5. अंत के दिनों में केवल परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना ही मानवजाति को बचाने वाला उसका महत्वपूर्ण, निर्णायक कार्य है
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“उसने बड़े शब्द से कहा, ‘परमेश्वर से डरो, और उसकी महिमा करो, क्योंकि उसके न्याय करने का समय आ पहुँचा है’” (प्रकाशितवाक्य 14:7)।
“क्योंकि वह समय आ चुका है कि परमेश्वर के घर से न्याय शुरू किया जाए” (1 पतरस 4:17)।
“वह जाति जाति का न्याय करेगा, और देश देश के लोगों के झगड़ों को मिटाएगा” (यशायाह 2:4)।
“यदि कोई मनुष्य मेरे वचन सुनता है लेकिन इनका पालन नहीं करता है तो मैं उसका न्याय नहीं करता हूँ : क्योंकि मैं संसार का न्याय करने नहीं, बल्कि संसार को बचाने आया हूँ। वो जो मुझे नकार देता है, और मेरे वचन नहीं स्वीकारता, उसका भी न्याय करने वाला कोई है : मैंने जो मार्ग बताया है वही अंत के दिन उसका न्याय करेगा” (यूहन्ना 12:47-48)।
“मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
जब यीशु मनुष्य के संसार में आया तो उसने अनुग्रह का युग शुरू किया और व्यवस्था का युग समाप्त किया। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर एक बार फिर देहधारी हुआ और इस देहधारण के साथ उसने अनुग्रह का युग समाप्त किया और राज्य का युग शुरू किया। वे सब जो परमेश्वर के दूसरे देहधारण को स्वीकार करने में सक्षम हैं, राज्य के युग में ले जाए जाएँगे और इसके अलावा वे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर का मार्गदर्शन स्वीकार करने में सक्षम होंगे। यूँ तो यीशु मनुष्यों के बीच आया और उसने बहुत-सा कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया और मनुष्य की पाप-बलि के रूप में काम किया; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त नहीं किया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह बचाने के लिए केवल यीशु का पाप-बलि बनना और मनुष्य के पापों को वहन करना ही आवश्यक नहीं था, बल्कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए उसके स्वभावों से पूरी तरह छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करना आवश्यक था। और इसलिए मनुष्य के पापों के क्षमा किए जाने के बाद परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए देह में लौट आया और उसने ताड़ना तथा न्याय का कार्य आरंभ किया। यह कार्य मानवजाति को एक उच्चतर क्षेत्र में ले आया है। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में प्रकाश में जिएँगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना
एक समय मैं यहोवा के नाम से पुकारा जाता था, एक समय मुझे लोग मसीहा के रूप में भी जानते थे और एक समय लोग मुझे प्यार और सम्मान से उद्धारकर्ता यीशु भी कहते थे। आज मैं वह यहोवा या यीशु नहीं हूँ, जिसे लोग अतीत में जानते थे। बल्कि मैं वह परमेश्वर हूँ जो अंत के दिनों में वापस आया है, वह परमेश्वर जो युग का समापन करेगा; मैं स्वयं परमेश्वर हूँ, जो अपने संपूर्ण स्वभाव से भरा है और अधिकार, आदर और महिमा से भरा, पृथ्वी के छोर से उदित होता है। लोग कभी मेरे संपर्क में नहीं रहे हैं, उन्होंने मुझे कभी जाना नहीं है और वे मेरे स्वभाव से हमेशा अनभिज्ञ रहे हैं। संसार की रचना के समय से लेकर आज तक एक भी मनुष्य ने मुझे नहीं देखा है। यह वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान लोगों पर प्रकट होता है, किंतु उनके बीच छिपा हुआ है। वह सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से लबालब भरा हुआ, दहकते हुए सूर्य और धधकती हुई आग के समान, सच्चे और वास्तविक रूप में, लोगों के बीच निवास करता है। ऐसा एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जिसका मेरे वचनों द्वारा न्याय नहीं किया जाएगा, और ऐसा एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जिसे जलती आग के माध्यम से शुद्ध नहीं किया जाएगा। अंततः मेरे वचनों के कारण तमाम देश धन्य हो जाएँगे और मेरे वचनों के कारण टुकड़े-टुकड़े भी कर दिए जाएँगे। इस तरह अंत के दिनों में सभी लोग देखेंगे कि मैं ही वह उद्धारकर्ता हूँ जो वापस लौट आया है, और मैं ही वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ जो समस्त मानवजाति को जीतता है। और सभी देखेंगे कि मैं एक बार मनुष्य के लिए पाप-बलि था, किंतु अंत के दिनों में मैं धधकते सूर्य की ज्वाला बन गया हूँ जो सभी चीजों को जला देती है, और साथ ही मैं धार्मिकता का सूर्य बन गया हूँ जो सभी चीजों को प्रकट कर देता है। यह मेरा अंत के दिनों का कार्य है। मैं इस नाम को अपनाता हूँ और यह स्वभाव धारण करता हूँ ताकि सभी लोग देख सकें कि मैं धार्मिक परमेश्वर हूँ, दहकता हुआ सूर्य हूँ और धधकती हुई ज्वाला हूँ, और ताकि सभी मेरी, एक सच्चे परमेश्वर की आराधना कर सकें, और ताकि वे मेरे असली चेहरे को देख सकें : मैं केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं हूँ, और मैं केवल छुटकारा दिलाने वाला नहीं हूँ; बल्कि मैं समस्त आकाश, पृथ्वी और महासागरों के सारे प्राणियों का परमेश्वर हूँ।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, उद्धारकर्ता पहले ही एक “सफेद बादल” पर सवार होकर वापस आ चुका है
अंत के दिनों का कार्य वचन बोलना है। वचनों के माध्यम से मनुष्य में बड़े परिवर्तन किए जा सकते हैं। इन वचनों को स्वीकार करने से इन लोगों में अब जो परिवर्तन हुए हैं, वे उन परिवर्तनों से बहुत अधिक बड़े हैं, जो संकेत और चमत्कार स्वीकार करने से अनुग्रह के युग में लोगों में हुए थे। क्योंकि अनुग्रह के युग में हाथ रखकर और प्रार्थना करके दुष्टात्माओं को मनुष्य से निकाला जाता था, परंतु मनुष्य के भीतर भ्रष्ट स्वभाव तब भी बने रहते थे। मनुष्य को उसकी बीमारी से चंगा कर दिया जाता था और उसके पाप क्षमा कर दिए जाते थे, किंतु जहाँ तक यह प्रश्न है कि मनुष्य अपने भीतर के शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को कैसे छोड़ सकता है, तो उस पर अभी यह कार्य किया जाना बाकी था। मनुष्य को सिर्फ उसकी आस्था के कारण छुटकारा दिया गया था और उसके पाप क्षमा किए गए थे, किंतु मनुष्य की पापी प्रकृति नहीं मिटाई गई थी और वह अब भी उसके भीतर बनी हुई थी। मनुष्य के पाप परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से क्षमा कर दिए गए थे, परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य के भीतर अब पाप नहीं रहा था। मनुष्य के पाप पाप-बलि के माध्यम से क्षमा किए जा सकते थे, लेकिन जहाँ तक यह बात है कि मनुष्य को अब पाप न करने वाला कैसे बनाया जा सकता है, उसके भ्रष्ट स्वभावों और पापी प्रकृति को पूरी तरह से कैसे त्यागा जा सकता है और उसके जीवन स्वभाव को कुछ हद तक कैसे बदला जा सकता है, उसके पास इस समस्या को हल करने का कोई तरीका नहीं है। मनुष्य के पाप क्षमा कर दिए गए हैं और यह परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य के कारण है, लेकिन मनुष्य अभी भी अपने पुराने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों में ही जी रहा है। ऐसे में मनुष्य को उसके शैतानी भ्रष्ट स्वभावों से पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए, उसकी पापी प्रकृति पूरी तरह से त्याग दी जानी चाहिए, ताकि वह फिर कभी विकसित न हो, और उसके स्वभाव में रूपांतरण होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य जीवन में संवृद्धि के मार्ग को समझे, जीवन का मार्ग समझे और अपने स्वभाव को बदलने का तरीका समझे। साथ ही, इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुसार अभ्यास करने की आवश्यकता है, ताकि धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदल सके और वह रोशनी की चमक में जी सके, ताकि वह जो कुछ भी करे वह परमेश्वर के इरादों के अनुसार हो, ताकि वह अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ सके और शैतान के अंधकार के प्रभाव से आजाद हो सके और परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह उबर सके। केवल तभी मनुष्य ने पूर्ण उद्धारकारी अनुग्रह प्राप्त किया होगा। जिस समय यीशु अपना कार्य कर रहा था, तब भी उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान कल्पित और अस्पष्ट था। मनुष्य ने हमेशा उसे दाऊद का वंशज माना और कहा कि वह एक महान नबी है, उदार प्रभु है जिसने मनुष्य को उसके पापों से छुटकारा दिलाया। कुछ लोग अपनी आस्था के बल पर उसके वस्त्र के किनारे को छूकर ही चंगे हो गए; अंधे देख सके, यहाँ तक कि मृतक जीवित किए जा सके। किंतु मनुष्य अपने भीतर गहराई से जड़ जमाए हुए शैतानी भ्रष्ट स्वभावों का पता लगाने में असमर्थ रहा, न ही वह यह जानता था कि उन्हें कैसे त्यागा जाए। मनुष्य ने बहुत अनुग्रह प्राप्त किया, जैसे देह की शांति और खुशी, एक व्यक्ति की आस्था से पूरे परिवार को आशीष मिलना, बीमारी से चंगाई, इत्यादि। शेष मनुष्य के अच्छे कर्म और उसका धर्मात्मा जैसा रूप था; यदि कोई इनके आधार पर जी सकता था तो उसे एक मानक स्तर का विश्वासी माना जाता था। केवल इसी तरह के विश्वासी मृत्यु के बाद स्वर्ग में प्रवेश कर सकते थे, जिसका अर्थ था कि उन्हें छुटकारा दिला दिया गया था। परंतु अपने जीवन-काल में इन लोगों ने जीवन के मार्ग को बिल्कुल नहीं समझा था। उन्होंने सिर्फ इतना किया कि अपना स्वभाव बदलने के किसी मार्ग को अपनाए बिना बस एक निरंतर चक्र में पाप किए और उन्हें स्वीकार कर लिया : अनुग्रह के युग में मनुष्य की स्थिति ऐसी थी। क्या मनुष्य ने पूर्ण उद्धार पा लिया है? नहीं! इसलिए, उस चरण का कार्य पूरा हो जाने के बाद भी न्याय और ताड़ना का कार्य बाकी रह गया था। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध करने और इस प्रकार उसे अनुसरण हेतु एक मार्ग प्रदान करने के लिए है। यह चरण फलदायक या अर्थपूर्ण न होता, यदि यह दुष्टात्माओं को निकालने के साथ जारी रहता, क्योंकि यह मनुष्य की पापी प्रकृति को उतार फेंकने में असफल रहता और मनुष्य अपने पापों की क्षमा पर ही रुक जाता। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए गए हैं, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले ही समाप्त हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। किंतु मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर रहते हैं, मनुष्य अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है और परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर वचन का उपयोग करके मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करता है और उसे उचित मार्ग के अनुसार अभ्यास करने के लिए प्रेरित करता है। इस चरण का कार्य पिछले चरण से अधिक अर्थपूर्ण और साथ ही अधिक फलदायक भी है, क्योंकि अब वचन ही है जो सीधे तौर पर मनुष्य के जीवन का पोषण करता है और मनुष्य के स्वभाव को पूरी तरह से नया होने में सक्षम बनाता है; कार्य का यह चरण कहीं अधिक संपूर्ण है। इसलिए, अंत के दिनों में देहधारण ने परमेश्वर के देहधारण के महत्व को पूर्ण किया है और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना का पूर्णतः समापन किया है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)
मनुष्य को छुटकारा दिलाए जाने से पहले उसके अंदर शैतान के बहुत-से जहर पहले ही डाल दिए गए थे और हजारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद उसके भीतर एक ऐसी प्रकृति है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। इसलिए जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया तो यह छुटकारे के मामले से बढ़कर कुछ नहीं था। यानी मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर वापस खरीदा गया, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति नहीं हटाई गई। मनुष्य, जो इतना गंदा है, को परमेश्वर की सेवा करने योग्य होने से पहले परिवर्तन से होकर गुजरना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह जान जाएगा और वह पूरी तरह बदल पाएगा और शुद्ध हो पाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने योग्य हो सकता है। सारा वर्तमान कार्य इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य को शुद्ध किया और बदला जा सके; ऐसा इसलिए है ताकि वचन के न्याय और ताड़ना के माध्यम से और शोधन के जरिये मनुष्य अपनी भ्रष्टता छोड़ सके और शुद्ध किया जा सके। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है। वास्तव में यह चरण विजय के कार्य का चरण भी है और साथ ही उद्धार-कार्य का दूसरा चरण भी है। वचन द्वारा न्याय और ताड़ना के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाता है, और वचन द्वारा शोधन, न्याय और उजागर किए जाने से ही मनुष्य के हृदय के भीतर की सभी अशुद्धताएँ, धारणाएँ, मंशाएँ और व्यक्तिगत आशाएँ पूरी तरह से प्रकट होती हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)
वर्तमान देहधारण में परमेश्वर का कार्य मुख्य रूप से ताड़ना और न्याय के द्वारा अपने स्वभाव को व्यक्त करना है, और इसी आधार पर मनुष्य तक अधिक सत्य पहुँचाना और उसे अभ्यास करने के और अधिक तरीके बताना है और ऐसा करके मनुष्य को जीतने और उसे उसके भ्रष्ट स्वभावों से बचाने का अपना उद्देश्य हासिल करना है। यही वह चीज है जो राज्य के युग में परमेश्वर के कार्य के पीछे निहित है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना
अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों का गहन-विश्लेषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर के प्रति समर्पण किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता जीनी चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभावों पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य परमेश्वर को कैसे अस्वीकार करता है, और भी अधिक इस तथ्य को उजागर करने पर केंद्रित हैं कि मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध एक विरोधी शक्ति है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर कुछ वचनों में मनुष्य की प्रकृति को पूरी तरह नहीं समझाता है; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर और काट-छाँट करने की इन विभिन्न विधियों को साधारण वचनों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; बल्कि उजागर और काट-छाँट करने के इस कार्य को करने में उस सत्य का उपयोग किया जाता है जो मनुष्य के पास बिल्कुल भी नहीं होता है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वश में किया जा सकता है और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य की समझ पैदा करने का काम करता है। न्याय के कार्य ने मनुष्य को परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों के बारे में काफी समझ प्राप्त करने में सक्षम बनाया है जो उसकी समझ से परे होते हैं। इसने मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार और अपनी भ्रष्टता की जड़ को समझने और जानने, साथ ही अपने कुरूप चेहरे का पता लगाने में सक्षम बनाया है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन को उन सभी के लिए उद्घाटित करने का कार्य है जो उसमें आस्था रखते हैं। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है
राज्य के युग में परमेश्वर नए युग की शुरुआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने और उस संपूर्ण युग का काम करने के लिए वचनों का उपयोग करता है। यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर वचन के युग में कार्य करता है। वह देहधारी हुआ है और विभिन्न दृष्टिकोणों से बोलता है, जिससे मनुष्य सचमुच परमेश्वर को देखे, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, और उसकी बुद्धि और चमत्कार को देखे। परमेश्वर इस तरह कार्य करता है ताकि लोगों को जीतने, लोगों को पूर्ण बनाने और लोगों को निकाल देने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल करे। वचन के युग में कार्य करने के लिए वचनों के उपयोग का यही वास्तविक अर्थ है। वचनों के द्वारा लोग परमेश्वर के कार्यों को, परमेश्वर के स्वभाव को, मनुष्य के सार के साथ ही यह जान पाते हैं कि मनुष्य को किसमें प्रवेश करना चाहिए। वचन के युग में परमेश्वर जो भी कार्य करना चाहता है, वह सारा वचनों के जरिए पूरा होता है। वचनों के माध्यम से लोगों को प्रकट किया और निकाला जाता है और उनका परीक्षण किया जाता है। लोगों ने इन वचनों को देखा है, इन वचनों को सुना है और इन वचनों के अस्तित्व को पहचाना है। इसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करने लगे हैं, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि के साथ ही साथ मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेममय और बचाने वाले हृदय पर विश्वास करने लगे हैं। यद्यपि “वचन” शब्द साधारण और सरल है, पर देहधारी परमेश्वर के मुख से निकले वचन ब्रह्माण्ड को झकझोरते हैं; लोगों के हृदय को रूपांतरित करते हैं, उनकी धारणाओं और पुराने स्वभावों को रूपांतरित करते हैं और समस्त संसार के पुराने स्वरूप में परिवर्तन लाते हैं। युगों-युगों में केवल आज का परमेश्वर इस प्रकार से कार्य करता है और केवल वही इस प्रकार से बोलता है और इस प्रकार मनुष्य को बचाता है। इसके बाद से मनुष्य परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में, उसके वचनों की चरवाही और आपूर्ति में जीवन जीता है; सभी लोग वचनों के संसार में जीते हैं, परमेश्वर के वचनों के अभिशापों और आशीषों के बीच जीते हैं और अधिकतर लोग परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना के अधीन जीते हैं। ये वचन और यह कार्य सब कुछ मनुष्य के उद्धार, परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने और पुरानी सृष्टि के संसार के मूल स्वरूप को बदलने के लिए हैं। परमेश्वर ने संसार की सृष्टि वचनों के उपयोग से की, वह समस्त ब्रह्माण्ड में मनुष्य की अगुवाई वचनों के द्वारा करता है, वह वचनों के द्वारा उन्हें जीतता और उनका उद्धार करता है और अंत में वह वचनों के उपयोग से समस्त पुरानी दुनिया का अंत कर देगा और इस प्रकार अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना पूरी करेगा। राज्य के युग के शुरू से अंत तक, परमेश्वर अपना कार्य करने और अपने कार्यों का परिणाम प्राप्त करने के लिए वचन का उपयोग करता है। वह कौतुक या चमत्कार नहीं करता, बल्कि अपना कार्य केवल वचनों के जरिए करता है। इन वचनों के कारण सभी लोग संपोषण और आपूर्ति पाते हैं और ज्ञान और वास्तविक अनुभव प्राप्त करते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है
सच में, जो कार्य अब किया जा रहा है, वह लोगों से शैतान और अपने पूर्वज के खिलाफ विद्रोह करने के लिए किया जा रहा है। वचन के द्वारा सभी न्यायों का उद्देश्य लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करना और उन्हें जीवन का सार समझने में सक्षम बनाना है। ये बार-बार के न्याय लोगों के हृदयों को बेध देते हैं। प्रत्येक न्याय सीधे उनके भाग्यों से संबंधित होता है और उनके हृदयों को घायल करने के लिए होता है, ताकि वे उन सभी बातों को जाने दें और फलस्वरूप जीवन के बारे में जान जाएँ, इस गंदी दुनिया को जान जाएँ, परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को जान जाएँ, और मानवजाति को भी जान जाएँ, जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है। जितना अधिक इस प्रकार की ताड़ना और न्याय होता है, उतना ही अधिक मनुष्य का हृदय घायल किया जा सकता है और उतना ही अधिक उसकी आत्मा को जगाया जा सकता है। इस प्रकार के न्याय का लक्ष्य इन अत्यधिक भ्रष्ट और सबसे अधिक गहराई से भ्रमित लोगों की आत्माओं को जगाना है। मनुष्य के पास कोई आत्मा नहीं है, अर्थात् उसकी आत्मा बहुत पहले ही मर गई और वह नहीं जानता है कि स्वर्ग है, नहीं जानता कि परमेश्वर है, और निश्चित रूप से नहीं जानता कि वह मौत की अतल खाई में संघर्ष कर रहा है; वह संभवतः कैसे जान सकता है कि वह इस बुरे मानवीय नरक में जी रहा है? वह संभवतः कैसे जान सकता है कि उसका यह सड़ा हुआ शव शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मृत्यु के रसातल में गिर गया है? वह संभवतः कैसे जान सकता है कि पृथ्वी पर सभी चीजें मानवजाति द्वारा बहुत पहले ही इतनी बरबाद कर दी गई हैं कि अब सुधारी नहीं जा सकतीं? और वह संभवतः कैसे जान सकता है कि आज सृष्टिकर्ता पृथ्वी पर आया है और भ्रष्ट किए गए लोगों के एक समूह की तलाश कर रहा है, जिसे वह बचा सके? भले ही मनुष्य ने हर संभव शोधन और न्याय का अनुभव किया है, उसकी संवेदनहीन चेतना पूरी तरह से अचल रही है और लगभग प्रतिक्रियाहीन है। मनुष्य कितना पतित है! और यद्यपि इस प्रकार का न्याय आसमान से गिरने वाले क्रूर ओलों के समान है, फिर भी वह मनुष्य के लिए सर्वाधिक लाभप्रद है। इस तरह से लोगों का न्याय किए बिना नतीजा हासिल नहीं किया जा सकता और लोगों को दुःख की अतल खाई से बचाना नितांत असंभव होगा। इस तरह कार्य किए बिना तो लोगों का रसातल से बाहर निकलना बहुत कठिन होगा, क्योंकि उनके हृदय बहुत पहले ही मर चुके हैं और उनकी आत्माओं को शैतान द्वारा बहुत पहले ही कुचल दिया गया है। पतन की गहराइयों में डूब चुके तुम लोगों को बचाने के लिए तुम्हें हर प्रयास कर पुकारने और तुम्हारा न्याय करने की आवश्यकता है; केवल तभी तुम लोगों के जमे हुए हृदयों को जगाया जा सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है
युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें वह वो सब प्रकट करता है जो अधार्मिक है, वह अनगिनत लोगों का सरेआम न्याय करता है और उन लोगों को पूर्ण बनाता है जो सच्चे दिल से उससे प्रेम करते हैं। केवल इस तरह का स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सभी चीजें अपनी किस्म के अनुसार छाँटी जाती हैं और अपनी विभिन्न खूबियों के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित की जाती हैं। ठीक यही वह समय है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और गंतव्य प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय का अनुभव न करें तो उनके विद्रोहीपन और अधार्मिकता को उजागर नहीं किया जा सकता है। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी चीजों का परिणाम प्रकट किया जा सकता है। लोग जो सच में हैं वह केवल तब दिखाते हैं जब उन्हें ताड़ना दी जाती है और उनका न्याय किया जाता है। बुरे को बुरे के साथ रखा जाएगा, भले को भले के साथ, और सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से सभी चीजों के परिणाम प्रकट किए जाएँगे ताकि बुरे को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और अनगिनत लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के सामने आत्मसमर्पण कर लें। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से पूरा करना होगा। चूँकि लोगों की भ्रष्टता अपने शिखर पर पहुँच गई है और उनका विद्रोहीपन अत्यंत गंभीर है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यतः ताड़ना और न्याय से युक्त है और अंत के दिनों में प्रकट होता है, लोगों को पूरी तरह से परिवर्तित कर सकता है और उन्हें पूर्ण कर सकता है, बुराई को उजागर कर सकता है, और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दंडित किया जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)
परमेश्वर न्याय और ताड़ना का कार्य इसलिए करता है ताकि मनुष्य परमेश्वर के बारे में ज्ञान प्राप्त कर सके; साथ ही, वह अपनी गवाही की खातिर ऐसा करता है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रति परमेश्वर के न्याय के बिना मनुष्य उसके धार्मिक स्वभाव को बिल्कुल नहीं जान सकता था, जो किसी अपमान को सहन नहीं करता, न ही मनुष्य परमेश्वर के बारे में अपने पुराने ज्ञान को एक नए ज्ञान में बदल पाता। अपनी गवाही और अपने प्रबंधन के वास्ते, परमेश्वर अपनी संपूर्णता को सार्वजनिक करता है; इस प्रकार, अपने सार्वजनिक प्रकटन के जरिए, वह मनुष्य को परमेश्वर से जुड़े ज्ञान तक पहुँचने, अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने और परमेश्वर के लिए जबरदस्त गवाही देने लायक बनाता है। मनुष्य के स्वभाव का परिवर्तन परमेश्वर के कई विभिन्न प्रकार के कार्यों के ज़रिए प्राप्त किया जाता है; अपने स्वभाव में ऐसे बदलावों के बिना, मनुष्य परमेश्वर की गवाही देने और उसके इरादों के अनुरूप बनने लायक नहीं हो पाएगा। मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन दर्शाता है कि मनुष्य को शैतान के बंधन और अंधकार के प्रभाव से मुक्त करा दिया गया है और वह वास्तव में परमेश्वर के कार्य का एक आदर्श, एक नमूना, परमेश्वर का गवाह और ऐसा व्यक्ति बन गया है, जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। आज देहधारी परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आया है और वह अपेक्षा रखता है कि मनुष्य उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करे, उसके प्रति समर्पित हो, और उसकी गवाही दे—मनुष्य को परमेश्वर के व्यावहारिक और सामान्य कार्य को जानना है, उसे उसके उन सभी वचनों और कार्य के प्रति समर्पण करना है, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं हैं और उसे उस समस्त कार्य की गवाही देनी है, जो वह मनुष्य को बचाने के लिए करता है और मनुष्य को जीतने के उसके सभी कर्मों की भी गवाही देनी है। जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज्ञान अवश्य होना चाहिए; केवल इस तरह की गवाही ही सटीक और व्यावहारिक होती है और केवल इस तरह की गवाही ही शैतान को शर्मिंदा कर सकती है। परमेश्वर अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्होंने उसके न्याय, उसकी ताड़ना, और काट-छाँट से गुज़रकर उसे जान लिया है। वह अपनी गवाही के लिए उन लोगों का उपयोग करता है, जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है। वह अपनी गवाही देने के लिए उनका उपयोग करता है जिनका स्वभाव बदल गया है और जिन्होंने इस प्रकार उसके आशीर्वाद प्राप्त कर लिए हैं। उसे मनुष्य के मुँह से की जाने वाली स्तुति की आवश्यकता नहीं है, न ही उसे शैतान की किस्म के उन लोगों की स्तुति और गवाही की आवश्यकता है, जिन्हें उसने नहीं बचाया है। केवल वो जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही देने योग्य हैं और केवल वो जिनके स्वभाव को रूपांतरित कर दिया गया है, उसकी गवाही देने योग्य हैं। परमेश्वर मनुष्य को जानबूझकर अपने नाम को शर्मिंदा नहीं करने देगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हैं
क्या अब तुम समझ गए हो कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? अगर तुम समझ गए हो, तो मैं तुम्हें न्याय किए जाने के लिए आज्ञाकारी ढंग से समर्पित होने की सलाह देता हूँ, वरना तुम्हें कभी भी परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किए जाने या उसके द्वारा अपने राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को स्वीकार करते हैं लेकिन कभी शुद्ध नहीं किए जा सकते, अर्थात् जो न्याय के कार्य के बीच से ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए जाएँगे। फरीसियों के पापों की तुलना में उनके पाप अधिक गंभीर हैं और अधिक संख्या में हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। जो लोग मजदूरी के भी योग्य नहीं हैं, वे और कठोर दंड प्राप्त करेंगे, ऐसा दंड जो चिरस्थायी भी होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा, जिसने एक बार तो वचनों से वफादारी दिखाई, मगर फिर परमेश्वर को धोखा दे दिया। ऐसे लोग आत्मा, प्राण और शरीर के दंड के माध्यम से प्रतिदंड भुगतेंगे। क्या यह हूबहू परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का प्रकटन नहीं है? क्या मनुष्य का न्याय करने और उसे उजागर करने में परमेश्वर का बिल्कुल यही उद्देश्य नहीं है? परमेश्वर उन लोगों को, जो न्याय के समय के दौरान सभी प्रकार के कुकर्म करते हैं, दुष्टात्माओं से आक्रांत स्थान पर भेजता है, और उन दुष्टात्माओं को इच्छानुसार उनके दैहिक शरीर नष्ट करने देता है, और उन लोगों के शरीरों से लाश की दुर्गंध निकलती है। यही उनका उचित प्रतिदंड है। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों और झूठे कार्यकर्ताओं का हर पाप उनकी रिकॉर्ड पुस्तिकाओं में लिखता है; और जब सही समय आता है, वह उन्हें अशुद्ध आत्माओं के बीच में फेंक देता है, उन अशुद्ध आत्माओं को अपनी इच्छानुसार उनके पूरे शरीर को अपवित्र करने देता है, और ऐसी व्यवस्था करता है कि वे कभी पुनर्जन्म नहीं ले पाते हैं और फिर कभी प्रकाश नहीं देख पाते हैं। परमेश्वर बुरे लोगों की सूची में उन पाखंडियों को जोड़ता है जो कुछ समय के लिए तो सेवा करते हैं, लेकिन अंत तक वफ़ादार नहीं रहते हैं और वह उन्हें बुरे लोगों के साथ कीचड़ में लोटने और उनके साथ मिलकर विविध प्रकार के बदमाशों का गिरोह बनाने देता है और अंत में, परमेश्वर उन्हें जड़ से मिटा देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देता है और उन पर कोई ध्यान नहीं देता, जो कभी भी मसीह के प्रति वफादार नहीं रहे या जिन्होंने अपनी ताकत का बिल्कुल भी योगदान नहीं किया, और युग बदलने पर वह उन सभी को जड़ से मिटा देगा। वे अब और पृथ्वी पर मौजूद नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य का मार्ग तो बिल्कुल भी प्राप्त नहीं करेंगे। परमेश्वर अपने लोगों की सेवा करने वालों की सूची में ऐसे हर व्यक्ति को जोड़ता है, जो कभी भी परमेश्वर के प्रति ईमानदार नहीं रहा है, बल्कि उसके पास परमेश्वर के साथ अनमने ढंग से व्यवहार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ऐसे गिने-चुने लोग ही जीवित बचेंगे, जबकि बहुसंख्यक लोग उन लोगों के साथ नष्ट कर दिए जाएँगे जिनका श्रम मानक-स्तर का भी नहीं है। अंत में, परमेश्वर उन सभी को, जो परमेश्वर के साथ एकदिल और एकमन हैं, अपने लोगों और पुत्रों को, और परमेश्वर द्वारा याजक बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को अपने राज्य में ले आएगा। ये परमेश्वर के कार्य का सार हैं। जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है, जिन्हें परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है, उन्हें अविश्वासियों की श्रेणियों में सूचीबद्ध किया जाएगा और तुम लोग निश्चित रूप से कल्पना कर सकते हो कि उनका क्या परिणाम होगा। मैं तुम सभी लोगों से पहले ही वह कह चुका हूँ, जो मुझे कहना चाहिए; तुम लोग जो मार्ग चुनते हो, वह केवल तुम्हारी पसंद है। तुम लोगों को जो समझना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी व्यक्ति की प्रतीक्षा कभी नहीं करता जो उसके साथ कदमताल नहीं कर सकता और परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मनुष्य के प्रति कोई दया नहीं दिखाता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह सत्य के द्वारा न्याय का कार्य करता है
जब हर देश और मेरे चुने लोगों में से हरेक मेरे सिंहासन के सामने लौटेगा, तब मैं इसके साथ स्वर्ग की सारी प्रचुरता मानव संसार को प्रदान करूँगा, जिससे, मेरी बदौलत, वह संसार बेजोड़ प्रचुरता से लबालब भर जाएगा। पुराने संसार के अस्तित्वमान रहते हुए, मैं अपना क्रोध हर देश के ऊपर पूरी जोर से बरसाऊंगा और प्रशासनिक आदेश लागू करूँगा जो समूचे ब्रह्मांड में सार्वजनिक किए जाते हैं और जो कोई भी उनका उल्लंघन करेगा उन्हें ताड़ना दी जाएगी :
जब मैं पूरे ब्रह्मांड से बोलता हूँ, सब लोग मेरी आवाज सुनते हैं, यानी सभी लोग उन सभी कर्मों को देखते हैं जिन्हें मैंने समूचे ब्रह्मांड में अंजाम दिया है। जो मेरे इरादों के विरुद्ध जाते हैं, अर्थात जो मनुष्य के कर्मों से मेरा विरोध करते हैं, वे मेरी ताड़ना के बीच गिरेंगे। मैं स्वर्ग के असंख्य तारों को नया बनाऊँगा; मेरी बदौलत, सूर्य और चंद्रमा नए हो जाएँगे, आकाश अब वैसा नहीं रहेगा जैसा वह था; और पृथ्वी पर सभी चीजें फिर से नई बना दी जाएँगी—यह सब मेरे वचनों के कारण संपन्न किया जाएगा। ब्रह्मांड के भीतर सारे देशों को नए सिरे से बाँटा जाएगा और मेरे राज्य द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा, जिससे पृथ्वी पर विद्यमान देश हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएँगे, और केवल वह राज्य होगा जो मेरी आराधना करता है; पृथ्वी के सभी देशों को नष्ट कर दिया जाएगा और उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। ब्रह्मांड के भीतर मनुष्यों में से वे सभी जो दानवों के हैं पूर्णतया नष्ट कर दिए जाएँगे। वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं वे मेरी जलती हुई आग के बीच गिर पड़ेंगे—अर्थात् उनको छोड़कर जो अभी धारा के अन्तर्गत हैं, शेष सभी को राख में बदल दिया जाएगा। जब मैं प्रत्येक जनसमूह को ताड़ना दूँगा तो धार्मिक समुदाय मेरे राज्य में अलग-अलग पैमाने पर लौट आएँगे और मेरे कर्मों के माध्यम से जीत लिए जाएँगे, क्योंकि वे यह देख चुके होंगे कि “सफेद बादल पर सवार पवित्र दिव्य जन” पहले ही आ चुका है। सब लोग अपनी किस्म के अनुसार छाँटे जाएँगे और वे अपने क्रियाकलापों के अनुरूप विविध प्रकार की ताड़नाएँ प्राप्त करेंगे; वे सब जिन्होंने मेरा प्रतिरोध किया है नष्ट हो जाएँगे और जहाँ तक उनकी बात है जिनके पृथ्वी पर कर्मों ने मुझे शामिल नहीं किया है, उन्होंने जिस तरह का व्यवहार किया है उस कारण वे पृथ्वी पर मेरी संतान और मेरे लोगों के शासन के अधीन अस्तित्व में बने रहेंगे। मैं असंख्य देशों और असंख्य लोगों के सामने प्रकट होऊँगा और अपनी वाणी को पृथ्वी पर व्यक्त करूँगा, अपने महान कार्य के पूरे होने की उद्घोषणा करूँगा और सब लोगों को अपनी-अपनी आँखों से यह देखने दूँगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 26
जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान अडिग रहने में समर्थ हैं—यानी, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—वे लोग होंगे, जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; तो वे सभी जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुजरने के बाद ही उसके द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग, जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे, अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर ताड़ना और न्याय का कार्य मूलतः मानवता को शुद्ध करने और विश्राम के अंतिम दिन की खातिर करता है; अन्यथा मानवता का कोई भी सदस्य अपनी किस्म के अनुसार छांटा नहीं जा सकेगा या विश्राम में प्रवेश नहीं कर सकेगा। यह कार्य ही मानवता के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे