मेरे समझने का ढोंग करने के पीछे क्या था

31 जुलाई, 2026

म्याओ शिआओ, चीन

फरवरी 2023 में, मुझे सिंचन कार्य की पर्यवेक्षक के रूप में पदोन्नत किया गया। उस समय, मैं कई सिंचन टीम अगुआओं के काम का पर्यवेक्षण कर रही थी। मुझे लगा कि मुझमें नए विश्वासियों को सींचने का कुछ कौशल है, इसलिए मुझे यकीन था कि यह कर्तव्य निभाने के लिए लोग मेरा आदर करेंगे। मैं मन ही मन खुश हुए बिना नहीं रह सकी। लेकिन खुश होने के साथ-साथ मैं चिंतित भी थी। मैं नए विश्वासियों की समस्याओं और मुश्किलों को लेकर टीम अगुआओं की मदद करने में काफी अच्छी थी, लेकिन पर्यवेक्षक होने के नाते मुझे टीम अगुआओं की समस्याएँ और मुश्किलें भी हल करनी थीं। मैं आम तौर पर सिर्फ कार्य पर ध्यान देती थी, अपने जीवन प्रवेश पर नहीं, इसलिए सत्य की मेरी समझ काफी सतही थी। मैं सामान्य दशाओं और समस्याओं को हल करने के लिए परमेश्वर के वचन ढूँढ़ सकती थी, लेकिन जब ज्यादा जटिल दशाओं और समस्याओं के समाधान की बात आती थी तो मैं उन्हें साफ-साफ नहीं देख पाती थी और यह नहीं जानती थी कि क्या करूँ। पहले, मैं दूसरे टीम अगुआओं के ही स्तर पर थी, इसलिए अगर मैं उनकी समस्याएँ और मुश्किलें हल नहीं कर पाती थी तो कोई फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन अब मैं पर्यवेक्षक थी। अगर मैं उनकी मुश्किलें हल नहीं कर सकी तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वे कहेंगे कि मैं इस कर्तव्य के लायक नहीं हूँ? अगर मैं उनकी समस्याएँ हल न कर सकी और काम में कोई नतीजा न लाने के कारण मुझे बर्खास्त कर दिया गया तो यह कितना अपमानजनक होगा! सबको यह यकीन दिलाने के लिए कि मैं एक मानक-स्तरीय पर्यवेक्षक हूँ, मैं हर सभा में अपने उन कामों को अच्छे से करती थी जो मुझे आते थे, जैसे नए विश्वासियों की समस्याओं और मुश्किलों को समझना और अभ्यास का मार्ग बताना, या टीम अगुआओं के सिंचन कार्य में आए विचलनों को सुधारना। मैंने सोचा कि जब तक मैं टीम अगुआओं के काम को अच्छी तरह से सँभालती हूँ और काम से नतीजे मिलते हैं, मुझे नीची नजर से नहीं देखा जाएगा या बर्खास्त नहीं किया जाएगा। लेकिन मैं टीम अगुआओं से उनके कर्तव्यों में आने वाली मुश्किलों के बारे में शायद ही कभी पूछती थी—मुझमें पूछने की हिम्मत ही नहीं थी। मुझे डर था कि अगर मैंने पूछा और मैं उन्हें हल नहीं कर पाई, तो मेरी नाक कट जाएगी। यह खासकर तब होता था जब एक अगुआ हमारी सभाओं में आती थी। अपनी अच्छी छाप छोड़ने और उसे यह यकीन दिलाने के लिए कि मैं पर्यवेक्षक का कर्तव्य निभाने के लायक हूँ, मुश्किलें और समस्याएँ होने पर भी मैं मदद नहीं माँगती थी। मैं हमेशा ऐसा दिखावा करती थी जैसे मुझे कोई मुश्किल ही नहीं है। टीम अगुआओं की दशाओं को हल करते समय भी मैं बहुत सतर्क रहती थी। मैं अगुआ की संगति खत्म होने का इंतजार करती थी और फिर अपनी बात जोड़ती थी और चंद शब्दों की संगति करती थी, ताकि यह दिखाऊँ कि मेरे दृष्टिकोण भी बिल्कुल वही हैं जो उसके हैं। इस तरह वह मेरी कमियों या विचलनों को नहीं देख पाती थी।

कुछ समय बाद, मैंने टीम अगुआओं को शिकायत करते हुए सुना कि वे सिर्फ काम के लिए भाग-दौड़ पर ध्यान दे रहे थे, लेकिन उन्हें कोई जीवन प्रवेश हासिल नहीं हुआ था। मुझे बहुत अपराध-बोध हुआ। मैं जानती थी कि अगर सभाएँ सिर्फ काम की निगरानी करने के लिए होती हैं और उनकी मुश्किलें हल नहीं करतीं, तो इससे भाई-बहनों के जीवन प्रवेश पर असर पड़ेगा, और वे अपने कर्तव्यों में अच्छे नतीजे नहीं पाएँगे। मैंने सोचा कि भविष्य की सभाओं में काम के मामलों पर आगे बढ़ने से पहले उनकी मुश्किलें हल करूँ। लेकिन फिर मुझे चिंता हुई, “अगर मैं उन्हें हल न कर पाई तो? क्या यह बहुत शर्मनाक नहीं होगा?” इसलिए मैं फिर से उस तरह से अभ्यास करने के लिए तैयार नहीं हुई। मैं टीम अगुआओं की दशा के बारे में तभी पूछती थी जब वे पहले ही बहुत खराब हो चुकी होती थीं और मेरे पास कोई चारा नहीं होता था। कभी-कभी, जब मैं उनकी समस्याओं को साफ-साफ नहीं देख पाती थी और मुझे समझ नहीं आता था कि क्या करूँ, तो मैं खुलकर बात करना और साथ मिलकर समाधान खोजना नहीं चाहती थी। मैं बस खुद को परमेश्वर के वचनों का कोई अंश ढूँढ़ने और काम चलाने के लिए कुछ लापरवाही भरी संगति करने पर मजबूर करती थी। और इस तरह, मैं अपने भाई-बहनों द्वारा नीची नजर से देखे जाने के लगातार डर की दशा में जीती थी। मैं सभाओं के दौरान खास तौर से दमित महसूस करती थी और अंधकार और पीड़ा में जीती थी, मैं इससे मुक्त होने में असमर्थ थी। मैं यह कर्तव्य निभाने के लिए सहमत होने पर पछताती तक थी।

