62. अब मैं झटकों और असफलताओं का सही ढंग से सामना कर सकती हूँ

चियाओ शिन, चीन

मई 2024 में मैंने कलीसिया में धर्मोपदेश लिखने का प्रशिक्षण लिया। शुरू में मुझे कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ा, मुझे लगा कि सत्य की मेरी समझ उथली थी। मैं इसे अच्छे से लिख नहीं पाऊँगी। मेरी सहयोगी बहन ने मेरे साथ संगति की और मुझे प्रोत्साहित किया और उसने मुझे कुछ अच्छे तरीके भी बताए। बाद में धर्मोपदेश लिखते समय मैंने संबंधित सत्यों को खोजा। एक बार सत्य पूरी तरह समझ लेने के बाद मैंने विचार किया कि धर्मोपदेश कैसे लिखना है और मैंने उसे जल्दी ही पूरा कर लिया। मैं बहुत खुश था और परमेश्वर के मार्गदर्शन के लिए आभारी था। दो दिन बाद पर्यवेक्षक ने मुझे पत्र लिखा, कहा कि मेरा धर्मोपदेश चुन लिया गया है और मुझमें अच्छी काबिलियत और कुछ विचार हैं। मैं हैरान भी थी और खुश भी। मैंने प्रशिक्षण लेना शुरू ही किया था और मेरे द्वारा लिखा गया पहला धर्मोपदेश चुन लिया गया। मेरे आस-पास की कुछ बहनों ने कई धर्मोपदेश लिखे थे, लेकिन उनमें से किसी का भी धर्मोपदेश चुना नहीं गया था, इसलिए मुझे लगा कि जरूर मैं बहुत ही खास हूँ। कुछ दिनों बाद मैंने गलती से वह पत्र पढ़ लिया जो पर्यवेक्षक ने अगुआओं को लिखा था। पत्र में लिखा था, “चियाओ शिन धर्मोपदेश लिखने में काफी सक्रिय है और वह विचारों और काबिलियत वाली व्यक्ति है, हम उसे आगे विकसित करने की तैयारी कर रहे हैं।” भले ही यह बहुत ज्यादा नहीं था, लेकिन मुझे लगा कि मैं सबके ध्यान का केंद्र बन गई हूँ और मैं दूसरे भाई-बहनों से अलग हूँ। मैंने सोचा कि पिछले साल कैसे मैंने एक हफ्ते में कई लेख लिखे थे और जल्द ही पर्यवेक्षक की नजर मुझ पर पड़ गई थी। पर्यवेक्षक ने कहा कि मुझमें लिखने की प्रतिभा है और मुझे पाठ आधारित कर्तव्य सौंपा। अब धर्मोपदेश लिखने का प्रशिक्षण शुरू करने के तुरंत बाद, एक और पर्यवेक्षक की नजर मुझ पर पड़ गई थी। मैंने मन ही मन सोचा, “मैं जहाँ भी जाती हूँ, सबका ध्यान खींच सकती हूँ। ऐसा लगता है मुझमें सचमुच काबिलियत और लिखने की प्रतिभा है!” इसके बाद मुझे लगने लगा कि मैं दूसरों से अलग हूँ। मैंने सोचा, “मुझे लगन से प्रशिक्षण लेना है और हर धर्मोपदेश को पिछले वाले से बेहतर बनाना है, ताकि मैं कम से कम समय में मानक स्तर के धर्मोपदेश लिख सकूँ। इस तरह हर कोई निश्चित रूप से मुझे और भी ऊँचा समझेगा और मेरी और भी ज्यादा प्रशंसा करेगा।” बाद में मैं धर्मोपदेश लिखने में बहुत सक्रिय थी और मैंने एक के बाद एक दो धर्मोपदेश लिखे जो मैंने पर्यवेक्षक को सौंप दिए। पर्यवेक्षक भी अक्सर मुझे प्रोत्साहित करने के लिए पत्र लिखता था और मैं बिना सीधे कहे ही समझ गई कि पर्यवेक्षक मेरी परवाह करता है और मुझे महत्व देता है। मैं मन ही मन बहुत खुश होती थी और आत्म-प्रशंसा की भावना में जीती थी।

कुछ ही समय बाद मुझे अपने लिखे धर्मोपदेश पर लिखित प्रतिक्रिया मिली। मैंने फाइल खोली और मैंने देखा कि अगुआओं ने बहुत सारे मुद्दों को चिह्नित किया था—संगति के कुछ हिस्से अस्पष्ट थे और कुछ विषय से भटक गए थे...। मैं बहुत निराश हो गई और हताश महसूस करने लगी। मैंने सोचा, “तर्क के हिसाब से, चूँकि मुझमें लिखने की प्रतिभा है, इसलिए मेरे धर्मोपदेशों में हर बार सुधार होना चाहिए और मुझमें स्पष्ट प्रगति दिखनी चाहिए, तो फिर मैं पीछे क्यों चली गई हूँ? अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेंगे? कहीं वे यह तो नहीं सोचेंगे कि उन्होंने मुझे गलत समझा और मुझमें आखिर इस तरह की काबिलियत नहीं है?” मैं इस बारे में जितना ज्यादा सोचती, उतनी ही ज्यादा नकारात्मक होती गई और मुझमें अगुआओं द्वारा उठाए गए मुद्दों पर विचार करने का मन नहीं रहा। मुझे एहसास हुआ कि मेरी अवस्था गलत है, इसलिए मैंने पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचन खोजे और मैंने यह अंश देखा : “लोगों को स्वयं को बहुत पूर्ण, बहुत प्रतिष्ठित, बहुत कुलीन या दूसरों से बहुत भिन्न नहीं समझना