3. धार्मिक दुनिया में, पादरी और एल्डर्स शक्ति लिए हुए होते हैं। वे पाखंडी फरीसियों के मार्ग पर चलते हैं, और यद्यपि हम उनका अनुसरण करते हैं और जैसा वे कहते हैं वैसा हम करते हैं, हम (दरअसल) प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, न कि पादरियों और एल्डर्स में। फिर आप यह कैसे कह सकते हैं कि हम भी फरीसियों के मार्ग पर चलते हैं? क्या आप कह रहे हैं कि हममें से जो धर्म में परमेश्वर को मानते हैं वे वास्तव में नहीं बचाए जाएँगे?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद :
“वे अंधे मार्गदर्शक हैं और अंधा यदि अंधे को मार्ग दिखाए, तो दोनों ही गड़हे में गिर पड़ेंगे” (मत्ती 15:14)।
“क्योंकि जो इन लोगों की अगुवाई करते हैं वे इनको भटका देते हैं, और जिनकी अगुवाई होती है वे नष्ट हो जाते हैं” (यशायाह 9:16)।
“मेरे ज्ञान के न होने से मेरी प्रजा नष्ट हो गई” (होशे 4:6)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
क्या तुम लोग इसकी जड़ जानना चाहते हो कि फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया? क्या तुम लोग फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे भी ज़्यादा, उन्होंने केवल इस पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, फिर भी जीवन सत्य का अनुसरण नहीं किया। इसलिए वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि उन्हें जीवन के मार्ग का कोई ज्ञान नहीं है, और वे नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है। तुम्हीं लोग बताओ ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर का आशीष कैसे प्राप्त कर सकते हैं? क्या वे मसीहा को देख सकते हैं? उन्होंने यीशु का विरोध किया क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु द्वारा बताए गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे और इससे भी अधिक इसलिए क्योंकि वे मसीहा को नहीं समझते थे। और चूँकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था और कभी मसीहा के साथ नहीं जुड़े थे, उन्होंने मसीहा के बस नाम के साथ चिपके रहने की ग़लती की, जबकि हर मुमकिन ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का आज्ञापालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत था : इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता, तुम मसीह नहीं हो। क्या यह सोच हास्यास्पद और बेतुकी नहीं है? मैं तुम लोगों से आगे पूछता हूँ : क्या तुम लोगों के लिए वो गलतियाँ करना बेहद आसान नहीं जो उस समय के फरीसियों ने की थीं, क्योंकि तुम लोगों के पास यीशु की थोड़ी-भी समझ नहीं है? क्या तुम सत्य के मार्ग का भेद पहचान सकते हो? क्या तुम सचमुच विश्वास दिला सकते हो कि तुम मसीह का विरोध नहीं करोगे? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने में समर्थ हो? यदि तुम नहीं जानते कि तुम मसीह का विरोध करोगे या नहीं, तो मेरा कहना है कि तुम पहले ही मौत की कगार पर जी रहे हो। जो लोग मसीहा को नहीं जानते थे, वे सभी यीशु का विरोध करने वाले कार्य करने, यीशु को अस्वीकार करने, उसे बदनाम करने में सक्षम थे। जो लोग यीशु को नहीं समझते, वे सब उसे अस्वीकार करने एवं उसे बुरा-भला कहने में सक्षम हैं। इससे भी अधिक, वे यीशु के लौटने को शैतान द्वारा गुमराह किए जाने की तरह देखने में सक्षम हैं और ज्यादातर लोग देह में लौटे यीशु की निंदा करेंगे। क्या इस सब से तुम लोगों को डर नहीं लगता? जिसका तुम लोग सामना करते हो, वह पवित्र आत्मा के खिलाफ निंदा होगी, कलीसियाओं के लिए कहे गए पवित्र आत्मा के वचनों को चीरना होगा और यीशु द्वारा व्यक्त किए गए समस्त वचनों को ठुकराना होगा। यदि तुम लोग इतने संभ्रमित हो तो यीशु से क्या प्राप्त कर सकते हो? यदि तुम हठपूर्वक होश में आने से इनकार करते हो तो तुम लोग उस कार्य को कैसे समझ सकते हो जिसे यीशु श्वेत बादल पर देह में लौटने पर करता है? मैं तुम लोगों को यह बताता हूँ : जो लोग सत्य स्वीकार नहीं करते, फिर भी अंधों की तरह श्वेत बादलों पर यीशु के आगमन का इंतजार करते हैं, वे निश्चित रूप से वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा की ईश-निंदा करते हैं और ये वो वर्ग है जो निश्चित तौर पर नष्ट कर दिया जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को फिर से बना चुका होगा
प्रत्येक संप्रदाय के अगुआओं को देखो—वे सभी अहंकारी और आत्म-तुष्ट हैं और बाइबल की उनकी व्याख्याएँ संदर्भ से बाहर की हैं और उनकी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर आधारित हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और ज्ञान पर भरोसा करते हैं। यदि वे बिल्कुल भी उपदेश न दे पाते तो क्या लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही और वे धर्म-सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों का मन कैसे जीता जाए और कुछ चालों का उपयोग कैसे करें। इसलिए वे लोगों को धोखा देते हैं और उन्हें अपने सामने ले आते हैं। नाममात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे इन अगुआओं का अनुसरण करते हैं। जब वे सच्चे मार्ग का प्रचार करने वाले किसी व्यक्ति का सामना करते हैं, तो उनमें से कुछ लोग कहते हैं, “मुझे आस्था के मामले में अपने अगुआ से परामर्श करना है।” देखो, परमेश्वर में विश्वास करने और सच्चा मार्ग स्वीकारने की बात आने पर कैसे लोगों को अभी भी दूसरों की सहमति और मंजूरी की जरूरत होती है—क्या यह परेशानी वाली बात नहीं है? तो फिर, वे सब अगुआ क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे और मसीह-विरोधी नहीं बन चुके हैं? क्या वे लोगों के सच्चा मार्ग स्वीकारने में अवरोध नहीं बन चुके हैं? इस तरह के लोग पौलुस जैसे ही हैं। ... अतीत में, परमेश्वर, लोगों के साथ सख्त नहीं था, भले ही परमेश्वर पर उनका विश्वास सच्चा रहा हो या नहीं, इससे फर्क नहीं पड़ता था कि वे दूसरों का अनुसरण करते थे, या सत्य का अनुसरण नहीं करते थे, क्योंकि उसने पहले ही यह पूर्वनियत कर दिया था कि अंतिम चरण में उसके द्वारा पूर्वनिर्धारित और चुने गए लोगों को उसके सामने आना ही होगा और उसके न्याय को स्वीकारना ही होगा। परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकारने के बाद, अगर लोग अभी भी दूसरों की उपासना और अनुसरण कर रहे हैं, अगर वे सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, बल्कि आशीष और ताज पाना चाहते हैं तो यह क्षमा करने योग्य नहीं है। ऐसे लोगों का अंत बिल्कुल पौलुस की तरह ही होगा।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
कुछ लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, न्याय से तो और भी कम प्रेम करते हैं। इसके बजाय वे सत्ता और दौलत से प्रेम करते हैं; ऐसे लोग सत्ता चाहने वाले कहे जाते हैं। वे केवल दुनिया के शक्तिशाली संप्रदायों को और धर्म-महाविद्यालयों से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को ही खोजते हैं। यूँ तो उन्होंने सत्य के मार्ग को स्वीकार कर लिया है, फिर भी वे केवल अर्ध-विश्वासी हैं और वे अपने समस्त तन और मन को समर्पित करने में असमर्थ हैं; वे अपने मुँह से तो परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की बात करते हैं, लेकिन उनकी नजरें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर गड़ी रहती हैं और वे मसीह की ओर निगाह फेरने तक की जहमत नहीं उठाते हैं। उनके मन प्रसिद्धि, लाभ और प्रतिष्ठा के विचारों से भरे रहते हैं। वे इसे असंभव समझते हैं कि ऐसा छोटा व्यक्ति इतने लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है, कि इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बना सकता है। वे इसे असंभव समझते हैं कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज लोग परमेश्वर द्वारा चुने गए हैं। वे मानते हैं कि अगर ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार के पात्र होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोगों का हँसते-हँसते बुरा हाल हो जाता। उनका मानना है कि अगर परमेश्वर ने ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; अविश्वासी होने से भी बढ़कर, वे अविवेकी जानवर हैं। क्योंकि वे केवल रुतबे, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते हैं और बड़े समूहों और संप्रदायों को सम्मान देते हैं और उनमें मसीह की अगुआई में चलने वालों के लिए रत्ती भर भी परवाह नहीं है। वे तो बस ऐसे विश्वासघाती हैं जिन्होंने मसीह, सत्य और जीवन से पीठ फेर ली है।
तुम मसीह की विनम्रता की प्रशंसा नहीं करते, लेकिन तुम उन ऊँचे रुतबे वाले झूठे चरवाहों का सम्मान जरूर करते हो। तुम मसीह की मनोहरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते, बल्कि तुम उन व्यभिचारियों को बहुत पसंद करते हो, जो संसार की गंदगी के साथ रहते हैं। तुम मसीह की सिर टिकाने तक की जगह न होने की पीड़ा पर केवल कुटिलता से हँसते हो, लेकिन उन मुरदों की तारीफ करते हो, जो चढ़ावों का गबन करते हैं और ऐयाशी में जीते हैं। तुम मसीह के साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हो, बल्कि खुद को खुशी-खुशी उन लापरवाह और मनमाने मसीह-विरोधियों की बाँहों में सौंप देते हो, जबकि वे तुम्हें सिर्फ देह, शब्द और नियंत्रण ही प्रदान करते हैं। अभी भी तुम्हारा हृदय उनकी ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनके रुतबे, उनकी शक्तियों की ओर मुड़ता है। अभी भी तुम यही रवैया अपनाए हुए हो कि मसीह का कार्य स्वीकारना कठिन है और तुम इसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं रहते। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुममें मसीह को स्वीकार करने की आस्था नहीं है। तुमने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ इसलिए किया है, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और विकल्प नहीं था। बुलंद छवियों की एक शृंखला हमेशा तुम्हारे हृदय में बसी रहती है; तुम उनके किसी शब्द और कर्म को नहीं भूल सकते, न ही उनके प्रभावशाली शब्दों और हाथों को भूल सकते हो। वे तुम लोगों के हृदय में हमेशा सर्वोच्च और हमेशा नायक रहते हैं। लेकिन आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। तुम्हारे हृदय में वह हमेशा महत्वहीन है, वह मनुष्य है जो हमेशा भय के अयोग्य है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह कद्दावर होने से बहुत पीछे है।
बहरहाल, मैं कहता हूँ कि जो लोग सत्य को महत्व नहीं देते वे सभी छद्म-विश्वासी हैं और सत्य के प्रति विश्वासघाती हैं। ऐसे लोगों को कभी भी मसीह का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा। क्या अब तुमने पहचान लिया है कि तुम्हारे भीतर कितना अविश्वास है, और तुममें मसीह के प्रति कितना विश्वासघात है? मैं तुम्हें इस प्रकार नसीहत देता हूँ : चूँकि तुमने सत्य का मार्ग चुना है, तो तुम्हें खुद को संपूर्ण हृदय से समर्पित करना चाहिए; दुविधाग्रस्त या आधे दिल वाले न बनो। तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर संसार का या किसी एक व्यक्ति का परमेश्वर नहीं है, बल्कि उन सबका परमेश्वर है जो उस पर सचमुच विश्वास करते हैं, जो उसकी आराधना करते हैं और जो उसके प्रति समर्पित और निष्ठावान हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम सचमुच परमेश्वर के विश्वासी हो?
जिन लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण बुरे लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जाएँगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये बुरे लोगों का अनुसरण करते हैं, ये बुरे लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए बुरे लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे बुरे लोग बुराई प्रकट करते हैं, फिर भी वे अड़ियल बन जाते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य से मुँह मोड़ लेते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं लेकिन विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, बुराई नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो “सम्राटों” की तरह पेश आते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर का प्रतिरोध करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और पूर्ण बना दिया जाएगा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आमंत्रण देंगे। ये वे परिणाम हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी
उन लोगों के लिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, अपनी आँखें खोलना और इस बात को ध्यान से देखना सर्वोत्तम रहेगा कि दरअसल वे किसमें विश्वास करते हैं : क्या यह वास्तव में परमेश्वर है जिस पर तू विश्वास करता है, या शैतान है? यदि तू जानता कि जिस पर तू विश्वास करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि तेरी स्वयं की प्रतिमाएँ हैं, तो फिर यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यदि तुझे वास्तव में नहीं पता कि तू किसमें विश्वास करता है, तो, फिर से, यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यह कहना कि तू विश्वासी है ईश-निंदा होगी! तुझसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं कर रहा कि तू परमेश्वर में विश्वास कर। मत कहो कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो, मैं ऐसी बहुत-सी बातें बहुत पहले खूब सुन चुका हूँ और उन्हें दुबारा सुनने की इच्छा नहीं है, क्योंकि तुम जिनमें विश्वास करते हो वे तुम लोगों के मन की प्रतिमाएँ और तुम लोगों के बीच के स्थानीय गुण्डे हैं। जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो घातक बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और उन्हें निकाल दिया जाएगा। कलीसिया में बहुत-से लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है। जब कोई व्यक्ति लोगों को गुमराह करने की कोशिश करता है, तो वे उलटे शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं; उन्हें शैतान का सेवक कहा जाना भी अपने साथ बहुत अन्याय होना लगता है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, वे हमेशा असत्य के पक्ष में खड़े होते हैं, वे संकटपूर्ण समय में कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में भेद पहचानने की क्षमता का अभाव है? वे विरोधवश शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो सत्य के लिए निष्पक्ष और विवेकपूर्ण हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में भेद पहचानने की क्षमता की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़े हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि भेद पहचानने की क्षमता से रहित लोग पाप से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन छोटे दानवों से वाकई प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तू सत्य का अभ्यास करने वालों को अनदेखा क्यों करता है और तू तुरंत उनके मात्र एक इशारे पर ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझमें भेद पहचानने की क्षमता है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह केवल इसलिए है क्योंकि तेरे आस-पास बहुत-से ऐसे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो इसलिए कि अभी निष्कासन-कार्य का समय नहीं है; बल्कि यह हटा देने के कार्य का समय है। तुझे निष्कासित करने की अभी कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब निकाल दिए जाने के बाद, मैं तुझे दंडित करूँगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, उसे निकाल दिया जाएगा!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी
परमेश्वर के विश्वासी, वे चाहे जितने भी हों, अगर उनके विश्वास को परमेश्वर द्वारा एक धार्मिक समूह के विश्वास के रूप में निरूपित किया जाता है तो ये लोग परमेश्वर के कार्य और उद्धार के पात्र नहीं हैं। परमेश्वर ने इसे पहले ही निर्धारित कर दिया है और इन लोगों को बचाया नहीं जा सकता। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? परमेश्वर के कार्य या मार्गदर्शन के बिना एक समूह जो बिल्कुल भी न उसके सामने समर्पण करता है और न उसकी आराधना करता है, शायद वह नाममात्र के लिए उसमें विश्वास रखता हो, लेकिन वह धर्म के पादरियों और एल्डरों का ही अनुसरण और पालन करता है, और धर्म के पादरी और एल्डर अपने सार से ही शैतान के और पाखंडी होते हैं। इसलिए, वे लोग जिनका अनुसरण और पालन करते हैं वे शैतान और दानव हैं। वे परमेश्वर में विश्वास करने का दावा करते हैं, लेकिन दरअसल, मनुष्य उनके साथ हेर-फेर करता है, वे इंसानी आयोजनों और वर्चस्व के अधीन होते हैं। तो, मूल रूप से वे जिनका अनुसरण और पालन करते हैं वे शैतान और दानव हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली दुराचारी शक्तियाँ हैं, और परमेश्वर के शत्रु हैं। क्या परमेश्वर ऐसे लोगों के गिरोह को बचाएगा? (नहीं।) क्यों नहीं? देखो, क्या ऐसे लोग पश्चात्ताप करने में सक्षम होते हैं? वे पश्चात्ताप नहीं करेंगे। वे परमेश्वर में आस्था की पताका के नीचे इंसानी कामकाज और उद्यमों से जुड़ जाते हैं, जोकि मनुष्य के उद्धार हेतु परमेश्वर की प्रबंधन योजना के विपरीत है, और उनका अंतिम परिणाम यह होगा कि वे परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिए जाते हैं। परमेश्वर द्वारा इन लोगों को बचाना असंभव है, और वे पश्चात्ताप करने में सक्षम नहीं हैं; वे शैतान के कब्जे में आ गए हैं और परमेश्वर इन लोगों को उसे ही सौंप देता है। परमेश्वर में किसी की आस्था को परमेश्वर की स्वीकृति मिल सकेगी या नहीं, क्या यह उसकी परमेश्वर में आस्था की अवधि पर निर्भर करता है? क्या यह किसी के द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठानों या माने जाने वाले विनियमों के प्रकार पर निर्भर करता है? क्या परमेश्वर इंसानी प्रथाओं को देखता है? क्या वह उनकी संख्या देखता है? (नहीं।) तो फिर वह किस बात पर गौर करता है? जब परमेश्वर लोगों के एक समूह को चुनता है, तो वह किस आधार पर यह मापता है कि उन्हें बचाया जा सकता है कि नहीं और वह उन्हें बचाएगा कि नहीं? यह इस पर आधारित है कि वे सत्य को स्वीकार कर सकते हैं कि नहीं; यह उस मार्ग पर आधारित है जिस पर वे चलते हैं। ... इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुमने कितने धर्मोपदेश सुने हैं या तुमने कितने सत्य समझे हैं; यदि तुम अभी भी लोगों द्वारा गुमराह किए जाने में—लोगों और शैतान का अनुसरण करने में—सक्षम हो और तुम अंत में परमेश्वर के मार्ग पर चलने में सक्षम नहीं हो, न ही उसका भय मानने और बुराई से दूर रहने में सक्षम हो तो ऐसे व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा ठुकरा दिया जाता है। संभव है धर्म के लोग बाइबल के विशाल ज्ञान का प्रचार करने में सक्षम हों, और वे कुछ आध्यात्मिक धर्म-सिद्धांत समझते हों, लेकिन वे परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण नहीं कर पाते, उसके वचनों का अभ्यास और अनुभव नहीं कर पाते, या सच्चे दिल से उसकी आराधना नहीं कर पाते, न ही वे उसका भय मान पाते हैं और न बुराई से दूर रह पाते हैं। वे सब पाखंडी हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो सच्चे दिल से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में, ऐसे लोगों को एक धार्मिक समूह, इंसानी गिरोह और शैतान के बसेरे के रूप में परिभाषित किया जाता है। सामूहिक रूप में, वे शैतान के गिरोह हैं, मसीह-विरोधियों का राज्य हैं, और परमेश्वर उन्हें पूरी तरह ठुकरा देता है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर का भय मानकर ही इंसान उद्धार के मार्ग पर चल सकता है
जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर की उपस्थिति से वंचित रहते हैं, और इससे भी बढ़कर, वे परमेश्वर के आशीषों और सुरक्षा से रहित होते हैं। उनकी अधिकांश कथनी और करनी पवित्र आत्मा के पुराने कार्य की अपेक्षाओं को थामे रहते हैं; वे धर्म-सिद्धांत हैं, सत्य नहीं। ऐसे धर्म-सिद्धांत और विनियम यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इन लोगों का एक-साथ इकट्ठा होना धर्म के अलावा कुछ नहीं है; वे चुने हुए लोग या परमेश्वर के कार्य के लक्ष्य नहीं हैं। उनका एक साथ इकट्ठा होना केवल एक धार्मिक खिचड़ी कहलाया जा सकता है; उसे कलीसिया नहीं कहा जा सकता। यह एक अपरिवर्तनीय तथ्य है। उनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य नहीं है; जो कुछ वे करते हैं वह धर्म का द्योतक होता है, वे जिसे जीते हैं वह धर्म से भरा हुआ होता है; उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और कार्य नहीं होता, और वे पवित्र आत्मा का अनुशासन या प्रबुद्धता प्राप्त करने के लायक तो बिल्कुल भी नहीं हैं। ये समस्त लोग निर्जीव लाशें और कीड़े हैं, जो आध्यात्मिकता से रहित हैं। उन्हें मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध का कोई ज्ञान नहीं है, मनुष्य के समस्त कुकर्मों का कोई ज्ञान नहीं है, और वे परमेश्वर के समस्त कार्य और परमेश्वर के वर्तमान इरादों को तो बिल्कुल भी नहीं जानते। वे सभी अज्ञानी, अधम लोग हैं, और वे कूडा-करकट हैं जो विश्वासी कहलाने के योग्य नहीं हैं! वे जो कुछ भी करते हैं, उसकी परमेश्वर के प्रबंधन के लिए कोई प्रासंगिकता नहीं है और वह परमेश्वर की योजनाओं को तो बिल्कुल भी नहीं बिगाड़ सकता। उनकी कथनी और करनी अत्यंत घृणास्पद और अत्यंत दयनीय होती हैं, ये उल्लेख करने के लायक भी नहीं हैं। जो लोग पवित्र आत्मा की धारा में नहीं हैं, उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य का पवित्र आत्मा के नए कार्य के साथ कोई लेना-देना नहीं है। इस वजह से, चाहे वे कुछ भी क्यों न करें, उनमें पवित्र आत्मा का अनुशासन नहीं होता है, पवित्र आत्मा की—प्रबुद्धता तो बिल्कुल नहीं होती है। कारण, वे सभी ऐसे लोग हैं, जिन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं है, और जिन्हें पवित्र आत्मा ने तिरस्कृत कर दिया है। उन्हें कुकर्मी कहा जाता है, क्योंकि वे अपनी मर्जी से काम करते हैं, अपनी देह पर काम करते हैं और ऐसा करते हुए परमेश्वर के नाम का झंडा लहराते हैं; क्योंकि वे जानबूझकर परमेश्वर के प्रति शत्रुता रखते हैं और परमेश्वर के कार्य के विपरीत काम करते हैं। परमेश्वर के साथ सहयोग करने में मनुष्य की असफलता अपने आप में चरम रूप से विद्रोही है, इसलिए क्या वे लोग, जो जानबूझकर परमेश्वर के प्रतिकूल चलते हैं, विशेष रूप से अपना उचित प्रतिफल प्राप्त नहीं करेंगे?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास
जो लोग मसीह द्वारा बोले गए सत्य पर भरोसा किए बिना जीवन प्राप्त करना चाहते हैं, वे पृथ्वी पर सबसे बेतुके लोग हैं, और जो मसीह द्वारा लाए गए जीवन के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे कोरी कल्पना में खोए हैं। और इसलिए मैं कहता हूँ कि जो लोग अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार नहीं करते, उनसे परमेश्वर हमेशा घृणा करेगा। अंत के दिनों में मसीह राज्य के लिए मनुष्य का प्रवेशद्वार है और ऐसा कोई नहीं है जो उसे लाँघकर निकल सके। मसीह के माध्यम के अलावा किसी भी दूसरे तरीके से किसी को भी परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें उसके वचन स्वीकारने चाहिए और उसके वचन के प्रति समर्पण करना चाहिए। सत्य और जीवन के प्रावधान को स्वीकारने में असमर्थ रहते हुए केवल आशीष प्राप्त करने की मत सोचो। मसीह अंत के दिनों में इसलिए आया है ताकि वह उन सबको जीवन प्रदान कर सके जो उसमें ईमानदारी से विश्वास रखते हैं। यह कार्य पुराने युग को समाप्त करने और नए युग में प्रवेश करने के लिए है, और यह कार्य वह मार्ग है जिसे नए युग में प्रवेश करने वाले सभी लोगों को अपनाना ही चाहिए। यदि तुम मसीह को नहीं स्वीकारते और यही नहीं, उसकी भर्त्सना, ईशनिंदा या उसका उत्पीड़न करते हो, तो तुम्हें अनंतकाल तक जलाया जाना तय है और तुम परमेश्वर के राज्य में कभी प्रवेश नहीं करोगे। ऐसा इसलिए क्योंकि यह मसीह स्वयं पवित्र आत्मा की अभिव्यक्ति है, परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वह है जिसे परमेश्वर ने अपना कार्य पृथ्वी पर करने के लिए सौंपा है, और इसलिए मैं कहता हूँ कि यदि तुम वह सब स्वीकार नहीं करते जो अंत के दिनों के मसीह द्वारा किया जाता है, तो तुम पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करते हो। पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करने वाले जिस प्रतिफल के पात्र हैं, वह सभी को स्वतः स्पष्ट है। मैं तुम्हें यह भी बताता हूँ : अगर तुम अंत के दिनों के मसीह का प्रतिरोध करते हो, अगर तुम अंत के दिनों के मसीह को नकारते हो तो कोई भी अन्य तुम्हारे बदले में इसका अंजाम नहीं भुगत सकता है। इतना ही नहीं, उस बिंदु के बाद तुम्हें परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने का अवसर कभी नहीं मिलेगा; यदि तुम अपने तौर-तरीके सुधारना भी चाहो, तब भी तुम दोबारा कभी परमेश्वर का चेहरा नहीं देख पाओगे। ऐसा इसलिए क्योंकि तुम जिसका प्रतिरोध कर रहे हो वह मानव नहीं है, तुम जिसे अस्वीकार कर रहे हो वह कोई तुच्छ व्यक्ति नहीं है, बल्कि मसीह है। क्या तुम जानते हो कि इसके क्या दुष्परिणाम हैं? तुम कोई छोटी-मोटी गलती नहीं कर रहे हो, बल्कि एक जघन्य पाप कर रहे हो। और इसलिए मैं हर व्यक्ति को सलाह देता हूँ कि सत्य के सामने अपने नुकीले दाँत और पंजे मत दिखाओ या मनमानी टिप्पणियाँ मत करो, क्योंकि केवल सत्य ही तुम्हें जीवन दिला सकता है, और सत्य के अलावा कुछ भी तुम्हें पुनः जन्म लेने या दोबारा परमेश्वर का चेहरा देखने में सक्षम नहीं बना सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है