1. आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आया है, और वह अपना कार्य करने के लिए देह बना है। यह कैसे हो सकता है? बाइबल का कहना है : “हे गलीली पुरुषो, तुम क्यों खड़े आकाश की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा” (प्रेरितों 1:11)। प्रभु यीशु द्वारा क्रूस पर चढ़ने का कार्य समाप्त करने के बाद, वह मृत्यु से जी उठा और अपने शिष्यों के सामने प्रकट हुआ। वह एक महिमामय आध्यात्मिक शरीर बन गया और स्वर्ग में आरोहित हुआ। जब प्रभु लौटता है, तो हमारे लिए उसे मृत्यु से जी उठे एक आध्यात्मिक शरीर के रूप में ही प्रकट होना चाहिए। आप यह क्यों कहते हैं कि परमेश्वर को देह बनना चाहिए और अंतिम दिनों में उसे मनुष्य के पुत्र के रूप में कार्य करना चाहिए।

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“तुम भी तैयार रहो; क्योंकि जिस घड़ी तुम सोचते भी नहीं, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा” (लूका 12:40)

“क्योंकि जैसे बिजली आकाश के एक छोर से कौंध कर आकाश के दूसरे छोर तक चमकती है, वैसे ही मनुष्य का पुत्र भी अपने दिन में प्रगट होगा। परन्तु पहले अवश्य है कि वह बहुत दुःख उठाए, और इस युग के लोग उसे तुच्छ ठहराएँ” (लूका 17:24-25)

“पिता किसी का न्याय नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है” (यूहन्ना 5:22)

“वरन् उसे न्याय करने का भी अधिकार दिया है, इसलिये कि वह मनुष्य का पुत्र है” (यूहन्ना 5:27)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

यीशु ने कहा था कि वह उसी तरह से आएगा जैसे वह गया था, किंतु क्या तुम उसके वचनों का सही अर्थ जानते हो? क्या ऐसा हो सकता है कि ऐसा उसने तुम लोगों के इस समूह से कहा हो? तुम केवल इतना ही जानते हो कि वह उसी तरह से आएगा जैसे वह गया था, एक बादल पर सवार होकर, किंतु क्या तुम जानते हो कि स्वयं परमेश्वर वास्तव में अपना कार्य कैसे करता है? यदि तुम सच में देखने में समर्थ होते, तब यीशु के द्वारा बोले गए वचनों को कैसे समझाया जाता? उसने कहा था : जब अंत के दिनों में मनुष्य का पुत्र आएगा, तो उसे स्वयं ज्ञात नहीं होगा, फ़रिश्तों को ज्ञात नहीं होगा, स्वर्ग के दूतों को ज्ञात नहीं होगा, और समस्त मनुष्यों को ज्ञात नहीं होगा। केवल पिता को ज्ञात होगा, अर्थात् केवल आत्मा को ज्ञात होगा। जिसे स्वयं मनुष्य का पुत्र नहीं जानता, तुम उसे देखने और जानने में सक्षम हो? यदि तुम जानने और अपनी आँखों से देखने में समर्थ होते, तो क्या ये वचन व्यर्थ में बोले गए नहीं होते? और उस समय यीशु ने क्या कहा था? “उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत और न पुत्र, परन्तु केवल पिता। जैसे नूह के दिन थे, वैसा ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा। ... इसलिए तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी के विषय में तुम सोचते भी नहीं हो, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा।” जब वह दिन आएगा, तो स्वयं मनुष्य के पुत्र को उसका पता नहीं चलेगा। मनुष्य का पुत्र देहधारी परमेश्वर के देह को संदर्भित करता है, जो एक सामान्य और साधारण व्यक्ति है। जब स्वयं मनुष्य का पुत्र भी नहीं जानता, तो तुम कैसे जान सकते हो? यीशु ने कहा था कि वह वैसे ही आएगा, जैसे वह गया था। जब वह आता है, तो वह स्वयं भी नहीं जानता, तो क्या वह तुम्हें अग्रिम रूप में सूचित कर सकता है? क्या तुम उसका आगमन देखने में सक्षम हो? क्या यह एक मज़ाक नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

परमेश्वर इसलिए देहधारी हुआ क्योंकि उसके कार्य का लक्ष्य शैतान की आत्मा, या कोई ऐसी चीज नहीं जो देह की न हो, बल्कि मनुष्य है, जो हाड़-माँस का बना है और जिसे शैतान ने भ्रष्ट कर दिया है। चूँकि इंसान की देह को भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिए परमेश्वर ने हाड़-माँस के मनुष्य को अपने कार्य का लक्ष्य बनाया है; इससे भी अधिक, चूँकि मनुष्य भ्रष्टता का लक्ष्य है इसी कारण से परमेश्वर ने उद्धार-कार्य के समस्त चरणों के दौरान मनुष्य को अपने कार्य का एकमात्र लक्ष्य के रूप में चुना है। मनुष्य एक नश्वर प्राणी है, देह और लहू से बना है, और एकमात्र परमेश्वर ही मनुष्य को बचा सकता है। इस प्रकार, परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए देहधारी होना होगा जिसमें मनुष्य के समान ही गुण हों, ताकि उसका कार्य बेहतर प्रभाव पैदा कर सके। परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए इसलिए देह धारण करना होगा क्योंकि मनुष्य हाड़-माँस से बना है और वह न तो पाप पर विजय पा सकता है और न ही स्वयं को शरीर से अलग कर सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

परमेश्वर द्वारा मनुष्य को बचाने का कार्य सीधे तौर पर आत्मा के माध्यम से और आत्मा की पहचान के साथ नहीं किया जाता, क्योंकि उसके आत्मा को मनुष्य द्वारा न तो छुआ जा सकता है, न देखा जा सकता है और न ही मनुष्य उसके निकट जा सकता है। अगर वह सीधे आत्मा के रूप में मनुष्य को बचाने का प्रयास करता तो मनुष्य उसका उद्धार प्राप्त करने में असमर्थ होता। यदि परमेश्वर एक सृजित मनुष्य का बाहरी रूप धारण न करता तो मनुष्य के लिए इस उद्धार को प्राप्त करने का कोई उपाय न होता। क्योंकि मनुष्य के पास उसके करीब आने का कतई कोई तरीका नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे कोई भी यहोवा के बादल के पास नहीं जा पाया था। केवल एक सृजित मनुष्य बनकर, यानी परमेश्वर जो देह बनने वाला है उस देह में अपने वचन को रखकर ही वह व्यक्तिगत रूप से वचन को उन सभी लोगों में सन्निविष्ट कर सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं। केवल तभी मनुष्य व्यक्तिगत रूप से उसके वचन को सुन और देख सकता है और उसके वचन को प्राप्त भी कर सकता है और इस तरीके से पूरी तरह बचाया जा सकता है। यदि परमेश्वर देहधारी न बनता तो देह और रक्त से बना कोई भी मनुष्य ऐसा महान उद्धार प्राप्त न कर पाता, न ही एक भी मनुष्य बचाया जाता। यदि परमेश्वर का आत्मा सीधे मानवजाति के बीच कार्य करता तो पूरी मानवजाति मार गिराई जाती या फिर परमेश्वर के संपर्क में आने का कोई उपाय न होने के कारण वह शैतान द्वारा पूरी तरह से बंदी बना ली जाती। प्रथम देहधारण मनुष्य को पाप से छुटकारा दिलाने के लिए था, उसे यीशु के दैहिक शरीर के माध्यम से छुटकारा दिलाने के लिए था, अर्थात् यीशु ने मनुष्य को सलीब से बचाया, किंतु शैतानी भ्रष्ट स्वभाव मनुष्य के भीतर अभी भी बचे रह गए। दूसरा देहधारण अब पापबलि के रूप में कार्य करने के लिए नहीं है, अपितु उन लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए है जिन्हें पाप से छुटकारा दिलाया गया था। यह इसलिए किया जाता है ताकि जिनके पापों को क्षमा किया जा चुका है वे अपने पाप से मुक्त और पूरी तरह से शुद्ध हो सकें और स्वभावगत बदलाव हासिल कर सकें और इस प्रकार शैतान के अंधकार के प्रभाव से मुक्त हो जाएँ और परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आएँ। केवल इसी तरीके से मनुष्य पूरी तरह से पावनीकृत हो सकता है। व्यवस्था के युग का अंत होने के बाद और अनुग्रह के युग के आरंभ से परमेश्वर ने उद्धार-कार्य शुरू किया, जो अंत के दिनों में जारी है, जब परमेश्वर मनुष्य की विद्रोहशीलता के लिए उसके न्याय और ताड़ना का कार्य करता है और इस प्रकार मानवजाति को पूरी तरह से शुद्ध करता है। केवल इसके बाद ही परमेश्वर उद्धार के अपने कार्य का समापन करेगा और विश्राम में प्रवेश करेगा। इसलिए, कार्य के तीन चरणों में परमेश्वर स्वयं मनुष्य के बीच अपना कार्य करने के लिए केवल दो बार देहधारी हुआ है। वह इसलिए, क्योंकि कार्य के तीन चरणों में से केवल एक चरण ही लोगों का जीवन जीने में मार्गदर्शन करने के लिए है, जबकि अन्य दो चरणों में उद्धार का कार्य शामिल है। केवल देहधारी होकर ही परमेश्वर मनुष्य के साथ रह सकता है, संसार के कष्ट का अनुभव कर सकता है और एक सामान्य दैहिक शरीर में रह सकता है। केवल इसी तरह से वह लोगों को उस व्यावहारिक वचन की आपूर्ति कर सकता है जिसकी उन्हें सृजित प्राणी होने के नाते आवश्यकता है। परमेश्वर के देहधारण के माध्यम से ही मनुष्य परमेश्वर से पूर्ण उद्धार प्राप्त करता है, न कि अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर में सीधे स्वर्ग से। मनुष्य देह और रक्त से बना है, उसके पास परमेश्वर के आत्मा को देखने का कोई उपाय नहीं है, उसके आत्मा के निकट पहुँचने की तो बात ही छोड़ दो, इसलिए मनुष्य जिसके संपर्क में आ सकता है वह सिर्फ परमेश्वर का देहधारी देह है। केवल इसी तरीके से मनुष्य समस्त वचन और सभी सत्य समझ पाता है और पूर्ण उद्धार प्राप्त कर पाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

