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परमेश्वर के नाम का अर्थ

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हर युग में, उसके कार्य के हर चरण में,

हर युग में सार्थक रहा है परमेश्वर का नाम,

आधारहीन नहीं है परमेश्वर का नाम।

हर नाम उसका एक युग दर्शाता है।

I

यहोवा, यीशु और मसीहा सभी परमेश्वर के आत्मा को दर्शाते हैं।

फिर भी, ये नाम परमेश्वर के प्रबंधन में, युगों को दर्शाते हैं,

मगर नहीं दर्शाते उसकी समग्रता को।

नाम जिन्हें धरती पर इंसान कहता है परमेश्वर,

नहीं व्यक्त कर सकते उसके समग्र स्वभाव को,

नहीं व्यक्त कर सकते वो जो है उसको।

वे महज़ नाम हैं परमेश्वर के अलग-अलग युगों में।

इसलिये आएगा जब अंतिम युग, अंत के दिनों का युग,

बदलेगा परमेश्वर का नाम फिर से।

न यहोवा, न यीशु, न मसीहा कहलाएगा वो।

शक्तिशाली और सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहलाएगा वो।

और इसी नाम से करेगा समापन युग का वो।

II

परमेश्वर कभी कहलाता था यहोवा, कभी कहलाता था मसीहा भी वो।

और कभी प्यार और सम्मान से, लोग कहते थे यीशु उद्धारक उसको।

आज परमेश्वर न यहोवा है, न यीशु है, लोग जानते थे पहले जिसको।

ये वो परमेश्वर है जो लौट आया है अंत के दिनों में,

जो ख़त्म करेगा इस युग को।

अपने पूरे स्वभाव के साथ, अधिकार, सम्मान और महिमा के साथ,

ये परमेश्वर है, स्वयं परमेश्वर है।

ये स्वयं परमेश्वर है, जो उदित होता है धरती के किनारों पर।

ये स्वयं परमेश्वर है, जो उदित होता है धरती के किनारों पर।

III

परमेश्वर के वचनों से आख़िरकार, दुनिया के देश सभी आशीष पाएँगे

और साथ ही उन वचनों से रौंदे जाएँगे।

देखेंगे इस तरह अंत के दिनों के लोग, उद्धारक परमेश्वर लौट आया है।

ये वो शक्तिशाली सर्वशक्तिमान परमेश्वर है,

जो जीत लेता है हर इंसान को, जीत लेता है हर इंसान को।

वो दिखलाएगा लोगों को, कभी इंसान की पाप-बलि हुआ करता था वो।

मगर अंत के दिनों में, आग है सूरज की वो,

जो भस्म कर देती है हर चीज़ को।

मगर अंत के दिनों में, आग है सूरज की वो,

जो भस्म कर देती है हर चीज़ को।

और धार्मिकता का सूरज है वो, प्रकट करता है हर चीज़ को।

अंत के दिनों में परमेश्वर का यही कार्य है, परमेश्वर का यही कार्य है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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