कम करने के लिए दवा का इस्तेमाल कर सकता था। लेकिन छह घंटे बीत गए और आँख का दबाव फिर भी कम नहीं हुआ। डॉक्टर ने कहा कि यह बहुत खतरनाक है, सर्जरी बेकार जा सकती है और मेरी नज़र नहीं बचाई जा सकती। यह सोचकर कि भविष्य में शायद मैं अपनी दाईं आँख से कुछ भी न देख पाऊँ, मुझे अंदर से गहरा दर्द महसूस हुआ। तब आखिरकार मैंने आत्मचिंतन करना शुरू किया। जब से मुझे आँखों की बीमारी हुई थी, तब से लेकर इस बिंदु तक, मुझमें समर्पण का कोई रवैया नहीं था, केवल परमेश्वर के प्रति शिकायतें और गलतफहमियाँ थीं और मुझमें वह समझ बिल्कुल नहीं थी जो परमेश्वर में विश्वास करने वाले व्यक्ति में होनी चाहिए। इसलिए मैंने प्रार्थना की और अपनी आँखों की बीमारी को परमेश्वर के हाथों में सौंप दिया, चाहे मेरी आँखों का कुछ भी हो, मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने को तैयार था। अप्रत्याशित रूप से, थोड़ी देर बाद, मेरी आँखें धुँधला-सा थोड़ा-बहुत देख सकती थीं और मेरी आँख का दबाव धीरे-धीरे सामान्य हो गया। अगले दिन यूँ तो मेरी नज़र अभी भी धुँधली थी, लेकिन यह सुधरकर 0.2 हो गई। मैं अचानक आनंद से भर उठा और यह जानकर कि यह परमेश्वर की दया और मेरी कमज़ोरी के प्रति उसकी समझ थी, मैं अपने दिल में परमेश्वर का धन्यवाद करता रहा।
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद, मैं आराम करने और ठीक होने के लिए कुछ समय तक एक रिश्तेदार के घर पर रहा। इस दौरान अगुआओं, पर्यवेक्षकों और दूसरे भाई-बहनों ने भी पत्र लिखकर मेरे प्रति हमदर्दी जाहिर की, मेरी दशा के बारे में पूछा और मेरी मदद और सहारे के लिए परमेश्वर के वचन खोजे। मेरी पत्नी ने भी ऊँचे स्वर में परमेश्वर के वचन पढ़कर मुझे सुनाए, जिनमें से परमेश्वर के वचनों के दो अंश मेरे लिए बहुत मददगार थे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “क्या तुम बीमारी और कष्ट आने पर परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और उससे मदद माँगते हो? पवित्र आत्मा तुम्हें मार्गदर्शन और अगुआई देने के लिए कैसे काम करता है? क्या वह केवल तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन करता है? यह उसका एकमात्र तरीका नहीं है; वह तुम्हारा परीक्षण करेगा और तुम्हें शोधित भी करेगा। परमेश्वर लोगों का परीक्षण कैसे करता है? क्या वह लोगों को कष्ट देकर उनका परीक्षण नहीं करता? परीक्षणों के साथ कष्ट आता है। यदि परीक्षण न हों, तो लोग कैसे कष्ट सह सकते हैं? और परीक्षणों के कष्ट के बिना, लोग कैसे बदल सकते हैं? परीक्षणों के साथ कष्ट आता है—यदि लोग परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं, तो पवित्र आत्मा काम करेगा” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर पर विश्वास करने में सत्य प्राप्त करना सबसे महत्वपूर्ण चीज है)। “जब लोगों पर बीमारी आती है, तो उन्हें किस पथ पर चलना चाहिए? उन्हें कैसे चुनना चाहिए? लोगों को संताप, व्याकुलता और चिंता में डूबकर अपने भविष्य और इन स्थितियों से निकलने के रास्तों के बारे में नहीं सोचना चाहिए। बल्कि, लोग खुद को जितना ज्यादा ऐसे दौर और ऐसी खास स्थितियों और संदर्भों में पाएँ और ऐसी व्यक्तिगत मुश्किलों में पाएँ, उतना ही ज्यादा उन्हें सत्य खोजना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए। ऐसा करके ही पहले तुमने जो धर्मोपदेश सुने हैं और जो सत्य समझे हैं, वे प्रभावी होंगे और बेकार नहीं होंगे। तुम खुद को जितना ज्यादा ऐसी मुश्किलों में पाते हो, तुम्हें उतना ही अपनी इच्छाओं को त्यागकर परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होना चाहिए। तुम्हारे लिए ऐसी स्थिति बनाने और इन हालात की व्यवस्था करने में परमेश्वर का प्रयोजन तुम्हें संताप, व्याकुलता और चिंता की भावनाओं में डुबोना नहीं है, यह इस बात के लिए भी नहीं है कि तुम परमेश्वर की परीक्षा ले सको कि क्या वह वास्तव में तुम पर बीमारी आने पर तुम्हें ठीक करेगा, जिससे मामले की सच्चाई पता चल सके; परमेश्वर तुम्हारे लिए इन विशेष स्थितियों या हालात का इंतजाम इसलिए करता है ताकि तुम ऐसी स्थितियों और परिस्थितियों में व्यावहारिक सबक सीख सको, सत्य में और परमेश्वर के प्रति समर्पण में अधिक गहराई से प्रवेश कर सको और ताकि तुम ज्यादा स्पष्ट और सही ढंग से जान सको कि परमेश्वर सभी लोगों, घटनाओं और चीजों को कैसे आयोजित करता है। लोगों के भाग्य परमेश्वर के हाथों में होते हैं; चाहे लोग इसे भाँप सकें या नहीं, वे इस बारे में सचमुच अवगत हों या न हों, उन्हें समर्पण करना