1. बाइबल में, पौलुस ने कहा था, “हर एक व्यक्ति शासकीय अधिकारियों के अधीन रहे, क्योंकि कोई अधिकार ऐसा नहीं जो परमेश्वर की ओर से न हो” (रोमियों 13:1)। “इसलिये अपनी और पूरे झुण्ड की चौकसी करो जिसमें पवित्र आत्मा ने तुम्हें अध्यक्ष ठहराया है, कि तुम परमेश्वर की कलीसिया की रखवाली करो” (प्रेरितों 20:28)। धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग अपने विश्वास में पौलुस के इन शब्दों को मानते हैं कि पादरियों और एल्डर्स को परमेश्वर द्वारा नियुक्त किया जाता है, और वे कलीसियाओं में प्रभु की सेवा करते हैं। उनका मानना है कि जो लोग पादरियों और एल्डर्स की बात सुनते हैं और उनका अनुपालन करते हैं, वे प्रभु का अनुपालन और अनुसरण करते हैं, और पादरियों के शब्दों को सुनना प्रभु के वचनों को सुनना है। क्या यह प्रभु की इच्छा के अनुरूप है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“मनुष्यों की आज्ञा से बढ़कर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना ही हमारा कर्तव्य है” (प्रेरितों 5:29)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
ऐसे भी लोग हैं, जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में बाइबल पढ़ते हैं और दिन भर उसके अंशों का पाठ करते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य नहीं समझता, न ही उनमें से कोई ऐसा होता है जो परमेश्वर को जान सकता है—उनमें से किसी के परमेश्वर के इरादों के अनुरूप चलने वाला होने की तो बात ही छोड़ दो। वे सब बेकार, नीच लोग होते हैं, जो "परमेश्वर" को उपदेश देने के लिए ऊँचे स्थानों पर खड़े होते हैं। वे ऐसे लोग हैं, जो परमेश्वर के बैनर तले काम करते हैं, फिर भी जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, जो परमेश्वर में विश्वास करने का लेबल लगाते हैं, लेकिन मनुष्य का मांस खाते और उनका रक्त पीते हैं। ऐसे तमाम लोग दुष्ट दानव हैं जो मनुष्यों की आत्माएँ निगल जाते हैं, वे प्रधान राक्षस हैं जो जानबूझकर लोगों को सही मार्ग पर चलने से बाधित करते हैं और वे ऐसी अड़चनें हैं जो लोगों को परमेश्वर की खोज करने से रोकती हैं। वे देखने में भले ही "शारीरिक रूप से हृष्ट-पुष्ट" लगते हों, लेकिन उनके अनुयायियों को यह कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों को परमेश्वर का प्रतिरोध करने की ओर ले जाते हैं? उनके अनुयायियों को यह कैसे पता चलेगा कि वे ऐसे जीवित दानव हैं जो मनुष्यों की आत्माएँ निगल जाने के लिए समर्पित हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते, वे सभी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले लोग हैं
प्रत्येक संप्रदाय के अगुआओं को देखो—वे सभी अहंकारी और आत्म-तुष्ट हैं और बाइबल की उनकी व्याख्याएँ संदर्भ से बाहर की हैं और उनकी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर आधारित हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और ज्ञान पर भरोसा करते हैं। यदि वे बिल्कुल भी उपदेश न दे पाते तो क्या लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही और वे धर्म-सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों का मन कैसे जीता जाए और कुछ चालों का उपयोग कैसे करें। इसलिए वे लोगों को धोखा देते हैं और उन्हें अपने सामने ले आते हैं। नाममात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे इन अगुआओं का अनुसरण करते हैं। जब वे सच्चे मार्ग का प्रचार करने वाले किसी व्यक्ति का सामना करते हैं, तो उनमें से कुछ लोग कहते हैं, “मुझे आस्था के मामले में अपने अगुआ से परामर्श करना है।” देखो, परमेश्वर में विश्वास करने और सच्चा मार्ग स्वीकारने की बात आने पर कैसे लोगों को अभी भी दूसरों की सहमति और मंजूरी की जरूरत होती है—क्या यह परेशानी वाली बात नहीं है? तो फिर, वे सब अगुआ क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे और मसीह-विरोधी नहीं बन चुके हैं? क्या वे लोगों के सच्चा मार्ग स्वीकारने में अवरोध नहीं बन चुके हैं? इस तरह के लोग पौलुस जैसे ही हैं। ... अतीत में, परमेश्वर, लोगों के साथ सख्त नहीं था, भले ही परमेश्वर पर उनका विश्वास सच्चा रहा हो या नहीं, इससे फर्क नहीं पड़ता था कि वे दूसरों का अनुसरण करते थे, या सत्य का अनुसरण नहीं करते थे, क्योंकि उसने पहले ही यह पूर्वनियत कर दिया था कि अंतिम चरण में उसके द्वारा पूर्वनिर्धारित और चुने गए लोगों को उसके सामने आना ही होगा और उसके न्याय को स्वीकारना ही होगा। परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकारने के बाद, अगर लोग अभी भी दूसरों की उपासना और अनुसरण कर रहे हैं, अगर वे सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, बल्कि आशीष और ताज पाना चाहते हैं तो यह क्षमा करने योग्य नहीं है। ऐसे लोगों का अंत बिल्कुल पौलुस की तरह ही होगा।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
परमेश्वर का अनुसरण करने में प्रमुख महत्व इस बात का है कि हर चीज परमेश्वर के वर्तमान वचनों के अनुसार होनी चाहिए : चाहे तुम जीवन प्रवेश का अनुसरण कर रहे हो या परमेश्वर के इरादों को पूरा कर रहे हो, सब कुछ परमेश्वर के वर्तमान वचनों के इर्द-गिर्द केंद्रित होना चाहिए। यदि तुम जो संगति करते हो और जिसमें प्रवेश करने का प्रयास करते हो, वह परमेश्वर के वर्तमान वचनों के इर्द-गिर्द केंद्रित नहीं है, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों से बाहर है और तुम्हारे पास बिल्कुल भी पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है। परमेश्वर ऐसे लोग चाहता है जो उसके पदचिह्नों का अनुसरण करें। भले ही जो तुमने पहले समझा था वह कितना ही अद्भुत और शुद्ध क्यों न हो, परमेश्वर उसे नहीं चाहता और यदि तुम ऐसी चीजों को दूर नहीं कर सकते, तो वो भविष्य में तुम्हारे प्रवेश के लिए एक भयंकर बाधा होंगी। वे सभी धन्य हैं, जो पवित्र आत्मा की आज की रोशनी का अनुसरण करने में सक्षम हैं। पिछले युगों और पीढ़ियों के लोग भी परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलते थे, फिर भी वे आज तक अनुसरण करना जारी नहीं रख सके; यह अंत के दिनों के लोगों के लिए आशीष है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कर सकते हैं और जो परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में सक्षम हैं, चाहे परमेश्वर उन्हें जहाँ भी ले जाए वो उसका अनुसरण करते हैं—ये वो लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर का आशीष प्राप्त है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों के कार्य में प्रवेश नहीं किया है और चाहे वो कितना भी कार्य करें या उनकी पीड़ा कितनी भी अधिक हो या वे कितनी ही भागदौड़ करें, इनमें से किसी भी चीज का परमेश्वर के लिए कोई महत्व नहीं है और वह उन्हें स्वीकृति नहीं देगा। ... “पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण” करने का मतलब है परमेश्वर के वर्तमान इरादों को समझना और परमेश्वर की वर्तमान अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने में सक्षम होना, आज के परमेश्वर का अनुसरण करना और उसके प्रति समर्पण करना और परमेश्वर के नवीनतम वचनों के अनुरूप प्रवेश करना। केवल यही ऐसा है जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है और पवित्र आत्मा के प्रवाह में है। ऐसे लोग न केवल परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने और परमेश्वर को देखने में सक्षम हैं बल्कि परमेश्वर के नवीनतम कार्य से उसके स्वभाव को भी जान सकते हैं और परमेश्वर के नवीनतम कार्य से मनुष्य की धारणाओं और उसके विद्रोहीपन को, मनुष्य की प्रकृति और सार को जान सकते हैं; इसके अलावा, वो अपनी सेवा के दौरान धीरे-धीरे अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने में सक्षम होते हैं। केवल ऐसे लोग ही हैं, जो परमेश्वर को प्राप्त करने में सक्षम हैं और जो सचमुच में सच्चा मार्ग पा चुके हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो
जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए। किसी व्यक्ति की बड़ाई मत करो, न किसी का आदर करो; परमेश्वर को पहले, जिनका आदर करते हो उन्हें दूसरे और खुद को तीसरे स्थान पर मत रखो। किसी भी व्यक्ति का तुम्हारे हृदय में कोई स्थान नहीं होना चाहिए और तुम्हें लोगों को—विशेषकर उन्हें जिन पर तुम श्रद्धा रखते हो—परमेश्वर के समतुल्य या उसके बराबर नहीं मानना चाहिए। यह परमेश्वर के लिए असहनीय है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए
कुछ लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, न्याय से तो और भी कम प्रेम करते हैं। इसके बजाय वे सत्ता और दौलत से प्रेम करते हैं; ऐसे लोग सत्ता चाहने वाले कहे जाते हैं। वे केवल दुनिया के शक्तिशाली संप्रदायों को और धर्म-महाविद्यालयों से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को ही खोजते हैं। यूँ तो उन्होंने सत्य के मार्ग को स्वीकार कर लिया है, फिर भी वे केवल अर्ध-विश्वासी हैं और वे अपने समस्त तन और मन को समर्पित करने में असमर्थ हैं; वे अपने मुँह से तो परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की बात करते हैं, लेकिन उनकी नजरें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर गड़ी रहती हैं और वे मसीह की ओर निगाह फेरने तक की जहमत नहीं उठाते हैं। उनके मन प्रसिद्धि, लाभ और प्रतिष्ठा के विचारों से भरे रहते हैं। वे इसे असंभव समझते हैं कि ऐसा छोटा व्यक्ति इतने लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है, कि इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बना सकता है। वे इसे असंभव समझते हैं कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज लोग परमेश्वर द्वारा चुने गए हैं। वे मानते हैं कि अगर ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार के पात्र होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोगों का हँसते-हँसते बुरा हाल हो जाता। उनका मानना है कि अगर परमेश्वर ने ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; अविश्वासी होने से भी बढ़कर, वे अविवेकी जानवर हैं। क्योंकि वे केवल रुतबे, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते हैं और बड़े समूहों और संप्रदायों को सम्मान देते हैं और उनमें मसीह की अगुआई में चलने वालों के लिए रत्ती भर भी परवाह नहीं है। वे तो बस ऐसे विश्वासघाती हैं जिन्होंने मसीह, सत्य और जीवन से पीठ फेर ली है।
तुम मसीह की विनम्रता की प्रशंसा नहीं करते, लेकिन तुम उन ऊँचे रुतबे वाले झूठे चरवाहों का सम्मान जरूर करते हो। तुम मसीह की मनोहरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते, बल्कि तुम उन व्यभिचारियों को बहुत पसंद करते हो, जो संसार की गंदगी के साथ रहते हैं। तुम मसीह की सिर टिकाने तक की जगह न होने की पीड़ा पर केवल कुटिलता से हँसते हो, लेकिन उन मुरदों की तारीफ करते हो, जो चढ़ावों का गबन करते हैं और ऐयाशी में जीते हैं। तुम मसीह के साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हो, बल्कि खुद को खुशी-खुशी उन लापरवाह और मनमाने मसीह-विरोधियों की बाँहों में सौंप देते हो, जबकि वे तुम्हें सिर्फ देह, शब्द और नियंत्रण ही प्रदान करते हैं। अभी भी तुम्हारा हृदय उनकी ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनके रुतबे, उनकी शक्तियों की ओर मुड़ता है। अभी भी तुम यही रवैया अपनाए हुए हो कि मसीह का कार्य स्वीकारना कठिन है और तुम इसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं रहते। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुममें मसीह को स्वीकार करने की आस्था नहीं है। तुमने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ इसलिए किया है, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और विकल्प नहीं था। बुलंद छवियों की एक शृंखला हमेशा तुम्हारे हृदय में बसी रहती है; तुम उनके किसी शब्द और कर्म को नहीं भूल सकते, न ही उनके प्रभावशाली शब्दों और हाथों को भूल सकते हो। वे तुम लोगों के हृदय में हमेशा सर्वोच्च और हमेशा नायक रहते हैं। लेकिन आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। तुम्हारे हृदय में वह हमेशा महत्वहीन है, वह मनुष्य है जो हमेशा भय के अयोग्य है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह कद्दावर होने से बहुत पीछे है।
बहरहाल, मैं कहता हूँ कि जो लोग सत्य को महत्व नहीं देते वे सभी छद्म-विश्वासी हैं और सत्य के प्रति विश्वासघाती हैं। ऐसे लोगों को कभी भी मसीह का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा। क्या अब तुमने पहचान लिया है कि तुम्हारे भीतर कितना अविश्वास है, और तुममें मसीह के प्रति कितना विश्वासघात है? मैं तुम्हें इस प्रकार नसीहत देता हूँ : चूँकि तुमने सत्य का मार्ग चुना है, तो तुम्हें खुद को संपूर्ण हृदय से समर्पित करना चाहिए; दुविधाग्रस्त या आधे दिल वाले न बनो। तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर संसार का या किसी एक व्यक्ति का परमेश्वर नहीं है, बल्कि उन सबका परमेश्वर है जो उस पर सचमुच विश्वास करते हैं, जो उसकी आराधना करते हैं और जो उसके प्रति समर्पित और निष्ठावान हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम सचमुच परमेश्वर के विश्वासी हो?
