5. मैंने देखा कि परमेश्वर के प्रेम ने मुझे कभी नहीं छोड़ा है
1997 में, मैं एक बीमारी की वजह से प्रभु में विश्वास करने लगी, और जल्द ही मेरी हालत में सुधार हो गया। मैं प्रभु के अनुग्रह के लिए बहुत कृतज्ञ थी। 2003 के वसंत में मुझे पता चला कि प्रभु यीशु लौट आया है और वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, मैं समझ गई कि परमेश्वर की छह हजार साल की प्रबंधन योजना तीन चरणों में विभाजित है, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर कार्य का अंतिम चरण, यानी न्याय का कार्य कर रहा है। जो परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करते हैं और अपने भ्रष्ट स्वभावों को शुद्ध करवा चुके होते हैं, वे सब परमेश्वर द्वारा बचाए जा सकते हैं और उसके राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। इसलिए मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार कर लिया और खुद को सुसमाचार का प्रचार करने में सक्रिय रूप से समर्पित कर दिया। हालाँकि मेरे परिवार ने मुझे रोकने की कोशिश की, मेरे पड़ोसियों ने मेरा मज़ाक उड़ाया, और बड़े लाल अजगर ने मेरा पीछा किया और मुझे गिरफ्तार करने की कोशिश की, लेकिन जब भी मैं यह सोचती कि कैसे परमेश्वर ने मेरी बीमारी को ठीक किया था और उस अद्भुत मंज़िल के बारे में सोचती जिसका उसने इंसान से वादा किया है, तो मुझे लगता कि यह थोड़ा-बहुत कष्ट सहना बहुत सार्थक था।
पलक झपकते ही, 2021 की शुरुआत हो गई, और मैं कलीसिया में नए लोगों को सींच रही थी। उस दौरान, मेरे पेट के निचले हिस्से में अक्सर एक हल्का, लगातार दर्द बना रहता था। पहले तो मैंने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और सोचा कि मुझे बस ठंड लग गई है। लेकिन जून के अंत तक, दर्द बहुत बढ़ गया था, और मेरे मूत्र में अक्सर खून आने लगा, इसलिए मेरा परिवार मुझे फौरन अस्पताल ले गया। जाँच के बाद, डॉक्टर ने गंभीरता से कहा, “तुम पहले क्यों नहीं आईं? तुम्हारा गर्भाशय दस हफ़्ते की गर्भवती महिला जितना बड़ा है, और यह गाँठों से भरा है। यह सिर्फ तुम्हारे मूत्र में खून नहीं है; यह गर्भाशय से रक्तस्राव है। स्थिति अच्छी नहीं लग रही। तुम्हें तुरंत सर्जरी की ज़रूरत है।” यह सुनकर मैं अचानक स्तब्ध रह गई। मैंने सोचा, “यह कैसे हो सकता है? मैं इतने समय से अपना कर्तव्य निभा रही हूँ। मेरे पास परमेश्वर की सुरक्षा होनी चाहिए थी!” जब मैं घर पहुँची, तो मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि मुझे यह बीमारी तुम्हारी अनुमति से हुई है, लेकिन डॉक्टर की बातों ने मुझे डरा दिया है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं तुम्हारे इरादों को समझ सकूँ।” मुझे परमेश्वर के वचनों की एक पँक्ति याद आई, “विश्वास करो कि परमेश्वर अवश्य तुम्हारा सर्वशक्तिमान है!” इसलिए मैंने अपना कंप्यूटर खोला और परमेश्वर के वचनों का वह अंश ढूँढ़ा : “जिसे तुम नहीं समझ पाते हो, उस बात के समाधान के लिए अधीर मत हो; ऐसी बातों को अक्सर परमेश्वर के समक्ष लेकर जाओ और उसे सच्चा दिल अर्पित करो। विश्वास करो कि परमेश्वर अवश्य तुम्हारा सर्वशक्तिमान है! तुम्हारे पास परमेश्वर के लिए जबरदस्त संकल्प होना चाहिए, तुम्हें शैतान के बहानों, इरादों और चालों को अस्वीकार करते हुए तीव्रता से खोज करनी चाहिए। हिम्मत मत हारो। कमजोर मत बनो। दिल की गहराइयों से खोज करो; पूरी लगन से इंतजार करो। परमेश्वर के साथ सक्रिय सहयोग करो और अपनी आंतरिक बाधाओं से छुटकारा पाओ” (परमेश्वर की संगति)। उनके वचनों पर विचार करते हुए, मेरा दिल धीरे-धीरे शांत हो गया। मैं जानती थी कि मुझे यह बीमारी होने में परमेश्वर के इरादे ज़रूर होंगे। भले ही मैं अभी समझ नहीं पा रही थी, पर मैं जानती थी कि मुझे प्रार्थना करनी चाहिए, खोजना चाहिए और परमेश्वर के मार्गदर्शन का इंतजार करना चाहिए। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और वह मेरे भाग्य का संप्रभु है। डॉक्टर अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर निदान करते हैं, लेकिन मैं उनकी बातों से खुद को डरने नहीं दे सकती थी। मुझे परमेश्वर पर आस्था रखनी थी। यह सोचकर, मेरा डर जाता रहा। जुलाई की शुरुआत में, मेरा गर्भाशय, अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब निकालने के लिए एक ऑपरेशन हुआ। डॉक्टर ने मुझसे कहा, “तुम बहुत भाग्यशाली हो। पैथोलॉजी रिपोर्ट में खतरे जैसी कोई बात नहीं आई है।” मैंने मन ही मन परमेश्वर को धन्यवाद दिया। बीस दिनों से ज्यादा आराम करने के बाद, मैंने फिर से अपना कर्तव्य निभाना शुरू कर दिया।
मैंने सोचा था कि बीमारी खत्म हो गई है, लेकिन मुझे क्या पता था कि यह तो बस शुरुआत थी। जीवन में तीन बड़ी सर्जरी करवाने के बाद—पित्ताशय, अपेंडिक्स, और अब गर्भाशय का ऑपरेशन—मुझे जल्द ही ऑपरेशन के बाद की कई जटिलताएँ होने लगीं। अगस्त की शुरुआत में एक रात, मुझे अचानक पेट में बहुत तेज़ दर्द हुआ, और मेरा परिवार मुझे फौरन अस्पताल ले गया। जाँच में आँतों में रुकावट का पता चला। डॉक्टरों ने तुरंत एक ट्यूब डालकर मेरा पेट खाली किया और मेरी आँतें साफ कीं। ट्यूब से मेरी भोजन-नली में जलन होती थी, जिससे मुझे लगातार उल्टियाँ हो रही थीं। उस पर पेट का असहनीय दर्द, मैं न तो स्थिर होकर बैठ पाती थी, न ही लेट पाती थी। यह सारा भयावह अनुभव पूरे एक दिन और एक रात तक चला, जिसने मुझे पूरी तरह से थका दिया था। फिर, अगली रात ग्यारह बजे, मुझे असहनीय दर्द की एक और लहर ने जकड़ लिया। मेरा पीला चेहरा देखकर मेरे पति जल्दी से डॉक्टर को बुलाने चले गए। सीटी स्कैन से पता चला कि मेरी आँत में छेद हो गया था और पेट में बहुत सारा तरल पदार्थ जमा हो गया था, जिसके