चाहिए, प्रतिरोध नहीं करना चाहिए, ठुकराना नहीं चाहिए और निश्चित रूप से परमेश्वर की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए। किसी भी सूरत में तुम्हारी मृत्यु हो सकती है और अगर तुम प्रतिरोध करते हो, ठुकराते हो और परमेश्वर की परीक्षा लेते हो, तो यह कहने की जरूरत नहीं कि तुम्हारा अंतिम परिणाम कैसा होगा। इसके विपरीत, मान लो कि जब तुम बीमारी का सामना करते हो, तो तुम यह खोज पाते हो कि किसी सृजित प्राणी को सृष्टिकर्ता के आयोजनों के प्रति कैसे समर्पण करना चाहिए, यह खोज पाते हो कि कौन-से सबक परमेश्वर चाहता है कि तुम सीखो और तुम्हारे सामने आई इस स्थिति में कौन-से भ्रष्ट स्वभावों के बारे में परमेश्वर चाहता है कि तुम जानो; इस तरह तुम परमेश्वर के इरादों को समझ सकते हो और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने के लिए एक अच्छी गवाही दे सकते हो। अगर तुम इस तरीके से अभ्यास करते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण हासिल कर सकने में सक्षम होगे” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैंने परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे को महसूस किया। परमेश्वर का इरादा यह नहीं था कि मैं चिंता और व्यथा की नकारात्मक भावनाओं में जिऊँ, बल्कि यह था कि मैं प्रार्थना करूँ, उस पर निर्भर रहूँ और उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करूँ ताकि इस मामले से मैं सत्य खोज सकूँ, आत्मचिंतन कर सकूँ और खुद को जान सकूँ। परमेश्वर मेरी बीमारी का इस्तेमाल मेरी भ्रष्टता को शुद्ध करने के लिए कर रहा था और यह उसका प्रेम था। एक बार जब मैं परमेश्वर का इरादा समझ गया तो मैं हर दिन प्रार्थना करने लगा, परमेश्वर से विनती करता था कि वह सबक सीखने में मेरा मार्गदर्शन करे। मेरी पत्नी भी अक्सर मुझे परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाती थी। धीरे-धीरे, मैं अब उतना हताश महसूस नहीं करता था और मेरी दशा में बहुत सुधार हुआ। कुछ समय बाद, मैं दोबारा जाँच के लिए अस्पताल गया और आश्चर्यजनक रूप से, मेरी नज़र 0.3 तक पहुँच गई थी। मैंने एक और चश्मा बनवाया और मैं कंप्यूटर पर शब्दों को थोड़ा और साफ देख सकता था और मेरी टाइपिंग पर अब कोई खास असर नहीं पड़ रहा था।
इसके बाद, मैंने विचार करना शुरू किया, “इस बीमारी के जरिए मैंने इतनी सारी शिकायतें और गलतफहमियाँ प्रकट कीं—मुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव के किस पहलू पर विचार करना चाहिए?” एक दिन मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “सभी लोग आशीषें, पुरस्कार और मुकुट पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। क्या हर व्यक्ति के दिल में यह इरादा नहीं होता? वास्तव में, हर व्यक्ति के दिल में यही होता है। यह एक तथ्य है। यद्यपि लोग अक्सर इसके बारे में बात नहीं करते और यहाँ तक कि आशीषें प्राप्त करने के अपने इरादे और इच्छा को छिपाते भी हैं, यह इच्छा, यह इरादा और उद्देश्य जो लोगों के दिलों में गहराई तक निहित है, कभी भी डगमगाया नहीं है। चाहे लोग कितना भी आध्यात्मिक सिद्धांत समझें, उनके पास कोई भी अनुभवजन्य ज्ञान हो, वे कोई भी कर्तव्य कर सकते हों, वे कितना भी कष्ट सहें या वे कितनी भी कीमत चुकाएँ, वे कभी भी आशीषें प्राप्त करने के उस इरादे को नहीं छोड़ते जो उनके दिलों में गहराई से छिपा हुआ है, वे हमेशा चुपचाप इसकी सेवा में मेहनत और भाग-दौड़ करते रहते हैं। क्या यही वह चीज नहीं है जो लोगों के दिलों में सबसे गहराई में दबी हुई है? आशीषें प्राप्त करने के इस इरादे के बिना, तुम लोगों को कैसा महसूस होगा? तुम किस रवैये से अपना कर्तव्य निभाओगे और परमेश्वर का अनुसरण करोगे? यदि आशीषें प्राप्त करने का यह इरादा जो उनके दिलों में छिपा है, पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाए तो लोगों का क्या होगा? यह संभव है कि बहुत-से लोग नकारात्मक हो जाएँगे, कुछ लोग अपने कर्तव्यों में उत्साहहीन हो जाएँगे और परमेश्वर में अपने विश्वास में रुचि खो देंगे। वे ऐसे लगने लगेंगे जैसे उन्होंने अपनी आत्मा खो दी हो और ऐसा प्रतीत होगा जैसे उनके दिल छीन लिए गए हों। इसीलिए मैं कहता हूँ कि आशीषें प्राप्त करने का इरादा कुछ ऐसा है जो लोगों के दिलों में गहराई से छिपा हुआ है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन संवृद्धि के छह संकेतक)। “परमेश्वर का अनुसरण करने में इन लोगों का उद्देश्य बहुत सरल होता है और यह एक ही लक्ष्य के लिए होता है : आशीषित होना। ये लोग ऐसी किसी भी