बाद में मैंने अपनी दशा के बारे में भाई-बहनों के सामने खुलकर बात की। एक बहन ने कहा कि मैंने खुद को बहुत ऊँचा समझ लिया है, और उसने मेरे पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचनों का एक अंश भी ढूँढ़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सभी भ्रष्ट इंसानों में एक सामान्य खामी होती है : जब उनके पास रुतबा नहीं होता, तो वे दूसरों से बातचीत करते या बोलते समय कोई अकड़ नहीं दिखाते या कोई खास तरीका नहीं अपनाते। उनकी बोली में कोई बनावटी लहजा नहीं होता और वह साधारण और सामान्य होती है। वे दिखावा नहीं करते या इस बात की चिंता नहीं करते कि दूसरे उनके बारे में क्या सोचते हैं। वे कोई मनोवैज्ञानिक दबाव महसूस नहीं करते और वे खुलकर दूसरों के साथ संगति और दिल से दिल की बातें करने में सक्षम होते हैं। दूसरों को लगता है कि वे मिलनसार और सहज हैं और सोचते हैं कि वे काफी अच्छे हैं। जैसे ही उन्हें कोई रुतबा प्राप्त होता है, वे घमंडी बन जाते हैं, साधारण लोगों की अनदेखी करते हैं, कोई उन तक नहीं पहुँच सकता; उन्हें लगता है कि वे श्रेष्ठ हैं और आम लोगों से भिन्न हैं। वे आम इंसान को हेय समझते हैं, बोलते समय श्रेष्ठता का भाव दिखाते हैं और दूसरों के साथ खुलकर संगति करना बंद कर देते हैं। वे अब खुले तौर पर संगति क्यों नहीं करते हैं? उन्हें लगता है कि अब उनके पास रुतबा है और वे अगुआ हैं। उन्हें लगता है कि अगुआओं की एक निश्चित छवि होनी चाहिए, उन्हें साधारण लोगों की तुलना में अधिक ऊँचा होना चाहिए, उनके पास अधिक बड़ा आध्यात्मिक कद और सहनशीलता होनी चाहिए; वे मानते हैं कि आम लोगों की तुलना में, अगुआओं में अधिक धैर्य होना चाहिए, उन्हें अधिक कष्ट उठाने और खपने में समर्थ होना चाहिए और शैतान के किसी भी प्रलोभन का प्रतिरोध करने में सक्षम होना चाहिए। भले ही उनके माता-पिता या परिवार के दूसरे सदस्य मर जाएँ, उन्हें लगता है कि उनमें रोने से बचने का आत्म-नियंत्रण होना चाहिए या उन्हें दूसरों के सामने रोने के बजाय, छिपकर, किसी की नजरों से दूर रोना चाहिए। वे सोचते हैं कि वे किसी को भी अपनी कमियों या खामियों या अपनी किसी भी कमजोरी को देखने नहीं दे सकते और वे किसी को यह भी पता नहीं चलने दे सकते कि वे नकारात्मक हो गए हैं; इसके बजाय, उन्हें ऐसी सभी चीजों को छिपाना ही चाहिए। वे मानते हैं कि रुतबे वाले व्यक्ति को ऐसा ही करना चाहिए। जब वे इस हद तक अपना दमन करते हैं, तो क्या रुतबा उनका परमेश्वर, उनका प्रभु नहीं बन गया है? और ऐसा होने पर, क्या उनमें अभी भी सामान्य मानवता है? जब उनमें ये विचार होते हैं, वे खुद को इस दायरे में रखते हैं और इस तरह का छद्मवेश धारण करते हैं, तो क्या वे रुतबे के प्रति आसक्त नहीं हो गए हैं?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, रुतबे के प्रलोभनों और बंधनों का समाधान कैसे करें)। परमेश्वर के वचनों के इस अंश ने सीधे मेरी दशा के बारे में बताया। मुझे एहसास हुआ कि मैं हमेशा अंधकार में जीती रही, इससे मुक्त होने में असमर्थ थी, क्योंकि मैं रुतबे के बंधनों के बीच जी रही थी। पर्यवेक्षक बनने से पहले, मैं दूसरे टीम अगुआओं के ही स्तर पर थी; हमारे बीच रुतबे का कोई फर्क नहीं था। भले ही मेरा जीवन प्रवेश थोड़ा सतही था और कुछ समस्याओं को मैं हल नहीं कर पाती थी, फिर भी मैं कोई दबाव महसूस नहीं करती थी। लेकिन पर्यवेक्षक बनने के बाद से ही मैंने खुद को ऊँचा समझ लिया। मुझे लगा कि चूँकि मैं उनके काम की प्रभारी हूँ, मुझे हर तरह से उनसे बेहतर होना होगा, और अगर कुछ ऐसा हुआ जो मैं नहीं जानती या नहीं कर सकती तो वे मुझे नीची नजर से देखेंगे और कहेंगे कि मैं इस कर्तव्य के लायक नहीं हूँ। ताकि टीम अगुआ मुझे नीची नजर से न देखें, मैं सभाओं के दौरान उनकी दशा के बारे में नहीं पूछती थी और केवल कार्य की जाँच करती थी। जब मेरी अगुआ सभाओं में आती थी, तो मुझे डर था कि मेरी अपनी समस्याएँ उसके सामने उजागर हो जाएँगी, इसलिए मैं अपनी कमियों को छिपा लेती थी। मैं काम में आने वाली मुश्किलों की रिपोर्ट नहीं करती थी, अगुआ के सामने झूठी छाप छोड़ती थी ताकि वह सोचे कि मैं समस्याएँ हल कर सकती हूँ और पर्यवेक्षक के कर्तव्य के लायक हूँ। पर्यवेक्षक बनने के बाद, मैंने यह नहीं सोचा कि अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कैसे निभाऊँ या भाई-बहनों की मुश्किलें कैसे हल करूँ। मैं बस यही सोचती थी कि अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा कैसे करूँ। मैं वाकई बहुत स्वार्थी थी!