चाहिए; यह सब मनुष्य के अभिमानी स्वभाव और अज्ञानता से उत्पन्न होता है। हमेशा अपने आप को दूसरों से अलग समझना—यह अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; कभी भी अपनी कमियाँ स्वीकार न कर पाना और कभी भी अपनी भूलों और असफलताओं का सामना न कर पाना—यह अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; कभी भी दूसरों को अपने से श्रेष्ठ नहीं होने देना या अपने से बेहतर नहीं होने देना—ऐसा अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; दूसरों की खूबियों को कभी खुद से श्रेष्ठ या बेहतर न होने देना—यह अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; कभी दूसरों को अपने से बेहतर विचार, सुझाव और दृष्टिकोण न रखने देना और दूसरे लोगों के बेहतर होने का पता चलने पर खुद नकारात्मक हो जाना, बोलने की इच्छा न रखना, व्यथित और निराश महसूस करना और परेशान हो जाना—ये सभी चीजें अभिमानी स्वभाव के ही कारण होती हैं। अभिमानी स्वभाव तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा के प्रति रक्षात्‍मक होने के कारण दूसरों के सुधारों को स्वीकार करने में असमर्थ बना सकता है, अपनी कमियों का सामना करने तथा अपनी असफलताओं और गलतियों को स्वीकार करने में असमर्थ बना सकता है। इसके अतिरिक्त, जब कोई व्यक्ति तुमसे बेहतर होता है, तो यह तुम्हारे दिल में घृणा और जलन पैदा कर सकता है, और तुम स्वयं को बाधित महसूस कर सकते हो, यहाँ तक कि तुम अपना कर्तव्य करना नहीं चाहते और इसे निभाने में अनमने हो जाते हो। अभिमानी स्वभाव के कारण तुम्हारे अंदर ये व्यवहार और आदतें प्रकट हो जाती हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, व्यक्ति के स्व-आचरण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि पूर्णता और दूसरों से अलग दिखने के पीछे भागने, साथ ही मेरे मुद्दों पर अगुआओं का मार्गदर्शन स्वीकारने से इनकार करने का कारण यह था कि मैं घमंडी स्वभाव से नियंत्रित हो रही थी। जब मैंने सुना कि मेरे द्वारा लिखे गए धर्मोपदेश चुन लिए गए हैं और पर्यवेक्षक ने कहा कि मुझमें काबिलियत है तो मैं दंभी हो गई, और मैं खुद को साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि काबिलियत और लिखने की प्रतिभा रखने वाला व्यक्ति समझने लगी। मैं खुद से यह सुनिश्चित करने की माँग करने लगी कि मेरे धर्मोपदेश दूसरों से बेहतर हों और मुझे लगा कि उनमें इतनी सारी समस्याएँ नहीं होनी चाहिए, क्योंकि तभी मैं लिखने की प्रतिभा वाली उपाधि के योग्य होती। इसलिए जब भी मुझे झटके लगते, मैं नकारात्मक हो जाती और खुद को ठीक से नहीं देख पाती थी। वास्तव में किसी के लिखे धर्मोपदेशों में मुद्दे होना बहुत सामान्य बात है और इस कर्तव्य को शुरू करते समय सब कुछ जानना और कर पाना, और कोई भी गलती न करना असंभव है। खुद से ऐसी माँगें करना अवास्तविक था। इसके अलावा, अगुआओं ने मेरी कमियों को खोजने, उन्हें दूर करना सीखने और आगे बढ़ने में मेरी मदद करने के लिए मेरी समस्याओं की ओर इशारा किया, लेकिन जब मुझे झटके लगे तो मैं नकारात्मक हो गई और सही से अपनी कमियों का सामना नहीं कर सकी। मैं खुद को बहुत ऊँचा समझती थी और मैं सचमुच घमंडी थी! यह सोचने के बाद मैं अगुआओं का मार्गदर्शन और मदद स्वीकार करने को तैयार हो गई और इन विचलनों और गलतियों को फिर से होने से रोकने के लिए अपने धर्मोपदेश लिखते समय प्रासंगिक सत्य सिद्धांतों को खोजने और उन पर विचार करने पर ध्यान केंद्रित करने लगी।

उसके बाद मैंने अपना दिल शांत किया और प्रासंगिक सिद्धांतों का अध्ययन किया और मैं अपने अध्ययन के दौरान कुछ बातें समझ पाई। लेकिन जब लिखने की बात आई तो मुझे अभी भी कुछ मुश्किलें हो रही थीं और मुझे लगा कि मानक स्तर का धर्मोपदेश लिखना आसान नहीं है। जैसे-जैसे समय बीतता गया, मैंने पाया कि मेरे पास अभी भी कोई विचार नहीं हैं और मैं निराश होने लगी, मन ही मन सोचने लगी, “अगर मैं एक अच्छा धर्मोपदेश नहीं लिख पाई तो? अगुआ मुझे किस नजर से देखेंगे? कहीं वे यह तो नहीं कहेंगे, ‘पता चल गया कि चियाओ शिन की काबिलियत सचमुच खराब है और वह सत्य भी नहीं समझती’?” यह सोचकर मैं चिंतित हो गई और जब मैंने दोबारा अध्ययन किया, तो मेरा मन भटक गया और मुझे नींद आती रही। रात को जब मैंने सोने की कोशिश की तो मैं आहें भरे बिना नहीं रह सकी और मैं करवटें बदलती रही, सो नहीं पाई। मैं सचमुच जल्दी से एक अच्छा धर्मोपदेश लिखना चाहती थी ताकि मैं उसे सबको दिखा सकूँ और इस तरह अपनी छवि सुधार सकूँ। लेकिन मैं उसे अच्छी तरह से लिखने के बारे में जितना ज्यादा सोचती, उतना ही ज्यादा दबाव महसूस करती। अगली सुबह मैं उठी तो निढाल महसूस कर रही थी और मेरे सिर में दर्द होने लगा। मैंने दिन भर सोचा, लेकिन फिर भी मेरे मन में कोई विचार नहीं आया और ऐसा लगा जैसे कोई भारी पत्थर मुझ पर दबाव डाल रहा हो, जिससे साँस लेना मुश्किल हो रहा था। मेरी सहयोगी बहन मेरे साथ मिलकर सिद्धांतों का अध्ययन करना चाहती थी, लेकिन मेरा मन नहीं था।

बाद में मैंने उसे पिछले कुछ दिनों की अपनी अवस्था के बारे में खुलकर बताया और उसने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़कर सुनाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “शैतान लोगों के विचारों को नियंत्रित करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल करता है, उनसे और कुछ नहीं, बस इन दो ही चीजों के बारे में सोच-विचार करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए कष्ट उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपमान सहन करवाता है और भारी बोझ उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ की खातिर हर फैसला या निर्णय करवाता है। इस तरीके से शैतान लोगों पर अदृश्य बेड़ियाँ डाल देता है और इन बेड़ियों के रहते उन बंधनों से मुक्त होने की न तो क्षमता होती है, न ही साहस। अनजाने में वे बड़ी ही कठिनाई से कदम-दर-कदम आगे घिसटते हुए ये बेड़ियाँ ढोते रहते हैं। इस प्रसिद्धि और लाभ की खातिर मानवजाति भटककर परमेश्वर से दूर हो जाती है, उसके साथ विश्वासघात करती है और अधिकाधिक दुष्ट होती जाती है। इस तरह, एक के बाद एक पीढ़ी शैतान की प्रसिद्धि और लाभ के बीच नष्ट होती जाती है। अब शैतान की करतूतें देखते हुए क्या उसके धूर्त इरादे एकदम घृणास्पद नहीं हैं? शायद आज भी तुम शैतान की धूर्त मंशाओं की असलियत नहीं देख पाते हो क्योंकि तुम्हें लगता है कि प्रसिद्धि और लाभ के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं होगा और लोग अब आगे का मार्ग नहीं देख पाएँगे, अपने लक्ष्य नहीं देख पाएँगे और उनका भविष्य अंधकारमय, धुँधला और प्रकाशरहित हो जाएगा। परंतु धीरे-धीरे तुम सब लोग एक दिन समझ जाओगे कि प्रसिद्धि और लाभ ऐसी भारी-भरकम बेड़ियाँ हैं जिन्हें शैतान मनुष्य पर डाल देता है। जब वह दिन आएगा, तुम पूरी तरह से शैतान के नियंत्रण का प्रतिरोध करोगे और पूरी तरह से उन बेड़ियों का भी प्रतिरोध करोगे जो शैतान ने तुम पर डाल दी हैं। जब तुम उन सभी चीजों से खुद को मुक्त करना चाहोगे जिन्हें शैतान ने तुम्हारे भीतर गहराई से बैठा दिया है, तब तुम शैतान से अपने आपको पूरी तरह से अलग कर लोगे और उस सबसे सच में नफरत करोगे जो शैतान तुम्हारे लिए लाया है। तभी तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम होगा और तड़प होगी(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचन सुनने के बाद, मेरा दिल अचानक रोशन हो गया। मुझे एहसास हुआ कि पिछले कुछ दिनों में मेरे दिल में जो घुटन की भावना थी, वह प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे से बाधित और बँधे होने के कारण थी। पहले तो पर्यवेक्षक ने कहा कि मुझमें अच्छी काबिलियत थी और मैंने जो धर्मोपदेश लिखे वे काफी अच्छे थे। फिर मैं मन ही मन खुद को सराहने लगी, यह महसूस करने लगी कि मुझमें लिखने की एक विशेष प्रतिभा है और इसलिए मैंने दूसरों की प्रशंसा और सराहना पाने की उम्मीद में धर्मोपदेश लिखने में और भी ज्यादा मेहनत की। हालाँकि जब