दूसरी चीज के लिए प्रयास नहीं करना चाहते हैं जो इस उद्देश्य से संबंध नहीं रखती। उनके लिए, परमेश्वर में विश्वास करने का कोई भी लक्ष्य आशीष प्राप्त करने से ज्यादा वैध नहीं है—यह उनकी आस्था का असली मूल्य है। यदि कोई चीज इस उद्देश्य को प्राप्त करने में योगदान नहीं करती, तो चाहे जो भी हो वे उससे अप्रभावित रहते हैं। आज परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोगों का यही हाल है। उनके उद्देश्य और इरादे न्यायोचित प्रतीत होते हैं, क्योंकि जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं और अपना कर्तव्य भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी न्योछावर कर देते हैं, परिवार और आजीविका त्याग देते हैं, यहाँ तक कि दौड़-धूप करने के लिए वर्षों अपने घर से दूर बिताते हैं। अपने परम उद्देश्य के लिए वे अपनी रुचियाँ बदल डालते हैं, अपने जीवन का दृष्टिकोण बदल देते हैं, यहाँ तक कि अपने अनुसरण की दिशा तक बदल देते हैं, किंतु परमेश्वर पर अपने विश्वास के उद्देश्य को नहीं बदल सकते। ... उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े उन लाभों के अतिरिक्त, परमेश्वर को कभी नहीं समझने वाले लोगों द्वारा उसके लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? यहाँ हमें एक ऐसी समस्या का पता चलता है जिसे मनुष्य पहले पता नहीं लगा सका है : परमेश्वर के साथ मनुष्य का संबंध केवल नग्न स्वार्थ पर आधारित है। यह आशीष लेने वाले और देने वाले के मध्य का संबंध है। स्पष्ट रूप से कहें तो यह एक कर्मचारी और एक नियोक्ता के मध्य का संबंध है। कर्मचारी केवल नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले प्रतिफल प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करता है। इस प्रकार के स्वार्थ आधारित संबंध में कोई आत्मीय स्नेह नहीं होता, केवल लेन-देन होता है। प्रेम करने या प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होती है। कोई समझ नहीं होती, केवल असहाय दबा हुआ आक्रोश और धोखा होता है। कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक अगम खाई होती है। अब जबकि चीजें इस बिंदु तक आ गई हैं तो ऐसी राह को कौन उलट सकता है? और कितने लोग इस बात को वास्तव में समझने में सक्षम हैं कि यह संबंध कितना भयावह बन चुका है? मेरा मानना है कि जब लोग आशीष प्राप्त होने के आनंदपूर्ण वातावरण में निमग्न हो जाते हैं तो कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि परमेश्वर के साथ ऐसा संबंध कितना अटपटा और भद्दा है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है)। परमेश्वर ने मेरी सही दशा को उजागर कर दिया। परमेश्वर में बरसों विश्वास करने के दौरान मैंने अपना घर और पेशा छोड़ दिया, कष्ट सहा और खुद को खपाया और यह सब इसलिए था ताकि मैं आशीष पा सकूँ, बचाया जा सकूँ और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकूँ। जब मैंने पहली बार परमेश्वर को पाया था, उस समय को याद करते हुए, मेरा मानना था कि जब तक मैं अपना कर्तव्य निभाता हूँ, चीज़ें त्यागता हूँ और खुद को खपाता हूँ, मुझे निश्चित रूप से परमेश्वर के आशीष मिलेंगे। इसी कारण से, मैंने सक्रिय रूप से अपना कर्तव्य निभाया और अपने कर्तव्य में देरी से बचने के लिए मैंने अपना कारोबार तक छोड़ दिया। मुझे लगा कि मुझमें असीम ऊर्जा है और मेरा एकमात्र लक्ष्य आशीषों का अनुसरण करना था। बाद में, मेरी बाईं आँख में बीमारी हो गई और मेरी नज़र कम हो गई, लेकिन मैं फिर भी अपने कर्तव्य में लगा रहा। मैंने सोचा कि परमेश्वर मेरे कर्तव्य में मेरी लगन और उसके प्रति मेरे समर्पण को ध्यान में रखेगा और इसलिए मेरी आँख ठीक कर देगा और भविष्य में मुझे एक अच्छी मंज़िल देगा। मुझे आश्चर्य हुआ कि न केवल मेरी बाईं आँख ठीक नहीं हुई, बल्कि मेरी दाईं आँख में भी ग्लूकोमा हो गया। मुझे बिल्कुल भी कुछ नहीं दिखाई दे रहा था और मैं कोई कर्तव्य नहीं निभा सकता था। जब मैंने देखा कि आशीष पाने की कोई उम्मीद नहीं है तो मुझे बहुत पीड़ा और व्यथा महसूस हुई और मैं परमेश्वर के प्रति गलतफहमियों और शिकायतों से भर गया। मैं अपने दिल में परमेश्वर से बहस करता रहा और उससे माँग करता रहा कि वह मुझे ठीक कर दे। परमेश्वर के वचनों के न्याय और प्रकाशन के माध्यम से मैंने आखिरकार देखा कि मैं स्वर्ग के राज्य के आशीषों के लिए सौदेबाजी करने हेतु अपने कर्तव्य का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा था और परमेश्वर के साथ मेरा रिश्ता सिर्फ नग्न स्वार्थ का था। अपना कर्तव्य निभाने के सारे सालों में मैंने सत्य का अनुसरण नहीं किया था और मेरा भ्रष्ट स्वभाव कुछ खास नहीं बदला था। मेरे कष्ट सहने और कीमत चुकाने के पीछे परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने के छिपे हुए प्रयास थे। मैं परमेश्वर के प्रति माँगों और धोखे से भरा था और मुझमें थोड़ा-सा भी सच्चा दिल नहीं था। बाद में मैंने खोज शुरू की, “मेरी आस्था में लगातार आशीषों की इच्छा रखने का मूल कारण क्या है?”