देहधारी परमेश्वर पूरी तरह भ्रष्ट इंसान की आवश्यकताओं के कारण ही देह में आया है। यह परमेश्वर की नहीं, मनुष्य की आवश्यकताओं की वजह से है और परमेश्वर ने जो सारी कीमतें चुकाई हैं और जो सारी पीड़ा सही है वह मानवजाति के लिए हैं न कि स्वयं परमेश्वर के लाभ के लिए। परमेश्वर के लिए कोई नफा, नुकसान या प्रतिफल नहीं है; परमेश्वर जो प्राप्त करता है वह कुछ ऐसा नहीं होता जिसे वह काटता है, बल्कि वह होता है जो मूल रूप से उसका था। वह मानवजाति के लिए जो कुछ करता है और वे सारी कीमतें जो उसने मानवजाति के लिए चुकाई हैं उस सबके पीछे का उद्देश्य यह नहीं है कि वह कोई और अधिक प्रतिफल प्राप्त कर सके, बल्कि यह पूरी तरह मानवजाति के लिए है। यूँ तो देह में परमेश्वर के कार्य से अनेक अकल्पनीय मुश्किलें जुड़ी हैं, लेकिन यह अंततः जो प्रभाव प्राप्त करता है वे उन कार्यों से कहीं बढ़कर होते हैं जिन्हें आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किया जाता है। देह के कार्य में काफी बड़ी तादाद में कठिनाइयाँ होती हैं, देह वही पहचान धारण नहीं कर सकता जो आत्मा की होती है, वह आत्मा की तरह अलौकिक कार्य नहीं कर सकता, उसमें आत्मा के समान अधिकार होने का तो सवाल ही नहीं है। फिर भी इस मामूली देह के द्वारा किए गए कार्य का सार आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर किए गए कार्य से कहीं श्रेष्ठतर है और यह स्वयं देह ही है जिसकी आवश्यकता सभी लोगों को है। क्योंकि जिन्हें बचाया जाना है उनके लिए, आत्मा का उपयोगिता मूल्य देह की अपेक्षा कहीं अधिक निम्न है : आत्मा का कार्य संपूर्ण विश्व, सारे पहाड़ों, नदियों, झीलों और महासागरों को समाविष्ट करने में सक्षम है, मगर देह का कार्य और अधिक प्रभावकारी ढंग से प्रत्येक ऐसे व्यक्ति से सम्बन्ध रखता है जिसके साथ वो सम्पर्क में आता है। इसके अलावा, स्पर्शगम्य रूप वाली परमेश्वर की देह को मनुष्य के द्वारा बेहतर ढंग से समझा जा सकता है और उस पर भरोसा किया जा सकता है, और यह परमेश्वर के बारे में मनुष्य के ज्ञान को और गहरा कर सकती है, तथा मनुष्य पर परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों की और अधिक गहन छाप छोड़ सकती है। आत्मा का कार्य रहस्य से ढका हुआ है; इसकी भविष्यवाणी कर पाना नश्वर प्राणियों के लिए कठिन है, उनके लिए उसे देख पाना तो और भी मुश्किल है और इसलिए वे बिना किसी आधार के मात्र चीजों की कल्पना ही कर सकते हैं। लेकिन देह का कार्य सामान्य और व्यावहारिक है, उसके पास प्रचुर बुद्धि है, और एक ऐसी सच्चाई है जिसे नश्वर इंसान की आँखों द्वारा व्यक्तिगत रूप से देखा जा सकता है; इंसान परमेश्वर के कार्य की बुद्धि को व्यक्तिगत रूप से समझ सकता है, उसके लिए उसे अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाने की आवश्यकता नहीं है। यह देहधारी परमेश्वर के कार्य की सटीकता और उसका व्यावहारिक मूल्य है। आत्मा केवल उन्हीं कार्यों को कर सकता है जो मनुष्य के लिए अदृश्य हैं और जिसकी कल्पना करना उसके लिए कठिन है, उदाहरण के लिए आत्मा की प्रबुद्धता, आत्मा का दिल को छू लेना, और आत्मा का मार्गदर्शन, लेकिन समझदार इंसान को वे कोई स्पष्ट अर्थ प्रदान नहीं कर सकते। वे केवल एक चलता-फिरता या एक मोटे तौर पर समान अर्थ प्रदान कर सकते हैं, और शब्दों से कोई निर्देश नहीं दे पाते। जबकि, देह में परमेश्वर का कार्य बहुत भिन्न होता है : इसमें वचनों का सटीक मार्गदर्शन होता है, और स्पष्ट इरादे और स्पष्ट अपेक्षित लक्ष्य जुड़े होते हैं। इसलिए इंसान को अँधेरे में भटकने या अपनी कल्पना का उपयोग करने की कोई आवश्यकता नहीं होती है, और अंदाज़ा लगाने की तो बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं होती। देह में किया गया कार्य बहुत स्पष्ट होता है, और उसका कार्य आत्मा के कार्य से काफी ज्यादा भिन्न होता है। आत्मा का कार्य केवल एक सीमित दायरे में ही उपयुक्त होता है, यह देह के कार्य का स्थान नहीं ले सकता। देह के कार्य द्वारा जो सटीक लक्ष्य अपेक्षित हैं, और इस कार्य से मनुष्य ज्ञान का जो व्यावहारिक मूल्य प्राप्त करता है, वह आत्मा के कार्य की सटीकता और व्यावहारिक मूल्य से कहीं ज्यादा है। भ्रष्ट मनुष्यों के लिए, केवल वही कार्य जो अनुसरण के लिए सटीक वचन और स्पष्ट लक्ष्य प्रदान करे, जो दृश्यमान और मूर्त हो, वही सबसे मूल्यवान प्रकार का काम है। केवल यथार्थवादी कार्य और समयोचित मार्गदर्शन ही मनुष्य की अभिरुचियों के लिए उपयुक्त होता है, और केवल व्यावहारिक कार्य ही मनुष्य को उसके भ्रष्ट और पतित स्वभाव से बचा सकता है। इसे केवल देहधारी परमेश्वर हासिल कर सकता है; केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य को उसके पुराने भ्रष्ट और पतित स्वभाव से बचा सकता है। यद्यपि आत्मा परमेश्वर का अंतर्निहित सार है, फिर भी इस तरह का कार्य केवल उसकी देह के द्वारा ही किया जा सकता है। यदि आत्मा अकेले ही कार्य करता, तब उसके कार्य का प्रभावी होना संभव नहीं होता—यह एक स्पष्ट सत्‍य है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

हालाँकि परमेश्वर की देहधारी देह परमेश्वर की पहचान और दर्जे से बिल्कुल मेल नहीं खाती, और मनुष्य को परमेश्वर के वास्तविक मूल्य से असंगत प्रतीत होती है, फिर भी यह देह, जिसके पास परमेश्वर की अंतर्निहित छवि या परमेश्वर की अंतर्निहित पहचान नहीं है, वह कार्य कर सकती है जिसे परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर करने में असमर्थ है। ये हैं परमेश्वर के देहधारण के अंतर्निहित मायने और मूल्य, इस महत्व और मूल्य को इंसान न तो समझ पाता है और न ही स्वीकार कर पाता है। यद्यपि सभी लोग परमेश्वर के आत्मा का आदर करते हैं और परमेश्वर की देह का तिरस्कार करते हैं, फिर भी इस बात पर ध्यान न देते हुए कि वे क्या सोचते-समझते हैं, देह के व्यावहारिक मायने और मूल्य आत्मा से बहुत बढ़कर हैं। निस्संदेह, यह केवल भ्रष्ट मनुष्य के संबंध में है। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो सत्य खोजते हैं और परमेश्वर के प्रकटन के लिए लालायित रहते हैं, आत्मा का कार्य केवल दिल को छू सकता है या प्रेरणा प्रदान कर सकता है, और आश्चर्य की यह भावना दे सकता है कि यह कार्य अद्भुत, अथाह और अकल्पनीय है और यह भावना प्रदान कर सकता है कि यह महान, उत्कृष्ट और प्रशंसनीय है, फिर भी सबके लिए अप्राप्य और अगम्य भी है। मनुष्य और परमेश्वर का आत्मा एक-दूसरे को केवल दूर से ही देख सकते हैं, मानो उनके बीच बहुत ज्यादा दूरी हो और वे कभी भी एक समान नहीं हो सकते, मानो मनुष्य और परमेश्वर किसी अदृश्य विभाजन रेखा द्वारा अलग कर दिए गए हों। वास्तव में, यह पवित्रात्मा के द्वारा मनुष्य को दिया गया एक मायाजाल है, जो इसलिए है क्योंकि पवित्रात्मा और मनुष्य दोनों एक ही प्रकार के नहीं हैं, दोनों एक ही संसार में कभी साथ नहीं रह सकते और क्योंकि पवित्रात्मा में मनुष्य का कुछ भी नहीं है। इसलिए मनुष्य को आत्मा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आत्मा सीधे तौर पर वह कार्य नहीं कर सकता जिसकी मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता है। देह का कार्य मनुष्य को अनुसरण के लिए व्यावहारिक लक्ष्य, स्पष्ट वचन और यह एहसास देता है कि परमेश्वर व्यावहारिक और सामान्य है, वह विनम्र और साधारण है। भले ही मनुष्य उससे डरता हो, फिर भी अधिकतर लोगों के लिए वह काफी हद तक पहुँच में है। मनुष्य उसका चेहरा देख सकता है, उसकी वाणी सुन सकता है, इंसान को उसे दूर से देखने की आवश्यकता नहीं है। यह देह इंसान को निकट लगती है, दूर या अथाह नहीं, बल्कि दृश्यमान और पहुँच में लगती है, क्योंकि यह देह उसी संसार में है जिसमें मनुष्य है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

क्योंकि जिसका न्याय किया जाता है वह मनुष्य है, मनुष्य जो कि हाड़-माँस का है और भ्रष्ट किया जा चुका है, और यह शैतान की आत्मा नहीं है जिसका सीधे तौर पर न्याय किया जाता है, इसलिए न्याय का कार्य आध्यात्मिक जगत में कार्यान्वित नहीं किया जाता, बल्कि मनुष्यों के बीच किया जाता है। मनुष्य की देह की भ्रष्टता का न्याय करने के लिए देह में प्रकट परमेश्वर से अधिक उपयुक्त और कोई योग्य नहीं है। यदि न्याय सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया जाए, तो यह सर्वव्यापी नहीं होता, और तो और मनुष्य के लिए इसे स्वीकार करना कठिन होता, क्योंकि आत्मा मनुष्य के रूबरू आने में असमर्थ है। इस बिंदु के प्रकाश में, प्रभाव तत्काल नहीं होंगे, मनुष्य का परमेश्वर के उस स्वभाव को अधिक स्पष्टता से देखना तो और भी दूर की बात है जो अपमान बर्दाश्त नहीं करता है। यदि देह में प्रकट परमेश्वर मनुष्यजाति की भ्रष्टता का न्याय करे तभी शैतान को पूरी तरह से हराया जा सकता है। देह में प्रकट परमेश्वर भी सामान्य मानवता वाला व्यक्ति है, फिर भी वह सीधे तौर पर मनुष्य की अधार्मिकता का न्याय कर सकता है; यही उसकी जन्मजात पवित्रता, और उसके अनुपम होने का चिन्ह है। केवल परमेश्वर ही मनुष्य का न्याय करने के योग्य है, और उसका न्याय करने की स्थिति में है, क्योंकि वह सत्य और धार्मिकता को धारण किए हुए है, और इस प्रकार वह मनुष्य का न्याय करने में समर्थ है। जो सत्य और धार्मिकता से रहित हैं वे दूसरों का न्याय करने लायक नहीं हैं। यदि इस कार्य को परमेश्वर के आत्मा द्वारा किया जाता, तो इसका अर्थ शैतान पर विजय नहीं होता। आत्मा अंतर्निहित रूप से ही नश्वर प्राणियों की तुलना में अधिक उत्कृष्ट है, और परमेश्वर का आत्मा अंतर्निहित रूप से पवित्र है, और देह पर विजय प्राप्त किए हुए है। यदि आत्मा ने इस कार्य को सीधे तौर पर किया होता, तो वह मनुष्य के पूरे विद्रोहीपन का न्याय नहीं कर पाता, और उसकी सारी अधार्मिकता को प्रकट नहीं कर पाता। क्योंकि न्याय के कार्य को परमेश्वर के बारे में मनुष्य की धारणाओं के माध्यम से भी कार्यान्वित किया जाता है, और मनुष्य के अंदर कभी भी आत्मा के बारे में कोई धारणाएँ नहीं रही हैं, इसलिए आत्मा मनुष्य की अधार्मिकता को बेहतर तरीके से प्रकट करने में असमर्थ है, वह ऐसी अधार्मिकता को पूरी तरह से उजागर करने में तो बिल्कुल भी समर्थ नहीं है। देहधारी परमेश्वर उन सब लोगों का शत्रु है जो उसे नहीं जानते। उसके बारे में मनुष्य की धारणाओं और उसके विरोध का न्याय करके, वह मनुष्यजाति के सारे विद्रोहीपन को उजागर करता है। देह में उसके कार्य के प्रभाव आत्मा के कार्य की तुलना में अधिक स्पष्ट होते हैं। इसलिए, संपूर्ण मनुष्यजाति के न्याय को आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर सम्पन्न नहीं किया जाता, बल्कि यह देहधारी परमेश्वर का कार्य है। देहधारी परमेश्वर को मनुष्य देख और छू सकता है, और देहधारी परमेश्वर मनुष्य पर पूरी तरह से विजय पा सकता है। मनुष्य उसका विरोध करने से उसके प्रति समर्पण करने की ओर, उसका उत्पीड़न करने से उसे स्वीकार करने की ओर, उसके बारे में धारणा रखने से उसे जानने की ओर, और उसे अस्वीकार करने से उसे प्रेम करने की ओर—ये हैं देहधारी परमेश्वर के कार्य के प्रभाव। मनुष्य को परमेश्वर के न्याय की स्वीकृति से ही बचाया जाता है, वह परमेश्वर के बोले गए वचनों से ही धीरे-धीरे उसे जानने लगता है, परमेश्वर के प्रति उसके विरोध के दौरान परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर विजय पायी जाती है, और परमेश्वर की ताड़ना की स्वीकृति के दौरान वह उससे जीवन की आपूर्ति प्राप्त करता है। यह समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर के कार्य हैं, यह आत्मा के रूप में परमेश्वर के कार्य नहीं हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

देह में उसके कार्य की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह उन लोगों के लिए सटीक वचन, प्रोत्साहन और मनुष्यजाति के लिए अपने सटीक इरादों को उन लोगों के लिए छोड़ सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं, ताकि बाद में उसके अनुयायी देह में किए गए उसके समस्त कार्य और संपूर्ण मनुष्यजाति के लिए उसके इरादों को अत्यधिक सटीकता से, और अधिक व्यावहारिक शब्दों में उन लोगों तक पहुँचा सकें जो इस मार्ग को स्वीकार करते हैं। केवल मनुष्यों के बीच कार्य करता हुआ देहधारी परमेश्वर ही सही अर्थों में परमेश्वर के मनुष्य के साथ रहने और उसके साथ जीने को यथार्थ बनाता है और परमेश्वर के चेहरे को देखने, परमेश्वर के कार्य को देखने, और परमेश्वर के व्यक्तिगत वचन को सुनने की मनुष्य की इच्छा को पूरा करता है। देहधारी परमेश्वर उस युग का अंत करता है जब सिर्फ यहोवा की पीठ ही मनुष्यजाति को दिखाई देती थी, और साथ ही वह अज्ञात परमेश्वरों में मनुष्यजाति के विश्वास करने के युग को भी समाप्त करता है। विशेष रूप से, परमेश्वर के अंतिम देहधारण का कार्य संपूर्ण मनुष्यजाति को एक ऐसे युग में लाता है जो अधिक वास्तविक, अधिक व्यावहारिक, और अधिक सुंदर है। यह काम न केवल व्यवस्था और विनियमों के युग का ही अंत करता है, बल्कि अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह मनुष्यजाति पर ऐसे परमेश्वर को प्रकट करता है जो व्यावहारिक और सामान्य है, जो धार्मिक और पवित्र है, जो प्रबंधन योजना के कार्य का खुलासा करता है और मनुष्यजाति के रहस्यों और मंज़िल को प्रदर्शित करता है, जिसने मनुष्यजाति का सृजन किया और प्रबंधन कार्य को अंजाम तक पहुँचाता है, और जिसने हज़ारों वर्षों तक खुद को छिपा कर रखा है। यह काम अस्पष्टता के युग का पूर्णतः अंत करता है, यह उस युग का समापन करता है जिसमें संपूर्ण मनुष्यजाति परमेश्वर का चेहरा खोजना तो चाहती थी मगर खोज नहीं पायी, यह उस युग का अंत करता है जिसमें संपूर्ण मनुष्यजाति शैतान की सेवा करती थी, और यह संपूर्ण मनुष्यजाति की एक पूर्णतया नए युग में अगुवाई करता है। यह सब परमेश्वर के आत्मा के बजाए देह में प्रकट परमेश्वर के कार्य का परिणाम है। केवल जब परमेश्वर अपने देह में कार्य करता है, तभी जो लोग उसका अनुसरण करते हैं, वे अब और उन चीजों को खोजते और टटोलते नहीं हैं जो विद्यमान और अविद्यमान दोनों प्रतीत होती हैं, और अज्ञात परमेश्वरों के इरादों का अंदाजा लगाना बंद कर देते हैं। जब परमेश्वर देह में अपने कार्य को फैलाता है, तो जो लोग उसका अनुसरण करते हैं वे उसके द्वारा देह में किए गए कार्य को सभी धर्मों और पंथों में आगे बढ़ाएँगे, और वे उसके सभी वचनों को संपूर्ण मनुष्यजाति के कानों तक प्रसार करेंगे। उसके सुसमाचार को प्राप्त करने वाले जो सुनेंगे, वे उसके कार्य के तथ्य होंगे, और ऐसी चीजें होंगी जो मनुष्य के द्वारा व्यक्तिगत रूप से देखी और सुनी गई होंगी—ये तथ्य होंगे, अफवाह नहीं। ये तथ्य ऐसे प्रमाण हैं जिनसे वह कार्य को फैलाता है, और वे ऐसे साधन भी हैं जिन्हें वह कार्य को फैलाने में उपयोग करता है। बिना तथ्यों के उसका सुसमाचार सभी देशों और सभी स्थानों तक नहीं फैलेगा; बिना तथ्यों के केवल मनुष्यों की कल्पनाओं के सहारे, वह कभी भी संपूर्ण ब्रह्मांड पर विजय पाने का कार्य नहीं कर सकेगा। आत्मा मनुष्य के लिए अस्पृश्य और अदृश्य है, और आत्मा का कार्य मनुष्य के लिए परमेश्वर के कार्य के और प्रमाण या और तथ्यों को छोड़ने में असमर्थ है। मनुष्य परमेश्वर के असली चेहरे को कभी नहीं देखेगा, वह हमेशा ऐसे अज्ञात परमेश्वर में विश्वास करेगा जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। मनुष्य कभी भी परमेश्वर के मुख को नहीं देखेगा, न ही मनुष्य परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से बोले गए वचनों को कभी सुन पाएगा। आखिर, मनुष्य की कल्पनाएँ खोखली होती हैं, वे परमेश्वर के असली चेहरे का स्थान कभी नहीं ले सकतीं; मनुष्य परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर के कार्य का अभिनय नहीं कर सकता। स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर और उसके कार्य को केवल परमेश्वर के व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करने के लिए देह धारण करने और मनुष्य के बीच आने के द्वारा ही पृथ्वी पर लाया जा सकता है जो मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है। परमेश्वर के लिए मनुष्य के सामने प्रकट होने का और मनुष्य के लिए परमेश्वर को देखने और परमेश्वर के असली चेहरे को जानने का यही सबसे आदर्श तरीका है। इसे गैर-देहधारी परमेश्वर संपन्न नहीं कर सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

देहधारी परमेश्वर का कार्य देह में ही किया जाना चाहिए। यदि इसे सीधे तौर पर परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया जाए तो उसका कोई प्रभाव नहीं होगा। यदि इसे आत्मा द्वारा किया भी जाता, तो भी उस कार्य के कोई खास मायने नहीं होते, और अंततः यह आश्वस्त करने वाला सिद्ध नहीं हो पाता। सभी सृजित प्राणी जानना चाहते हैं कि क्या सृजनकर्ता के कार्य का कोई अर्थ है, यह क्या दर्शाता है, और यह किसलिए किया जाता है, क्या परमेश्वर का कार्य अधिकार और बुद्धि से पूर्ण है, और क्या यह अत्यंत मूल्यवान और सार्थक है। उसका कार्य सम्पूर्ण मनुष्यजाति के उद्धार के लिए, शैतान को हराने के लिए, और सभी चीज़ों में स्वयं की गवाही देने के लिए किया जाता है। इस तरह, उसका कार्य बेहद सार्थक होना चाहिए। मनुष्य की देह को शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, और इसे अत्यधिक अंधा कर दिया गया है और अत्यधिक नुकसान पहुँचाया गया है। परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से देहधारी होकर कार्य करने का सबसे मूलभूत कारण यह है कि उसके उद्धार का लक्ष्य मनुष्य है, जो देह से बना है, और इसलिए कि परमेश्वर के कार्य में बाधा डालने के लिए शैतान भी मनुष्य की देह का उपयोग करता है। दरअसल, शैतान के साथ युद्ध इंसान पर विजय पाने का कार्य है, और साथ ही, इंसान परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य भी है। इस प्रकार अपना कार्य करने के लिए परमेश्वर का देहधारी होना अत्यावश्यक है। शैतान ने मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर दिया और मनुष्य शैतान का मूर्त रूप बन गया है, परमेश्वर द्वारा हराए जाने का लक्ष्य बन गया है। इसलिए, पृथ्वी पर शैतान से युद्ध करने और मनुष्यजाति को बचाने का कार्य किया जाता है। इसलिए शैतान से युद्ध करने के लिए परमेश्वर का मनुष्य बनना आवश्यक है। यह अत्यंत व्यावहारिकता का कार्य है। जब परमेश्वर देह में कार्य कर रहा होता है, तो वह वास्तव में देह में शैतान से युद्ध कर रहा होता है। जब वह देह में कार्य करता है, तो वह आध्यात्मिक क्षेत्र का अपना कार्य कर रहा होता है, वह आध्यात्मिक क्षेत्र के अपने समस्त कार्य को पृथ्वी पर साकार करता है। जिस पर विजय पाई जाती है वो इंसान है, वह इंसान जो उसके प्रति विद्रोही है, जिसे पराजित किया जाता है वो शैतान का मूर्त रूप है (बेशक, यह भी इंसान ही है), जो उससे शत्रुता रखता है, और अंततः जिसे बचाया जाता है वह भी इंसान ही है। इसलिए, यह परमेश्वर के लिए और भी अधिक आवश्यक हो जाता है कि वह ऐसा इंसान बने जिसका बाहरी आवरण एक सृजित प्राणी का हो, ताकि वह शैतान से असल युद्ध कर सके, उस इंसान पर विजय पाने के लिए जो उसके प्रति विद्रोही है, उसके समान बाहरी आवरण धारण किए हुए है और उस इंसान को बचाने के लिए जिसका बाहरी आवरण उसी के समान है और जिसे शैतान द्वारा नुकसान पहुँचाया गया है। उसका शत्रु मनुष्य है, उसकी विजय का लक्ष्य मनुष्य है, और उसके उद्धार का लक्ष्य भी मनुष्य ही है, जिसे उसने बनाया है। इसलिए उसे मनुष्य बनना ही होगा, और इस तरह, उसका कार्य बहुत आसान हो जाता है—वह शैतान को हराने और मनुष्य को जीतने में समर्थ है, और भी अधिक मानवजाति को बचाने में सक्षम है। ... यह देह मानवजाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह इंसान है और उससे भी बढ़कर वह परमेश्वर है, क्योंकि वह उस कार्य को कर सकता है जिसे कोई देह का साधारण इंसान नहीं कर सकता है, क्योंकि वह भ्रष्ट इंसान को बचा सकता है, जो उसके साथ पृथ्वी पर रहता है। हालाँकि वह भी इंसान है, फिर भी देहधारी परमेश्वर किसी भी मूल्यवान व्यक्ति की तुलना में मानवजाति के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह उस कार्य को कर सकता है जो परमेश्वर के आत्मा के द्वारा नहीं किया जा सकता, वह स्वयं परमेश्वर की गवाही देने के लिए परमेश्वर के आत्मा की तुलना में अधिक सक्षम है, और मानवजाति को पूरी तरह से प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के आत्मा की तुलना में अधिक समर्थ है। नतीजतन, यूँ तो यह देह सामान्य और साधारण है, फिर भी मानवजाति के प्रति उसके योगदान और मानवजाति के अस्तित्व के लिए उसके महत्व के संदर्भ में वह अत्यंत अनमोल है और कोई भी इंसान इस देह के वास्तविक मूल्य तथा महत्व को नहीं माप सकता है। यूँ तो यह देह शैतान को सीधे नष्ट नहीं कर सकती है, फिर भी देहधारी परमेश्वर मानवजाति को जीतने और शैतान को हराने के लिए अपने कार्य का उपयोग कर सकता है, शैतान को पूरी तरह से अपने प्रभुत्व के अधीन कर सकता है। चूँकि परमेश्वर देहधारी हुआ है, इसलिए वह शैतान को हरा सकता है और मानवजाति को बचाने में सक्षम है। वह शैतान को सीधे नष्ट नहीं करता है, बल्कि उस मानवजाति को जीतने का कार्य करने के लिए देहधारी हो जाता है जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया है। इस तरह से, वह अपने सृजित प्राणियों के बीच बेहतर ढंग से स्वयं की गवाही दे सकता है और वह भ्रष्ट हुए इंसान को बेहतर ढंग से बचा सकता है। परमेश्वर के आत्मा के द्वारा शैतान के प्रत्यक्ष विनाश की तुलना में देहधारी परमेश्वर के द्वारा शैतान की पराजय अधिक बड़ी गवाही देती है और ज्यादा आश्वस्त करने वाली है। देहधारी परमेश्वर सृष्टिकर्ता को जानने में मनुष्य के लिए अधिक सहायक है और अपने सृजित प्राणियों के बीच स्वयं की बेहतर ढंग से गवाही दे सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की ज्यादा आवश्यकता है

पिछला: 8. हम मानते हैं कि बुद्धिमान कुँवारियों द्वारा तेल तैयार करने का अर्थ है प्रार्थना में अचल होना, धर्मशास्त्रों का पढ़ना, और सभा में उपस्थित होना, प्रभु के लिए यत्नपूर्वक काम करना, और सतर्कता से प्रभु की वापसी की प्रतीक्षा करना। एक बुद्धिमान कुँवारी होने का मतलब यही है, और जब परमेश्वर लौटता है, तो हम दूल्हे का स्वागत करेंगे और मेम्ने की दावत में भाग लेंगे।

अगला: 2. मैंने कई सालों से प्रभु में विश्वास किया है, और मैंने बाइबल को बहुत पढ़ा है। क्यों मैंने मनुष्य के पुत्र के रूप में परमेश्वर के देह बनने और अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करने के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं पढ़ी है? आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु देह में लौट आया है, कि वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, और यह कि वह अंतिम दिनों का न्याय का कार्य कर रहा है। क्या बाइबल में इसका कोई आधार है?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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5. पुराने और नए दोनों नियमों के युगों में, परमेश्वर ने इस्राएल में काम किया। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की कि वह अंतिम दिनों के दौरान लौटेगा, इसलिए जब भी वह लौटता है, तो उसे इस्राएल में आना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु पहले ही लौट चुका है, कि वह देह में प्रकट हुआ है और चीन में अपना कार्य कर रहा है। चीन एक नास्तिक राजनीतिक दल द्वारा शासित राष्ट्र है। किसी भी (अन्य) देश में परमेश्वर के प्रति इससे अधिक विरोध और ईसाइयों का इससे अधिक उत्पीड़न नहीं है। परमेश्वर की वापसी चीन में कैसे हो सकती है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति-जाति में मेरा नाम महान् है..., सेनाओं के यहोवा का यही वचन है” (मलाकी...

प्रश्न 1: सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है," तो मुझे वह याद आया जो प्रभु यीशु ने एक बार कहा था, "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा" (यूहन्ना 4:14)। हम पहले से ही जानते हैं कि प्रभु यीशु जीवन के सजीव जल का स्रोत हैं, और अनन्‍त जीवन का मार्ग हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर और प्रभु यीशु समान स्रोत हों? क्या उनके कार्य और वचन दोनों पवित्र आत्मा के कार्य और वचन हैं? क्या उनका कार्य एक ही परमेश्‍वर करते हैं?

उत्तर: दोनों बार जब परमेश्‍वर ने देह धारण की तो अपने कार्य में, उन्होंने यह गवाही दी कि वे सत्‍य, मार्ग, जीवन और अनन्‍त जीवन के मार्ग हैं।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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