मेरे लिखे दो धर्मोपदेशों में बहुत सारे मुद्दे बताए गए तो मुझे चिंता हुई कि दूसरे मुझे नीची नजर से देखेंगे और अब मुझे काबिलियत और प्रतिभा वाली व्यक्ति नहीं समझेंगे, इसलिए मैं अगुआओं द्वारा बताए गए मुद्दों पर शांत होकर विचार नहीं कर सकी, न ही मैंने अपनी कमियों को दूर करने के लिए सिद्धांतों का अध्ययन किया या सत्य खोजा। मैं तो बस अपनी छवि बहाल करने के लिए जल्दी से एक अच्छा धर्मोपदेश लिखना चाहती थी। हालाँकि मैं जितनी ज्यादा व्याकुल होती गई, मुझे उतने ही कम ख्याल आए और मेरे विचार उतने ही ज्यादा धुँधले होते गए और दिन भर काम करने के बाद भी, मैंने कोई प्रगति नहीं की। मुझे याद आया कि जब मैंने पहली बार धर्मोपदेश लिखना शुरू किया था, हालाँकि बहुत मुश्किलें थीं, मेरे पास परमेश्वर पर निर्भर रहने वाला एक शुद्ध दिल था। मैंने विचार करने के लिए परमेश्वर के प्रासंगिक वचनों का सचमुच अध्ययन किया और उन्हें खोजा और परमेश्वर ने मुझे प्रबुद्ध किया और मेरा मार्गदर्शन किया और इसलिए जब मैंने लिखा, तो मेरे पास कुछ विचार थे। लेकिन अब मैं सिर्फ अपने आत्म-सम्मान और रुतबे के बारे में ही सोचती थी और दूसरों की नजरों में एक अच्छी छवि बनाए रखने के इन विचारों में उलझी रहने के कारण मैं न ढंग से खा पाती थी, न सो पाती थी; मुझे चक्कर आने लगे और सिर हल्का-सा लगने लगा और इस वजह से मैं धर्मोपदेश लिखने पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रही थी। मेरा दिल पूरी तरह से प्रसिद्धि और लाभ के नियंत्रण में था। अगर मैं इस अवस्था को न बदलती, तो मैं बस अँधेरे और असहनीय पीड़ा में जीती रहती और समय के साथ, मैं पवित्र आत्मा का काम खो देती, यहाँ तक कि यह कर्तव्य भी खो देती। फिर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करने की अवस्था में नहीं जीना चाहती, लेकिन मुझे नहीं पता कि इसे कैसे हल किया जाए। मुझे प्रबुद्ध करो और मेरा मार्गदर्शन करो, ताकि मैं इस गलत अवस्था से बाहर निकल सकूँ और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकूँ।”

अगली सुबह बहन ने मुझे परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश पढ़कर सुनाए और एक अंश से मुझे बहुत मदद मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “हर कोई जानता है कि घमंडी होना बुरा है, लेकिन जैसे ही लोग अपने कर्तव्य में कुछ नतीजे हासिल करते हैं, वे स्वाभाविक रूप से घमंडी हो जाते हैं, वे अपने आप को तोप समझने लगते हैं और सोचते हैं कि वे परमेश्वर में अपने विश्वास में सफल हो गए हैं। जब लोग अपने कर्तव्य में कुछ नतीजे हासिल करते हैं, तो वे अपने आप को तोप क्यों समझने लगते हैं? इसका एक हिस्सा लोगों के बहुत अधिक घमंडी और दंभी होने के कारण है। क्या कोई और कारण भी है? (इसका कारण यह है कि लोग यह महसूस नहीं करते कि यह परमेश्वर ही है जो उन्हें इन नतीजों को हासिल करने के लिए अगुआई करता है। वे सोचते हैं कि सारा श्रेय उन्हीं को मिलना चाहिए और उनके पास पूँजी है, इसलिए वे अपने आप को तोप समझने लगते हैं। वास्तव में, सत्य के बिना और पवित्र आत्मा के कार्य के बिना, लोग कुछ भी करने में असमर्थ हैं, लेकिन वे इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते।) यह कथन सही है और यह इस मुद्दे का केंद्र भी है। यदि लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं करते और सत्य प्राप्त नहीं कर सकते, तो वे हमेशा खुद को कुछ भी करने के लिए सक्षम समझते हैं। इसलिए यदि उनके पास कुछ पूँजी होती है, तो वे घमंडी हो जाते हैं और अपने आप को तोप समझने लगते हैं। क्या तुम लोग अपना कर्तव्य करने के दौरान परमेश्वर की अगुआई और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता को महसूस कर पाते हो? (हाँ।) यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को महसूस करने में सक्षम हो, फिर भी अपने आप को तोप समझने लगते हो और सोचते हो कि तुम वास्तविकता से युक्त हो, तो यहाँ क्या हो रहा है? (जब हमारा कर्तव्य-पालन कुछ सफल हो जाता है, तो हम सोचते हैं कि आधा श्रेय परमेश्वर का है और आधा हमारा। हम अपने सहयोग को असीम रूप से बढ़ा-चढ़ा लेते हैं, सोचते हैं कि हमारे सहयोग से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं है और परमेश्वर का प्रबोधन इसके बिना संभव नहीं होगा।) तो परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध क्यों करता है? क्या परमेश्वर अन्य लोगों को भी प्रबुद्ध कर सकता है? (हाँ।) जब परमेश्वर किसी को प्रबुद्ध करता है, तो यह परमेश्वर का अनुग्रह होता है। और तुम्हारी ओर से वह छोटा-सा सहयोग क्या है? क्या वह कोई ऐसी चीज है, जिसके लिए तुम्हें श्रेय दिया जाए—या वह तुम्हारा कर्तव्य और जिम्मेदारी है? (यह हमारा कर्तव्य और जिम्मेदारी है।) जब तुम मानते हो कि यह तुम्‍हारा कर्तव्य और जिम्मेदारी है, तो तुम सही मनःस्थिति में होते हो, और तब तुम इसका श्रेय लेने की कोशिश करने के बारे में नहीं सोचोगे। अगर तुम हमेशा यह सोचते हो, ‘यह मेरा योगदान है। क्या परमेश्वर का प्रबोधन मेरे सहयोग के बिना संभव होगा? इस कार्य के लिए इंसान के सहयोग की जरूरत है; यह उपलब्धि मुख्य रूप से हमारे सहयोग की बदौलत होती है,’ तो तुम गलत हो। अगर पवित्र आत्मा ने तुम्हें प्रबुद्ध नहीं किया है और अगर किसी ने तुम्हारे साथ सत्य सिद्धांतों पर संगति नहीं की है, तो तुम सहयोग कैसे कर सकते हो? यदि तुम नहीं जानते कि परमेश्वर क्या अपेक्षा करता है और तुम अभ्यास का मार्ग नहीं जानते, तो भले ही तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करना और सहयोग करना चाहो, तुम नहीं जान पाओगे कि ऐसा कैसे करना है। तो क्या तुम्हारा यह ‘सहयोग’ सिर्फ कोरी बातें नहीं होंगी? यदि तुम सचमुच सहयोग नहीं करते और केवल अपने विचारों के अनुसार कार्य कर रहे हो, तो क्या तुम्हारे द्वारा किया गया कर्तव्य मानक स्तर का हो सकता है? बिल्कुल नहीं। यह एक समस्या को दर्शाता है। समस्या क्या है? कोई व्यक्ति चाहे कोई भी कर्तव्य करे, वह नतीजे हासिल करता है या नहीं, उसका कर्तव्य मानक स्तर का करता है या नहीं और वह परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करता है या नहीं, यह परमेश्वर के कार्य पर निर्भर करता है। भले ही तुम अपनी जिम्मेदारियाँ और कर्तव्य निभाओ, यदि परमेश्वर कार्य नहीं करता या तुम्हें प्रबुद्ध नहीं करता और तुम्हारी अगुआई नहीं करता और तुम अपना मार्ग, अपनी दिशा या अपने लक्ष्य नहीं जानते, तो अंततः इसका क्या परिणाम होगा? लगातार परिश्रम करने के बाद, तुमने अपना कर्तव्य ठीक से नहीं किया होगा, न ही तुमने सत्य और जीवन प्राप्त किया होगा—यह सब व्यर्थ हो गया होगा। इसलिए, अपने कर्तव्य को मानक स्तर तक करना, अपने भाई-बहनों को सुदृढ़ करना और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त करना, यह सब परमेश्वर पर निर्भर करता है! लोग केवल वही चीजें कर सकते हैं जिन्हें करने में वे सक्षम होते हैं, जिन्हें उन्हें करना चाहिए और जो उनकी अंतर्निहित क्षमताओं के भीतर होती हैं—इससे ज्यादा कुछ नहीं। इसलिए, अंततः अपने कर्तव्यों में नतीजे हासिल करना परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन और पवित्र आत्मा के प्रबोधन और अगुआई पर निर्भर करता है; केवल तभी तुम सत्य को समझ सकते हो और परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिए गए मार्ग और उसके द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार परमेश्वर का आदेश पूरा कर सकते हो। ये परमेश्वर के अनुग्रह और आशीष हैं, अगर लोग यह नहीं देख पाते, तो वे अंधे हैं। परमेश्वर का घर चाहे किसी भी प्रकार का कार्य करे, इच्छित नतीजा क्या होता है? इसका एक भाग परमेश्वर की गवाही देना और परमेश्वर के सुसमाचार का प्रसार करना है, जबकि इसका दूसरा भाग भाई-बहनों को उन्नत करना और लाभ पहुँचाना है। परमेश्वर के घर के कार्य का उद्देश्य दोनों क्षेत्रों में नतीजे प्राप्त करना है। परमेश्वर के घर में तुम चाहे कोई भी कर्तव्य करो, क्या तुम परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना नतीजे प्राप्त कर सकते हो? कदापि नहीं। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना तुम जो करते हो वह मूलतः व्‍यर्थ है और निश्चित रूप से इससे कोई नतीजा हासिल नहीं किया जा सकता(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, व्यक्ति के स्व-आचरण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि मैं “लिखने की विशेष प्रतिभा वाली” होने का तमगा इसलिए नहीं उतार पा रही थी क्योंकि मैंने धर्मोपदेश लिखने की सारी प्रभावशीलता का श्रेय खुद को दिया था और मैंने सोचा कि ये नतीजे केवल मेरी अच्छी काबिलियत, लिखने की मेरी प्रतिभा और मैंने जो प्रयास किए थे, साथ ही मैंने विचार करने में जो समय और मेहनत लगाई थी, इनके कारण ही मिले हैं। असल में, मुझे अक्सर लिखने के दौरान संघर्ष करना पड़ता था और परमेश्वर से प्रार्थना करने, प्रासंगिक सत्यों पर विचार करने और परमेश्वर का प्रबोधन और मार्गदर्शन पाने से ही मुझे थोड़ी प्रेरणा मिली थी। हालाँकि बाद में जब दूसरों ने प्रशंसा और प्रोत्साहन के कुछ शब्द कहे तो मैं दंभी हो गई, यह सोचते हुए कि यह सब मेरी अपनी उपलब्धि है और मैंने खुद पर “अच्छी काबिलियत और लिखने की प्रतिभा वाली” होने का तमगा भी लगा लिया और मैं यह देखने में नाकाम रही कि मैं वास्तव में क्या हूँ। वास्तव में कोई कर्तव्य अच्छी तरह से किया जा सकता है या नहीं, यह आंशिक रूप से कर्तव्य के सिद्धांतों और प्रासंगिक सत्यों को समझने पर निर्भर करता है और सबसे महत्वपूर्ण रूप से यह परमेश्वर का प्रबोधन और मार्गदर्शन पाने पर निर्भर करता है। कई बार ऐसा होता है जब हमारे पास कोई विचार नहीं होते और परमेश्वर से प्रार्थना करने, उसका मार्गदर्शन खोजने और उसके वचनों पर मनन करने से, हम अनजाने में कुछ सत्यों को समझ जाते हैं और कुछ प्रकाश और विचार पाते हैं और तभी हमारे लिखे धर्मोपदेशों से अच्छे नतीजे मिल सकते हैं। यह हमारी अपनी क्षमताओं के कारण नहीं है। मैंने सोचा कि पिछले कुछ दिनों से मैं कैसे प्रसिद्धि और रुतबे के लिए जी रही थी, परमेश्वर का प्रबोधन और मार्गदर्शन पाने में असमर्थ थी। भले ही मैंने लिखने में मेहनत की थी, लेकिन मेरा दिमाग एकदम खाली था, कोई विचार नहीं थे और मैं पूरी तरह से मूर्ख बन रही थी। मुझे सचमुच एहसास हुआ कि मेरे कर्तव्यों में अच्छे नतीजे परमेश्वर के प्रबोधन और मार्गदर्शन से मिले थे और मेरे पास शेखी बघारने के लिए कुछ भी नहीं था। फिर भी मैंने बेशर्मी से सारा श्रेय खुद को दे दिया था। यह सचमुच शर्मनाक था! हालाँकि मैंने कई धर्मोपदेश लिखे थे, मैंने उन्हें लिखने की प्रक्रिया का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही समझा था। दरअसल मुझे कई सिद्धांतों की समझ नहीं थी और कई पहलुओं में सत्य की स्पष्ट समझ नहीं थी; कभी-कभी तो धर्मोपदेश लिखते समय मुझे मुख्य बिंदुओं को समझने में भी संघर्ष करना पड़ता था। हालाँकि मैंने प्रासंगिक सिद्धांतों का अध्ययन किया था, लेकिन उन्हें व्यावहारिक रूप से लागू करते समय मुझमें बहुत कमी थी और मुझे अभी भी दूसरों से सुधार और मदद की जरूरत थी। लेकिन मैं खुद को असाधारण समझती थी, मानो मैं हवा में उड़ रही हूँ और मैं सचमुच अपनी सीमाओं से अनजान थी। मैं इस बारे में जितना ज्यादा सोचती, उतना ही ज्यादा शर्मिंदा महसूस करती, अपना चेहरा छिपाना चाहती थी और मैं बस धरती में समा जाना चाहती थी।

उसके बाद मैंने सोचा कि उन दो धर्मोपदेशों को अच्छे से लिखने में समर्थ न होने का मुख्य कारण यह था कि मैंने अभी-अभी प्रशिक्षण शुरू किया था और अभी भी कुछ सिद्धांतों पर मेरी पकड़ नहीं थी, इसलिए मैंने बहनों के साथ सिद्धांतों का अध्ययन किया और मैंने उन दो धर्मोपदेशों को सबके विश्लेषण और चर्चा के लिए उदाहरण के रूप में इस्तेमाल किया। सबने सुझाव दिए और उसके बाद जब मैंने फिर से धर्मोपदेशों को संशोधित किया, मेरे पास एक दिशा थी। जब भी मुझे कुछ समझ नहीं आता तो मैं परमेश्वर से प्रार्थना करती और मैं सत्य खोजती और विचार करती और एक धर्मोपदेश का संशोधन पूरा कर लेने के बाद मैंने उसे आगे बढ़ा दिया। हालाँकि, दूसरे को संशोधित करते समय, मुझे अब भी कठिनाई थी। मैं सत्य के बारे में स्पष्ट नहीं थी और थोड़ी परेशान महसूस कर रही थी। मुझे यह भी डर था कि मेरा लेखन बासी और रूखा-सूखा होगा और मैं सोच रही थी कि इसे जमा करने के बाद अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेंगे। कहीं वे यह तो नहीं कहेंगे कि मेरी काबिलियत अपर्याप्त है? मैंने भाई-बहनों से मदद माँगने की हिम्मत नहीं की, लेकिन मेरे पास आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं था और मैंने अपने दिल में बहुत दबाव महसूस किया। उस पल मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया और मैंने उसे पढ़ने के लिए खोजा। परमेश्वर कहता है : “जब परमेश्वर यह अपेक्षा करता है कि लोग अपना कर्तव्य पूरा करें, तो वह उनसे एक निश्चित संख्या में कार्यों को पूरा करने या कोई महान उपलब्धि हासिल करने के लिए नहीं कहता, न ही वह कोई अभूतपूर्व करतब हासिल करने के लिए कह रहा है। परमेश्वर जो चाहता है वह यह है कि लोग व्यावहारिक तरीके से वह सब कर सकें जो वे कर सकते हैं और उसके वचनों के अनुसार जिएँ। परमेश्वर को तुम्हारे महान या गरिमावान होने या कोई चमत्कार करने की आवश्यकता नहीं है, न ही वह तुममें कोई सुखद आश्चर्य देखना चाहता है। उसे ऐसी चीजों की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर को बस इतना चाहिए कि तुम व्यावहारिक तरीके से उसके वचनों के अनुसार अभ्यास करो। परमेश्वर के वचनों को समझने के बाद, उन पर कार्य करो और उन्हें पूरा करो या परमेश्वर के वचनों को सुनने के बाद, उन्हें अच्छी तरह से याद रखो और जब अभ्यास करने का समय आए, तो परमेश्वर के वचनों के अनुसार ऐसा करो। उन्हें तुम्हारा जीवन, तुम्हारी वास्तविकताएँ और जो तुम जीते हो, वह बन जाने दो। इस तरह, परमेश्वर संतुष्ट होगा। तुम हमेशा महानता, गरिमा और रुतबे के पीछे भागते हो; तुम हमेशा दूसरों से श्रेष्ठ बनने की कोशिश करते हो। इसे देखकर परमेश्वर को कैसा लगता है? वह इससे घृणा करता है और वह खुद को तुमसे दूर कर लेगा। तुम जितनी अधिक महानता और गरिमा के पीछे भागते हो और दूसरों से अलग दिखने, भीड़ से ऊपर उठने, असाधारण और उत्कृष्ट बनने की कोशिश करते हो, परमेश्वर तुमसे उतना ही अधिक विमुख होता है। यदि तुम आत्म-चिंतन नहीं करते और पश्चात्ताप नहीं करते, तो परमेश्वर तुमसे बेइंतहा नफरत करेगा और तुम्हें त्याग देगा। तुम्हें बिल्कुल भी ऐसा व्यक्ति नहीं बनना चाहिए जिससे परमेश्वर विमुख हो जाए; तुम्हें ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए जिससे परमेश्वर प्रेम करे। तो तुम एक ऐसे व्यक्ति कैसे बन सकते हो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है? आज्ञाकारिता से सत्य को स्वीकार करो, एक सृजित प्राणी के रूप में अपने उचित स्थान पर रहो, परमेश्वर के वचनों के आधार पर व्यावहारिक ढंग से काम करो, अपना कर्तव्य अच्छे से निभाओ, एक ईमानदार व्यक्ति बनो और मनुष्य जैसा जीवन जियो। इतना ही काफी है और यह परमेश्वर को संतुष्ट करेगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, कर्तव्य के उचित निर्वहन के लिए सामंजस्यपूर्ण सहयोग आवश्यक है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ ऊँची नहीं हैं और वह लोगों से बड़े नतीजे हासिल करने के लिए नहीं कहता। जब तक लोग आज्ञाकारी हो सकते और समर्पण कर सकते हैं और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार जमीन से जुड़े रहकर अपना कर्तव्य अच्छे से कर सकते हैं, तब तक परमेश्वर संतुष्ट होगा। लेकिन मैं हमेशा अलग दिखना चाहती थी और दूसरों की प्रशंसा और स्वीकृति पाने के लिए अच्छे धर्मोपदेश लिखना चाहती थी। यह मेरी महत्वाकांक्षा और इच्छा से नियंत्रित था। यह एक भ्रष्ट स्वभाव था। मुझे पहले प्रशासनिक आदेश का ख्याल आया जिसका परमेश्वर के चुने हुए लोगों को पालन करना चाहिए, जिसमें कहा गया है : “मनुष्य को स्वयं को बड़ा नहीं दिखाना चाहिए, न अपनी बड़ाई करनी चाहिए। उसे परमेश्वर की आराधना और बड़ाई करनी चाहिए(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए)। मैंने हमेशा प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे का अनुसरण किया, मैं दूसरों से प्रशंसा और सम्मान पाना और उनके दिलों में जगह बनाना चाहती थी। इससे परमेश्वर घृणा करता है। इस अवस्था में जीने से मेरे लिए अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना असंभव हो जाता है और यह काम में बाधा भी डाल सकता है। मुझे जल्दी से अपने अनुसरण के पीछे के गलत नजरिए को बदलना था। हालाँकि धर्मोपदेश लिखने में मुझमें अभी भी बहुत-सी कमियाँ थीं, मैं सत्य खोजने के लिए परमेश्वर के सामने अपना दिल शांत करने और सहयोग करने की पूरी कोशिश करने को तैयार थी। मैं जितना समझती थी, उतना ही लिखती और धर्मोपदेश लिखने में आने वाले हर मुद्दे को अपनी कमियाँ दूर करने का एक अवसर मानती। मुझे विश्वास था कि इस तरह धीरे-धीरे प्रशिक्षण के माध्यम से, मैं निश्चित रूप से प्रगति करूँगी। जब मैंने यह सोचा तो मैंने काफी चिंतामुक्त महसूस किया।

अगली बार जब मैंने धर्मोपदेश लिखे तो मैंने पहले वह लिखा जो मैं समझती थी और जो बातें मैं नहीं समझती थी, उनके लिए मैं खोजती और विचार करती या भाई-बहनों के साथ संवाद करती और एक बार जब मैं सत्य को लेकर स्पष्ट हो जाती, मैं लिखना फिर शुरू कर देती। इस तरह मेरे लिखे धर्मोपदेशों की प्रभावशीलता बहुत बेहतर हो गई। कुछ ही समय बाद अगुआओं ने हमें अध्ययन करने और उनसे सीखने के लिए कुछ अच्छे धर्मोपदेश भेजे। वे धर्मोपदेश न केवल नए और रोशन करने वाले थे, बल्कि सत्यों की संगति वास्तव में व्यावहारिक और स्पष्ट थी। तुलना करने पर मुझे एहसास हुआ कि मेरे धर्मोपदेश सिर्फ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से भरे हैं और सत्य की संगति स्पष्ट रूप से नहीं की गई है। उस पल मैंने देखा कि मुझमें कितनी कमी है। भाई-बहनों की तुलना में मैं बहुत पीछे थी! जब उन्होंने अपने विचारों और लाभों के बारे में लिखा तो उन्होंने न केवल घमंड नहीं किया, बल्कि कहा कि उनमें बहुत-सी कमियाँ हैं और मानक स्तर का धर्मोपदेश लिख पाना उनकी अपनी काबिलियत के कारण नहीं था, न ही इसलिए कि वे सत्य समझते थे, बल्कि प्रार्थना, खोज और प्रासंगिक सत्यों पर विचार करने से पवित्र आत्मा का प्रबोधन पाने के माध्यम से था। यह देखकर मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। मैंने सोचा कि कैसे मैंने अभी-अभी धर्मोपदेश लिखना शुरू किया है और सिर्फ एक सतही समझ के साथ, मैंने सोचा कि मैं औसत से ऊपर हूँ। मैंने तो अपने ऊपर लिखने की विशेष प्रतिभा होने का ऐसा तमगा लगा लिया था जिसे मैं उतार नहीं पा रही थी। मैं सचमुच खुद को बढ़ा-चढ़ाकर आँक रही थी और मुझमें कोई आत्म-जागरूकता नहीं थी!

अब, जब मैं अगुआओं के सुझावों को फिर से देखती हूँ तो मैं उनसे सही ढंग से पेश आ पाती हूँ और अगर कुछ ऐसा है जो मैं नहीं समझती या नहीं कर सकती तो मैं खोजने की पहल कर सकती हूँ और मेरे धर्मोपदेशों की गुणवत्ता पहले की तुलना में सुधर गई है। मैं अपने दिल में जानती हूँ कि मैंने जो प्रगति की है, वह परमेश्वर के प्रबोधन और मार्गदर्शन की बदौलत है। इस अनुभव के माध्यम से मैंने अपने भ्रष्ट स्वभाव की कुछ समझ हासिल की है और मैंने अपने जीवन प्रवेश में कुछ लाभ पाए हैं। मैंने यह भी देखा है कि सत्य की मेरी समझ सचमुच उथली है और मुझे सत्य सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और दृढ़ता से अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। अगर यह प्रकाशन न होता तो मैं खुद की प्रशंसा करने की अवस्था में जीती रहती और मैंने अपने कर्तव्य में कोई प्रगति नहीं की होती। इस असफलता और झटके ने मुझे बहुत लाभ पहुँचाया है और मैं तहे दिल से परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ!

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