2. पादरियों और एल्डर्स ने कई वर्षों से प्रभु पर विश्वास किया है, वे बाइबल के बारे में अत्यधिक जानकार हैं, और उनकी आस्था हमसे श्रेष्ठतर है, इसलिए प्रभु में विश्वास करने के बारे में हमें उनकी बात सुननी चाहिए। आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आया है और परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य कर रहा है, लेकिन अधिकांश पादरी और एल्डर्स इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं, और वे विरोध और निंदा करने की हद तक चले जाते हैं। इस तरह, हम भी इसे स्वीकार नहीं कर सकते।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“मनुष्यों की आज्ञा से बढ़कर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना ही हमारा कर्तव्य है” (प्रेरितों 5:29)

“वे अंधे मार्गदर्शक हैं और अंधा यदि अंधे को मार्ग दिखाए, तो दोनों ही गड़हे में गिर पड़ेंगे” (मत्ती 15:14)

“स्रापित है वह पुरुष जो मनुष्य पर भरोसा रखता है, और उसका सहारा लेता है, जिसका मन यहोवा से भटक जाता है” (यिर्मयाह 17:5)

“तौभी ये लोग अपने मारनेवाले की ओर नहीं फिरे और न सेनाओं के यहोवा की खोज करते हैं। इस कारण यहोवा इस्राएल में से सिर और पूँछ को, खजूर की डालियों और सरकंडे को, एक ही दिन में काट डालेगा। पुरनिया और प्रतिष्‍ठित पुरुष तो सिर हैं, और झूठी बातें सिखानेवाला नबी पूँछ है; क्योंकि जो इन लोगों की अगुवाई करते हैं वे इनको भटका देते हैं, और जिनकी अगुवाई होती है वे नष्‍ट हो जाते हैं” (यशायाह 9:13-16)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

प्रत्येक संप्रदाय के अगुआओं को देखो—वे सभी अहंकारी और आत्म-तुष्ट हैं और बाइबल की उनकी व्याख्याएँ संदर्भ से बाहर की हैं और उनकी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर आधारित हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और ज्ञान पर भरोसा करते हैं। यदि वे बिल्कुल भी उपदेश न दे पाते तो क्या लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही और वे धर्म-सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों का मन कैसे जीता जाए और कुछ चालों का उपयोग कैसे करें। इसलिए वे लोगों को धोखा देते हैं और उन्हें अपने सामने ले आते हैं। नाममात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे इन अगुआओं का अनुसरण करते हैं। जब वे सच्चे मार्ग का प्रचार करने वाले किसी व्यक्ति का सामना करते हैं, तो उनमें से कुछ लोग कहते हैं, “मुझे आस्था के मामले में अपने अगुआ से परामर्श करना है।” देखो, परमेश्वर में विश्वास करने और सच्चा मार्ग स्वीकारने की बात आने पर कैसे लोगों को अभी भी दूसरों की सहमति और मंजूरी की जरूरत होती है—क्या यह परेशानी वाली बात नहीं है? तो फिर, वे सब अगुआ क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे और मसीह-विरोधी नहीं बन चुके हैं? क्या वे लोगों के सच्चा मार्ग स्वीकारने में अवरोध नहीं बन चुके हैं?

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

ऐसे भी लोग हैं, जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में बाइबल पढ़ते हैं और दिन भर उसके अंशों का पाठ करते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य नहीं समझता, न ही उनमें से कोई ऐसा होता है जो परमेश्वर को जान सकता है—उनमें से किसी के परमेश्वर के इरादों के अनुरूप चलने वाला होने की तो बात ही छोड़ दो। वे सब बेकार, नीच लोग होते हैं, जो "परमेश्वर" को उपदेश देने के लिए ऊँचे स्थानों पर खड़े होते हैं। वे ऐसे लोग हैं, जो परमेश्वर के बैनर तले काम करते हैं, फिर भी जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, जो परमेश्वर में विश्वास करने का लेबल लगाते हैं, लेकिन मनुष्य का मांस खाते और उनका रक्त पीते हैं। ऐसे तमाम लोग दुष्ट दानव हैं जो मनुष्यों की आत्माएँ निगल जाते हैं, वे प्रधान राक्षस हैं जो जानबूझकर लोगों को सही मार्ग पर चलने से बाधित करते हैं और वे ऐसी अड़चनें हैं जो लोगों को परमेश्वर की खोज करने से रोकती हैं। वे देखने में भले ही "शारीरिक रूप से हृष्ट-पुष्ट" लगते हों, लेकिन उनके अनुयायियों को यह कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों को परमेश्वर का प्रतिरोध करने की ओर ले जाते हैं? उनके अनुयायियों को यह कैसे पता चलेगा कि वे ऐसे जीवित दानव हैं जो मनुष्यों की आत्माएँ निगल जाने के लिए समर्पित हैं?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते, वे सभी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले लोग हैं

कुछ लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, न्याय से तो और भी कम प्रेम करते हैं। इसके बजाय वे सत्ता और दौलत से प्रेम करते हैं; ऐसे लोग सत्ता चाहने वाले कहे जाते हैं। वे केवल दुनिया के शक्तिशाली संप्रदायों को और धर्म-महाविद्यालयों से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को ही खोजते हैं। यूँ तो उन्होंने सत्य के मार्ग को स्वीकार कर लिया है, फिर भी वे केवल अर्ध-विश्वासी हैं और वे अपने समस्त तन और मन को समर्पित करने में असमर्थ हैं; वे अपने मुँह से तो परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की बात करते हैं, लेकिन उनकी नजरें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर गड़ी रहती हैं और वे मसीह की ओर निगाह फेरने तक की जहमत नहीं उठाते हैं। उनके मन प्रसिद्धि, लाभ और प्रतिष्ठा के विचारों से भरे रहते हैं। वे इसे असंभव समझते हैं कि ऐसा छोटा व्यक्ति इतने लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है, कि इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बना सकता है। वे इसे असंभव समझते हैं कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज लोग परमेश्वर द्वारा चुने गए हैं। वे मानते हैं कि अगर ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार के पात्र होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोगों का हँसते-हँसते बुरा हाल हो जाता। उनका मानना है कि अगर परमेश्वर ने ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; अविश्वासी होने से भी बढ़कर, वे अविवेकी जानवर हैं। क्योंकि वे केवल रुतबे, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते हैं और बड़े समूहों और संप्रदायों को सम्मान देते हैं और उनमें मसीह की अगुआई में चलने वालों के लिए रत्ती भर भी परवाह नहीं है। वे तो बस ऐसे विश्वासघाती हैं जिन्होंने मसीह, सत्य और जीवन से पीठ फेर ली है।

तुम मसीह की विनम्रता की प्रशंसा नहीं करते, लेकिन तुम उन ऊँचे रुतबे वाले झूठे चरवाहों का सम्मान जरूर करते हो। तुम मसीह की मनोहरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते, बल्कि तुम उन व्यभिचारियों को बहुत पसंद करते हो, जो संसार की गंदगी के साथ रहते हैं। तुम मसीह की सिर टिकाने तक की जगह न होने की पीड़ा पर केवल कुटिलता से हँसते हो, लेकिन उन मुरदों की तारीफ करते हो, जो चढ़ावों का गबन करते हैं और ऐयाशी में जीते हैं। तुम मसीह के साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हो, बल्कि खुद को खुशी-खुशी उन लापरवाह और मनमाने मसीह-विरोधियों की बाँहों में सौंप देते हो, जबकि वे तुम्हें सिर्फ देह, शब्द और नियंत्रण ही प्रदान करते हैं। अभी भी तुम्हारा हृदय उनकी ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनके रुतबे, उनकी शक्तियों की ओर मुड़ता है। अभी भी तुम यही रवैया अपनाए हुए हो कि मसीह का कार्य स्वीकारना कठिन है और तुम इसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं रहते। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुममें मसीह को स्वीकार करने की आस्था नहीं है। तुमने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ इसलिए किया है, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और विकल्प नहीं था। बुलंद छवियों की एक शृंखला हमेशा तुम्हारे हृदय में बसी रहती है; तुम उनके किसी शब्द और कर्म को नहीं भूल सकते, न ही उनके प्रभावशाली शब्दों और हाथों को भूल सकते हो। वे तुम लोगों के हृदय में हमेशा सर्वोच्च और हमेशा नायक रहते हैं। लेकिन आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। तुम्हारे हृदय में वह हमेशा महत्वहीन है, वह मनुष्य है जो हमेशा भय के अयोग्य है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह कद्दावर होने से बहुत पीछे है।

बहरहाल, मैं कहता हूँ कि जो लोग सत्य को महत्व नहीं देते वे सभी छद्म-विश्वासी हैं और सत्य के प्रति विश्वासघाती हैं। ऐसे लोगों को कभी भी मसीह का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा। क्या अब तुमने पहचान लिया है कि तुम्हारे भीतर कितना अविश्वास है, और तुममें मसीह के प्रति कितना विश्वासघात है? मैं तुम्हें इस प्रकार नसीहत देता हूँ : चूँकि तुमने सत्य का मार्ग चुना है, तो तुम्हें खुद को संपूर्ण हृदय से समर्पित करना चाहिए; दुविधाग्रस्त या आधे दिल वाले न बनो। तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर संसार का या किसी एक व्यक्ति का परमेश्वर नहीं है, बल्कि उन सबका परमेश्वर है जो उस पर सचमुच विश्वास करते हैं, जो उसकी आराधना करते हैं और जो उसके प्रति समर्पित और निष्ठावान हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम सचमुच परमेश्वर के विश्वासी हो?

जो सत्य को नहीं समझते, वे हमेशा दूसरों का अनुसरण करते हैं : यदि लोग कहते हैं कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो तुम भी कहते हो कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है; यदि लोग कहते हैं कि यह दुष्टात्मा का कार्य है, तो तुम्हें भी संदेह हो जाता है, या तुम भी कहते हो कि यह किसी दुष्टात्मा का कार्य है। तुम हमेशा दूसरों के शब्दों को तोते की तरह दोहराते हो और स्वयं किसी भी चीज का भेद पहचानने में अक्षम हो, न ही तुम स्वयं सोचने में सक्षम होते हो। इस तरह के व्यक्ति का कोई स्पष्ट रुख नहीं होता, जिसे भेद की कोई पहचान नहीं होती—ऐसा व्यक्ति निकम्मा होता है! तुम हमेशा दूसरों के वचनों को दोहराते हो : आज ऐसा कहा जाता है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, परंतु शायद एक दिन कोई कहे कि यह पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है और कि यह असल में मनुष्य के कर्मों के अतिरिक्त कुछ नहीं है—फिर भी तुम इसका भेद नहीं पहचान पाते और जब तुम दूसरों को यह कहते देखते हो, तो तुम इसे दोहराते हो। यह वास्तव में पवित्र आत्मा का कार्य है, परंतु तुम कहते हो कि यह मनुष्य का कार्य है; क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य की ईशनिंदा करने वालों में से एक नहीं बन गए हो? इसमें, क्या तुमने परमेश्वर का इसलिए विरोध नहीं किया है, क्योंकि तुममें भेद पहचान की क्षमता नहीं है? शायद किसी दिन कोई मूर्ख प्रकट होकर कहे कि “यह किसी दुष्टात्मा का कार्य है,” और इन शब्दों को सुनकर तुम हतप्रभ रह जाओ, और एक बार फिर तुम दूसरों के शब्दों से बेबस हो जाओगे। हर बार जब कोई तुम्हारे साथ गड़बड़ी करता है, तो तुम अपने दृष्टिकोण पर अडिग रहने में असमर्थ हो जाते हो, और यह सब इसलिए होता है क्योंकि तुम्हारे पास सत्य नहीं है। परमेश्वर पर विश्वास करना और परमेश्वर को जानने की कोशिश करना आसान बात नहीं है। ये चीज़ें एक-साथ इकट्ठे होने और उपदेश सुनने भर से हासिल नहीं की जा सकतीं, और तुम केवल जुनून के द्वारा पूर्ण नहीं किए जा सकते। तुम्हें अनुभवों से गुजरना चाहिए, तुम्हारे पास ज्ञान होना चाहिए और तुम्हें अपने कार्यों में सैद्धांतिक होना चाहिए और पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करना चाहिए। जब तुम अनुभवों से गुज़र जाओगे, तो तुम कई चीजों में अंतर करने में सक्षम हो जाओगे—तुम भले और बुरे के बीच, न्याय और दुष्टता के बीच, देह और रक्त से संबंधित चीज़ों और सत्य से संबंधित चीज़ों के बीच अंतर करने में सक्षम हो जाओगे। तुम्हें इन सभी चीजों के बीच अंतर करने में सक्षम होना चाहिए, और ऐसा करने में, चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ हों, तुम कभी भी नहीं भटकोगे। केवल यही तुम्हारा वास्तविक आध्यात्मिक कद है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं

जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए और उसकी आराधना करनी चाहिए। किसी व्यक्ति की बड़ाई मत करो, न किसी का आदर करो; परमेश्वर को पहले, जिनका आदर करते हो उन्हें दूसरे और खुद को तीसरे स्थान पर मत रखो। किसी भी व्यक्ति का तुम्हारे हृदय में कोई स्थान नहीं होना चाहिए और तुम्हें लोगों को—विशेषकर उन्हें जिन पर तुम श्रद्धा रखते हो—परमेश्वर के समतुल्य या उसके बराबर नहीं मानना चाहिए। यह परमेश्वर के लिए असहनीय है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दस प्रशासनिक आदेश जो राज्य के युग में परमेश्वर के चुने हुए लोगों द्वारा पालन किए जाने चाहिए

कुछ लोग अक्सर ऐसे लोगों से गुमराह हो जाते हैं जो बाहर से आध्यात्मिक, कुलीन, ऊँचे और महान प्रतीत होते हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो वाक्पटुता से शब्द और धर्म-सिद्धांत बोल सकते हैं, और जिनकी कथनी-करनी सराहनीय लगती है, तो जो लोग उनके द्वारा गुमराह किए गए हैं उन्होंने उनके कार्यकलापों के सार को, उनके कर्मों के पीछे के सिद्धांतों को, और उनके लक्ष्य क्या हैं, इसे कभी नहीं देखा है। उन्होंने यह कभी नहीं देखा कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं या नहीं, वे लोग सचमुच परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहते हैं या नहीं। उन्होंने इन लोगों के मानवता सार को कभी नहीं पहचाना। बल्कि, उनसे परिचित होने के साथ ही, थोड़ा-थोड़ा करके वे उन लोगों की तारीफ करने, और आदर करने लगते हैं, और अंत में ये लोग उनके आदर्श बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों के मन में, वे आदर्श जिनकी वे उपासना करते हैं, मानते हैं कि वे अपने परिवार एवं नौकरियाँ छोड़ सकते हैं, और सतही तौर पर कीमत चुका सकते हैं—ये आदर्श ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, और एक अच्छा परिणाम और एक अच्छी मंजिल प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें मन में लगता है कि परमेश्वर इन आदर्श लोगों की प्रशंसा करता है। उनके ऐसे विश्वास की वजह क्या है? इस मुद्दे का सार क्या है? इसके क्या परिणाम हो सकते हैं? आओ, हम सबसे पहले इसके सार के मामले पर चर्चा करें।