बाद में, मैंने खोजा और विचार किया : मैं अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा करने के लिए क्यों हमेशा मुखौटा पहनती थी और छद्मवेश धारण करती थी? कौन-सा भ्रष्ट स्वभाव इसे नियंत्रित कर रहा था? मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “कोई भी सत्य, सही वचन और सकारात्मक चीज उन सब लोगों के लिए हैं जो सत्य से प्रेम करते हैं, परमेश्वर के वचनों से प्रेम करते हैं और परमेश्वर के लिए प्रचंड आकांक्षा रखते हैं। जिन लोगों के पास ये योग्यताएँ नहीं हैं, वे सत्य सुनने के बाद यह भी कहेंगे कि सत्य सही है और सत्य अच्छा है, लेकिन वे इस पर विचार करेंगे और सोचेंगे, ‘मैं किस चीज के लिए जीता हूँ? मैं प्रतिष्ठा, रुतबे, मुकुटों, आभामंडलों और परमेश्वर के पुरस्कारों के लिए जीता हूँ। इनके बिना भी क्या मुझमें गरिमा है? मेरे जीवन का क्या अर्थ है? क्या परमेश्वर में आस्था पुरस्कारों और मुकुटों के पीछे दौड़ने का एक साधन भर नहीं है? अब जबकि मैंने अपने दिल का इतना रक्त खपा दिया है, और इतने लंबे इंतजार के बाद आखिरकार समय आ गया है कि परमेश्वर अच्छे लोगों को पुरस्कृत करे और दुष्टों को दंड दे। यही वह समय है जब मुझे मुकुट पहनाया जाना चाहिए और अपना पुरस्कार प्राप्त करना चाहिए। मैं इसे किसी और को कैसे दे सकता हूँ? एक सामान्य व्यक्ति, साधारण व्यक्ति, अन्य सभी सीधे-सादे लोगों जैसा, इस तरह जीने का क्या मतलब है? मैं इतना मूर्ख नहीं हूँ!’ क्या ऐसा व्यक्ति लाइलाज नहीं है? (बिल्कुल है।) ऐसे लोगों को मनाने की कोशिश मत करो। सत्य उनके लिए नहीं है, और वे जो चाहते हैं वह सत्य नहीं है। इस तरह का व्यक्ति सिर्फ आशीष और मुकुट चाहता है। उसकी इच्छाएँ और महत्वाकांक्षाएँ सामान्य लोगों के लिए आवश्यक सीमाओं से अधिक हैं। कुछ लोग कल्पना नहीं कर सकते कि ऐसा व्यक्ति रुतबे और सत्ता से क्यों चिपका रहता है और इन्हें छोड़ क्यों नहीं देता। यह ऐसे व्यक्ति का सार और जन्मजात प्रकृति है। तुम इसका पता नहीं लगा सकते क्योंकि तुम्हारा सार उनसे अलग है, और न ही वे तुम्हें समझ सकते हैं। वे नहीं जानते कि तुम इतने मूर्ख क्यों हो। तुम बने-बनाए मुकुट, आभामंडल और प्रतिष्ठा नहीं चाहते, बल्कि एक साधारण व्यक्ति होना चाहते हो। उन्हें तुम अबूझ लगते हो। इस तरह का व्यक्ति सोचता है, ‘तुम निष्ठापूर्वक सत्य का अनुसरण करते हो, परमेश्वर जो कहता है उसका अभ्यास करते हो, वही करते हो जो परमेश्वर तुमसे करने के लिए कहता है और जो कुछ भी परमेश्वर तुमसे करने के लिए कहता है उसके प्रति समर्पण करते हो। तुम इतने मूर्ख कैसे हो सकते हो?’ उन्हें लगता है कि एक ईमानदार व्यक्ति होना और सत्य का अभ्यास करना मूर्ख, अज्ञानी और मंदबुद्धि होना है। वे मानते हैं कि ज्ञान का अनुसरण करने और एक श्रेष्ठ व्यक्ति की भूमिका निभाने के कारण वे चतुर हैं। यह सोचते हुए कि वे सब कुछ समझते हैं, वे यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि ‘ऐसे व्यक्ति का जीवन ही बेकार है जिसके पास रुतबे और प्रतिष्ठा का अभाव है, जिसके सिर पर कोई मुकुट नहीं है, जिसका लोगों के बीच कोई मूल्य नहीं है और जिसके पास बोलने का अधिकार नहीं है। अगर व्यक्ति प्रसिद्धि के लिए नहीं जीता तो उसे निजी लाभ के लिए जीना चाहिए। अगर वह निजी लाभ के लिए नहीं जीता तो उसे प्रसिद्धि के लिए जीना चाहिए।’ क्या यह शैतान का तर्क नहीं है? शैतान के तर्क से जीने पर उनका कोई इलाज नहीं है। वे कभी परमेश्वर का कोई वचन, कोई सकारात्मक चीज या सही सलाह नहीं स्वीकार सकते। अगर वे इसे नहीं स्वीकार सकते तो क्या किया जा सकता है? हम ये वचन उनके लिए नहीं कहते हैं। ये वचन सिर्फ सामान्य मानवता वाले लोगों के लिए, सिर्फ परमेश्वर के लिए प्रचंड आकांक्षा वाले लोगों के लिए कहे जाते हैं। ये सिर्फ इन्हीं लोगों के लिए हैं। सिर्फ ये लोग ही ईमानदारी से परमेश्वर के वचन सुनकर उन पर विचार कर सकते हैं, सत्य की समझ प्राप्त कर सकते हैं, सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकते हैं, परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार अपने कर्तव्य निभा सकते हैं, परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए परिवेश में परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव कर सकते हैं और धीरे-धीरे सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो अपने हृदय में सकारात्मक चीजों और परमेश्वर के वचनों के प्रति अवमानना और शत्रुता रखते हैं, वे यह स्वीकार करने के इच्छुक नहीं होते हैं कि वे एक साधारण और मामूली जीवन जिएँ, एक सामान्य व्यक्ति बनें, निष्ठापूर्वक परमेश्वर के सामने आएँ और जिन मामलों को वे नहीं समझते उनके संबंध में दिल की गहराइयों से खोज और इंतजार करें। वे ऐसा व्यक्ति बनने से संतुष्ट नहीं हैं। इसलिए ऐसे व्यक्ति को बचाया जाना असंभव है। स्वर्ग का राज्य इन लोगों के लिए नहीं बनाया गया था(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के वचनों को सँजोना परमेश्वर में विश्वास की नींव है)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि परमेश्वर उन्हें बचाता है जो सत्य से प्रेम और इसे स्वीकार करते हैं। जब परमेश्वर ऐसे लोगों के लिए परिवेश बनाता है, तो वे सत्य खोज पाते हैं, अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को छोड़ पाते हैं और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास कर पाते हैं। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, वे केवल अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की इच्छा पूरी करने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं और अपना कर्तव्य निभाते हैं। वे चाहे जो भी करें, वे केवल इस बात पर विचार करते हैं कि क्या इससे उनकी प्रतिष्ठा और उनके रुतबे को फायदा होगा, न कि अपना कर्तव्य इस तरह से कैसे करें जो परमेश्वर के इरादे के अनुरूप हो। ऐसे लोग परमेश्वर द्वारा नापसंद और तिरस्कृत किए जाते हैं। मैं इस शैतानी जहर से प्रभावित थी, “एक व्यक्‍ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है,” और मैंने प्रतिष्ठा और रुतबे को अपने अनुसरण का सही लक्ष्य मान लिया था। मैं हमेशा प्रशंसा पाना चाहती थी और कभी नीची नजर से नहीं देखा जाना चाहती थी। जब कलीसिया ने मेरे लिए पर्यवेक्षक का कर्तव्य करने की व्यवस्था की, तो मैं अच्छी तरह से जानती थी कि मेरा जीवन प्रवेश काफी उथला है और जब मैं ऐसी समस्याओं और मुश्किलों का सामना करती हूँ जिन्हें मैं हल नहीं कर सकती, तो इनका समाधान करने के लिए मुझे टीम अगुआओं के साथ प्रार्थना करनी चाहिए और मिलकर सत्य खोजना चाहिए। लेकिन मुझे डर था कि इस तरह से अभ्यास करने से मेरी बहुत सारी कमियाँ उजागर हो जाएँगी और वे मुझे नीची नजर से देखेंगे। इसलिए सभाओं के दौरान मैं उनकी मुश्किलें हल करती ही नहीं थी और केवल कार्य के अनुवर्तन पर ध्यान देती थी। इस तरह से, न केवल टीम अगुआ यह देख सकते थे कि मेरे पास काम को सँभालने के लिए कुछ विचार हैं, बल्कि अगर काम से अच्छे नतीजे मिले तो मुझे बर्खास्त नहीं किया जाएगा। जब अगुआ सभाओं में आती थी, तो अपनी कमियाँ ढकने के लिए मैं अपनी बात जोड़ने से पहले यह इंतजार करती थी कि वह अपने दृष्टिकोण व्यक्त कर ले। कोई भी चीज जो मेरी असलियत उजागर कर सकती थी और दूसरों की नजरों में मेरी छवि को प्रभावित कर सकती थी, मैं उसे छिपाने की पूरी कोशिश करती थी, धोखेबाजी और छल-कपट का इस्तेमाल करती थी। मैं इतनी नीच थी! हालाँकि मैंने अपनी अगुआ और टीम अगुआओं को अस्थायी रूप से मूर्ख बनाने के लिए बहुत दिमाग लगाया, पर मैं न तो एक ईमानदार व्यक्ति थी और न ही सही रास्ते पर चल रही थी और मैं परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकती थी। मुझे अपने कर्तव्य में परमेश्वर का मार्गदर्शन नहीं मिल सका और कलीसिया का कार्य प्रभावित हुआ। क्या यह परमेश्वर द्वारा तथ्यों के आधार पर मेरा न्याय करना नहीं था? मैं अपनी सराहना कराने के लिए लोगों को गुमराह करने में धोखे का इस्तेमाल कर रही थी, लेकिन समय के साथ, भाई-बहन आखिरकार मेरा भेद पहचान जाते, और अंत में, मैं उनके द्वारा ठुकरा दी जाती। इस बारे में सोचते हुए मुझे डर लगा। अगर मैंने पश्चात्ताप न किया तो मुझे बर्खास्त किए जाने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। इससे भी बुरी बात, मैं परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत कर दी जाऊँगी और छोड़ दी जाऊँगी।

बाद में, मैंने अपनी समस्याओं से संबंधित सत्य खोजे। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “मुझे बताओ, तुम साधारण और सामान्य व्यक्ति कैसे बन सकते हो? जैसा कि परमेश्वर कहता है, कैसे तुम एक सृजित प्राणी का उचित स्थान ग्रहण कर सकते हो, कैसे तुम कोई महान हस्ती या अतिमानव बनने की कोशिश नहीं कर सकते हो? एक साधारण और सामान्य इंसान बनने के लिए तुम्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए? यह कैसे प्राप्त किया जा सकता है? कौन बोलना चाहेगा? (सबसे पहले, हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम साधारण लोग हैं, बहुत ही आम लोग हैं और ऐसी बहुत-सी बातें हैं जो हमारी समझ में नहीं आती हैं, जिन्हें हम नहीं समझते और जिनकी असलियत नहीं देख सकते। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हम भ्रष्ट और त्रुटिपूर्ण हैं। उसके बाद, हमारे पास एक सच्चा दिल होना चाहिए और खोजने के लिए अक्सर परमेश्वर के सामने आना चाहिए।) सबसे पहले, खुद को कोई उपाधि मत दो और फिर खुद को सीमित मत होने दो, यह कहते हुए, ‘मैं अगुआ हूँ, मैं टीम का प्रभारी हूँ, मैं पर्यवेक्षक हूँ या मैं इस क्षेत्र में सबसे अधिक जानकार और तकनीकी रूप से कुशल व्यक्ति हूँ।’ अपनी खुद की दी हुई उपाधि से बाधित मत हो। जैसे ही ऐसा होता है, यह तुम्हें कसकर बाँध देगा; तुम्हारी कथनी-करनी इससे प्रभावित होगी, साथ ही तुम्हारी सामान्य सोच और निर्णय भी। तुम्हें इस रुतबे की बाधाओं से खुद को मुक्त करना चाहिए। सबसे पहले, इस आधिकारिक उपाधि के स्थान से नीचे उतरो और एक साधारण व्यक्ति का स्थान ग्रहण करो। तब तुम्हारी मानसिकता कुछ हद तक सामान्य हो जाएगी। तुम्हें यह भी स्वीकार करना है : ‘मैं नहीं जानता कि इसे कैसे करना है और मैं उस चीज को नहीं समझता हूँ—मुझे कुछ शोध और अध्ययन करना है’ या ‘मैंने इसका कभी अनुभव नहीं किया है, इसलिए मुझे नहीं पता कि क्या करना है।’ जब तुम वह कह सकते हो जो तुम वास्तव में सोच रहे हो और इस तरह ईमानदारी से बोल सकते हो, तो तुम सामान्य विवेक से युक्त होगे। यदि तुम दूसरों को अपनी असलियत जानने देते हो, तो वे तुम्हारे बारे में एक सामान्य दृष्टिकोण रखेंगे और तुम्हें कोई मुखौटा नहीं लगाना पड़ेगा। तुम अब भारी दबाव महसूस नहीं करोगे और तुम दूसरों के साथ सामान्य रूप से संवाद कर पाओगे। इस तरह जीना मुक्त और सहज है। जिस किसी को भी जीवन बहुत ही थकाऊ लगता है, इसके लिए वह खुद ही दोषी है। कुछ भी दिखावा मत करो या छिपाओ मत। सबसे पहले, अपने दिल में जो सोच रहे हो और अपने सच्चे विचारों के बारे में खुलकर बताओ, ताकि हर कोई उन्हें जाने और समझे। इस तरह, तुम्हारी चिंताएँ, साथ ही तुम्हारे और दूसरों के बीच की बाधाएँ और संदेह, सब समाप्त हो जाएँगे। इसके अलावा, एक और चीज भी है जो तुम्हें बाँध रही है, वह यह है कि तुम हमेशा खुद को टीम का मुखिया, एक अगुआ या कार्यकर्ता, पदवी, रुतबे और हैसियत वाला कोई व्यक्ति मानते हो—अगर तुम फिर कहते हो कि तुम यह नहीं समझते और वह करने में असमर्थ हो, तो क्या यह खुद को नीचा दिखाना नहीं है? जब तुम अपने दिल की इन बेड़ियों को तोड़ देते हो, जब तुम खुद को अगुआ या कार्यकर्ता समझना बंद कर देते हो और जब तुम यह सोचना बंद कर देते हो कि तुम दूसरे लोगों से बेहतर हो और इसके बजाय महसूस करते हो कि तुम एक साधारण व्यक्ति हो, जो बाकी सब जैसा ही है और यह कि कुछ क्षेत्रों में तुम दूसरों से कमतर हो, फिर जब तुम इस मानसिकता के साथ सत्य और काम से संबंधित मामलों पर संगति करते हो, तो नतीजे और माहौल दोनों अलग होंगे। ... सभी लोग, चाहे वे अगुआ और कार्यकर्ता हों या भाई-बहन, एक साधारण व्यक्ति हैं। उन सभी को इस सिद्धांत का अभ्यास करना चाहिए। परमेश्वर के वचनों के अभ्यास में सभी की हिस्सेदारी और जिम्मेदारी है। तुम कोई अगुआ, कार्यकर्ता, टीम के प्रमुख, पर्यवेक्षक या समूह के बीच से कोई अत्यधिक सम्मानित व्यक्ति हो सकते हो। चाहे तुम कोई भी हो, तुम्हें इस तरह से अभ्यास करना सीखना चाहिए। तुम जो प्रभामंडल और उपाधि अपने सिर पर धारण करते हो, उसे उतार दो, दूसरों ने जो ताज तुम्हें पहनाए हैं, उन्हें उतार दो। तब, तुम्हारे लिए एक सामान्य व्यक्ति बनना आसान होगा और तुम आसानी से अंतरात्मा और विवेक के आधार पर कार्य करोगे। बेशक, इसके बाद, सिर्फ यह स्वीकारना काफी नहीं है कि तुम समझते नहीं और जानते नहीं। यह समस्या हल करने वाला अंतिम समाधान नहीं है। अंतिम समाधान क्या है? प्रार्थना करने और खोजने के लिए मामले और कठिनाइयाँ परमेश्वर के सामने लाओ। एक व्यक्ति के लिए अकेले प्रार्थना करना पर्याप्त नहीं है। इसके बजाय, तुम्हें सभी के साथ मिलकर इस मामले के संबंध में प्रार्थनाएँ करनी चाहिए और यह जिम्मेदारी और दायित्व उठाना चाहिए। यह काम करने का एक शानदार तरीका है! तुम कोई महान हस्ती और अतिमानव बनने की कोशिश करने का मार्ग अपनाने से बचोगे। अगर तुम ऐसा कर सको, तो तुम अनजाने ही एक सृजित प्राणी का उचित स्थान ग्रहण कर लोगे और अतिमानव और महान हस्ती बनने की महत्वाकांक्षा और इच्छा की बेबसी से खुद को मुक्त कर लोगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के वचनों को सँजोना परमेश्वर में विश्वास की नींव है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे परमेश्वर का इरादा समझ में आ गया और अभ्यास और प्रवेश का मार्ग मिल गया। रुतबे के बंधन और सीमाओं से निकलने के लिए मुझे अपने ऊँचे आसन से उतरना था, खुद को इतना ऊँचा समझना बंद करना था और यह मानना था कि मैं बस एक साधारण इंसान हूँ, किसी भी दूसरे से कतई बेहतर नहीं हूँ। मुझे परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार व्यावहारिक तरीके से आचरण करना था और जमीर और विवेक वाला एक साधारण, सामान्य व्यक्ति बनना था। मुझे खुद को प्रशिक्षित करने का मौका देने के लिए परमेश्वर ने मुझे पर्यवेक्षक बनने के अवसर से अनुगृहीत किया। लेकिन चूँकि मेरा असली आध्यात्मिक कद नहीं बदला था और मेरा जीवन प्रवेश सतही था, मैं उन चीजों की असलियत नहीं जान सकती थी जिनका मैंने अनुभव नहीं किया था, और कुछ समस्याएँ इतनी जटिल थीं कि मैं उन्हें हल नहीं कर सकती थी—यह सब बिल्कुल सामान्य था। मुझे परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए, और इन समस्याओं को हल करने के लिए सबके साथ खुलकर बात करनी चाहिए और सत्य खोजना चाहिए। उसके बाद, मैंने परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास करना और प्रवेश करना शुरू किया। जब भी मेरे सामने कुछ ऐसा आता जिसे मैं साफ-साफ नहीं देख पाती, मैं खुलकर बात करती, खुद को बेनकाब करती और टीम अगुआओं के साथ संगति करती और खोजती थी।

बाद में, मैं सिंचन टीम अगुआओं के साथ एक सभा में गई। शुरू होने से पहले, मैंने सोचा, “सीसीपी की गिरफ्तारियों के शत्रुतापूर्ण माहौल के कारण हम कुछ समय से आमने-सामने नहीं मिले हैं। भाई-बहनों को बहुत-सी मुश्किलें और समस्याएँ होंगी जिन्हें लेकर संगति करने और हल निकालने की जरूरत है। अगर मैं उनकी असलियत नहीं जान सकी और उन्हें हल नहीं कर पाई तो? क्या वे मुझे नीची नजर से देखेंगे?” मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से प्रतिष्ठा और रुतबे के बारे में सोच रही हूँ, इसलिए मैंने अपने दिल में प्रार्थना की, परमेश्वर से आग्रह किया कि वह मेरे दिल की रक्षा करे ताकि मैं अपनी कमियों के बारे में खुलकर बात कर सकूँ और सबके साथ खोज और प्रवेश कर सकूँ। प्रार्थना करने के बाद मैंने थोड़ा-सा और अधिक शांत महसूस किया। मैंने पहले टीम अगुआओं की दशा के बारे में पूछा। मैंने सुना कि उनमें से एक को इस बात से समस्या थी कि अगुआ कार्य का अनुवर्तन कैसे कर रहा है। मुझे नहीं पता था कि इसे हल करने के लिए हमें परमेश्वर के वचनों के किस पहलू को देखना चाहिए, इसलिए मैंने बस सबके सामने खुलकर बात की और उनसे कहा कि वे समाधान निकालने में मदद के लिए मिलकर सत्य खोजें। उस पल मुझे सत्य के इस पहलू का ख्याल आया कि दूसरों के पर्यवेक्षण को कैसे लें, इसलिए मैंने इसे ढूँढ़ा और हमने इसे साथ मिलकर पढ़ा। इसे पढ़ने के बाद सबने कहा कि परमेश्वर के ये वचन बहुत अच्छे हैं और इस समस्या को हल कर सकते हैं। यूँ तो मुझमें अभी भी बहुत-सी कमियाँ थीं, लेकिन जब मैंने प्रतिष्ठा और रुतबे की खातिर मुखौटा लगाना और छद्मवेश धारण करना बंद कर दिया और मैं परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करने की इच्छुक हुई, तो मुझे परमेश्वर का मार्गदर्शन मिल सका, और मैंने टीम अगुआओं की कुछ समस्याएँ हल कर दीं। कभी-कभी, खुलकर बात करने और खोजने से, मैं भाई-बहनों की अनुभवजन्य समझ से कुछ रोशनी और अंतर्दृष्टि भी पा सकती थी। मैं परमेश्वर की बहुत कृतज्ञ हूँ।

बाद में भाई-बहनों के एक अनुस्मारक ने मुझे एहसास कराया कि मेरे उथले जीवन प्रवेश और टीम अगुआओं की समस्याओं को हल करने में मेरी असमर्थता का मुख्य कारण यह था कि मैं अपने कर्तव्य में हमेशा सिर्फ चीजों को करने पर ध्यान देती थी, न कि अपने जीवन प्रवेश पर। अगर मैं इसी तरह चलती रही तो मैं निश्चित रूप से अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं निभा पाऊँगी, इसलिए मैंने इस पहलू में परमेश्वर के वचन खोजे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सत्य को स्वीकार करना और सत्य का अनुसरण करना उद्धार पाने का सबसे यथार्थवादी, व्यावहारिक मार्ग है। यदि तुम सत्य प्राप्त नहीं कर सकते, तो तुम व्यर्थ में परमेश्वर में विश्वास करते हो। जो लोग खोखले शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलते हैं, जो हमेशा नारे लगाते हैं, बड़े-बड़े विचार उछालते हैं और सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित किए बिना हमेशा विनियमों का पालन करते हैं, उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता, चाहे वे कितने भी वर्षों तक विश्वास करें। वे कौन लोग हैं जिन्हें कुछ हासिल होता है? जो लोग सच्चे मन से अपना कर्तव्य करते हैं और सत्य का अभ्यास करने को तैयार हैं, जो परमेश्वर ने उन्हें जो सौंपा है उसके प्रति अपने मिशन की तरह व्यवहार करते हैं, जो स्वेच्छा से अपना पूरा जीवन परमेश्वर के लिए खुद को खपाने में बिताते हैं और अपने भले के लिए साजिश नहीं रचते, जो व्यावहारिक रूप से आचरण करते हैं और परमेश्वर के आयोजनों का पालन करते हैं। अपना कर्तव्य करते समय, ऐसे लोग सत्य सिद्धांतों को ग्रहण करने, प्रत्येक कार्य को सावधानीपूर्वक अच्छी तरह से करने, परमेश्वर की गवाही देने का नतीजा हासिल करने और परमेश्वर के इरादों को पूरा करने में सक्षम होते हैं। अपना कर्तव्य करते समय जब वे कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो वे परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं और परमेश्वर के इरादों को समझने की कोशिश कर सकते हैं, वे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का पालन कर सकते हैं, वे चीजें करते समय सत्य की तलाश कर सकते हैं और सत्य का अभ्यास कर सकते हैं। वे नारे नहीं लगाते या बड़े-बड़े विचार नहीं उछालते, बल्कि केवल व्यावहारिक रूप से काम करने पर और सिद्धांतों के अनुसार मामलों को बहुत सावधानीपूर्वक सँभालने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं उसमें अपना दिल लगाते हैं और हर चीज का अनुभव अपने दिल से करते हैं। अधिकांश मामलों में, वे सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं, अनुभव के माध्यम से ज्ञान और समझ प्राप्त कर सकते हैं, सबक सीख सकते हैं और वास्तविक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। और जब उनमें गलत विचार या गलत दशाएँ होती हैं, तो वे परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं और उनका समाधान करने के लिए सत्य की तलाश कर सकते हैं। चाहे वे कोई भी सत्य समझें, उनके पास अनुभव और अंतर्दृष्टि होती है और वे अपनी अनुभवजन्य गवाही साझा करने में सक्षम होते हैं। ऐसे लोग अंततः सत्य प्राप्त कर सकते हैं। जो विचारहीन होते हैं वे कभी भी अपने दिलों में सत्य का अभ्यास करने के मामलों पर विचार नहीं करते। वे केवल प्रयास करने और कार्रवाई करने पर और खुद को प्रदर्शित करने और दिखावा करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि कभी यह नहीं तलाशते कि सत्य का अभ्यास कैसे करें। इससे उनके लिए सत्य प्राप्त करना कठिन हो जाता है। इसके बारे में सोचो—ठीक किस तरह के लोग सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं? (जो लोग चीजों में अपना दिल लगाते हैं, जो यथार्थवादी हैं और जो अपने कर्तव्यों को व्यावहारिक तरीके से करते हैं।) यह सही है। केवल वे जो अपने कर्तव्यों को व्यावहारिक रूप से करते हैं और लगन से सत्य की तलाश करते हैं, वे ही सत्य को समझ सकते हैं और वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। इसके अलावा, ऐसे लोग सभी चीजों में व्यावहारिक बातों पर ध्यान केंद्रित करते हैं; वे अपेक्षाकृत यथार्थवादी होते हैं, सकारात्मक चीजों से प्रेम करते हैं, सत्य को स्वीकार करने और सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होते हैं, अंततः वे सत्य प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं। तुम लोग किस प्रकार के व्यक्ति हो? (अव्यावहारिक, जो हमेशा दिखावे के लिए काम करना चाहता है, और छल-कपट पर निर्भर रहता है।) क्या ऐसा करने से कुछ हासिल हो सकता है? (नहीं।) क्या तुम्हें अपनी समस्याओं को हल करने का तरीका मिल गया है? यदि तुम इसे पहचानकर चीजों को बदलना शुरू करते हो, तो क्या यह जान पाओगे कि चीजों पर तुम्हारी धारणाओं, कल्पनाओं और दृष्टिकोण में बदलाव हुआ है या नहीं? (मुझे लगता है कि उनमें कुछ हद तक बदलाव हुए हैं।) जब तक परिणाम मिलते हैं और प्रगति होती है, तुम्हें उस पर संगति करनी चाहिए और दूसरों को शिक्षित होने देना चाहिए। भले ही तुम्हारा अनुभव सीमित है, फिर भी यह जीवन में विकास का अनुभव है। परमेश्वर में विश्वास करने का तुम्हारा अनुभव और परमेश्वर के वचन का अनुभव करते हुए जीवन में प्रगति करना ही जीवन में विकास की प्रक्रिया है। ये अनुभव सबसे अधिक मूल्यवान हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर पर विश्वास करने में सबसे महत्वपूर्ण उसके वचनों का अभ्यास और अनुभव करना है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि मेरा जीवन प्रवेश सतही इसलिए था क्योंकि, अपने कर्तव्य में, मैं आम तौर पर केवल प्रयास और काम करने और काम के नतीजों में सुधार करने पर ध्यान देती थी ताकि दूसरे मेरा आदर करें। मैंने तमाम चीजों में सत्य खोजने और परमेश्वर के इरादे को समझने, उसकी अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास करने पर ध्यान नहीं देती थी। यही वजह है कि इतने लंबे समय तक परमेश्वर में विश्वास करने के बावजूद मेरी जीवन संवृद्धि अधिक नहीं हुई थी। मैंने सोचा कि कैसे बहुत-से वर्षों तक प्रभु में विश्वास करने के बावजूद पौलुस कभी भी आत्म-चिंतन करने और खुद को जानने पर ध्यान नहीं देता था और उसे अपने भ्रष्ट स्वभाव की कतई कोई समझ नहीं थी। यूँ तो उसने सुसमाचार का प्रचार करते हुए बहुत अधिक कष्ट सहा, पर परमेश्वर का प्रतिरोध करने की उसकी प्रकृति बिल्कुल भी नहीं बदली और आखिरकार उसे हटा दिया गया। लेकिन पतरस ने छोटे-बड़े दोनों मामलों में परमेश्वर के इरादे को समझने की कोशिश पर ध्यान दिया। उसने न केवल अपनी भ्रष्टता और कमियों को समझा, बल्कि उसने तमाम चीजों में परमेश्वर के इरादे के अनुरूप कार्य करने का भी अनुसरण किया और आखिरकार, उसने परमेश्वर की स्वीकृति पाई। परमेश्वर में विश्वास में पतरस ने जो रास्ता अपनाया, वह जीवन प्रवेश का अनुसरण करने का था। उसका जीवन मूल्यवान और सार्थक था। भविष्य में मैं अपने कर्तव्य में केवल बाहरी कार्य करने पर ध्यान नहीं दे सकती; मुझे अपने जीवन प्रवेश और अपने स्वभाव में बदलाव पर ध्यान देना होगा। उसके बाद, मैंने सचेत रूप से इस बात पर विचार करना शुरू किया कि मैंने हर मामले में कौन-से भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए, और मैं अपनी समस्याओं से संबंधित परमेश्वर के वचन ढूँढ़ती थी और नोट्स लेती थी। कुछ समय तक इस तरह से अभ्यास करने के बाद, मुझे अपने भ्रष्ट स्वभावों के बारे में कुछ समझ मिली। मैंने अपने दिल में थोड़ा और सहज और शांत महसूस किया, और मैं चीजों को पहले से ज्यादा साफ-साफ देख सकती थी। मैंने जो यह थोड़ी-सी प्रगति की है, वह सब परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन का नतीजा है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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