मैंने खोज में परमेश्वर के वचन पढ़े : “लोग जो कुछ भी करते हैं—वे चाहे प्रार्थना कर रहे हों या संगति कर रहे हों या धर्मोपदेश दे रहे हों—वे जिस चीज के बारे में सोचते हैं, जिस चीज का अनुसरण करते हैं और जिस चीज के लिए लालायित रहते हैं, वह हमेशा परमेश्वर से चीजें माँगने और उनके लिए आग्रह करने के समान ही होता है, उससे कुछ प्राप्त करने की उम्मीद करना होता है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘यह बात मानव प्रकृति पर आकर ठहर जाती है,’ जो सही है। इसके अलावा, परमेश्वर से लोगों का बहुत अधिक माँगें करना और बहुत अधिक असंयत लालसाएँ रखना यह साबित करता है कि लोग पूरी तरह अंतरात्मा और विवेक से रहित हैं। वे सब अपने लिए चीजों की माँग और आग्रह कर रहे हैं, या अपने लिए औचित्य साबित करने और बहाने बनाने की कोशिश कर रहे हैं—वे यह सब अपने लिए करते हैं। बहुत सारे मामलों में देखा जा सकता है कि लोग जो कुछ करते हैं वह पूरी तरह विवेक से रहित है, जो पूरी तरह यह साबित करता है कि ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए’ वाला शैतानी तर्क पहले ही मनुष्य की प्रकृति बन चुका है। परमेश्वर से लोगों का बहुत अधिक माँगें करना किस समस्या को दर्शाता है? यह दर्शाता है कि लोगों को शैतान एक निश्चित बिंदु तक भ्रष्ट कर चुका है, और परमेश्वर में अपने विश्वास में वे उसे परमेश्वर बिल्कुल भी नहीं मानते हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, लोग परमेश्वर से बहुत अधिक माँगें करते हैं)। “जिनके दिलों में परमेश्वर है, उनका चाहे किसी भी प्रकार से परीक्षण क्यों न किया जाए, उनकी निष्ठा अपरिवर्तित रहती है; किंतु जिनके दिलों में परमेश्वर नहीं है, वे अपनी देह के लिए परमेश्वर का कार्य लाभदायक न रहने पर परमेश्वर के बारे में अपना दृष्टिकोण बदल लेते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़कर चले जाते हैं। वे ऐसे लोग हैं जो अंत में दृढ़ नहीं रहेंगे, जो केवल परमेश्वर की आशीषों की तलाश करते हैं और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने और उसके प्रति समर्पण करने की कोई इच्छा नहीं रखते। ऐसे सभी नीच लोगों को तब ‘बाहर निकाल दिया जाएगा’ जब परमेश्वर का काम समाप्त हो जाएगा और उन पर बिल्कुल भी कोई दया नहीं दिखाई जाएगी। जिन लोगों में मानवता नहीं है, उनमें परमेश्वर के लिए बिल्कुल भी सच्चा प्रेम नहीं होता। जब परिवेश आरामदायक होता है या उनके पास कुछ प्राप्त करने का अवसर होता है, तो वे परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी होते हैं, लेकिन एक बार जब उनकी इच्छाएँ बाधित होती हैं या अंततः वे धराशायी हो जाती हैं, तो वे तुरंत विद्रोह में उठ खड़े होते हैं। यहाँ तक कि सिर्फ एक रात के अंतराल में, वे एक मुस्कुराते हुए, ‘दयालु’ व्यक्ति से एक जंगली दिखने वाले जल्लाद में बदल जाते हैं, बिना किसी तुक या कारण के अप्रत्याशित रूप से अपने कल के उपकारी के साथ अपने घातक दुश्मन की तरह पेश आते हैं। यदि इन दुष्ट राक्षसों को जो बिना पलक झपकाए मारते हैं, बहिष्कृत नहीं किया जाता, तो क्या वे एक गंभीर अंतर्निहित खतरा नहीं बन जाएँगे?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे एहसास दिलाया कि मेरा लगातार आशीषों का अनुसरण करना, “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “मनुष्य धन के लिए मरता है, जैसे पक्षी भोजन के लिए मरते हैं,” और “बिना पुरस्कार के कभी कोई काम मत करो” जैसे शैतानी ज़हरों के अनुसार जीने से उपजा था। मैंने जो कुछ भी किया, उसका उद्देश्य खुद को लाभ पहुँचाना था और मेरी प्रकृति विशेष रूप से लालची और स्वार्थी थी। जब मैंने पहली बार अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया, तो मैंने जाना कि परमेश्वर मानवजाति को बचाने के लिए अपने कार्य का अंतिम चरण पूरा कर रहा है और केवल परमेश्वर में विश्वास करके और अपना कर्तव्य निभाकर ही मेरे पास बचाए जाने और बचे रहने का मौका हो सकता है। मैंने इसे जीवन में एक बार मिलने वाले अवसर के रूप में देखा, इसलिए मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना कारोबार छोड़ दिया और पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य निभाने का फैसला किया। अगर आशीष और लाभ पाने की बात न होती तो मुझमें इतना उत्साह बिल्कुल नहीं होता। इन सालों के दौरान यूँ तो मैं केवल एक आँख से साफ देख सकता था, फिर भी मैं अपने कर्तव्य में लगा रहा, यह सोचता रहा कि ऐसा करने से मैं बचा लिया जाऊँगा और एक अच्छी मंज़िल पाऊँगा। मैं परमेश्वर के साथ एक नियोक्ता की तरह पेश आया और थोड़ा-सा कर्तव्य निभाने के बाद मैंने बेशर्मी से परमेश्वर से आशीषों और वादों की माँग की, यह सोचता रहा कि मैं परमेश्वर से कैसे लाभ उठा सकता हूँ। जब मेरी दाईं आँख में बीमारी हो गई और मुझे अंधा होने और कोई कर्तव्य न कर पाने की संभावना का सामना करना पड़ा तो मैंने सोचा कि मैं एक अनुपयोगी व्यक्ति बनने वाला हूँ और हटाया जाने वाला हूँ। मुझे लगा कि मेरे सालों का सारा प्रयास और खपना बेकार जा सकता है और आशीष पाने की मेरी उम्मीद टूट सकती है। इसलिए मैं इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा था और परमेश्वर के प्रति गलतफहमियों और शिकायतों से भरा था। मैंने यह भी सवाल किया कि उसने मुझ पर ऐसी बीमारी क्यों आने दी। मेरे ये व्यवहार ठीक वैसे ही थे जैसा परमेश्वर ने उजागर किया था : “जिन लोगों में मानवता नहीं है, उनमें परमेश्वर के लिए बिल्कुल भी सच्चा प्रेम नहीं होता। जब परिवेश आरामदायक होता है या उनके पास कुछ प्राप्त करने का अवसर होता है, तो वे परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी होते हैं, लेकिन एक बार जब उनकी इच्छाएँ बाधित होती हैं या अंततः वे धराशायी हो जाती हैं, तो वे तुरंत विद्रोह में उठ खड़े होते हैं। यहाँ तक कि सिर्फ एक रात के अंतराल में, वे एक मुस्कुराते हुए, ‘दयालु’ व्यक्ति से एक जंगली दिखने वाले जल्लाद में बदल जाते हैं, बिना किसी तुक या कारण के अप्रत्याशित रूप से अपने कल के उपकारी के साथ अपने घातक दुश्मन की तरह पेश आते हैं।” अपनी आस्था में मैं परमेश्वर को परमेश्वर मानकर उससे पेश नहीं आया। मैं अपने कर्तव्य को सौदेबाजी की चीज मानकर पेश आता था जिसे मैं आशीषों और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश के बदले इस्तेमाल कर सकता था। मूलतः मैं परमेश्वर का इस्तेमाल करने और उसके खिलाफ साजिश करने की कोशिश कर रहा था, यह सोचता था कि मैं अपने कीमत चुकाने और कड़ी मेहनत का इस्तेमाल बड़े आशीषों के लेन-देन के लिए कर सकता हूँ। मुझमें किस रूप में कोई मानवता या विवेक था? जब यह परीक्षण आया, तो मैंने यह नहीं सोचा कि परमेश्वर को कैसे संतुष्ट किया जाए और मुझे केवल अपने भविष्य और मंज़िल की चिंता थी। मैं सचमुच स्वार्थी और नीच था! जब से मैंने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया था, मैं परमेश्वर के वचनों का सिंचन और भरण-पोषण पा रहा था और परमेश्वर ने मुझे अपना कर्तव्य निभाने के अवसर भी दिए, जिससे मैं अपने कर्तव्य के दौरान, सत्य के विभिन्न पहलुओं को धीरे-धीरे समझ और पा सका। यह सब मेरे लिए परमेश्वर का प्रेम और उद्धार था, लेकिन मैं अपने कर्तव्य को आशीष पाने का माध्यम मानकर पेश आता था। यह परमेश्वर के लिए सचमुच घिनौना और घृणित था! मैंने वह याद किया जो पौलुस ने कहा था, “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है” (2 तीमुथियुस 4:7-8)। पौलुस ने अपनी कड़ी मेहनत और चुकाई हुई कीमत का इस्तेमाल परमेश्वर से धार्मिकता का मुकुट माँगने के लिए किया, यह दावा किया था कि अगर परमेश्वर ने उसे यह प्रदान नहीं किया तो वह अधार्मिक होगा और उसने खुलेआम परमेश्वर के खिलाफ शोर मचाया और उसका विरोध किया। इसने परमेश्वर के स्वभाव को नाराज किया और इसलिए पौलुस परमेश्वर द्वारा दंडित किया गया। क्या मैं अब पौलुस के ही रास्ते पर नहीं चल रहा था? अगर मैंने पश्चात्ताप न किया तो मैं भी अंततः नरक में दंडित होऊँगा!
बाद में मैंने परमेश्वर के और अधिक वचन पढ़े और एहसास किया कि अपना कर्तव्य निभाने का कोई भी वास्ता आशीष प्राप्त करने या दुर्भाग्य झेलने से नहीं है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मनुष्य के कर्तव्य और उसे आशीष होंगे या हाय का सामना करना होगा, इन दोनों के बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए निभाना आवश्यक है; यह उसकी स्वर्ग द्वारा प्रेषित वृत्ति है, उसे प्रतिफल खोजे बिना, और बिना शर्तों या बहानों के इसे करना चाहिए। केवल इसे अपना कर्तव्य निभाना कहा जा सकता है। आशीष प्राप्त होना उन आशीषों को संदर्भित करता है जिनका कोई व्यक्ति तब आनंद लेता है जब उसे न्याय का अनुभव करने के बाद पूर्ण बनाया जाता है। हाय का सामना करना उस सज़ा को संदर्भित करता है जो एक व्यक्ति को तब मिलती है जब ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद भी लोगों का स्वभाव नहीं बदलता—अर्थात् जब उन्हें पूर्ण नहीं बनाया जाता। लेकिन इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्हें आशीष प्राप्त होते हैं या हाय का सामना करना पड़ता है, सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए; वह करते हुए, जो उन्हें करना ही चाहिए और वह करते हुए, जिसे करने में वे सक्षम हैं। यह तो कम से कम व्यक्ति को, परमेश्वर का अनुसरण करने वाले व्यक्ति को करना ही चाहिए। तुम्हें अपना कर्तव्य आशीष प्राप्त करने की खातिर नहीं निभाना चाहिए और तुम्हें हाय का सामना करने के भय से अपना कर्तव्य निभाने से इनकार भी नहीं करना चाहिए” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर)। परमेश्वर के वचन कितने स्पष्ट हैं! कर्तव्य मनुष्य को परमेश्वर का आदेश है और यह एक सृजित प्राणी की ऐसी जिम्मेदारी है जिससे जी नहीं चुराया जा सकता है। इसमें कोई गुप्त इरादा या अशुद्धता नहीं होनी चाहिए। ठीक जैसे बच्चों का अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होना बिल्कुल स्वाभाविक और न्यायोचित है, इसमें लाभ का कोई अनुसरण नहीं होना चाहिए। यही नहीं, क्या कोई व्यक्ति बचाया जा सकता है यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वह अपना कर्तव्य निभाने के दौरान सत्य का अनुसरण करता है, परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों और चीजों को देखता है और क्या उसका भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध और रूपांतरित हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर की माँगों के अनुसार आचरण कर सकता है और अपने काम कर्तव्यनिष्ठ होकर पूरा कर सकता है, एक सृजित प्राणी के स्थान पर खड़ा हो सकता है और अपना कर्तव्य अच्छे से निभा सकता है और चाहे उस पर कितने भी बड़े परीक्षण या शोधन क्यों न आएँ, वह कोई गलतफहमी या शिकायत नहीं रखता और बिना शर्त परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकता है और अंत में परमेश्वर के प्रति समर्पण और भय प्राप्त कर सकता है, तो ऐसा व्यक्ति बचाया जा सकता है और अंततः बचा रहेगा। ऐसा नहीं है कि अगर कोई अपना कर्तव्य निभा सकता है तो वह बचा लिया जाएगा, भले ही उसका भ्रष्ट स्वभाव बिल्कुल भी न बदला हो—यह दृष्टिकोण पूरी तरह से मेरी अपनी धारणा और कल्पना था और बिल्कुल बेहूदा था। तब से मैं अपने साथ घटित होने वाली सारी चीजों में परमेश्वर के इरादे खोजने और सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर के उद्धार का प्रतिफल चुकाने के लिए अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने को इच्छुक था। इसके बाद मेरी दशा कुछ हद तक बदल गई। कभी-कभी कुछ देर धर्मोपदेश पढ़ने के बाद मेरी आँखें अभी भी धुँधली हो जाती थीं और मुझे आराम करना पड़ता था, लेकिन मेरे दिल में पहले जैसा दुख महसूस नहीं होता था।
मैंने भक्ति के दौरान परमेश्वर के और अधिक वचन पढ़े और इस बारे में अधिक समझ प्राप्त की कि जब बीमारी आ जाए तो अभ्यास कैसे किया जाए। परमेश्वर कहता है : “आओ ... बीमारी के बारे में बात करें; यह कुछ ऐसा है जिसका अनुभव अधिकतर लोग अपने जीवनकाल में करेंगे। इसलिए, किसी निश्चित समय या किसी निश्चित उम्र में किसी को किस तरह की बीमारी का अनुभव करना है और उसका स्वास्थ्य कैसा रहेगा, ये सभी चीजें परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित हैं और लोग इन चीजों का फैसला खुद नहीं कर सकते हैं; ठीक उसी तरह जैसे जब कोई पैदा होता है तो वह इसका फैसला खुद नहीं कर पाता है। तो क्या जिन चीजों के बारे में तुम फैसला नहीं ले सकते, उनको लेकर तुम्हारा संतप्त, व्याकुल और चिंतित महसूस करना बेवकूफी नहीं है? (है।) लोगों को उन चीजों को सुलझाने में लगना चाहिए जिन्हें वे खुद सुलझा सकें, और जो चीजें वे नहीं सुलझा सकते, उनके लिए उन्हें परमेश्वर की प्रतीक्षा करनी चाहिए; लोगों को चुपचाप समर्पण करना चाहिए और परमेश्वर से विनती करनी चाहिए कि वह उनकी रक्षा करे—लोगों की मानसिकता ऐसी ही होनी चाहिए। जब रोग सचमुच जकड़ ले और मृत्यु सचमुच करीब हो, तो लोगों को समर्पण करना चाहिए, परमेश्वर के खिलाफ शिकायत या विद्रोह नहीं करना चाहिए, या ऐसी चीजें नहीं कहनी चाहिए जो परमेश्वर की ईशनिंदा करती हों या उस पर हमला करती हों। इसके बजाय, लोगों को सृजित प्राणियों के रूप में अपना उचित स्थान ग्रहण करना चाहिए और वह सब अनुभव और महसूस करना चाहिए जो परमेश्वर से आता है—उन्हें अपने लिए चीजों को खुद चुनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यह तुम्हारे जीवन को समृद्ध करने वाला एक विशेष अनुभव हो सकता है और यह अनिवार्य रूप से कोई बुरी चीज नहीं है, है न? इसलिए बीमारी की बात आने पर, जब लोगों के बीमारी के उद्गम से जुड़े गलत विचारों और दृष्टिकोणों का सबसे पहले समाधान होता है, तब उन्हें इसके बारे में अब कोई चिंता नहीं होगी। यही नहीं, लोगों के पास ज्ञात-अज्ञात चीजों पर नियंत्रण करने की कोई शक्ति नहीं है, न ही वे इन्हें नियंत्रित करने में सक्षम हैं क्योंकि ये तमाम चीजें परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं। लोगों के पास जो रवैया और अभ्यास का सिद्धांत होना चाहिए, वह है प्रतीक्षा और समर्पण करना। समझने से लेकर अभ्यास करने तक सब कुछ सत्य सिद्धांतों के अनुरूप किया जाना चाहिए—यह सत्य का अनुसरण करना है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (4))। “तो तुम कैसे चुनोगे और बीमार पड़ने से तुम्हें किस तरह निपटना चाहिए? यह बहुत सरल है और चलने का एकमात्र पथ है : सत्य का अनुसरण करो। सत्य का अनुसरण करो, और इस बात को परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार देखो—यही समझ लोगों में होनी चाहिए। तुम्हें अभ्यास कैसे करना चाहिए? सत्य और परमेश्वर के वचनों के अनुसार तुमने जो समझ प्राप्त की है और जिन सत्य सिद्धांतों को समझा है उन्हें तुम्हें उन चीजों के अभ्यास में अमल में लाना चाहिए जिनका तुम अनुभव करते हो और जिन्हें अपनी वास्तविकता और अपना जीवन बनाते हो—यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि तुम्हें अपने कर्तव्य का परित्याग करना ही नहीं चाहिए। चाहे तुम बीमार हो या पीड़ा में, जब तक तुम्हारी एक भी साँस बाकी है, जब तक तुम जिंदा हो, जब तक तुम बोल और चल-फिर सकते हो, तब तक तुममें अपना कर्तव्य करने की ऊर्जा है और तुम्हें अपने कर्तव्य निर्वहन में ईमानदार और जमीन से जुड़ा होना चाहिए। तुम्हें एक सृजित प्राणी के कर्तव्य, या सृष्टिकर्ता द्वारा तुम्हें दी गई जिम्मेदारी का परित्याग नहीं करना चाहिए। जब तक तुम अभी मरे नहीं हो, तुम्हें अपना कर्तव्य पूर्ण करना चाहिए और इसे निभाना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, ‘तुम्हारी ये बातें बहुत विचारशील नहीं हैं। मैं बीमार हूँ और बिल्कुल अच्छा महसूस नहीं कर रहा हूँ!’ जब तुम्हें बिल्कुल अच्छा महसूस न हो, तब तुम आराम कर सकते हो, अपनी देखभाल कर सकते हो, और इलाज करवा सकते हो। अगर तुम अभी भी अपना कर्तव्य करना जारी रखना चाहते हो तो तुम अपने काम का बोझ घटाकर कोई उपयुक्त कर्तव्य कर सकते हो, जो तुम्हारे स्वास्थ्य-लाभ को प्रभावित न करे। इससे साबित होगा कि तुमने अपने दिल से अपने कर्तव्य का परित्याग नहीं किया है, कि तुम्हारा दिल परमेश्वर से नहीं भटका है, कि तुमने अपने दिल से परमेश्वर के नाम को नहीं नकारा है, और तुमने अपने दिल से एक उचित सृजित प्राणी बनने की आकांक्षा का परित्याग नहीं किया है। कुछ लोग कहते हैं, ‘अगर मैंने यह सब किया है तो क्या परमेश्वर मेरी यह बीमारी दूर कर देगा?’ क्या वह करेगा? (जरूरी नहीं।) परमेश्वर तुमसे वह बीमारी ले या न ले, परमेश्वर तुम्हें ठीक करे या न करे, तुम जो करते हो वह वही है जो एक सृजित प्राणी को करना चाहिए। चाहे तुम्हारी शारीरिक स्थिति तुम्हें कोई काम सँभालने में सक्षम बनाती हो या न बनाती हो और तुम्हें अपना कर्तव्य करने देती हो या नहीं, तुम्हारा दिल परमेश्वर से दूर नहीं भटकना चाहिए और तुम्हें अपने दिल में अपना कर्तव्य नहीं छोड़ना चाहिए। इस तरह, तुम अपनी जिम्मेदारियों, अपने दायित्वों और अपने कर्तव्य को पूरा करोगे—यह वह वफादारी है जिसे तुम्हें बनाए रखना चाहिए” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि कोई व्यक्ति चाहे जीवन के किसी भी चरण में रोग या कष्ट का सामना करे, यह सब परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है और परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित है और इस सबका अर्थ होता है। ठीक मेरी तरह—अगर यह आँखों की बीमारी न होती जिसने मुझे लगभग अंधा कर दिया था, तो मैं परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने के अपने नीच इरादे को कभी नहीं जान पाता, यह जानना तो दूर की बात थी कि मैं हमेशा से पौलुस के रास्ते पर चल रहा था और अंततः परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए मुझे दंडित किया जाता। हालाँकि उस समय मैं दुख और दर्द से भरा था, लेकिन इसने मुझे आत्मचिंतन करने और खुद को जानने के लिए प्रेरित किया और मैंने जीवन में कुछ उन्नति हासिल की। यह सब परमेश्वर का अनुग्रह था। मैं एक आरामदायक माहौल में ये बातें कभी नहीं सीख पाता। मैंने अय्यूब के बारे में भी सोचा—वह परमेश्वर का भय मानता था। जब उसने सचमुच बड़े परीक्षणों और शोधनों का सामना किया, तो डाकुओं ने उसकी सारी संपत्ति छीन ली, उसके बच्चे मर गए और वह पीड़ादायक फोड़ों से ढक गया। वह राख में बैठकर अपना दर्द कम करने के लिए एक ठीकरे से अपने फोड़ों को खुरच रहा था, फिर भी उसने अपने मुँह से पाप नहीं किया। यहाँ तक कि जब उसकी पत्नी ने उसे परमेश्वर का नाम छोड़ने के लिए कहा और उसके तीन दोस्तों ने उसकी आलोचना की तो भी उसने परमेश्वर के खिलाफ़ शिकायत नहीं की। उसने यहाँ तक कहा, “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)। “क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?” (अय्यूब 2:10)। अय्यूब ने परमेश्वर के प्रति समर्पण करना या परमेश्वर के आयोजनों की दया पर रहना छोड़ने के बजाय खुद को शाप देना पसंद किया, और इस तरह शैतान को लज्जित कर दिया। फिर पतरस की मिसाल है—उसने केवल सात सालों में सैकड़ों परीक्षणों और शोधनों का अनुभव किया और वह हमेशा सत्य के अनुसरण के मार्ग पर चला। उसने आत्मचिंतन करने और खुद को जानने पर ध्यान केंद्रित किया और हर चीज में परमेश्वर के इरादों को पूरा करने का प्रयास किया। अंततः, वह परमेश्वर से अत्यंत प्रेम करने लगा और उसने मृत्यु तक समर्पण किया। न तो अय्यूब और न ही पतरस ने परमेश्वर से कोई माँग या अनुरोध किया, और न ही उन्होंने इस बात की चिंता की कि उनका परिणाम कैसा होगा। वे केवल यही सोचते थे कि परमेश्वर के प्रति कैसे समर्पण करें और उसे कैसे संतुष्ट करें और अंत में, वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहे और शैतान को पूरी तरह से अपमानित किया। ये सभी लोग ऐसे उदाहरण हैं जिनका मुझे अनुकरण करना चाहिए। मैंने एक दृढ़ संकल्प लिया : “जब तक मेरे पास अपना कर्तव्य निभाने का मौका है, और जब तक मैं अभी भी शब्द देख सकता हूँ, मेरे हाथ अभी भी टाइप कर सकते हैं और मेरा दिमाग स्पष्ट है, तब तक मैं अपना कर्तव्य निभाने में अपनी जी-जान लगा दूँगा। भले ही एक दिन मेरी नज़र चली जाए और मैं अपना कर्तव्य न कर पाऊँ, तो भी मैं समर्पण करने को तैयार रहूँगा। भले ही मैं देख न सकूँ, मैं परमेश्वर के वचनों का पाठ सुन सकता हूँ और अपने दिल में उसके वचनों पर मनन कर सकता हूँ, और मैं अपनी अनुभवजन्य समझ को मौखिक रूप से अपनी पत्नी और बच्चों के साथ साझा कर सकता हूँ, ताकि वे अनुभवजन्य गवाही के लेख लिखने में मेरी मदद कर सकें। मैं परमेश्वर की संगति सुनने के लिए खुद को उसके सामने शांत रखने पर भी ध्यान केंद्रित करूँगा और आत्मचिंतन करने और खुद को जानने के लिए और अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान करने के लिए परमेश्वर के वचनों का सहारा लूँगा।” उसके बाद के समय में मैं पढ़ने का चश्मा पहनकर सभाओं में शामिल होता और अपनी पत्नी के साथ परमेश्वर के वचन पढ़ता था। मैं हर दिन धर्मोपदेश लिखता रहा और जब मेरे पास समय होता, तो मैं अनुभवजन्य गवाही के लेख भी लिखता था। जब लंबे समय तक कंप्यूटर देखने के बाद मेरी आँखें धुँधली हो जातीं, तो मैं कुछ आई ड्रॉप्स डाल लेता और अपनी आँखों को थोड़ी देर आराम देता और जब बेचैनी कम हो जाती, तो मैं अपना कर्तव्य करना जारी रखता। अपनी आँख की सर्जरी के लगभग दो महीने बाद मैं जाँच कराने के लिए अस्पताल गया और डॉक्टर ने लेज़र थेरेपी से मेरा इलाज किया। इससे मेरी आँख की विट्रियस की कुछ धुंधलाहट साफ हो गई और मैं पास की चीज़ों को पहले से कहीं ज़्यादा साफ़ देख सकता था। कंप्यूटर पर इबारत देखने के लिए अब मुझे पढ़ने के चश्मे की जरूरत नहीं पड़ती थी और मैं छोटे अक्षरों को भी साफ़-साफ़ देख सकता था। मैं सचमुच बहुत उत्साहित था और मैंने परमेश्वर के अनुग्रह के लिए अपने दिल की गहराई से उसका धन्यवाद किया।
इस अनुभव से गुजरकर मुझे एहसास हुआ कि अपनी आस्था में परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करने के लिए मैं कितना स्वार्थी और नीच था। ये परमेश्वर के वचन ही थे जिन्होंने मुझे खुद के बारे में कुछ समझ दी और जो मुझमें कुछ बदलाव लाए। मैं सच्चे दिल से परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ!