97. मैंने परमेश्वर में विश्वास के प्रति अपने गलत दृष्टिकोण सही किए
जब मैं सोलह साल की थी तो पता चला कि मुझे ‘थ्रोम्बोसाइटोपेनिक परप्यूरा’ है और अगले साल पता चला कि मुझे ‘सिस्टमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस’ भी है। इस तरह की बीमारी लाइलाज होती है और इसे सिर्फ दवा से ही नियंत्रित किया जा सकता है। उस दिन से मेरे जीवन पर एक साया छा गया। मुझे लगभग हर साल अस्पताल में भर्ती होना पड़ता था। बाद में, मेरे हाथ-पैरों के जोड़ों में सूजन और दर्द रहने लगा, और कभी-कभी दर्द इतना बढ़ जाता था कि मैं चल नहीं पाती थी और अपने बाल तक नहीं बाँध पाती थी। इतनी कम उम्र में खुद को ऐसी हालत में देखकर, मुझे बहुत दुख और बेबसी महसूस होती थी, सोचती थी कि मुझे ऐसी बीमारी क्यों हुई। कई बार दर्द इतना असहनीय हो जाता था कि मेरा मन करता था कि मैं मर जाऊँ, लेकिन जब मैंने देखा कि मेरा परिवार मेरे लिए इतनी मेहनत और भाग-दौड़ कर रहा है तो मैं ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। मैं बस जैसे-तैसे एक-एक दिन गुज़ार रही थी।
सितंबर 2012 में, किसी ने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य का उपदेश सुनाया। जब मैंने सुना कि परमेश्वर में विश्वास करने से उसकी देखभाल और रक्षा मिल सकती है, तो निराशा में मुझे आशा की एक किरण दिखाई दी, इसलिए मैंने खुशी-खुशी इसे स्वीकार कर लिया। एक साल बाद, मेरी सेहत में काफी सुधार हो गया। मैं अपने दिल में परमेश्वर के प्रति बहुत कृतज्ञ थी और उम्मीद करती थी कि एक दिन मेरी बीमारी पूरी तरह से ठीक हो जाएगी ताकि मैं एक सामान्य इंसान की तरह जी सकूँ। लेकिन अप्रैल 2014 में एक दिन, मेरी नाक से अचानक बेतहाशा खून बहने लगा। खून बस लगातार बहता जा रहा था, और किसी भी तरह रुक नहीं रहा था। मैं उसे टिशू पेपर से पोंछती रही, और जल्द ही फर्श खून से सने टिशू पेपर से भर गया। उस समय मैं घर पर अकेली थी। डर की एक लहर मुझ पर छा गई, और मैं फूट-फूटकर रोने लगी, मैं बहुत डरी हुई थी और समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूँ। उसी पल, मुझे परमेश्वर का खयाल आया और मैंने उसे पुकारा, “सर्वशक्तिमान परमेश्वर, कृपया मुझे बचाइए...” मैं लगातार परमेश्वर को पुकारती रही, लेकिन नाक से खून बहना बंद नहीं हुआ। मैं निराशा में छत को घूरती रही, पहली बार मुझे लगा कि मौत मेरे बहुत करीब है। मैंने मन में सोचा, “मरना ही है तो मर जाऊँगी। वैसे भी मैं इससे बच तो नहीं सकती, और मौत एक मुक्ति होगी...।” बाद में, मेरे माता-पिता भागे-भागे घर आए और मुझे जल्दी से अस्पताल ले गए। अस्पताल में रहने के दौरान, मैंने मन में सोचा, “क्या परमेश्वर में विश्वास करना मुख्य रूप से सुरक्षित रखे जाने के बारे में नहीं है? मैं अब परमेश्वर में विश्वास करती हूँ, तो इसके बावजूद मेरे साथ ऐसा कैसे हो सकता है? अगर परमेश्वर सच में है, तो जब मैंने उसे पुकारा था, उसे कोई चमत्कार करना चाहिए था और मेरी नाक से खून बहना रोक देना चाहिए था। लेकिन परमेश्वर ने मुझे ठीक क्यों नहीं किया? उसने मेरी बीमारी को दोबारा क्यों उभरने दिया? तो फिर मेरे परमेश्वर में विश्वास करने की तुक क्या है? इससे तो अच्छा है कि मैं विश्वास ही न करूँ।” अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद जब मैं घर लौटी, तो मैंने परमेश्वर के वचनों की किताबें अगुआ को वापस दे दीं और परमेश्वर में विश्वास न करने का फैसला किया।
बाद में, जब कलीसिया के भाई-बहनों को मेरी दशा के बारे में पता चला, तो वे मेरी मदद और मेरा साथ देने के लिए आए, और उन्होंने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़कर सुनाया : “जब अय्यूब परीक्षणों से गुजरा, तो परमेश्वर और शैतान एक-दूसरे के साथ शर्त लगा रहे थे, और परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब को पीड़ित करने दिया। यद्यपि वह परमेश्वर था जो अय्यूब का परीक्षण ले रहा था, फिर भी वह वास्तव में शैतान था जिसने उसमें दखल दिया था। शैतान की नजर में यह अय्यूब को प्रलोभित करना था, लेकिन अय्यूब परमेश्वर के पक्ष में खड़ा था। अगर ऐसा नहीं होता, तो अय्यूब प्रलोभन में पड़ जाता। एक बार जब लोग प्रलोभन में पड़ते हैं, तो वे खतरे में पड़ जाते हैं। शोधन से गुजरना परमेश्वर की ओर से एक परीक्षण कहा जा सकता है, लेकिन अगर तुम अच्छी मनोदशा में नहीं हो, तो इसे शैतान का प्रलोभन कहा जा सकता है। अगर तुम दर्शनों के बारे में स्पष्ट नहीं हो, तो शैतान तुम पर दोष लगाएगा और दर्शनों के बारे में तुम्हारी समझ को धुँधला कर देगा। इससे पहले कि तुम जान पाओ, तुम प्रलोभन में पड़ जाओगे” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा)। एक बहन ने संगति की, “आज, परमेश्वर हमें बचाने का कार्य करने आया है, लेकिन शैतान लगातार हमें परेशान करता है, हमारे साथ बुरी चीजें घटित कराता है। उसका मकसद है कि हम परमेश्वर के बारे में शिकायत करें या यहाँ तक कि परमेश्वर को अस्वीकार करें और उसे त्याग दें, ताकि शैतान आखिरकार हमें निगल सके। हमें शैतान की साजिशों की असलियत देखनी होगी। यह बिल्कुल वैसा ही है जब अय्यूब ने परीक्षणों का सामना किया था। शैतान ही आध्यात्मिक जगत में अय्यूब पर आरोप लगा रहा था, कह रहा था कि अय्यूब सिर्फ इसलिए परमेश्वर का भय मानता है क्योंकि परमेश्वर ने उसे बहुत ज्यादा आशीष दिया है और अगर उसका सब कुछ नष्ट हो जाए, तो वह निश्चित रूप से परमेश्वर को त्याग देगा। उसके बाद, शैतान ने अय्यूब को नुकसान पहुँचाने के लिए हर संभव कोशिश की, उसने उसके बच्चों और उसकी विशाल संपत्ति को छीन लिया, और यहाँ तक कि उसे दर्दनाक फोड़ों से ढक दिया, यह सब इसलिए किया ताकि अय्यूब परमेश्वर को त्याग दे। लेकिन अय्यूब परमेश्वर में अपनी आस्था से मजबूती से टिका रहा, उसने शिकायत नहीं की और परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहते हुए उसके नाम की स्तुति भी की। अंत में, शैतान शर्मिंदा होकर पीछे हट गया। इससे पता चलता है कि शैतान को लोगों के साथ खिलवाड़ करना और उन्हें नुकसान पहुँचाना पसंद है, और उसका मकसद लोगों को परमेश्वर से दूर करना और उनसे परमेश्वर को धोखा दिलवाना है। आज, सिर्फ इसलिए कि तुम्हारी बीमारी फिर से उभर आई है, तुमने परमेश्वर में विश्वास करना छोड़ दिया है। क्या तुम सीधे शैतान के जाल में नहीं फँस रही हो?” बहन की संगति सुनने के बाद मेरे मन में कुछ कौंध गया। मैंने यह एहसास किया कि मेरे लिए यह बीमारी यह देखने की एक परीक्षा थी कि मैं परमेश्वर के पक्ष में खड़ी रहूँगी या शैतान के पक्ष में। अगर मैं सच में विश्वास करना छोड़ देती, तो शैतान की साजिश सफल हो जाती। यह सोचकर, मैंने परमेश्वर में विश्वास करना जारी रखने का फैसला किया। इसलिए, मैंने कलीसिया से “वचन देह में प्रकट होता है” की एक प्रति माँगी और हर दिन घर पर लगन से परमेश्वर के वचन पढ़ना शुरू कर दिया। परमेश्वर के वचन पढ़ने के माध्यम से, मैं मनुष्य की रुग्णता और पीड़ा की उत्पत्ति को समझ गई। शुरुआत में, परमेश्वर ने आदम और हव्वा को बनाया, और वे अदन की वाटिका में खुशी-खुशी रहते थे। लेकिन शैतान के प्रलोभन के कारण, उन्होंने भले और बुरे के ज्ञान के पेड़ का फल खा लिया। तब से, वे पाप में जीने लगे, और इसी तरह जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु अस्तित्व में आए। जैसे-जैसे मानवजाति शैतान द्वारा और अधिक गहराई से भ्रष्ट होती गई, लोग परमेश्वर से और दूर होते गए, उनकी रुग्णता और पीड़ा और गंभीर होती गई और उनका जीवन अधिकाधिक दयनीय होता चला गया। इस बार, न्याय और ताड़ना का कार्य करने के लिए परमेश्वर स्वयं देहधारी बना है, मनुष्य की भ्रष्टता को शुद्ध करने, मनुष्य को शैतान की शक्ति से पूरी तरह से बचाने, उसे उसके मूल स्वरूप में वापस लाने और उसे एक सुंदर गंतव्य तक पहुँचाने के लिए सत्य व्यक्त कर रहा है। भविष्य में न तो और पीड़ा होगी और न और आँसू होंगे। यह सब समझकर मैं बहुत द्रवित हो गई। मैंने महसूस किया कि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है, और मैंने सत्य का लगन से अनुसरण करने और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का संकल्प लिया।
एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और अपनी आस्था में अशुद्धियों, यानी आशीषों का अनुसरण करने के अपने इरादे के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “बहुत सारे लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि मैं उन्हें चंगा कर दूँ। बहुत सारे लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि मैं उनके शरीर से अशुद्ध आत्माओं को निकालने के लिए अपनी सामर्थ्य का इस्तेमाल करूँ और बहुत-से लोग मुझसे बस शांति और आनंद प्राप्त करने के लिए मुझमें विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझसे सिर्फ और अधिक भौतिक संपदा माँगने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि इस जीवन को शांति से गुजार सकें और आने वाले संसार में सुरक्षित और हानिरहित रह सकें। बहुत-से लोग केवल नरक की पीड़ा से बचने के लिए और स्वर्ग के आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ में विश्वास करते हैं। बहुत सारे लोग केवल अस्थायी आराम के लिए मुझ में विश्वास करते हैं, फिर भी आने वाले संसार में कुछ भी हासिल करने का प्रयास नहीं करते। जब मैं लोगों पर अपना क्रोध उतारता हूँ और कभी उनके पास रही सारी सुख-शांति छीन लेता हूँ, तो मनुष्य शंकालु हो जाता है। जब मैं मनुष्य को नरक का कष्ट देता हूँ और स्वर्ग के आशीष वापस ले लेता हूँ, वे क्रोध से भर जाते हैं। जब लोग मुझसे खुद को चंगा करने के लिए कहते हैं और मैं उन पर ध्यान नहीं देता और उनके प्रति घृणा महसूस करता हूँ तो वे मुझे छोड़कर चले जाते हैं, इलाज के दुष्ट तरीके और जादू-टोने का मार्ग खोजने लगते हैं। जब मैं मनुष्य द्वारा मुझसे माँगी गई सारी चीजें वापस ले लेता हूँ, तो वे बिना कोई निशान छोड़े गायब हो जाते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि लोग मुझमें आस्था इसलिए रखते हैं क्योंकि मेरा अनुग्रह अत्यंत विपुल है, और क्योंकि बहुत अधिक लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैंने महसूस किया कि परमेश्वर सचमुच हमारे अंतरतम हृदयों की पड़ताल करता है। उसने मेरी आस्था में आशीषों का अनुसरण करने का मेरा इरादा पूरी तरह उजागर कर दिया था। मेरा परमेश्वर में विश्वास सिर्फ उससे अनुग्रह पाने और अपनी बीमारी ठीक करवाने के लिए था। शुरू में, मैंने ठीक होने के लिए परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया था। जब परमेश्वर ने मुझे चैन और आशीष प्रदान किया और मेरी सेहत सुधर गई तो मैं उसके प्रति आभार और स्तुति से परिपूर्ण थी। लेकिन जब मेरी बीमारी फिर से उभर आई और उसे पुकारने के बाद भी मेरी नाक से खून बहना बंद नहीं हुआ, तो मैंने शिकायत की कि परमेश्वर मेरी रक्षा नहीं कर रहा है, और मैं उस पर संदेह करने लगी, यहाँ तक कि विश्वास करना छोड़ देना चाहा। मैंने देखा कि मैं वास्तव में परमेश्वर में बिल्कुल भी विश्वास नहीं करती थी; मेरी आस्था सिर्फ आशीष पाने के लिए थी। मैंने परमेश्वर को एक डॉक्टर की तरह माना था और अपने कर्तव्य में मेरा खपना भी परमेश्वर से अपनी बीमारी ठीक करवाने के उद्देश्य से था। यह तो पूरी तरह से परमेश्वर के साथ सौदा करने की कोशिश थी; यह परमेश्वर को धोखा देना था! मनुष्य को परमेश्वर ने बनाया है और उसे बिना किसी सौदेबाजी या माँग के उस पर विश्वास करना और उसकी आराधना करनी चाहिए। फिर भी, मेरा मानना था कि चूँकि मैं उस पर विश्वास करती हूँ, इसलिए परमेश्वर को मुझे ठीक करना चाहिए। इसलिए जिस पल मेरी बीमारी फिर से उभर आई, मैंने उसके बारे में शिकायत की और यहाँ तक कि उसके साथ विश्वासघात किया और उसे त्याग दिया। मुझमें जमीर और विवेक की इतनी कमी कैसे हो सकती थी! अगर परमेश्वर ने मेरी मदद और मेरा साथ देने के लिए भाई-बहनों का इस्तेमाल न किया होता, तो मुझे शैतान नुकसान पहुँचा और निगल चुका होता। मुझे बचाने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद! यह एहसास होने पर मैंने परमेश्वर से पश्चात्ताप किया और अपने पाप कबूल किए। मैंने फैसला किया कि मैं अब परमेश्वर में विश्वास आशीष पाने के इरादे से नहीं करूँगी और अपनी बीमारी को परमेश्वर के हाथों में सौंपने और उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के आगे समर्पण करने को तैयार हो गई।
छुट्टी मिलने के बाद, मेरा प्लेटलेट काउंट लगभग सामान्य हो गया था, लेकिन साप्ताहिक जाँच के दौरान यह गिरता रहा, और मेरे शरीर पर छोटे-छोटे नील पड़ने लगे। डॉक्टर ने मेरी दवा की खुराक अधिकतम कर दी, लेकिन मेरी हालत में फिर भी सुधार नहीं हुआ, इसलिए मुझे फिर से अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। मैं बहुत कमजोर और चिंतित महसूस कर रही थी, सोच रही थी, “मैं अब ठीक से परमेश्वर में विश्वास करने की कोशिश कर रही हूँ, तो वह मेरा प्लेटलेट काउंट क्यों नहीं बढ़ने दे रहा है?” मुझे एहसास हुआ कि मैं परमेश्वर से माँगें कर रही थी, इसलिए मैंने चुपचाप प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि मुझे तुमसे माँगें नहीं करनी चाहिए, लेकिन मेरा आध्यात्मिक कद बहुत ही छोटा है और मैं तुम्हारे प्रति पूरी तरह समर्पण कभी नहीं कर पाती हूँ। परमेश्वर, मैं प्रार्थना करती हूँ कि तुम मुझे मार्गदर्शन और आस्था दो।” फिर मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “यह चिंता न करो कि कल कैसा होगा या भविष्य कैसा रहेगा। बस हर दिन मुझ पर भरोसा करते हुए जियो और मैं निश्चित रूप से तुम्हारी अगुवाई करूँगा” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 28)। “आस्था एक ही लट्ठे से बने पुल की तरह है : जो लोग जीवन से चिपके रहते हैं और मृत्यु से डरते हैं उन्हें इसे पार करने में परेशानी होगी, परन्तु जो अपनी जान देने को तैयार रहते हैं वे सधे हुए कदमों से और बेफिक्र होकर इसे पार कर सकते हैं। अगर लोग कायर और भययुक्त विचार पालते हैं तो ऐसा इसलिए है कि शैतान उन्हें मूर्ख बना चुका है; उसे डर है कि हम परमेश्वर में प्रवेश करने के लिए आस्था का पुल पार कर लेंगे। शैतान अपने विचार हमें भेजने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। हमें हर पल परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें रोशन और प्रबुद्ध करे, हर पल परमेश्वर पर निर्भर रहना चाहिए ताकि वह हमारे भीतर से शैतान के जहर को शुद्ध कर दे, हर पल अपनी आत्मा के भीतर परमेश्वर के निकट आने का अभ्यास करना चाहिए; हमें अपने संपूर्ण अस्तित्व पर परमेश्वर को प्रभुत्व रखने और उसमें पूरी तरह से बसने देना चाहिए” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 6)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे यह समझने में मदद की कि चिंता और डर के वे विचार शैतान से आए थे और हर समय परमेश्वर पर निर्भर करके और अपनी जान जोखिम में डालने की इच्छा रखकर ही मैं अपनी कायरता को दूर कर सकती हूँ और शैतान पर विजय पा सकती हूँ। परमेश्वर के वचनों ने मुझे आस्था दी। परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है और हर चीज पर शासन करता है। मेरी बीमारी उसके हाथों में है। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं इसका अनुभव करने के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहने को तैयार हूँ। जब परमेश्वर मेरे साथ है तो मेरे पास डरने के लिए कुछ भी नहीं है। मुझ जैसे महत्वहीन व्यक्ति के लिए, जो बीमारी से त्रस्त है, आज परमेश्वर के सामने आ पाना और उसके वचनों का आनंद ले पाना ही उसका अनुग्रह और उसकी बड़ाई है। अगर मैं एक दिन मर भी जाऊँ, तो भी मेरा जीवन व्यर्थ नहीं गया होगा। यह एहसास होने पर, मेरा दिल अब उतना चिंतित या भयभीत नहीं था। मैं परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण करने को तैयार हो गई और हमेशा की तरह रोज परमेश्वर के वचन पढ़ती रही। बाद में, डॉक्टर ने मेरी दवा कम कर दी, और मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि मेरा प्लेटलेट काउंट वास्तव में बढ़ गया है। इसके तुरंत बाद मुझे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। मैंने अपने दिल में परमेश्वर का अनगिनत बार धन्यवाद किया। मैंने देखा कि सभी चीजों में अंतिम निर्णय परमेश्वर का ही होता है और उसमें मेरी आस्था बढ़ गई। उसके बाद, मेरा प्लेटलेट काउंट महीने-दर-महीने बढ़ता गया, और कुछ महीनों बाद, यह पूरी तरह से सामान्य हो गया। मैं परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता पर अचंभित हुए बिना नहीं रह सकी और मैंने गहराई से महसूस किया कि परमेश्वर हर चीज पर संप्रभुता रखता है। मेरा हृदय उसके प्रति असीम कृतज्ञता से भर गया।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के दो और अंश पढ़े और अपनी समस्याओं की एक नई समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मनुष्य की धारणाओं के अनुसार परमेश्वर को सदैव चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, सदैव बीमारों को चंगा करना और दानवों को बहिष्कृत करना चाहिए और सदैव ठीक यीशु के समान होना चाहिए। परंतु इस बार परमेश्वर इसके समान बिल्कुल नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर अब भी चिह्न और चमत्कार दिखाए और अब भी दानवों को बहिष्कृत करे और बीमारों को चंगा करे—यदि वह बिल्कुल यीशु की तरह करे—तो परमेश्वर वही कार्य दोहरा रहा होगा और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाएगा। ... आज परमेश्वर का कार्य यीशु के कार्य से भिन्न क्यों है? आज परमेश्वर चिह्न और चमत्कार क्यों नहीं दिखाता है, दानवों को क्यों नहीं निकालता है और बीमारों को चंगा क्यों नहीं करता है? यदि यीशु का कार्य व्यवस्था के युग के दौरान किए गए कार्य के समान ही होता, तो क्या वह अनुग्रह के युग के परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर पाता? क्या वह सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा कर पाता? यदि यीशु मंदिर में गया होता और व्यवस्था के युग की तरह उसने सब्त को माना होता, उसे किसी ने नहीं सताया होता और सबने उसे गले लगाया होता, तो क्या उसे सलीब पर चढ़ाया जा सकता था? क्या वह छुटकारे का कार्य पूरा कर सकता था? यदि अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर यीशु के समान चिह्न और चमत्कार दिखाता, तो इसका क्या अर्थ होता? यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान अपने कार्य का दूसरा भाग करता है, जो उसकी प्रबंधन योजना के भाग का प्रतिनिधित्व करता है, तो केवल तभी मनुष्य परमेश्वर का अधिक गहरा ज्ञान प्राप्त कर सकता है और परमेश्वर की प्रबंधन योजना पूर्ण हो सकती है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान)। “आज, तुम सभी लोगों को यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा मुख्य रूप से ‘वचन देहधारी होता है’ का तथ्य साकार किया जाता है। पृथ्वी पर अपने व्यावहारिक कार्य के माध्यम से परमेश्वर इस बात की अनुमति देता है कि मनुष्य उसे जाने, उसके साथ जुड़े और उसके व्यावहारिक कर्मों को देखे। वह मनुष्य को यह स्पष्ट रूप से देखने देता है कि वह चिह्न और चमत्कार दिखाने में सक्षम है और ऐसा समय भी आता है, जब वह ऐसा करने में अक्षम होता है; यह युग पर निर्भर करता है। इससे तुम देख सकते हो कि परमेश्वर चिह्न और चमत्कार दिखाने में अक्षम नहीं है, बल्कि इसके बजाय वह अपने कार्य का ढंग, किए जाने वाले कार्य और युग के अनुसार बदल देता है। कार्य के वर्तमान चरण में वह चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता; यीशु के युग में उसने कुछ चिह्न और चमत्कार दिखाए थे, क्योंकि उस युग में उसका कार्य भिन्न था। परमेश्वर आज वह कार्य नहीं करता, और कुछ लोग मानते हैं कि वह चिह्न और चमत्कार दिखाने में अक्षम है या वे सोचते हैं कि चूँकि वह चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता, तो वह परमेश्वर नहीं है। क्या यह एक झूठा तर्क नहीं है? परमेश्वर चिह्न और चमत्कार दिखाने में सक्षम है, परंतु वह एक भिन्न युग में कार्य कर रहा है और इसलिए वह ऐसा कार्य नहीं करता। अलग-अलग युगों में और परमेश्वर के कार्य के भिन्न चरणों के अनुसार, परमेश्वर अलग-अलग कर्म अभिव्यक्त करता है। परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास चिह्नों और चमत्कारों में विश्वास करना नहीं है, न ही अजूबों पर विश्वास करना है, बल्कि नए युग के दौरान उसके व्यावहारिक कार्य में विश्वास करना है। मनुष्य परमेश्वर को उसके कार्य करने के ढंग के माध्यम से जानता है, और यही ज्ञान मनुष्य के भीतर परमेश्वर में विश्वास, अर्थात् परमेश्वर के कार्य और कर्मों में विश्वास, उत्पन्न करता है। ... प्रत्येक युग में परमेश्वर विभिन्न कर्म अभिव्यक्त करता है। प्रत्येक युग में वह अपने कर्मों का अंश अभिव्यक्त करता है, और प्रत्येक युग का कार्य परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग का और परमेश्वर के कर्मों के एक भाग का प्रतिनिधित्व करता है। वह जिन कर्मों को अभिव्यक्त करता है, वे हर उस युग के साथ बदलते जाते हैं जिसमें वह कार्य करता है, परंतु वे सब परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को अधिक गहरा करने देते हैं, मनुष्य को परमेश्वर में अधिक सच्चा और ठोस विश्वास करने देते हैं। मनुष्य परमेश्वर में उसके समस्त कर्मों के कारण विश्वास करता है, क्योंकि वह इतना अद्भुत, इतना महान और सर्वशक्तिमान है, क्योंकि वह अथाह है, इसलिए मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे यह एहसास हुआ कि मैंने अपनी बीमारी के दौरान जो धारणा प्रकट की थी वह ठीक यह थी : यह विश्वास कि अगर वह परमेश्वर है तो उसे संकेत और चमत्कार दिखाने चाहिए, बीमारों को चंगा करना चाहिए और राक्षसों को बाहर निकालना चाहिए, और अगर वह ऐसा नहीं करता है तो वह परमेश्वर नहीं है। मेरा दृष्टिकोण कितना हास्यास्पद और बेतुका था! शैतान और दुष्टात्माएँ भी लोगों को चंगा करने के लिए कुछ संकेत और चमत्कार दिखाकर परमेश्वर की नकल कर सकती हैं। क्या इसका मतलब यह है कि उन्हें परमेश्वर कहा जा सकता है? क्या यह परमेश्वर की ईशनिंदा नहीं है? परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, जो सभी चीजों पर शासन करता है और संप्रभुता रखता है, और मानवजाति का मार्गदर्शन कर सकता है और उसे बचा सकता है। अंत के दिनों में, परमेश्वर मानवजाति को पूरी तरह से बचाने के लिए सत्य व्यक्त करने हेतु देहधारी हुआ है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करके, लोग अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव को त्याग सकते हैं, उद्धार पा सकते हैं और पूर्ण बनाए जा सकते हैं। इस तरह का कार्य और इस तरह के वचन बीमारों को चंगा करने और राक्षसों को निकालने के लिए संकेत और चमत्कार करने के परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य से कहीं बढ़कर हैं। यह कुछ ऐसा है जिसे कोई भी सृजित मानव, शैतान या कोई दुष्टात्मा हासिल नहीं कर सकता है। मुझे ख्याल आया कि कैसे आज कितने ही लोग किसी का परमेश्वर होना इस आधार पर तय करते हैं कि क्या वह बीमारों को चंगा कर सकता है या चमत्कार दिखा सकता है। जब शैतान और दुष्टात्माएँ उन्हें कुछ लाभ देती हैं या कुछ चमत्कार करती हैं, तो वे उनकी आराधना करते हैं, शैतान को सच्चा परमेश्वर मानकर उसके साथ पेश आते हैं, जबकि उस सच्चे परमेश्वर के लिए दरवाजा बंद कर देते हैं जो सत्य व्यक्त करता है और मानवजाति को बचा सकता है। नतीजतन, वे बचाए जाने का मौका खो देते हैं। ऐसा दृष्टिकोण वास्तव में बेतुका और विनाशकारी है! परमेश्वर के वचनों से मैं यह भी समझ गई कि बीमारों को चंगा करना, राक्षसों को बाहर निकालना और संकेत और चमत्कार दिखाना वह कार्य था जो परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में किया था। अगर परमेश्वर इसे अंत के दिनों में फिर से करता, तो यह दोहराव होता। अगर परमेश्वर हमेशा बीमारों को चंगा करता, दुष्टात्माओं को निकालता, और चमत्कार करता, तो हर कोई सिर्फ इसलिए परमेश्वर में विश्वास करता और उसका अनुसरण करता क्योंकि उनकी बीमारियाँ ठीक हो गईं या उन्होंने एक चमत्कार देख लिया। इससे यह प्रकट करना असंभव हो जाएगा कि कौन सचमुच विश्वास करता है और किसमें झूठी आस्था है, अपनी किस्म के अनुसार हरेक की छँटाई करना तो दूर रहा। इस बार, परमेश्वर अपने कार्य में एक भी संकेत या चमत्कार नहीं दिखाता है, जो लोगों के भ्रष्ट स्वभावों का बेहतर ढंग से खुलासा कर सकता है और उन्हें बदलने और शुद्ध करने के लिए अधिक अनुकूल है। उदाहरण के लिए, मुझे ही ले लो। अगर परमेश्वर वास्तव में मेरी हर विनती को पूरा कर देता और मेरी बीमारी को पूरी तरह से ठीक कर देता तो मैं कभी भी आस्था के बारे में अपने गलत दृष्टिकोणों या परमेश्वर के साथ सौदेबाजी के प्रयास के अपने नीच इरादे पर चिंतन न करती। मैं अपनी ही धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर परमेश्वर को सीमित करती रहती। उस तरह से विश्वास करते हुए मैं कभी सत्य और जीवन प्राप्त न करती, मेरा भ्रष्ट स्वभाव नहीं बदलता और मैं अंततः हटा दी जाती। यूँ तो इस बीमारी के दौरान मैंने थोड़ी-सी शारीरिक पीड़ा सही, फिर भी अपनी पीड़ा के बीच प्रार्थना करने और परमेश्वर पर निर्भर रहने के जरिए परमेश्वर ने अपने वचनों से मेरा प्रबोधन और मार्गदर्शन किया, मुझे मेरी बीमारी की बाधाओं से और दर्द और डर में जीने से मुक्त किया। मैंने परमेश्वर में थोड़ी-सी आस्था भी प्राप्त की। ये ऐसी प्राप्तियाँ थीं जो मैं एक आरामदायक माहौल में कभी भी हासिल नहीं कर सकती थी। मैंने सच में महसूस किया कि मानवजाति को बचाने के लिए अपने वचनों का उपयोग करने का परमेश्वर का कार्य कितना व्यावहारिक और कितना बुद्धिमानी भरा है! यह समझकर, मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, भविष्य में मेरी बीमारी का चाहे जो भी हो, मैं अपना सब कुछ तुम्हें सौंपने, लगन से सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने के लिए तैयार हूँ।”
फिर मैंने परमेश्वर के और अधिक वचन पढ़े और जाना कि परमेश्वर में सच्ची आस्था क्या है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “‘परमेश्वर में विश्वास’ का अर्थ यह मानना है कि परमेश्वर है; यह परमेश्वर में विश्वास की सरलतम अवधारणा है। इस अवधारणा को एक कदम आगे ले जाएँ तो परमेश्वर के अस्तित्व को मानना परमेश्वर में सचमुच विश्वास करने जैसा नहीं है; बल्कि यह गहरे धार्मिक रंग वाली एक प्रकार की साधारण आस्था है। परमेश्वर में सच्चे विश्वास का अर्थ यह है : इस विश्वास के आधार पर कि परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभुता रखता है, व्यक्ति उसके वचनों और उसके कार्य का अनुभव करता है और इस प्रकार से अपने भ्रष्ट स्वभाव त्याग देता है, परमेश्वर के इरादे पूरे करता है और परमेश्वर को जान पाता है। केवल इस प्रकार की यात्रा ही ‘परमेश्वर में विश्वास’ कहलाई जा सकती है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना)। “तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर पर विश्वास करना बस कष्ट सहने या उसके लिए बहुत सारी चीजें करने या अपनी देह की शांति या अपने लिए सब कुछ सहज रूप से होने देने या सभी चीजों में खुद आराम और सहजता से रहने के बारे में है। इनमें से कोई भी प्रयोजन ऐसा नहीं है जो लोगों का परमेश्वर पर अपने विश्वास में होना चाहिए। अगर तुम इन प्रयोजनों के लिए विश्वास करते हो, तो तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है और तुम्हें पूर्ण बनाया जाना बिल्कुल भी संभव नहीं है। परमेश्वर के कर्म, परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, उसकी बुद्धि, उसके वचन, उसकी अद्भुतता और उसका अथाहपन, वे सब चीजें हैं जिन्हें लोगों को समझना चाहिए। इस समझ के जरिए तुम्हें अपने व्यक्तिगत माँगों, आशाओं और धारणाओं को अपने हृदय से निकाल देना चाहिए। केवल इन चीजों को हटा करके ही तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित शर्तें पूरी कर सकते हो। केवल इसके माध्यम से ही तुम जीवन प्राप्त कर सकते हो और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो। परमेश्वर पर विश्वास करने का प्रयोजन उसे संतुष्ट करना और उसके द्वारा अपेक्षित स्वभाव को जीना है, ताकि अयोग्य लोगों के इस समूह के माध्यम से उसके कर्म और उसकी महिमा अभिव्यक्त हो सके। परमेश्वर में विश्वास करने का यही सही दृष्टिकोण है और यही वह लक्ष्य भी है जिसका तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में तुम्हारा दृष्टिकोण सही होना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर के वचनों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने की आवश्यकता है और तुम्हें सत्य को जीने, और विशेष रूप से उसके व्यावहारिक कर्मों और पूरे ब्रह्मांड में उसके अद्भुत कर्मों को देखने, और साथ ही देह में उसके द्वारा किए जाने वाले व्यावहारिक कार्य को देखने में सक्षम होना चाहिए। अपने वास्तविक अनुभवों के माध्यम से लोग इस बात को समझ सकते हैं कि कैसे परमेश्वर उन पर अपना कार्य करता है और उनके प्रति परमेश्वर के इरादे क्या हैं। इस सबका प्रयोजन यह है कि लोग अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभावों को उतारकर फेंक सकें” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा)। “अब क्या तुम लोग समझते हो कि परमेश्वर में विश्वास क्या है? क्या परमेश्वर में विश्वास का अर्थ चिह्न और चमत्कार देखना है? क्या इसका अर्थ स्वर्ग जाना है? परमेश्वर में विश्वास करना किसी भी तरह से कोई सरल मामला नहीं है। विश्वास के धार्मिक तरीकों को हटा दिया जाना चाहिए; बीमारों को चंगा करने और दानवों को निकालने का अनुसरण करना, चिह्नों और चमत्कारों पर ध्यान केंद्रित करना, परमेश्वर के अधिक अनुग्रह, शांति और आनंद का लालच करना, देह की संभावनाओं और सुख-सुविधाओं का अनुसरण करना—ये विश्वास के धार्मिक तरीके हैं और विश्वास के ऐसे तरीके एक अस्पष्ट प्रकार की आस्था हैं। आज परमेश्वर में व्यावहारिक विश्वास क्या है? यह परमेश्वर के वचन को अपनी जीवन वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना, परमेश्वर के वचन से उसको जानना और इस प्रकार उसके प्रति सच्चा प्रेम प्राप्त करना है। स्पष्ट रूप से कहूँ तो : परमेश्वर में विश्वास इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सको, परमेश्वर से प्रेम कर सको और उस कर्तव्य को पूरा कर सको जिसे एक सृजित प्राणी द्वारा पूरा किया जाना चाहिए। परमेश्वर में विश्वास करने का यही उद्देश्य है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब कुछ पूरा हो जाता है)। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि परमेश्वर में विश्वास शारीरिक चैन के लिए नहीं होना चाहिए, न ही यह आशीषों के लिए होना चाहिए। बल्कि, यह परमेश्वर के और अधिक वचन खाने-पीने और उसके कार्य का अनुभव करने के बारे में होना चाहिए, ताकि व्यक्ति अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव को त्याग सके और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सके और परमेश्वर को जानने, उसके प्रति समर्पण करने और उसका भय मानने में सक्षम हो सके; केवल तभी कोई अंततः परमेश्वर द्वारा बचाया जा सकता है। लेकिन आस्था के प्रति मेरा दृष्टिकोण शुरुआत से ही गलत था। मैं चाहती थी कि परमेश्वर मुझे ठीक करे और शारीरिक चैन दे। इस तरह की आस्था एक अस्पष्ट धार्मिक विश्वास है और परमेश्वर इसे बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता है। मुझे अय्यूब का ख्याल आया। उसने अपनी आस्था में शारीरिक चैन नहीं खोजा। इसके बजाय, उसने अपने दैनिक जीवन में परमेश्वर की संप्रभुता का अनुभव करने और उसके कर्मों को जानने पर ध्यान केंद्रित किया और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का अनुसरण किया। जब वह शारीरिक बीमारी से पीड़ित था, तो उसने अपने होठों से पाप नहीं किया। वह परमेश्वर से शिकायत करने या उसे दोष देने के बजाय अत्यंत पीड़ा सहना पसंद करता था और फिर भी परमेश्वर के नाम की स्तुति करता था। उसकी आस्था को परमेश्वर की स्वीकृति मिली। लेकिन मैंने अपनी आस्था में सत्य का अनुसरण नहीं किया; मैंने केवल शारीरिक चैन खोजा। जब मेरी बीमारी फिर से उभर आई, तो मेरा दिल परमेश्वर के खिलाफ शिकायतों से भर गया, और मैंने उसे अस्वीकार तक किया और उसे धोखा तक दिया। मैं अय्यूब से अपनी तुलना करने की सोच तक नहीं सकती थी। मेरा यह जीवन परमेश्वर का दिया हुआ था। नाक से अनवरत खून बहने के दौरान मेरा जीवन खतरे में नहीं था, यह बात पहले ही परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा थी। फिर भी, मैंने परमेश्वर का धन्यवाद नहीं किया; बल्कि मैंने उसके बारे में शिकायत की और उसके साथ विश्वासघात किया। मुझमें जमीर और विवेक का सचमुच इतना अभाव था! इसके अलावा, मुझे यह बीमारी परमेश्वर में विश्वास करने से पहले ही हो गई थी। अगर मैं विश्वास नहीं भी करती, तो भी मेरी दिक्कतें बढ़तीं। मेरे फिर से बीमार पड़ने का मेरे परमेश्वर में विश्वास करने या न करने से कोई लेना-देना नहीं था। मुझे उसके बारे में शिकायत नहीं करनी चाहिए थी। तब मैं समझी कि परमेश्वर में सच्ची आस्था क्या है और मैं उसकी आवश्यकताओं के अनुसार लगन से सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने को तैयार हो गई।
बाद में, जब भी मुझे बीमारी का अनुभव हुआ, मैंने अपने द्वारा प्रकट होने वाले भ्रष्ट स्वभाव पर चिंतन करने और उसका समाधान करने के लिए सत्य खोजने पर ध्यान केंद्रित किया। इस तरीके से अभ्यास करके मैं अब अपनी बीमारी से उतनी बाधित नहीं रहती थी। परमेश्वर का धन्यवाद कि उसने आस्था के प्रति मेरे गलत दृष्टिकोणों की मुझे थोड़ी-सी समझ देने और परमेश्वर में आस्था का उचित मार्ग खोजने में मेरी मदद करने के लिए इस बीमारी का उपयोग किया। चाहे मेरे शरीर के साथ भविष्य में कुछ भी हो या चाहे मेरी बीमारी ठीक हो सकती हो, मैं परमेश्वर का अनुसरण करूँगी और सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलूँगी। परमेश्वर का धन्यवाद!