लिए तुरंत सर्जरी की ज़रूरत थी। तब तक, मैं दर्द से बेहोश होने वाली थी, आँसू और पसीना मेरे चेहरे से बह रहा था। मैं मन ही मन बार-बार पुकार रही थी, “परमेश्वर, मुझे बचा लो! हे, परमेश्वर ...” अर्ध-चेतन स्थिति में मेरे मन में परमेश्वर के वचन प्रकट हुए : “विश्वास करो कि परमेश्वर अवश्य तुम्हारा सर्वशक्तिमान है!” (परमेश्वर की संगति)। मुझे नहीं पता कि कितना समय बीत गया, फिर एक डॉक्टर ने मुझे हिलाकर जगाया और पूछा, “कैसी हो? तुम सो कैसे गईं?” तभी मुझे एहसास हुआ कि इतनी पीड़ा के बीच, मैं सच में सो गई थी। चूँकि बहुत देर हो चुकी थी और सर्जन से संपर्क नहीं हो पा रहा था, वे मुझे केवल निगरानी के लिए मेरे कमरे में वापस भेज सके। अप्रत्याशित रूप से, मैं अगली सुबह सात बजे के बाद तक गहरी नींद में सोती रही। जब डॉक्टर मेरी जाँच करने आया तो उसने हैरान होकर कहा, “सीटी स्कैन में साफ तौर पर तुम्हारे पेट में तरल पदार्थ दिख रहा था। अब तुम्हारी हालत स्थिर कैसे हो गई?” मैंने मन ही मन परमेश्वर को बार-बार धन्यवाद दिया। एक हफ़्ते बाद, मुझे छुट्टी मिल गई।
मेरे पित्ताशय निकालने के कारण पित्त के प्रति प्रवाह से मेरा पेट अक्सर फूला रहता और उसमें जलन होती थी। मेरी छाती और पीठ में बहुत दर्द रहता था, और दिन भर मैं ठीक से न तो खा पाती थी और न ही सो पाती थी। मैं कई अलग-अलग अस्पतालों में गई और मैंने कई पारंपरिक चीनी दवाएँ आजमाईं, लेकिन किसी से कोई फायदा नहीं हुआ। मेरी अनिद्रा की बीमारी भी और बिगड़ गई; कभी-कभी मैं पूरी रात बिल्कुल नहीं सो पाती थी। खुद को हर दिन दुबला होते देख, मैं निरंतर घबराहट और चिंता में जी रही थी। मैंने सोचा, “अगर ऐसा ही चलता रहा, तो क्या मैं अपना कर्तव्य निभा पाऊँगी? अगर मैं खा या सो न सकी, तो क्या मैं मर जाऊँगी? और अगर मैं मर गई, मैं तब कैसे बचाई जाऊँगी?” मैं न चाहते हुए भी परमेश्वर को थोड़ा-सा गलत समझने लगी। “मैंने अपनी आस्था के इन सारे वर्षों के दौरान हर सुख-दुख में अपना कर्तव्य निभाया है। भले ही मैं एक साल से अधिक समय से बीमार हूँ, मैंने अपना कर्तव्य निभाना बंद नहीं किया है। परमेश्वर मेरी रक्षा क्यों नहीं कर रहा है? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर इस बीमारी का इस्तेमाल मुझे बेनकाब करने और निकाल देने के लिए कर रहा है?” मैंने बार-बार, आँसुओं के साथ परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे, परमेश्वर, मैं बहुत कमजोर हूँ। मुझे चिंता है कि मैं अपना कर्तव्य नहीं कर पाऊँगी और मुझे और भी डर है कि अगर मैं मर गई, तो मैं बचाई नहीं जा सकूँगी। परमेश्वर, मैं विनती करती हूँ तुम मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं तुम्हारे वचनों में अभ्यास का एक मार्ग खोज सकूँ।” फिर मैंने परमेश्वर के ये वचन देखे : “जब लोगों पर बीमारी आती है, तो उन्हें किस पथ पर चलना चाहिए? उन्हें कैसे चुनना चाहिए? लोगों को संताप, व्याकुलता और चिंता में डूबकर अपने भविष्य और इन स्थितियों से निकलने के रास्तों के बारे में नहीं सोचना चाहिए। बल्कि, लोग खुद को जितना ज्यादा ऐसे दौर और ऐसी खास स्थितियों और संदर्भों में पाएँ और ऐसी व्यक्तिगत मुश्किलों में पाएँ, उतना ही ज्यादा उन्हें सत्य खोजना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए। ऐसा करके ही पहले तुमने जो धर्मोपदेश सुने हैं और जो सत्य समझे हैं, वे प्रभावी होंगे और बेकार नहीं होंगे। तुम खुद को जितना ज्यादा ऐसी मुश्किलों में पाते हो, तुम्हें उतना ही अपनी इच्छाओं को त्यागकर परमेश्वर के आयोजनों के प्रति समर्पित होना चाहिए। तुम्हारे लिए ऐसी स्थिति बनाने और इन हालात की व्यवस्था करने में परमेश्वर का प्रयोजन तुम्हें संताप, व्याकुलता और चिंता की भावनाओं में डुबोना नहीं है, यह इस बात के लिए भी नहीं है कि तुम परमेश्वर की परीक्षा ले सको कि क्या वह वास्तव में तुम पर बीमारी आने पर तुम्हें ठीक करेगा, जिससे मामले की सच्चाई पता चल सके; परमेश्वर तुम्हारे लिए इन विशेष स्थितियों या हालात का इंतजाम इसलिए करता है ताकि तुम ऐसी स्थितियों और परिस्थितियों में व्यावहारिक सबक सीख सको, सत्य में और परमेश्वर के प्रति समर्पण में अधिक गहराई से प्रवेश कर सको और ताकि तुम ज्यादा स्पष्ट और सही ढंग से जान सको कि परमेश्वर सभी लोगों, घटनाओं और चीजों को कैसे आयोजित करता है। लोगों के भाग्य परमेश्वर के हाथों में होते हैं; चाहे लोग इसे भाँप सकें या नहीं, वे इस बारे में सचमुच अवगत हों या न हों, उन्हें समर्पण करना चाहिए, प्रतिरोध नहीं करना चाहिए, ठुकराना नहीं चाहिए और निश्चित रूप से परमेश्वर की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए। किसी भी सूरत में तुम्हारी मृत्यु हो सकती है और अगर तुम प्रतिरोध करते हो, ठुकराते हो और परमेश्वर की परीक्षा लेते हो, तो यह कहने की जरूरत नहीं कि तुम्हारा अंतिम परिणाम कैसा होगा। इसके विपरीत, मान लो कि जब तुम बीमारी का सामना करते हो, तो तुम यह खोज पाते हो कि किसी सृजित प्राणी को सृष्टिकर्ता के आयोजनों के प्रति कैसे समर्पण करना चाहिए, यह खोज पाते हो कि कौन-से सबक परमेश्वर चाहता है कि तुम सीखो और तुम्हारे सामने आई इस स्थिति में कौन-से भ्रष्ट स्वभावों के बारे में परमेश्वर चाहता है कि तुम जानो; इस तरह तुम परमेश्वर के इरादों को समझ सकते हो और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने के लिए एक अच्छी गवाही दे सकते हो। अगर तुम इस तरीके से अभ्यास करते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण हासिल कर सकने में सक्षम होगे। जब परमेश्वर यह व्यवस्था करता है कि तुम्हें बीमारी हो, चाहे वह छोटी हो या बड़ी, ऐसा करने के पीछे उसका उद्देश्य तुम्हें बीमार होने के पूरे विवरण, बीमारी से तुम्हें होने वाली हानि, बीमारी के कारण तुम्हें होने वाली विभिन्न असुविधाओं और मुश्किलों और बीमारी से होने वाले तमाम विभिन्न एहसासों का अनुभव करने देना नहीं है—उसका प्रयोजन यह नहीं है कि तुम बीमार होने की प्रक्रिया में बीमारी का अनुभव करो। इसके बजाय उसका प्रयोजन यह है कि बीमारी से तुम सबक सीखो, सीखो कि परमेश्वर के इरादों को कैसे पकड़ें, अपने द्वारा प्रकट भ्रष्ट स्वभावों और बीमार होने पर परमेश्वर के प्रति अपने गलत रवैयों को जानो और यह सीखो कि परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति कैसे समर्पण करें ताकि तुम परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण प्राप्त कर सको और अपनी गवाही में अडिग रह सको—यह बिल्कुल अहम है। परमेश्वर बीमारी के जरिए तुम्हें बचाना और स्वच्छ करना चाहता है। वह तुम्हारी किस चीज को स्वच्छ करना चाहता है? वह परमेश्वर पर थोपी गई तुम्हारी तमाम असंयमित आकांक्षाओं और माँगों और यहाँ तक कि हर कीमत पर जीवित रहने और खुद को जिंदा रखने की तुम्हारे अलग-अलग हिसाबों, फैसलों और योजनाओं को स्वच्छ करना चाहता है। परमेश्वर तुम्हें योजनाएँ बनाने की अनुमति नहीं देता, वह तुम्हें राय नहीं बनाने देता और उससे कोई असंयमित आकांक्षा रखने नहीं देता; उसकी बस इतनी अपेक्षा होती है कि तुम उसके प्रति समर्पित रहो, और समर्पण करने के अपने अभ्यास और अनुभव में, तुम बीमारी के प्रति अपने रवैये को जान जाओ और उसके द्वारा तुम्हें दी गई इन शारीरिक स्थितियों के प्रति अपने रवैये को और साथ ही अपनी निजी कामनाओं को जान लो। जब तुम इन चीजों को जान लेते हो, तब तुम समझ सकते हो कि तुम्हारे लिए यह कितना फायदेमंद है कि परमेश्वर ने तुम्हारे लिए बीमारी की परिस्थितियों का इंतजाम किया है, या उसने तुम्हें ये शारीरिक स्थितियाँ दी हैं; और तुम समझ सकते हो कि तुम्हारा स्वभाव बदलने, तुम्हारे उद्धार हासिल करने, और तुम्हारे जीवन प्रवेश में ये कितनी मददगार हैं” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई। मुझ पर यह बीमारी आने देने में परमेश्वर का इरादा यह नहीं था कि मैं दुःख, घबराहट और चिंता में डूब जाऊँ, बल्कि यह था कि मैं सत्य खोजूँ, सबक सीखूँ, और उस भ्रष्ट स्वभाव को जानूँ जो मैंने प्रकट किया था। यह इस बात की भी परीक्षा थी कि क्या मुझमें परमेश्वर के प्रति सच्ची आस्था और समर्पण है। अपनी बीमारी के पिछले एक साल या उससे अधिक समय के बारे में सोचती हूँ तो मैंने हर तरह के इलाज आजमाए थे—पारंपरिक चीनी दवा, पश्चिमी दवा और घरेलू उपचार। मैंने प्रसिद्ध डॉक्टरों और विशेषज्ञों को दिखाया था, लेकिन मेरी हालत में सुधार तो नहीं हुआ, बल्कि और खराब हो गई। मैं दुःख, घबराहट और चिंता की दशा में जी रही थी, इस बात से डरती थी कि जैसे-जैसे मेरी बीमारी बढ़ेगी, मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगी, और इस बात से और भी डरती थी कि अगर मैं मर गई, तो मैं बचाई नहीं जा सकूँगी। मेरा दिल दुखी और कमज़ोर था और मैं परमेश्वर में आस्था खो चुकी थी। अतीत में जब मैं बीमार हुई थी और मैंने परमेश्वर की सुरक्षा और अनुग्रह को देखा था तो मैं उसके प्रति बहुत कृतज्ञ थी। लेकिन अब जब मेरी बीमारी गंभीर थी और मुझे उसका अनुग्रह और आशीष नहीं दिख सका तो मुझे शक हुआ कि परमेश्वर मेरी बीमारी का इस्तेमाल मुझे बेनकाब करने और निकाल देने के लिए कर रहा है। मैंने परमेश्वर में विश्वास करने के वर्षों के दौरान अपने त्याग और पीड़ा को उसके साथ मोलभाव करने के लिए पूँजी के रूप में इस्तेमाल करने की भी कोशिश की, मैं यह शिकायत करती रही कि वह मेरी रक्षा क्यों नहीं कर रहा है। वास्तव में, परमेश्वर इस बीमारी का इस्तेमाल मेरी आस्था में अशुद्धियों को बेनकाब करने और मुझे अपनी ही भ्रष्टता को जानने और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना सिखाने के लिए कर रहा था। परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को समझकर मुझे गहरी ग्लानि हुई। मैंने घुटने टेके और परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं खुद को तुम्हारे हाथों में सौंपने और तुम्हारे आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने को तैयार हूँ। तुम मेरा मार्गदर्शन करो।”
अगले कुछ समय तक, मैं पारंपरिक चीनी दवा लेती रही, लेकिन मेरी हालत में फिर भी सुधार नहीं हुआ। मेरे पेट में आग सी लगी रहती थी, और मुझे इतनी उबकाई आती थी कि मैं खा नहीं सकती थी। मेरा पूरा शरीर दर्द करता था, और रात में, मैं नींद की गोलियों के सहारे मुश्किल से दो-तीन घंटे ही सो पाती थी। बाद में, मैं न केवल अपना कर्तव्य नहीं निभा पा रही थी, बल्कि सभाओं में भी शामिल नहीं हो पा रही थी। जुलाई 2023 में, कलीसिया ने मेरी हालत के आधार पर सुझाव दिया कि मैं घर पर आराम करने और अपनी बीमारी से ठीक होने के लिए अपने कलीसियाई जीवन को अस्थायी रूप से विराम दे दूँ। मैं बहुत पीड़ा में थी। मैंने सोचा, “पहले मैं चाहे कितनी भी पीड़ा सह रही होती थी, मैं दाँत भींचती थी और अपना कर्तव्य निभाती रहती थी, यह सोचती थी कि परमेश्वर मुझे ठीक कर देगा।” “लेकिन अब तो मैं सभाओं में भी नहीं जा पा रही हूँ। क्या मैं कोई गवाही दे पाऊँगी? क्या मैं बस परमेश्वर द्वारा निकाल दिए जाने का इंतज़ार नहीं कर रही होऊँगी?” मेरी आखिरी उम्मीद की किरण भी टूट गई। उस दिन, मैं घर गई, बिस्तर पर जा गिरी और बस सिसकती रही। मैंने सोचा कि कैसे मेरे आस-पास के भाई-बहन सब स्वस्थ हैं और सामान्य रूप से सभाओं में शामिल हो पा रहे हैं और अपने कर्तव्य निभा पा रहे हैं। यहाँ तक कि कुछ अविश्वासी भी स्वस्थ थे। मैं ही क्यों लगातार बीमारी से ग्रस्त थी?
अगस्त के अंत में, मुझे एक बार फिर आँतों में रुकावट के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया। उस दौरान, मेरे पेट, आमाशय और पीठ में रोज़ होने वाले दर्द ने मुझे असहनीय पीड़ा दी। मैं शायद ही कुछ खा पाती थी, इसलिए मैं पोषण के लिए केवल प्रोटीन और ग्लूकोज की आईवी ड्रिप पर ही निर्भर रह सकती थी। मेरा 20 किलोग्राम से अधिक वजन तेजी से घट गया। मेरे पति ने अस्पताल में मेरे साथ रहने के लिए काम करना बंद कर दिया, वह हर दिन मेरी पीठ की मालिश करते थे। कुछ बार मैंने अपनी पीठ पर उनके आँसू गिरते महसूस किए। मैं जानती थी कि शायद मेरे दिन गिने-चुने ही बचे हैं। रात में, जब मैं सो नहीं पाती थी, तो आस्था के मेरे बीस वर्षों के दृश्य मेरे मन में कौंधते थे। मेरे पति ने मुझे परमेश्वर में विश्वास करने से मना किया और तलाक तक की धमकी दी, लेकिन मैंने समझौता नहीं किया। दुनिया के लोगों ने मेरा मज़ाक उड़ाया, उपहास किया और अपमान किया, लेकिन मैं पीछे नहीं हटी। बड़े लाल अजगर ने मेरा पीछा और उत्पीड़न किया, लेकिन मैंने आस्था नहीं खोई। मैंने सोचा था कि परमेश्वर यह देखेगा कि मैंने कैसे वर्षों त्याग किया था और पीड़ा सही थी और वह अंत तक मेरी रक्षा करेगा, मुझे राज्य की शोभा देखने देगा। मैंने कभी नहीं सोचा था कि जिसका मैं अब सामना कर रही थी, वह संभवतः मेरे जीवन का अंत हो सकता है। मेरा दिल टूट गया था और मैं सोचने पर मजबूर थी, “इतनी पीड़ा सहने के बाद, अंत में मुझे मरना ही है। अगर मुझे पता होता कि अंत में ऐसा होगा तो भला मैं परमेश्वर में विश्वास करना ही क्यों शुरू करती?” कुछ दिनों तक, मैं अपने अस्पताल के बिस्तर पर लेटी रही, न प्रार्थना करती थी और न ही परमेश्वर के वचन पढ़ती थी। मेरा मन बस मृत्यु के बाद क्या होता है, उसी की छवियों के बारे में सोच सकता था। मुझे खासकर ख्याल आया कि कैसे आध्यात्मिक क्षेत्र एक अंधकारमय, धुँधले कोहरे में लिपटा हुआ था, इतना अंधकारमय कि तुम अपने चेहरे के सामने अपना हाथ भी न देख सको, साथ देने के लिए कोई परिवार भी न हो, और मैं डर से काँप उठती थी। एक दिन मेरा भाई और उसकी पत्नी मुझसे मिलने अस्पताल आए। मुझे इतनी दुबली और कमजोर देखकर मेरे भाई ने आँखों में आँसू भरकर कहा, “हिम्मत मत हारो। तुम्हें और प्रार्थना करनी होगी और परमेश्वर पर निर्भर रहना होगा!” उसके शब्दों ने मुझे अपराध बोध और बेचैनी से भर दिया। मैंने सोचा, “जब से मैं बीमार हुई हूँ, जब परमेश्वर ने मुझे अनुग्रह और आशीष प्रदान किया तो मैंने उसका धन्यवाद किया और महसूस किया कि परमेश्वर में विश्वास करना अद्भुत है। लेकिन अब जबकि मृत्यु मेरे सामने है तो मैं परमेश्वर से शिकायत करने लगी हूँ और अपनी आस्था पर भी पछताने लगी हूँ। यह तो परमेश्वर के साथ विश्वासघात है!” उस दौरान, मुझे हर दिन दस घंटे से ज़्यादा आईवी ड्रिप चढ़ती थी। नौवें दिन तक, मेरी दोनों बाहें इतनी सूज गईं कि उन पर अब और आईवी ड्रिप नहीं लग सकती थी, इसलिए मेरे पास छुट्टी लेने के अलावा कोई चारा नहीं था। घर लौटने के बाद, मैंने बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मृत्यु का सामना करते हुए मेरा दिल संत्रास और लाचारी से भरा हुआ है और तुम्हारे प्रति गलतफहमियों, शिकायतों और अविवेकपूर्ण माँगों से भी। परमेश्वर, कृपया मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं अपनी भ्रष्टता को जान सकूँ और तुम्हारे इरादों को समझ सकूँ।”
बिस्तर पर टेक लगाकर, मैंने अपना कंप्यूटर खोला और परमेश्वर के ये वचन देखे : “हर व्यक्ति अपने मन में बस उस समस्त अनुग्रह, आशीषों और वादों की बातें सोच सकता है जो यहोवा लोगों को देता है, लेकिन वे इस बारे में कभी नहीं सोचते या कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि जब यहोवा उनसे ये सारी चीजें वापस ले लेगा तो कैसा दृश्य सामने आएगा। परमेश्वर में विश्वास रखने वाला हर व्यक्ति केवल परमेश्वर के अनुग्रह, आशीष और वादों को स्वीकारने के लिए तैयार होता है, और केवल उसकी मेहरबानी और दया को स्वीकार करने का इच्छुक होता है, लेकिन कोई भी परमेश्वर की ताड़ना और न्याय, उसके परीक्षण और शोधन या उसके द्वारा वंचित किए जाने को स्वीकार करने की प्रतीक्षा या तैयारी नहीं करता है। एक भी व्यक्ति परमेश्वर के न्याय और ताड़ना, उसके द्वारा वंचित किए जाने या उसके शाप को स्वीकार करने के लिए तैयारी नहीं करता है। लोगों और परमेश्वर के बीच यह रिश्ता सामान्य है या असामान्य? (असामान्य।) तुम इसे असामान्य क्यों कहते हो? कौन-सी चीज इसे गलत बनाती है? जो चीज इसे गलत बनाती है वह यह है कि लोगों के पास सत्य नहीं है। और ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के पास बहुत सारी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, वे लगातार परमेश्वर को गलत समझते हैं और यह नहीं जानते हैं कि कैसे सत्य खोजकर इन चीजों का समाधान किया जाए—इससे समस्याएँ उत्पन्न होने की संभावना सबसे अधिक होती है। विशेष रूप से, लोग केवल आशीष पाने के लिए ही परमेश्वर में विश्वास करते हैं। वे परमेश्वर के साथ बस सौदा करना चाहते हैं, उससे चीजों की माँग करते हैं, पर वे सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं। यह बहुत ही खतरनाक है। जैसे ही उनका सामना किसी ऐसी चीज से होता है जो उनकी धारणाओं के विपरीत है तो उनमें तुरंत परमेश्वर को लेकर धारणाएँ, गलतफहमियाँ और शिकायतें विकसित हो जाती हैं और वे उसे धोखा देने की हद तक भी जा सकते हैं। क्या इसके परिणाम गंभीर नहीं होते हैं? ज्यादातर लोग परमेश्वर में अपनी आस्था में वास्तव में किस मार्ग पर चलते हैं? यद्यपि उन्होंने कई वर्षों तक धर्मोपदेश सुने हैं और वे कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत बोल सकते हैं, असल में, वे सत्य को सचमुच नहीं समझते हैं। यूँ तो वे सत्य का अनुसरण करने का इच्छुक होने का दावा करते हैं, उनमें से कुछ ही सत्य प्राप्त करने के लिए कीमत चुकाने में सक्षम हैं” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (11))। “अय्यूब वास्तव में एक आस्थावान व्यक्ति था। जब परमेश्वर ने उसे आशीष दी, तो उसने परमेश्वर को धन्यवाद दिया। जब परमेश्वर ने उसे अनुशासित किया और उसका सब कुछ छीन लिया, तब भी उसने परमेश्वर को धन्यवाद दिया। अंत तक सब कुछ अनुभव करने के बाद, जब वह बूढ़ा हो गया था और परमेश्वर ने उसकी सारी संपत्ति और उसके बच्चों को छीन लिया था, तो अय्यूब ने कैसी प्रतिक्रिया दी? उसने न केवल शिकायत नहीं की, बल्कि वह शैतान को ठुकरा सका, उसने अपने हृदय से परमेश्वर की स्तुति की, परमेश्वर के नाम की बड़ाई की और उसके लिए गवाही दी। ... लोग अक्सर कहते हैं, ‘परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह लोगों के लिए लाभदायक होता है और उसमें उसके अच्छे इरादे होते हैं।’ क्या यह सत्य है? (हाँ।) किंतु क्या तुम इसे स्वीकार कर सकते हो? जब परमेश्वर तुम्हें आशीष देता है, तब तुम इसे स्वीकार कर पाते हो, किंतु जब वह इसे छीन लेता है, तो क्या तुम इसे स्वीकार कर पाते हो? तुम ऐसा नहीं कर सकते, पर अय्यूब ऐसा कर सका था। उसने इस कथन को सत्य माना—क्या अय्यूब सत्य से प्रेम नहीं करता था? परमेश्वर ने उसकी सारी संपत्ति छीन ली, जिससे उसे इतना भारी नुकसान हुआ और उसे एक गंभीर बीमारी भी हो गई। लेकिन उसके द्वारा कहा गया यह कथन, ‘परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सही है और उसमें परमेश्वर के अच्छे इरादे होते हैं,’ यह साबित करता है कि वह अपने दिल में पूरी तरह से समझता था कि उसके पास जो कुछ भी था वह परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया था। चूँकि वह समझता था कि यही सत्य है, इसलिए चाहे उसने कितनी भी पीड़ा क्यों न सही हो, उसे कोई शिकायत नहीं थी और वह फिर भी परमेश्वर की स्तुति करने में सक्षम था। चाहे उसकी पत्नी ने कुछ भी कहा हो, वह अपनी गवाही में अडिग रहने और अपने दिल में परमेश्वर का गुणगान करने में सक्षम था। इसलिए हम कहते हैं कि अय्यूब सत्य से प्रेम करता था। इसके अलावा, परमेश्वर ने उसका परीक्षण करने के लिए चाहे जो भी तरीका अपनाया हो, वह बिना किसी शिकायत के उसे स्वीकार करने और समर्पण करने में सक्षम था। यहाँ तक कि जब शैतान ने उसकी संपत्ति छीन ली और उसकी जान लेने की कोशिश की या उसके शरीर को फोड़ों से भर दिया—ये सभी बातें इंसानी धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं—तो अय्यूब ने कैसी प्रतिक्रिया दी? क्या उसने परमेश्वर से शिकायत की? उसने परमेश्वर के बारे में शिकायत का एक शब्द भी नहीं कहा, बल्कि यह कहा कि परमेश्वर के नाम का गुणगान किया जाए। यह साबित करता है कि अय्यूब परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकता था और यह भी साबित करता है कि अय्यूब सत्य से प्रेम करता था, वह निष्पक्षता और धार्मिकता से प्रेम करता था। अपने दिल में उसने कहा, ‘परमेश्वर लोगों के प्रति कितना निष्पक्ष और धार्मिक है! परमेश्वर जो भी करता है सही करता है!’ इस प्रकार वह परमेश्वर की स्तुति कर सका। उसने कहा, ‘चाहे परमेश्वर कुछ भी करे, मैं शिकायत नहीं करूँगा। परमेश्वर की नजर में सृजित प्राणी भुनगे मात्र हैं। परमेश्वर मेरे साथ जैसा भी व्यवहार करे वह सही और न्यायोचित है।’ वह मानता था कि परमेश्वर ने जो कुछ किया वह सही और सकारात्मक था। चाहे उसकी संपत्ति का कितना भी नुकसान क्यों न हुआ हो, चाहे उसने कितनी भी कठिनाई का सामना क्यों न किया हो या कितनी भी पीड़ा क्यों न सही हो, उसने परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं की और वह फिर भी परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सका। यह सत्य से प्रेम करने की एक अभिव्यक्ति है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अनुसरण करने के लिए आत्म-ज्ञान होना अनिवार्य है)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए, मैं शर्म से भर गई! मेरे दृष्टिकोण में, परमेश्वर में विश्वास करना केवल उनसे अनुग्रह और आशीष प्राप्त करने के बारे में था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन परमेश्वर का न्याय और ताड़ना या परीक्षण और शोधन मुझ पर आएगा, और मैंने परमेश्वर के न्याय का सामना करने के लिए खुद को पहले से सत्य से लैस तो बिल्कुल भी नहीं किया था। यूँ तो मुझे अय्यूब के अनुभव कंठस्थ याद थे और मैं उसके उन मूलभूत वचनों को मुँह-जुबानी सुना सकती थी जो उसने अपनी गवाही में अडिग रहते हुए कहे थे, लेकिन मैं जो कुछ भी समझती थी, वह बस धर्म-सिद्धांत था। अय्यूब ने परमेश्वर के परीक्षणों का अनुभव इसलिए किया क्योंकि वह परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था। उसने अपनी सारी संपदाएँ और संतानें खो दीं और उसका शरीर दर्दनाक फोड़ों से ढक गया था। उसकी पत्नी ने उसका मज़ाक उड़ाया और उसके दोस्तों ने उसका उपहास किया, लेकिन फिर भी वह अपनी सत्यनिष्ठा पर दृढ़ रहा। अपनी अत्यंत पीड़ा में उसने परमेश्वर के खिलाफ शिकायत करने और उसके नाम को त्यागने के बजाय अपने जन्म के दिन को कोसना बेहतर समझा। वह अभ्यास के लिए सर्वोच्च सत्य यह मानता था कि “परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सही है और उसमें परमेश्वर के अच्छे इरादे होते हैं।” अगर कोई चीज परमेश्वर से आए तो चाहे वह अच्छी हो या बुरी, वह इसे स्वीकार कर सकता था और समर्पण कर सकता था। परमेश्वर के प्रति अपनी आस्था, समर्पण और भय के माध्यम से उसने शैतान को हराया और परमेश्वर के लिए एक गूँजती हुई गवाही दी। धर्म-सैद्धांतिक तौर पर मैं जानती थी कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह उचित होता है और उसमें उसके नेक इरादे होते हैं, लेकिन जब मेरी लंबी बीमारी मुझे मौत के कगार पर ले आई, तो मेरा असली आध्यात्मिक कद पूरी तरह से प्रकट हो गया। मैं अपने योगदान गिनाने लगी, यह शिकायत करने लगी कि परमेश्वर मेरी रक्षा क्यों नहीं कर रहा है और यहाँ तक कि मुझे अपनी आस्था पर और उस सब पर पछतावा होने लगा जो मैंने त्यागा था और खपाया था। जब परमेश्वर मुझे आशीष देता था तो मैं उसके प्रति कृतज्ञता से भर जाती थी, लेकिन जब वह जो कुछ करता था वह मेरी धारणाओं के खिलाफ जाता था तो मैं उससे बहस करती थी और उसका विरोध करती थी। मुझमें सचमुच जमीर और विवेक की कमी थी; मैं इतनी मानवता-विहीन थी! फिर मैं जमीन पर दंडवत गिर पड़ी और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, तुम सृष्टिकर्ता हो और मैं एक सृजित प्राणी हूँ। तुम चाहे जो भी करते हो, मुझे तुम्हारे प्रति कोई शिकायत नहीं रखनी चाहिए या तुमसे कोई माँग नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर, मैं तुम्हारे आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने को तैयार हूँ।”
अगले कुछ दिनों के दौरान मैंने अपने मामलों को व्यवस्थित करना शुरू कर दिया। मैंने परमेश्वर के वचनों की पुस्तकें समेट दीं और एक बहन को बता दिया कि मैंने उन्हें कहाँ रखा है। मैंने यह प्रार्थना और खोज भी की कि मृत्यु का उचित ढंग से सामना कैसे किया जाए। मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा : “मृत्यु के विषय को तुम्हें इसी तरह लेना चाहिए। हर किसी को अपने जीवन में मृत्यु का सामना करना ही है, यानी, मृत्यु वह है जिसका हर किसी को अपनी यात्रा के अंत में सामना अवश्य करना है। लेकिन मृत्यु की अलग-अलग प्रकृतियाँ होती हैं। इनमें से एक यह है कि, परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत समय पर, एक व्यक्ति अपना मिशन पूरा कर लेता है और परमेश्वर उसके शारीरिक जीवन को समाप्ति की ओर ले जाता है, इसलिए उसका शारीरिक जीवन समाप्त हो जाता है, यद्यपि इसका मतलब यह नहीं है कि उसका जीवन समाप्त हो गया है। जब किसी की देह अस्तित्व में नहीं रहती तो उसका जीवन समाप्त हो जाता है—क्या ऐसा है? (नहीं।) मृत्यु के बाद तुम्हारा जीवन किस रूप में मौजूद रहेगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम जीवित रहते हुए परमेश्वर के काम और वचनों के साथ कैसा व्यवहार करते हो—यह बहुत महत्वपूर्ण है। मृत्यु के बाद तुम किस रूप में मौजूद रहोगे या तुम मौजूद रहोगे या नहीं, यह जीवित रहने के दौरान परमेश्वर और सत्य के प्रति तुम्हारे रवैये पर निर्भर करता है। यदि जीवित रहते हुए, मृत्यु और सभी प्रकार की बीमारियों का सामना करते समय सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया विद्रोहीपन, विरोध और विमुखता का है तो जब तुम्हारा शारीरिक जीवन समाप्त हो जाएगा तो तुम किस तरह से मौजूद रहोगे? तुम निश्चित रूप से किसी और तरह से मौजूद रहोगे और तुम्हारा जीवन निश्चित रूप से जारी नहीं रहेगा। इसके विपरीत, यदि जीवित रहते हुए, जब तुम्हारी देह में चेतना होती है, तब सत्य और परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया समर्पण और वफादारी का है और तुममें सच्ची आस्था है, तो भले ही तुम्हारा शारीरिक जीवन समाप्त हो जाए, तुम्हारा जीवन फिर भी दूसरे क्षेत्र में एक अलग रूप में मौजूद रहेगा। यह मृत्यु की परिभाषा है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (4))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैंने बहुत शांत महसूस किया। हरेक को मृत्यु का सामना करना ही चाहिए, लेकिन हर व्यक्ति की मृत्यु की प्रकृति और मृत्यु के बाद उसका परिणाम बहुत ही भिन्न होता है। वह सृष्टिकर्ता के सामने लौटता है कि शैतान के साथ नरक में जाता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके जीवित रहते हुए परमेश्वर और सत्य के प्रति उसका रवैया क्या था। मैंने बाइबल में उस पद के बारे में सोचा जिसमें कहा गया है, “अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया” (अय्यूब 42:17)। अय्यूब जीवन भर परमेश्वर का भय मानता रहा और बुराई से दूर रहा। शैतान के हमलों और उत्पीड़न के बीच वह परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहा, जिससे परमेश्वर के हृदय को सुकून मिला। मृत्यु का सामना करते हुए, अय्यूब अपने दिल से समर्पण कर सका। उसका मन शांत और स्थिर था, बिना किसी चिंता या भय के। तब मैं समझी कि मृत्यु अपने आप में भयावह नहीं है। भयावह तो यह है कि सत्य का अनुसरण किए बिना या इसे पाए बिना अपना जीवन जिया जाए, अभी भी अपने भ्रष्ट स्वभाव और शैतानी फलसफों के अनुसार जिया जाए और अभी भी परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और उसका प्रतिरोध किया जाए। ऐसा शारीरिक जीवन चाहे कितना भी लंबा चले या कितना भी आरामदायक क्यों न हो, यह केवल अस्थायी है, और मृत्यु के बाद, व्यक्ति को दंडित होने के लिए नरक में ही जाना पड़ता है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति जीवित रहते हुए सत्य का अनुसरण कर सकता है और सत्य को अपने जीवन के रूप में प्राप्त कर सकता है, अय्यूब की तरह परमेश्वर का भय मानने और उनके प्रति समर्पण करने की वास्तविकता को जी सकता है, और शैतान को अपमानित करने के लिए अपनी गवाही में अडिग रह सकता है, तो भले ही एक दिन उसका भौतिक शरीर मर जाए, वह फिर भी एक ऐसा व्यक्ति है जिसका परमेश्वर ने अनुमोदन किया है। मृत्यु का सामना करते हुए, मैंने जो कुछ भी प्रकट किया था वह परमेश्वर के प्रति गलतफहमियाँ, शिकायतें और अनुचित माँगें थीं। मैं उसके प्रति विद्रोह और प्रतिरोध से भरी हुई थी। भले ही मैं जीवित रहती, अगर मेरा भ्रष्ट स्वभाव नहीं बदलता, तो अंत में मुझे फिर भी हटा दिया जाता और दंडित किया जाता।
बाद में, मैंने चिंतन करना शुरू किया। लगभग तीन साल तक बीमारी का अनुभव करने के बाद मैं परमेश्वर के प्रति बहुत अधिक विद्रोह और गलतफहमी प्रकट कर चुकी थी। भले ही मैं जानती थी कि वह जो कुछ भी करता है वह सब उचित होता है और मुझे समर्पण करना चाहिए, लेकिन जब मृत्यु का सामना हुआ तो मैं समर्पण करने के लिए खुद को किसी भी तरह से तैयार नहीं कर सकी। मैं परमेश्वर से बहस भी कर सकती थी और उसका विरोध भी कर सकती थी। मेरे भ्रष्ट स्वभाव का कौन-सा पहलू इसका कारण था? एक दिन, मैंने परमेश्वर के ये वचन देखे : “अपना कर्तव्य निभाने का फैसला लेने से पहले, अपने दिलों की गहराई में, मसीह-विरोधी अपनी संभावनाओं की उम्मीदों, आशीष पाने, अच्छी मंजिल पाने और यहाँ तक कि मुकुट पाने की उम्मीदों से भरे होते हैं और उन्हें इन चीजों को पाने का पूरा विश्वास होता है। वे ऐसे इरादों और आकांक्षाओं के साथ अपना कर्तव्य निभाने के लिए परमेश्वर के घर आते हैं। तो, क्या उनके कर्तव्य निर्वहन में वह ईमानदारी, सच्ची आस्था और निष्ठा है जिसकी परमेश्वर अपेक्षा करता है? इस मुकाम पर, अभी कोई भी उनकी सच्ची निष्ठा, आस्था या ईमानदारी को नहीं देख सकता, क्योंकि हर कोई अपना कर्तव्य करने से पहले पूरी तरह से लेन-देन की मानसिकता रखता है; हर कोई अपना कर्तव्य निभाने का फैसला अपने हितों से प्रेरित होकर और अपनी अतिशय महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं की पूर्ति की पूर्व-शर्त पर करता है। अपना कर्तव्य निभाने के पीछे मसीह-विरोधियों का इरादा क्या है? यह सौदा और लेन-देन करने का इरादा है। यह कहा जा सकता है कि यही वे शर्तें हैं जो वे कर्तव्य करने के लिए निर्धारित करते हैं : ‘अगर मैं अपना कर्तव्य करता हूँ, तो मुझे आशीष मिलने चाहिए और एक अच्छी मंजिल मिलनी चाहिए। मुझे वे सभी आशीष और लाभ मिलने चाहिए जो परमेश्वर ने कहा है कि वे मानवजाति के लिए बनाए गए हैं। अगर मैं उन्हें नहीं पा सकता तो मैं यह कर्तव्य नहीं करूँगा।’ वे ऐसे इरादों, महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के साथ अपना कर्तव्य निभाने के लिए परमेश्वर के घर आते हैं। ऐसा लगता है कि उनमें थोड़ी ईमानदारी है और बेशक जो नए विश्वासी हैं और अभी अपना कर्तव्य निभाना शुरू कर रहे हैं, उनके लिए इसे उत्साह भी कहा जा सकता है। मगर इसमें कोई सच्ची आस्था या निष्ठा नहीं है; केवल उस स्तर का उत्साह है। इसे ईमानदारी नहीं कहा जा सकता। अपना कर्तव्य निभाने के प्रति मसीह-विरोधियों के इस रवैये को देखें तो यह पूरी तरह से लेन-देन वाला है और आशीष पाने, स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने, मुकुट पाने और इनाम पाने जैसे लाभों की उनकी इच्छाओं से भरा हुआ है। इसलिए, बाहर से ऐसा लगता है कि निष्कासित किए जाने से पहले कई मसीह-विरोधी अपना कर्तव्य निभा रहे हैं और उन्होंने एक औसत व्यक्ति की तुलना में अधिक त्याग किया है और अधिक कष्ट झेला है। वे जो खपाते हैं और जो कीमत वे चुकाते हैं, वह पौलुस के बराबर है और वे पौलुस जितनी ही भागदौड़ भी करते हैं। यह ऐसी चीज है जिसे हर कोई देख सकता है। उनके व्यवहार और कष्ट सहने तथा कीमत चुकाने के उनके संकल्प के संदर्भ में, उन्हें कुछ न कुछ तो मिलना ही चाहिए। लेकिन परमेश्वर किसी व्यक्ति को उसके बाहरी व्यवहार के आधार पर नहीं, बल्कि उसके सार, उसके स्वभाव, उसके खुलासे और उसके द्वारा की जाने वाली हर एक चीज की प्रकृति और सार के आधार पर देखता है” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग सात))। परमेश्वर उजागर करता है कि मसीह-विरोधी केवल आशीष और पुरस्कार पाने के लिए अपना कर्तव्य निभाते हैं। यदि कोई अच्छा परिणाम, कोई पुरस्कार या आशीष न हो, तो एक मसीह-विरोधी परमेश्वर में विश्वास नहीं करेगा, अपने कर्तव्य के लिए कष्ट सहना तो दूर की बात है। एक मसीह-विरोधी जो कुछ भी करता है वह परमेश्वर के साथ मोलभाव करने की कोशिश के बारे में होता है, और वह भुलावे में रहकर यह उम्मीद करता है कि बड़े आशीष के लिए छोटी कीमत का सौदा करेगा। मैंने खुद पर चिंतन किया। जब मैंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया और उसके वादों और आशीषों के बारे में जाना, और यह जाना कि लोग स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं और अनंत जीवन प्राप्त कर सकते हैं, तो मैं सुसमाचार का प्रचार करने और अपना कर्तव्य निभाने में सक्रिय हो गई। मेरे परिवार ने मुझे चाहे जैसे भी रोकने की कोशिश की, मेरे आस-पास के लोगों ने मेरा चाहे जैसे भी मज़ाक उड़ाया या अपमान किया या जब बड़े लाल अजगर द्वारा मेरा उत्पीड़न किया गया, तब भी मैं पीछे नहीं हटी। जब मैं बीमारी से त्रस्त थी और खा-पी या सो नहीं सकती थी, तब भी मैं अपने कर्तव्य में लगी रही। लेकिन जब मेरी बीमारी बढ़ गई और मैंने मृत्यु के खतरे का सामना किया, तो मैंने इस बारे में शिकायत की कि परमेश्वर मेरी रक्षा क्यों नहीं कर रहा है और यहाँ तक कि अपने वर्षों के त्याग, खुद को खपाने पर पछतावा किया, और अपनी आस्था पर पछतावा किया। मैंने जो प्रकट किया वह परमेश्वर के प्रति विद्रोह और विश्वासघात के अलावा कुछ नहीं था। मैंने पौलुस के बारे में सोचा। उसने सुसमाचार का प्रचार करते हुए यूरोप के अधिकांश जगहों की यात्रा की, और उसने बहुत अधिक पीड़ा सही और बड़ी कीमत चुकाई, लेकिन उसकी पीड़ा और वह कीमत जो उसने चुकाई केवल आशीष और मुकुट पाने के लिए थीं। उसने कहा, “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिए धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है” (2 तीमुथियुस 4:7-8)। पौलुस ने अपनी पीड़ा और चुकाई गई कीमत को परमेश्वर के साथ सौदा करने की कोशिश के लिए मोलभाव के साधन के रूप में इस्तेमाल किया, और खुले तौर पर उसका कड़ा प्रतिरोध किया। उसका मंतव्य यह था कि उसने जो खपाया और हासिल किया था, उसके आधार पर परमेश्वर को उसे पुरस्कार, एक मुकुट और एक अच्छी मंज़िल देनी ही थी; अन्यथा, परमेश्वर धार्मिक नहीं होता। मैंने जो स्वभाव प्रकट किया था वह पौलुस जैसा ही था। अपने क्रियाकलापों के आधार पर, मैं नष्ट होने के लायक थी, लेकिन परमेश्वर ने मुझे अभी भी जीने दिया है। यह मेरे लिए पश्चात्ताप करने का एक मौका था, परमेश्वर की महान दया और अनुग्रह का एक कार्य।
मैं मानती थी कि चाहे मुझे उत्पीड़न, क्लेश, या जानलेवा बीमारी का सामना करना पड़े, जब तक मैं अपना कर्तव्य निभा सकती हूँ, मुझे परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा मिलेगी और मैं जीवित रह सकूँगी और बचाई जा सकूँगी। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि यह दृष्टिकोण पूरी तरह से बेहूदा था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कोई व्यक्ति अंततः उद्धार प्राप्त कर सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह कौन-सा कर्तव्य करता है, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वह सत्य को समझ और प्राप्त कर सकता है, और अंततः परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण प्राप्त कर सकता है और खुद को उसके आयोजन की दया पर छोड़ सकता है, अब अपने भविष्य और नियति पर विचार नहीं करता और एक मानक स्तर का सृजित प्राणी बन जाता है। परमेश्वर धार्मिक और पवित्र है, वह पूरी मानवजाति को मापने के लिए इस मानक का उपयोग करता है और यह मानक कभी नहीं बदलेगा—तुम्हें यह याद रखना चाहिए” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं अंततः समझ गई कि बचाया जाना अपना कर्तव्य निभाने के बाहरी अभ्यास पर टिके रहने के बारे में नहीं है। अहम यह है कि स्वभावगत बदलाव लाने के लिए अपने कर्तव्य के दौरान सत्य का अनुसरण किया जाए और इसे प्राप्त किया जाए, और उन विभिन्न परिवेशों में सबक सीखे जाएँ जिनका इंतजाम परमेश्वर करता है, ठीक अय्यूब की तरह परमेश्वर के प्रति समर्पण कर पाएँ और उसके आयोजन की दया पर रह पाएँ। केवल तभी कोई बचाए जाने और जीवित रहने के लिए आवश्यक योग्यताएँ पूरी कर सकता है। मैंने अपनी प्रार्थना में एक संकल्प लिया। चाहे मेरा परिणाम कुछ भी हो, मैं एक विवेकयुक्त सृजित प्राणी बनने को तैयार थी। यदि परमेश्वर ने मुझे अभी भी जीने दिया, तो मैं नए सिरे से शुरुआत करने को तैयार थी, आशीष पाने के अपने इरादे को छोड़ने और परमेश्वर के साथ मोलभाव का प्रयास करना बंद करने को तैयार थी। मैं सत्य प्राप्त करने और परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल चुकाने के लिए अपना कर्तव्य निभाऊँगी। यदि परमेश्वर ने यह ठहराया है कि मेरा जीवन यहीं समाप्त हो जाना चाहिए, तो मैं उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने को तैयार थी। उसके बाद मेरी मनोदशा बहुत अधिक सुधर गई। यूँ तो मेरी बीमारी में अभी भी सुधार नहीं हुआ और अधिकांश समय मेरे पूरे शरीर में दर्द रहता था और कभी-कभी मेरा दिमाग भी बहुत साफ नहीं रहता था, लेकिन मेरा दिल शांत रहता था। मैं बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना करती थी, अपने जीवन और मरण को उसके हाथ में सौंपने को तैयार थी। वह जो भी आयोजन करता, मैं उसके प्रति समर्पण करती।
उसके बाद, मेरी सेहत और बिगड़ गई। एक घूँट पानी गटकने पर भी मुझे उबकाई आ जाती थी और मैं उल्टी कर देती थी। मुझमें चलने तक की ताकत नहीं थी। मुझे जो सबसे स्पष्ट रूप से याद है वह 18 सितंबर की रात थी। मैं पूरी रात करवटें बदलती रही, सो नहीं सकी। सुबह तक, मुझे बुखार हो गया था, और मेरे पूरे शरीर में दर्द असहनीय था। मैंने मन ही मन प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मुझे नहीं लगता कि मैं बचूँगी। हालाँकि बहुत कुछ है जिसे मैं पीछे छोड़ने को तैयार नहीं हूँ, पर मैं एक सृजित प्राणी हूँ। चाहे मैं जिऊँ या मरूँ, चाहे मुझे एक अच्छा परिणाम और गंतव्य मिले या न मिले, मैं बस यह विनती करती हूँ कि तुम्हारे आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करूँ।” मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक सर्वशक्तिशाली चिकित्सक है!” “परमेश्वर के वचन गुणकारी दवा हैं! वे दानवों और शैतान को शर्मिंदा करते हैं! परमेश्वर के वचनों को समझने से हमें सहारा मिलता है। उसके वचन हमारे हृदय को बचाने के लिए शीघ्रता से कार्य करते हैं! वे सभी चीजों को दूर करते हैं और सर्वत्र शांति बहाल करते हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 6)। हाँ, परमेश्वर सर्वशक्तिमान है। जीवन और मरण परमेश्वर के एक ही विचार में निहित होते हैं। डॉक्टर बीमारियों का इलाज कर सकते हैं, लेकिन वे जान नहीं बचा सकते। परमेश्वर ही मेरा एकमात्र सहारा है, और उसके वचनों में रहकर ही मेरी आत्मा को शांति मिल सकती है। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते-करते मुझे पता भी नहीं चला कि मैं कब सो गई। दो साल से ज़्यादा समय में यह पहली बार था जब मैं बिना नींद की गोली लिए सो गई थी, और मैं लगभग चार घंटे तक सोई। जब मैं उठी, तो मुझे मानसिक रूप से बहुत बेहतर महसूस हुआ, और दर्द भी काफी कम हो गया था। यह इतना अद्भुत एहसास था कि इसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता था। बाद में, एक और भी चमत्कारी घटना हुई। एक शाम रात के खाने के बाद, मेरे पति मुझे नीचे टहलने में मदद कर रहे थे जब हमारी मुलाकात लगभग मेरी ही उम्र की एक महिला से हुई। उसने मेरी ओर देखा और पूछा, “बहनजी, आप इतनी कमज़ोर क्यों हैं?” मेरे पति ने उसे मेरी हालत के बारे में बताया। उसने कहा, “मेरी एक दोस्त भी बिल्कुल ऐसी ही थी। उसका इलाज पास के एक छोटे से अस्पताल में हुआ था, और अब वह पूरी तरह से ठीक है।” अगले दिन, मेरे पति मुझे उस अस्पताल ले गए। कुछ दर्जन युआन की पश्चिमी दवा से ही, मेरी बीमारी ठीक हो गई। एक महीने बाद, मैं फिर से सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभा रही थी। पाँच महीने बाद मेरा वजन वापस 20 किलोग्राम से अधिक बढ़ गया। मेरे भाई-बहनों और मेरी जान-पहचान वाले अविश्वासियों सबने ही कहा कि यह एक चमत्कार था। मैं अपने दिल में साफ तौर पर जानती थी कि यह पूरी तरह से परमेश्वर की दया और अनुग्रह था, और परमेश्वर के अद्भुत कर्म थे। यह सोचकर कि मैं पहले कितनी विद्रोही थी, अपने कर्तव्य में निरंतर परमेश्वर के साथ मोलभाव करने की कोशिश करती रहती थी और उसे धोखा देती रहती थी, मैं वास्तव में इस योग्य नहीं थी कि परमेश्वर के इतने बड़े अनुग्रह का आनंद लूँ। मैं आज भी जीवित हूँ और अपना कर्तव्य निभा पा रही हूँ, यह मेरे लिए परमेश्वर की अपार दया और प्रेम है। मैं तहे दिल से परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ, और मैं अपना कर्तव्य निभाने के इस अनमोल अवसर को सँजोती हूँ।
यूँ तो इस बीमारी का अनुभव करते हुए मेरी देह ने कुछ पीड़ा सही, लेकिन जो मैंने पाया वह एक अनमोल खजाना था। मैं समझ गई कि परमेश्वर में विश्वास करना आशीष या लाभ पाने के बारे में नहीं है, बल्कि शुद्ध होने के लिए सत्य का अनुसरण करने के बारे में है। परमेश्वर का अनुसरण करना और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना मेरी ज़िम्मेदारी है, और परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसका भय हासिल करना वह लक्ष्य है जिसका मुझे अनुसरण करना चाहिए। इस अनुभव के माध्यम से, मैंने गहराई से महसूस किया है कि “जब तुम पर बीमारी आती है तो यह परमेश्वर का प्रेम है और इसमें उसके अच्छे इरादे निश्चित ही निहित हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 6)। यह सत्य है, और यह एक तथ्य भी है! यह अनुभव मेरे जीवन का सबसे कीमती खजाना है। यह परमेश्वर का विशेष प्रेम है, एक अलग तरह का प्रेम। परमेश्वर का धन्यवाद!