सार रूप में, लोगों का दृष्टिकोण, उनका अभ्यास, लोग अभ्यास करने के लिए किन सिद्धांतों को चुनते हैं, और लोग किस चीज पर जोर देते हैं, इन सब बातों का लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाओं का कोई लेना-देना नहीं है। चाहे लोग सतही मसलों पर ध्यान दें या गंभीर मसलों पर, शब्दों एवं धर्म-सिद्धांतों पर ध्यान दें या वास्तविकता पर, लेकिन लोग उसके मुताबिक नहीं चलते जिसके मुताबिक उन्हें सबसे अधिक चलना चाहिए, और उन्हें जिसे सबसे अधिक जानना चाहिए, उसे जानते नहीं। इसका कारण यह है कि लोग सत्य को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते; इसलिए, लोग परमेश्वर के वचन में सिद्धांतों को खोजने और उनका अभ्यास करने के लिए समय लगाने एवं प्रयास करने को तैयार नहीं है। इसके बजाय, वे छोटे रास्तों का उपयोग करने को प्राथमिकता देते हैं, और जिन्हें वे समझते हैं, जिन्हें वे जानते हैं, उसे अच्छा अभ्यास और अच्छा व्यवहार मान लेते हैं; तब यही सारांश, खोज करने के लिए उनका लक्ष्य बन जाता है, जिसे वे अभ्यास में लाए जाने वाला सत्य मान लेते हैं। इसका प्रत्यक्ष परिणाम ये होता है कि लोग अच्छे मानवीय व्यवहार को, सत्य को अभ्यास में लाने के विकल्प के तौर पर उपयोग करते हैं, इससे परमेश्वर की कृपा पाने की उनकी अभिलाषा भी पूरी हो जाती है। इससे लोगों को सत्य के साथ संघर्ष करने का बल मिलता है जिसे वे परमेश्वर के साथ तर्क करने तथा स्पर्धा करने के लिए भी उपयोग करते हैं। साथ ही, लोग अनैतिक ढंग से परमेश्वर को भी दरकिनार कर देते हैं, और जिन आदर्शों को वे सराहते हैं उन्हें परमेश्वर के स्थान पर रख देते हैं। लोगों के ऐसे अज्ञानता भरे कार्य और दृष्टिकोण का, या एकतरफा दृष्टिकोण और अभ्यास का केवल एक ही मूल कारण है, आज मैं तुम लोगों को उसके बारे में बताऊँगा : कारण यह है कि भले ही लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हों, प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हों और उसके कथन पढ़ते हों, फिर भी वे वास्तव में उसके इरादों को नहीं समझते। और यही समस्या की जड़ है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के हृदय को समझता है, और जानता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है, किस चीज से वो घृणा करता है, वो क्या चाहता है, किस चीज को वो अस्वीकार करता है, किस प्रकार के व्यक्ति से परमेश्वर प्रेम करता है, किस प्रकार के व्यक्ति को वो नापसंद करता है, लोगों से अपेक्षाओं के उसके क्या मानक हैं, मनुष्य को पूर्ण करने के लिए वह किस प्रकार की पद्धति अपनाता है, तो क्या तब भी उस व्यक्ति का व्यक्तिगत विचार हो सकता है? क्या वह यूँ ही जा कर किसी अन्य व्यक्ति की आराधना कर सकता है? क्या कोई साधारण व्यक्ति लोगों का आदर्श बन सकता है? जो लोग परमेश्वर के इरादों को समझते हैं, उनका दृष्टिकोण इसकी अपेक्षा थोड़ा अधिक तर्कसंगत होता है। वे मनमाने ढंग से किसी भ्रष्ट व्यक्ति की आदर्श के रूप में आराधना नहीं करेंगे, न ही वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चलते हुए, यह विश्वास करेंगे कि मनमाने ढंग से कुछ साधारण नियमों या सिद्धांतों के मुताबिक चलना सत्य को अभ्यास में लाने के बराबर है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो नतीजा हासिल करेगा, उसे कैसे जानें

उन लोगों के लिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, अपनी आँखें खोलना और इस बात को ध्यान से देखना सर्वोत्तम रहेगा कि दरअसल वे किसमें विश्वास करते हैं : क्या यह वास्तव में परमेश्वर है जिस पर तू विश्वास करता है, या शैतान है? यदि तू जानता कि जिस पर तू विश्वास करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि तेरी स्वयं की प्रतिमाएँ हैं, तो फिर यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यदि तुझे वास्तव में नहीं पता कि तू किसमें विश्वास करता है, तो, फिर से, यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यह कहना कि तू विश्वासी है ईश-निंदा होगी! तुझसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं कर रहा कि तू परमेश्वर में विश्वास कर। मत कहो कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो, मैं ऐसी बहुत-सी बातें बहुत पहले खूब सुन चुका हूँ और उन्हें दुबारा सुनने की इच्छा नहीं है, क्योंकि तुम जिनमें विश्वास करते हो वे तुम लोगों के मन की प्रतिमाएँ और तुम लोगों के बीच के स्थानीय गुण्डे हैं। जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो घातक बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और उन्हें निकाल दिया जाएगा। कलीसिया में बहुत-से लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है। जब कोई व्यक्ति लोगों को गुमराह करने की कोशिश करता है, तो वे उलटे शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं; उन्हें शैतान का सेवक कहा जाना भी अपने साथ बहुत अन्याय होना लगता है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, वे हमेशा असत्य के पक्ष में खड़े होते हैं, वे संकटपूर्ण समय में कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में भेद पहचानने की क्षमता का अभाव है? वे विरोधवश शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो सत्य के लिए निष्पक्ष और विवेकपूर्ण हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में भेद पहचानने की क्षमता की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़े हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि भेद पहचानने की क्षमता से रहित लोग पाप से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन छोटे दानवों से वाकई प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तू सत्य का अभ्यास करने वालों को अनदेखा क्यों करता है और तू तुरंत उनके मात्र एक इशारे पर ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझमें भेद पहचानने की क्षमता है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह केवल इसलिए है क्योंकि तेरे आस-पास बहुत-से ऐसे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो इसलिए कि अभी निष्कासन-कार्य का समय नहीं है; बल्कि यह हटा देने के कार्य का समय है। तुझे निष्कासित करने की अभी कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब निकाल दिए जाने के बाद, मैं तुझे दंडित करूँगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, उसे निकाल दिया जाएगा!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी

पिछला: 1. बाइबल में, पौलुस ने कहा था, “हर एक व्यक्‍ति शासकीय अधिकारियों के अधीन रहे, क्योंकि कोई अधिकार ऐसा नहीं जो परमेश्‍वर की ओर से न हो” (रोमियों 13:1)। “इसलिये अपनी और पूरे झुण्ड की चौकसी करो जिसमें पवित्र आत्मा ने तुम्हें अध्यक्ष ठहराया है, कि तुम परमेश्‍वर की कलीसिया की रखवाली करो” (प्रेरितों 20:28)। धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग अपने विश्वास में पौलुस के इन शब्दों को मानते हैं कि पादरियों और एल्डर्स को परमेश्वर द्वारा नियुक्त किया जाता है, और वे कलीसियाओं में प्रभु की सेवा करते हैं। उनका मानना है कि जो लोग पादरियों और एल्डर्स की बात सुनते हैं और उनका अनुपालन करते हैं, वे प्रभु का अनुपालन और अनुसरण करते हैं, और पादरियों के शब्दों को सुनना प्रभु के वचनों को सुनना है। क्या यह प्रभु की इच्छा के अनुरूप है?

अगला: 3. धार्मिक दुनिया में, पादरी और एल्डर्स शक्ति लिए हुए होते हैं। वे पाखंडी फरीसियों के मार्ग पर चलते हैं, और यद्यपि हम उनका अनुसरण करते हैं और जैसा वे कहते हैं वैसा हम करते हैं, हम (दरअसल) प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, न कि पादरियों और एल्डर्स में। फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि हम भी फरीसियों के मार्ग पर चलते हैं? क्या आप कह रहे हैं कि हममें से जो धर्म में परमेश्वर को मानते हैं वे वास्तव में नहीं बचाए जाएँगे?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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