परमेश्वर के विश्वासी, वे चाहे जितने भी हों, अगर उनके विश्वास को परमेश्वर द्वारा एक धार्मिक समूह के विश्वास के रूप में निरूपित किया जाता है तो ये लोग परमेश्वर के कार्य और उद्धार के पात्र नहीं हैं। परमेश्वर ने इसे पहले ही निर्धारित कर दिया है और इन लोगों को बचाया नहीं जा सकता। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? परमेश्वर के कार्य या मार्गदर्शन के बिना एक समूह जो बिल्कुल भी न उसके सामने समर्पण करता है और न उसकी आराधना करता है, शायद वह नाममात्र के लिए उसमें विश्वास रखता हो, लेकिन वह धर्म के पादरियों और एल्डरों का ही अनुसरण और पालन करता है, और धर्म के पादरी और एल्डर अपने सार से ही शैतान के और पाखंडी होते हैं। इसलिए, वे लोग जिनका अनुसरण और पालन करते हैं वे शैतान और दानव हैं। वे परमेश्वर में विश्वास करने का दावा करते हैं, लेकिन दरअसल, मनुष्य उनके साथ हेर-फेर करता है, वे इंसानी आयोजनों और वर्चस्व के अधीन होते हैं। तो, मूल रूप से वे जिनका अनुसरण और पालन करते हैं वे शैतान और दानव हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली दुराचारी शक्तियाँ हैं, और परमेश्वर के शत्रु हैं। क्या परमेश्वर ऐसे लोगों के गिरोह को बचाएगा? (नहीं।) क्यों नहीं? देखो, क्या ऐसे लोग पश्चात्ताप करने में सक्षम होते हैं? वे पश्चात्ताप नहीं करेंगे। वे परमेश्वर में आस्था की पताका के नीचे इंसानी कामकाज और उद्यमों से जुड़ जाते हैं, जोकि मनुष्य के उद्धार हेतु परमेश्वर की प्रबंधन योजना के विपरीत है, और उनका अंतिम परिणाम यह होगा कि वे परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए जाते हैं। परमेश्वर द्वारा इन लोगों को बचाना असंभव है, और वे पश्चात्ताप करने में सक्षम नहीं हैं; वे शैतान के कब्जे में आ गए हैं और परमेश्वर इन लोगों को उसे ही सौंप देता है। परमेश्वर में किसी की आस्था को परमेश्वर की स्वीकृति मिल सकेगी या नहीं, क्या यह उसकी परमेश्वर में आस्था की अवधि पर निर्भर करता है? क्या यह किसी के द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठानों या माने जाने वाले विनियमों के प्रकार पर निर्भर करता है? क्या परमेश्वर इंसानी प्रथाओं को देखता है? क्या वह उनकी संख्या देखता है? (नहीं।) तो फिर वह किस बात पर गौर करता है? जब परमेश्वर लोगों के एक समूह को चुनता है, तो वह किस आधार पर यह मापता है कि उन्हें बचाया जा सकता है कि नहीं और वह उन्हें बचाएगा कि नहीं? यह इस पर आधारित है कि वे सत्य को स्वीकार कर सकते हैं कि नहीं; यह उस मार्ग पर आधारित है जिस पर वे चलते हैं। हालाँकि परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में मनुष्य को उतने सत्य नहीं बताए होंगे, जितने वह आज बताता है, और हालाँकि वे इतने विनिर्दिष्ट नहीं थे, फिर भी वह उस समय भी मनुष्य को पूर्ण करने में सक्षम था, और ऐसे लोग भी थे जो बचाए जा सके। तो आज के युग के लोग, जिन्होंने इतने सत्य सुने हैं और जो परमेश्वर के इरादे समझते हैं, अगर उसके मार्ग का अनुसरण नहीं कर सकते, या उद्धार के मार्ग पर नहीं चल सकते, तो अंत में उनका परिणाम क्या होगा? उनका अंतिम परिणाम वैसा ही होगा जैसा ईसाई धर्म और यहूदी धर्म के विश्वासियों का हुआ—उन्हीं की तरह उन्हें भी बचाया नहीं जा सकेगा। यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुमने कितने धर्मोपदेश सुने हैं या तुमने कितने सत्य समझे हैं; यदि तुम अभी भी लोगों द्वारा गुमराह किए जाने में—लोगों और शैतान का अनुसरण करने में—सक्षम हो और तुम अंत में परमेश्वर के मार्ग पर चलने में सक्षम नहीं हो, न ही उसका भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम हो तो ऐसे व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिया जाता है। संभव है धर्म के लोग बाइबल के विशाल ज्ञान का प्रचार करने में सक्षम हों, और वे कुछ आध्यात्मिक धर्म-सिद्धांत समझते हों, लेकिन वे परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण नहीं कर पाते, उसके वचनों का अभ्यास और अनुभव नहीं कर पाते, या सच्चे दिल से उसकी आराधना नहीं कर पाते, न ही वे उसका भय मान पाते हैं और न बुराई से दूर रह पाते हैं। वे सब पाखंडी हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो सच्चे दिल से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में, ऐसे लोगों को एक धार्मिक समूह, इंसानी गिरोह और शैतान के बसेरे के रूप में परिभाषित किया जाता है। सामूहिक रूप में, वे शैतान के गिरोह हैं, मसीह-विरोधियों का राज्य हैं, और परमेश्वर उन्हें पूरी तरह ठुकरा देता है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर का भय मानकर ही इंसान उद्धार के मार्ग पर चल सकता है
उन लोगों के लिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, अपनी आँखें खोलना और इस बात को ध्यान से देखना सर्वोत्तम रहेगा कि दरअसल वे किसमें विश्वास करते हैं : क्या यह वास्तव में परमेश्वर है जिस पर तू विश्वास करता है, या शैतान है? यदि तू जानता कि जिस पर तू विश्वास करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि तेरी स्वयं की प्रतिमाएँ हैं, तो फिर यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यदि तुझे वास्तव में नहीं पता कि तू किसमें विश्वास करता है, तो, फिर से, यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यह कहना कि तू विश्वासी है ईश-निंदा होगी! तुझसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं कर रहा कि तू परमेश्वर में विश्वास कर। मत कहो कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो, मैं ऐसी बहुत-सी बातें बहुत पहले खूब सुन चुका हूँ और उन्हें दुबारा सुनने की इच्छा नहीं है, क्योंकि तुम जिनमें विश्वास करते हो वे तुम लोगों के मन की प्रतिमाएँ और तुम लोगों के बीच के स्थानीय गुण्डे हैं। जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो घातक बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और उन्हें निकाल दिया जाएगा। कलीसिया में बहुत-से लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है। जब कोई व्यक्ति लोगों को गुमराह करने की कोशिश करता है, तो वे उलटे शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं; उन्हें शैतान का सेवक कहा जाना भी अपने साथ बहुत अन्याय होना लगता है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, वे हमेशा असत्य के पक्ष में खड़े होते हैं, वे संकटपूर्ण समय में कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में भेद पहचानने की क्षमता का अभाव है? वे विरोधवश शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो सत्य के लिए निष्पक्ष और विवेकपूर्ण हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में भेद पहचानने की क्षमता की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़े हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि भेद पहचानने की क्षमता से रहित लोग पाप से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन छोटे दानवों से वाकई प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तू सत्य का अभ्यास करने वालों को अनदेखा क्यों करता है और तू तुरंत उनके मात्र एक इशारे पर ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझमें भेद पहचानने की क्षमता है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह केवल इसलिए है क्योंकि तेरे आस-पास बहुत-से ऐसे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो इसलिए कि अभी निष्कासन-कार्य का समय नहीं है; बल्कि यह हटा देने के कार्य का समय है। तुझे निष्कासित करने की अभी कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब निकाल दिए जाने के बाद, मैं तुझे दंडित करूँगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, उसे निकाल दिया जाएगा!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी