6. यह क्यों कहा जाता है कि परमेश्वर का दो बार देहधारी होना देहधारण की महत्ता को पूरा करता है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“वैसे ही मसीह भी बहुतों के पापों को उठा लेने के लिये एक बार बलिदान हुआ; और जो लोग उसकी बाट जोहते हैं उनके उद्धार के लिये दूसरी बार बिना पाप उठाए हुए दिखाई देगा” (इब्रानियों 9:28)

“आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था” (यूहन्ना 1:1)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

प्रथम देहधारण मनुष्य को पाप से छुटकारा दिलाने के लिए था, उसे यीशु के दैहिक शरीर के माध्यम से छुटकारा दिलाने के लिए था, अर्थात् यीशु ने मनुष्य को सलीब से बचाया, किंतु शैतानी भ्रष्ट स्वभाव मनुष्य के भीतर अभी भी बचे रह गए। दूसरा देहधारण अब पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए नहीं है, अपितु उन लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए है जिन्हें पाप से छुटकारा दिलाया गया था। यह इसलिए किया जाता है ताकि जिनके पापों को क्षमा किया जा चुका है वे अपने पाप से मुक्त और पूरी तरह से शुद्ध हो सकें और स्वभावगत बदलाव हासिल कर सकें और इस प्रकार शैतान के अंधकार के प्रभाव से मुक्त हो जाएँ और परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आएँ। केवल इसी तरीके से मनुष्य पूरी तरह से पावनीकृत हो सकता है। व्यवस्था के युग का अंत होने के बाद और अनुग्रह के युग के आरंभ से परमेश्वर ने उद्धार-कार्य शुरू किया, जो अंत के दिनों में जारी है, जब परमेश्वर मनुष्य की विद्रोहशीलता के लिए उसके न्याय और ताड़ना का कार्य करता है और इस प्रकार मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध करता है। केवल इसके बाद ही परमेश्वर उद्धार के अपने कार्य का समापन करेगा और विश्राम में प्रवेश करेगा। इसलिए, कार्य के तीन चरणों में परमेश्वर स्वयं मनुष्य के बीच अपना कार्य करने के लिए केवल दो बार देहधारी हुआ है। वह इसलिए, क्योंकि कार्य के तीन चरणों में से केवल एक चरण ही लोगों का जीवन जीने में मार्गदर्शन करने के लिए है, जबकि अन्य दो चरणों में उद्धार का कार्य शामिल है। केवल देहधारी होकर ही परमेश्वर मनुष्य के साथ रह सकता है, संसार के कष्ट का अनुभव कर सकता है और एक सामान्य दैहिक शरीर में रह सकता है। केवल इसी तरह से वह लोगों को उस व्यावहारिक वचन की आपूर्ति कर सकता है जिसकी उन्हें सृजित प्राणी होने के नाते आवश्यकता है। परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर से पूर्ण उद्धार प्राप्त करता है, न कि अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर में सीधे स्वर्ग से। मनुष्य देह और रक्त से बना है, उसके पास परमेश्वर के आत्मा को देखने का कोई उपाय नहीं है, उसके आत्मा के निकट पहुँचने की तो बात ही छोड़ दो, इसलिए मनुष्य जिसके संपर्क में आ सकता है वह सिर्फ परमेश्वर का देहधारी देह है। केवल इसी तरीके से मनुष्य समस्त वचन और सभी सत्य समझ पाता है और पूर्ण उद्धार प्राप्त कर पाता है। दूसरा देहधारण मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा दिलाने और उसे पूरी तरह से शुद्ध करने के लिए पर्याप्त है। इसलिए, दूसरे देहधारण के साथ देह में परमेश्वर का संपूर्ण कार्य समाप्त कर दिया जाएगा और परमेश्वर के देहधारण का महत्व पूरा कर दिया जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

जिस समय यीशु अपना कार्य कर रहा था, तब भी उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान कल्पित और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा उसे दाऊद का वंशज माना और कहा कि वह एक महान नबी है, उदार प्रभु है जिसने मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा दिलाया। कुछ लोग अपनी आस्था के बल पर उसके वस्त्र के किनारे को छूकर ही चंगे हो गए; अंधे देख सके, यहाँ तक कि मृतक जीवित किए जा सके। किंतु मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए शैतानी भ्रष्ट स्वभावों का पता लगाने में असमर्थ रहा, न ही वह यह जानता था कि उन्हें कैसे त्यागा जाए। मनुष्य ने बहुत अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति की आस्था से पूरे परिवार को आशीष मिलना, बीमारी से चंगाई, इत्यादि। शेष मनुष्य के अच्छे कर्म और उसका धर्मात्मा जैसा रूप था; यदि कोई इनके आधार पर जी सकता था तो उसे एक मानक स्तर का विश्वासी माना जाता था। केवल इसी तरह के विश्वासी मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ था कि उन्हें छुटकारा दिला दिया गया था। परंतु अपने जीवन-काल में इन लोगों ने जीवन के मार्ग को बिल्कुल नहीं समझा था। उन्होंने सिर्फ इतना किया कि अपना स्वभाव बदलने के किसी मार्ग को अपनाए बिना बस एक निरंतर चक्र में पाप किए और उन्हें स्वीकार कर लिया : अनुग्रह के युग में मनुष्य की स्थिति ऐसी थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया है? नहीं! इसलिए, उस चरण का कार्य पूरा हो जाने के बाद भी न्याय और ताड़ना का कार्य बाकी रह गया था। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध करने और इस प्रकार उसे अनुसरण हेतु एक मार्ग प्रदान करने के लिए है। यह चरण फलदायक या अर्थपूर्ण न होता, यदि यह दुष्टात्माओं को निकालने के साथ जारी रहता, क्योंकि यह मनुष्य की पापी प्रकृति को उतार फेंकने में असफल रहता और मनुष्य अपने पापों की क्षमा पर ही रुक जाता। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए गए हैं, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले ही समाप्त हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। किंतु मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर रहते हैं, मनुष्य अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है और परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर वचन का उपयोग करके मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करता है और उसे उचित मार्ग के अनुसार अभ्यास करने के लिए प्रेरित करता है। इस चरण का कार्य पिछले चरण से अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक फलदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन का पोषण करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया होने में सक्षम बनाता है; कार्य का यह चरण कहीं अधिक संपूर्ण है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूर्ण किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना का पूर्णतः समापन किया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

अपने पहले देहधारण में परमेश्वर ने देहधारण के कार्य को पूरा नहीं किया; उसने उस कार्य के पहले चरण को ही पूरा किया जिसे करना देह में रह रहे परमेश्वर से अपेक्षित था। इसलिए देहधारण के कार्य को पूरा करने के लिए परमेश्वर एक बार फिर देह में वापस आया है, और देह की समस्त सामान्यता और व्यावहारिकता को जी रहा है, अर्थात् उस देह में परमेश्वर के वचन को प्रकट कर रहा है जो उतनी सामान्य और साधारण है जितना संभव है, इस प्रकार उस कार्य का समापन कर रहा है जिसे देह में पूरा होना बाकी है। दूसरी देहधारी देह का सार पहले वाली के ही समान है, लेकिन यह पहली से और भी अधिक व्यावहारिक है, और भी अधिक सामान्य है। परिणामस्वरूप, दूसरी देहधारी देह पहले देहधारण से भी अधिक पीड़ा सहती है, किन्तु यह पीड़ा देह में उसकी सेवकाई का परिणाम है, जो कि एक भ्रष्ट मानव की पीड़ा से भिन्न है। यह भी उसकी देह की सामान्यता और व्यावहारिकता से उत्पन्न होती है। क्योंकि वह अपनी सेवकाई का कार्य उस देह में करता है जो सर्वाधिक सामान्यता और व्यावहारिकता वाली है, इसलिए उसकी देह को अत्यधिक कष्ट सहना होगा। उसकी देह जितनी अधिक सामान्य और व्यावहारिक होगी, उतना ही अधिक वह अपनी सेवकाई में कष्ट उठाएगा। परमेश्वर का कार्य एक बहुत ही आम देह में अभिव्यक्त होता है, जो बिल्कुल अलौकिकता से रहित है। चूँकि उसकी देह सामान्य है और उसे मनुष्य को बचाने के कार्य का दायित्व भी लेना है, इसलिए वह अलौकिक देह की अपेक्षा और भी अधिक पीड़ा भुगतता है—और ये सारी पीड़ा उसकी देह की व्यावहारिकता और सामान्यता से उत्पन्न होती है। सेवकाई का कार्य करते समय जिस पीड़ा से दोनों देहधारी देह गुजरी हैं, उससे देहधारी देह के सार को देखा जा सकता है। देह जितनी अधिक सामान्य होगी, उसे कार्य करते समय उतना ही अधिक कष्ट सहना होगा; कार्य करने वाली देह जितनी अधिक व्यावहारिक होती है, लोगों की धारणाएँ उतनी ही अधिक मजबूत होती जाती हैं, और वह उतने ही जोखिम उठाता है। फिर भी, देह जितनी अधिक व्यावहारिक होती है, और उसमें सामान्य मानव की जितनी अधिक आवश्यकताएँ और पूर्ण विवेक होता है, वह उतना ही अधिक परमेश्वर के कार्य का देह में बीड़ा उठाने में सक्षम होती है। यीशु को देह के जरिए सलीब पर चढ़ाया गया था और वह देह के जरिए पापबलि बना, यानी उसने सामान्य मानवता वाली देह के जरिए ही शैतान को हराया और सलीब से मनुष्य को पूरी तरह से बचाया था। पूर्ण देह के जरिए ही दूसरा देहधारी परमेश्वर विजय का कार्य करता है और शैतान को हराता है। केवल ऐसी देह जो पूरी तरह से सामान्य और व्यावहारिक है, अपने पूर्ण अर्थ में विजय का कार्य कर सकती और एक सशक्त गवाही दे सकती है। अर्थात् देह में रह रहे परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता के माध्यम से मानव पर विजय पाने में सफलता मिलती है, न कि अलौकिक चमत्कारों और प्रकाशनों के माध्यम से। यह देहधारी परमेश्वर बोलकर सेवकाई करता है और बोलकर ही वह मनुष्य को जीतता और पूर्ण बनाता है; दूसरे शब्दों में, देह में साकार हुए आत्मा का कार्य बोलना है और देह का कार्य बोलना है, और इसके फलस्वरूप मनुष्य को पूरी तरह से जीतने, प्रकाशित करने, पूर्ण बनाने और निकाल देने का उद्देश्य पूरा करना है। इसलिए विजय के कार्य में देह में परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से सम्पन्न होगा। मनुष्य के पापों के लिए प्रायश्चित का कार्य जो पहली बार किया गया था, वह देहधारण के कार्य का आरंभ मात्र था; विजय का कार्य करने वाली देह ही देहधारण के समस्त कार्य को पूरा करती है। ... कार्य के इस चरण में, परमेश्वर चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता, ताकि कार्य वचनों के माध्यम से अपने परिणाम प्राप्त करे। इसके अलावा, क्योंकि देहधारी परमेश्वर का इस बार का कार्य बीमार को चंगा करना और राक्षसों को बाहर निकालना नहीं है, बल्कि बोलकर मनुष्य को जीतना है, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के इस देहधारण की स्वाभाविक क्षमताएँ वचन बोलना और मनुष्य को जीतना हैं, न कि बीमार को चंगा करना और राक्षसों को बाहर निकालना। सामान्य मानवता में उसका कार्य चिह्न दिखाना नहीं है, बीमार को चंगा करना और राक्षसों को बाहर निकालना नहीं है, बल्कि बोलना है, और इसलिए दूसरी देहधारी देह लोगों को पहले वाले की तुलना में अधिक सामान्य लगती है। लोग जैसे देखते हैं, परमेश्वर ने वास्तव में देह धारण किया है। हालाँकि, यह देहधारी परमेश्वर यीशु के देहधारण से भिन्न है, हालाँकि दोनों ही परमेश्वर के देहधारण हैं, फिर भी वे पूरी तरह से एक नहीं हैं। यीशु में सामान्य और साधारण मानवता थी, लेकिन उसमें अनेक चिह्न और चमत्कार दिखाने की शक्ति थी। जबकि इस देहधारी परमेश्वर में मानवीय आँखों को न तो कोई चिह्न दिखाई देगा, और न कोई चमत्कार, न तो बीमार चंगे होते हुए दिखाई देंगे, न ही दुष्टात्माएँ बाहर निकाली जाती हुई दिखाई देंगी, न तो समुद्र पर चलना दिखाई देगा, न ही चालीस दिन तक उपवास रखना दिखाई देगा...। वह उसी कार्य को नहीं करता जो यीशु ने किया, इसलिए नहीं कि उसकी देह सार रूप में यीशु से भिन्न है, बल्कि इसलिए कि बीमार को चंगा करना और राक्षसों को निकालना उसकी सेवकाई नहीं है। वह अपने ही कार्य को ध्वस्त नहीं करता, अपने ही कार्य में विघ्न नहीं डालता। चूँकि वह मनुष्य को अपने व्यावहारिक वचनों से जीतता है, इसलिए उसे चिह्नों से वश में करने की आवश्यकता नहीं है, और इसलिए यह चरण देहधारण के कार्य को पूरा करने के लिए है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार

मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि देहधारण का अर्थ यीशु के कार्य में पूर्ण नहीं हुआ था? क्योंकि वचन पूरी तरह से देह नहीं बना था। यीशु ने जो किया वह देह में परमेश्वर के कार्य का केवल एक अंश ही था; उसने केवल छुटकारे का कार्य किया और मनुष्य को पूरी तरह से प्राप्त करने का कार्य नहीं किया। इसी कारण से परमेश्वर एक बार पुनः अंत के दिनों में देह बना है। कार्य का यह चरण भी एक साधारण देह में किया जाता है; यह एक सर्वथा सामान्य मानव द्वारा किया जाता है, जिसकी मानवता अंश मात्र भी अलौकिक नहीं होती। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर पूरी तरह से इंसान बन गया है; और वह ऐसा व्यक्ति है जिसकी पहचान परमेश्वर की है, जो एक पूर्ण मानव है, जो एक पूर्ण देह है, जो कार्य को कर रहा है। मानवीय आँखों के लिए, वह केवल एक देह है जो बिल्कुल भी अति-असाधारण नहीं है, एक अति साधारण व्यक्ति जो स्वर्ग की भाषा बोल सकता है, जो कोई भी चिह्न और चमत्कार नहीं दिखाता है, वृहद सभाकक्षों में धर्म के पीछे की असली कहानी को उजागर करना तो दूर की बात है। लोगों को दूसरी देहधारी देह का कार्य पहले वाले से एकदम अलग प्रतीत होता है, और दोनों में कुछ भी समान नहीं दिखता—इस बार पहले वाले के कार्य का थोड़ा-भी अंश नहीं देखा जा सकता। यद्यपि दूसरे देहधारण की देह का कार्य पहले वाले से भिन्न है, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उनका स्रोत एक ही नहीं है। उनका स्रोत एक ही है या नहीं, यह दोनों देहों के द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति पर निर्भर करता है, न कि उनके बाहरी आवरण पर। अपने कार्य के तीन चरणों के दौरान, परमेश्वर ने दो बार देहधारण किया है, और दोनों बार देहधारी परमेश्वर के कार्य ने एक नए युग का शुभारंभ किया है, एक नए कार्य का सूत्रपात किया है; दोनों देहधारण एक-दूसरे के पूरक हैं। मानवीय आँखों के लिए यह बताना असंभव है कि दोनों देह वास्तव में एक ही स्रोत से आते हैं। बेशक यह मानवीय आँखों या मानवीय मन की क्षमता से बाहर है। किन्तु अपने सार में वे एक ही हैं, क्योंकि उनका कार्य एक ही आत्मा से उत्पन्न होता है। दोनों देहधारी देह एक ही स्रोत से उत्पन्न होते हैं या नहीं, इस बात को उस युग और उस स्थान से जिसमें वे पैदा हुए थे, या ऐसे ही अन्य कारकों से नहीं, बल्कि उनके द्वारा किए गए दिव्य कार्य से तय किया जा सकता है। दूसरी देहधारी देह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करती जिसे यीशु कर चुका है, क्योंकि परमेश्वर का कार्य किसी परंपरा का पालन नहीं करता, बल्कि हर बार वह एक नया मार्ग खोलता है। दूसरी देहधारी देह का लक्ष्य, लोगों के मन पर पहली देह के प्रभाव को गहरा या दृढ़ करना नहीं है, बल्कि इसे पूरक करना और उनके मन में पहली देह की छवि को सुधारना है, परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को गहरा करना है, उन सभी विनियमों को तोड़ना है जो लोगों के हृदय में विद्यमान हैं, और उनके हृदय से परमेश्वर की भ्रामक छवि को मिटाना है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के अपने कार्य का कोई भी अकेला चरण मनुष्य को उसके बारे में पूरा ज्ञान नहीं दे सकता; प्रत्येक चरण केवल एक भाग का ज्ञान देता है, न कि संपूर्ण का। यद्यपि परमेश्वर ने अपने स्वभाव को पूरी तरह से व्यक्त कर दिया है, किन्तु मनुष्य की सीमित बोध क्षमता की वजह से, परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान अभी भी अपूर्ण है। मानव भाषा का उपयोग करके, परमेश्वर के स्वभाव की समग्रता को पूरी तरह समझाना असंभव है। तो फिर परमेश्वर के कार्य के एक चरण का परमेश्वर को पूरी तरह से व्यक्त करना और भी कितना असंभव होगा? वह देह में अपनी सामान्य मानवता की आड़ में कार्य करता है, उसे केवल उसकी दिव्यता की अभिव्यक्तियों से ही जाना जा सकता है, न कि उसके दैहिक आवरण से। परमेश्वर मनुष्य को अपने विभिन्न कार्यों के माध्यम से स्वयं को जानने देने के लिए देह में आता है। उसके कार्य के कोई भी दो चरण एक जैसे नहीं होते। केवल इसी प्रकार से मनुष्य, देह में परमेश्वर के कार्य का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है और इसे एक निश्चित दायरे तक सीमित नहीं कर सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर द्वारा धारण किए गए देह का सार

कार्य का जो चरण यीशु ने संपन्न किया, उसने केवल “वचन परमेश्वर के साथ था” का सार ही पूरा किया : परमेश्वर का सत्य परमेश्वर के साथ था, और परमेश्वर का आत्मा देह के साथ था और उस देह से अभिन्न था। अर्थात, देहधारी परमेश्वर का देह परमेश्वर के आत्मा के साथ था, जो इस बात का अधिक बड़ा प्रमाण है कि देहधारी यीशु परमेश्वर का प्रथम देहधारण था। कार्य का यह चरण सटीक रूप से “वचन देहधारी हुआ है” के आंतरिक अर्थ को पूरा करता है, “वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था,” को और गहन अर्थ देता है और तुम्हें इन वचनों पर दृढ़ता से विश्वास कराता है कि “आरंभ में वचन था।” कहने का अर्थ है कि सृष्टि के निर्माण के समय परमेश्वर वचनों से संपन्न था, उसके वचन उसके साथ थे और उससे अभिन्न थे, और अंतिम युग में वह अपने वचनों का सामर्थ्य और अधिकार और भी अधिक प्रकट करता है, और मनुष्य को अपना सारा मार्ग देखने—अपने सभी वचन सुनने देता है। ऐसा है अंतिम युग का कार्य। तुम्हें इन चीजों को हर पहलू से जान लेना चाहिए। यह देह को जानने का प्रश्न नहीं है, बल्कि इस बात का है कि तुम देह और वचन को और देह और मार्ग को कैसे समझते हो। यही वह गवाही है, जो तुम्हें देनी चाहिए, जिसे हर किसी को जानना चाहिए। चूँकि यह दूसरे देहधारण का कार्य है—और यह आख़िरी बार है जब परमेश्वर देहधारी होता है; दूसरे शब्दों में, यह देहधारण के महत्व को पूरा कर देता है, देह में परमेश्वर के समस्त कार्य को पूरी तरह से कार्यान्वित और प्रकट करता है, और परमेश्वर के देह में होने के युग का अंत करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (4)

पिछला: 5. यह क्यों कहा जाता है कि भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की सबसे अधिक आवश्यकता है?

अगला: 7. यह कैसे समझें कि मसीह सत्य, मार्ग और जीवन है?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न: प्रभु यीशु कहते हैं: "मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं" (यूहन्ना 10:27)। तब समझ आया कि प्रभु अपनी भेड़ों को बुलाने के लिए वचन बोलने को लौटते हैं। प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात है, प्रभु की वाणी सुनने की कोशिश करना। लेकिन अब, सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि हमें नहीं पता कि प्रभु की वाणी कैसे सुनें। हम परमेश्वर की वाणी और मनुष्य की आवाज़ के बीच भी अंतर नहीं कर पाते हैं। कृपया हमें बताइये कि हम प्रभु की वाणी की पक्की पहचान कैसे करें।

उत्तर: हम परमेश्वर की वाणी कैसे सुनते हैं? हममें कितने भी गुण हों, हमें कितना भी अनुभव हो, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। प्रभु यीशु में विश्वास...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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